@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: वडनेरकर जी की टाइम मशीन ने कराई भूतकाल की सैर - लगाई गांठें और बनाए गैजेट्स

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

वडनेरकर जी की टाइम मशीन ने कराई भूतकाल की सैर - लगाई गांठें और बनाए गैजेट्स

अजित वडनेरकर जी के शब्दों के सफर पर प्रकाशित आलेख ने एक टाइम मशीन की तरह काम करते हुए मुझे अपनी किशोरावस्था में पहुँचा दिया। शायद इसे ही कहते हैं भूतकाल की सैर करना। तो इस टाइम मशीन ने मुझे स्काउटिंग के कैंप में पहुँचाया। जहाँ मैं ने देखा कि मैं गाँठें सीख रहा हूँ। मैं ने बहुत सारी गांठें सीख ली हैं, जिन का उपयोग मैं अनेक कामों में कर सकता हूँ। जैसे रीफ नॉट है जिस का उपयोग किसी घाव पर पट्टी को अंतिम रूप देने के लिए किया जाता है, जिस से गांठ तो लगे लेकिन वह घाव में न चुभे। किसी स्तंभ से किसी पशु को बांधना हो तो खूंटा फाँस का उपयोग किया जा सकता है इसे अंग्रेजी में क्लोव हिच कहते हैं। लेकिन किसी पशु के गले में इसे न लगा देना, अन्य़था यह उस के लिए फाँसी का फंदा बन सकती है। वहाँ हमें लूप नॉट का प्रयोग करना होगा।



सी ही बहुत सी गांठे मैं ने सीखीं। फिर बहुत से स्काउटिंग के कैंपों में होता हुआ मैं एक कैंप में पहुँचा। यह भी एक प्रशिक्षण शिविर था जो माउंट आबू में लगाया गया था। इस में सब स्काउट प्रथम श्रेणी स्काउट का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। मैं अकेला था जो यह प्रशिक्षण पहले ही प्राप्त कर प्रमाण पत्र ले चुका था, मुझे राष्ट्रपति स्काउट का प्रशिक्षण लेना पड़ा। यहाँ रस्सियों, लट्ठों, बाँसों, केम्प क्षेत्र के वृक्षों आदि की सहायता से गाँठें लगा लगा कर मैं ने अनेक गैजेट्स बनाए। एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच एक पुल बनाया। दोनों और पुल तक पहुँचने के लिए रस्सियों की सीढ़ियाँ लगाई गईं। केम्प में उपस्थित प्रत्येक स्काउट और स्काउट मास्टर सीढ़ी पर हो कर पुल पर जाता है और पुल पार करता है फिर दूसरी ओर की सीढ़ी से उतरता है।




सा ही एक और शिविर है चम्बल के किनारे,  जहाँ प्रतियोगिता है। मैं एक गैजेट नाव बनाता हूँ जिस में एक बाईसिकल चढ़ाई जाती है। यह क्या? बाईसिकल पर बैठ कर  पैड़ल चलाते हुए नदी पार की जा सकती है। यानी अब बाईसिकल अब नदी में भी चल रही है।
मैं वापस वर्तमान में लौट आता हूँ। वडनेरकर जी के शब्दों के सफर  पर एक टिप्पणी करता हूँ। फिर एक वेबसाइट तलाशता हूँ। बहुत शानदार है यह वेबसाइट यहाँ गाँठें हैं और उन्हें सिखाने का पूरा प्रबंध है। आप इन्हें सीखना चाहते हैं तो नीचे के चित्र पर  या यहाँ क्लिक कीजिए, जो वेब-पृष्ठ खुले उस पर मौजूद किसी गाँठ पर क्लिक कीजिए। अरे वाह! यहाँ तो ऐनीमेशन पूरी गाँठ लगाना सिखा रहा है।




देखते हैं आप कितनी गाँठें कितने दिन, मिनटों या सैकंडों में सीखते हैं।

20 टिप्‍पणियां:

अफ़लातून ने कहा…

अच्छा लगा । आपको अजित की पोस्ट जितना पीछे ले गई उससे कम मुझे आपकी पोस्ट ले गई । मेरी बिटिया स्काउट - गाईड में जाती और उससे सुना बुलबुल और कब ।

Udan Tashtari ने कहा…

अरे, स्काऊट में ऐसी गांठे तो हमने भी सीखी थी.अब वडनेकर जी को देखते है कि क्या कहते हैं.

Khushdeep Sehgal ने कहा…

एक बार मक्खन भी स्कॉउटिंग कैंप में हमारे साथ गया था...नाश्ते में मक्खन की टिक्की भी मिली थीं...मक्खन ने जितनी नाश्ते के साथ खाई गईं, खा लीं...बाकी तीन चार जेब में भी डाल ली...अब बाहर धूप में परेड चालू हुई...मक्खन की स्काउट की बड़ी सी निकर से दोनों तरफ से मक्खन पिघलना शुरू हो गया...हम सबका हंस हंस कर बुरा हाल...और फिर जो मास्टर जी ने मक्खन की खबर ली...बस पूछो नहीं...

