पिंजरा और पंख-22
लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
शांता निकेतन होस्टल के कमरा 106 में सुबह की धूप प्रवेश कर चुकी थी. शगुन ने अपना खादी का सादा हल्के भूरे रंग का कुर्ता, सफेद पायजामा पहना, सफेद दुपट्टा गले में डाला. किरण अपना कुर्ता प्रेस कर रही थी. "हमारे यहाँ तो खादी भी अलग होती है," उसने गर्व से कहा, "सुघड़ हाथों से काती हुई, एकदम महीन."
शगुन ने ध्यान से देखा. किरण के कपड़ों की खादी वाकई महीन थी. उसकी खुद के कपड़े बाजार की साधारण खादी के थे. प्रियंका की वर्दी और भी सादी थी, पर साफ-सुथरी. सीमा की वर्दी थोड़ी मोटी, जैसे टिकाऊपन ज्यादा मायने रखता हो.
"कल मंगलवार है," प्रियंका ने कैलेंडर देखते हुए कहा, "साप्ताहिक छुट्टी का दिन. कोई क्लास नहीं और ऊपर से मैस में स्पेशल डिश भी.”.
सीमा मुस्कुराई, "हमारे घर में भी मंगलवार को मीठा बनता है. यहाँ तो मैस में कल पूरी, सब्जी और खीर बनेंगी."
किरण ने उत्साह से कहा, "हाँ! मंगलवार को तो हमेशा विशेष भोजन होता है. सबसे अच्छे भोजन का दिन."
प्रियंका ने सिर हिलाया, "शाकाहारी, शुद्ध भोजन. अच्छा है."
शगुन ने सोचा, “सप्ताह में एक दिन की छुट्टी, पर मैस में विशेष भोजन. बनस्थली की अपनी लय. पर क्या इस ‘विशेष’ में भी सबके लिए एक जैसा ‘विशेष’ है?
भोजनशाला में नाश्ते के समय, सबका खाना एक जैसा था. दलिया और दूध. फातिमा, एक मुस्लिम लड़की जो अक्सर उनके साथ बैठती थी, ने धीरे से कहा, "हमारे यहाँ तो जुम्मे (शुक्रवार) का दिन खास होता है. पर यहाँ का मंगल भी अच्छा है."
"अच्छा है". शगुन ने शब्द पकड़े. पर क्या वास्तव में अच्छा है? क्या जो उसके लिए "विशेष" है, वह फातिमा के लिए भी उतना ही "विशेष" है?
दोपहर की कक्षा में, अंग्रेजी की मैडम ने एक कविता पढ़ी, "भारत की विविधता" पर. फिर चर्चा छिड़ गई.
"हमारे भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती है इसकी विविधता," मैडम ने कहा.
प्रियंका ने हाथ उठाया, "मैडम, पर विविधता में एकता भी तो होनी चाहिए. सबको एक सूत्र में बाँधने वाली कोई बात."
किरण बोली, "जैसे हम सब यहाँ खादी वस्त्रों में हैं."
सीमा चुप रही. शगुन ने देखा, वह कुछ कहना चाहती थी, पर शायद हिम्मत नहीं हुई.
फातिमा ने धीरे से कहा, "विविधता तभी सुंदर है जब सबको बराबर का सम्मान मिले."
प्रियंका ने फातिमा की ओर देखा. कोई प्रतिक्रिया नहीं. शगुन ने सोचा, क्या यह चुप्पी भी एक तरह की प्रतिक्रिया है?
शाम के भोजन का समय हुआ तो सब मैस की ओर चल पड़ीं. सीमा ने जाते समय अपनी अलमारी से एक डिब्बा निकाला और साथ ले लिये.
जब भोजन परस दिया गया तो. सीमा ने कहा, “मैं अचार साथ लायी हूँ, माँ के हाथ का बना. मेरी माँ बहुत टेस्टी अचार बनाती हैं. चखोगी तो उंगलियाँ चाटती रह जाओगी.” उसने चम्मच की मदद से डिब्बे से अचार निकाल कर अपनी प्लेट में रखा और डब्बा किरण की तरफ बढ़ा दिया.
