@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

बधाई हो


अदालत की इमारत उस दिन जैसे मुस्करा रही थी. बरसात में महीनों तक छत टपकती रही, फाइलों पर पानी की बूंदें गिरती रहीं, और मरम्मत के लिए एक चिट्ठी बमुश्किल पीडब्ल्यूडी तक पहुँची. पर आज माहौल अलग था—जैसे दीवारों से सीलन उतर गई हो, जैसे गलियारों में धूप उतर आई हो.

खबर थी, “जज साहब का तबादला हो गया और साथ ही उन्हें रिटायरमेंट के चन्द महीनों पहले डिस्ट्रिक्ट जज बना दिया गया था.”
 
इस खबर से अदालत की दरारों में फँसी नमी तक मानो राहत की साँस ले रही थी. जज साहब वही थे जिनके बारे में मजदूरों और अभियुक्तों की दुनिया में एक ही कहावत चलती थी, "अगर तुम्हारा मामला इनके पास है, तो समझो तुम्हारा पक्ष पहले ही हार गया." दीवानी मामलों में सरकार के खिलाफ़ तब तक फैसला नहीं दिया जब तक कि सरकार की तरफ से पैरवी ही नहीं की गयी हो या फिर ऐसा करना बिल्कुल असंभव हो गया हो. फौजदारी मुकदमों में बरी होना तो मानो अपराध ही था. उनकी अदालत में अभियुक्त को खुद को पाक-साफ़ साबित करना पड़ता था, अभियोजन को कुछ भी साबित करने की ज़रूरत नहीं थी.

फिर जब श्रम न्यायालय में नियुक्त हुए तो मजदूरों की हालत और भी पतली हो गई. एक तो पहले ही उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों ने कानून की पुनर्व्याख्याएँ कर-कर के श्रमिक को सामाजिक न्याय प्रदान करने वाले कानून के झुकाव की दिशा नियोजक पक्ष की ओर मोड़ दी थी, दूसरे इन जज साहब का सोचना कमाल का था. जो कुछ साबित करना है वह मजदूर को ही साबित करना है. वे मजदूर के पक्ष को मजबूत करने वाले दस्तावेजों को जो नियोजक के कब्जे में होते अदालत में पेश करने का आर्डर कभी नियोजक को न देते. फैसले में लिखते यह मजदूर का दायित्व था. मजदूर सोचने लगे थे कि वे इन दस्तावेजों के लिए नियोजक के यहाँ चोरी करें या डाका डालें? नियोजक का पक्ष चाहे कितना भी खोखला हो, मजदूर को राहत मिलना ऊँट के मुहँ में जीरा ही साबित होता. मजदूर की गवाही अदालत की दीवारों तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती.

अब जब उनका तबादला हुआ और वे जिला जज बन गए, तो मजदूरों और उनके वकीलों ने राहत की साँस ली. अदालत के गलियारों में जज साहब के लिए बधाइयों की बौछार थी, "बधाई हो साहब बधाई.” मन ही मन बधाई देने वाला कह रहा होता, “अब हम भी चैन की नींद सो पाएंगे."
 
तबादला आदेश आने के तीन दिन बाद जज साहब ने रुखसत ली. वकील लोग आपस में एक दूसरे से पूछते, “फेयरवेल का क्या करें?” तो जवाब में फिर सवाल मिलता, “अब बधाई के चार शब्द बोल दिए वही क्या कम हैं? दूसरे जजों की तरह कर्मचारियों ने साहब के माथे टीका लगा कर माला पहनाई, मिठाई, कचौड़ियों और चाय से जलपान करवा कर फेयरवेल दिया. वकीलों की ओर से कोई विदाई समारोह नहीं हुआ, बस एक सामूहिक मुस्कान थी, जैसे किसी भारी बोझ से मुक्ति मिल गई हो.

