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शनिवार, 3 जनवरी 2026

रास्ता

 लघुकथा  : दिनेशराय द्विवेदी

अवनि उस रात के बाद कभी नहीं सो पायी. जिस रात डीजल पम्प की चौंधियाती रोशनी में उसकी बहन तारा को विक्रम सिंह के बेटे और उसके दोस्त उसे उठा कर पीछे जंगल में ले गए थे... फिर कुछ घंटों बाद न जाने कैसे वह घिसटते हुए सड़क तक पहुँची थी. पीसीआर वैन ने उसे अस्पताल पहुँचाया था. उस दिन के बाद से तारा की आँखें नाइट बल्ब की मद्धिम रोशनी को एक टक देखा करतीं — जैसे वह रोशनी ही अब उसकी एकमात्र गवाह हो, जो उसके जागते सवालों का जवाब दे सके. देखने वाले को पता नहीं लगता कि वह सो रही है या जाग रही है.

पुलिस दरोगा उसी पर सवाल दाग रहा था, "अच्छी लड़कियाँ शाम ढलने के बाद वहाँ क्यों जाती हैं?" मीडिया ने सुर्खी बनाई: "दोनों पक्षों में समझौते की बातचीत जारी." समाज ने... सिर्फ अपने कपाट बंद कर लिए.

तारा की एक दम चुप थी. उसकी यह चुप्पी अब एक जीवित, साँस लेता ज़ख़्म थी, जिससे हर पल नई पीड़ा रिस रही थी. उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक ऐसा शून्य था जिसने उसका होना ही उससे छीन लिया था. वह अब सिर्फ एक खोल थी, जिसकी आत्मा उसी डीजल पम्प की रोशनी में कहीं छूट गई थी.

पुलिस स्टेशन के सामने का नज़ारा देखकर अवनि और उसके पिता पत्थर हो गए. विक्रम सिंह का बेटा, गले में मालाएँ डाले, मीडिया के कैमरे के लैंस में अपनी आँखें डालकर कह रहा था—"यह मेरे खिलाफ राजनीतिक साजिश है." पीछे खड़े विक्रम सिंह की मुस्कुराहट में जीत का उल्लास सहज दिखाई दे रहा था.

उसी शाम, "शहर का सम्मान बचाना है" के नारे लगते हुए जुलूस निकला रहा था. उसमें वही सब चेहरे थे जो कभी लड़कियों के 'छोटे कपड़ों' पर टिप्पणी करते थे और वेलेंटाइन डे पर जोड़ों को पकड़ कर तंग करते थे. आज वे ही 'शहर के कथित भविष्य' को बचाने के 'महान कार्य' पर निकले थे.

घटना का बस एक गवाह मिला—बूढ़ा मास्टर राजन, जो उस रात सड़क किनारे अपनी साइकिल ठीक करवा रहा था. एकमात्र साहसी आवाज़ जिसने पुलिस को अपराधियों के नाम बताए. पर अदालत की पहली तारीख पर ही वह गायब था. अगले दिन अखबार के एक कोने में खबर थी: "वृद्ध शिक्षक अचानक बीमार हुआ, उसे विशेषज्ञों के पास भेजा गया."

अवनि समझ गई. यह गवाह की बीमारी नहीं थी, उसके लिए एक संदेश था, “वह चुप हो जाए, अपनी लड़ाई को यहीं समेट ले”.

साल दर बीतते गए. तारा की आँखों का खालीपन अब पूरे घर में फैल चुका था. पिता की नौकरी जा चुकी थी—"कंपनी की प्रतिष्ठा का सवाल जो था." माँ का शरीर रोज़ एक नया पीड़ा से पिराने लगा था. और अदालत का कमरा... वहाँ केवल पंखे की घरघराहट और कागज़ों की सरसराहट सुनाई देती थी. यह वह जगह थी जहाँ समय रुक जाता था, जहाँ हर तारीख एक नई कब्र बन जाती थी. एक श्मशान, जहाँ न्याय के शवों का अन्तिम-संस्कार धीमे-धीमे चलता ही रहता था. कभी-कभी अवनि को लगता, वह अपने ही भविष्य की कब्र खोदने आई है.

एक दिन, जमानत पर आजाद हुए आरोपी को अवनि ने एक विशाल राजनीतिक रैली में मंच से भाषण देते देखा. उसकी आवाज़ गूँज रही थी—"मैं युवा शक्ति का नेता हूँ, समाज का नया सवेरा लाऊँगा!" उसके साहस को ऊँचाइयाँ देने को जन-समुद्र गर्जना कर उठा था.

उसी रात, अवनि ने अपनी डायरी लिखना शुरू किया.

पहला पन्ना:

"हम वह समाज हैं जो बेटियों को गर्भ में ही मार दिया करते हैं, और बलात्कारी को गर्भनाल से ही पालते हैं — वे हमारे वंश के वृक्ष की जड़ें हैं, हम उन्हें काट नहीं सकते. हम वह समाज हैं जो धर्म के नाम पर खून तो बहा सकते हैं, लेकिन एक बेटी के आँसू पोंछने का धर्म — एक सनातन मानवीय धर्म — भूल चुके हैं."

उसने ये शब्द सोशल मीडिया के अपने सभी अकाउंट पर अपलोड किए. पहले कुछ घंटे सन्नाटा रहा. फिर एक आवाज़ ने दस्तक दी... फिर दस... फिर सैकड़ों की आवाज गूँजने लगी.

फिर वह दिन आया. राजन मास्टर अब व्हीलचेयर पर, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे. उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर हर शब्द लोहे की तरह था:

"मैंने देखा है. मैं घटना का आई विटनेस हूँ. और अगर इस नगर में अब भी कोई इंसान बचा है, तो उसे भी यह कहना होगा—'मैंने देखा है'. हम सब गवाह हैं. हमारी चुप्पी ही हमारा सबसे बड़ा अपराध है."

चुप्पी का बाँध अब टूट चुका था. अवनि अकेली नहीं थी. अनेक ताराएँ, अनेक राजन, अब एक मानव-श्रृंखला बनाकर खड़े थे.

अब उनके हाथों में आँसू बहाती मोमबत्तियाँ नहीं, मशालें थीं. उनकी लपटें न केवल अँधेरा लील रही थीं, बल्कि चुप्पी के बवंडर को भी उन्होंने जला दिया था. समाज का वह घिनौना मौन, जो किसी जघन्य अपराध से कम नहीं था, अब टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर रहा था. न्याय अभी बहुत दूर था, पर उस तक पहुँचने वाला रास्ता अब बन रहा था — एक ऐसा रास्ता जो चुप्पी के जंगलों को चीरता हुआ, डर के दलदलों को पार करता हुआ, सीधे हमारे अपने घर के दरवाज़े तक आता था. लोग उसे लक्ष्य तक पहुँचाने को जुट पड़े थे. और एक भरोसा कि, इस बार, यह रास्ता टूटेगा नहीं.

