लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी
डॉ. आर्यन मिश्रा ने अपनी कॉफ़ी की चुस्की ली और कम्प्यूटर स्क्रीन से नज़र हटाकर प्रोफेसर राजीव सेठ की ओर देखा. "सर, कल रात मैंने एक कहानी 'घिरनियाँ' पढ़ी. उसमें प्रोफेसर पात्र का वह कथन – 'सारे विचार भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं' – मुझे मेरे न्यूरोसाइंस के शोध का सार प्रतीत हुआ."
प्रोफेसर सेठ मुस्कुराए. "तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारे शोध के निष्कर्ष उस साहित्यिक कथन की वैज्ञानिक पुष्टि करते हैं?"
"बिल्कुल!" आर्यन उत्साहित हो गया. "हमारे मस्तिष्क में लगभग 100 अरब न्यूरॉन्स हैं, सर. ये आपस में करीब 1000 ट्रिलियन कनेक्शन बनाते हैं. यह आकाशगंगा के तारों से भी जटिल नेटवर्क है. और हर विचार..." आर्यन ने अपनी उँगलियों से हवा में एक जाल सा बनाया, "सिर्फ इन न्यूरॉन्स के बीच इलेक्ट्रोकेमिकल संकेतों का एक विशिष्ट पैटर्न है. बिल्कुल 'घिरनियाँ' कहानी के उस गियर सिस्टम की तरह, जहाँ एक घिरनी की गति दूसरी को चलाती है, और यह शृंखला एक विचार या क्रिया को जन्म देती है."
"विस्तार से समझाओ," प्रोफेसर ने कहा, अपनी कुर्सी पर आराम से बैठते हुए, उनकी आँखों में एक जिज्ञासु चमक थी. वे जानते थे कि आर्यन न सिर्फ़ एक होनहार शोधकर्ता था, बल्कि विज्ञान के दर्शन पर गहराई से विचार करने वाला दिमाग़ भी था.
आर्यन ने एक नोटबुक खोली, जिसमें रंग-बिरंगे डायग्राम और समीकरण भरे हुए थे. "देखिए सर, एक न्यूरॉन आराम की अवस्था में -70 मिलीवोल्ट पर होता है. जब उसे संकेत मिलता है, तो सोडियम आयन अंदर आते हैं – इस तरह डिपोलराइज़ेशन की प्रक्रिया आरंभ होती है. एक सीमा पार करते ही +40 mV एक्शन पोटेंशियल बनता है, जो एक विद्युत तरंग की तरह एक्सॉन के सहारे दौड़ता है. फिर एक समय के बाद पोटेशियम आयन बाहर जाने लगते हैं – इस तरह रिपोलराइज़ेशन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, और न्यूरॉन फिर से आराम की अवस्था में लौट आता है. यही चक्र... यही भौतिक प्रक्रिया हर विचार, हर अनुभव, हर सपने की नींव है. जब आप अभी 'घिरनियाँ' शब्द सुन रहे हैं, तो आपके मस्तिष्क के वर्निके एरिया (Wernicke's Area) में न्यूरॉन्स का एक विशिष्ट समूह इसी तरह के इलेक्ट्रोकेमिकल तूफान से गुजर रहा है."
"प्रभावशाली," प्रोफेसर ने कहा, अपनी उँगलियों को एक पिरामिड की शक्ल में जोड़ते हुए. "पर कौशिक नामक वह छात्र जब पहली बार गियर को छूता है, तो उसे एक 'अहसास' होता है – एक आंतरिक झनझनाहट, एक जागृति. तुम्हारी FMRI और EEG मशीनें उस 'अहसास' को कैसे मापती हैं? क्या वह महज न्यूरल फायरिंग का एक और पैटर्न है, या कुछ और?"
आर्यन कुछ पल को चुप रहा, कॉफ़ी के मग को घूमता हुआ देखने लगा. "सर, हम न्यूरल एक्टिविटी के कोरेलेट माप सकते हैं. प्रेम के लिए ऑक्सीटोसिन और डोपामाइन का स्राव, डर के लिए एमिग्डाला की सक्रियता, ध्यान के लिए प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स का दोलन... पर..."
"पर 'अहसास' स्वयं?" प्रोफेसर ने पूछा, अपनी आवाज़ को कोमल बनाते हुए. "वह 'मैं' जो इन रसायनों को 'अपना' अनुभव बताता है? वह घिरनी जो सभी घिरनियों के घूमने को देख रही है, और अपने घूमने को भी महसूस कर रही है? वह चेतना, जो इन सब भौतिक प्रक्रियाओं का साक्षी है – क्या वह भी एक घिरनी है, या घिरनियों के जाल से उपजी कोई नई, अदृश्य वास्तविकता?"
शाम की लाली खिड़की से उनके कमरे में घुस रही थी, दीवारों को एक नारंगी आभा से रंगते हुए. प्रोफेसर ने खिड़की की ओर इशारा किया, जहाँ आकाश धीरे-धीरे गहरा हो रहा था. "देखो, 'घिरनियाँ' कहानी सरल थी – एक गियर सिस्टम, एक कुएँ की घिरनी. पर उसका सिद्धांत गहरा था. आज तुम मुझे मस्तिष्क की घिरनियाँ दिखा रहे हो – न्यूरॉन्स, सिनैप्स, न्यूरोट्रांसमीटर. और बाहर... ब्रह्मांड की घिरनियाँ."
