@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

बुधवार, 21 जनवरी 2026

नये सवाल

पिंजरा और पंख-12

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

आयुष के आने की खबर ने घर में एक विचित्र हलचल पैदा कर दी. माँ ने शगुन से पूछा कि क्या वह कमरे को तैयार कर लेगी जिससे आयुष को कोई परेशानी न हो. शगुन ने माँ को आश्वस्त कर दिया. फिर भी आयुष के आने के दिन सुबह माँ ने हर एक चीज जाँची कि सब कुछ ठीक है या नहीं. हर रोज सुबह चाय पर चाचा अखबार पढ़ते हुए चाची को कहना नहीं भूलते कि, "अब सब संभल जाएगा. लड़की को मर्द की नज़र चाहिए." चाची बिना कोई प्रतिक्रिया दिए चुप ही रहती, लेकिन सजग बनी रहती.

एक शाम रसोई में चाची ने शगुन को अकेले पाकर कहा, "तू डरना मत... पर लड़ना भी मत. समझाना. हमें तो समझाने का मौका भी नहीं मिला." यह चाची की शगुन से पहली सीधी बात थी. शगुन ने देखा, उनकी आँखों में उम्मीद थी, जैसे वे अपनी ज़िंदगी की लड़ाई शगुन के माध्यम से लड़ रही हों.

शगुन ने फैसला किया, वह आयुष का स्वागत अपने तरीके से करेगी. उसने कमरे में आयुष के बिस्तर के पास की मेज पर दो चीज़ें रखीं; एक साइकिल की चाबी, और पुस्तकालय से लाई गई किताब "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप"; जो पारंपरिक मर्दानगी के मनोवैज्ञानिक ख़तरों पर थी.

सुबह चाचा स्टेशन गए. शगुन साइकिल लेकर बाज़ार गई, आयुष के लिए उसकी पसंद का समोसा लाने. यह उसकी शांत चुनौती थी, “मैं अकेले आ-जा सकती हूँ, और तुम्हारी पसंद का ख़्याल भी रख सकती हूँ.”

सुबह के साढ़े दस बजने को थे, टैक्सी के रुकने की आवाज आई. शगुन ने दरवाजा खोला. आयुष टैक्सी के बाहर कदम रख रहा था. वह कैजुअल्स में था, चेहरा एक दम सख्त, आँखों के नीचे गहरे घेरे उसकी थकान बता रहे थे. उसकी नज़र पहले शगुन पर पड़ी, फिर उसकी जेब से झाँक रही साइकिल की चाबी पर. चाचा ने आयुष का बैग टैक्सी से बाहर निकाला, टैक्सी वाले को भाड़ा दिया. आयुष ने चाचा से बैग लेने की जहमत नहीं उठाई, वह दरवाजे से घर के अंदर आया और सीधे लिविंग रूम में आ बैठा. शगुन भी उसके पीछे पास ही आ बैठी. उसके चेहरे पर न मुस्कान थी, न डर, बस एक स्थिरता थी.

“सफर कैसा रहा?” उसने आयुष से पूछा.

“सफर जैसा सफर, बस वहाँ से बैठे, यहाँ आकर उतर गये.” उसके स्वर में हलका अहंकार था.

"तू..." आयुष ने शुरू किया, आवाज़ में एक खिंचाव.

"सफ़र लंबा तो था ही," शगुन उठी और डाइनिंग पर रखे पैकेट को खोल कर समोसों से प्लेट सजाई और लाकर आयुष को देते हुए बोली, तेरा मनपसंद नाश्ता... लाई हूँ.

आयुष ने प्लेट हाथ में ली. अब उसकी नजरें समोसों पर थीं. लेकिन, सवाल शगुन से किया “तेरे को अकेले जाना जरूरी था?

"आते ही भाई का मनपसंद नाश्ता जरूरी क्यों नहीं था? और मैं अकेली नहीं थी, मेरी साइकिल साथ थी.” जवाब देते हुए शगुन अपनी जेब से साइकिल की चाबी निकाल कर दाएँ हाथ की तर्जनी में घुमाने लगी थी.