जज साहब इस अदालत की अपनी कुर्सी से अन्तिम बार अत्यन्त खुश हो कर उठे, सोचते रहे कि जाते जाते उन्हें जिला जज बनने का मौका मिल ही गया. एक तरह से प्रमोशन ही समझो. लोगों ने इतनी बधाइयाँ दी जितनी इससे पहले उन्हें कभी नहीं मिलीं. यह कोई कम उपलब्धि नहीं थी.
 
अदालत के बाहर मजदूर और वकील आपस में फुसफुसा रहे थे, “आखिर साहब चले ही गए, अब शायद न्यायालय में न्याय भी लौट आए."

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

रैंप और गंगा

लघुकथा
सभागार में रोशनी झिलमिला रही थी.
रैंप पर कदमों की खटखटाहट, जैसे सदियों की चुप्पी पर चोट.

दरवाज़ा धड़ाम से खुला.
कुछ पुरुष भीतर घुसे, आवाज़ें गूँजीं गूंजने लगीं.

पहली पुरुष आवाज थी, "मॉडलिंग खत्म, घर जाओ. संस्कृति बचाओ."
यह आवाज गंगा की धारा को रोकने की कोशिश थी.

प्रतियोगी एक ने मुस्कराकर उत्तर दिया, "संस्कृति इतनी नाज़ुक है अगर, तो दुकानों से पश्चिमी कपड़े हटाइए."

तभी दूसरे पुरुष की आवाज गूंजी, उसमें गुस्सा भरा था. "सभ्यता ऐसे कपड़ों से टूटती है."

प्रतियोगी दो की आँखें चमकी और उसने अपने महीन स्वर में कहा, "और आप कौन हैं यह तय करने वाले, कि सभ्यता किससे टूटेगी?"

हॉल में सन्नाटा छा गया.

पुरुषों की आवाज़ें धीरे-धीरे खोने लगीं.

प्रतियोगी तीन का दृढ़ स्वर गूंजा, "हम यहाँ कपड़े दिखाने नहीं आए, हम अपने सपने सुनाने आए हैं."

रैंप अब लकड़ी का फर्श भर नहीं था.
अब वह एक पुल था, जिस पर से महिलाएँ अपने सपनों को समाज के उस पार ले जा रही थीं.
ऊँची एड़ी की खटखटाहट गूंजी, वह थी साहस की ऊँचाई.
हर कदम एक घोषणा, "हम पीछे नहीं हटेंगे."

बाहर गंगा बह रही थी, उसकी लहरें गा रही थी,
"संस्कृति वही है जो बहती रहती है ...
रुकती नहीं."

बुधवार, 10 दिसंबर 2025

अमूल्य घोड़ा

लघुकथा

अरब में एक साईस था, जो एक अमीर के घोड़ों की देखरेख करता था. अमीर के पास एक से एक बेहतरीन घोड़े थे. साईस की भी इच्छा थी कि उसका अपना घोड़ा हो, पर उसके पास इतना धन नहीं था. आखिर अपनी बचत से उसने मेले से एक घोड़े का बच्चा खरीदा और उसे बेटे की तरह पाला. वह उससे बातें करता, उसे दुलारता और अपनी सारी कमाई उसी पर खर्च करता.

जब घोड़ा जवान हुआ तो साईस को लगा कि ऐसा घोड़ा पूरे अरब में नहीं होगा. उसने सोचा कि इसकी असली पहचान तो मेले में ही होगी जहाँ सारे अरब से घोड़े आते हैं. अमीर से अवकाश लेकर वह अपने घोड़े को मेले में ले गया.

मेले में सबसे महंगे घोड़े की कीमत देखकर उसने अपने घोड़े की कीमत (टैग-प्राइस) उससे भी सवाई रख दी. लोग घोड़ा देखने आते, पर कीमत देखकर लौट जाते. तभी एक अमीर ने बोली लगाई. फिर दूसरा अमीर आया और उसने उससे अधिक बोली लगाई. इस तरह कीमत बढ़ती गई और टैग से भी दुगनी हो गई. जैसे जैसे उसकी कीमत बढ़ती जाती साईस का दिल डूबने लगता कि, मेरा बेटा मुझ से छिन जाएगा.