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

तारों और न्यूरॉन्स के बीच

लघुकथा :  दिनेशराय द्विवेदी 
डॉ. आर्यन मिश्रा ने अपनी कॉफ़ी की चुस्की ली और कम्प्यूटर स्क्रीन से नज़र हटाकर प्रोफेसर राजीव सेठ की ओर देखा. "सर, कल रात मैंने एक कहानी 'घिरनियाँ' पढ़ी. उसमें प्रोफेसर पात्र का वह कथन – 'सारे विचार भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं' – मुझे मेरे न्यूरोसाइंस के शोध का सार प्रतीत हुआ."
प्रोफेसर सेठ मुस्कुराए. "तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारे शोध के निष्कर्ष उस साहित्यिक कथन की वैज्ञानिक पुष्टि करते हैं?"

"बिल्कुल!" आर्यन उत्साहित हो गया. "हमारे मस्तिष्क में लगभग 100 अरब न्यूरॉन्स हैं, सर. ये आपस में करीब 1000 ट्रिलियन कनेक्शन बनाते हैं. यह आकाशगंगा के तारों से भी जटिल नेटवर्क है. और हर विचार..." आर्यन ने अपनी उँगलियों से हवा में एक जाल सा बनाया, "सिर्फ इन न्यूरॉन्स के बीच इलेक्ट्रोकेमिकल संकेतों का एक विशिष्ट पैटर्न है. बिल्कुल 'घिरनियाँ' कहानी के उस गियर सिस्टम की तरह, जहाँ एक घिरनी की गति दूसरी को चलाती है, और यह शृंखला एक विचार या क्रिया को जन्म देती है."

"विस्तार से समझाओ," प्रोफेसर ने कहा, अपनी कुर्सी पर आराम से बैठते हुए, उनकी आँखों में एक जिज्ञासु चमक थी. वे जानते थे कि आर्यन न सिर्फ़ एक होनहार शोधकर्ता था, बल्कि विज्ञान के दर्शन पर गहराई से विचार करने वाला दिमाग़ भी था.

आर्यन ने एक नोटबुक खोली, जिसमें रंग-बिरंगे डायग्राम और समीकरण भरे हुए थे. "देखिए सर, एक न्यूरॉन आराम की अवस्था में -70 मिलीवोल्ट पर होता है. जब उसे संकेत मिलता है, तो सोडियम आयन अंदर आते हैं – इस तरह डिपोलराइज़ेशन की प्रक्रिया आरंभ होती है. एक सीमा पार करते ही +40 mV एक्शन पोटेंशियल बनता है, जो एक विद्युत तरंग की तरह एक्सॉन के सहारे दौड़ता है. फिर एक समय के बाद पोटेशियम आयन बाहर जाने लगते हैं – इस तरह रिपोलराइज़ेशन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, और न्यूरॉन फिर से आराम की अवस्था में लौट आता है. यही चक्र... यही भौतिक प्रक्रिया हर विचार, हर अनुभव, हर सपने की नींव है. जब आप अभी 'घिरनियाँ' शब्द सुन रहे हैं, तो आपके मस्तिष्क के वर्निके एरिया (Wernicke's Area) में न्यूरॉन्स का एक विशिष्ट समूह इसी तरह के इलेक्ट्रोकेमिकल तूफान से गुजर रहा है."

"प्रभावशाली," प्रोफेसर ने कहा, अपनी उँगलियों को एक पिरामिड की शक्ल में जोड़ते हुए. "पर कौशिक नामक वह छात्र जब पहली बार गियर को छूता है, तो उसे एक 'अहसास' होता है – एक आंतरिक झनझनाहट, एक जागृति. तुम्हारी FMRI और EEG मशीनें उस 'अहसास' को कैसे मापती हैं? क्या वह महज न्यूरल फायरिंग का एक और पैटर्न है, या कुछ और?"

आर्यन कुछ पल को चुप रहा, कॉफ़ी के मग को घूमता हुआ देखने लगा. "सर, हम न्यूरल एक्टिविटी के कोरेलेट माप सकते हैं. प्रेम के लिए ऑक्सीटोसिन और डोपामाइन का स्राव, डर के लिए एमिग्डाला की सक्रियता, ध्यान के लिए प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स का दोलन... पर..."

"पर 'अहसास' स्वयं?" प्रोफेसर ने पूछा, अपनी आवाज़ को कोमल बनाते हुए. "वह 'मैं' जो इन रसायनों को 'अपना' अनुभव बताता है? वह घिरनी जो सभी घिरनियों के घूमने को देख रही है, और अपने घूमने को भी महसूस कर रही है? वह चेतना, जो इन सब भौतिक प्रक्रियाओं का साक्षी है – क्या वह भी एक घिरनी है, या घिरनियों के जाल से उपजी कोई नई, अदृश्य वास्तविकता?"

शाम की लाली खिड़की से उनके कमरे में घुस रही थी, दीवारों को एक नारंगी आभा से रंगते हुए. प्रोफेसर ने खिड़की की ओर इशारा किया, जहाँ आकाश धीरे-धीरे गहरा हो रहा था. "देखो, 'घिरनियाँ' कहानी सरल थी – एक गियर सिस्टम, एक कुएँ की घिरनी. पर उसका सिद्धांत गहरा था. आज तुम मुझे मस्तिष्क की घिरनियाँ दिखा रहे हो – न्यूरॉन्स, सिनैप्स, न्यूरोट्रांसमीटर. और बाहर... ब्रह्मांड की घिरनियाँ."

"सितारे?" आर्यन ने पूछा, उसकी नज़र भी अब खिड़की के बाहर टिक गई थी.

"हाँ. मिल्की वे में 100 से 400 अरब तक तारे हैं. हमारे दिमाग़ में लगभग 100 अरब न्यूरॉन्स. क्या यह महज संयोग है?" प्रोफेसर ने अपनी कुर्सी से उठकर खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए. "या फिर जटिलता का एक सार्वभौम नियम है – कि जब भी अरबों इकाइयाँ आपस में जुड़ती हैं, तो कुछ 'नवीन' का उद्भव होता है? तारों के जाल से ग्रह और जीवन उभर आया... न्यूरॉन्स के जाल से... चेतना उभर आई? क्या यह सब एक ही महा-प्रक्रिया के विभिन्न स्तर हैं? जैसे फ्रैक्टल पैटर्न, जो हर स्केल पर खुद को दोहराते हैं?"

