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शनिवार, 4 अप्रैल 2026

पुर्जा नहीं, इंसान

देहरी के पार, कड़ी - 16
रविवार शाम चार बजे मुंबई की उमस के बीच, प्रिया, राहुल, स्नेहा और आदित्य अंधेरी वेस्ट के एक पुराने औद्योगिक इलाके में 'IIDEA' के कार्यालय पहुँचे. बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर एक लंबे कमरे के अंत में एक टेबल लगी थी, जिसके पीछे की कुर्सी पर एक अधेड़ व्यक्ति बैठा था. कमरे में दोनों ओर दो-दो बेंचें रखी थीं जिन पर कुछ लोग बैठे थे. उन्होंने टेबल के पीछे बैठे व्यक्ति से कहा, “हमें प्रशांत बाबू से मिलना है.”

“वे ऊपर मीटिंग में हैं.” वहाँ बैठे व्यक्ति ने जवाब दिया. “आप कहाँ से आए हैं? और क्या नाम हैं? बता दें, मैं उन्हें खबर भिजवा दूंगा.”

“बस उन्हें कहिए ‘डाटाप्रोस’ से प्रिया और उसके साथी आए हैं.”

उसने एक व्यक्ति को अंदर भेजा. पाँच मिनट बाद वह लौटा और बोला, “आपको ऊपर बुलवाया है.”

चारों उसी व्यक्ति के साथ कमरे के अंदर के दरवाजे से अंदर गए, वहाँ एक छोटे आंगन से सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं. फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरे में प्रशांत बाबू बैठे मिले, इस कमरे के पास ही एक हॉल था जिसमें कम से कम दो सौ लोग बैठ सकते थे. वहाँ कोई बैठक चल रही थी.

“आओ, तुम लोग बिलकुल समय से आए हो. कुछ देर बाद एक महत्वपूर्ण मीटिंग शुरू होने वाली है. मैं चाहता हूँ तुम सब उसमें दर्शक के रूप में बैठो. बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”

“हम उसमें शामिल होंगे, लेकिन पहले हम यूनियन की सदस्य बनना चाहते हैं.”

“मैं तुम्हें फॉर्म देता हूँ, इन्हें भर दीजिए और उस पर बने क्यूआर कोड को स्कैन करके अपनी सदस्यता शुल्क पे कर दीजिए.” प्रशांत बाबू ने चार फॉर्म निकाल कर प्रिया को दिए, चारों ने वहीं बैठकर उन्हें भरा, शुल्क भुगतान की. प्रशांत बाबू ने फार्म के निचले हिस्से पर अपने हस्ताक्षर करके उन्हें रसीद दे दी.

“आपकी यूनियन का नाम ‘डेमोक्रेटिक आईटी एम्पलॉइज एसोसिएशन’ यह 'IIDEA' से एफिलिएटेड है. मैं इस यूनियन की मुम्बई इकाई का सैक्रेटरी हूँ. एसोसिएशन के सदस्य बन कर तुम सब एक व्यापक ‘श्रम शक्ति’ का हिस्सा बन गए हो.”

कुछ देर में पास वाले हॉल में मीटिंग आरंभ हो गयी. वे सब भी उसी हॉल में जा बैठे.

मीटिंग में 'इलेक्ट्रो-सर्किट इंडिया' के लगभग 150 मज़दूर जमा थे. यह कारखाना इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) बनाता था. चर्चा से पता चला कि दस साल पहले मालिक ने एक अजीब समझौता किया था. जब मज़दूरों ने महंगाई के कारण वेतन बढ़ाने की मांग की, तो मालिक ने कहा— "मैं वेतन नहीं बढ़ाऊंगा, लेकिन कारखाने की अपनी 'एम्प्लॉइज शॉप' पर आपको राशन और दूसरी सब जरूरी चीजें उसी पुराने दाम पर मिलेंगी जो आज हैं."

शुरू में यह लुभावना लगा, लेकिन वक्त के साथ दुकान के बाहर की दुनिया में 'महंगाई' आग लगा चुकी थी. बच्चों की स्कूल फीस, अस्पताल का खर्च और बस का किराया उस से नहीं मिल सकता था. मज़दूरों ने अब फिर से यूनियन बनाई और अपना मांग-पत्र दिया.

मांग पत्र पर मालिक का जवाब सीधा और क्रूर था— "हड़ताल की, तो मैं यह यूनिट पंजाब ले जाऊँगा. तुम सब सड़क पर आ जाओगे."

मीटिंग में 'IIDEA' के कानूनी सलाहकार, एक सीनियर वकील मौजूद थे उन्होंने अपनी राय मजदूरों के सामने रखी: "कानूनी रूप से मालिक को अपना व्यापार कहीं भी ले जाने का हक है. अगर उसने ऐसा किया, तो आप सब बेरोजगार हो जाएंगे. यह आपको सोचना है कि क्या आप फिर भी हड़ताल का जोखिम उठाने को तैयार हैं या नहीं?"

कुछ पल की खामोशी के बाद एक अधेड़ उम्र का मज़दूर खड़ा हुआ. उसके हाथ आईसी बनाने के काम से कुछ काले पड़ गए थे. उसने कड़क आवाज़ में कहा— "साहब, बेरोज़गारी का डर दिखाकर वह हमें गुलाम बनाए रखना चाहता है. इन शर्तों पर काम करना भी तो धीरे-धीरे मरने जैसा ही है. हम कुछ भी कर लेंगे, फुटकर मजदूरी कर लेंगे, लेकिन इस ज़िल्लत में काम नहीं करेंगे. हम हड़ताल करेंगे!"

उसके बाद मजदूरों का आव्हान किया गया कि, ‘वे हड़ताल के विषय अपनी मंच पर आकर रखें. और वे मजदूर अवश्य अपनी बात रखें जो हड़ताल के विरुद्ध राय रखते हों. यदि हड़ताल होती है तो बाद में कोई यह नहीं कहे कि वह हड़ताल के विरुद्ध है’. इसके बाद कुछ हाथ उठे, उन सब मजदूरों ने मंच पर आकर एक-एक करके अपनी राय रखी. अंत में यूनियन के पदाधिकारियों ने आपस में कुछ बात की, फिर सैक्रेटरी ने सब मजदूरों से कहा, “यूनियन कार्यसमिति की राय है कि हमें मालिक को एक सप्ताह का समय और देना चाहिए और उसके बाद के सोमवार से हड़ताल कर देना चाहिए. जो भी इस राय के विरुद्ध हो वह हाथ खड़ा करे, उसे अपनी राय रखने का अवसर दिया जाएगा.

किसी मजदूर ने हाथ नहीं उठाया. कुछ देर इंतजार करने के बाद सैक्रेटरी ने कहा जो हड़ताल के साथ है वे हाथ उठाएँ. मजदूरों ने हाथ उठाए. हाथ गिने गए. उसके बाद सैक्रेटरी ने कहा कि, “सर्वसम्मत राय है कि आज से ठीक आठवें दिन सोमवार को सुबह की शिफ्ट के साथ हड़ताल आरंभ होगी.”

इसके बाद सैक्रेटरी ने नारा लगाया, ‘इंकलाब ज़िन्दाबाद¡’ सब मजदूरों ने नारे का बुलंदी से जवाब दिया. उनकी आवाज़ों में एक अजीब सा तालमेल था, बिलकुल 'हीरे के अणुओं' की उस मजबूती जैसा जिसके बारे में प्रशांत बाबू ने उन्हें बताया था.

