शनिवार, 14 मार्च 2026
पटकथा
शुक्रवार, 13 मार्च 2026
नेह का धागा
गुरुवार, 12 मार्च 2026
रूपांतरण
पिंजरा और पंख-55
शगुन का नियुक्ति
पत्र देखने के बाद अनिल चाचा अवाक रह गए थे. उनकी पितृसत्ता वाली कंडीशनिंग को चोट लगी थी. वे एक-दो दिन मौन रहे, कुछ नॉर्मल
हुए तो उन्होंने शगुन और आयुष से बात करना शुरू किया. वे शगुन से बनस्थली के
बारे में और आयुष से आईआईटी गुवाहाटी के बारे में सवाल करने लगे. कई बार उनकी
प्रतिक्रिया होती, “अच्छा ऐसा भी है?” ... “मतलब हम तो कुएँ के मेंढक ही रह गए" ... हमने जाना ही नहीं कि दुनिया कितनी बड़ी और विविध है, ... कहाँ थी और कहाँ जा रही है?” ... “हम
तो सरकारी दफ्तरों में अपनी जान पहचान, कुछ व्यापारियों और कुछ नेताओं से रसूख को
ही दुनिया समझे बैठे थे. तुमसे पता लगा कि वास्तविक ज्ञान के सामने वह सब महत्वहीन
है.” इस बातचीत से चाचा की ग्रंथियाँ शनै-शनै खुलने लगीं. अब वे शगुन और आयुष से अभिभावक जैसा नहीं, बल्कि दोस्तों जैसा व्यवहार कर
रहे थे. देखते-देखते जून की बीस तारीख आ गई.
शगुन का सत्र 27 जून से आरंभ होना था. उस दिन उसे ‘टीचिंग असिस्टेंट’ के पद पर जॉइन भी
करना था. वह चाहती थी कि 25 को ही बनस्थली पहुँच जाए. जिससे वह अपने एडमिशन और
होस्टल आवंटन का काम पूरा कर सके. उसने पैकिंग शुरू कर दी थी. इस बार उसे नया
होस्टल मिलने वाला था और जरूरत का सारा सामान ले जाना था. दो दिन वह चाची के साथ
बाजार जाकर स्त्रियों के लिए जरूरी वस्त्र और दूसरे सामान खरीद लाई थी.
जाने के तीन दिन
पहले रात को डिनर के बाद, जब चाचा पान खाने के लिए बाज़ार
चले गए और गुप्ताजी ड्राइंग रूम में आकर बैठे, तभी शगुन उनके
पास आकर बैठी और बतियाने लगी. करीब आधे घंटे इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने कहा.
“पापा, आप दिल पर न
लें तो एक बात कहूँ?”
“बोल ना, कभी तेरी
बात को दिल पर लिया है मैंने?”
“सोचती हूँ कि मैं 25 जून को सुबह पाँच बजे वाली
जयपुर एक्सप्रेस बस पकड़ूँ, वह 9:30 बजे मुझे निवाई उतारेगी. वहाँ से ऑटो रिक्शा
लेकर मैं बनस्थली पहुँच जाऊंगी.”
गुप्ताजी ने उसकी ओर
देखा और मुस्कुरा दिए.
“अच्छा तुझे नौकरी
मिल गयी तो इत्ती बड़ी हो गई है, अब हम तुझे बनस्थली छोड़ने भी नहीं जा सकते. तुझे
हमारे छोड़ने आने से कोई तकलीफ है?”
“नहीं पापा, मुझे
कोई तकलीफ नहीं है. पर आप जाते हैं, रात गेस्ट हाउस में रुकते हैं और अगले दिन
वापस लौटते हैं. इतनी दूर कार चलाने से थकान भी तो होती है. फिर मैं सोच रही थी कि
इस बार मैं अपना पहला जॉब शुरू करने जा रही हूँ... तो आत्मनिर्भर होने का अहसास घर
से ही क्यों न शुरू करूँ?”
गुप्ता जी की आँखों
में हल्की चमक, थोड़ा गर्व और थोड़ी शरारत थी. उन्होंने शगुन के कंधे पर हाथ रखा.