डॉ. आर्यन ने गहरी साँस ली. उसके मन में एक साथ कई विचार-घिरनियाँ घूमने लगी थीं. "तो आप कह रहे हैं कि चेतना, भौतिक प्रक्रियाओं का ही एक ऐसा उच्चस्तरीय गुण है, जिसे हम अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं? जैसे पानी के अणुओं की व्यवस्था से 'तरलता' का गुण उभरता है, वैसे ही न्यूरॉन्स की अत्यंत जटिल व्यवस्था से 'चेतना' उभर आती है?"

"हाँ," प्रोफेसर ने कहा, वापस अपनी कुर्सी की ओर मुड़ते हुए. "मैं यह नहीं कहता कि कोई गैर-भौतिक आत्मा है, जो मशीन में घुसी हुई है. मैं कहता हूँ कि भौतिकता ही इतनी जटिल, इतनी सुंदर हो सकती है कि वह... स्वयं को देखने लगे. 'घिरनियाँ' कहानी का वह प्रोफेसर सही था – “सभी विचार भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं”. पर वह यथार्थ इतना विशाल, इतना गहरा है, इतना परस्पर जुड़ा हुआ है कि उससे 'चेतना' जैसा अद्भुत, रहस्यमय गुण उभर आया है. और शायद, हमारी यह चेतना ही उस यथार्थ को समझने की कोशिश कर रही है – यह एक दर्पण में दर्पण को देखने जैसा है."

आर्यन ने अपनी कॉफ़ी की चुस्की ली, जो अब पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी, पर उसे इसका एहसास भी नहीं हुआ. "शायद हमारा काम इस भौतिक यथार्थ को समझने की कोशिश जारी रखना है – एक स्तर से दूसरे स्तर तक. हर नया शोध, हर नया तथ्य... एक नई घिरनी शुरू करता है, जो दूसरी घिरनियों को चलाती है, और ज्ञान का एक नया चक्र आरंभ होता है. और शायद, एक दिन, हम उस अंतिम घिरनी तक पहुँच जाएँगे... या फिर पाएँगे कि घिरनियों का अंत ही नहीं है, बस अनंत संपर्क है."

"बिल्कुल," प्रोफेसर ने कहा, एक संतुष्ट मुस्कान के साथ. "और सबसे सुंदर बात यह है कि ये सभी घिरनियाँ – मस्तिष्क की, ब्रह्मांड की, विचारों की, भावनाओं की – आपस में जुड़ी हैं. हम स्वयं उस संपर्क का प्रमाण हैं. एक ऐसा बिंदु जहाँ ब्रह्मांड स्वयं को प्रतिबिंबित करने लगा है. तारों की धूल से बने इस शरीर में, तारों जितने ही न्यूरॉन्स घूम रहे हैं, और उनसे उपजी चेतना, तारों के रहस्यों को जानने की चाह रखती है. यह एक स्व-संदर्भित कविता है, आर्यन, और हम उसके शब्द हैं."

बाहर, पहला तारा टिमटिमाया – शायद वह भी कोई दूर का सूर्य था, जिसके चारों ओर ग्रह घूम रहे होंगे, और शायद किसी ग्रह पर कोई और प्राणी, किसी और प्रयोगशाला में, इसी पल न्यूरॉन्स और तारों के बीच के संबंध पर विचार कर रहा होगा. अंदर, उस शांत कमरे में, दो वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में, अरबों न्यूरॉन्स की घिरनियाँ एक नए, गहरे विचार को जन्म दे रही थीं. वही पुराना सिद्धांत था, पर एक नए, विस्तृत स्तर पर – कि सभी घिरनियाँ एक दूसरे से जुड़ी हैं, और हर घूर्णन, हर संपर्क, इस विशाल ब्रह्मांडीय ताने-बाने में एक थ्रेड है. और शायद, चेतना ही वह वह चमकदार धागा है जो इन सभी थ्रेड्स को एक सार्थक पैटर्न में बुनता है – अस्थायी रूप से, नाज़ुक रूप से, अद्भुत रूप से.

नोट : डॉक्टर मित्र Navmeet Nav को धन्यवाद करते हुए. इस कहानी के लिए तकनीकी जानकारी प्राथमिक रूप से उन्हीं के एक लेख से प्राप्त हुई हैं.

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बयान

'लघुकथा'  
: दिनेशराय द्विवेदी

अशोक ने अपनी कार रोकी. सामने घर के दरवाजे से वही मिट्टी का आँगन था, जहाँ उसकी लाड़ली भाँजी प्रिया दौड़ती हुई ‘मामा’ कह कर उसके दौड़ती हुई उसके गले लग जाती थी. आज वह आँगन सूना था. सोलह साल की प्रिया, नर्स बनने का सपना देखने वाली. अब केवल एक पुलिस फाइल, एक पोस्टमार्टम नंबर और तालाब किनारे चाक से खींची गई रेखा हो कर गयी थी. वह भांजी की वीभत्स मृत्यु से दुःखी अपनी बहिन के दुःख और दर्द को बाँटने को आया था.

अंदर आंगन में पहुँचने पर जीजा शिवदीन की निगाहें उस पर पड़ी. उसने देखा, वे बिलकुल टूटे हुए लग रहे थे. उनकी आँखों में कोई आशा नहीं, बस एक गहरी थकान थी. कमला दीदी चूल्हे के पास बैठी थीं. उसे देखते ही उनकी रुलाई फूट पड़ी. क्षण भर में ही उसकी तीव्रता ने अशोक का मन चीख उठा. वह दौड़ कर कमला दीदी के पास पहुँचा और उसे अपने सीने से चिपका लिया. बमुश्किल चार-पाँच मिनट रो लेने के बाद दीदी के मुहँ से बोल निकले, “तेरी प्यारी प्रिया चली गयी”. वह देर तक कमला को ढाढ़स दिलाता रहा. फिर जीजा के पास जाकर बैठा.
"जीजा, आप बताइए... सब कुछ, "अशोक ने नोटबुक खोली.

"क्या बताएँ, बेटा?" शिवदीन की आवाज़ टूटी हुई थी. "हमने मना किया था. उम्र थी उसकी... पंद्रह साल से ज्यादा का फर्क. ब्याहता था वो आदमी. पर बेटी कहती थी — 'बाबू, वह मेरी मदद करेगा. पढ़ाएगा. शहर ले जाएगा.' हम क्या कहते? हमारी हैसियत में सपने देखना भी पाप होता है?"

कमला दीदी ने अचानक फुसफुसाकर कहा, "उस... उस रंजन साहब के घर की औरत... उसने प्रिया को गली में रोक-रोक कर डाँटा था. कहा था — 'अपनी औकात याद रखो. हमारे घर की तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत?'