साईस मन ही मन सोचने लगा, ... "मैंने तो कीमत अपनी इच्छा से तय की थी, पर असली कीमत तो वही है जो लोग देने को तैयार हैं. मालिक की चाह अलग है, पर असली मूल्य बाजार ही तय करता है."

आखिरकार पहला अमीर मैदान छोड़ भागा और दूसरा अमीर खुश हुआ कि उसने पहले वाले अमीर को मात दे दी. पर जब मेले के अधिकारी ने रकम जमा करने को कहा तो वह अमीर बोला, "मैंने घोड़ा खरीदना नहीं है, मुझे तो बस दूसरे को पछाड़ने का सुख चाहिए था."

साईस बहुत खुश हुआ कि उसका बेटा-सा घोड़ा अब उसके पास ही रहेगा. वह अपने बेटे को साथ ले कर अमीर के पास लौटा. अमीर ने घोड़ा देखकर पूछा, "यह घोड़ा तुम लाए हो?"

साईस ने विनम्रता से कहा, "हुजूर, मेरी इतनी हैसियत कहाँ कि ऐसा घोड़ा खरीद सकूं. यह घोड़ा मैंने ही पाल-पोसकर अपने बेटे की तरह बड़ा किया है. मेले में इसकी कीमत मैंने सबसे महंगे घोड़े से सवाई रखी थी. पर दो रईस आए और बोली लगाने लगे. आखिर मेरी बताई कीमत से दुगने तक पहुँच गए. अचानक एक रईस ने बोली छोड़ दी. दूसरे ने इसे लेने से इन्कार कर दिया कि मैं तो बस दूसरे अमीर को पछाड़ना चाहता था. मेरा मकसद पूरा हुआ. यह कह कर वह मेला छोड़ कर चला गया.


कुछ रुक कर साईस ने फिर कहा, "असली कीमत वही बनी जो बाजार ने तय की. मैं खुश हूँ कि मेरा बेटा मेरे पास है. मैं इसे वापस ले आया हूँ. इसे आप मेरी ओर से नजराना समझ रख लीजिए. मैं इसी में खुश हूँ कि यह हमेशा मेरे पास रहेगा."

रईस ने खुश हो कर कहा, “भले ही मेले में इस घोड़े की कीमत सबसे अधिक लगी हो, लेकिन यह घोड़ा बेशकीमती ही नहीं, बल्कि अमूल्य है. इसकी कोई कीमत नहीं, जिसे कोई बाप की तरह प्यार करे उसकी कोई कीमत नहीं होती. यह घोड़ा तुम्हारा है और हमेशा तुम्हारा ही रहेगा. आज से यह इस घुड़साल में सबके साथ रहेगा."

मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

'पतंगबाज'

'लघुकथा'

रमन अपने दफ्तर जाने के लिए बस-स्टॉप पर खड़ा हो कर बस की प्रतीक्षा कर रहा था. तभी उसकी नजर सड़क के उस पार सामने वाले बस-स्टॉप के निकट फुटपाथ पर बैठे बच्चे पर पड़ी. यह बच्चा पास ही किसी झुग्गी में रहने वाले परिवार से दिखाई पड़ता था. उसने एक पुरानी गंदी निक्कर और पुरानी टी शर्ट पहने था. उसके पास एक लूटी हुई पतंग थी, जो किनारे से थोड़ी फटी थी। उसके पास लूटे हुए लेकिन उलझे हुए धागों के कुछ गुच्छे थे और पतंग के ऊपर रखी एक पुरानी चरखी भी. वह उन लूटे धागों के एक गुच्छे को सुलझा रहा था.

