@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: "काला टापू"

रविवार, 21 जून 2009

"काला टापू"

'लघुकथा'
दिनेशराय  द्विवेदी
साधु ने अपनी झोंपड़ी नदी के बीच उभरे वृक्ष, लताओं और रंग बिरंगे फूलों से युक्त हरे-भरे टापू पर बनाई थी. वह शांति से स्वाध्याय के लिए उत्तम स्थान था. साधु के पास थी एक छोटी सी डोंगी. साधु और उसके शिष्य दिन के किसी समय डोंगी पर बैठ कर नदी पार कर किनारे आते और शाम को वापस टापू पर चले जाते.


कई लोग उस की झोंपड़ी देखने भी जाते. धीरे धीरे लोगों को वह स्थान अच्छा लगा. लोगों ने देखा, साधु ने बहुत अच्छी जगह हथिया ली है. तो कुछ लोगों ने भी वहाँ झौंपडियाँ बना लीं. वे छुट्ठियों के दिनों में वहाँ आते. नशा करते, नाच गाना करते. अगले दिन सुबह चले जाते. उनके रहने से साधु की शांति भंग होने लगी. उसके स्वाध्याय में खलल पड़ने लगा. शिष्यों को यह सब अच्छा नहीं लगा, उन्होंने लोगों को टोका तो वे साधु की निंदा करने लगे.


शिष्यों ने साधु से जा कर कहा-
"लोग टापू पर आ कर मजे करने लगे हैं. यहाँ आते हैं, नशा करते हैं, रात भर हंगामा करते हैं, आपकी निंदा करते हैं. हम सुबह शाम कसरत करते हैं आपकी आज्ञा हो तो निपट लें. "

साधु के मुहँ से निकला- "साधु! साधु!"

और फिर कबीर की पंक्तियाँ सुना दीं-

"निन्दक नियरे राखिए, आँगन कुटी छबाय.
बिन पानी साबुन बिना, निरमल करै सुभाय."

अब रोज ही नए नए लोग टापू पर मौज करने आने लगे थे. लोगों की संख्या बढ़ती रही, और निन्दकों की भी. साधु और शिष्य आश्रम में स्वाध्याय करते. अखाड़े में शिष्य जोर करते. लोग सोचने लगे, साधु टापू पर से चला जाए तो आराम हो, ये और इसके शिष्य हमेशा जीवन में विघ्न डालते रहते हैं. साधु से उस के शिष्य जब भी कहते कि लोग अब हमें टापू से भगाने के बारे में बातें करते. लेकिन साधु उन्हें कबीर का वही दोहा सुना देता-

"निन्दक नियरे राखिए..."

शिष्य शांत हो जाते, पर उनके भीतर की आग इससे ठंडी नहीं होती. वह अंदर ही अंदर धधकती रहती.

एक दिन साधु शिष्यों सहित नदी पार बस्ती में गया हुआ था. बस्ती में ही किसी शिष्य ने बताया कि टापू पर उनकी झौंपड़ी में आग लगी है. वे सभी नदी किनारे पहुंचे तो देखा कि लोग साधु की झौंपड़ी में लगी आग को बुझाने के बजाए उस में ईर्ष्या और नफरत से तेल और लकड़ियाँ झोंक रहे हैं. यहाँ तक कि टापू पर शेष डोंगियाँ भी उन्होंने उस में झोंक दीं. कैसे स्वार्थ और भीड़ की मानसिकता मनुष्य को अंधा कर देती है। शिष्य टापू पर जाने के लिए शीघ्रता से डोंगियों में बैठने लगे. साधु ने मना कर दिया. सब नीचे भूमि पर आ उतरे.

एक शिष्य ने प्रश्न किया-
"गुरू जी, आप ने टापू पर जाने से मना क्यों किया?"

साधु ने उत्तर दिया -"अब वहाँ जाने से कुछ नहीं होगा. लोग तेल और लकड़ियाँ झौंक रहे हैं, अब कुछ नहीं बचेगा."
इतना कह कर साधु अपने शिष्यों सहित वहीं किनारे धूनी रमा कर बैठ गया.