अशोक ने अपनी डायरी में नोट किया: 'प्यार का झाँसा? नहीं. जाति और सत्ता का हथियार.'


अगला पड़ाव सरोज थी, प्रिया की सहेली. उससे गाँव से दूर, एक सूखे पेड़ के नीचे मुलाकात हुई. सरोज की आँखों में डर का साया था.

"सरोज, मुझ पर भरोसा करो. मैं तुम्हारा रिश्तेदार हूँ, और वकील भी."

सरोज ने गहरी साँस ली. "उस रात... हम दोनों गए थे. मैं पीछे रुक गयी थी. प्रिया कुछ दूर पेड़ों के झुरमुट में बैठ बातें करने ही लगे थे. अचानक पाँच लोग आ गए... करन चाचा सबके आगे थे."

"करन? पंचायत वाले?" अशोक ने पूछा.

"हाँ. वे चिल्लाए, 'हमारी बहन-बेटियों को भ्रष्ट करोगे? इस गाँव की मर्यादा मिट्टी में मिला दोगे?' फिर... मारना शुरू कर दिया. दोनों को."

सरोज की आवाज़ लड़खड़ा गई. "प्रिया के सिर पर... करन चाचा ने खुरपी से वार किया. वह चीखी... और फिर गिर गई. खून... बहुत खून था."

"फिर?" अशोक ने कोमलता से पूछा.

"फिर..." सरोज ने आँखें मूँद लीं, जैसे उस दृश्य को भगाना चाहती हो. "जब वह बेहोश पड़ी थी... तब... उनमें से दो... महेश और बलवंत... उन्होंने उसे... छुआ. उसके कपड़े... फाड़े. मैं दूर झाड़ियों में छिपी थी... रो भी नहीं सकी. सब देखा. फिर वे सब, खुसर-फुसर करते हुए, चले गए. रंजन साहब वहीं ज़मीन पर बैठे थे... डरे हुए, काँपते हुए."

अशोक का दिल ज़ोर से धड़का. पुलिस रिपोर्ट में बलात्कार का जिक्र तक नहीं था. यह सामूहिक हिंसा का चरम, 'मर्यादा' के नाम पर किया गया सामूहिक अधिकार जताना था. उसने डायरी में नोट किया: 'मर्यादा = सामूहिक हिंसा + सामूहिक बलात्कार का बहाना.'

"तुमने पुलिस को यह क्यों नहीं बताया, सरोज?"

"कौन सुनता?" सरोज की आँखों में आँसू आ गए. "करन चाचा कहते, अगर किसी ने मुँह खोला, तो उसका वही हाल होगा. और पुलिस... पुलिस तो उनकी ही सुनती है."

अशोक समझ गया. पुलिस बलात्कार से इनकार कर रही थी क्योंकि आरोपी 'गाँव के सम्मानित' लोग थे. प्रिया का शोषण शुरू हुआ था एक सवर्ण पुरुष के झाँसे से, और पूरा हुआ था गाँव के दंबंगों की सामूहिक क्रूरता से. और अंत में, रंजन ने, उस सामूहिक हिंसा के बाद, सिर्फ अपने बचाव के लिए, उसी लड़की का गला घोंट दिया जिससे वह 'प्यार' करने का नाटक करता था. शव तालाब में फेंक दिया, जैसे कोई कूड़ा.


उस रात, अशोक का छोटा सा कार्यालय रोशनी से जगमगा रहा था. दीवार पर प्रिया की एक धुंधली सी तस्वीर टंगी थी. उसके सामने तीन कॉलम बने थे:

पहला ¬: रंजन: छल, शोषण, हत्या.
दूसरा : करन और गिरोह: सामूहिक हिंसा, सामूहिक बलात्कार (छिपाया हुआ), धमकी.
तीसरा : पुलिस जानबूझकर लापरवाही, सबूत दबाना.

वह जानता था, कोर्ट में सिर्फ पहला कॉलम ही चलेगा. दूसरा गाँव की सामूहिक चुप्पी और डर में दफन रहेगा. तीसरा सिस्टम की लाचारी कहलाएगा.

तभी उसकी नज़र अपनी पुरानी पत्रकारिता की डायरी पर पड़ी. पहले पन्ने पर लिखा था: "सच कोई तथ्य नहीं, एक प्रतिबद्धता है."

उसने फोन उठाया. राहुल का नंबर डायल किया, वह उसका पुराना साथी था, अब एक बड़े अखबार का निर्भीक एडिटर.

"राहुल, तैयार हो जाओ."

"क्या हुआ, अशोक? फिर किसी केस में उलझ गए?"

"यही समझ लो.”

“इस बार मेरी खुद की भांजी का मामला है.”

"क्या?

"सच का जिसे दफनाने की पूरी कोशिश हुई है. एक दलित लड़की के सपनों, उसके शोषण और उसकी हत्या का. और सिर्फ एक इंसान की नहीं... एक पूरे तंत्र की हत्या का."

फोन के दूसरे छोर पर एक पल की चुप्पी थी. फिर राहुल की आवाज़ आई, दृढ़ और स्पष्ट.

"बताओ क्या करना है?"

"मैं रिपोर्ट भेजता हूँ.

...........

अशोक ने प्रिया की तस्वीर की ओर देखा. वह अब केवल एक वकील नहीं था. वह कमला दीदी और जीजा शिवदीन के दर्द, सरोज के डर, और अपने ही समुदाय के अपमान का जीता-जागता साक्षी था. उसे अब खुद उस सिस्टम से लड़ना होगा, जो जाति के नाम पर हिंसा को अनदेखा कर देता है.

उसने कलम उठाई. शिकायत का मसौदा शुरू किया. पहली पंक्ति लिखी:

"यह केवल एक हत्या का मुकदमा भर नहीं होगा. यह सदियों पुरानी सड़ी-गली व्यवस्था के खिलाफ, एक साक्षी का बयान होगा..."

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

खाई

"लघुकथा" : दिनेशराय द्विवेदी

शहर में हुई ताज़ा बड़ी रैली के बाद, हवा का स्वाद बदल सा गया था. चाय की दुकान पर आवाज़ें ऊँची थीं, और व्हाट्सएप ग्रुप्स नोटिफिकेशन की बौछार से भरे हुए थे. रैली शांतिपूर्ण रही थी, पर उसके बाद मोहल्ले में एक अजीब सा सन्नाटा था, जैसे किसी आने वाली आंधी या तूफान की सूचना दे रहा हो.

