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सोमवार, 22 दिसंबर 2025

दीवार

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
गाँव के चौक में बड़ी हलचल थी. गाँव की बहू, सत्या, ने राज्य स्तर पर अवॉर्ड जीता था. पंचायत भवन में उसके सम्मान में एक समारोह रखा गया था. लोग इकट्ठा हुए थे, ढोल-नगाड़े बज रहे थे.

सत्या मंच पर पहुँची. सिर पर घूंघट था. साथ में उसकी ननद राधा भी थी.
 
सत्या को घूंघट में देख कर भीड़ में खुसर-फुसर होने लगी. तभी एक नौजवान ने जोर से कह दिया ...
“देखो, इतनी पढ़-लिख कर भी घूंघट में आई है!”

“चुप्प¡ तुम्हें तमीज भी नहीं, भरी सभा में चिल्ला रहे हो. यही तो असली संस्कार है. बड़े पद पर है, अवार्ड जीता है, फिर भी घमंड नहीं. अपनी परंपरा को कैसे अच्छे से निबाह रही है.” पास ही बैठे बुजुर्ग ने नौजवान को डाँट पिलाई. कुछ लोग ताली बजाने लगे तो कुछ हँस पड़े.

तभी पास खड़ी सत्या की ननद राधा, जो कॉलेज में पढ़ रही थी, आगे बढ़ कर माइक पर आ गयी और सहज स्वर में बोली...
“इसे मेरी गुस्ताखी कहें कि मैं बिना बुलाए भाभी के साथ मंच पर आई और यहाँ अपनी बात कह रही हूं. आप खुद देखें यह संस्कार है? या बाध्यता? अगर सच में हमारी शिक्षा ने आज़ादी दी होती, तो सत्या भाभी को घूंघट की ज़रूरत ही न पड़ती. कोई स्त्री घूंघट में नहीं रहना चाहती. आप लोग समझ ही नहीं सकते कि यह घूंघट एक स्त्री को कैसी कैसी तकलीफें देता है.”

उसकी बात सुनकर बुज़ुर्गों में खुसर-फुसर शुरू हो गई. एक बुजुर्ग ने जोर से कहा...
“लड़कियाँ अब बहुत बोलने लगी हैं. “ये सब पढ़ाई का असर है. अंग्रेजी पढ़ाई बदतमीजी सिखाती है.”

अचानक मंच पर खड़ी सत्या ने अपनी ननद राधा को एक ओर किया और माइक पर खुद बोलने लगी. उसका स्वर धीमा था, लेकिन शब्दों में आग थी...
“आप कहते हैं कि घूंघट संस्कार है. लेकिन जब कोई पुरुष किसी स्त्री का घूंघट उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक स्थान पर हटाने की कोशिश करता है, तब वह किस तरह का संस्कार है?
आप कहते हैं कि हम पढ़-लिख कर भी आगे नहीं बढ़ पाए. लेकिन सच यह है कि शिक्षा का दरवाज़ा ही आधा खुला रखा गया है.
और जब हम बड़े पद पर पहुँचते हैं, तब भी आप हमें घूंघट में देखना चाहते हैं, ताकि आपके गर्व का झूठा आईना चमकता रहे.”

सभा में सन्नाटा छा गया. किसी नौजवान ने सन्नाटे को चीर कर जोर से कहा हिप हिप हुर्रे. कुछ लड़के लड़कियों ने उसके जवाब में फिर से हिप हिप हुर्रे को दोहराया.

तभी, सत्या ने आहिस्ता से घूंघट हटाया. उसकी आँखों में डर नहीं था, बल्कि दृढ़ता थी. वह फिर बोलने लगी...
“बदलाव की शुरुआत पुरुषों से होनी चाहिए. जब आप हमें सहजता और सम्मान देंगे, तब हम बिना डर के चल पाएंगी. और अगर आप ऐसा नहीं कर सकते, तो कम से कम हमसे सवाल करने का अधिकार मत छीनिए.”

भीड़ में खामोशी थी. कुछ चेहरों पर शर्म थी, कुछ पर सोच.