तभी चाचा आयुष का बैग कमरे में रख कर लिविंग में पहुँच गए.

“तो तू समोसे लेने चली गयी?” चाचा ने सोफे पर टिकते हुए शगुन से ऐसे कहा जैसे उसने कोई गलती कर दी हो.

“आपके लिए भी हैं.” शगुन तब तक दूसरी प्लेट में समोसे सजा चुकी थी. उसने दूसरी प्लेट चाचा के आगे बढ़ा दी. आयुष समोसा खाते हुए शगुन की ओर देखता रह गया उससे कुछ कहते नहीं बना.


नाश्ते के बाद आयुष कमरे में आया उसका बिस्तर कायदे से सजा हुआ था. वह अपने बिस्तर पर बैठा. उसके दायें ओर दोनों के बिस्तरों के बीच खिड़की के पास रखी मेज पर एक किताब रखी थी, "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप". आयुष ने उसे उठा लिया. किताब तहसील पुस्तकालय से लायी हुई थी. वह समझ गया कि शगुन की पुस्तकालय तक नियमित दौड़ है.

रात के भोजन पर चाचा शुरू हो गए, "अब भाई आ गया है, शगुन. तू भी समझदार हो जा. साइकिल से इधर उधर घूमना छोड़ घर के काम सीखने पर ध्यान दे.”

शगुन रोटी से कौर तोड़ते हुए मुस्कुराकर बोली, "मैं पढ़ाई में अव्वल हूँ, चाचा. और साइकिल से ही समय बचता है."

आयुष चुप था, पर उसकी नज़रें शगुन के हाथों पर थीं. जवाब देते हुए उसके हाथों में कोई कंपन नहीं था. माँ ने चाचा की प्याली में सब्ज़ी परोसते हुए कहा, "पहले खाना खा लो, बातें बाद में कर लेना."

चाची ने रसोई में रोटी बेलते हुए लिविंग में एक निगाह डाली, उनके चेहरे पर मुस्कान थी.


आयुष को रात में ठीक से नींद नहीं आई. वह उठकर बहार बरामदे में आया. शगुन की साइकिल वहाँ टिकी थी. उसके पहियों की रिमें और हैंडल चाँदनी में चमक रहे थे. उसने अनजाने में एक पहिए को हाथ से घुमा दिया.

"तू भी कुछ कहना चाहता है, पर डर रहा है न?" पीछे से चाची की आवाज़ आई. आयुष चौंका. चाची पानी पीने आई थीं. "शगुन डरपोक नहीं है, बेटा. वह सिर्फ़ इंसान है; जैसे तू है. और तेरा डर... वह तेरी ताकत नहीं, तेरी कैद है." इतना कहकर चाची चली गईं, पर उनके शब्द हवा में लटक गए.

आयुष कमरे में लौटा. शगुन गहरी नींद में थी. उसने टेबल लैंप का स्विच ऑन करके इस तरह रखा जिससे शगुन के बिस्तर पर रोशनी न जाए. वह मेज पर पड़ी किताब "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप" उठा कर देखने लगा. किताब में कवर के बाद ही एक कागज लगा था. जिस पर उसके लिए लिखा था;

"आयुष, इसे तुम भी पढ़ लेना. बस यह जान लो, मैंने इसे पढ़ चुकी हूँ. और अब मैं वह नहीं, जो तुम्हारे जाने के पहले थी.” – शगुन"

आयुष ने किताब बंद की. उसकी नज़र मेज के पार खिड़की पर गई. वहाँ शगुन ने एक छोटा सा पौधा रखा था, जिसके गमले पर एक कागज़ चिपका था: "इसे धूप और पानी दोनों चाहिए."

उसे अचानक एनसीसी कैंप की याद आई; वह कमजोर कैडेट जिसे धूप में खड़ा किया गया था. उसके हाथ काँप उठे थे. बाहर, रात का अंधेरा था. घर के भीतर, दो दिलों के बीच एक नए संघर्ष की तैयारी थी. वह सोच रहा था; शगुन बहुत आगे बढ़ गयी है. 
क्रमशः .....