अनन्या और ज़रीना हमेशा की तरह उस शाम छत पर बैठी थीं, इस साल उन्हें सैकण्डरी बोर्ड की परीक्षा देनी थी. बोर्ड के नाम का बड़ा आतंक था. उन्हें चिन्ता थी कि वे इस रेखा को ठीक से पार कर पाएंगी या नहीं. सात साल की दोस्ती उनकी आवाज़ों में, उनकी हँसी में रच-बस गई थी.

"कल से तेरे घर पढ़ना पड़ेगी" ज़रीना ने कहा, "मेरी अम्मी बीमार हैं."

"ठीक है," अनन्या ने इस प्रस्ताव को सहज स्वीकार कर लिया.

रात के खाने की मेज पर भाई विक्रम का चेहरा उत्तेजना से चमक रहा था. "आज तो लोगों की आँखें खुल गई होंगी! हमें अपने लोगों की सुरक्षा खुद करनी होगी." पिताजी मौन सिर हिला रहे थे.

तभी विक्रम का ध्यान अनन्या पर गया. "सुन, कल से उस ज़रीना को घर मत बुलाना."

"क्यों भैया? हमें साथ पढ़ना है," अनन्या हैरानी से बोली.

"उनकी संस्कृति अलग है, अनन्या. हम नहीं जानते उनके मन में क्या चल रहा है."

अनन्या को उसकी आवाज़ में एक नई, कठोर निश्चय की ध्वनि सुनाई दी. सुन कर अनन्या का गला सूख गया. "पर... वह तो मेरी सबसे अच्छी दोस्त है."

पिताजी ने आवाज़ दबाकर कहा, "बेटे, विक्रम की बात मान लो. तुझे कुछ हो गया तो? हमारी इज्ज़त का क्या होगा? उनसे दूर ही रहना ठीक है."

इज्ज़त शब्द हवा में झूल गया, जैसे कोई भारी पत्थर है और कभी भी उसके सिर पर गिर पड़ेगा.

अगले दिन जब ज़रीना किताबें लेकर आई, तो अनन्या ने दरवाज़ा आधा खोला. "ज़री... आज मैं ठीक नहीं हूँ. सिर दर्द है. तू चली जा."

ज़रीना की मासूम आँखों में चिंता तैर गई. "अच्छा? ठीक है... दवा ले लेना. पढ़ नहीं पाई तो परीक्षा कैसे देगी." उसने अपने बैग से चॉकलेट की एक पट्टी निकाली और अनन्या के हाथ में थमा दी, फिर चली गई.

दरवाज़ा बंद करते हुए अनन्या के हाथ काँप रहे थे. वह जो सिर्फ ज़रीना थी. उसकी हँसी, उसकी शैतानियाँ, उसके रहस्य, अचानक सब 'संभावित खतरा' बन गए थे. वह उसका चेहरा भूल रही थी, पर भैया के शब्द, "उनके मन में क्या चल रहा हैं," उसके कानों में गूँज रहे थे. पहली बार, उसने अपनी ही सहेली से तनिक भय महसूस किया. उसके सारे शरीर में एक सिहरन दौड़ गयी. फिर एक लंबी सांस अपने अंदर खींच कर उसने अपने विश्वास को मजबूत किया कि प्यारी सी ज़रीना उसके लिए खतरे का बायस कैसे बन सकती है.

एक हफ़्ते तक बहानेबाजी करती रही. फिर एक दिन, स्कूल गेट पर, ज़रीना ने उसका रास्ता रोक लिया.
"तू मुझसे नाराज़ है क्या? मैंने कुछ गलत कहा?"

"नहीं... बस... अब हम बड़े हो गए हैं. अलग-अलग रहना चाहिए."

ज़रीना स्तब्ध रह गई. उसकी आँखों की चमक धूमिल पड़ गई. "क्या मतलब? 'अलग' क्यों?"

एक क्षण के लिए स्तब्धता ने उसे रोका. फिर उसने धीरे से सवाल कर ही लिया, "क्योंकि मैं मुस्लिम हूँ?"

अनन्या मौन रह गयी. लेकिन उसके इस मौन ने उसे बहुत कुछ कह दिया था.

ज़रीना के चेहरे पर आघात, और फिर एक ठंडी, दुखद समझदारी उभरी.

"समझ गई. तेरे भैया ने कहा होगा न? मैंने सुना है उसका भाषण." वह एक कदम पीछे हटी, जैसे कोई अदृश्य रेखा खींच रही हो. "ठीक है. तू सुरक्षित रह."

और फिर सब कुछ थम गया.

अब अनन्या अपनी खिड़की से कभी-कभी ज़रीना के घर की ओर देखती है, जहाँ वह अपनी छत पर अकेली बैठी रहती है. पहले जहाँ दोनों के बीच एक खुला आंगन था, साझी हँसी थी, अब दो घरों के बीच की सड़क, अब सड़क नहीं रह गयी थी. वहाँ रातों रात एक गहरी खाई बन गयी थी, एक अदृश्य खाई. उसे लगता कि वह कभी इस खाई के पार न जा सकेगी. बहुत सारे लोगों को यह खाई कभी नहीं दिखी. वे इस पार से उस पार आते जाते रहे. पर यह खाई हर पल अनन्या के ज़ेहन में मौजूद थी.

एक शाम, अपना बैग खंगालते हुए अनन्या को चॉकलेट की पट्टी हाथ लगी. इसे ज़रीना ने उसे दिया था और वह बैग में डाल कर भूल गयी थी. उस पर ज़रीना ने ख़ुश ख़त में लिखा था, "हमेशा तेरी दोस्त."

जैसे ही अनन्या के हाथ ने उस चॉकलेट की पट्टी को छुआ, वैसे ही उसके अंतर से 'कुछ हो जाने' का डर पता नहीं काफूर हो गया. डर केवल उसे दिखाया गया था, वह कभी आया ही नहीं. कोई अनहोनी नहीं हुई. उलटा, कुछ और ही 'हो गया' था. उसकी दुनिया सिमट गई थी. उसके मन की कोमल पंखुड़ियों के बीच संदेह के काँटे उग आए थे. उसकी सबसे कीमती चीज़, निश्छल और बिना शर्त दोस्ती टूटकर बिखर गई थी.

उस रात अनन्या जब अपने कमरे में बिलकुल अकेली रह गयी, बहुत कुछ सोचती रही. फिर अचानक वह उठी, पानी के अधभरे गिलास में अपनी उंगली डुबोई और अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर उँगली से एक शब्द लिखा: "क्यों?"