राधा ने ताली बजाई. धीरे-धीरे और लोग भी ताली बजाने लगे. भीड़ में उपस्थित अनेक स्त्रियों ने जो घूंघट किए हुए थीं, अपना-अपना घूंघट हटाना शुरू किया. एक- एक कर पर्दों में कैद सभी चेहरे आजाद हो गए

गाँव में घूंघट की दीवार टूट चुकी थी.

ट्रेन में बहस

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
यह कोई 45-47 साल पहले का वाक़या है। मुझे अपने नगर से कोटा आना था. जनरल क्लास का कोच खचाखच भरा था, खिड़की के पास बैठा यात्री मेरा परिचित था वह उतरने वाला था. उसने मेरा बैग ले कर अपनी जगह रख दिया. मैं जैसे तैसे उस जगह जा कर बैठा. एक सफेद झक्क कुर्ता पायजामा पहने गोल टोपी लगाए गोरे सज्जन ठीक मेरे सामने वाली सीट पर खिड़की से दूसरे स्थान पर बैठे थे. अपने लिबास से वे सबसे अलग ही दिखाई दे रहे थे.
मैंने उन सफेदपोश सज्जन से पूछ लिया, “ जनाब कहाँ से तशरीफ ला रहे हैं?”

“यहीं से बैठा हूँ.”

"जनाब, सफ़र कहाँ तक है?"

“फिलहाल तो ट्रेन कोटा तक ही है, वैसे लखनऊ जाना है? उन्होंने बताया. आगे बातचीत से पता लगा वे मुफ्ती हैं. उन दिनों मोबाइल तो हुआ नहीं करते थे. ट्रेन में आसपास के यात्रियों से बातचीत या कोई किताब हो तो उसे पढ़ते जाना ही यात्रा का वक्त बिताने के तरीके हुआ करते थे. मैंने इसीलिए मुफ्ती साहब को छेड़ा...

“मुफ्ती साहब आप तो धार्मिक इंसान हैं, और आपने मजहबी तालीम भी हासिल की है. मेरे जेहन में बार-बार यह सवाल उठता है कि क्या कोई ईश्वर है?”

"बिलकुल है. जो कुछ भी इस कायनात में है, उसका बनाने वाला ख़ुदा ही है."

सुन कर मैं मुस्कराने से खुद को रोक नहीं सका. मैंने बात आगे बढ़ाई...

“लेकिन जनाब, कायनात मतलब पूरा यूनिवर्स है. अभी तक तो हमें यह भी नहीं पता कि यह कायनात कितनी विशाल है. अरबों खरबों तारे, उनके गिर्द चक्कर काटते ग्रह, उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, पुच्छल तारे वगैरा-वगैरा. अरबों खरबों तारों बनी अरबों खरबों गैलेक्सियाँ. यह यूनिवर्स तो बहुत विशाल है. अभी तक जितनी इंसान जितनी क्षमता की दूरबीनें बना सका है उनसे यूनिवर्स का केवल हमारी धरती के गिर्द वाला हिस्सा ही हम ऑब्जर्व कर पाते हैं. उसके अलावा उसका कितना हिस्सा शेष है, उसका विस्तार कहाँ तक है, हम नहीं जान पाए हैं. हम जितना ऑब्ज़र्व कर सकते हैं, उतना ही देख पाते हैं. तो इतना बड़ा यूनिवर्स किसी ख़ुदा ने बनाया है.”

“यक़ीनन उसी ने बनाया है. आखिर हम देखते हैं कि बिना बनाए कुछ नहीं बनता है, तो जो बना बनाया है उसे ख़ुदा ने ही बनाया है. उन तमाम चीजों का होना ही तो ख़ुदा के होने का सबूत है.” मुफ्ती साहब बोले. अब वे मंद-मंद मुस्करा रहे थे.


“यानी ख़ुदा का होना यक़ीनन है?”

“जी बिलकुल यक़ीनन है.” मुफ्ती साहब ने फिर से ख़ुदा के होने की ताईद की.

“ग़र ख़ुदा है तो फिर उसको बनाने वाला भी होना चाहिए?” मैंने अपना नया सवाल दागा.

“देखिए ख़ुदा ऑब्जर्वेबल नहीं है, इसलिए हम कहते हैं कि वह खुद-ब-खुद है. वह खुद-ब-खुद है इसीलिए ख़ुदा है.”