प्रशांत बाबू मंच पर आए. उनकी नज़रें प्रिया पर पड़ीं, जो सन्न होकर यह सब देख रही थी. प्रशांत बाबू ने गरजती हुई आवाज़ में कहा: "जब जीवन का संकट बेरोज़गारी के डर से बड़ा हो जाए, तो नेतृत्व का काम रास्ता दिखाना होता है. हम यहाँ केवल चंद रुपयों के लिए नहीं, बल्कि अपने 'अधिकारों' और 'मनुष्य की गरिमा' के लिए लड़ेंगे. सारा मज़दूर एकमत है, IIDEA इस लड़ाई का नेतृत्व करेगा. हम हड़ताल करेंगे!"

हॉल फिर से 'मजदूर एकता ज़िंदाबाद' के नारों से गूंज उठा. प्रिया ने एक सच्चा जनतंत्र वाद देखा था उसे अहसास हुआ कि 'देहरी के पार' की दुनिया केवल जैसे विक्रांत व्यक्तिगत दुश्मनों से लड़ने के बारे में नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था से टकराने के बारे में भी है जो इंसान को मशीन का एक पुर्जा समझती है.
... क्रमशः

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

एकता

देहरी के पार, कड़ी - 15
प्रिया ऑटो से मेवाड़ भोजनालय पहुँची, तब रात के साढ़े दस बज चुके थे. मुंबई की सड़कों पर ट्रैफिक कम था. वाहन अपनी गति से दौड़ने लगे थे. राहुल और आदित्य भी उसके पीछे ही पहुँच गए. 'मेवाड़ भोजनालय' में कुछ और ही चल रहा था. कर्मचारियों ने रामजी काका के निर्देश पर भोजनालय के अंदर वाले हॉल की मेजों और कुर्सियों को फुर्ती से जोड़कर एक विशाल 'राउंड टेबल' की शक्ल दे दी थी. अब हॉल में बीस लोग एक साथ बैठकर डिनर कर सकते थे. ऐसा लगता था कि आज हॉल में किसी खास क्लाइंट के ऑर्डर पर मीटिंग और डिनर होने वाला था.

हॉल तैयार होते ही प्रशांत बाबू और उनकी 'आइडिया' एसोसिएशन के चार पाँच साथियों ने सबसे पहले हॉल में प्रवेश किया. प्रिया के सभी साथियों को भी रामजी काका ने अंदर के हॉल में जाने को कहा तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि आज क्या होने वाला है. लेकिन कुछ ही देर में सबको समझ आ गया कि पिछले चार दिन से जो लोग विक्रांत को सबक सिखाने के ऑपरेशन में लगे थे वे सब इस डिनर में शामिल होने वाले हैं. प्रशांत बाबू राउंड टेबल की मुख्य कुर्सी पर बैठे. उनके पास दोनों ओर की एक-एक कुर्सी छोड़ कर एक तरफ प्रिया और उसकी टीम के लोग थे तो दूसरी तरफ एसोसिएशन के सदस्य. उनके साथ ही ऑटो चालक फरीद भाई और मोड़ पर विक्रांत को रुकने पर मजबूर करने वाले मिनी-ट्रक के चालक डेनियल भी मौजूद थे. प्रिया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब प्रिया और उसके मैनेजर मिस्टर देसाई भी वहाँ पहुँच गए. प्रिया और उसके साथियों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया. प्रशांत बाबू ने उन्हें अपने पास प्रिया की टीम के साथ बैठने का न्यौता दिया. उनके दूसरी ओर की कुर्सी अब भी खाली थी. हॉल के दरवाजे के पास खड़े रामजी को उन्होंने इशारे से अपने पास बुलाया और कहा, “रामजी भाई, ये खाली कुर्सी आपकी है, आप कब तक हमसे बचते रहेंगे. आज के असली हीरो तो आप ही हैं. आप न होते तो यह आपरेशन ही नहीं होता. आज आपको भी हमारे साथ डिनर करना है.” उन्होंने खड़े होकर रामजी का हाथ पकड़ा और लगभग जबरन पास की खाली कुर्सी पर बिठा दिया.

प्रशांत बाबू ने गले में पड़ा गमछा ठीक किया और मुस्कुराते हुए बोले, "साथियों, आज हमने जो किया, वह केवल एक अपराधी को पकड़वाना नहीं था. इस 'ऑपरेशन' में फरीद भाई के ऑटो ने रास्ता दिखाया तो डेनियल भाई के मिनी-ट्रक ने दीवार खड़ी की." उन्होंने आगे बढ़कर दोनों का परिचय कराया. ये दोनों अपनी-अपनी यूनियनों के बेहतरीन कार्यकर्ता हैं जो हमारी एसोसिएशन के बिरादराना संगठन हैं.

"यह दृश्य देखिए," प्रशांत बाबू ने कमरे की ओर इशारा किया, "यहाँ हिंदू, मुस्लिम और क्रिश्चियन साथी एक साथ बैठे हैं. और ताज्जुब देखिए, यह सब मेरे जैसे एक 'नास्तिक' के कहने पर आपस में जुटे हैं. आज दुनिया भर के ज्यादातर राजनीतिज्ञ धर्म, जाति और नस्लों के आधार पर लोगों को बाँटने के चलन पर हैं तब हम सबका इस तरह एक उद्देश्य के लिए एकजुट होकर सफल हो जाने को लोग चमत्कार कह सकते हैं. हम सब अपने संगठनों में तो काम करते ही हैं, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर हमारे 'बिरादराना संगठन' श्रमजीवियों के एक विशाल परिवार की तरह एकजुट हो जाते हैं. आज विक्रांत इसलिए हारा क्योंकि वह अपने उद्देश्य में अकेला था. उसके साथ जो थे वे उसके साथी नहीं, कर्मचारी थे, उनमें उद्देश्य और लक्ष्य की एकता नहीं थी, उनकी एकता गीली रेत के लड्डू जैसी भुरभुरी थी. और हम, इसलिए जीते क्योंकि हम संगठित थे और हमारा उद्देश्य और लक्ष्य एक था, हमारी एकता हीरे के अणुओं जैसी मजबूत और अकाट्य थी."

माहौल की गरमाहट और सुरक्षा का अहसास ऐसा था कि राहुल और आदित्य अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाए. राहुल ने हिचकिचाते हुए पूछा, "सर, क्या हम लोग भी आपकी एसोसिएशन के सदस्य बन सकते हैं? आज जो ताकत हमने देखी, वह किसी कंपनी की पॉलिसी में नहीं है."

प्रशांत बाबू ने हलकी मुस्कुराहट और शरारत भरी नज़रों से कोने में बैठे देसाई जी को देखा और मज़ाक में कहा, "आप सबका एसोसिएशन में स्वागत है, मेंबरशिप फार्म भरने की औपचारिकता कभी भी की जा सकती है. पर पहले सोच लीजिए, देसाई जी जरूर आपसे नाराज हो जाएंगे. कहीं वे इसे 'बगावत' न समझ लें!"

हॉल में हल्का ठहाका गूँज उठा. देसाई जी, जो अब तक केवल आंकड़ों और फाइलों में जी रहे थे, भावुक होकर बोले, "नाराजगी कैसी प्रशांत जी? सच कहूँ तो मन तो मेरा भी कर रहा है कि मैं भी आप लोगों की इस एसोसिएशन में शामिल हो जाऊँ. लेकिन भला एक मैनेजर का वहाँ क्या काम?"