उस रात उसका पढ़ने में बिलकुल मन नहीं लगा. वह ठीक से सो भी नहीं सकी. जैसे ही सुबह की रोशनी ने खिड़की से कमरे में प्रवेश किया. उनींदी सी वह उठी और उसने खिड़की खोल दी. उसे चिड़ियों की चहचहाट सुनाई दी. सामने की छत पर ज़रीना टहल रही थी. उसके मन ने बस चाहा कि ज़रीना उसे देखे. तभी ज़रीना ने उसकी खिड़की की और देखा. दोनों की निगाहें मिलीं. उसने ज़रीना की ओर अपना हाथ हिलाया. ज़रीना ने भी अपना हाथ हिला कर जवाब दिया. दोनों के चेहरों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी. अनन्या ने महसूस किया कि उनके बीच की सड़क पर कभी कोई खाई थी ही नहीं.

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

साँस

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
मैंने साँस अन्दर खींची, जितनी हवा मैं अपने फेफड़ों में भर सकता था भर ली. जो फेफड़ों में भरी गयी थी, वह सिर्फ हवा नहीं थी. उसके साथ एक कठोर नियम था, पिताजी का वह वाक्य "लड़के रोते नहीं". वह मेरे फेफड़ों में भरी गयी हवा के निकल जाने के बाद भी अंदर रह गया था. पहले मेरे फेफड़ों में और फिर मेरे खून में घुल कर मेरी रग-रग में समा गया. बारह साल की उम्र तक आते-आते, जब भी जरूरत होती मुझे मेरे अंदर से सुनाई देने लगता.

प्रिया, मेरी बहन तब चौदह की थी. उसने साइकिल चलानी सीखनी चाही. हमारे छोटे से शहर की उस सड़क पर, जहाँ मैं और मेरे दोस्त बिना किसी डर के पूरे दिन साइकिलों पर उड़ान भरते थे, लड़कियाँ कभी साइकिल चलाते नहीं दिखीं. वे सीखते हुए दिखतीं, फिर कुछ दिनों बाद उनकी साइकिल गायब हो जातीं.प्रिया के लिए पिताजी से साइकिल चलाने की अनुमति प्राप्त कर लेना एक संघर्ष था.

"लड़कियाँ इतनी दूर साइकिल पर नहीं जातीं," माँ ने कहा, आँखें नीची किए. "लोग क्या कहेंगे?" 'लोग'... हमारे घर की चौथी दीवार थे, जिसमें उन लोगों के कान और आँखें चिपकी थीं, जो कभी नहीं दिखते थे पर हर वक्त, हर जगह मौजूद रहते थे.

पिताजी ने एक वाक्य में फैसला सुना दिया: "ज़रूरत नहीं है।"

प्रिया की आँखों में वह चमक, जो सवाल पूछते वक्त होती थी, धुंधली पड़ गई। मैंने देखा. पर मैं चुप रहा. मेरे अंदर का लड़का जिसने रोने पर जीत हासिल कर ली थी, वह मुझे यही सिखाता था, चुप रहो. यह तुम्हारी लड़ाई नहीं है.

फिर मैं सोलह का हो गया. स्कूल की बास्केटबॉल टूर्नामेंट की फाइनल मैच. पूरे हफ़्ते की प्रैक्टिस, पसीना, और एक जुनून था जो मेरे अंदर भर गया था। आखिरी सेकंड. स्कोर बराबर. मैंने शॉट लगाया. गेंद रिम पर घूमी... और बाहर गिर गई. मेरी टीम जीत नहीं सकी, मैच बराबरी पर छूटा.

सुनसान जिम में, मेरे साथियों के झुंड के बीच, एक अजीब सी जलन मेरी आँखों के पीछे उभरी. मेरा गला रुंधने लगा. मैंने तुरंत सिर झुका लिया. लड़के रोते नहीं. मेरे अंदर का लड़का कहीं टूटने को था.

लेकिन फिर एक हाथ मेरे कंधे पर पड़ा. हमारी टीम के कप्तान राहुल का, जो ग्यारहवीं में था और जिसे मैं एक देवता की तरह देखता था. उसकी आवाज़ सामान्य से कुछ कोमल थी.

"कोई बात नहीं, विशाल। तुमने बहुत अच्छा खेला."

और तभी मैंने देखा, राहुल की आँखें भी चमकीली थीं। लेकिन नम. वह भी... महसूस कर रहा था? उसके अंदर के लड़का भी टूट रहा था. उस की टूटन ने मेरे भीतर के लड़के को हिला कर रख दिया.

उस शाम, मैं घर लौटा, तब प्रिया रसोई में माँ की मदद कर रही थी. उसने पूछा, "कैसा रहा मैच?"
मैंने सिर्फ सिर हिलाया। फिर अचानक बोल पड़ा, "हारे नहीं, पर जीत भी नहीं सके. बुरा लग रहा है."

मेरा यह वाक्य हवा में तैरता रह गया. प्रिया हैरान थी. मैंने कभी नहीं कहा था, 'बुरा लग रहा है.'

उस रात, पिताजी ने मेरे चेहरे पर उदासी देखी और पूछा, तो मैंने फिर से वही कहा: "हार का बुरा लग रहा है, पापा।"

पिताजी चुप रहे। शायद उन्होंने मेरे लड़के के कवच में पड़ी उस दरार को देख लिया था. उनकी आवाज़ सख्त नहीं थी, बस थकी हुई थी, बोले "कोई बात नहीं. अगली बार जीत लेना."

यह एक तसल्ली नहीं थी, पर डाँट भी नहीं थी. यह क्या था? मुझे समझ नहीं आया. क्या उनका भी कवच दरक रहा था?

कुछ दिन बाद, जब प्रिया ने फिर, बहुत ही धीमे स्वर में, कहा, "मैं साइकिल सीखना चाहती हूँ ताकि ट्यूशन समय से पहुँच सकूँ," तो मैंने, अचानक अपने कवच की दरार से बाहर निकल आया. जा कर पिताजी से कहा, “अब प्रिया को साइकिल सीखने की जरूरत है, “उसे मैं सिखा देता हूँ पापा. शाम को सड़क खाली रहती है.”

यह कोई विद्रोह नहीं था, नारेबाजी भी नहीं थी. सिर्फ एक प्रस्ताव था. एक साँस, जो बहुत पहले मैंने खींच कर अपने फेफड़ों में भर ली थी. जो मेरी रग-रग में दौड़ रही थी. अब बाहर निकलने को छटपटा रही थी.

पिताजी ने मेरी ओर देखा. फिर प्रिया की ओर, जिसकी आँखों में चमक लौट आई थी. चमक, जो सवाल नहीं, उम्मीद पूछ रही थी.

"ठीक है," उन्होंने कहा, बिना किसी जोश के. "पर शाम सात बजे से पहले. और खाली सड़क पर ही."

