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शनिवार, 14 मार्च 2026

पटकथा

'लघुकथा'
कोटा से बाराँ जाने वाली सड़क पर 50 किलोमीटर दूर बसे अंता कस्बे में भँवर का बचपन बीता. वहाँ घरों की बनावट कस्बे का माहौल ही ऐसा था कि मर्दानगी के लिए अलग से कोई पाठशाला नहीं खोलनी पड़ती थी; वह तो वहाँ की हवा और मर्दों की बैठकों के धुएँ में रची-बसी थी. भँवर ने बचपन से देखा कि घर के बड़े 'हुकम' उचारते थे और औरतों के स्वर घूंघट की ओट में कहीं लुप्त हो जाते थे.

भंवर की पूरी पढ़ाई एक 'लड़कों के स्कूल' में हुई. स्कूल एक ऐसा किला था जहाँ औरतों का प्रवेश वर्जित तो नहीं था, पर उनकी अनुपस्थिति एक 'सांस्कृतिक ज़रूरत' बना दी गई थी. स्कूल के लड़कों के लिए लड़कियां कोई हाड-माँस का इंसान नहीं, बल्कि 'इज्जत' या 'आफत' के दो खानों में बँटी हुई कल्पित आकृतियाँ थीं. वहाँ मर्दानगी का पैमाना था—बिना पलक झपकाए किसी की आँखों में देखना और अपनी जाति के रसूख को अपनी कमीज के कॉलर पर टांगे रखना.

फिर भंवर का सामना कुलदीप से हुआ. कुलदीप, जिसके पास अपनी जाति और अपने 'मर्दाना' होने का एक गहरा अहंकार था.

"देख भँवर, चंबल का पानी और हाड़ौती का खून... दोनों में उबाल रहना चाहिए," कुलदीप अक्सर अपनी बाइक को रेस देते हुए कहता. उसके लिए दबदबा ही एकमात्र सद्गुण था.

एक दिन, पुराने कस्बे के स्कूल से लौट रही लड़कियां कुएं की जगत पर बैठकर कुछ बातचीत करने लगी थीं. उनमें मास्टर जी की मंजरी भी थी. मास्टर जी कुछ चार साल कोटा में इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल के दफ्तर में सहायक रहे थे. मंजरी चार साल कोटा के किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ कर लौटी थी. उसकी चाल में दबी हुई सहम नहीं थी, होंठों पर मुस्कान बसती और आँखों में प्यार झलकता. उसकी काया में बेबसी की वह रेखा नहीं थी जिसे भँवर ने अपने घर की औरतों में देखा था. उसके बोल में 'हुकम' की गुलामी नहीं, बराबरी का आत्मविश्वास था. उसका स्वर कस्बे में पसरा सदियों का सन्नाटा तोड़ता लगता था. उस दिन कुलदीप ने उसे देखते ही अपनी बाइक का पहिया उसकी ओर मोड़ा और एक भद्दा मज़ाक उछाला.

"अरे भाई, ये तो शहर जाकर ज़्यादा ही पढ़ ली है," सड़क से गुजरते लड़के ठहर गए और ठहाका मारकर हँसे.

भंवर वहीं से गुजर रहा था. उसे लगा कि उसे भी इस ठहाके में शामिल होना चाहिए, क्योंकि यही उस 'पटकथा' की मांग थी जो उसे पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपी गई थी. लेकिन उस पल मंजरी ने अपनी नज़रें नीचे नहीं कीं. उसने रुककर कुलदीप की आँखों में सीधे झांका. उस नज़र में नफरत से ज़्यादा एक गहरी 'घृणा' थी, ऐसी घृणा जो किसी ताकतवर को बौना बना दे और बरसती आग सा क्रोध.

मंजरी ने सिर्फ इतना कहा, "कुलदीपे, ये जो तुम 'मर्दानगी' दिखा रहे हो न... ये तुम्हारे भीतर का डर है. तुम डरे हुए हो कि अगर हम तुम्हारे बराबर खड़े हो गए, तो तुम्हारी ये विरासत पसर जाएगी."