प्रशांत बाबू ने गर्मजोशी से उनके कंधे पर हाथ रखा, "देसाई साहब, आप अकेले क्यों? आप जैसे कम से कम दस मैनेजर तैयार करिए, फिर हम 'मैनेजर्स एसोसिएशन' बनाएंगे. हमारी यूनियनों के बीच 'बिरादराना ताल्लुक' (Fraternal Relations) रहेंगे. मज़दूर हो या मैनेजर, हम सभी इस सिस्टम में वर्किंग पीपुल्स ही हैं, जब तक हम एक-दूसरे के हक़ के लिए खड़े हैं, कोई हमारा शोषण नहीं कर सकता."

रामजी काका के कर्मचारियों ने गरम-गरम मेवाड़ी दाल-बाटी और चूरमा परोसना शुरू कर दिया. माहौल उत्सव जैसा हो गया था. फरीद और डेनियल एक-दूसरे को 'ऑपरेशन काली स्कॉर्पियो' के किस्से सुना रहे थे. प्रिया ने महसूस किया कि मुंबई उसके लिए अब 'पराया' नहीं रहा.

इसी जश्न के बीच, प्रशांत बाबू का फोन बजा. उन्होंने कुछ देर बात की और उनका चेहरा गंभीर हो गया. वे धीरे से प्रिया के पास आए और बोले, "प्रिया, विक्रांत के पिता ने मुंबई के एक नामी वकील से संपर्क किया है. कल सुबह वे 'जमानत' की अर्जी डालेंगे. उन्होंने ‘फेक आईडी’ वाले मामले को बंद करा देने तैयारी की है."

प्रिया के हाथ में निवाला रुक गया. उसने प्रशांत बाबू की आँखों में देखा और शांत आवाज़ में बोली, "सर, वह बाहर आए या अंदर रहे, अब मैं अकेली नहीं हूँ. मेरे पास फरीद भाई का रास्ता है, डेनियल की दीवार है और हमारी एसोसिएशन का सुरक्षा कवच है. अब वह 'बग' मेरा सिस्टम क्रैश नहीं कर पाएगा."
... क्रमशः

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

शिकंजा

देहरी के पार, कड़ी - 14
योजना के अनुसार, रात साढ़े आठ बजे प्रिया ऑफिस से निकली. उसके कदम सधे हुए थे. उनमें किसी तरह की कोई घबराहट नहीं, बल्कि एक तरह की लापरवाही थी. उसने अपनी स्मार्टवॉच पर 'लोकेशन शेयरिंग' ऑन कर दी और टीम को 'रेडी' का सिग्नल भेजा. कुछ दूर चलकर उसने ऑटो लिया. ऑटो चालक बब्बन खाँ  ऑटोरिक्शा चालक यूनियन का कार्यकर्ता था, जिसे इस तरह के कामों की आदत थी. ऑटो मेवाड़ भोजनालय से विपरीत दिशा में जा रहा था. एक किलोमीटर बाद ऑटो एक छोटी गली में मुड़ गया. दूसरी सड़क पर आकर विपरीत दिशा में चलकर उसके पहले वाली गली में तीन मकान आगे आकर खड़ा हो गया. प्रिया ऑटो में बैठी रही, ड्राइवर ने उतर कर सड़क पर जाकर देखा स्कॉर्पियो उस गली से सड़क पर आकर रुक गयी थी. उसके चालक को पता नहीं लग रहा था कि आटो कहाँ चला गया. ड्राइवर वापस आकर बताया कि स्कॉर्पियो वाला कन्फ्यूज है, अब मैं आपको फ्लैट पर छोड़ देता हूँ.

अगले दिन सुबह उन्होंने प्रोजेक्ट क्लाइंट के सर्वर पर शिफ्ट करके उसे सौंप दिया. क्लाइंट को किसी तरह की समस्या आने पर उसे देखने के लिए एक डेवलपर काफी था. प्रिया की टीम के बाकी साथी उसके साथ योजना में शामिल थे. सबने लंच एक साथ लिया. काली स्कॉर्पियो बदस्तूर ड्यूटी पर थी. उसे थोड़ा काम देने के लिए प्रिया, स्नेहा और राहुल ऑफिस से बाहर निकले, आटो लिया और डेढ़ किलोमीटर दूर एक कैफे में कॉफी पीकर लौट आए. स्कॉर्पियो ने उनका पीछा किया. प्रिया ने यह जान लिया कि आज स्कॉर्पियो को विक्रांत ड्राइव कर रहा है, उसके दो लोग पीछे बैठे थे.

शाम ठीक आठ बजे प्रिया अकेली अपने ऑफिस से निकली. उसने स्टैंड से ऑटो लिया. यह कल वाला ऑटो नहीं था, लेकिन चालक वही वाला था. ऑटो जानबूझकर उस रास्ते पर मुड़ा जहाँ 'मेवाड़ भोजनालय' से पहले एक चौड़ी सड़क और फिर एक सुरक्षित मोड़ आता था. काली स्कॉर्पियो किसी भूखे शिकारी की तरह पीछे लग गई. जैसे ही स्कॉर्पियो मोड़ पर पहुँची, अचानक सामने से एक बड़ा मिनी-ट्रक आकर खड़ा हो गया और पीछे से राहुल और आदित्य की गाड़ियों ने रास्ता ब्लॉक कर दिया. मिनी-ट्रक का चालक भी नीचे उतर गया.

स्कॉर्पियो के पहिए चीखते हुए रुक गए. घेराबंदी पूरी थी. स्कॉर्पियो न आगे जा सकती थी, न पीछे, और न ही मुड़ने का कोई ऑप्शन था. इस 'घेराबंदी' से विक्रांत बुरी तरह तिलमिला गया वह ड्राइविंग सीट से नीचे उतरा. उसके चेहरे पर वही कोटा वाली सनक थी. उसे लगा कि वह धौंस से इन मिनी-ट्रक वाले को डरा देगा.

उसने चिल्लाकर कहा, "ये क्या बदतमीजी है? ट्रक को इस तरह बीच में क्यों खड़ा किया है? अपना ट्रक हटाओ, पीछे जाम लग रहा है."

मैं क्या करूँ बाबूजी, इंजन बंद हो गया है, देखना पड़ेगा या फिर किसी मिस्त्री को बुलाना पड़ेगा. इतना कहकर उसने ट्रक का बोनट खोला और उसके अंदर की गड़बड़ी देखने लगा.

विक्रांत यह देखकर झुंझला गया. वह पीछे राहुल और आदित्य की ओर बढ़ा, “तुम अपने स्कूटर एक तरफ करो मैं अपनी गाड़ी थोड़ा पीछे लेकर निकालता हूँ, वरना ट्रैफिक रुक जाएगा. वे दोनों उतरकर स्कूटर को एक तरफ करने लगे. तभी उसे ध्यान आया कि प्रिया का ऑटो तो निकल चुका होगा. उसने ट्रक के आगे जाकर देखा तो प्रिया का ऑटो रुका हुआ था, वह बाहर निकलकर खड़ी थी.

प्रिया को इस तरह खड़ी देखकर उसे गुस्सा आ गया. उसने चिल्लाकर कहा, "प्रिया, ये क्या तमाशा है? जयपुर में भी तुमने यही किया था. पुलिस बुलाकर क्या उखाड़ लोगी? वहाँ तुमने मुझे शांति भंग (170 BNS) में गिरफ्तार करवाया था. क्या हुआ? शाम को मजिस्ट्रेट ने जमानत ले ली. आधी रात तक तो कोटा पहुँच गया था. यहाँ तुम क्या कर लोगी? यहाँ भी बॉन्ड भरकर बाहर आ जाऊँगा."