“यानी पहले हम यह मानें कि इस यूनिवर्स को बनाने वाला कोई है, फिर यह मानें कि वह अनऑब्जर्वेबल है. इसके बाद यह मानें कि वह खुद-ब-खुद बना है. बड़ा झंझट है. हमें तीन-तीन चीजें मानें तब ख़ुदा सिद्ध हो. आपका ये ख़ुदा तो तीन-तीन बातों पर डिपेंडेबल है. इससे बेहतर तो यह है कि हम इस यूनिवर्स को ही ख़ुदा मान लें. कम से कम वह ऑब्जर्वेबल तो है और सिर्फ एक बात मानने पर डेपेंडेबल है कि आखिर कोई चीज तो है जो खुद-ब-खुद है.”

मेरा तर्क सुन कर मुफ्ती साहब की भौंहें चढ़ गईं. कहने लगे...
“यह यूनिवर्स ख़ुदा कैसे हो सकता है? यह तो ऑब्जर्वेबल है.”

“फिर तो ख़ुदा को मानने वालों और न मानने वालों में यही फर्क रहा कि ख़ुदा मानने वालों को तीन चीजें माननी पड़ेंगी. जब कि न मानने वालों को एक ही चीज माननी पड़ेगी.” यात्री अब तक मुस्करा रहे थे अब उनमें से किसी की हँसी भी फूट पड़ी और मुफ्ती साहब की भौंहें और चढ़ गयीं. मैंने अपना कहना जारी रखा...

“तो फिर बेहतर तो वह हुआ न जो एक ही चीज को मान लेता है.” इससे ख़ुदा का होना भी उसने मान लिया. बस वह मानता है कि यह यूनिवर्स ही ख़ुदा है. कोई ईश्वर, अल्लाह, गॉड वगैरा नहीं जो अक्सर ख़ुदाई किताबों में होना बताया जाता है.”

“नहीं जनाब, यह फेयर प्ले नहीं है. हमने जब बात शुरू की तो पहले ही कह दिया था कि जो ऑब्जर्वेबल नहीं है वह ख़ुदा है. चूंकि यूनिवर्स पूरा नहीं थोड़ा ही सही पर ऑब्जर्वेबल है, इसलिए ख़ुदा नहीं हो सकता.” मुफ्ती साहब ने अपनी आपत्ति पेश की.

“यह बात तो आपने कही थी, हमने मानी थोड़े ही थी. ये तो वही हुआ कि खुद ही नियम तय कर लें और खुद ही जीत की घोषणा कर दें. यह तो कोई बात नहीं हुई. मतलब तर्क का खात्मा और आस्था की शुरूआत.”

तब तक अगला स्टेशन आ चुका था. कोच में उतरने चढ़ने वालों में हलचल मच चुकी थी. वह बहस वहीं खत्म हो गयी. ट्रेन दुबारा चली तो बातचीत के दूसरे मुद्दे उठ गए.

रविवार, 21 दिसंबर 2025

तमगे की चमक

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

शहर की सड़कों पर सफ़ाई का शोर अखबारों के जरीए देश ही नहीं समूची दुनिया तक पहुँच चुका था। स्वच्छता सर्वेक्षण में वह देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया था। शहर के हर चौक पर होर्डिंग चमक रहे थे -
“स्वच्छता में अव्वल! हमारा शहर, हमारा गर्व।”

होटल से कैफ़े की ओर पैदल जा रही दो विदेशी महिला क्रिकेटर भी उस चमक को देख मुस्कुरा रही थीं।

“देखो, कितना साफ़ है यहाँ,” पहली ने कहा।

दूसरी ने सिर हिलाया, “हाँ, जैसे किसी किताब का पन्ना।”

तभी अचानक एक बाइक सवार युवक पास से गुज़रा। उसकी हरकत ने उनकी मुस्कान को भय में बदल दिया। पहली खिलाड़ी का चेहरा पीला पड़ गया। उसे लग रहा था जैसे उसकी समूची देह उस स्पर्श और दबाव से गंदगी में सन चुकी थी, ऐसी गंदगी जो शरीर से तो चली जाएगी लेकिन उसके मन से कभी नहीं। वह मन की दीवार पर हमेशा के लिए छप गयी थी। उसने अपने भीतर उठते डर को दबाने की कोशिश की, पर उसकी आँखों में असुरक्षा साफ़ झलक रही थी।