कुलदीप तिलमिला गया. उसने हाथ उठाया, लेकिन भंवर में, न जाने कहाँ से हिम्मत आ गई, उसने आगे बढ़ कर कुलदीप का हाथ पकड़ लिया.

"छोड़ दे कुलदीप," भँवर की आवाज़ कांप रही थी, पर उसमें एक ठहराव था. उसे न जाने क्या हुआ था. जैसे ही मंजरी ने कुलदीप की मर्दानगी को डर कहा, उसका दिमाग झनझना उठा था. फिर उसका हाथ बढ़ा और उसने कुलदीप का हाथ पकड़ लिया.

"तू पागल हो गया है? एक लड़की के लिए अपने दोस्त और अपनी बिरादरी के खिलाफ जाएगा?" कुलदीप की आवाज़ में पारंपरिक रोब था.

"बिरादरी के खिलाफ नहीं, खुद के खिलाफ जा रहा हूँ," भंवर ने जवाब दिया. "हम सालों से यही तो कर रहे हैं. चुप रहना, डराना और इसे ही मर्द होना समझना. पर हम ही तो डरते रहते हैं हर पल कि कोई बराबरी पर न आ खड़ा हो. मुझे अब ये डर का बोझ नहीं ढोना."

उस शाम भँवर जब घर लौटा, तो बैठक में सन्नाटा था. उसके पिता हुक्का पी रहे थे. भंवर ने पहली बार गौर किया कि उस सन्नाटे में कितनी घुटन थी. उसने अपनी माँ को देखा, जो रसोई की गर्मी में बिना पंखे के रोटियाँ बेल रही थी. वह अपनी माँ के पास जाकर बैठ गया, वहाँ, जहाँ अमूमन घर के 'मर्द' नहीं बैठते.

"माँ, आज से मैं स्कूल के बाद आपका हाथ बँटाऊँगा," उसने धीरे से कहा.

माँ ने रोटी बेलते बेलन को रोक कर भँवर की आँखों में देखा, वहाँ उसके प्रति शाब्दिक आदर नहीं बल्कि प्यार था.

उसके पिता ने चौंककर हुक्का छोड़ दिया. उनकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन भँवर की आँखों की 'भावनात्मक चुप्पी' टूट चुकी थी. उसे समझ आ गया था कि जिस मर्दानगी को वह अब तक अपना कवच समझता था, वह दरअसल उसके खुद के व्यक्तित्व की बेड़ियाँ थीं.

हाड़ौती की उस तपती दोपहर में चंबल के पानी ने भले अपना रास्ता न बदला हो, लेकिन भँवर ने पीढ़ियों से लिखी जा रही अपनी 'पटकथा' फाड़ दी थी. उसे अब समझ आ गया था कि असली मर्दानगी किसी को दबाने में नहीं, बराबरी से खड़े होने में है.

शनिवार, 2 दिसंबर 2023

एग्नोडिस : प्राचीन ग्रीस की पहली स्त्री चिकित्सक

प्राचीन ग्रीस में, स्त्रियों के लिए चिकित्सा का अध्ययन करना वर्जित था। 300 ईस्वी पूर्व में जन्मी, एग्नोडिस ने अपने बाल काटे और एक पुरुष के रूप में वस्त्र धारण करके अलेक्जेंड्रिया मेडिकल स्कूल में प्रवेश किया।


अपनी चिकित्सा शिक्षा पूरी करने के बाद एथेंस की सड़कों पर चलते समय, एग्नोडिस ने प्रसव पीड़ा में तड़प रही एक स्त्री की कराहट सुनाई दी। वह उस स्त्री के यहाँ पहुँच गयी। दर्द से कराहती स्त्री नहीं चाहती थी कि एग्नोडिस उसे छुए क्योंकि उसे लगा कि वह एक पुरुष है। किन्तु एग्नोडिस ने अपने कपड़े उतारकर साबित किया कि वह एक स्त्री है। उसने प्रसव कराया जिससे स्त्री ने बच्चे को जन्म दिया।