फुटपॉथ पर से गुजरने वाले लोग उस बच्चे को देखते और हँसते हुए गुजर जाते. शायद सोचते कि बच्चा इतनी मेहनत के बाद भी पतंग शायद ही उड़ा पाए, उड़ा कर खुश भी हो लेगा तो पेंच लड़ाने की तो कभी सोच भी न सकेगा.

कुछ देर बाद रमन ने देखा, उसने वह गुच्छा सुलझा लिया था और अब वह अपनी चरखी पतंग के ऊपर से उठा कर उस पर सुलझा हुआ धागा लपेट रहा था. तभी चरखा का वजन हट जाने से उसकी हरे पीले रंग की पतंग हवा के झोंके के साथ उड़ कर सड़क पर आ गयी। बच्चा चरखी वहीं रख तुरन्त पतंग उठाने दौड़ा. पतंग फिर उड़ी और एक स्कूटर का पिछला पहिया उस पर से गुजर गया। पतंग की हालत और खराब हो गयी. बच्चे ने फिर भी उसे न छोड़ा और उसे उठा कर वापस अपनी जगह जा बैठा. अब वह पतंग को देख रहा था कि उसकी हालत कैसी है. उसने पतंग को फिर से पास रख कर उस पर चरखी रख दी और धागों का दूसरा गुच्छा सुलझाने में तल्लीन हो गया. शायद उसे विश्वास हो गया था कि वह पतंग और डोर को फिर से उड़ाने योग्य बना लेगा. रमन की बस आ गयी थी. वह उसमें बैठा और दफ्तर के लिए रवाना हो गया.

शाम को दफ्तर से छूट कर रमन उसी रास्ते से वापस लौटा. अपने बस स्टॉप पर उतरते ही उसे सुबह वाले बच्चे का ध्यान आया. उसकी निगाह उस स्थान पर पड़ गयी जहाँ सुबह वह बच्चा बैठा था. यह जगह उसके बिलकुल नजदीक थी. अब बच्चा वहाँ नहीं था. तभी उसकी निगाह पास के स्कूल के सामने के मैदान पर पड़ी.
स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी. वहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे, कुछ पतंग उड़ा रहे थे. मैदान के कोने पर खड़ा सुबह वाला बच्चा उसी मरम्मत की हुई हरी पीली पतंग को उड़ा रहा था. उससे छोटे एक बच्चे ने उसकी चरखी थाम रखी थी. रमन मुस्कराकर अपने घर की ओर चल दिया.

मकर संक्रान्ति का दिन था. पूरे शहर में पतंगें उड़ायी जा रही थी. रमन जिस बिल्डिंग में रहता था उसमें कुल सोलह अपार्टमेंट थे, सबसे ऊपर छत थी, संक्रान्ति के दिन अपार्टमेंट वाले उसी छत से पतंग उड़ाते. दोपहर बाद रमन बाजार से तिल के लड्डू लेकर लौटा ही था कि बिल्डिंग के प्रवेश द्वारा पर वही पतंग वाला बच्चा एक और छोटे बच्चे के साथ खड़ा दिखायी दिया. छोटे बच्चे के हाथ में चरखी थी तो बड़े ने तीन चार सुधारी हुई पतंगें पकड़ रखी थीं. वे दोनों चौकीदार से कह रहे थे, “अंकल जी आपकी छत से पतंग उड़ा लें.”

चौकीदार उसे अंदर घुसने नहीं दे रहा था. रमन को लगा कि आज बच्चे का हुनर जरूर देखना चाहिए. उसने चौकीदार से कहा बच्चों को जाने दो. बच्चे ने चौकीदार की प्रतिक्रिया का इन्तजार के बिना तुरन्त अंदर सीढ़ियों की ओर भागे. कुछ देर बाद वे छत पर थे.