प्रिया ने शांत भाव से अपना फोन ऊपर किया. "विक्रांत, तुमने सही कहा. जयपुर में तुम केवल 'शांति भंग' के मामले में छूट गए थे. लेकिन वहाँ तुमने अपना एक रिकॉर्ड (Criminal Record) छोड़ दिया था. उसके बाद तुमने सोशल साइट्स से मेरे फोटो लेकर उन्हें डिस्टॉर्ट करके जो अपराध किया था उसकी जाँच मुम्बई पुलिस लगभग पूरी कर चुकी है उसे बस अब तुम्हारी तलाश है, उम्मीद है वह जल्दी ही तुम्हें तलाश कर लेगी. इसके अलावा मेरे पास पिछले 48 घंटों की तुम्हारी 'स्टॉकिंग' (Stalking) का वीडियो सबूत है, तुम्हारे मूवमेंट के डिजिटल लॉग्स हैं और तुम्हारे कारिंदों की गवाही है."

प्रिया कुछ आगे बढ़कर विक्रांत के एकदम नजदीक आ गई और कड़क आवाज़ में बोली, "एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के लिए तुम केवल एक 'ट्रैकेबल बग' (Trackable Bug) हो. अब तुम्हारा एक और अपराध मुम्बई पुलिस की डायरी में दर्ज होने को तैयार है. अब तुम एक 'रिपीटर ऑफेंडर' (Repeater Offender) हो."

तभी सड़क पर नजदीक ही नीली-लाल बत्तियाँ चमकने लगीं. प्रशांत बाबू ने पहले ही पुलिस को सारे डिजिटल सबूत और विक्रांत की लाइव लोकेशन भेज दी थी. पुलिस की गाड़ी ठीक प्रिया के पीछे आकर रुकी, गाड़ी से मुम्बई पुलिस का एक इंस्पेक्टर और दो सिपाही बाहर निकले. तीनों ने विक्रांत को दबोचा और उसे जबरन धकिया कर कार की पिछली सीट पर ठेलकर दरवाजा बंद किया और डोर लॉक कर दिए. अब वह पुलिस गाड़ी से नीच नहीं उतर सकता था.

इंस्पेक्टर ने प्रिया को कहा, “आपको कुछ देर के लिए पुलिस स्टेशन आना पड़ेगा. हमने आपकी सूचना दर्ज कर ली थी. आपको आकर दस्तखत करने होंगे. फिर हम उसे एफआईआर के रूप में दर्ज कर आपको उसकी एक प्रति दे देंगे.

प्रिया अपने ही ऑटो से पुलिस स्टेशन पहुँची, कुछ देर बाद ही राहुल और आदित्य भी पहुँच गए. इंस्पेक्टर ने सूचना पर प्रिया के हस्ताक्षर लिए फिर एफआईआर दर्ज कर उसपर और एक प्रति प्रिया को दी. फाइल देखकर उसने कहा, “जयपुर का पुराना रिकॉर्ड, मुम्बई में फेक प्रोफाइल का मामला और अब स्टॉकिंग का नया मामला... इस बार विक्रांत साहब का बिना सजा काटे जेल से बाहर आना मुश्किल होगा. प्रिया, राहुल ओर आदित्य बाहर आए. राहुल ने प्रिया से पूछा, “अब?”

“अब क्या? अब मेवाड़ भोजनालय चलना है, सब वहाँ प्रतीक्षा कर रहे होंगे. आज डिनर वहीं होगा.”
... क्रमशः

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

काउंटर-इंटेलिजेंस

देहरी के पार, कड़ी - 13
रामजी काका के कर्मचारियों की सूचना से स्पष्ट हो गया कि अभी प्रिया का पीछा करने वाले मेवाड़ भोजनालय तक नहीं पहुँचे. प्रशांत बाबू ने अपनी कॉफी का आखिरी घूंट लेकर अपने हैंड बैग से पेंसिल और खाली कागज निकाला, कागज को मेज पर फैला कर पेंसिल से कागज पर एक अजीब सा डायग्राम बनाया. फिर प्रिया से बोले, “प्रिया, तुम डरो मत.”

“मैं डरी कहाँ हूँ, सर. मैं स्कॉर्पियो को चकमा देकर आई हूँ. प्रिया ने पूरी शिद्दत से जवाब दिया. “आखिर वह दोपहर से मेरी निगरानी कर रहा था और पहली बार में ही मेरी निगाह में आ गया.”

"प्रिया, फिर ठीक है, वो फिल्मी डायलॉग बिलकुल सही है कि ‘जो डर गया, सो मर गया, तो जीवन में कभी डरना नहीं है, हर स्थिति में मुसीबत का मुकाबला करना है. अब हम इस काली स्कॉर्पियो को एक सॉफ्टवेयर 'बग' की तरह देखेंगे, जो तुम्हारे सिस्टम में घुसने की कोशिश कर रहा है," प्रशांत बाबू की आवाज़ में एक अजीब ठहराव था.

प्रिया ने गहरी सांस ली और अपना फोन निकाला. "सर, वह मेरा पीछा कर रहा है, तो वह 'डेटा' भी छोड़ रहा है. अब पूरी संभावना है कि वह कल सुबह मेरे ऑफिस पहुँचने के पहले ही वहाँ आ खड़ा होगा." उसने तुरंत एक एक्सेल शीट जैसा मानसिक खाका तैयार किया—समय, स्थान और वाहन का प्रकार. उसने महसूस किया कि 'पैटर्न रिकग्निशन' (नियत ढाँचों की पहचान) ही सुरक्षा की पहली सीढ़ी है. यदि हम पीछा करने वाले के समय और रास्ते को समझ लें, तो उसकी अगली चाल का अंदाज़ा लगा सकते हैं.

“बिलकुल, तुमने ठीक पहचाना. अब वह जानना चाहता है कि तुम कहाँ रहती हो? और ऑफिस के सिवा और कौनसी जगहें हैं जहाँ तुम अक्सर जाती हो. तुमने उसे चकमा देकर बहुत ही बुद्धिमत्ता और बहादुरी का काम किया है. एक आम व्यक्ति से ऐसी आशा कोई नहीं करता. तुम ज़रूर जासूसी उपन्यास पढ़ती होगी?”

“नहीं सर बस कभी-कभी कुछ पढ़ लिया है.” प्रिया ने सकुचाते हुए उत्तर दिया.

“तभी तुमने यह होशियारी कर ली. लेकिन आगे भी यह होशियारी जारी रहनी चाहिए. कम से कम तुम्हारे फ्लैट का उन्हें पता नहीं लगना चाहिए. यहाँ भोजनालय वे पहुँच जाएंगे तो कोई बात नहीं यहाँ उनसे निपटने के लिए हमेशा कुछ लोग रहते हैं.”

“ठीक सर, मैं ध्यान रखूंगी.” कल हम उसकी गतिविधि पर और अधिक ध्यान रखेंगे. अब तुम चाहो तो जा सकती हो.”

“अरे, बिटिया ऐसे कैसे जाएगी? पहले खाना खाएगी. फिर मैं इसे इसके फ्लैट पर छोड़कर आउंगा.

...