इस घटना का समाचार स्त्रियों में फैल गया और सभी महिलाएं जो बीमार थीं, एग्नोडिस के पास जाने लगीं। ईर्ष्यालु, पुरुष डॉक्टरों ने एग्नोडिस पर जिसे वे पुरुष मानते थे, आरोप लगाया कि उसने महिला रोगियों को धोखा दिया है। एग्नोडिस पर अदालत में मुकदमा चलाया गया और उसे मौत की सजा सुना दी। तब एग्नोडिस ने बताया कि वह एक स्त्री है, पुरुष।

यह जानने पर कि उसने स्त्री होते हुए भी पुरुष वेश धारण कर चिकित्सा अध्ययन किया है एग्नोडिस को स्त्री होते हुए भी छद्म पुरुष वेश धारण करने के लिए मौत की सजा सुना दी गयी। तब स्त्रियों ने विद्रोह कर दिया जिसमें सजा सुनाने वाले न्यायाधीशों की पत्नियाँ भी सम्मिलित थीं।

कुछ ने कहा कि अगर एग्नोडिस को मृत्युदंड दे दिया गया, तो वे उसके साथ अपने प्राण भी त्याग देंगी। अपनी पत्नियों और अन्य स्त्रियों के दबाव का सामना करने में असमर्थ, न्यायाधीशों ने एग्नोडिस को दोष मुक्त कर दिया। तब से स्त्रियों को भी चिकित्सा का अभ्यास करने की अनुमति दी गई, बशर्ते कि वे केवल स्त्रियों की देखभाल करें।

एग्नोडिस ने इतिहास में पहली स्त्री चिकित्सक और स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में अपनी पहचान बनाई।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