"शगुन, तुम एक स्वतंत्र व्यक्तित्व हो, यह तुम साबित कर
चुकी हो. लेकिन अभी तुमने नौकरी जॉइन नहीं की है. अभी तुम जॉइन करोगी, अगस्त के
पहले सप्ताह में तुम्हारा पहला वेतन तुम्हारे हाथ में आएगा. उस दिन मैं मानूँगा कि
मेरी बेटी सचमुच अपने पैरों पर खड़ी हो गई है. उसके बाद तुम अपनी फीस खुद भरना,
अपनी पसंद के कपड़े खरीदना और शायद हमारे लिए भी कुछ लाना. पर अभी? अभी
तो हम ही तुझे छोड़ने चलेंगे."
“पापा, आपने तो मेरा
सारा प्लान ही ध्वस्त कर दिया.” शगुन हल्की मुस्कान के साथ बोली.
“अच्छा शगुन मेरी
बात सुन.” अनिल चाचा की आवाज सुन कर शगुन चौंक कर आश्चर्य से उन्हें देखा. उसे इस
बात का अहसास ही नहीं था कि वे वहाँ आ बैठे थे और उनकी बातें सुन रहे थे.
“चाचा, आप?
“शगुन मैं तो बहुत
देर से तेरी और भाई साहब की बातें सुन रहा हूँ. अब मेरी बात सुन. आज मेरी 26 से 1
जुलाई तक की छुट्टी मंजूर हो गयी है, 2 को रविवार है. मेरे पास पूरे आठ दिन हैं.
तेरी चाची भी जयपुर घूमना चाहती है. तो भाभी और भाई साहब की जगह तुझे छोड़ने मैं
और चाची जा रहे हैं, साथ में मुक्ति भी होगी. आयुष से भी पूछेंगे, वह भी हमारे साथ
घूम आएगा. कैसा रहेगा?”
शगुन चाचा के इस प्रस्ताव
से चकित थी. यह तो उसे पता था कि चाचा का रूपांतरण (Transformation) तेजी हो रहा है. लेकिन उसे यह अहसास नहीं था कि वे इस स्तर तक पहुँच
जाएंगे. उसने पापा की ओर देखा तो वे मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे.
“मतलब पापा, ये बात
आपको भी पता थी.” शगुन ने रुआँसा होने का अभिनय करते हुए कहा.
“मुझे भी अनिल ने
शाम को ही बताया. मुझे प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा तो मैंने तुरन्त हाँ कर दी. तुझे मंजूर
न हो तो यह नहीं जाएगा.”
“नहीं पापा, चाचा-चाची
मुक्ति के साथ मुझे छोड़ने जाएँ, वहाँ दो-तीन दिन रुकें, सब कुछ देखें. इससे अच्छा
क्या हो सकता है? आखिर कभी तो उन्हें भी मुक्ति के भविष्य के बारे में सोचना होगा.”
“मुक्ति की मुझे अब कोई
चिन्ता नहीं. उसकी सोचने वाले यहाँ तुम और आयुष हो तो.” चाचा ने कहा.
25 जून की सुबह.
गुप्ता निवास के
बाहर सुबह से ही चहल-पहल थी. हवा में रामगंजमंडी की वही परिचित महक थी, लेकिन शगुन को आज सब कुछ नया लग रहा था. गुप्ताजी की कोरल रेड मारूति-800 बनस्थली
जाने को तैयार खड़ी थी.
चाचा ड्राइविंग सीट
पर थे, शगुन आगे बैठी, पीछे चाची और आयुष, आयुष की गोद में थी मुक्ति. मम्मा-पापा ने
उन्हें हाथ हिलाकर विदा किया. कार धीरे-धीरे गली से बाहर निकलने लगी. ताई-ताऊ की
ओर देखते हुए मुक्ति उत्साह से हवा में हिला रही थी.
शगुन ने भी खिड़की
से पीछे देखा कि उसका घर छोटा होता जा रहा है, लेकिन उसके
अपने भीतर का आसमान बड़ा होता जा रहा था. उसने अपने छोटे बैग से अपनी ‘संबल’ नोटबुक
निकाली और लिखना शुरू किया:
"स्वतंत्रता
का अर्थ रिश्तों को तोड़ना नहीं, बल्कि रिश्तों में अपनी
पहचान को ढूँढना है. संबल केवल सहारा नहीं, बल्कि वह
विश्वास है जो आपको तब भी उड़ने की शक्ति देता है जब हवाएँ खिलाफ बह रही हों.
आज मेरे लिए
पिंजरे का दरवाज़ा खुल चुका है… अब
सारा आसमान मेरा है."
(समाप्त)
बुधवार, 11 मार्च 2026
रिजेक्शन?