अगली सुबह ऑफिस पहुँचते ही प्रिया ने सदा की भाँति टीम मीटिंग की. रोज़ से अलग आज उसने मीटिंग रूम को अंदर से बंद करवाया. उसने काली स्कॉर्पियो और विक्रांत के मुंबई में होने की बात सभी को बताई, तो एकदम सन्नाटा छा गया. लेकिन यह सन्नाटा डर का नहीं, बल्कि रणनीति बनाने का था.

राहुल ने तुरंत अपना लैपटॉप खोला. "प्रिया, सबसे पहले अपने 'डिजिटल फुटप्रिंट' साफ करो. हम अक्सर अनजाने में अपनी लाइव लोकेशन, सोशल मीडिया चेक-इन्स और यहाँ तक कि कैब बुकिंग के स्क्रीनशॉट साझा कर देते हैं. यह पीछा करने वाले के लिए 'जीपीएस' का काम करता है."

स्नेहा और आदित्य ने एक 'रोस्टर' बनाया. तय हुआ कि अगले दो दिन प्रिया अकेले कहीं नहीं जाएगी. टीम का एक सदस्य हमेशा उसके साथ रहेगा, लेकिन इस तरह कि दूर से देखने वाले को शक न हो. यह 'कम्युनिटी विजिलेंस' (सामूहिक सतर्कता) का एक पाठ था—कि सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपनों की एकजुटता और एकजुट कार्रवाई भी है.

...

उधर, अपने ऑफिस में विक्रांत शेखावत पर चिल्ला रहा था. "कल वह गायब कैसे हो गई? एक लड़की मुंबई की गलियों में तुम लोगों को चकमा कैसे दे गई?"

विक्रांत का अहंकार उसे यह मानने नहीं दे रहा था कि प्रिया अब इतनी बदल चुकी है और इतनी होशियार हो चुकी है कि उसके लोगों को आसानी से चकमा दे दे. उसे लगा कि शायद यह इत्तफाक था. उसने आदेश दिया, "आज रात वह जहाँ भी जाए, मुझे उसकी तस्वीर चाहिए. मुझे देखना है कि वह किसके साथ है." उसे नहीं पता था कि उसका 'शिकार' अब खुद उसे एक नियंत्रित वातावरण (Controlled Environment) में खींच रहा है.

...

अगले दिन दोपहर लंच के समय प्रिया और स्नेहा दोनों बाहर निकली और ऑटो लेकर कोई एक किलोमीटर दूर उतर कर एक रेस्टोरेंट में घुस गयीं, और तुरन्त ही पीछे गली में निकल कर अगली सड़क से ऑटो कर स्कॉर्पियो वाले को चकमा देकर वापस आफिस पहुँच गयीं. वहाँ प्रशांत बाबू उनका इंतजार कर रहे थे.

“कहाँ गई थी?” प्रशांत बाबू ने पूछ लिया?

“कुछ नहीं हम एक बार और स्कॉपियो वाले को चकमा दे आए हैं. अब वह घंटे दो घंटे बाद वापस इधर आएगा. बस उसके साथ थोड़ा मजाक था.” प्रिया की बात सुन कर प्रशांत बाबू को हँसी आ गई.

उन्होंने प्रिया को एक छोटा सा डिवाइस दिया. "यह वॉयस रिकॉर्डर और जीपीएस ट्रैकर है. आज तुम उसी रास्ते से जाओगी जहाँ वह स्कॉर्पियो खड़ी रहती है. लेकिन आज तुम 'शिकार' नहीं, बल्कि 'चारा' (Bait) बनोगी."

योजना सरल थी लेकिन प्रभावी. प्रिया को सामान्य तरीके से ऑफिस से निकलकर एक खास पॉइंट तक जाना था. पीछे स्कॉर्पियो होगी, लेकिन उस स्कॉर्पियो के पीछे टीम के लड़के अलग-अलग टैक्सियों में और प्रशांत बाबू की 'आईडिया' यूनियन के दो साथी बाइकों पर होंगे. प्रशांत बाबू कुछ और बातें प्रिया को समझाकर चले गए. प्रिया और उसके साथी अपने काम में जुट गए. आखिर उन्हें आज ही अपना प्रोजेक्ट पूरा करना था.

रात सवा आठ बजे तक प्रिया का प्रोजेक्ट पूरा हुआ. सबने एक दूसरे को बधाई दी. तय किया कि कल सुबह हम इसकी टेस्टिंग करेंगे और फिर क्लाइंट को हैंडओवर कर देंगे. इसके बाद प्रिया ने आईने में खुद को देखा. अपने फोन की सेटिंग बदली, अपनी टीम को 'सेंड' का बटन दबाया और ऑफिस से बाहर कदम रखा. उसे पता था कि काली स्कॉर्पियो की हेडलाइट्स चालू हो गई होंगी, लेकिन आज उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी. वह अब भाग नहीं रही थी, वह 'एविडेंस गैदरिंग' (सबूत जुटाने के) मिशन पर थी.
... क्रमशः

मंगलवार, 31 मार्च 2026

काली स्कॉर्पियो

देहरी के पार, कड़ी - 12
मुम्बई के अंधेरी वेस्ट के अपने एक्सपोर्ट दफ्तर में विक्रांत फाइलें पलट रहा था. वह यहाँ आते ही बुरी तरह फँस गया था. हिसाब में बहुत गड़बड़ियाँ थीं; खर्च अधिक दिखाए गए थे. बिलों की जाँच करने पर पता चला कि उसका अकाउंटेंट और मैनेजर दोनों मिलकर ग़बन कर रहे हैं. उसने कोटा से अपने अकाउंटेंट और मैनेजर के सहायकों को बुला लिया. ग़बन की रिपोर्ट कराकर दोनों बेईमान कर्मचारियों को गिरफ्तार करवाया. इन सब में उसे पूरा एक सप्ताह गुजर गया. थोड़ी राहत मिली तो उसे प्रिया का खयाल आया. बिजनेस की गड़बड़ी में वह उसे भूल ही गया था.

उसने अपने सबसे वफादार कारिंदे, शेखावत को बुलाया. मेज पर प्रिया की तस्वीरें रखते हुए उसने भारी आवाज़ में कहा, "यह रही लड़की. इसकी कंपनी का पता मैंने निकाल लिया है. कल सुबह तुम ऑफिस के बाहर रहोगे. मुझे यह देखना है कि यह मुम्बई में कितनी 'आज़ाद' घूम रही है. इसके फ्लैट का पता, इसके उठने-बैठने की जगह... सब मुझे कल शाम तक चाहिए."

प्रिया के लिए पिछला सप्ताह किसी तपस्या से कम नहीं था. प्रशांत बाबू के 'सामूहिक नेतृत्व' वाले सूत्र ने टीम के भीतर जो ऊर्जा फूँकी थी, उसका परिणाम साफ दिख रहा था. जिस प्रोजेक्ट का समय से पूरा होना असंभव लग रहा था, वह दौड़ पड़ा था. सुबह की पंद्रह मिनट की मीटिंग अब केवल काम की चर्चा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए प्रेरणा बन गई थी. राहुल, स्नेहा और आदित्य अब केवल अपने-अपने 'मॉड्यूल' पर काम नहीं कर रहे थे, बल्कि जहाँ भी कोई अटकता, पूरी टीम उसे सुलझाने में जुट जाती. प्रिया ने महसूस किया कि जब 'बॉस' का डर खत्म होता है, तो 'जिम्मेदारी' का भाव अपने आप जन्म लेता है. प्रोजेक्ट डेडलाइन से दो दिन पहले ही पूरा हो जाने की संभावना थी.