दूसरी ने तुरंत मोबाइल से एसओएस दबाया। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं, मानो यह काँपना सिर्फ़ डर का नहीं, बल्कि अपमान का भी था।

कुछ ही मिनटों में पुलिस की गाड़ी सायरन बजाती पहुँची। युवक गिरफ्तार हुआ।

खिलाड़ियों के मन में जो दरार पड़ चुकी थी, उसे कोई गिरफ्तारी भर नहीं भर सकती थी। कैफ़े के बाहर खड़े लोग सन्न रह गए।

एक बुज़ुर्ग ने धीमे स्वर में कहा, “सड़कें चाहे जितनी चमकदार हों, शहर भले ही देश का सबसे स्वच्छ शहर बन गया हो, लेकिन अगर मन गंदा है तो तमगे का क्या मतलब?”

अगले दिन अख़बारों में सुर्ख़ी थी, “स्वच्छता में अव्वल शहर का कारनामा!”

क्रिकेट बोर्ड के सचिव ने इसे “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया और सुरक्षा बढ़ाने का वादा किया।

लेकिन शहर के नागरिकों के मन में सवाल गूंजता रहा, “क्या असली स्वच्छता केवल कचरे के डिब्बे खाली करने से आती है, या फिर नागरिकता और आचरण की सफ़ाई से?”

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

‘निकाह मंजिल’

लघुकथा 
दिनेशराय द्विवेदी

‘निकाह मंजिल’ पुराने शहर के बीचों बीच खड़ी एक सदियों पुरानी इमारत थी, इसके सब ओर रास्ते गुजरते थे. पुरानी होने के बावजूद उसका रखरखाव ऐसा था कि अनेक आधुनिक इमारतें उसके सामने पुरानी लगतीं. इमारत बाहर से औरत-मर्द के बीच के करार का घर लगती थी, लेकिन उसकी भीतरी दीवारें काजियों के फतवों से सजी थीं.

शबनम संवेदनशील, अपनी जिन्दगी में बराबरी की तलाशती एक आधुनिक और आजाद औरत, एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी. आरिफ एक दूसरी मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर. वे एक मीटिंग में मिले. दोनों को दोनों की कंपनियों के साझा प्रोजेक्ट पर काम करना था. प्रोजेक्ट चार माह में पूरा हो गया. दोनों के बीच लगाव पनपा. शबनम को आरिफ एक प्रगतिशील नजरिये वाला प्रतीत हुआ, उसे लगा कि दोनों के रिश्ते में बराबरी रहेगी.

आखिर दोनों ने अपने परिवारों को भी सहमत किया. दोनों का निकाह तय हो गया. वकील शबनम के पास आरिफ का इजाब लाया और शबनम ने उस पर हाँ कर कर अपनी मुहर लगा दी, गवाहों ने कहा इजाब क़बूल हुआ, मेहर तय हो गया, शादी मुकम्मल हुई. क़ाजी ने निकाहनामा लिख कर उन दोनों के तथा मौजूद गवाहों के दस्तखत करवाए और अपने दस्तखत करने के बाद दोनों को एक-एक कापी दे कर कहा यह तुम दोनों के बीच शादी का करार है. शबनम ने मुस्कुराकर सोचा, "करार में बराबरी होती है." दोनों बहुत खुश थे, दोनों को अपना मनपसंद हमराह मिल गया था.

विवाह के पहले विचारों से प्रगतिशील लगने वाले आरिफ अपनी जिन्दगी में जरा भी नहीं उतार सका था. मर्द औरत की बराबरी की बात जरूर करता, लेकिन रिश्ते में आने के बाद से ही उसके व्यवहार ने शबनम को समझा दिया कि वह उस पर नियंत्रण चाहता है. पर अपनी चाहतों को हमेशा उसकी चाहतों पर तरजीह देता. दोनों के बीच बहस होती और आखिर शबनम को ही झुकना पड़ता. वह झुकना नहीं चाहती थी, पर उसे लगता कि दोनों के बीच का अमन टूट जाएगा, उसका सुकून छिन जाएगा. निकाह की पहली सालगिरह तक शबनम को इस रिश्ते में घुटन महसूस होने लगी.