स्त्री-पुरुष संवाद अगस्त 2021

- आखिर, यह नियम किसने बनाया कि स्त्री एक से अधिक पुरुषों से यौन सम्बन्ध नहीं बना सकती, जबकि पुरुष एक से अधिक स्त्रियों से एक ही काल खंड में यौन संबंध बना कर रख सकता है?
- निश्चित रूप से, समाज ने.
- तो उस समाज में स्त्रियाँ नागरिक नहीं रही होंगी. उन्हें नागरिकों के कुछ अधिकार रहे हो सकते हैं, लेकिन वे पुरुष समान नहीं थे. रहे होते तो समाज में यह नियम चल नहीं सकता था.
- लेकिन अब तो सभ्य समाजों में दोनों के लिए यही नरम है.
- है, लेकिन वहीं, जहाँ पुरुष कमजोर है और नियमों को मानना उसकी विवशता है. यह विवशता हटते ही वह अपनी मनमानी करने लगता है.
- हां, ऐसा तो है.
- तो सबको मनमानी क्यों न करने दिया जाए, जब तक कि किसीज्ञके साथ जबर्दस्ती न की जाए? पुरुषों के लादे गए इस नियम को क्यों न ध्वस्त कर दिया जाए?
- उससे तो समाज में अराजकता फैल जाएगी. पुरुष को यह पता ही नहीं चलेगा कि कौन उसकी सन्तान है, और कौन नहीं? सन्तान की पहचान ही मिट जाएगी. शब्दकोश से पिता शब्द ही मिट जाएगा.
- केवल स्त्री संतान की पहचान क्यों नहीं हो सकती? जैसे सदियों से पुरुष चला आ रहा है.
- जरूर हो सकती है. लेकिन पुरुष भी उसकी पहचान बना रहे तो क्या आपत्ति हो सकती है?
- मुझे कोई आपत्ति नहीं. लेकिन देखा जाता है कि स्त्री पुरुष के बीच संबन्ध समाप्त हो जाने पर पुरुष सन्तान को स्त्री से छीनने की कोशिश करता है और अक्सर कामयाब भी हो जाता है.
- हाँ, यह तो है. पर समाज में स्त्री-पुरुष समानता स्थापित हो जाने पर ऐसा नहीं हो सकेगा.
- हा हा हा, अब आई नाव में गाड़ी. स्त्री-पुरुष समानता स्थापित हो जाने पर तो स्त्री-पुरुष के लिए समाज के नियम बराबर हो जाएंगे. फिर या तो यौन संबंधों के मामले में स्त्रियों को आजादी देनी होगी. या यह नियम बनाना होगा कि साथ रहने के काल खंड में दोनों किसी दूसरे के साथ यौन संबंध न बनाए.
- हां, यह तो करना पड़ेगा. पर फिर भी, गर्भकाल और संतान की परवरिश के आरंभिक काल में स्त्री कोई उत्पादक काम नहीं कर पाएगी. तब उत्पादक काम पुरुष को ही करने होंगे.
- तुम शायद भूल रहे हो कि मानव विकास के आरंभिक काल में जब मनुष्य केवल फल संग्राहक या शिकारी था तब तक एक मात्र उत्पादक कार्य संतानोत्पत्ति था और मनुष्य समाज का सबसे महत्वपूर्ण काम भी.
- हाँ, तब तो समाज में स्त्रियों की ही प्रधानता थी. वे ही सबसे महत्वपूर्ण थीं. वे ही समाज को नया सदस्य देती थीं. समाज के लिए एक सदस्य को खो देना आसान था, नए को जन्म देना और वयस्क और खुद मुख्तार होने तक पालन पोषण करना बहुत ही दुष्कर.
- और एक लंबे समय तक तो पुरुषों को यह भी पता नहीं था कि संतानोत्पत्ति में उनका भी कोई योगदान था. स्त्री ने खिलखिलाते हुए कहा.
- वही तो, तब पुरुषों की स्थिति अत्यंत दयनीय रही होगी. तभी उन्होंने पितृसत्ता स्थापित कर बदला लिया. पुरुष भी इतना कह कर खिलखिलाया.
- बहुत हुआ, तुम्हारा यह बदला-सिद्धान्त नहीं चलने का. सदियों पुरुष ने स्त्रियों को हलकान रखा है, अब ऐसा नहीं चलेगा. स्त्रियां तेजी से समझदार हो रही हैं. देख नहीं रहे. अभी तालिबान को काबुल पहुंचे हफ्ता भी नहीं हुआ कि वहाँ स्त्रियाँ दमन के विरुद्ध आवाज उठाने लगी हैं.
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सोमवार, 21 मई 2012

स्त्री के साथ छल से किया गया यौन संसर्ग पुलिस हस्तक्षेप लायक गंभीर अपराध नहीं


पुलिस के सामने इस तरह के मामले अक्सर आते हैं जिन में किसी महिला द्वारा यह शिकायत की गई होती है किसी पुरुष ने उस के साथ विवाह करने का विश्वास दिला कर यौन संसर्ग किया। पुरुष अब उस के साथ धोखा कर किसी दूसरी महिला के साथ विवाह कर लिया है या करने जा रहा है। शिकायत आने पर पुलिस भी इस तरह के मामले में कुछ न कुछ कार्यवाही करने के लिए तत्पर हो उठती है। मुंबई पुलिस ने इसी तरह के एक मामले को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 तथा 376 के अंतर्गत दर्ज कर लिया। ऐसी अवस्था में आरोपी गिरीश म्हात्रे को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। बंबई उच्च न्यायालय ने इस मामले में गिरीश म्हात्रे को अग्रिम जमानत का आदेश प्रदान कर दिया। इस मामले में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि विवाह का वायदा कर के किसी व्यक्ति के साथ यौन संसर्ग करना न तो बलात्कार की श्रेणी में आता है और न ही कोमार्य को संपत्ति माना जा सकता है जिस से इस मामले को धारा 420 के दायरे में लाया जा सके।