(ये वाक्या सच्चा है, बस दोस्त के असल नाम की जगह मक्खन कर दिया है)

जय हिंद...

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी है। बधाई आपको मगर हम तो वर्तमान मे ही ठीक हैं।

Arvind Mishra ने कहा…

ये गांठें मैंने अपने मत्स्य विगयान के डिप्लोमा में जाल बनाए के लिए सीखी थीं -कई तो कहतीं हैं !
गांठे तो खूब बनाओ मगर ध्यान रहे इतना रहे की वे बाहर की हों भीतर के मन की गांठे न हों !

Himanshu Pandey ने कहा…

स्काउट की ट्रेनिंग हमने भी ली है एक ट्रेनिंग के दौरान, मगर शायद वह प्रारंभिक ट्रेनिंग थी ! कुछ गांठे सीखीं थीं उस वक्त । एकाध लगा भी लेता हूँ ।

बेहतरीन प्रविष्टि । आभार ।

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

इसे पढकर स्काउट का महत्व समझ में आता है। शुक्रिया।
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महफ़ज़ भाई आखिर क्यों न हों एक्सों...?
जिसपर है दुनिया को नाज़, उसका जन्मदिवस है आज।

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

स्काउट्स को बहुत साफ सुथरे काम और करतब करते देखा है। और मैं अत्यन्त प्रभावित हुआ था उनसे।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बढिया जानकारी मिली और अब समझ आया कि जब वास्तविक इतनी प्रकार की गांठे होती हैं तो मन मे कितनी प्रकार की होती होंगी?:)

रामराम.

अजित वडनेरकर ने कहा…

बहुत खूब। स्काऊटिंग तो कभी नहीं की, हां हमारी माताजी जरूर स्काऊट गाईड रहीं थी और वे ये गांठें वगैरह बताती थीं। हम तो एनसीसी में थे।

बेनामी ने कहा…

आप मुझे भी स्काऊटिंग के दिनों की यादों में ले गए

Abhishek Ojha ने कहा…

गणित में गांठो के लिए अलग से शाखा है. नॉट थियोरी. पर इन गांठो से थोडा अलग है. मुझे आप उसकी क्लास में ले गए :)

Pawan Kumar ने कहा…

एक और गाँठ अपने बांधी है आपने हम सबके साथ......ब्लोगिंग गांठ वो भी बड़ी मज़बूत है.

Ashok Kumar pandey ने कहा…

दिनेश जी

अपनी तो यही दुआ की दिल में गिरहें कभी न पडें…पडीं तो आपसे ही पूछ लेंगे खोलने के तरीके।

बेनामी ने कहा…

ये लीजिए...
हम भी अपनी स्मृति में स्काउट के दिनों को टटोल आए...
रीफ़ नॉट यदि सही ना लगे तो वह थीफ़ नॉट कही जाती थी, जो कि खुलकर आपको धोखा दे सकती है...

धन्यवाद...

उम्मतें ने कहा…

अच्छी जानकारी

राज भाटिय़ा ने कहा…

आधी गांठे तो हम सीख भी गये,वेसे स्काऊट मै सीखी हो तो पता नही, लेकिन हम ने निशाना लगा जरुरे सीखा था, जो आज तक अचूक है

मनोज कुमार ने कहा…

अच्छी जानकारी

अजित वडनेरकर ने कहा…

सुबह आपकी टिप्पणी पढ़ कर कहना चाहता थी कि इस अनुभव को आपने बकलमखुद में क्यों नहीं डाला। सोचा कि क्यों दुखती रग छेड़ूं। आप वैसे ही बकलमखुद में अपनी अनकही के ज्यादा लंबा हो जाने को लेकर चिंता पाल रहे थे। फिर सोचा कि ये स्वतंत्र पोस्ट बन सकती है, आपके यहां। तब तक नीचे के लिंक पर ध्यान नहीं गया था। आपकी पोस्ट पर टिप्पणी कर चुकने के बाद ध्यान आया तब तक बिजली चली गई थी।
दिल की बात अब कह रहा हूं कि आपने इसे स्वतंत्र पोस्ट बनाया, उसका शुक्रिया।

विष्णु बैरागी ने कहा…

आप कह रहे हैं कि आपने गॉंठें लगाना सीखा। लेकिन हमें तो लग रहा है कि आप अतीत की गॉंठें खोलकर अपने रत्‍न लुटा रहे हैं।
खूब आनन्‍द आया आपकी यह पोस्‍ट पढ कर।