सोमवार सुबह आठ बजे ही उसके कोटा के मित्र समीर का फोन आया, “मैं सुबह मुम्बई पहुँचा हूँ. आज ही कोटा वापसी की ट्रेन भी है. तुम्हारे ऑफिस के नजदीक ही काम है, दोपहर दो बजे के तुम मिलोगी?”

कोटा से निकलने के बाद किसी मित्र से रूबरू मिलने का पहला अवसर था, प्रिया उसे कैसे गँवाती. उसने समीर को ऑफिस के निकट ही रेस्टोरेंट में लंच का न्यौता दे दिया. उसने अपनी टीम से सामूहिक लंच से गैरहाजिर रहने की छूट ली और दो बजे ऑफिस से निकल कर ऑटो लिया और रेस्टोरेंट पहुँची. वह ऑटो वाले को भुगतान कर रही थी, तभी उसकी नजर एक काले रंग की पुरानी फाइव-सीटर स्कॉर्पियो पर पड़ी. इस एसयूवी को उसने ऑफिस के गेट से कुछ दूर खड़े देखा था. उसका ऑटो रवाना होने तक वह वहीं थी. अब उसका ऑटो रुकते ही पीछे आकर रुकी हुई थी. उसका माथा ठनका. लेकिन वह उसकी उपेक्षा करके रेस्टोरेंट में घुस गई.

समीर वहाँ पहले से मौजूद था. दोनों ने साथ लंच किया. समीर ने कोटा से जयपुर और मुम्बई तक की उसकी कहानी सुनी और कोटा की जानकारियाँ दीं. उसने बताया कि विक्रांत ने उसके पिता ब्रज मोहनजी की मंडी में साख और उसके साथ होने वाले विवाह का लाभ उठा कर मंडी में अनेक सौदे कर लिए थे. उसने एक्सपोर्ट के लिए माल उठाया, लेकिन समय निकल जाने पर भी भुगतान नहीं किया था. जिससे उसकी मंडी में और उनकी बिरादरी में भारी बदनामी हो गई थी. विक्रांत कोटा छोड़कर मुम्बई आ चुका है और मंडी में किए गए सौदों के रुपए अदा करने की व्यवस्था किए बिना अब कोटा में मुहँ नहीं दिखा सकता. समीर ने उसे सावधान भी किया कि वह भी विक्रांत की हरकतों से सावधान रहे.

लंच के बाद वह रेस्टोरेंट से बाहर आई. काली स्कॉर्पियो वहीं रेस्टोरेंट से कुछ दूर खड़ी थी. उसने वहीं से समीर को विदा किया और एक ऑटो रोककर उसे अपने ऑफिस छोड़ने को कहा. आटो जैसे ही रवाना हुआ. काली स्कॉर्पियो भी उसके पीछे हो ली. ऑफिस पहुँच कर प्रिया अपनी टीम के साथ रात काम करती रही.

अपने फ्लैट जाने के लिए प्रिया ऑफिस से बाहर आई तो उसने देखा कि काली स्कॉर्पियो वहीं तैयार खड़ी है. उसके चेहरे पर मुस्कुराहट फैल गई. स्कॉर्पियो ने उसका इरादा बदल दिया. वह ऑटो में बैठी और उसे मेवाड़ भोजनालय चलने को कहा. उस दिन वह ऑटो को कोई डेढ़ सौ मीटर पहले ही उतरकर एक छोटी गली में घुस गई. उसके पीछे आ रही स्कॉर्पियो का चालक कुछ समझे और उतरकर पैदल उसका पीछा करे, तब तक वह आगे चल कर एक और छोटी गली में मुड़ गयी. अब वह स्कॉर्पियो चालक की नजर से पूरी तरह दूर थी. उसे दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. पर वह घूम फिर कर मेवाड़ भोजनालय में थी.

साढ़े आठ बज चुके थे. भोजनालय में इक्का-दुक्का ग्राहक डिनर कर रहे थे. प्रशांत बाबू सदा की तरह कॉर्नर टेबल पर बैठे, अखबार के साथ कॉफी पी रहे थे. रामजी काका काउंटर पर बैठे अपने कर्मचारी को निर्देश दे रहे थे. काका को अभिवादन कर प्रिया सीधी कॉर्नर टेबल पर पहुँची. अपना बैग टेबल पर रखकर प्रशांत बाबू को नमस्ते करते हुए बैठ गई.

“नमस्ते, प्रिया कैसी हो? आज ऑफिस से देर से छूटी? तुम्हारा प्रोजेक्ट कैसा चल रहा है?

“बिलकुल ठीक हूँ, ऑफिस समय से ही छूटा है, बस कोई डेढ़ सौ मीटर पहले उतर कर पीछे की बस्ती में पैदल घूमकर आई हूँ, और मेरा प्रोजेक्ट तय समय से दो दिन पहले परसों पूरा हो जाएगा. आपका सामूहिक नेतृत्व का सूत्र बहुत काम आया.” प्रशांत बाबू ने एक साथ तीन सवाल किए थे; प्रिया ने उसी तरह उत्तर भी दे दिया. तभी रामजी काका खुद प्रिया के लिए कॉफी लेकर टेबल पर पहुँच गए.

“काका, आज आपको थोड़ी देर बैठना पड़ेगा. कुछ काम है.”

कॉफी टेबल पर रखकर रामजी प्रिया के पास बैठ गए. प्रिया ने काली स्कॉर्पियो का पीछा करने की बात दोनों को बताई. रामजी ने तुरन्त अपना एक नौकर स्कॉर्पियो की तलाश में भेजा. बीस मिनट बाद नौकर ने लौटकर बताया कि काली स्कॉर्पियो कोई डेढ़ सौ मीटर पहले खड़ी थी. फिर कोई दस मिनट बाद एक आदमी आकर उसमें बैठा और स्कॉर्पियो को मोड़कर चला गया.
... क्रमशः

सोमवार, 30 मार्च 2026

टीम खुशबू

देहरी के पार, कड़ी - 11

प्रशांत बाबू से बातचीत के बाद प्रिया के अशांत मन को बहुत राहत मिली. उसे जल्दी ही नींद आ गई. सुबह आँखें खुली, वह बिस्तर से नीचे भी न उतरी थी कि अलार्म बजने लगा. वह मन ही मन मुस्कुरा उठी कि आज उसके शरीर की घड़ी ठीक काम कर रही थी. थकान पूरी तरह गायब थी, मन का भारीपन भी जाता रहा था, जिससे वह पिछले कई दिनों से परेशान थी. उसने आईने में खुद को देखा—आज अक्स साफ़ था. प्रशांत बाबू ने सही कहा था, डर केवल एक पुरानी आवाज है जिसे हम अनजाने में अपना मान लेते हैं.

ऑफिस पहुँचते ही प्रिया ने अपनी टीम की एक अनौपचारिक मीटिंग बुलाई. कॉन्फ्रेंस रूम का माहौल हमेशा की तरह थोड़ा औपचारिक और थका हुआ था. प्रिया ने अपनी डायरी मेज पर रखी और मुस्कुराते हुए शुरू किया.

"साथियों, कल तक मैं आप पर एक 'डेडलाइन' का दबाव डाल रही थी, लेकिन कल शाम मुझे अहसास हुआ कि मैं गलत थी. यह प्रोजेक्ट सिर्फ मेरी जिम्मेदारी नहीं है, यह हम सबकी साझी विरासत है."