लोगों ने देखा कि टापू की आग तेजी से भड़क उठी. टापू पर जो कुछ था सब भस्म हो गया. कुछ लोग ही बमुश्किल बची खुची डोंगियों में बैठ वहाँ से निकल सके. साधु बहुत दिनों तक वहीं किनारे पर धूनी रमा कर बैठा रहा. दिन में शिष्य बस्ती में जाते, साधु की वाणी का प्रचार करते और वापस चले आते. टापू कई दिनों तक जलता रहा. धीरे-धीरे जब टापू पर सब कुछ जल चुका तो आग स्वयमेव ही शांत हो गई. बची सिर्फ राख. टापू की सब हरियाली नष्ट हो गई, टापू काला पड़ गया. फिर बरसात आई राख बह गई. टापू पर फिर से अंकुर फूट पड़े, कुछ ही दिनों में वहाँ पौधे दिखने लगे. फिर रंग बिरंगे फूल खिले. दो एक बरस में ही फिर से पेड़ और लताएँ दिखाई देने लगीं. काला टापू फिर से हरियाने लगा. एक दिन देखा गया, साधु और उस के शिष्य फिर से डोंगी में बैठ टापू की ओर जा रहे थे.

18 टिप्‍पणियां:

अफ़लातून ने कहा…

प्रणाम है ,साधू और शिष्यों को !

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

उपसंहार :- जिस हाऊसिंग सोसाइटी में साधू का फ्लैट हो, उसमें अपार्टमेन्ट नहीं लेना चाहिए :)

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

काजलकुमारजी की बात जम रही है.:)

रामराम.

Arvind Mishra ने कहा…

सृष्टि और विध्वंस ..और पुनर्सृष्टि !

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

क्या प्रस्तुति है -वाह.

ज्ञान ने कहा…

आप तो यह बताईये महाराज कि आपकी पोस्ट पर ब्लOउगवाणी की पसंद क्यों नहीं बढ़ रही। 4 पर ही क्यों अटकी हुयी?

बेनामी ने कहा…

टापू की आग तो दावानल में बदलती नज़र आ रही :-)

Udan Tashtari ने कहा…

हरी भरी तो जब होगी तब होगी. मगर आग का इस तरह बढ़ते जाना बड़ा खतरनाक साबित हो रहा है.

कर्मचारी ने कहा…

लो! जिस बात को हम लिखने आये वो तो पहले से ही ज्ञान जी ने लिखा हुया है। 4 तो नहीं 6 है लेकिन बढ़ नहीं रही पसन्द की गिनती।

Science Bloggers Association ने कहा…

प्रेरक लघुकथा है। साथ में दिए चित्रों ने प्रभावोत्पादकता में वृद्धि कर दी है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

बेनामी ने कहा…

ज्ञान जी आप मेरे पड़ोसी शहर के प्रतीत होते हैं। आपकी ईमेल आईडी नहीं मिली। इसलिये यहाँ कहना पड़ रहा है कि आप मुझसे सम्पर्क करें। मेरी ईमेल आईडी, प्रोफाईल पर उपलब्ध है।

Ashok Kumar pandey ने कहा…

अरे भाई साहब यह तो थोड़ी ज्यादा डेमोक्रसी हो गयी

Abhishek Ojha ने कहा…

हम भी धुनी रमा के मस्त होते हैं :)

Smart Indian ने कहा…

कहानी अच्छी है - कब्ज़ा संस्कृति ने साधू और उसके पहलवानों से लेकर आम जनता तक सबको प्रभावित किया है.

Shastri JC Philip ने कहा…

दिनेश जी, कई दिनों के बाद आज पुन: वापस आया (जिसे आप ने ताड लिया था) तो आर सी मिश्रा जी ने इस कहानी की ओर इशारा किया.

पढा तो एकदम मन को सकून मिला. कारण साफ है: कहानी का मर्म बहुत गहरा है. सामाजिक कार्यों में जुटे होने के कारण और कई संस्थाओं से जुडे रहने के कारण यह बात मैं ने कई बार देखी है. हां, आज उसे एक नैतिक कथा के रूप में पहली बार पढ रहा हूँ.

कहानी के और भी पहलू हैं जिनसे मैआप परिचित हैं. वह भी हो रहा है. होने दें.

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

'' अन्योनास्ति " { ANYONAASTI } / :: कबीरा :: ने कहा…

साधू ही जाने साध स्वाभाव ,
विद्वेष की आग ऐसी ही होती है
लोभी का काम ही ऐसा होता है

निर्मला कपिला ने कहा…

िसमे भेद क्या है ये तो मुझे नहीं पता मगर लघु कथा बहुत अच्छी लगी। शुभकामनायें

Meenu Khare ने कहा…

बहुत ही प्रेरक लघुकथा.