दिन बीतते गए. निकाह मंजिल की दीवारें अब उसकी हर आवाज को आरिफ के रंग में रंग कर फतवे में बदल जाती. आखिर एक दिन शबनम ने आरिफ को कह दिया, “हमारी जिन्दगी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, घुटन महसूस होती है. हमें अलग हो जाना चाहिए.” आरिफ चुप्पी खींच गया.

एक रात जब शबनम गहरी नींद में थी, आरिफ ने कहा, “शबनम, यहाँ निकाह मंजिल में बड़ा दरवाजा है, इसे तलाक कहते हैं और उससे मैं बाहर जा सकता हूँ, मुझे किसी वजह की जरूरत नहीं. तुम्हें इससे बाहर निकलने की इजाजत नहीं.”

शबनम ने कहा, “अगर मैं बाहर जाना चाहूँ?”

आरिफ ने छोटे दरवाजे की और इशारा करते हुए कहा, “तुम उस खुला दरवाजे से, बाहर जा सकती हो लेकिन उसके लिए भी तुम्हें मेरी मंजूरी की जरूरत है. और अगर मेरी मंजूरी न हो तो तुम्हारे लिए यह दरवाजा फस्ख होगा, तुम्हें खास वजह बतानी होंगी और अदालत में उसे साबित भी करना होगा.”

“मैं तो जानती थी कि निकाह एक करार है जिसमें दोनों पक्ष बराबर होते हैं.” शबनम ने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी. तभी दीवारें बोलने लगीं. “निकाह कोई करार नहीं बल्कि फतवा है. यहाँ बराबरी की चाबी भी खाविंद के पास होती है, बीवी के पास नहीं.”

शबनम दीवार के पास गयी और उस पर लिख दिया, “करार तब तक करार नहीं होता जब तक कि उसमें दोनों पक्ष बराबर न होते हों, मैं लड़ूंगी और इस निकाह मंजिल से बाहर निकलूंगी.”

शबनम ने अगले दिन ही अदालत में खुला (फस्ख) के लिए दरख्वास्त पेश कर दी. उसने अदालत के सामने साबित किया कि उसके पास ‘निकाह मंजिल’ से बाहर जाने की वजहें हैं. अदालत ने उसकी दलीलों को मंजूर करते हुए “निकाह मंजिल” से बाहर जाने की इजाजत के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी. शबनम फिर से आजाद औरत थी।

"बेटियाँ"

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी 
गाँव का चौधरी अपनी बेटी को मार कर खेत के किनारे नाले में फेंक आया था.

लोगों ने कहा, “ठीक किया, बेटी बेजात के साथ भाग कर अपनी मर्जी से शादी करना चाहती थी.”

बेटी के इस अन्त से दुःख में डूबी हुई आंगन के एक कोने में राख से बर्तन माँजती चौधराहन ने दबे स्वर में चौधरी से कहा,

“कुछ भी हो मेरी बेटी हीरा थी. हमने उसे खो दिया. वह भाग कर शादी कर लेती तो उसे गाँव में न आने देते. पर यह सोच कर कि वह कहीं किसी के साथ खुश खुश अपना जीवन जी रही है, हम अपना जीवन गुजार लेते. अब तुम खुद बेटी के हत्यारे हो.”

चौधरी ने क्रोध से पत्नी की ओर देखा और फिर अपना सिर ऊँचा करके कहा, “अपनी ही इज्ज़त खोकर जिन्दा रहना भी कोई जीवन है. मैं तो जीते जी ही मर जाता. लोग मुझ पर और पूरे खानदान के लोगों पर उंगलियाँ उठा कर कहते कि, इस चौधरी को देखो¡ इसकी बेटी बेजात के साथ भाग गई और यह सिर ऊँचा कर के चल रहा है. इसे तो चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए था. मैंने अपनी ही नहीं पूरे खानदान की इज्जत बचा ली.”