पिंजरा और पंख-54
मंगलवार, 10 मार्च 2026
उपहास-भय
पिंजरा और पंख-53
सोमवार, 9 मार्च 2026
सन्नाटे की गूँज
पिंजरा और पंख-52
रात ग्यारह बजे घर के बाहर कार रुकी. मम्मा के हाथ में शगुन के लिए खाने का बैग था. वे थकी हुई और उदास लग रही थीं. अनिल चाचा और पापा नीचे लिविंग रुम में ही बातें करने बैठ गए.
रविवार, 8 मार्च 2026
मोर्चेबन्दी
पिंजरा और पंख-51
मुक्ति अब डेढ़ साल की थी. अब दौड़ने और बोलने भी लगी होगी. शगुन का मन उसे गोद में उठाने और बातें करने का हुआ. शगुन ड्राइंग रूम में गयी तो मुक्ति परदे के पीछे से हंसती हुई भाग कर अंदर जाने लगी, तभी फिसल कर फर्श पर कालीन पर गिर गयी. उसे चोट नहीं लगी थी पर बच्चे का रुआँसा होना स्वाभाविक था. शगुन ने उसे गोद में उठा कर पुचकार लिया. तू दीदी से भाग रही थी तो गिर गयी. दीदी से भागी क्यों? दीदी को प्यार नहीं करेगी? प्यार में भीगे शब्द सुन कर मुक्ति मुस्कुराने लगी.
शनिवार, 7 मार्च 2026
स्वावलंबन
पिंजरा और पंख-50
शगुन ने आज बादामी रंग का खादी का कुर्ता पाजामा और हलके भूरे रंग का ऊनी फुल स्वेटर पहना था. बाल सलीके से बंधे थे. मनोविज्ञान विभाग की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसे रामगंजमंडी की उस शगुन की याद आई जिसने बनस्थली विद्यापीठ के इसी कैंपस में तीन साल पहले सहमे हुए अपने कदम रखे थे.
शुक्रवार, 6 मार्च 2026
इनकार
पिंजरा और पंख-49
गुरुवार, 5 मार्च 2026
ब्रह्मपुत्र की हवाएँ
पिंजरा और पंख-48
गुवाहाटी में दीवाली के पहले से ही सुबह की धुंध
और गहरी होने लगी थी. पहले सेमेस्टर की परीक्षा के नतीजे आ चुके थे और आयुष ने
अपनी जगह 'टॉप-10' में सुरक्षित कर ली
थी. लेकिन इस सफलता से अधिक जिस चीज़ ने उसे बदला था, वह था
यहाँ का खुला 'इंटरेक्शन'.
उस दोपहर, वह 'कम्प्यूटर सेंटर' में लैब असाइनमेंट पूरा कर रहा था.
तभी उसके साथ वाली डेस्क पर ईशा ने अपनी कुर्सी खिसकाई. वह कोलकाता से थी और
फिजिक्स की 'ब्राइट' छात्राओं में गिनी
जाती थी.
"आयुष, तुमने 'डिस्क्रीट मैथ' वाले लॉजिक गेट्स का असाइनमेंट कर
लिया? मुझे उस 'ट्रुथ टेबल' में थोड़ी दिक्कत आ रही है," ईशा ने सहजता से
पूछा.
आयुष एक पल के लिए ठिठका. उसके पुराने बोर्डिंग
स्कूल में लड़कियाँ केवल 'एनुअल डे' पर
दिखती थीं, और घर (रामगंजमंडी) में लड़कियों से बात करने का
मतलब था, ‘संदेह की नज़रें’. लेकिन यहाँ ईशा की आँखों में कोई संकोच नहीं था,
केवल एक सहपाठी की जिज्ञासा थी.
"हाँ... वो, मैंने कर लिया है. तुम चाहो तो मेरा लॉजिक देख सकती हो," आयुष ने अपना रजिस्टर उसकी ओर बढ़ा दिया.
अगले एक घंटे तक दोनों ने 'बाइनरी लॉजिक' पर चर्चा की. क्लास के बाद वे दोनों कॉफी
पीने कैंपस के मशहूर कैंटीन एरिया 'खोका' (Khokha) चले गए. वहाँ ब्रह्मपुत्र की ठंडी हवाएँ सीधे उनके बदन से टकरा रही थीं.
आयुष ने देखा, आसपास कई और लड़के-लड़कियाँ समूहों में बैठे थे, हँस रहे थे, बहस कर रहे थे. वहाँ न तो अनिल चाचा का
डर था, न ही समाज की 'मर्यादा' वाली घुटन.