"सितारे?" आर्यन ने पूछा, उसकी नज़र भी अब खिड़की के बाहर टिक गई थी.
"हाँ. मिल्की वे में 100 से 400 अरब तक तारे हैं. हमारे दिमाग़ में लगभग 100 अरब न्यूरॉन्स. क्या यह महज संयोग है?" प्रोफेसर ने अपनी कुर्सी से उठकर खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए. "या फिर जटिलता का एक सार्वभौम नियम है – कि जब भी अरबों इकाइयाँ आपस में जुड़ती हैं, तो कुछ 'नवीन' का उद्भव होता है? तारों के जाल से ग्रह और जीवन उभर आया... न्यूरॉन्स के जाल से... चेतना उभर आई? क्या यह सब एक ही महा-प्रक्रिया के विभिन्न स्तर हैं? जैसे फ्रैक्टल पैटर्न, जो हर स्केल पर खुद को दोहराते हैं?"
डॉ. आर्यन ने गहरी साँस ली. उसके मन में एक साथ कई विचार-घिरनियाँ घूमने लगी थीं. "तो आप कह रहे हैं कि चेतना, भौतिक प्रक्रियाओं का ही एक ऐसा उच्चस्तरीय गुण है, जिसे हम अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं? जैसे पानी के अणुओं की व्यवस्था से 'तरलता' का गुण उभरता है, वैसे ही न्यूरॉन्स की अत्यंत जटिल व्यवस्था से 'चेतना' उभर आती है?"
"हाँ," प्रोफेसर ने कहा, वापस अपनी कुर्सी की ओर मुड़ते हुए. "मैं यह नहीं कहता कि कोई गैर-भौतिक आत्मा है, जो मशीन में घुसी हुई है. मैं कहता हूँ कि भौतिकता ही इतनी जटिल, इतनी सुंदर हो सकती है कि वह... स्वयं को देखने लगे. 'घिरनियाँ' कहानी का वह प्रोफेसर सही था – “सभी विचार भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं”. पर वह यथार्थ इतना विशाल, इतना गहरा है, इतना परस्पर जुड़ा हुआ है कि उससे 'चेतना' जैसा अद्भुत, रहस्यमय गुण उभर आया है. और शायद, हमारी यह चेतना ही उस यथार्थ को समझने की कोशिश कर रही है – यह एक दर्पण में दर्पण को देखने जैसा है."
आर्यन ने अपनी कॉफ़ी की चुस्की ली, जो अब पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी, पर उसे इसका एहसास भी नहीं हुआ. "शायद हमारा काम इस भौतिक यथार्थ को समझने की कोशिश जारी रखना है – एक स्तर से दूसरे स्तर तक. हर नया शोध, हर नया तथ्य... एक नई घिरनी शुरू करता है, जो दूसरी घिरनियों को चलाती है, और ज्ञान का एक नया चक्र आरंभ होता है. और शायद, एक दिन, हम उस अंतिम घिरनी तक पहुँच जाएँगे... या फिर पाएँगे कि घिरनियों का अंत ही नहीं है, बस अनंत संपर्क है."
"बिल्कुल," प्रोफेसर ने कहा, एक संतुष्ट मुस्कान के साथ. "और सबसे सुंदर बात यह है कि ये सभी घिरनियाँ – मस्तिष्क की, ब्रह्मांड की, विचारों की, भावनाओं की – आपस में जुड़ी हैं. हम स्वयं उस संपर्क का प्रमाण हैं. एक ऐसा बिंदु जहाँ ब्रह्मांड स्वयं को प्रतिबिंबित करने लगा है. तारों की धूल से बने इस शरीर में, तारों जितने ही न्यूरॉन्स घूम रहे हैं, और उनसे उपजी चेतना, तारों के रहस्यों को जानने की चाह रखती है. यह एक स्व-संदर्भित कविता है, आर्यन, और हम उसके शब्द हैं."
बाहर, पहला तारा टिमटिमाया – शायद वह भी कोई दूर का सूर्य था, जिसके चारों ओर ग्रह घूम रहे होंगे, और शायद किसी ग्रह पर कोई और प्राणी, किसी और प्रयोगशाला में, इसी पल न्यूरॉन्स और तारों के बीच के संबंध पर विचार कर रहा होगा. अंदर, उस शांत कमरे में, दो वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में, अरबों न्यूरॉन्स की घिरनियाँ एक नए, गहरे विचार को जन्म दे रही थीं. वही पुराना सिद्धांत था, पर एक नए, विस्तृत स्तर पर – कि सभी घिरनियाँ एक दूसरे से जुड़ी हैं, और हर घूर्णन, हर संपर्क, इस विशाल ब्रह्मांडीय ताने-बाने में एक थ्रेड है. और शायद, चेतना ही वह वह चमकदार धागा है जो इन सभी थ्रेड्स को एक सार्थक पैटर्न में बुनता है – अस्थायी रूप से, नाज़ुक रूप से, अद्भुत रूप से.
नोट : डॉक्टर मित्र Navmeet Nav को धन्यवाद करते हुए. इस कहानी के लिए तकनीकी जानकारी प्राथमिक रूप से उन्हीं के एक लेख से प्राप्त हुई हैं.