“वैसे भी अब तुम हत्यारे कहलाओगे, तब तुम्हारी क्या इज्जत रह जाएगी? और पुलिस ने पकड़ लिया और सजा हो गयी तो जिन्दगी जेल में गुजरेगी.” इस बार चौधराहन की आवाज कुछ तल्ख और ऊंची थी.”

“जेल में गुजरेगी तो गुजर जाएगी. लोग नाम तो इज्जत से लेंगे. अब तू बड़बड़ाना छोड़ और चाय बना कर दे मुझे.” इतना कह कर चौधरी ने अपनी पगड़ी उतार कर आँगन में पड़े पलंग के कोने में रखी और लेट गया.

चौधराहन उठ कर रसोई की ओर चल दी.

उसी रात, गाँव के हैंडपम्प पर स्त्रियाँ फुसफुसा रही थीं,
“चौधरी की इज्ज़त बची या इंसानियत मर गई?”

“इज्ज़त तो चौधरी की बची, पर हमारी बेटियाँ तो अब और डर गईं.” एक स्त्री ने जवाब में कहा.

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

स्त्रियाँ देवियाँ नहीं

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
आशा अचानक अपने दो साल के बेटे को लेकर मायके पहुँची. उसे आए देख वहाँ सभी चौंके. जब उसने बताया कि कैसे क्या हुआ था तो मम्मी-पापा ने कहा, “यह गलत है, दामाद जी को ऐसा नहीं करना चाहिए था. तुमने ठीक किया, यहाँ चली आयी, अब सब कुछ खुद करना पड़ेगा तो अपने आप पता लग जाएगा.”
भाई ने कहा, “यहाँ क्यों आएंगे, वहीं चल कर बात करते हैं. उन्हीं के हाथ चलते हैं क्या? हमने कौन सी चूड़ियाँ पहन रखी हैं.”

हुआ यह था कि उस दिन दफ्तर से लौटते हुए नरेश अपने साथ एक अंग्रेजी की बोतल ले आया था, आते ही आशा से कहा था कि उसका दोस्त पवन आएगा, दो गिलास और तले हुए पापड़ बोतल के साथ बैठक में टी टेबल पर रख दे. वह फ्रेश हो कर बैठक में गया और आराम कुर्सी पर ऊंघने लगा. आशा ने उसकी हिदायत के अनुसार टी-टेबल सजा दी. वह शाम के भोजन की तैयारी के लिए रसोई में घुस गयी. कुछ देर बाद पवन आया तो आशा ने उसे बताया कि बैठक में आप का ही इन्तजार कर रहे हैं. पवन के बैठक में जाने के तुरन्त बाद कांच की वस्तु गिरने और टूटने की आवाज आयी तो सब्जी साफ करती हुई आशा वैसे ही बैठक की ओर तेजी आयी. वहाँ बोतल टूट कर गिरी पड़ी थी, अंग्रेजी फर्श पर फैल गयी थी, बोतल के काँच के टुकड़े बैठक में बिखर गए थे, नरेश और पवन दोनों स्तब्ध खड़े थे.

वह तुरन्त लौटी और झाडू लेकर वापस गयी फर्श साफ करने लगी. पवन से पूछा, "भाई साहब¡ कैसे गिर गयी बोतल?"

कुछ उत्तर मिलता उससे पहले उसके गाल पर चाँटा पड़ा, “तुम्हें टेबुल सजाने का तो शऊर नहीं है और कहती हो बोतल कैसे गिर गयी.”

आशा ने कुछ नहीं कहा, बस उसे रुलाई आ गयी। उसने स्वर भी नहीं निकाला चुपचाप रोने लगी. नरेश और पवन दोनों घर से बाहर चले गए. उसने शाम का भोजन तैयार किया, सास ससुर को खिलाया, नरेश के लिए रख दिया. वह जानती थी कि अब बाहर से पीकर आएंगे और उन्हें खाना चाहिएगा. नरेश आया और खुद भोजन लेकर खाया, फिर वहीं बैठक में सो गया. आशा रात भर कमरे में सुबकती रही उसने रात को ही अपने व बेटे के कपड़े और जरूरी सामान अपनी अटैची में जमा लिए. सुबह नरेश नाश्ता कर टिफिन ले कर दफ्तर के लिए निकला. आशा ने अपने सास ससुर को शाम की घटना बताई और उन्हें कहा कि वह बेटे के साथ मायके जा रही है, इन्हें जब अक्ल आ जाए, तब लेने आ जाएंगे.