घंटे भर बाद जब रमन छत पर पहुँचा तो उसने देखा कि बच्चा छत पर पतंग उड़ा रहा है. उसकी चरखी बिल्डिंग के ही एक बच्चे ने पकड़ रखी है. तीन चार बच्चे उससे कह रहे हैं कि पास की नीली वाली पतंग पर पेंच डाल दे. तभी बच्चे की पतंग ने उस नीली पतंग पर पेंच डाला और दो ही सेकंड में नीली पतंग कट कर हवा में डोलती हुई नीचे गिरने लगी. छत पर सारे बच्चे हुर्रे करते हुए नाच रहे थे. वह पतंगबाज बच्चा उन सब का हीरो बना हुआ था. रमन को छत पर देख उसका बेटा पास आया और बोला, “ये बच्चा छीतर पतंग उड़ाने में माहिर है, उसने अपने पुराने लूटे हुए मांजे और लूटी हुई पतंगों से तीन पतंगें काट डाली हैं। पक्का पतंगबाज है. रमन उसकी बात सुन कर मुस्कराते हुए पतंगबाज का हौसला बढ़ाने वालों में शामिल हो गया.

सोमवार, 8 दिसंबर 2025

सर्वप्रिय भगवान

लघुकथा
गाँव के चौक में वह आदमी रोज़ खड़ा होता. उसकी आवाज़ में धर्म का जादू था और थी साम्प्रदायिकता की आग. वह लोगों में नफरत बाँटता. लोग उसे सुनते, झूमते, और धीरे-धीरे उसे अपना पथ प्रदर्शक मानने लगे. उसके पीछे चलने लगे. उस आदमी का नाम था ‘सर्वप्रिय’.

लोगों ने सर्वप्रिय को अपने कंधों पर उठा लिया. कंधों पर बैठ वह नगर पहुँचा. वहाँ भी धीरे धीरे लोग उसके पीछे हो लिए और उसे अपने कंधों पर उठाया.
 
वह प्रान्त की राजधानी पहुँचा. फिर इसी तरह वह एक दिन कंधों पर बिठा कर पहाड़ पर बसी देश की राजधानी पहुँचा दिया गया. वह पहाड़ की चोटी पर बैठ देश पर राज करने लगा.
 
उसे कंधों पर ढोने वाले उसे भगवान कहने लगे. इस तरह सर्वप्रिय भगवान हो गया.

लेकिन, धीरे-धीरे समाज टूटने लगा. नफरत ने समाज को अनेक हिस्सों में बाँट दिया.
• पड़ोसी दुश्मन बन गए.
• मज़दूरों की रोज़ी छिन गई.
• बच्चों की दोस्ती दीवारों में कैद हो गई.
• स्त्रियाँ भय में जीने लगीं.

इन आपदाओं से पीड़ित वही आम लोग थे, जिनमें से कुछ ने उसे कंधों पर उठाया था. उसे गाँव से देश की राजधानी की सबसे ऊँची चोटी पर बिठाया था. जिन्हें शांति चाहिए थी, रोटी चाहिए थी, और सम्मान चाहिए था. उनकी पीड़ा का असली जिम्मेदार वही था, जो धर्म और साम्प्रदायिकता को औज़ार बनाकर बाँट रहा था.

कुछ लोग शुरू से ही सच बोलते रहे. वे कहते—"यह भगवान नहीं, समाज का शत्रु है."

भीड़ ने उसे गद्दार कहा.

समय बीतता गया. पीड़ा गहरी होती गई. और एक दिन, पीड़ितों की आँखों से पर्दा हटने लगा. उन्होंने देखा कि उनका भगवान दरअसल उनके दुखों का व्यापारी है.

भीड़ ने पछतावे और गुस्से में कहा, "जिन्हें हमने गद्दार कहा, वही हमें रास्ता दिखाने वाले थे!"
चौक में भीड़ फिर इकट्ठी हुई. इस बार तालियाँ नहीं बजीं. हाथ उठे, और भगवान का मुखौटा टूट गया.
सर्वप्रिय का अंत हुआ.

... और समाज ने पहली बार राहत की साँस ली, जैसे किसी लंबे नशे से जागकर होश में आया हो.