सोमवार, 19 जनवरी 2026

लिफाफे में भूचाल

पिंजरा और पंख-11

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

आयुष की दिनचर्या सख्त यांत्रिक अनुशासन में बंध चुकी थी, बिना किसी गलती की गुंजाइश के. सुबह 5 बजे की व्हिशल बजने के पहले उठना और सही समय पर दौड़ व ड्रिल के लिए मैदान पर, लौटकर तैयार होना और समय पर सुबह की प्रेयर पर पहुँचना. उसके बाद क्लासें, ब्रेकफास्ट, फिर क्लासें, लंच और विश्राम, रेमेडियल क्लास, शाम को खेल का मैदान, शाम की प्रार्थना, डिनर, फिर होमवर्क व सेल्फ स्टडी, रात की नींद और सुबह फिर से 5 बजे की व्हिशल. उसे सोचने को भी समय नहीं था. पर हर रात उसे देर तक उसे नींद नहीं आती. आँखों के नीचे के गहरे घेरे इस गड़बड़ी को सार्वजनिक करने लगे थे. विजय कभी-कभी उसे गौर से देखता, पर कुछ नहीं कहता.

एक शाम, हॉस्टल के कॉमन रूम की मेज पर रखे डाक से आए लिफाफों में से एक की लिखावट को आयुष की निगाहों ने फौरन पहचाना, वह शगुन की थी. उसने लिफाफा उठाया, और चुपचाप अपने रूम में आ गया. किवाड़ बन्द कर उसने लिफाफा खोला और साँस रोक कर पत्र पढ़ने लगा.

पत्र के शब्द एक-एक करके उसकी आँखों के सामने से गुजरे; साइकिल, पुस्तकालय, लेखिका का व्याख्यान.

फिर वह पंक्ति आई, “यह चिंता नहीं, तुम्हारा प्यार था.”

आयुष ने देखा पत्र हिल रहा है. वह सोच में पड़ गया. आखिर उसके हाथ क्यों काँप रहे हैं? उसने अपनी रुकी हुई साँस को छोड़ा और दो तीन गहरी साँसें लीं. साँसे दुरुस्त होने पर पत्र फिर पढ़ने लगा.

आखिरी सवाल आया; “क्या यह अनुशासन तुम्हें भीतर से मजबूत बना रहा है?” पढ़ कर उसने पत्र को मेज पर पटक दिया. वह देर तक असमंजस में रहा. भीतर की मजबूती? फिर उसने अपने आप से कहा, वह मजबूत है बाहर से भी, और भीतर से भी. भीतर की मजबूती के बिना क्या बाहर की मजबूती आती है?

अब वह सोच रहा था कि इस पत्र का क्या करे? पहले मन किया कि वह पत्र को फाड़ कर डस्टबिन के हवाले कर दे. फिर विचार आया ... नहीं, यह भागना होगा. जवाब लिखना चाहिए, और शगुन को सब कुछ समझा देना चाहिए. पर कैसे? उसे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह लिखे क्या? आखिर विचार आया अभी कुछ मत करो. वह उठा और उसने पत्र को सूटकेस में सबसे नीचे दबा कर रख दिया. जैसे किसी राज को दफ्न कर दिया हो. उसने महसूस किया उसका गला सूख रहा है. उसने अपनी बोतल उठाई और एक साँस में उसे मुहँ के जरीए अपने पेट में उड़ेल लिया.

उस रात वह देर तक नहीं सो सका. उसने फिर वही सपना देखा; लेकिन इस बार साइकिल चला रही शगुन के पीछे वह दौड़ रहा था. साइकिल तेज थी, वह उसे पकड़ नहीं पा रहा था. वह थकने लगा. साइकिल के पहिए और तेज घूमने लगे. उसके कानों में एक आवाज गूंजी, “सीमाएँ मन में होती हैं...” उसकी नींद टूट गयी. वह हाँफ रहा था.