एक सप्ताह में ही नरेश को पता लग गया कि आशा के शऊर कैसे हैं. वह तो केवल अपने दफ्तर जाता, घर के कामों में उसका योगदान बिलकुल नहीं था. यहाँ तक कि बाजार से घर जरूरत का सामान तक वही खरीदती. वह तो सब्जी तक ठीक से नहीं ला सकता था. माता-पिता और बेटे को भी वही संभालती, वह चार प्राणियों की देखरेख करती, कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था. खैर, उसे आशा का महत्व पता लग चुका था, इस हिसाब से वह देवी थी. उसने नवें दिन ही अपने ससुर को फोन कर दिया था कि वह आशा को लेने आ रहा है. कुछ देर बाद ही साले का फोन आ गया कि जीजाजी अकेले मत आना, किसी रिश्तेदार को या दोस्त को साथ लेकर आना.

नरेश रिश्तेदारों तक बात को नहीं पहुँचाना चाहता था. लेकिन वह पवन को साथ ले कर ससुराल पहुँचा. सास-ससुर प्रेम से बोले, कहने लगे रात रुकना पड़ेगा. कल सुबह आप आशा को ले जा सकते हैं, यदि वह जाना चाहे. साले ने आवभगत तो की लेकिन बात बिलकुल नहीं की.

शाम को ससुर के कुछ मित्र कुछ रिश्तेदार वहाँ पहुँचे उनके साथ स्त्रियाँ भी थीं. रिश्तेदारों को देख नरेश को बहुत संकोच हुआ, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता था. वह जानता था कि आशा के बिना उसका सारा संसार बिखर जाएगा. वह चुप रहा.

चाय नाश्ता पूरा हो जाने पर आशा को भी बैठक में बुला लिया. उसके आने पर एक रिश्तेदार जो सबसे अधिक बुजुर्ग था बोला, “नरेश जी आपने आशा के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, उसकी तो कोई गलती भी नहीं थी, फिर भी आपने उस पर हाथ छोड़ दिया. ऐसा कैसे चलेगा. हमें तो अपनी बिटिया की सुरक्षा ही खतरे में लगने लगी है.” 
उसके बाद ही तुरन्त दूसरा बोलने लगा. लेकिन नरेश चुप ही रहा.

आखिर में, बुजुर्ग ने नरेश से पूछा, “आप का क्या कहना है.”

अब तक नरेश भी अंदर तक भर चुका था, उसकी आँख से आँसू निकल पड़े, गला भर्रा गया. बोला, "मैं क्या कहूँ, आप सब के पैर पड़ कर माफी मांग सकता हूँ. मुझे आप माफ करें, न करें आपकी मर्जी. मैं तो दस दिनों में ही समझ गया हूँ कि मैं किसी काम का इंसान नहीं हूँ. मैंने आशा की सारी खूबियों को देख कर भी अनदेखा किया. मैं मूर्ख था. पर उसी ने मेरी आँखें खोल दी हैं. वह एक देवी है, मुझे उसकी पूजा करनी चाहिए थी, पर मैं नालायक इसे समझ ही नहीं सका. मैं तो आपकी और इस देवी की शरण में हूँ. यदि इस ने मेरा साथ नहीं दिया तो मेरे माता-पिता तो बिना देखरेख के ही मर जाएंगे. मेरा न जाने क्या होगा.” इतना कह कर वह सुबक पड़ा."