ईशा ने कॉफी का घूँट लेते हुए कहा,
"तुम्हें पता है आयुष, घर पर सब सोचते
हैं कि मैं यहाँ सिर्फ पढ़ रही हूँ, लेकिन यहाँ आकर मुझे
अहसास हुआ कि मैं पहली बार 'जी' रही
हूँ. कोलकाता में पाबंदियाँ थीं, पर यहाँ हम अपनी पहचान खुद
गढ़ते हैं."
आयुष को अपनी दीदी, शगुन
की याद आई. उसे महसूस हुआ कि शगुन जिस 'आज़ादी' के लिए बनस्थली विद्यापीठ के परकोटा वाले दायरे में लड़ रही है, वह यहाँ कितनी सहज उपलब्ध है. उसने मन ही मन सोचा— "क्या रामगंजमंडी
में कभी ऐसा हो पाएगा? जहाँ शगुन दीदी जैसी किसी लड़की को
अपनी शिक्षा के लिए किसी 'मुहूर्त' या 'सगाई' से न लड़ना पड़े?"
रात को हॉस्टल लौटकर आयुष ने ईशा के साथ बिताए
समय के बारे में सोचा. यह सिर्फ 'दोस्ती' नहीं थी, यह उसके भीतर की उस ग्रंथि का खुलना था
जिसने उसे हमेशा सिखाया था कि स्त्री और पुरुष के बीच केवल 'रिश्ते'
या 'दूरी' हो सकती है,
'सहज मित्रता' नहीं.
उसने शगुन को ईमेल लिखा, "दीदी, आज मैंने जाना कि समानता केवल किताबों में
नहीं होती, वह व्यवहार में होती है. यहाँ लड़कियां सिर्फ पढ़
नहीं रही हैं, वे नेतृत्व कर रही हैं. मुझे एक नई दोस्त मिली
है, ‘ईशा’. उससे बात करके मुझे लगा कि पितृसत्ता का सबसे
बड़ा हथियार 'अलगाव' (Separation) है.
जब हम साथ मिलकर काम करते हैं, तो डर अपने आप खत्म हो जाता
है. आप अपनी लड़ाई जारी रखिए, यहाँ की आबोहवा मेरे भीतर के 'अनिल चाचा' को रोज़ थोड़ा-थोड़ा मार रही है."
ईमेल भेजकर वह खिड़की के पास खड़ा हो गया. दूर
ब्रह्मपुत्र का पानी चाँदनी में चमक रहा था. आयुष अब वह छोटा भाई नहीं रहा था जो
केवल आज्ञा मानता था, वह अब एक 'स्वतंत्र-चेता'
बन रहा था.
बनस्थली में शगुन का संघर्ष एक अलग स्तर पर था.
दीवाली के बाद कैंपस में सन्नाटा था, लेकिन शगुन की मेज़ 'असामान्य मनोविज्ञान' की किताबों और केस स्टडी की
फाइलों से अटी पड़ी थी. उसने हॉस्टल मेस की बाई नाथी और उसकी मदद से गाँव की अन्य
स्त्रियों के जो इंटरव्यू लिए थे, वे उसके प्रोजेक्ट का आधार
बन रहे थे.
उसी शाम मम्मा का फोन आया. "शगुन, अनिल चाचा बहुत नाराज़ हैं. वे कह रहे हैं कि तूने दीवाली पर न आकर उन
लोगों का अपमान किया है. अब वे कह रहे हैं कि दिसंबर के अंत में वे खुद वहाँ
बनस्थली आएंगे, उस लड़के और उसके परिवार के साथ. वे वहीं सब
पक्का करना चाहते हैं."
शगुन का हाथ काँपा, पर
आवाज़ नहीं. उसने पास रखे 'टीचिंग असिस्टेंट'
(Teaching Assistant) के आवेदन फॉर्म को देखा. डॉ. शास्त्री ने उसे
बताया था कि मनोविज्ञान विभाग में दो पद खाली हैं, और शगुन
अपनी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर सबसे मजबूत दावेदार थी.
"मम्मा, चाचा को कह
दीजिएगा कि दिसंबर में मेरे प्रैक्टिकल और फील्ड वर्क की प्रेजेंटेशन है. मुझे
किसी से मिलने की फुरसत नहीं होगी. और मैं यह बहाना नहीं बना रही हूँ, स्थिति यही
है कि अभी भी मेरी नींद पूरी नहीं होती. वे आए तो बहुत निराश होंगे," शगुन ने स्पष्ट कहा. “चाचा की बेसब्री बहुत डराती है, मम्मा. दिसंबर के
बाद केवल तीन-चार माह बचेंगे. क्या वे तब तक नहीं रुक सकते.”