किरण ने उत्साह से अपनी प्लेट में रखा और चख कर एक चटकारा लेकर कहा. "बहुत स्वादिष्ट है!" शगुन ने भी प्रशंसा की.
प्रियंका ने हाथ के इशारे से अचार के लिए इनकार कर दिया. "मैं तो अभी भरपेट खा चुकी हूँ," उसने कहा.
शगुन ने देखा, प्रियंका की आँखों में वही हिचक थी. ब्राह्मण लड़की. एससी परिवार का अचार. पारंपरिक दूरी.
सीमा ने भी देख लिया. उसने डिब्बा बंद कर दिया. "कोई बात नहीं," उसने कहा, पर आवाज़ में एक टूटन थी. और किसी की निगाह नहीं पड़ी, पर शगुन ने देख लिया था कि उसकी आँखों में पानी छलक आया था.
सब अपने कमरे में पहुँची. कुछ देर बाद, प्रियंका ने अपनी अलमारी से एक पैक निकाला, चॉकलेट हैं, भैया ने भिजवायी थीं. "चलो, यह खाते हैं," उसने कहा, और सबको बाँटने लगी.
सीमा ने हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया. "नहीं... मैं तो मीठा कम खाती हूँ," उसने कहा.
अब प्रियंका का चेहरा उदास हो गया. शगुन ने देखा, एक चक्र पूरा हो गया था. अचार और चॉकलेट के बीच. दो दुनियाओं के बीच.
रात को, जब सब सो चुके थे, शगुन ने अपनी निकाल कर टॉर्च जलाई और डायरी लिखने बैठी.
"आज समझा: बनस्थली हमें बाहर से एक जैसा बनाती है.
एक जैसे खादी वस्त्र. एक जैसा भोजन. एक जैसे नियम.
पर अन्दर...
अन्दर हम अलग-अलग हैं.
किरण में राजपूत का गर्व है.
प्रियंका में ब्राह्मण का अहंकार.
सीमा में छुआछूत का दंश.
फातिमा में अल्पसंख्यक की असुविधा है.
और मुझ में...?
एक वैश्य लड़की की उलझन है.
जो देख रही है कि वर्ण, जाति, धर्म...
ये रेखाएँ वस्त्रों के नीचे भी जीवित हैं.
आज प्रियंका की हिचक...
सीमा के आँसू...
फातिमा की कसक...
बताते हैं कि, एकरूपता का दावा...
एक भ्रम है.
हम सब यहाँ हैं, अलग-अलग पृष्ठभूमि से.
हमारी एक जैसी किताबें, एक जैसे वस्त्र.
हमारे मन, वे फिर भी अलग हैं
अचार और चॉकलेट सिर्फ खाने का आदान-प्रदान नहीं
दो दुनियाओं का, दो सामाजिक वास्तविकताओं का मौन टकराव था.
किरण ने सीमा का अचार चखा.
प्रियंका ने नहीं चखा. दोनों सामाजिक रूप से ऊपर हैं
फिर ये अंतर क्यों?
सीमा ने प्रियंका की चॉकलेट क्यों नहीं ली?
अहं ने क्या अहं को जगाया
या केवल अपना सम्मान बचाया?
मैंने दोनों चखे,
पर क्या मैं दोनों की दुनियाओं को समझ पाई?
नहीं.
नियम हैं, और हम एक जैसे खादी वस्त्र पहन रहे हैं.
पर मन? वह तो नहीं बदला.
नियमों ने व्यवहार बदला,
संस्कार नहीं.
आज सीमा के आँसू कहते थे
लड़ाई सिर्फ पितृसत्ता से नहीं
इन अदृश्य दीवारों से भी है.
एक जैसे वस्त्र और भोजन
बन जाते हैं परतें
ढकते हैं भेदों को
हमें पहचानने होंगे ये भेद
और स्वीकारना होगा उन्हें.
मन मिलें और जुड़ें दृढ़ता से
पर कैसे?
शगुन ने डायरी बन्द की
बाहर ढका हुआ था
सब कुछ अंधकार से
सब कुछ था एकरूप
यह एकरूपता क्या कृत्रिम थी?
वह सोच रही थी.
फिर निद्रा ने उसे अपने आगोश में ले लिया
नए दिन में नयी ताजगी के लिए.
... क्रमशः
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