अगले दिन हॉस्टल के बरामदे में एक जूनियर छात्र तेजी से उसकी बगल से निकला, उसे हलका सा धक्का लगा, आयुष की किताबें गिर गयीं. आयुष उस छात्र की ओर देखने लगा. उसकी आँखों में गुस्सा नहीं आया. वह ठंडी निगाहों से उस छात्र को जाते देखता रहा. आगे जा कर बरामदे के साथ वह भी दाएँ मुड़ कर ओझल हो गया. सब सोच रहे थे; अब उस जूनियर लड़के की खैर नहीं. आयुष दौड़ेगा, लड़के को पकड़ेगा और फिर ... पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

सबकी अपेक्षा के विपरीत आयुष ने लड़के पर से अपनी निगाहें हटाईं. नीचे गिरी किताबों को देखा और झुककर उन्हें उठाने लगा. सब किताबें समेट, बिना एक शब्द मुहँ से निकाले वह आहिस्ता से अपने रूम की ओर बढ़ गया.

सब की निगाहें उस पर चिपकी हुई थी. विजय मुस्कुराए बिना नहीं रह सका. उसने अपने साथियों से कहा, “यह क्या हुआ यार? आज तो आयुष एक दम बदला-बदला लगा. बिलकुल एक इंसान की तरह.” आयुष के कानों तक भी यह आवाज पहुँची. एक पल को उसने मुड़ कर विजय की ओर देखा. लेकिन, बिना कोई जवाब दिए, वह आगे चल दिया. उसे लगा कि उसके कदम थोड़े भारी हो चले हैं.

अपने रूम में लौटकर आयुष ने शगुन का पत्र निकाला, फिर से पढ़ने लगा. पढ़ते हुए ही उसकी नजरें टेबल पर पड़ी कैंची से टकराईं. एक पल को उसके मन में आया; काट दो इसे, मिटा दो इन सवालों को. उसने कैंची उठाई... लेकिन फिर उसे वापस रख दिया. कैंची वहीं पड़ी रह गई. वह कुछ तय नहीं कर पा रहा था.

उसने तय किया; वह शगुन को जवाब नहीं लिखेगा.

पर उसने एक और फैसला किया; वह अगली छुट्टियों में घर जाएगा. छुट्टियाँ बिताने नहीं, बल्कि शगुन से मिलने, उसे समझाने? शायद वह उसे समझा पाए. पर उसके मन के एक कोने में एक डर छुपा था. वह शगुन से ज्यादा बात ही न कर पाया तो... शगुन ने ही खुद उसे समझा दिया तो ...

उस रात आयुष ने डायरी निकाली. एक खाली पन्ना तलाशा और उस पर लिखा;

"पत्र आया, शगुन के सवाल मिले.

अभी जवाब तलाशना है.

शगुन की साइकिल चल पड़ी है, वह रुक नहीं रही है.

उसके मन के पहिए भी उसी की तरह दौड़ रहे हैं.

वह साइकिल को पकड़ेगा.

नहीं पकड़ पाया तो ... ...

वह आगे नहीं लिख पाया. उसने वह पन्ना मरोड़ा और दोनों हथेलियों के बीच घुमा कर गेंद सी बना दी. फिर उसे डस्टबिन में डाल दिया.

उसने सोने की कोशिश की. नहीं सो सका. कहीं दूर थाने में घंटे बजने लगे, टन .. टन .. टन .. वह गिनने लगा, 12 के बाद घंटे बजना बन्द हो गया. आधी रात गुजर चुकी थी. उसकी आँखों में नींद कहीं नहीं थी. वह उठा. डस्टबिन से उसने गुड़ी मुड़ी हुए पत्र को निकाला. उसे सीधा किया. हाथों से प्रेस कर के उसकी सिलवटें हटाने की कोशिश की और फिर फोल्ड करके अपनी डायरी के बीच रखा. डायरी को अपने तकिए के नीचे दबा कर सोने की कोशिश करने लगा.

खिड़की के बाहर, आज चाँद फिर टूटा हुआ दिखाई दे रहा था, टुकड़ा-टुकड़ा बादलों के बीच से झाँकता हुआ.
... क्रमशः

रविवार, 18 जनवरी 2026

पहियों पर आज़ादी

पिंजरा और पंख-10

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

साइकिल सीख लेने से शगुन का दायरा बढ़ गया. अब वह स्कूल और बाज़ार के साथ शहर की उन सड़कों पर भी जा सकती थी जहाँ लड़कियाँ अकेली कम दिखती थीं. लेकिन वह यह भी जानती थी कि हर आज़ादी की कीमत चुकानी पड़ती है.