यह जीत नहीं थी. यह सिर्फ एक मोड़ था. उस दिन, जब मैंने प्रिया को साइकिल का हैंडल पकड़ाना सिखाया, तो मैंने महसूस किया कि मेरे अंदर का कभी न रोने वाला लड़का पिघल रहा है. हर साँस जो अब मैं बाहर छोड़ता हूँ, उसके साथ वह लड़का थोड़ा सा मेरा साथ छोड़ देता है और कमजोर पड़ता जाता है. शायद एक दिन, मैं उससे मुक्त हो जाऊंगा. और तब... शायद तब मैं एक इंसान बन सकूँगा."

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

एकता

लघुकथा

दिनेशराय द्विवेदी

मदुरा नगर निगम के एयरकंडीशंड बैठक कक्ष की शीतलता और बाहर की चिपचिपी गर्मी के बीच, पंखे की आवाज़ के सिवा कोई आवाज़ नहीं थी. आयुक्त श्रीवास्तव ने निविदा के कागजात पर नज़र दौड़ाई. "मिलाप तेवटिया, तुम्हारी दर राज्य की न्यूनतम मजदूरी दर से भी पाँच प्रतिशत कम है. यह कैसे?"

मिलाप तेवटिया, जिसकी आँखों में तीस साल के अनुभव की चालाकी थी, मुस्कुराया. "सर, मैनेजमेंट है. हम स्मार्ट तरीके से काम करेंगे."

मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. चौधरी ने चश्मा सहलाते हुए कहा, "यह धार्मिक नगर है, तेवटिया. तीर्थयात्री देश-विदेश से आते हैं. सफाई पर कोई समझौता नहीं."

"डॉक्टर साहब," तेवटिया आगे झुका, "आप लोग बस अपना कमीशन समय पर पहुँचने की चिंता करें. बाकी मैं संभाल लूँगा. पर व्यापार में दिल नहीं, दिमाग चलता है, सर!"


आयुक्त और डॉक्टर की नज़रें मिलीं. साल भर के लिए नगर की सफाई का ठेका मिलाप तेवटिया को मिल गया.

अगले सोमवार सुबह, मधुवन रोड के कूड़ा संग्रहण केंद्र पर पचास मजदूर इकट्ठे थे. तेवटिया ने ऊँची आवाज़ में कहा, " वेतन मिलेगा, रोज दो सौ, जो काम बताया जाए उसे करना होगा, चाहे चार घंटे में करो या छह घंटे में या आठ घंटे में. जो माने ठीक, जो नहीं माने, आज ही जाए."

रामलाल, जिसकी बेटी बुखार से तप रही थी, आगे बढ़ा. "साहब, आधे दिन की मजदूरी में..."

"तुझे पता है बाहर कितने लोग बेरोजगार हैं?" तेवटिया ने उसे घूरकर देखा. रामलाल पीछे हट गया. दो सौ रुपये में दवाई तो मिल जाएगी.

दो महीने बाद, मदुरा की गलियों में यत्र-तत्र कूड़े के ढेर दिखने लगे. आराम घाट पर बदबू, मंदिर के सामने उड़ता प्लास्टिक. शिकायतें पार्षद शर्मा तक पहुँचीं.

"तेवटिया, मेरे वार्ड में शिकायतें हैं."

"चिंता मत कीजिए, साहब." तेवटिया ने लिफाफा आगे बढ़ाया. "यह इस महीने का. और आपके भतीजे की नौकरी लग गई है."

शर्मा ने लिफाफा ड्रॉयर में रख लिया. "पर सफाई का ध्यान रखना. चुनाव दूर नहीं."

रामलाल और साथियों की हालत खराब हो रही थी. एक दिन, जब तेवटिया ने डाँटा, तो रामलाल ने हिम्मत करके कहा, "साहब, पूरा काम करेंगे, पर पूरी मजदूरी चाहिए."

"कल से तेरी जरूरत नहीं." तेवटिया बोला.

उस शाम, बीस मजदूर नगर निगम के सामने धरने पर बैठ गए. मोहन ने रामलाल से कहा, "मेरे बाप का ऑपरेशन टल गया इस कम मजदूरी में."

"मेरी बेटी की दवाई..." रामलाल ने जवाब दिया.

स्थानीय अखबार ने खबर छापी: "पवित्र नगर में अशुद्ध व्यवहार."

मोहन ने सुझाव दिया, "चलो स्थायी कर्मचारियों की यूनियन से मिलते हैं."

नगर निगम कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह ने उनकी बात सुनकर कहा, "तुम ठेकेदार के गुलाम बन गए हो. हमें एक साथ लड़ना होगा."

जब तेवटिया ने माँगें नहीं मानीं, तो सभी ने हड़ताल कर दी.

तीन दिन में मदुरा की स्थिति भयावह हो गई. जैसे पवित्र नगर ने अपनी पवित्रता उतार फेंकी हो.

नागरिक समूहों की आपात बैठक में समाजसेवी डॉ. मेहता, जो पहले भी श्रमिक हकों के लिए लड़ चुके थे, बोले, "यह मजदूरों के शोषण और नागरिकों से लगातार किए जा रहे छल की समस्या है. वे मजदूरों के शोषण के साथ साथ हम नागरिकों से जुटाए गए कोष का भी दुरुपयोग कर रहे हैं. हमें एकजुट होना होगा."

नगर निगम बोर्ड की आपात बैठक में, जब महापौर ने तेवटिया का ठेका रद्द करने का प्रस्ताव रखा, तो पार्षद शर्मा भड़क गए.

तभी सुरेंद्र सिंह ने कक्ष में प्रवेश किया, हाथ में दस्तावेज.

"महोदय, यह रजिस्टर है जिसमें कमीशन का हिसाब है: आयुक्त साहब को पचास हज़ार, डॉ. चौधरी को तीस हज़ार, पार्षदों को दस-दस हज़ार."

कमरा सन्नाटे में डूब गया.

अगले दिन, कलेक्ट्रेट के सामने पांच हज़ार नागरिक और सभी मजदूर इकट्ठे हुए. रामलाल ने माइक पकड़ा.

"हम मदुरा को स्वच्छ रखना चाहते हैं. पर हमें इंसान की तरह जीने का अधिकार चाहिए."

डॉ. मेहता बोले, "यह संघर्ष हर मदुरावासी का है."

समाचार राजधानी तक पहुँचा. मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश आया: नगर निगम बोर्ड भंग, तेवटिया का ठेका रद्द, आयुक्त और स्वास्थ्य अधिकारी निलंबित, नई निविदा प्रक्रिया शुरु होगी तब तक मजदूरों को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन पर नगर निगम काम कराएगा.