तभी आशा खड़ी हो गयी. बोली,"इस सब की जरूरत नहीं है. न मैं देवी हूँ, न कोई स्त्री देवी है. न ही हम किसी भी स्थिति में केवल स्त्री होने के नाते किसी भी रूप में दण्ड की अधिकारी हैं. जब मैं घर संभालती हूँ, खर्च बचाती हूँ, माता-पिता की सेवा करती हूँ, तो मुझे देवी कहा जाता है. पर जब गलती हो जाए या परिस्थिति बिगड़ जाए, तो वही लोग मुझे राक्षसी कहकर मारपीट करने लगते हैं. हमारे साथ यह दोहरा व्यवहार क्यों? हम स्त्रियाँ हैं, एक मनुष्य मात्र, यदि पुरुष समाज हमें भी खुद की तरह इंसान समझे और स्त्रियों के साथ समानता का व्यवहार करे. हम इसके सिवा कुछ नहीं चाहतीं।“

बैठक में सन्नाटा छा गया. नरेश की आँखें झुकी हुई थीं. वह काँपती आवाज़ में बोला, “आशा, मैं गलत हूँ, लेकिन यह समझ गया हूँ कि तुम मेरे घर की धुरी हो. मैं वादा करता हूँ कि अब तुम्हें देवी या राक्षसी नहीं, सिर्फ़ मनुष्य और साथी मानूँगा.”

बुजुर्ग ने सिर हिलाया, “आशा बिटिया, आज हमने भी यह सबक लिया है कि स्त्री को पूजा या दुत्कार की नहीं, मानवीय व्यवहार की ज़रूरत है. सम्मान ही उसका अधिकार है.”

घर में एकत्र स्त्रियों की आँखें चमक उठीं.

जैसे पहली बार किसी ने उनके मन की बात पंचायत में कह दी हो.

सेवाद का सफ़र

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी



रात गहराई हुई थी. तानाशाही की दीवारें ऊँची और ऊँची होती जाती थीं, पहरेदारों की आँखें चौकस थीं, अब तो बहुत से तकनीकी पहरेदार थे जो बिना दिखे चौकसी कर रहे थे. लोगों का हर कदम डर का रूप ले लेता. वे थके हुए थे, लेकिन रुकना किसी के लिए विकल्प नहीं था.

एक बुज़ुर्ग ने धीमी आवाज़ में कहा-

“रात जो गहराई है, तो सहर भी होगी.”

उसकी आवाज़ अंधकार में मशाल की तरह गूँज गई.



काफ़िला आगे बढ़ रहा था. रास्ता कठिन, लेकिन हर यात्री जान रहा था कि यह यात्रा केवल अपने लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए है.

यहीं पर अदृश्य साथी सेवाद प्रकट हुआ. वह किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं था, बल्कि सबके भीतर था, एक ताकत की तरह.

जब कोई बच्चे को गोद में उठाता, जब कोई बुज़ुर्ग का हाथ थामता, जब कोई अपने हिस्से का बोझ दूसरों के लिए छोड़ देता, वहीं सेवाद जीवित हो उठता.

शुरू में नौजवान पस्त दिख रहे थे. थकान उनके कंधों पर बोझ की तरह थी.

लेकिन जैसे ही बुज़ुर्ग की आवाज़ गूँजी और सेवाद की अदृश्य पुकार हर एक के भीतर से उठी-

“तुम्हारा हर कदम जनसेवा है. तुम्हारा हर त्याग जनतंत्र की ओर बढ़ता है. मत रुको.”

अचानक ऊर्जा भर आई. वे सजग होकर चलने लगे, गति भी बढ़ गई. उनकी आँखों में अब डर नहीं था, बल्कि जनतंत्र का सवेरा देखने की तमन्ना थी.



“काफ़िला निकल पड़ा है, जीत सर भी होगी!” एक नौजवान ने जवाब में पुकारा.

सेवाद ने उस पुकार को और ऊँचा कर दिया. उसकी अदृश्य उपस्थिति सब को याद दिलाने लगी, यह सफ़र केवल मंज़िल तक पहुँचने का नहीं, बल्कि तानाशाही की रात को तोड़ने का है.




वे चलते रहे, चलते रहे, फिर क्षितिज पर पहली किरण दिखाई दी, तो सबने देखा, “अंधकार सचमुच सिमट रहा था.

सवेरा केवल उजाले का नहीं था, बल्कि जनतंत्र का था.


नोट : "सेवाद" शब्द संस्कृत के "सेवा" से निकला है, और इसका प्रयोग हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में सामूहिक सेवा, त्याग और जनहित के भाव को व्यक्त करने के लिए किया जाता है.