एक शाम चाय पर चाची ने माँ से कहा, “भाभी, शगुन को थोड़ा रोको... लोग क्या कहेंगे? वह इतनी दूर निकल जाती है.”

माँ ने हल्के से कहा, “पढ़ाई में तो अव्वल है, और अब तो खुद ही सब संभाल लेती है.”

पर चाचा ने अखबार नीचे रखते हुए स्पष्ट कह दिया, “अब बस भाभी, आप तो जानती हैं. लड़कियों के अकेले कहीं जाने के नतीजे क्या होते हैं. समय रहते संभल जाना चाहिए.”

शगुन मनोविज्ञान के अध्ययन से जानने लगी थी कि “सीमाएँ तोड़ने के लिए पहले धैर्य से सीमाओं को समझना जरूरी है.” उसने सोच लिया कि वह चाचा को विश्वास दिलाएगी कि साइकिल समय बचाती है, पढ़ाई के लिए अधिक समय मिलता है. पर पहले उसे साबित करना था कि यह आज़ादी सुरक्षित और सार्थक है.

वह तहसील पुस्तकालय में युवा लेखिका, नीरजा शर्मा, की वार्ता सुनने जाना चाहती थी. वहाँ पहले आटोरिक्शा से जा चुकी थी. इस बार उसने साइकिल से वहाँ जाना तय किया. वार्ता समकालीन स्त्री समस्याओं पर थी, ”स्त्रियों की आवाज, स्त्रियों की सड़कें.” शगुन वार्ता के दिन बिना किसी को बताए पुस्तकालय गई. रास्ते में उसे सुनने को भी मिला, “देखो, अकेली लड़की साइकिल पर!” शगुन ने उसे अनसुना कर दिया. तब उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. उसने तेजी से पैडल चलाए, जैसे उसका डर उसे आगे धकेल रहा हो.

वार्ता में का सार था कि, ”स्त्रियाँ अक्सर समाज से पहले अपनी सीमाएँ खुद बना लेती हैं. हम स्त्रियाँ सोचने लगती हैं कि यह रास्ता हमारे लिए नहीं है, पर सच यह नहीं. सही में हम कदम उठाने से डरती हैं. यह पहला कदम ही सबसे कठिन होता है. बाद का रास्ता खुद-ब-खुद बनता चला जाता है.”

शगुन ने सोचा, ”क्या मैं भी अपनी सीमाएँ खुद बना रही हूँ? यदि ऐसा है भी तो मैंने आज यहाँ आकर एक सीमा तोड़ी है.

वह घर लौटी, तब सूरज ढल चुका था. चाचा दरवाज़े पर ही थे. शगुन को देख उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया. “तू कहाँ गई थी? किसके साथ गयी थी? आयुष ने सही ही कहा था कि तुझे रोकना चाहिए.” वे ऊँची आवाज में बोले.

सुन कर वह बिलकुल नहीं घबराई, वह जानती थी कि किसी न किसी दिन उसे ऐसे सवालों का सामना करना पड़ेगा. शगुन ने पहली बार स्पष्ट और धीमे स्वर में कहा, “ चाचाजी, भाई यहाँ नहीं है, और मैंने कोई गलत काम नहीं किया. मैं पुस्तकालय गई थी.

“चाची और माँ चुप रहीं. माँ की आँखों में चिंता दिखी, पर उन्होंने संयम रखा और अपने होंठ बन्द रखे.

रात में, जब सब सो चुके तब मम्मा शगुन के कमरे में आई. “तेरी हिम्मत अच्छी है... पर चाचा का डर भी ठीक है. बदनामी होते देर नहीं लगती, बेटी.”