मजदूरों ने विजय जलूस निकाला. जलूस के बाद सुरेंद्र सिंह ने मजदूरों से बात की, "साथियों, आज हमने एक लड़ाई जीती है. पर असली लड़ाई अब शुरू होगी. नया ठेकेदार आएगा, वह भी शोषण से नहीं चूकेगा."

रामलाल ने पूछा, "तो फिर हमने क्या जीता?"

"हमने एकता सीखी," सुरेंद्र ने कहा. "और याद रहे, जब मजदूर और नागरिक एक साथ खड़े हों, तो एकता से ज्यादा मजबूत कुछ नहीं होता. यह एकता... यही इस संघर्ष की असली कमाई है."

रामलाल ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसकी बेटी अब ठीक थी - न सिर्फ बुखार से, बल्कि उस डर से भी जो तेवटिया की आवाज़ में था. और आज, उसे लगा कि नगर की स्वच्छता का रास्ता न केवल गलियों की सफाई से, बल्कि इस एकता से भी गुज़रता है.

रविवार, 28 दिसंबर 2025

घिरनियाँ

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

तीन साल की कोचिंग, दो बार ड्रॉप, और अंततः आईआईटी दिल्ली का ऐतिहासिक गेट. कौशिक के कदम भारी थे – न सिर्फ बैग के बोझ से, बल्कि उस अदृश्य उम्मीद से भी जो पूरे मोहल्ले, स्कूल और कोचिंग के दोस्तों ने उस पर लाद दी थी. उम्र बीस साल, मन पचास साल का अनुभवी, और डर सत्रह साल के नए बैचमेट जैसा. उसका रूममेट राजीव अभी सत्रह का ही था – गाँव से आया हुआ, चेहरे पर एक निश्चल उत्सुकता, जैसे किसी नई दुनिया को टटोल रहा हो.

पहली मैकेनिकल लैब. प्रोफेसर ने एक सरल गियर सिस्टम टेबल पर रखा. और नए छात्रों से पूछा, “बताओ, यह कैसे काम करता है?”

कौशिक की नज़रें तुरंत ब्लैकबोर्ड पर टिक गईं. उसके दिमाग में फ़ॉर्मूले की लाइनें दौड़ने लगीं – वेलोसिटी रेशियो, टॉर्क ट्रांसमिशन, मेकेनिकल एडवांटेज… सब कुछ याद था, सब याद था. उसने सूत्र लिखने के लिए कलम उठाई.

तभी राजीव ने आगे बढ़कर गियर के एक पहिये को हल्के से छुआ. फिर घूम कर मुस्कराया. “सर, यह तो हमारे गाँव के कुएँ की घिरनी जैसा है. वहाँ कुएँ की जगत पर एक बड़ी घिरनी होती है जो कुएँ की ओर झुकी होती है, जिस पर रस्सी चलती है. जब हम रस्सी के एक सिरे को खींचते हैं, तो दूसरे सिरे पर बँधी बाल्टी, ऊपर आती है. यह गियर भी वैसा ही है – एक पहिया घूमता है, तो दूसरा उसकी गति और दिशा के हिसाब से चलता है. बस यहाँ लकड़ी की घिरनी की जगह धातु के पहिये पर दाँत हैं, जो दूसरे दाँत वाले पहिए को गति देते हैं.”

प्रोफेसर की आँखों में एक चमक आ गई. “ठीक कहा, राजीव. तुमने सिद्धांत को छूकर भौतिक रूप से महसूस किया. तुम्हारे लिए सिद्धांत केवल विचार नहीं रहा, बल्कि वह भौतिक यथार्थ से निकला. सारे विचार ऐसे ही भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं.”

कौशिक अवाक रह गया. उसने सोचा था कि उसके पास तीन साल का अतिरिक्त ज्ञान है, पर राजीव के पास तो सत्रह साल का वास्तविक जीवन का अनुभव था – वास्तविक दुनिया का अनुभव, जहाँ सिद्धांत सिर्फ किताबों में नहीं होते, खेतों, कुओं और घिरनियों से जन्म लेते हैं.

शाम को कमरे में, कौशिक ने पूछा, “तुमने इतनी स्पष्ट तुलना कैसे की? क्या तुमने कोई खास किताब पढ़ी है?”

राजीव ने अपना साधारण सा सूटकेस खोला. उसमें कोई किताब नहीं थी, बस कुछ पुराने टूल्स थे – एक छोटा सा स्क्रूड्राइवर, दो-तीन तरह के प्लायर्स, और एक लोहे का छल्ला. “मेरे पिता कारीगर हैं, सर. मैं बचपन से मशीनों के बीच बड़ा हुआ हूँ. मैंने पढ़ा ही नहीं, पर खुद देखा है. और जो देखा, उस पर विश्वास किया.”

वह सोचने लगा, जब भी खाली समय में वह घर के बाहर जाना चाहता तभी उसके मम्मी-पापा उससे कहते –फालतू समय मत व्यर्थ करो. तुम्हें आईआईटियन बनना है. समय व्यर्थ करने के बजाय किताबों में मन लगाओ. तुम्हारा अध्ययन ही तुम्हें वैसा बना सकता है. अब उसकी समझ में आया कि मम्मी-पापा पूरी तरह सही नहीं थे. अध्ययन केवल किताबों और सिद्धान्तों में नहीं होता बल्कि वह व्यवहारिक दुनिया से प्रत्यक्ष होता है.

अगले दिन, कौशिक अकेला लैब में लौटा. उसने प्रोफेसर से वही गियर सिस्टम माँगा. इस बार उसने कॉपी-पेन नहीं उठाया. उसने धीरे से गियर के दाँतों को अपनी उँगलियों से छुआ. एक पहिये को घुमाया, दूसरा अपने आप चल पड़ा.

उसकी आँखों के सामने कोचिंग के वो बोर्ड नहीं, बल्कि राजीव के गाँव का कुआँ घूम गया – रस्सी, घिरनी, पानी की बाल्टी, और एक साधारण सिद्धांत जो पीढ़ियों से चला आ रहा था.

प्रोफेसर ने पूछा, “क्या तुम्हें अब समझ आया?”

कौशिक ने सिर उठाया. “नहीं सर… अभी महसूस किया है.”

...और उस पल कौशिक ने जाना कि शिक्षा सिर्फ परीक्षा पास करने का रास्ता नहीं है – यह उस रास्ते पर चलने का साहस है जहाँ किताबें और प्रत्यक्ष ज्ञान साथ जलते हैं. और सच्ची समझ की शुरुआत होती है. उसने पहली बार महसूस किया कि ज्ञान की सब से बड़ी घिरनी – विचार और अनुभव का संगम – अब घूम चुकी थी.