रविवार, 7 दिसंबर 2025

आपदा में अवसर

लघुकथा

खूब बरसात हुई थी. नदी का पानी गाँव में घुस गया.

निचली पट्टी के घर डूब गए, कपड़े-बरतन बह गए, बच्चे भूखे थे.

नेता जी अफसर, बाबू और दो चपरासियों के साथ नाव पर आए. बोले, “घबराइए मत! सरकार आपके साथ है. राहत सामग्री पहुँचेगी, नए घर बनेंगे.”

गाँव वाले थोड़े आश्वस्त हुए.

फिर नेता जी मुस्कराए,

“देखिए भाइयों-बहनों, हर आपदा में अवसर छिपा होता है. पुल टूटा है, नया बनेगा. सड़क बह गई है, अब और चौड़ी बनेगी. आपको काम मिलेगा, जेबों में पैसा आएगा. जिनके कच्चे घर टूटे हैं, वे पक्के बनेंगे. हम इसकी योजना बनाएंगे.”

गाँव वाले दुःख में भी प्रसन्न हो गए. कुछ ने कहा, “साहब, अभी हम भूखे हैं.”

नेता जी ने आश्वासन दिया,

“भोजन की व्यवस्था हमने कर दी है, अभी पहुँचेगा.”

तभी जमींदार और महाजन पहुँचे, उनके घर ऊँचाई पर बने थे,जहाँ बाढ़ का पहुँचना संभव न था.

नेता जी ने पूछा, “आपके घर तो सुरक्षित हैं?”

जमींदार बोला,“हुजूर, कहाँ? फसलें नष्ट हो गईं, जानवर बह गए. आप खुद देख लीजिए.”

नेता जी जमींदार की गढ़ी पहुँचे. वहाँ कत्त बाफले बन रहे थे.

नेता जी ने कहा, “जब तक बाढ़ का पानी नहीं उतरता, गाँव वालों की मदद करनी होगी. पहले पूरी-सब्जी बनवाइए और स्कूल में शरण लिए लोगों को भेजिए. आपके नुकसान की भरपाई बीमा कर देगा.”
जमींदार हाथ जोड़ बोला, जो हुक्म सरकार.
महाजनों से सामान आया, ब्राह्मणों ने सब्जी-पूरी बनाई.

गाँव वालों को भोजन मिला, पर वे समझ गए कि यह मदद उनकी ही मेहनत और ब्याज की कमाई से आई है.
इस बीच नेता जी और अफसरों ने जमींदार के यहाँ कत्त बाफले की दावत उड़ाई.

दो माह बाद जमींदार उपहारों के साथ नेता जी के घर पहुँचा. बोला, “हुजूर, टेंडर पास हो गया है. पुल और सड़क का काम हमें मिला है.”

नेता जी मुस्कराए, “देखा! आपदा में अवसर.”

अगली बरसात आने को थी.

पुल और सड़क की मरम्मत बिखरने लगी थी. नए पुल और चौड़ी सड़क की योजना अब भी कागज़ पर थी. गाँव वालों के घर टूटे ही थे. राहत का वादा केवल कागज़ पर था.

गाँव वालों ने समझ लिया—आपदा उनकी थी, अवसर दूसरों का.

शनिवार, 6 दिसंबर 2025

"मकौले का भूत"

लघुकथा
दो दोस्त अर्जुन और सलीम यूनिवर्सिटी गार्डन में बरगद के नीचे बैठे चर्चा में लीन थे. दोनों इतिहास के विद्यार्थी, दोनों ही अपने-अपने तर्कों के हथियार से लैस.

बात लॉर्ड मकौले की शिक्षा योजना पर हो रही थी.

अर्जुन कह रहा था, "सलीम, अगर मैकाले की शिक्षा न होती, तो हम आज भी संस्कृत के श्लोकों और अरबी की आयतों में उलझे रहते. रेल, उद्योग, संविधान—सब अंग्रेज़ी शिक्षा से ही आए."