शगुन ने माँ की आँखों में देख कर गंभीरता से कहा, ”माँ, डर हमेशा रहेगा. पर डर के आगे जीना सीखना होगा. वरना जिंदगी सिर्फ चारदीवारी में सिमट जाएगी.” मम्मा ने और कुछ नहीं कहा, बस उसके सिर पर हाथ रखा. यह उनका अनकहा, स्नेहासिक्त मौन समर्थन था. यह शगुन की जीत थी, छोटी थी, मगर ठोस थी.

उस रात शगुन अपनी डायरी लिखने बैठी, पर मन न लगा. उसके मन में चाचा का वह वाक्य गूंज रहा था, “आयुष ने सही ही कहा था कि तुझे रोकना चाहिए.”

डायरी के स्थान पर वह आयुष को पत्र लिखने बैठ गयी. उसने लिखा,

प्रिय भाई, आयुष¡ तुम्हें बहुत प्यार.

तुमने एनसीसी कैम्प में “उत्कृष्ट कैडेट” का खिताब प्राप्त किया, तुम्हें बहुत बहुत मुबारक. 

मैंने भी हाल ही में एक “उपलब्धि” हासिल की है, साइकिल चलाना सीख लिया है. अब मैं स्कूल और बाज़ार साइकिल से जाती हूँ. कल मैं तहसील पुस्तकालय गई. वहाँ वार्ता में एक लेखिका ने कहा, ”सीमाएँ अक्सर हमारे मन में होती हैं, बाहर नहीं.”

तुम्हें याद है, तुमने कहा था, “हॉस्टल में लड़कियों के बारे में बात नहीं होती।” मैं यह बात तब नहीं समझी थी। अब समझ रही हूँ. शायद तुम भी एक ऐसी ही दुनिया में रहते हो, जहाँ कुछ बातें “नहीं” होतीं, कुछ भाव “नहीं” दिखाए जाते.

चाचा कहते हैं, “लड़कियाँ अकेले बाहर नहीं जानी चाहिए. तुमने भी शायद माँ से यही कहा था? मैं जानती हूँ, तुम चिंतित हो, यह चिंता नहीं तुम्हारा प्यार था. पर कभी तुमने सोचा, यह चिंता हमें सुरक्षित रखती है या छोटा बनाती है?

तुम्हारे कैंप में जो कठोर अनुशासन सिखाया जाता है, क्या वह तुम्हें अन्दर से भी मजबूत बना रहा है? या सिर्फ बाहर से? इस सवाल का कोई जवाब देने की ज़रूरत नहीं. बस इतना जान लो, मैं सुरक्षित हूँ, और थोड़ी आज़ाद भी. शायद एक दिन तुम भी अपने हॉस्टल की उन “न कही जाने वाली बातों” के बारे में कुछ बताओगे।
                                                                                                                              तुम्हारी बहन,

                                                                                                                                  शगुन

उसने पत्र लिख कर तह किया और लिफाफे में बंद करके गोंद से चिपका दिया. सुबह स्कूल जाते समय ही वह पोस्ट ऑफिस से टिकट ले कर चिपकाकर इसे डाक में छोड़ देगी.

इसके बाद उसने डायरी लिखी.

“आज मैंने साइकिल पर पहली बार इतनी दूर तय की. रास्ते में डर भी लगा, दिल तेजी से धड़कता रहा. पर आवाज़ नहीं दबी. पुस्तकालय में बैठकर लगा जैसे मैंने अपने लिए एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोल लिया है.

घर में लड़ाई हुई, पर मैं हारी नहीं. माँ ने चुपचाप मेरा साथ दिया, शायद यही “सूक्ष्म जीत” है. उनका हाथ मेरे सिर पर था, और उसमें एक आशीर्वाद था जो शब्दों से बड़ा था.

अब मैं जानती हूँ, पहिये सिर्फ साइकिल के नहीं, मन के भी होते हैं. और एक बार घूमने लगें, तो रुकते नहीं.