धारा 420 दंड संहिता के अध्याय 17 का एक भाग है जो संपत्ति के विरुद्ध अपराधों और चोरी के संबंध में है। इस कारण यह केवल मात्र संपत्ति से संबधित मामलों में ही लागू हो सकती है। इस धारा के अंतर्गत छल करना और संपत्ति हथियाने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करने के लिए दंड का उपबंध किया गया है। हालांकि धारा 415 में छल की जो परिभाषा की गई है उस में शारीरिक, मानसिक, ख्याति संबंधी या सांपत्तिक क्षतियाँ और अपहानि सम्मिलित है। लेकिन छल का यह कृत्य धारा 417 में केवल एक वर्ष के दंड से दंडनीय है और एक असंज्ञेय व जमानतीय अपराध है। जिस के अंतर्गत पुलिस कार्यवाही आरंभ करने के लिए सक्षम नहीं है केवल न्यायालय ही उसे की गई शिकायत पर उस का प्रसंज्ञान ले सकता है और उसे भी जमानत पर छोड़ना होगा।

दंड संहिता की धारा 376 के अंतर्गत किसी पुरुष द्वारा किसी 16 वर्ष की आयु प्राप्त स्त्री के साथ उस की असहमति से स्थापित किए गए यौन संसर्ग को अपराध ठहराया गया है यदि सहमति उस स्त्री के समक्ष उसे या उस के किसी प्रिय व्यक्ति को चोट पहुँचाने या हत्या कर देने का भय उत्पन्न कर के प्राप्त की गयी हो, या ऐसी सहमति उस स्त्री के समक्ष यह विश्वास उत्पन्न कर के प्राप्त की गई हो कि वह व्यक्ति उस का विधिपूर्वक विवाहित पति है, या ऐसी सहमति प्रदान करने के समय स्त्री विकृत चित्त हो, या किसी प्रकार के नशे में हो जिस से वह सहमति के फलस्वरूप होने वाले परिणामों के बारे में न सोच सके तो भी वह इस धारा के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। लेकिन किसी स्त्री को उस के साथ विवाह करने का या किसी भी अन्य प्रकार का कोई लालच दे कर उस के साथ यौन संसर्ग करने को बलात्कार का अपराध घोषित नहीं किया गया है।

स स्थिति का अर्थ है कि कोई भी पुरुष किसी भी स्त्री से जो 16 वर्ष की हो चुकी है छल करते हुए यौन संसर्ग स्थापित करे तो उसे अधिक से अधिक एक वर्ष के कारावास और अर्थदंड से ही दंडित किया जा सकता है। उस में भी कार्यवाही तब आरंभ की जा सकती है जब कि वह स्त्री स्वयं न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो कर शिकायत प्रस्तुत करे और उस का और उस के गवाहों का बयान लेने के उपरान्त न्यायालय यह समझे कि कार्यवाही के लिए उपयुक्त आधार मौजूद है। उस के उपरान्त साक्ष्य से यह साबित हो कि ऐसा छल किया गया था। इसे कानून ने कभी गंभीर अपराध नहीं माना है। यदि समाज यह समझता है कि इसे गंभीर अपराध होना चाहिए तो उस के लिए यह आवश्यक है कि छल करके किसी स्त्री के साथ किए गए यौन संसर्ग को संज्ञेय, अजमानतीय और कम से कम तीन वर्ष से अधिक अवधि के कारावास से दंडनीय अपराध बनाया जाए।

र्तमान उपबंधों के होते हुए भी कोई पुलिस थाना धारा 420 और धारा 376 के अंतर्गत इस कृत्य को अपराध मानते हुए प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करता है तो इस का अर्थ यही लिया जाना चाहिए कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का आशय मात्र आरोपी को तंग करना और उस से धन प्राप्त करना रहा होगा। क्या इसे एक भ्रष्ट आचरण मान कर रिपोर्ट दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करनी चाहिए?दर्ज करने का आशय मात्र आरोपी को तंग करना और उस से धन प्राप्त करना रहा होगा। क्या इसे एक भ्रष्ट आचरण मान कर रिपोर्ट दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करनी चाहिए?