"बेटा, वे नहीं
मानेंगे. वे पापा पर बहुत दबाव बना रहे हैं," मम्मा की
आवाज़ में डर था.
शगुन ने फोन रखा और डॉ. शास्त्री के केबिन की ओर
चल दी. शायद चाचा समझने लगे हैं कि, ‘यदि उसने बी.एससी. कर लिया तो लड़की हाथ से
निकल जाएगी’. उसे पता था कि अब केवल 'ना' कहना काफी नहीं होगा, उसे खुद को आर्थिक रूप से
स्वतंत्र साबित करना होगा. उसने ऑफिस जाकर टीचिंग असिस्टेंट के पद के लिए अपना
आवेदन जमा किया और साक्षात्कार (Interview) की तैयारी में
जुट गई.
उस रात उसने अपनी नई 'संबल'
नोटबुक में लिखा, "आयुष गुवाहाटी में उस
दुनिया को जीने का आरंभ कर चुका है, जिसे मैं यहाँ कागज़ों पर उतार रही हूँ. हम
दोनों के बीच का यह संवाद ही हमारा असली हथियार है. दिसंबर में चाचा तो न आने
पाएंगे लेकिन वापस लौटने पर युद्ध अब केवल उसके जीवन को सगाई में बांध देने के
खिलाफ नहीं, बल्कि मेरी एक स्वतंत्र पहचान के लिए
होगा."
खिड़की के बाहर बनस्थली के हरे वृक्षों के बीच
छाया सन्नाटा और दूर गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र की लहरों को छूकर उठती हवाएँ,
दोनों एक ही संकल्प से जुड़े थे.
... क्रमशः
बुधवार, 4 मार्च 2026
प्रोजेक्शन
पिंजरा और पंख-47
शगुन तब तक निकल कर छत पर आ चुकी थी. पश्चिम में सूरज डूबने को था. शगुन के मस्तिष्क पटल पर सांख्यिकी के चार्ट उतर आए. अभी बहुत काम बाकी पड़ा था. दीवाली के तुरन्त बाद सेमेस्टर था. और उसके तुरन्त बाद आखिरी सेमेस्टर शुरू होना था. इस सेमेस्टर की केस स्टडी तैयार नहीं हुई थी जिसे सेमेस्टर के पहले जमा करना था.
मंगलवार, 3 मार्च 2026
सामाजिक लक्ष्य
पिंजरा और पंख-46
ईमेल भेजकर शगुन ने अपनी 'ऑनर्स प्रोजेक्ट' की फाइल खोली. विषय था, "पितृसत्ता में स्त्री शिक्षा का वैचारिक संघर्ष". डॉ. शास्त्री ने उसे आगाह किया था कि यह विषय अकादमिक से ज़्यादा व्यक्तिगत हो सकता है, लेकिन शगुन अड़ी रही. उसे लगा कि जो लड़ाई वह घर के भीतर लड़ रही है, उसे शब्दों में ढालना ही उसका असली 'संबल' होगा. जब वह प्रोजेक्ट करने लगी तो उसे महसूस हुआ कि केवल उसके परिवार के तथ्य पर्याप्त नहीं होंगे. शेष तथ्य कहाँ से लाए जाएँ? फिर उसे होस्टल मेस में काम करने वाली नाथी का ध्यान आया. वह विद्यापीठ परिसर से बाहर बसे बनस्थली गाँव से आती थी. उसने उससे बात की तो उसने महसूस किया कि उसे उसके गाँव जाकर कुछ स्त्रियों से बात करनी चाहिए. नाथी उसे गाँव की स्त्रियों से बात कराने को तैयार हो गयी. एक मंगलवार साप्ताहिक अवकाश के दिन जब नाथी का भी अवकाश था, शगुन बनस्थली गाँव गई. उसने चार घंटे वहाँ बिताए और बहुत सारी स्त्रियों से बात करने के बाद बहुत से तथ्य एकत्र किए. उसने महसूस किया कि यह संघर्ष जितना उसने सोचा था उससे कहीं बहुत अधिक कठोर है. लेकिन अब प्रोजेक्ट लगभग तैयार था, बस एक बार डॉ. शास्त्री को दिखाने भर की देर थी.