Friday, June 26, 2009

चार-चार बच्चों वाली औरतें

अदालत से वापस आते समय लालबत्ती पर कार रुकी तो नौ-दस वर्ष की उम्र का एक लड़का आया और विंड स्क्रीन पर कपड़ा घुमा कर उसे साफ करने का अभिनय करने लगा। बिना विंडस्क्रीन को साफ किए ही वह चालक द्वार के शीशे पर आ पहुँचा।  उस का इरादा सफाई का बिलकुल न था। मैं ने शीशा उतार कर उसे मना किया तो पेट पर हाथ मार कर रोटी के लिए पैसा मांगा।  आम तौर पर मैं भिखारियों को पैसा नहीं देता। पर न जाने क्या सोच उसे एक रुपया दिया। जिसे लेते ही वह सीन से गायब हो गया। तीस सैकंड में ही उस के स्थान पर दूसरे लड़के ने उस का स्थान ले लिया।  इतने में लाल बत्ती हरी हो गई और मैं ने कार आगे बढा दी।

25 जून हो चुकी थी, लेकिन बारिश नदारद थी।  रायपुर से अनिल पुसदकर जी  ने रात को उस के लिए अपने ब्लाग पर गुमशुदा की तलाश का इश्तहार छापा।  उसे पढ़ने के कुछ समय पहले ही भिलाई से पाबला जी बता रहे थे बारिश आ गई है।  मैं ने पुसदकर जी को बताया कि बारिश को भिलाई में पाबला जी के घर के आसपास देखा गया है।  रात को तारीख बदलने के बाद सोये।  रात को  बिजली जाने से नींद टूटी।  पार्क में खड़े यूकेलिप्टस के पेड़ आवाज कर रहे थे, तेज हवा चल रही थी। कुछ देर में बूंदों के गिरने की आवाज आने लगी।  पड़ौसी जैन साहब के घर से परनाला गिरने लगा जिस ने बहुत सारे शोर को एक साथ पृष्ठभूमि में दबा दिया। गर्मी के मारे बुरा हाल था। लेकिन बिस्तर छोड़ने की इच्छा न हुई। आधे घंटे में बिजली लौट आई। इस बीच लघुशंका से निवृत्त हुए और घड़ी में समय देखा  तीन बज रहे थे।

सुबह उठे, घर के बाहर झाँका तो पार्क खिला हुआ था। सड़क पर यूकेलिप्टस ने बहुत सारे पत्ते गिरा दिए थे और बरसात ने उन्हें जमीन से चिपका दिया था। नुक्कड़ पर बरसात का पानी जमा था।  नगर निगम के ठेके दार ने वहाँ सड़क बनाते वक्त सही ही कसर रख दी थी। वरना रात को हुई बारिश का निशान तक नहीं रहता। मैं ने अन्दर आ कर सुबह की काफी सुड़की और नेट पर समाचार पड़ने लगा। बाहर कुछ औरतों और बच्चों की आवाजें आ रही थीं।  पत्नी तुरंत बाहर गई और उन से निपटने लगी।  कुछ ही देर में वह चार पाँच बार बाहर और अंदर हुई। मुझे माजरा समझ नहीं आ रहा था।

पत्नी इस बार अन्दर किचन में गई तो मैं ने बाहर जा कर देखा।  हमारे और पड़ौसी जैन साहब के मकान के सामने की सड़क पर चिपके यूकेलिप्टस के पत्ते और दूसरी गंदगी साफ हो चुकी थी।  नुक्कड़ पर पानी पहले की तरह भरा था।  दो औरतें गोद में एक-एक बच्चा लिए तीन-तीन बच्चों के साथ जा रही थीं। माजरा कुछ-कुछ समझ में आने लगा था।  मैं किचन में गया तो पत्नी बरतन साफ करने में लगी थी।  -तुम ने फ्रिज में पड़ा बचत भोजन साफ कर बाहर की सफाई करवा ली दिखती है।  मैं ने कहा।  -हाँ, किचन में पड़ा आटे की रोटियाँ भी बना कर खिला दी हैं उन्हें।

मुझे शाम वाले बच्चे याद आ गए।  फिर सोचने लगा -एक औरत के साथ चार-चार बच्चे? 
लेकिन कौन उन औरतों को बताएगा कि आबादी बढ़ाना ठीक नहीं और इस को रोकने का उपाय भी है।  मुझे वे लोग भी आए जो भिखारी औरतों को देख कर लार टपकाते रहते हैं और कुछ अधिक पैसा देने के बदले आधे घंटे कहीं छुपी जगह उन के साथ बिता आते हैं।  कौन जाने बच्चों के पिता कौन हैं? शायद माँएँ जानती ह या शायद वे भी नहीं जानती हों।



ब्लाग पढने आता हूँ।  वहाँ बाल श्रम पर गंभीर चर्चा है, कानूनों का हवाला है।  महिलाओं की समानता के लिए ब्लाग बने हैं।  कोई कह रहा है महिलाओं का प्रधान कार्य बच्चे पैदा करना और उन की परवरिश करना है।  ब्लाग लिखती महिलाओं में से एक उलझ जाती है।  दंगल जारी है।  देशभक्ति और देशद्रोह की नई परिभाषाएँ बनाई जा रही हैं, तदनुसार तमगे बांटे जा रहे हैं।  लालगढ़ पर लोग चिंतित हैं कि कैसे सड़क, तालाब, पुलियाएँ आदिवासियों ने बना कर राज्य के हक में सेंध लगा दी है।  वे लोग किसी को अपने क्षेत्र में न आने देने के लिए हिंसा कर रहे हैं।  वे जरूर माओवादी हैं।  माओवादी पार्टी पर प्रतिबंध लग गया है। तीन दिन में बंगाल की सरकार भी प्रतिबंध लगाने पर राजी हो गई है।  बिजली चली जाती है और मैं ब्लाग की दुनिया से अपने घर लौट आता हूँ।  कल लाल बत्ती पर मिले बच्चे और वे चार-चार बच्चों वाली औरतें और उन के बच्चे? सोचता हूँ, वे इस देश के नागरिक हैं या नहीं? उन का कोई राशनकार्ड बना है या नहीं? किसी मतदाता सूची में उन का नाम है या नहीं?


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