सलीम उसके कथन पर हँस पड़ा, "वाह! तो तुम कहना चाहते हो कि हमारी सारी भाषाएँ सिर्फ़ पूजा-पाठ और ग़ज़ल सुनाने के काम की थीं? संस्कृत में गणित नहीं था? फारसी में साहित्य नहीं था? अरबी में चिकित्सा नहीं थी? यह तो वही मकौले का तर्क है, ‘तीस फ़ीट के राजा और मक्खन का समुद्र’. ... न जाने कब भारत पर से मकौले का भूत विदा लेगा."

अर्जुन मुस्कराया और बोला, "अगर अंग्रेज़ी न होती, तो संसद में आज भी चार भाषाओं में बहस होती. एक मंत्री संस्कृत में बोलता, दूसरा अरबी में, तीसरा फारसी में, चौथा हिन्दुस्तानी में. जनता ताली बजाती—‘वाह, क्या विविधता है!’ लेकिन निर्णय लेने में सालों लग जाते."



"और आज क्या है?” सलीम ने पलटकर व्यंग्य किया. “मंत्री अंग्रेज़ी में बोलते हैं, जनता समझती नहीं, फिर भी ताली बजाती है. ‘वाह, क्या आधुनिकता है!’ फर्क सिर्फ़ इतना है कि पहले हम अपनी भाषा में बेखबर रहते, अब पराई भाषा में. यही तो गुलामी है."

बोलते बोलते सलीम गंभीर हो चला था, "हमारी भाषाओं में संस्कृति का अध्ययन था. वेदांत, सूफ़ी साहित्य, ग़ज़लें, दोहे; ये सब हमारी आत्मा थे. अंग्रेज़ी ने हमें उनसे काट दिया. आज बच्चे शेक्सपियर तो पढ़ते हैं, पर कबीर को नहीं. यही तो समस्या है."

सलीम को गंभीर होते देख अर्जुन शान्त स्वर में बोला, "संस्कृति बेहद ज़रूरी चीज है, किन्तु आधुनिकता भी उतनी ही जरूरी चीज है. अंग्रेज़ी ने हमें दुनिया से जोड़ा. इसी भाषा में हमने स्वतंत्रता और जनतंत्र के अर्थ सीखे और अपनी भाषाओं में अपनी संस्कृति के साथ चलते हुए आजादी के संघर्ष को आगे बढ़ाया. हमने इसी संगम को साथ लेकर आजादी हासिल की. हमने अंग्रेजी में हमने संविधान क्यों लिखा? क्योंकि अंग्रेजी में इंटरप्रिटेशन के नियम स्थिर थे, हम किसी भी अन्य भाषा में इसे लिखते तो उसकी अनेक व्याख्याएं होतीं. संविधान और कानून को प्रभावी बना पाना दुष्कर हो जाता. आज अंग्रेजी के कारण ही ह, वैश्विक मंच पर अपनी बात को मजबूती के साथ रख पाते हैं. हमारी भाषा और बोली पूरी दुनिया में कहीं भी अजनबी नहीं रहती है. और फिर संस्कृति कोई तालाब का ठहरा हुआ पानी नहीं. वह बहती हुई गंगा है जिसका रूप गंगोत्री में अलग है तो हरिद्वार में अलग, काशी में अलग तो प्रयाग में और अलग, गया में उसका रूप फिर बदलता है तो गंगासागर में बिलकुल अलग हो जाता है. संस्कृति में से बहुत कुछ हम सहेजते हुए चलते हैं, लेकिन पुराने पिछड़े मूल्यों को छोड़ते जाते हैं और उनमें नए आधुनिक और प्रगतीशील मूल्यों को जोड़ते जाते हैं. हम इतिहास के विद्यार्थी हैं, हम क्या नहीं जानते कि भारत की संस्कृति एक सी नहीं रही. वह हर युग में बदली है और बदलती रहेगी. ”

अर्जुन कुछ रुकता है तभी सलीम अपनी हाथ घड़ी में समय देख कर कहता है, “अब मैं चलूंगा, अम्मी को डाक्टर के यहाँ ले जाना है.” दोनों चल देते हैं.

उधर टीवी चैनलों पर बहस चल रही है, “हमें मैकाले की शिक्षा और अंग्रेज़ी को छोड़ना चाहिए." यह बहस अंग्रेज़ी में प्रसारित हो रही है.

आईटी दफ़्तरों में कर्मचारी कहते हैं, "हमें अपनी भाषा पर गर्व है." उसके तुरंत बाद ईमेल अंग्रेज़ी में लिखते हैं और कोडिंग तो बिना अंग्रेजी के संभव ही नहीं.

संसद में नेता कहते हैं, "हमें भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना चाहिए" इसके बाद प्रेस कांन्फ्रेंस अंग्रेजी में कह रहै हैं.

विश्वविद्यालय में छात्र नारा लगाते हैं, "हिन्दी हमारी शान है." लेकिन अपना रिज़्यूमे अंग्रेज़ी में बनाते हैं.

दो दिन बाद दोनों मित्र फिर उसी उद्यान में फिर बैठे हैं. सलीम कह रहा है, "प्रधान मंत्री तक कहते हैं कि हमें उस गुलामी को समाप्त करना है, जिसकी नींव अंग्रेजों ने रखी है. अंग्रेज़ी ने हमें मानसिक रूप से बाँध दिया है."
जवाब में अर्जुन ने व्यंग्य किया, "हाँ, और वही प्रधान मंत्री विदेश जाते हैं तो अंग्रेज़ी में भाषण देते हैं. यही विडंबना है, गुलामी को कोसते हैं, पर उसी भाषा से दुनिया को प्रभावित करते हैं."

अर्जुन की कुछ देर चुप बैठा रहा. सलीम कुछ नहीं बोला रहा था. अर्जुन ने चुप्पी तोड़ी, “अम्मी कैसी हैं? डाक्टर ने क्या कहा.”

नहीं अर्जुन भाई, अम्मी ठीक हैं, बस डाक्टर ने महीने भर बाद एक बार दिखाने को कहा था इसलिए जाना पड़ा. अब तो दवाओं में बस एक गोली रह गयी है, बाकी सब बन्द कर दी हैं.”

“चलो अम्मां की ओर से कुछ तो निश्चिन्तता हुई. तुम भी अपने अध्ययन पर पूरा ध्यान दो सकोगे” अर्जुन ने कहा. फिर अपना वक्तव्य जारी रखा.

"सलीम, ये मकौले वाला मामला बहुत आसान है, प्रधानमंत्री उसे जान बूझ कर हवा दे रहे हैं. लोग धर्मों के आधार पर लोगों को बाँट कर अपनी राजनीति चलाने की उनकी भाषा को समझने लगे हैं. इसी कारण से वे लोगों को बाँटे रखने के लिए नए नए मुद्दए लेकर आते रहते हैं. जबकि समस्या भाषा नहीं, मानसिकता है. अगर हम अंग्रेज़ी को साधन मानें और अपनी भाषा को आत्मा, तो दोनों का मेल ही हमें आगे ले जाएगा."

सलीम ने सिर हिला कर बोला, "शायद तुम सही हो. हमें अंग्रेज़ी से आधुनिकता लेनी है, पर अपनी भाषाओं से संस्कृति और आत्मगौरव." यह कह कर सलीम हँस पड़ा, अर्जुन ने भी उसके जवाब में जोर का ठहाका लगाया.
फिर अर्जुन बोला, "तो तय रहा, “अंग्रेज़ी हमारी रेल है, और अपनी भाषा हमारी आत्मा. रेल बिना आत्मा बेकार, आत्मा बिना रेल ठहरी हुई."

सलीम ने जोड़ा, "और अगर हम फिर भी बहस करते रहे, तो जनता ताली बजाएगी- ‘वाह, क्या विविधता है!’