@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: व्यथा की थाह

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

व्यथा की थाह

शिवराम के तीन काव्य संग्रहों में एक है 'माटी मुळकेगी एक दिन'। बकौल 'शैलेन्द्र चौहान' इस संग्रह की कविताएँ प्रेरक और जन कविताएँ हैं। अनवरत पर इन कविताओं को यदा कदा प्रस्तुत करने का विचार है। प्रस्तुत है एक कविता......


व्यथा की थाह
  • शिवराम

किसी तरह 
अवसर तलाशो
उस की आँखों में झाँको


चुपचाप


गहरे और गहरे


वहाँ शायद 
थाह मिले कुछ


उस की व्यथा का 
पूछने से 
कुछ पता नहीं चलेगा।







10 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

ओह!! बहुत उम्दा!! शिवराम जी रचनायें बहुत सोचने को विवश करती हैं.

उम्मतें ने कहा…

सुचिंतित !

विष्णु बैरागी ने कहा…

बिलकुल 'सतसैया के दोहरे' की तरह। थोडे में बहुत, और बहुत गम्‍भीर।

जितेन्द़ भगत ने कहा…

मार्मि‍क।

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर और गहरे भाव लिये कविता बहुत अच्छी लगी । शिवराम जी को बधाई। आपका धन्यवाद्

prabhat gopal ने कहा…

बहुत अच्छी..

vandan gupta ने कहा…

behad gahre bhav liye ..........bahut hi sundar.

Amrendra Nath Tripathi ने कहा…

व्यथा से शक्ति पाने की कोशिश .. काबिलेतारीफ ..

Khushdeep Sehgal ने कहा…

इन आंखों पर पर्दा गिरा दो, बहुत बोलती हैं...

जय हिंद...

गौतम राजऋषि ने कहा…

छोटी किंतु सशक्त कविता।

संभव हो तो पुस्तक का प्रकाशन स्म्बधित जानकारी दें। शैलेन्द्र चौहान जी की कविताओं की तारीफ़ एक मित्र के मुख से भी सुना है।