मैंने आयुष को भी पत्र लिखा है. शायद वह मेरी बात को समझ सके. हो सकता है वह न भी समझे. पर उसने जब मुझे रोके जाने की बात कही थी, तो मुझे उस तक अपनी बात भी जरूर पहुँचानी चाहिए थी. मैंने पहुँचा दी है.
 ... क्रमश:

शनिवार, 17 जनवरी 2026

अदृश्य दरारें

पिंजरा और पंख-9

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

एनसीसी कैंप से मिले "उत्कृष्ट कैडेट" के प्रमाणपत्र ने आयुष को गर्व से भर दिया. उसे अपने बैग में लिए जब उसने होस्टल में प्रवेश किया तो लग रहा था, जैसे वह अभी भी परेड ग्राउंड पर हो. उसकी चाल सीधी-सतर और मजबूत थी, कंधे सख्त और निगाहें तेज, जैसे अपने लक्ष्य को बेध देंगी. अपने रूम पर पहुँच कर उसने प्रमाणपत्र को दीवार पर इस तरह टांगा कि कमरे में आने वाले हर व्यक्ति की निगाह सबसे पहले उस पर पड़े. वह हर वक्त उसे याद दिलाता रहे कि उसके सभी फैसले सही थे. कैंप में मिले इस खिताब ने उसकी दुनिया को बदल दिया था.

राजन जैसे दोस्तों ने उसकी पीठ थपथपाई, "अब तुम असली मर्द हो, यार!" आयुष को लगा ये तारीफ़ें बेहतर महसूस कराती, लेकिन फिर उसके भीतर गूंजकर कहीं खो जाती. उसके भीतर कहीं एक खाली जगह थी, जहाँ पहले हँसी, डर और गुस्सा रहते थे. अब वे सब वहाँ नहीं थे, सिर्फ गूंज बची थी."

रात सोते के पहले जब वह उनींदा होता, उसे अक्सर एनसीसी कैंप का वह कमजोर कैडेट दिखाई देता जो धूप में खड़ा था, जिसका चेहरा पसीने से सराबोर था. फिर वह चेहरा बदलने लगता. वह कभी सिद्धार्थ, कभी शगुन और कभी-कभी खुद उसके चेहरे में बदल जाता. आयुष की नींद टूटती वह हाँफ रहा होता और उसका बिस्तर पसीने से भीगा होता. वह खुद से सवाल करता. फिर खुद ही जवाब देता,

"कच्ची नींद है, ऐसे में दिमाग पता नहीं क्या-क्या सोचने लगता है." वह फिर से सोने की कोशिश करता. पर देर तक नींद नहीं आती.

एक दिन राजन ने किसी पुरानी मजाकिया घटना का जिक्र कर रहा था. बात हँसने की थी आयुष को हँसी आयी भी. लेकिन उसके मुहँ से हँसी के स्थान पर खी-खी आवाज निकली, जैसे उसे खाँसी आयी हो.

"तेरी हँसी को क्या हो गया? वे ठहाके कहाँ चले गए यार?" राजन ने पूछा.

"हँसने से क्या मिलता है?" आयुष ने कठोर स्वर में कहा, "कुछ सार्थक होता है क्या?" राजन चुप रह गया.

आयुष ने जवाब तो दे दिया था पर खुद हैरान था. वह अकेले में आईने के सामने खड़ा हुआ और हँसने की कोशिश की. उसे आईने में एक विचित्र, बेजान और अजनबी चेहरा दिखाई दिया. वह उसका अपना प्रतिबिंब तो नहीं था. वह देख नहीं सका और उसने मुहँ फेर लिया.

एक दिन घर से माँ का फोन आया, उसके हाल पूछने के बाद उत्साह से बताने लगी. "शगुन ने साइकिल चलाना सीख लिया है. वह उसी से स्कूल जाती है, बाज़ार लो सामान ले आती है."

सुन कर आयुष को अच्छा नहीं लगा. उसने कहा, "माँ, उसका अकेले बाहर. यूँ डोलना ठीक नहीं. उसे रोको."

फोन की दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया. फिर माँ बोली, "ठीक है, बेटा."

फोन कटने पर आयुष मोबाइल को घूरते हुए सोचता रह गया. “शगुन के साइकिल सीख लेने की बात उसे अच्छी क्यों नहीं लगी?” फिर उस को लगा, उसकी यह सोच उसे कमजोर बना देगी, उसने खुद को डाँटा, “कमज़ोर मत बन. औरतें अकेले कभी सुरक्षित नहीं रह सकतीं, उन्हें संरक्षण चाहिए ही”; यही सही है.