वह अपनी टीम के एक-एक सदस्य का नाम लेकर बोलने लगी. "आदित्य, तुम्हारे कोडिंग के लॉजिक ने हमारा हफ़्तों का समय बचाया है. स्नेहा, तुम्हारा डिजाइन क्लाइंट की उम्मीदों से कहीं ऊपर है. राहुल, तुम्हारी टेस्टिंग की बारीकियों ने हमें बड़े खतरों से बचाया है."

प्रिया ने महसूस किया कि जैसे-जैसे वह उनके योगदान का उल्लेख करते हुए उनकी प्रशंसा कर रही थी, कमरे की हवा बदल रही थी. लोगों के कंधों का तनाव कम हो रहा था और उनकी आँखों में एक चमक लौट रही थी. उसने अंत में कहा, "मैं यहाँ आपकी बॉस नहीं हूँ, आपकी साथी हूँ. मैं भी टीम का वैसा ही हिस्सा हूँ जैसे आप सब हैं. बस कंपनी ने मुझे टीम की लीड बना दिया है. पर मेरी भूमिका क्या है? हम सब मिलकर काम कर रहे हैं. सबका प्रोजेक्ट में समान योगदान है. मैं एक माध्यम भर हूँ जिससे हमारी कंपनी का प्रबंधन और कंपनी का क्लाइंट हमारी टीम के साथ कम्युनिकेट करते हैं. यह वैसे ही है जैसे किसी खास मैच के लिए टीम में से एक खिलाड़ी को कप्तान बना दिया जाता है. हम सब ठान लें तो इस प्रोजेक्ट को समय से पहले पूरा कर सकते हैं, और हम करेंगे. इसलिए नहीं कि हमें डर है, बल्कि इसलिए क्योंकि यह हमारी सामूहिक काबिलीयत का सबूत होगा."

प्रिया के इन चंद वाक्यों ने सबके मन पर से प्रोजेक्ट का दबाव हटा दिया. सब खुश नजर आ रहे थे.

तभी राहुल ने कहा, “प्रिया, हमें रोज सुबह एक मीटिंग करनी चाहिए, इससे हमें अपने लक्ष्य पर पहुँचने में बहुत मदद मिलेगी.”

राहुल से ‘प्रिया’ संबोधन सुनकर एक क्षण के लिए वह चौंकी. राहुल हमेशा उसे मैम कहता था. आज उसने उसके नाम से संबोधित किया. लेकिन अगले ही क्षण वह मुस्कुरा उठी. यह टीम में समानता की भावना का आरंभ था. प्रिया ने कहा, “हाँ, हम रोज दिन के आरंभ में मीटिंग करेंगे और उसके बाद कैंटीन चल कर एक साथ कॉफी पीकर ताजगी हासिल करेंगे और फिर काम में जुट जाएंगे. अब हम कॉफी के लिए कैंटीन चल सकते हैं.”

आदित्य ने हलकी आवाज में नारा लगाया, “हिप हिप हुर्रे.”

सबने उसका जवाब दिया, प्रिया भी उनमें शामिल थी.

उस दिन उनकी टीम के काम में एक जादुई ऊर्जा थी. लंच ब्रेक में भी उसका असर दिखा. टीम के सब लोग एक साथ खाने बैठे. सबने एक दूसरे से खाना शेयर किया. खाते हुए भी वे चर्चा करते रहे. खाने के बाद भी सुस्ती सिरे से गायब थी. शाम को प्रिया ने देखा कि जिस काम के लिए अनुमान था कि वह तीन दिन का समय तो लेगा. लेकिन उसका आधे से अधिक शाम के पहले ही पूरा हो चुका था. प्रशांत बाबू का 'टीम लीडर बनाम सुपरवाइजर' वाले सूत्र ने वाकई चमत्कार कर दिखाया था.

उधर कोटा की 'मोहन विला' में सन्नाटा था. पर यह एक बड़े बदलाव की आहट थी. ब्रज मोहनजी की चुप्पी ने विक्रांत को और ज्यादा हिंसक बना दिया था. वह सुबह-सुबह पहुँच गया और चिल्लाते हुए व्यापारिक साख की दुहाई देने लगा.

तभी मयंक कमरे में दाखिल हुआ. उसके हाथ में कुछ दस्तावेज़ थे. "विक्रांत भाई, अब बहुत हुआ. ये उन व्यापारियों की लिस्ट है जिनसे आपने हमारे नाम पर झूठे वादे किए थे. मैंने उनसे बात कर ली है. कोटा की मंडी अब आपकी धमकियों से नहीं डरेगी."

विक्रांत गुस्से से तमतमा उठा. उसने ब्रज मोहनजी की ओर देखा, पर उन्होंने अपनी नज़रें फेर लीं. मयंक ने आगे बढ़कर कहा, "हम आपकी बातों में नहीं आएंगे. हमने आपसे प्रिया के रिश्ते की बात करके ही गलती की थी. आप एक जीती जागती इंसान को अपनी संपत्ति ही समझने लगे. मुम्बई पुलिस की एफआईआर आपके लिए एक चेतावनी है कि सुधर जाओ."

अपनी जड़ें हिलते देख विक्रांत वहाँ से पैर पटकता हुआ निकल गया. उसकी आँखों में खतरनाक चमक थी. उसे समझ आ गया था कि कोटा की ज़मीन उसके पैरों के नीचे से खिसक चुकी है, अब उसे मुम्बई जाकर ही आखिरी दांव खेलना होगा.

रात नौ बजे विक्रांत मुम्बई जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस में था. उसने तय किया था कि अब वह मुम्बई का कारोबार संभालेगा, और  प्रिया को भी सबक सिखाएगा.

शाम के आठ बजे प्रिया ऑफिस से सीधे 'मेवाड़ भोजनालय' पहुँची. रामजी काउंटर पर थे, प्रशांत बाबू अभी नहीं आए थे.

"काका, आज चमत्कार हो गया. टीम ने वह कर दिखाया जो नामुमकिन लग रहा था," प्रिया ने उत्साह से कहा.

रामजी ने मुस्कुराकर उसे पानी दिया. "प्रशांत बाबू कहते हैं कि जब इंसान खुद को छोटा समझना बंद कर देता है, तो पहाड़ भी हिला सकता है. आज उनकी एसोसिएशन की मीटिंग है, वे देर से आएंगे."

प्रिया ने बाहर सड़क की ओर देखा. भीड़ भाग रही थी. अब उसे कोई डर नहीं था. उसने महसूस किया कि उसका अक्स अब आईने से बाहर आकर खुशबू हो रहा था. 

... क्रमशः

रविवार, 29 मार्च 2026

जड़ों की समझ

देहरी के पार, कड़ी - 10
प्रिया को जिस प्रोजेक्ट का लीड बनाया गया था उसकी डेडलाइन निकट थी. फेक आईडी प्रकरण ने उसके काम को प्रभावित किया था. उसे लगा कि प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो सकेगा. टीम लीड के रूप में उसका यह पहला प्रोजेक्ट था. वह अब कर्मचारी के साथ एक 'लीडर' की भूमिका में थी. उसे अपनी टीम को साथ लेकर काम करना था. विक्रांत की हरकत ने उसका मनोबल तोड़ने की कोशिश की थी. यदि रामजी काका, प्रशांत बाबू, आकाश, उसके पापा और उसके मैनेजर देसाई ने उसका साथ नहीं दिया होता तो वह सफल हो ही गया था.

अब वह पूरी क्षमता से इस प्रोजेक्ट में लगना चाहती थी. लेकिन अभी भी ‘विक्रांत और उसे पिता के मौन समर्थन’ की बात उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी. काम के दौरान यह याद आता और उसका सारा उत्साह शांत पड़ जाता और अवसाद हावी होने लगता. जैसा सोचा था, काम उसके हिसाब से नहीं हुआ. पूरी टीम में खुद वही सबसे सुस्त रही. इसका असर तमाम टीम मेंबरों पर भी पड़ा, वे भी धीमे हो गए. शाम तक वह लगभग हताशा की स्थिति में पहुँच गई. जैसे-तैसे आठ बजे, उसने अपना लैपटॉप ऑफ करके बैग में डाला और ऑफिस से निकल पड़ी.

बाहर आते ही उसे लगा कि अपने फ्लैट में वह अकेली होगी और अवसाद बढ़ेगा. उसने अपना इरादा बदल दिया. वह रामजी के भोजनालय जा पहुँची. आटो से उतरकर भोजनालय में प्रवेश करते ही उसने देखा, प्रशांत बाबू कॉर्नर टेबल पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे.

प्रिया ने ‘राम-राम काका’ कह कर काउंटर पर बैठे रामजी का अभिवादन किया और कॉर्नर टेबल पर जा बैठी. प्रशांत बाबू ने सिर उठा कर उसे देखा. “अरे तुम, लगता है तुम भी ऑफिस से सीधे इधर आ गई.”

“हाँ, सर!” मैंने आज दिनभर काम के बीच अवसाद महसूस किया. मेरी टीम का काम भी सुस्त रहा. मुझे लगा कि कुछ देर रामजी काका से बात करूंगी तो मन को तसल्ली मिलेगी. फ्लैट पर जाकर अकेले रहने से अधिक अवसाद में आ जाती. अब तो आप मिल गए हैं तो मेरे लिए यह सोने में सुहागा हो गया.”

प्रशांत बाबू ने हाथ का अखबार समेटकर साइड में रखा और कहने लगे, "प्रिया, जिसे तुम 'अवसाद' कह रही हो, दरअसल यह तुम्हारे भीतर का द्वंद्व है. तुम यहाँ मुम्बई में अपने लिए एक नई दुनिया गढ़ रही हो, लेकिन तुम्हारी पुरानी दुनिया, तुम्हारे पापा और उनका वर्चस्व तुम्हारे काम में लगातार बाधा बन रहे हैं.

तुम कहती हो कि 'विक्रांत की हरकतें' और उसे 'पापा का मौन समर्थन' तुम्हें कमजोर कर रहे हैं, तो समझो कि ऐसा क्यों है. विक्रांत ने तुम्हें एक 'इंसान' नहीं, केवल शरीर और 'संपत्ति' समझा. और जब संपत्ति किसी के हाथ से निकलती है, तो उसका स्वामी समझने वाला उसे वापस पाने के लिए हर हथकंडा अपनाता है. तुम्हारे पिता का मौन भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है जहाँ बेटी की आज़ादी को 'कुल की मर्यादा' से तौला जाता है. तुम्हें आज ऑफिस में जो हताशा हुई, वह इसलिए कि तुमने अनजाने में उनकी उन आवाजों को अपने भीतर जगह दे दी, है जो कहती हैं कि 'तुम अकेले कुछ नहीं कर सकतीं'.”

“हाँ, यह तो है. मैं कोशिश करूंगी कि उन आवाजों को अपने भीतर से निकाल डालूँ.” प्रशांत बाबू की बात प्रिया को ठीक लगी. “लेकिन इस सबके बीच मेरे प्रोजेक्ट का पता नहीं क्या होगा? डेडलाइन में दो सप्ताह भी नहीं बचे.”

“ऐसा कुछ नहीं कि तुम्हारा प्रोजेक्ट समय सीमा में पूरा न हो सके. यदि एक दो दिन की देरी भी हो जाए तो हर प्रोजेक्ट के लिए कंपनी के पास कुछ स्पेयर समय होता है, और तुम्हारे मैनेजर तुम्हें समझते हैं. तुम्हारी टीम की तुम सिर्फ लीड हो, उनके ऊपर सुपरवाइजर नहीं. तुम्हारी टीम के सभी मेंबर, सीनियर या जूनियर महत्वपूर्ण हैं. प्रोजेक्ट के काम में सभी का योगदान है. तुम्हें हर मेंबर के अब तक के काम का उल्लेख करते हुए उनके योगदान की प्रशंसा करनी चाहिए और उन्हें अहसास कराना चाहिए कि ‘वे सभी समान हैं, अब तक सबने बहुत अच्छा काम का किया है, सभी को मिल कर प्रोजेक्ट को समय सीमा से पहले पूरा करना है, इस प्रोजेक्ट की कामयाबी सभी टीम मेंबरों की होगी, केवल लीड की नहीं’. जब तुम्हारे टीम मेंबरों को अहसास होगा कि वे सब एक टीम हैं और टीम में सब समान हैं, तुम खुद को उनसे ऊपर नहीं समझती और सबसे अधिक काम करते हुए सबकी काम में मदद करती हो तो वे सब मेहनत से काम करेंगे. तुम्हारा प्रोजेक्ट समय से पहले पूरा हो लेगा. अब तुम तुम्हारे पिता और विक्रांत के बारे में सोचना बंद करो और अपने प्रोजेक्ट पर ध्यान दो.”

प्रिया तन्मयता से प्रशांत बाबू को सुन रही थी. तभी रामजी काका दो चाय लेकर खुद आ गए. “प्रशांत बाबू, हमारी बिटिया को लंबे लेक्चर से परेशान मत करो, वैसे ही ऑफिस से थकी हुई लौटी है. दोनों चाय पीजिए थोड़ी थकान उतरेगी.” वे चाय रख कर वापस अपने काउंटर की ओर बढ़ गए.

प्रशांत बाबू ने अपनी बात जारी रखी, “यह अवसाद नहीं, बल्कि तुम्हारी मानसिक थकान का प्रतिबिंब है. तुमने घर छोड़ दिया, आज तुमने अकेले फ्लैट में बंद होकर हार मानने के बजाय संवाद को चुना. यह तुम्हारी जीत है. विक्रांत और तुम्हारे पापा समाज के पुराने सामंती और पितृसत्ता के ढाँचे में ढले हुए लोग हैं. वे अपनी सोच और स्थिति के समान व्यवहार कर रहे हैं. जब तुम समझ लोगी कि तुम्हारी लड़ाई उस सोच के खिलाफ है जो तुम्हें 'वस्तु' मानती है, उस दिन तुम्हारा अवसाद ‘संकल्प’ में बदल जाएगा."

प्रशांत बाबू की बात तर्कपूर्ण थी. प्रिया को समझ आ रहा था कि जो कुछ उसके साथ हो रहा है, उसके पीछे गहरे सामाजिक और व्यवहारिक कारण हैं.

तभी रामजी आ गए. “सवा नौ बज रहे हैं बिटिया. प्रशांत बाबू के खाने का समय हो रहा है. तुम भी अब इतनी रात क्या बनाओगी. तुम्हारा भी लगवा देता हूँ.”

प्रिया ने सिर उठाकर रामजी की ओर देखा, उनकी बात प्रश्न नहीं बल्कि आदेश थी. वह क्या कहती, उसने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया.

उस रात प्रिया बहुत गहरी नींद सोई.
 ... क्रमशः