फिर बोर्डिंग स्कूल में एक नया लड़का विजय किसी दूसरे बोर्डिंग से आया. वह एनसीसी कैंप में भी था. एक शाम वह आयुष के कमरे में आया. उससे बातचीत में कहने लगा.

"तुम्हें पता है, कैंप में तुमने जो किया, वह ताकत नहीं थी, तुम्हारा डर था. तुमने उसकी मदद नहीं की क्योंकि तुम्हें डर था कि अगर एक बार दया दिखाई, तो तुम्हारा 'मर्द' वाला मुखौटा उतर जाएगा... और तुम फिर वही पुराने वाले आयुष बन जाओगे जो रो सकता था."

सुनते ही आयुष का खून खौल उठा. वह विजय को धक्का देकर बोला, "बाहर निकल जा!"
विजय चला गया, पर उसका वाक्य कमरे में लटकता रह गया. वह वाक्य सारी रात आयुष के कानों में गूंजता रहा, "डर था... डर था..." उसने देखा, उसके हाथों में कंपन हो रहा था. वह सोचता रह गया. “क्या वह वास्तव में डर रहा था?”

तभी एक दिन आयुष सुबह की दौड़ में एक मिनट देरी से पहुँचा. सब उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगे. एक जूनियर कैडेट ने हिम्मत करके कहा, "सर, आप तो कभी देर नहीं करते?"

आयुष का दिमाग सन्न हो गया. फिर अचानक वह चिल्ला उठा,

"छोटी सी बात पर टोकना ज़रूरी है क्या? अपना काम करो!"

सब चुप रह गए, जैसे हवा जम गई. आयुष ने दौड़ना शुरू किया, वह तेज दौड़ा, और तेज... और तेज, जैसे वह नहीं, उसका गुस्सा दौड़ रहा हो. उस दिन वह रिकॉर्ड तोड़ दौड़ा. पर जब रुका, तो साँस फूल रही थी, दिल तेजी से धड़क रहा था और आँखों के आगे अँधेरा था. उसे पहली बार अपने शरीर की सीमा का एहसास हुआ, लेकिन मन की सीमा अभी दूर थी.

उस रात आयुष फिर आईने के सामने खड़ा था. उसने गौर से देखा, उसकी आँखों के नीचे गहरे घेरे थे, जबड़े की मांसपेशियाँ तनी हुईं थीं और होंठ सख्त.

उसने अपने प्रतिबिंब से पूछा, "तुम ठीक हो?"

प्रतिबिंब ने जवाब नहीं दिया.

"तुम मजबूत हो?"

फिर कोई जवाब नहीं.

आयुष ने थके स्वर में पूछा, "पर... क्यों? तुम जवाब क्यों नहीं देते?"

उसका प्रतिबिंब फिर भी चुप रहा.

आयुष ने अपना माथा शीशे पर टिका दिया. शीशा ठंडा था, वह ठंडक जैसे उसके सिर में घुसती जा रही थी. उसने अपना माथा शीशे से हटा लिया.

रात को जब उसने बिस्तर पर लेटा, उसे रूम की खिड़की से चाँद दिखाई दिया. लेकिन पूरा नहीं. वह टूटा हुआ था, आधा बादलों से आधा ढका हुआ?

उसने उधर से अपनी आँखें फेर लीं.

सुबह उसे सामने दीवार पर टंगा प्रमाणपत्र दिखाई दिया. उसे वह थोड़ा तिरछा लगा. आयुष ने सोचा वह उसे ठीक करेगा. लेकिन फिर मन न हुआ. कई दिन तक उसने उसे ठीक करने की जहमत नहीं उठाई?

आयुष के भीतर, अदृश्य दरारें फैलने लगी थीं, चुपचाप, निरंतर. वह उन्हें देखने को तैयार नहीं था. उसके बजाय, वह और ज़ोर से दौड़ने, और कठोर बनने की तैयारी कर रहा था.
 ... क्रमश: