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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

खाई

"लघुकथा" : दिनेशराय द्विवेदी

शहर में हुई ताज़ा बड़ी रैली के बाद, हवा का स्वाद बदल सा गया था. चाय की दुकान पर आवाज़ें ऊँची थीं, और व्हाट्सएप ग्रुप्स नोटिफिकेशन की बौछार से भरे हुए थे. रैली शांतिपूर्ण रही थी, पर उसके बाद मोहल्ले में एक अजीब सा सन्नाटा था, जैसे किसी आने वाली आंधी या तूफान की सूचना दे रहा हो.

अनन्या और ज़रीना हमेशा की तरह उस शाम छत पर बैठी थीं, इस साल उन्हें सैकण्डरी बोर्ड की परीक्षा देनी थी. बोर्ड के नाम का बड़ा आतंक था. उन्हें चिन्ता थी कि वे इस रेखा को ठीक से पार कर पाएंगी या नहीं. सात साल की दोस्ती उनकी आवाज़ों में, उनकी हँसी में रच-बस गई थी.

"कल से तेरे घर पढ़ना पड़ेगी" ज़रीना ने कहा, "मेरी अम्मी बीमार हैं."

"ठीक है," अनन्या ने इस प्रस्ताव को सहज स्वीकार कर लिया.

रात के खाने की मेज पर भाई विक्रम का चेहरा उत्तेजना से चमक रहा था. "आज तो लोगों की आँखें खुल गई होंगी! हमें अपने लोगों की सुरक्षा खुद करनी होगी." पिताजी मौन सिर हिला रहे थे.

तभी विक्रम का ध्यान अनन्या पर गया. "सुन, कल से उस ज़रीना को घर मत बुलाना."

"क्यों भैया? हमें साथ पढ़ना है," अनन्या हैरानी से बोली.

"उनकी संस्कृति अलग है, अनन्या. हम नहीं जानते उनके मन में क्या चल रहा है."

अनन्या को उसकी आवाज़ में एक नई, कठोर निश्चय की ध्वनि सुनाई दी. सुन कर अनन्या का गला सूख गया. "पर... वह तो मेरी सबसे अच्छी दोस्त है."

पिताजी ने आवाज़ दबाकर कहा, "बेटे, विक्रम की बात मान लो. तुझे कुछ हो गया तो? हमारी इज्ज़त का क्या होगा? उनसे दूर ही रहना ठीक है."

इज्ज़त शब्द हवा में झूल गया, जैसे कोई भारी पत्थर है और कभी भी उसके सिर पर गिर पड़ेगा.

अगले दिन जब ज़रीना किताबें लेकर आई, तो अनन्या ने दरवाज़ा आधा खोला. "ज़री... आज मैं ठीक नहीं हूँ. सिर दर्द है. तू चली जा."

ज़रीना की मासूम आँखों में चिंता तैर गई. "अच्छा? ठीक है... दवा ले लेना. पढ़ नहीं पाई तो परीक्षा कैसे देगी." उसने अपने बैग से चॉकलेट की एक पट्टी निकाली और अनन्या के हाथ में थमा दी, फिर चली गई.

दरवाज़ा बंद करते हुए अनन्या के हाथ काँप रहे थे. वह जो सिर्फ ज़रीना थी. उसकी हँसी, उसकी शैतानियाँ, उसके रहस्य, अचानक सब 'संभावित खतरा' बन गए थे. वह उसका चेहरा भूल रही थी, पर भैया के शब्द, "उनके मन में क्या चल रहा हैं," उसके कानों में गूँज रहे थे. पहली बार, उसने अपनी ही सहेली से तनिक भय महसूस किया. उसके सारे शरीर में एक सिहरन दौड़ गयी. फिर एक लंबी सांस अपने अंदर खींच कर उसने अपने विश्वास को मजबूत किया कि प्यारी सी ज़रीना उसके लिए खतरे का बायस कैसे बन सकती है.

एक हफ़्ते तक बहानेबाजी करती रही. फिर एक दिन, स्कूल गेट पर, ज़रीना ने उसका रास्ता रोक लिया.
"तू मुझसे नाराज़ है क्या? मैंने कुछ गलत कहा?"

"नहीं... बस... अब हम बड़े हो गए हैं. अलग-अलग रहना चाहिए."

ज़रीना स्तब्ध रह गई. उसकी आँखों की चमक धूमिल पड़ गई. "क्या मतलब? 'अलग' क्यों?"

एक क्षण के लिए स्तब्धता ने उसे रोका. फिर उसने धीरे से सवाल कर ही लिया, "क्योंकि मैं मुस्लिम हूँ?"

अनन्या मौन रह गयी. लेकिन उसके इस मौन ने उसे बहुत कुछ कह दिया था.

ज़रीना के चेहरे पर आघात, और फिर एक ठंडी, दुखद समझदारी उभरी.

"समझ गई. तेरे भैया ने कहा होगा न? मैंने सुना है उसका भाषण." वह एक कदम पीछे हटी, जैसे कोई अदृश्य रेखा खींच रही हो. "ठीक है. तू सुरक्षित रह."

और फिर सब कुछ थम गया.

अब अनन्या अपनी खिड़की से कभी-कभी ज़रीना के घर की ओर देखती है, जहाँ वह अपनी छत पर अकेली बैठी रहती है. पहले जहाँ दोनों के बीच एक खुला आंगन था, साझी हँसी थी, अब दो घरों के बीच की सड़क, अब सड़क नहीं रह गयी थी. वहाँ रातों रात एक गहरी खाई बन गयी थी, एक अदृश्य खाई. उसे लगता कि वह कभी इस खाई के पार न जा सकेगी. बहुत सारे लोगों को यह खाई कभी नहीं दिखी. वे इस पार से उस पार आते जाते रहे. पर यह खाई हर पल अनन्या के ज़ेहन में मौजूद थी.

एक शाम, अपना बैग खंगालते हुए अनन्या को चॉकलेट की पट्टी हाथ लगी. इसे ज़रीना ने उसे दिया था और वह बैग में डाल कर भूल गयी थी. उस पर ज़रीना ने ख़ुश ख़त में लिखा था, "हमेशा तेरी दोस्त."

जैसे ही अनन्या के हाथ ने उस चॉकलेट की पट्टी को छुआ, वैसे ही उसके अंतर से 'कुछ हो जाने' का डर पता नहीं काफूर हो गया. डर केवल उसे दिखाया गया था, वह कभी आया ही नहीं. कोई अनहोनी नहीं हुई. उलटा, कुछ और ही 'हो गया' था. उसकी दुनिया सिमट गई थी. उसके मन की कोमल पंखुड़ियों के बीच संदेह के काँटे उग आए थे. उसकी सबसे कीमती चीज़, निश्छल और बिना शर्त दोस्ती टूटकर बिखर गई थी.

उस रात अनन्या जब अपने कमरे में बिलकुल अकेली रह गयी, बहुत कुछ सोचती रही. फिर अचानक वह उठी, पानी के अधभरे गिलास में अपनी उंगली डुबोई और अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर उँगली से एक शब्द लिखा: "क्यों?"

उस रात उसका पढ़ने में बिलकुल मन नहीं लगा. वह ठीक से सो भी नहीं सकी. जैसे ही सुबह की रोशनी ने खिड़की से कमरे में प्रवेश किया. उनींदी सी वह उठी और उसने खिड़की खोल दी. उसे चिड़ियों की चहचहाट सुनाई दी. सामने की छत पर ज़रीना टहल रही थी. उसके मन ने बस चाहा कि ज़रीना उसे देखे. तभी ज़रीना ने उसकी खिड़की की और देखा. दोनों की निगाहें मिलीं. उसने ज़रीना की ओर अपना हाथ हिलाया. ज़रीना ने भी अपना हाथ हिला कर जवाब दिया. दोनों के चेहरों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी. अनन्या ने महसूस किया कि उनके बीच की सड़क पर कभी कोई खाई थी ही नहीं.

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

साँस

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
मैंने साँस अन्दर खींची, जितनी हवा मैं अपने फेफड़ों में भर सकता था भर ली. जो फेफड़ों में भरी गयी थी, वह सिर्फ हवा नहीं थी. उसके साथ एक कठोर नियम था, पिताजी का वह वाक्य "लड़के रोते नहीं". वह मेरे फेफड़ों में भरी गयी हवा के निकल जाने के बाद भी अंदर रह गया था. पहले मेरे फेफड़ों में और फिर मेरे खून में घुल कर मेरी रग-रग में समा गया. बारह साल की उम्र तक आते-आते, जब भी जरूरत होती मुझे मेरे अंदर से सुनाई देने लगता.

प्रिया, मेरी बहन तब चौदह की थी. उसने साइकिल चलानी सीखनी चाही. हमारे छोटे से शहर की उस सड़क पर, जहाँ मैं और मेरे दोस्त बिना किसी डर के पूरे दिन साइकिलों पर उड़ान भरते थे, लड़कियाँ कभी साइकिल चलाते नहीं दिखीं. वे सीखते हुए दिखतीं, फिर कुछ दिनों बाद उनकी साइकिल गायब हो जातीं.प्रिया के लिए पिताजी से साइकिल चलाने की अनुमति प्राप्त कर लेना एक संघर्ष था.

"लड़कियाँ इतनी दूर साइकिल पर नहीं जातीं," माँ ने कहा, आँखें नीची किए. "लोग क्या कहेंगे?" 'लोग'... हमारे घर की चौथी दीवार थे, जिसमें उन लोगों के कान और आँखें चिपकी थीं, जो कभी नहीं दिखते थे पर हर वक्त, हर जगह मौजूद रहते थे.

पिताजी ने एक वाक्य में फैसला सुना दिया: "ज़रूरत नहीं है।"

प्रिया की आँखों में वह चमक, जो सवाल पूछते वक्त होती थी, धुंधली पड़ गई। मैंने देखा. पर मैं चुप रहा. मेरे अंदर का लड़का जिसने रोने पर जीत हासिल कर ली थी, वह मुझे यही सिखाता था, चुप रहो. यह तुम्हारी लड़ाई नहीं है.

फिर मैं सोलह का हो गया. स्कूल की बास्केटबॉल टूर्नामेंट की फाइनल मैच. पूरे हफ़्ते की प्रैक्टिस, पसीना, और एक जुनून था जो मेरे अंदर भर गया था। आखिरी सेकंड. स्कोर बराबर. मैंने शॉट लगाया. गेंद रिम पर घूमी... और बाहर गिर गई. मेरी टीम जीत नहीं सकी, मैच बराबरी पर छूटा.

सुनसान जिम में, मेरे साथियों के झुंड के बीच, एक अजीब सी जलन मेरी आँखों के पीछे उभरी. मेरा गला रुंधने लगा. मैंने तुरंत सिर झुका लिया. लड़के रोते नहीं. मेरे अंदर का लड़का कहीं टूटने को था.

लेकिन फिर एक हाथ मेरे कंधे पर पड़ा. हमारी टीम के कप्तान राहुल का, जो ग्यारहवीं में था और जिसे मैं एक देवता की तरह देखता था. उसकी आवाज़ सामान्य से कुछ कोमल थी.

"कोई बात नहीं, विशाल। तुमने बहुत अच्छा खेला."

और तभी मैंने देखा, राहुल की आँखें भी चमकीली थीं। लेकिन नम. वह भी... महसूस कर रहा था? उसके अंदर के लड़का भी टूट रहा था. उस की टूटन ने मेरे भीतर के लड़के को हिला कर रख दिया.

उस शाम, मैं घर लौटा, तब प्रिया रसोई में माँ की मदद कर रही थी. उसने पूछा, "कैसा रहा मैच?"
मैंने सिर्फ सिर हिलाया। फिर अचानक बोल पड़ा, "हारे नहीं, पर जीत भी नहीं सके. बुरा लग रहा है."

मेरा यह वाक्य हवा में तैरता रह गया. प्रिया हैरान थी. मैंने कभी नहीं कहा था, 'बुरा लग रहा है.'

उस रात, पिताजी ने मेरे चेहरे पर उदासी देखी और पूछा, तो मैंने फिर से वही कहा: "हार का बुरा लग रहा है, पापा।"

पिताजी चुप रहे। शायद उन्होंने मेरे लड़के के कवच में पड़ी उस दरार को देख लिया था. उनकी आवाज़ सख्त नहीं थी, बस थकी हुई थी, बोले "कोई बात नहीं. अगली बार जीत लेना."

यह एक तसल्ली नहीं थी, पर डाँट भी नहीं थी. यह क्या था? मुझे समझ नहीं आया. क्या उनका भी कवच दरक रहा था?

कुछ दिन बाद, जब प्रिया ने फिर, बहुत ही धीमे स्वर में, कहा, "मैं साइकिल सीखना चाहती हूँ ताकि ट्यूशन समय से पहुँच सकूँ," तो मैंने, अचानक अपने कवच की दरार से बाहर निकल आया. जा कर पिताजी से कहा, “अब प्रिया को साइकिल सीखने की जरूरत है, “उसे मैं सिखा देता हूँ पापा. शाम को सड़क खाली रहती है.”

यह कोई विद्रोह नहीं था, नारेबाजी भी नहीं थी. सिर्फ एक प्रस्ताव था. एक साँस, जो बहुत पहले मैंने खींच कर अपने फेफड़ों में भर ली थी. जो मेरी रग-रग में दौड़ रही थी. अब बाहर निकलने को छटपटा रही थी.

पिताजी ने मेरी ओर देखा. फिर प्रिया की ओर, जिसकी आँखों में चमक लौट आई थी. चमक, जो सवाल नहीं, उम्मीद पूछ रही थी.

"ठीक है," उन्होंने कहा, बिना किसी जोश के. "पर शाम सात बजे से पहले. और खाली सड़क पर ही."

यह जीत नहीं थी. यह सिर्फ एक मोड़ था. उस दिन, जब मैंने प्रिया को साइकिल का हैंडल पकड़ाना सिखाया, तो मैंने महसूस किया कि मेरे अंदर का कभी न रोने वाला लड़का पिघल रहा है. हर साँस जो अब मैं बाहर छोड़ता हूँ, उसके साथ वह लड़का थोड़ा सा मेरा साथ छोड़ देता है और कमजोर पड़ता जाता है. शायद एक दिन, मैं उससे मुक्त हो जाऊंगा. और तब... शायद तब मैं एक इंसान बन सकूँगा."

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

एकता

लघुकथा

दिनेशराय द्विवेदी

मदुरा नगर निगम के एयरकंडीशंड बैठक कक्ष की शीतलता और बाहर की चिपचिपी गर्मी के बीच, पंखे की आवाज़ के सिवा कोई आवाज़ नहीं थी. आयुक्त श्रीवास्तव ने निविदा के कागजात पर नज़र दौड़ाई. "मिलाप तेवटिया, तुम्हारी दर राज्य की न्यूनतम मजदूरी दर से भी पाँच प्रतिशत कम है. यह कैसे?"

मिलाप तेवटिया, जिसकी आँखों में तीस साल के अनुभव की चालाकी थी, मुस्कुराया. "सर, मैनेजमेंट है. हम स्मार्ट तरीके से काम करेंगे."

मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. चौधरी ने चश्मा सहलाते हुए कहा, "यह धार्मिक नगर है, तेवटिया. तीर्थयात्री देश-विदेश से आते हैं. सफाई पर कोई समझौता नहीं."

"डॉक्टर साहब," तेवटिया आगे झुका, "आप लोग बस अपना कमीशन समय पर पहुँचने की चिंता करें. बाकी मैं संभाल लूँगा. पर व्यापार में दिल नहीं, दिमाग चलता है, सर!"


आयुक्त और डॉक्टर की नज़रें मिलीं. साल भर के लिए नगर की सफाई का ठेका मिलाप तेवटिया को मिल गया.

अगले सोमवार सुबह, मधुवन रोड के कूड़ा संग्रहण केंद्र पर पचास मजदूर इकट्ठे थे. तेवटिया ने ऊँची आवाज़ में कहा, " वेतन मिलेगा, रोज दो सौ, जो काम बताया जाए उसे करना होगा, चाहे चार घंटे में करो या छह घंटे में या आठ घंटे में. जो माने ठीक, जो नहीं माने, आज ही जाए."

रामलाल, जिसकी बेटी बुखार से तप रही थी, आगे बढ़ा. "साहब, आधे दिन की मजदूरी में..."

"तुझे पता है बाहर कितने लोग बेरोजगार हैं?" तेवटिया ने उसे घूरकर देखा. रामलाल पीछे हट गया. दो सौ रुपये में दवाई तो मिल जाएगी.

दो महीने बाद, मदुरा की गलियों में यत्र-तत्र कूड़े के ढेर दिखने लगे. आराम घाट पर बदबू, मंदिर के सामने उड़ता प्लास्टिक. शिकायतें पार्षद शर्मा तक पहुँचीं.

"तेवटिया, मेरे वार्ड में शिकायतें हैं."

"चिंता मत कीजिए, साहब." तेवटिया ने लिफाफा आगे बढ़ाया. "यह इस महीने का. और आपके भतीजे की नौकरी लग गई है."

शर्मा ने लिफाफा ड्रॉयर में रख लिया. "पर सफाई का ध्यान रखना. चुनाव दूर नहीं."

रामलाल और साथियों की हालत खराब हो रही थी. एक दिन, जब तेवटिया ने डाँटा, तो रामलाल ने हिम्मत करके कहा, "साहब, पूरा काम करेंगे, पर पूरी मजदूरी चाहिए."

"कल से तेरी जरूरत नहीं." तेवटिया बोला.

उस शाम, बीस मजदूर नगर निगम के सामने धरने पर बैठ गए. मोहन ने रामलाल से कहा, "मेरे बाप का ऑपरेशन टल गया इस कम मजदूरी में."

"मेरी बेटी की दवाई..." रामलाल ने जवाब दिया.

स्थानीय अखबार ने खबर छापी: "पवित्र नगर में अशुद्ध व्यवहार."

मोहन ने सुझाव दिया, "चलो स्थायी कर्मचारियों की यूनियन से मिलते हैं."

नगर निगम कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह ने उनकी बात सुनकर कहा, "तुम ठेकेदार के गुलाम बन गए हो. हमें एक साथ लड़ना होगा."

जब तेवटिया ने माँगें नहीं मानीं, तो सभी ने हड़ताल कर दी.

तीन दिन में मदुरा की स्थिति भयावह हो गई. जैसे पवित्र नगर ने अपनी पवित्रता उतार फेंकी हो.

नागरिक समूहों की आपात बैठक में समाजसेवी डॉ. मेहता, जो पहले भी श्रमिक हकों के लिए लड़ चुके थे, बोले, "यह मजदूरों के शोषण और नागरिकों से लगातार किए जा रहे छल की समस्या है. वे मजदूरों के शोषण के साथ साथ हम नागरिकों से जुटाए गए कोष का भी दुरुपयोग कर रहे हैं. हमें एकजुट होना होगा."

नगर निगम बोर्ड की आपात बैठक में, जब महापौर ने तेवटिया का ठेका रद्द करने का प्रस्ताव रखा, तो पार्षद शर्मा भड़क गए.

तभी सुरेंद्र सिंह ने कक्ष में प्रवेश किया, हाथ में दस्तावेज.

"महोदय, यह रजिस्टर है जिसमें कमीशन का हिसाब है: आयुक्त साहब को पचास हज़ार, डॉ. चौधरी को तीस हज़ार, पार्षदों को दस-दस हज़ार."

कमरा सन्नाटे में डूब गया.

अगले दिन, कलेक्ट्रेट के सामने पांच हज़ार नागरिक और सभी मजदूर इकट्ठे हुए. रामलाल ने माइक पकड़ा.

"हम मदुरा को स्वच्छ रखना चाहते हैं. पर हमें इंसान की तरह जीने का अधिकार चाहिए."

डॉ. मेहता बोले, "यह संघर्ष हर मदुरावासी का है."

समाचार राजधानी तक पहुँचा. मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश आया: नगर निगम बोर्ड भंग, तेवटिया का ठेका रद्द, आयुक्त और स्वास्थ्य अधिकारी निलंबित, नई निविदा प्रक्रिया शुरु होगी तब तक मजदूरों को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन पर नगर निगम काम कराएगा.

मजदूरों ने विजय जलूस निकाला. जलूस के बाद सुरेंद्र सिंह ने मजदूरों से बात की, "साथियों, आज हमने एक लड़ाई जीती है. पर असली लड़ाई अब शुरू होगी. नया ठेकेदार आएगा, वह भी शोषण से नहीं चूकेगा."

रामलाल ने पूछा, "तो फिर हमने क्या जीता?"

"हमने एकता सीखी," सुरेंद्र ने कहा. "और याद रहे, जब मजदूर और नागरिक एक साथ खड़े हों, तो एकता से ज्यादा मजबूत कुछ नहीं होता. यह एकता... यही इस संघर्ष की असली कमाई है."

रामलाल ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसकी बेटी अब ठीक थी - न सिर्फ बुखार से, बल्कि उस डर से भी जो तेवटिया की आवाज़ में था. और आज, उसे लगा कि नगर की स्वच्छता का रास्ता न केवल गलियों की सफाई से, बल्कि इस एकता से भी गुज़रता है.

रविवार, 28 दिसंबर 2025

घिरनियाँ

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

तीन साल की कोचिंग, दो बार ड्रॉप, और अंततः आईआईटी दिल्ली का ऐतिहासिक गेट. कौशिक के कदम भारी थे – न सिर्फ बैग के बोझ से, बल्कि उस अदृश्य उम्मीद से भी जो पूरे मोहल्ले, स्कूल और कोचिंग के दोस्तों ने उस पर लाद दी थी. उम्र बीस साल, मन पचास साल का अनुभवी, और डर सत्रह साल के नए बैचमेट जैसा. उसका रूममेट राजीव अभी सत्रह का ही था – गाँव से आया हुआ, चेहरे पर एक निश्चल उत्सुकता, जैसे किसी नई दुनिया को टटोल रहा हो.

पहली मैकेनिकल लैब. प्रोफेसर ने एक सरल गियर सिस्टम टेबल पर रखा. और नए छात्रों से पूछा, “बताओ, यह कैसे काम करता है?”

कौशिक की नज़रें तुरंत ब्लैकबोर्ड पर टिक गईं. उसके दिमाग में फ़ॉर्मूले की लाइनें दौड़ने लगीं – वेलोसिटी रेशियो, टॉर्क ट्रांसमिशन, मेकेनिकल एडवांटेज… सब कुछ याद था, सब याद था. उसने सूत्र लिखने के लिए कलम उठाई.

तभी राजीव ने आगे बढ़कर गियर के एक पहिये को हल्के से छुआ. फिर घूम कर मुस्कराया. “सर, यह तो हमारे गाँव के कुएँ की घिरनी जैसा है. वहाँ कुएँ की जगत पर एक बड़ी घिरनी होती है जो कुएँ की ओर झुकी होती है, जिस पर रस्सी चलती है. जब हम रस्सी के एक सिरे को खींचते हैं, तो दूसरे सिरे पर बँधी बाल्टी, ऊपर आती है. यह गियर भी वैसा ही है – एक पहिया घूमता है, तो दूसरा उसकी गति और दिशा के हिसाब से चलता है. बस यहाँ लकड़ी की घिरनी की जगह धातु के पहिये पर दाँत हैं, जो दूसरे दाँत वाले पहिए को गति देते हैं.”

प्रोफेसर की आँखों में एक चमक आ गई. “ठीक कहा, राजीव. तुमने सिद्धांत को छूकर भौतिक रूप से महसूस किया. तुम्हारे लिए सिद्धांत केवल विचार नहीं रहा, बल्कि वह भौतिक यथार्थ से निकला. सारे विचार ऐसे ही भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं.”

कौशिक अवाक रह गया. उसने सोचा था कि उसके पास तीन साल का अतिरिक्त ज्ञान है, पर राजीव के पास तो सत्रह साल का वास्तविक जीवन का अनुभव था – वास्तविक दुनिया का अनुभव, जहाँ सिद्धांत सिर्फ किताबों में नहीं होते, खेतों, कुओं और घिरनियों से जन्म लेते हैं.

शाम को कमरे में, कौशिक ने पूछा, “तुमने इतनी स्पष्ट तुलना कैसे की? क्या तुमने कोई खास किताब पढ़ी है?”

राजीव ने अपना साधारण सा सूटकेस खोला. उसमें कोई किताब नहीं थी, बस कुछ पुराने टूल्स थे – एक छोटा सा स्क्रूड्राइवर, दो-तीन तरह के प्लायर्स, और एक लोहे का छल्ला. “मेरे पिता कारीगर हैं, सर. मैं बचपन से मशीनों के बीच बड़ा हुआ हूँ. मैंने पढ़ा ही नहीं, पर खुद देखा है. और जो देखा, उस पर विश्वास किया.”

वह सोचने लगा, जब भी खाली समय में वह घर के बाहर जाना चाहता तभी उसके मम्मी-पापा उससे कहते –फालतू समय मत व्यर्थ करो. तुम्हें आईआईटियन बनना है. समय व्यर्थ करने के बजाय किताबों में मन लगाओ. तुम्हारा अध्ययन ही तुम्हें वैसा बना सकता है. अब उसकी समझ में आया कि मम्मी-पापा पूरी तरह सही नहीं थे. अध्ययन केवल किताबों और सिद्धान्तों में नहीं होता बल्कि वह व्यवहारिक दुनिया से प्रत्यक्ष होता है.

अगले दिन, कौशिक अकेला लैब में लौटा. उसने प्रोफेसर से वही गियर सिस्टम माँगा. इस बार उसने कॉपी-पेन नहीं उठाया. उसने धीरे से गियर के दाँतों को अपनी उँगलियों से छुआ. एक पहिये को घुमाया, दूसरा अपने आप चल पड़ा.

उसकी आँखों के सामने कोचिंग के वो बोर्ड नहीं, बल्कि राजीव के गाँव का कुआँ घूम गया – रस्सी, घिरनी, पानी की बाल्टी, और एक साधारण सिद्धांत जो पीढ़ियों से चला आ रहा था.

प्रोफेसर ने पूछा, “क्या तुम्हें अब समझ आया?”

कौशिक ने सिर उठाया. “नहीं सर… अभी महसूस किया है.”

...और उस पल कौशिक ने जाना कि शिक्षा सिर्फ परीक्षा पास करने का रास्ता नहीं है – यह उस रास्ते पर चलने का साहस है जहाँ किताबें और प्रत्यक्ष ज्ञान साथ जलते हैं. और सच्ची समझ की शुरुआत होती है. उसने पहली बार महसूस किया कि ज्ञान की सब से बड़ी घिरनी – विचार और अनुभव का संगम – अब घूम चुकी थी.

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

कच्ची ईंटें

'लघुकथा'

- दिनेशराय द्विवेदी
सूरज के उगने से पहले ही रामलाल के हाथ चिपचिपी मिट्टी में डूबे थे. हर ईंट को साँचे में ढालते हुए उसकी उँगलियों के छाले पुराने पड़ चुके थे, पर मन अब भी कोमल था. एक ईंट रखते हुए अचानक मुन्नी का चेहरा आँखों में तैर गया—कल ही उसने टूटी स्लेट पर कोयले से लिखा था, “बाबूजी, देख लेना, एक दिन मैं भी बड़ी मास्टरनी बनूँगी.”

उसका सपना रामलाल की रगों में खून बनकर दौड़ता, तभी भट्ठा मालिक की आवाज़ कोड़े सी बरसी -
“ऐ रामलाल! हाथ चला, दिमाग नहीं. कल भट्ठा लगाना है.”

रामलाल ने गर्दन झुका ली. ज़बान खोलने की कीमत मज़दूरी कटने से चुकानी पड़ती थी.

एक तपती दोपहरी में अचानक धड़ाम की आवाज़ हुई. ईंटों की कच्ची दीवार ढह गई थी, और रामलाल उसके नीचे दबा था. उसे बाहर निकाला गया तो पैर लहूलुहान था. मालिक ने आकर घड़ी देखी और चिल्लाया-
“मरा तो नहीं! काम रुकना नहीं चाहिए.”

उस रात रामलाल की झुग्गी में दर्द से ज्यादा एक दबी हुई आग धधक रही थी. डॉक्टर ने प्लास्टर चढ़ाया था और आराम करने को कहा था. पर जब मुन्नी ने पूछा, “बाबूजी, फिर स्कूल कब जाऊँगी?” तो रामलाल को लगा जैसे उसकी चुप्पी ही उस स्लेट को हमेशा के लिए तोड़ देगी.

देर रात, जब भट्ठे का धुआँ आसमान को काला कर रहा था, रामलाल लंगड़ाता हुआ सुक्खू, गफूर और चंदर के पास पहुँचा.

“मित्रो,” उसकी आवाज़ में दर्द से ज्यादा आग थी, “आज मेरा पैर दबा, कल किसी का सपना दबेगा. क्या हमारे बच्चे भी इसी भट्ठे में ईंट बनकर पकेंगे?”

सुक्खू डरा हुआ था, “बोलेंगे तो भूखे मरेंगे.”

रामलाल की आँखों में बिजली कौंधी, “साथ बोलेंगे तो मालिक का गुरूर मरेगा. ये ईंटें हमारे पसीने से पकती हैं. हमें जीने लायक मज़दूरी चाहिए.”

त हवा से फैली. अगले कई दिनों तक, रामलाल के पैर से प्लास्टर कटने तक, अंधेरी रातों में मजदूर उसकी झोंपड़ी में जुटते रहे. उन्हें समझ आने लगा—उनकी आपबीती एक ही दास्तान है.

जिस दिन रामलाल काम पर लौटा, उस रात उसने कोयले से एक फटे बोरे पर लिखा: 'मजदूर यूनियन'. अगली शाम, काम खत्म होते ही सभी मजदूर शिव मंदिर के लॉन में इकट्ठे हुए. रामलाल ने कहा, “हम एक होकर लड़ेंगे. पहला कदम—यूनियन बनाएँगे. जो शामिल नहीं होना चाहते, वे हाथ ऊपर उठाएँ.”

चारों तरफ सन्नाटा छा गया. केवल भट्ठे की चिमनी से उठता काला धुआँ हवा में लहरा रहा था, मानो स्वयं आकाश सुन रहा हो. एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा.

रामलाल की आवाज़ गूँजी, “इंकलाब जिन्दाबाद!”

नारे से हवा काँप उठी. और उसी क्षण मुन्नी ने, जो एक कोने में खड़ी सब देख रही थी, अपनी टूटी स्लेट पर फिर से कोयले से कुछ लिखना शुरू किया—शायद अपना नाम, शायद एक नई शुरुआत.

भट्ठे से उठता धुआँ अब केवल कालिख नहीं, एक संकल्प बनकर फैल रहा था. कच्ची ईंटें अब सिर्फ दीवारें नहीं, एक नई नींव की पहली परत थीं.

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

बेनकाब उजाले

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
महानगर की उमस भरी नसों में आज एक अजीब सी बेचैनी थी। एक तरफ कई सौ एकड़ में फैला वह महलनुमा आवास था, जो आज पूरी दुनिया की चकाचौंध को खुद में समेटे हुए था। अरबपति के बेटे की शादी थी। सड़कों पर गाड़ियों का हुजूम नहीं, बल्कि सत्ता और संपत्ति का प्रदर्शन रेंग रहा था।

महल के भीतर बने आधुनिक ऑडिटोरियम में संगीत की थाप तेज हुई। नर्तकियां मंच पर थीं। दर्शक दीर्घा में देश के सबसे रसूखदार चेहरे बैठे थे। जैसे-जैसे नर्तकियों के बदन से कपड़े कम हो रहे थे, हॉल में तालियों का शोर और सिगार का धुआँ घना होता जा रहा था। जब मुख्य नर्तकी के साथ केवल उसकी दो सहायिकाएँ रह गईं, तो एक रईस ने जाम छलकाते हुए कहा, "यही तो असली विकास है, जहाँ मर्यादा की बेड़ियाँ टूट रही हैं।"


उसी जगमगाते महल की ऊँची दीवारों के साये में 'नील गगन' झुग्गी बस्ती थी, जहाँ नाम के उलट आसमान भी काला और धुएँ भरा था।

श्यामू रिक्शा चालक अपनी फटी हुई बनियान से पसीना पोंछते हुए बैठा था। उसका छोटा बेटा सुबक रहा था, "पापा, वहाँ से हलवे की खुशबू आ रही है। क्या हम जा सकते हैं?"

श्यामू की पत्नी राधिका ने पास पड़े खाली मटके को पटकते हुए कहा, "वहाँ जाने की कीमत हमारी जान से ज्यादा है बेटा। वहाँ पहरे नहीं, लोहे की दीवारें हैं। सुना है आज पी.एम. साहब भी आए हैं आशीर्वाद देने। हमारी भूख उनके कैमरों के फ्लैश में कहीं खो गई है।"


ऑडिटोरियम में अब केवल मुख्य नर्तकी बची थी। रोशनी मद्धम हुई और उसके बदन से एक और वस्त्र सरक गया।

"शानदार!" एक अफसर ने फुसफुसाया। तभी कोने में खड़े एक पत्रकार ने अपनी डायरी में लिखा— 'उतरते हुए वस्त्र केवल नग्नता नहीं, इस लोकतंत्र की उतरती हुई खाल हैं। व्यवस्था आज स्टेज पर नंगी नाच रही है और रक्षक तालियाँ बजा रहे हैं।'

अचानक, आसमान में एक जोरदार धमाका हुआ। आतिशबाजी का एक बड़ा गोला फटा और उसकी रंगीन रोशनी ने झुग्गियों के अंधेरे को एक पल के लिए चीर दिया।

श्यामू चौंक कर खड़ा हो गया। उसे लगा जैसे आसमान से आग के गोले गिर रहे हों। उसने गुस्से में चिल्लाकर कहा, "देख राधिका! ये रोशनी नहीं है। ये हमारी बेबसी का जश्न है। वो आसमान में बारूद नहीं, हमारे हिस्से की रोटियाँ जला रहे हैं।"


मंच पर अब अंतिम दृश्य था। मुख्य नर्तकी ने अपना अंतिम वस्त्र भी त्याग दिया। संगीत रुक गया, रोशनी मद्धम होकर शून्य हो गई। मदहोश दर्शकों के गले से एक सामूहिक चीख निकली—उत्साह की या हवस की, यह तय करना मुश्किल था।

तभी पी.एम. की आवाज गूँजी, "आज दुनिया के सबसे अमीर लोगों में हमारा नाम है। यह नया भारत है, यह नग्न सत्य है!"

पत्रकार ने अपनी कलम बंद की और बुदबुदाया, "हाँ, नग्न और बेनकाब। सत्य भी और सत्ता भी।"


झुग्गी में अंधेरा फिर लौट आया था। बिजली का बिल न भर पाने की वजह से कटा कनेक्शन अब एक स्थायी सन्नाटा बन चुका था।

बच्चा फिर रोया, "पापा, दूध..."

श्यामू ने आतिशबाजी से चमकते उस महल की ओर देखा और मुट्ठियाँ भींच लीं। उसने अपने पास पड़े खाली पीपे को जोर से लात मारी। आवाज़ गूँजी और बस्ती के दूसरे घरों से भी सिसकियों की जगह अब गुस्से की सुगबुगाहट आने लगी।

"हमें तुम्हारी ये झूठी रोशनी नहीं चाहिए साहब," बस्ती के कोने से एक बुजुर्ग की आवाज आई, "हमें तो बस हाथ को काम और पेट को रोटी चाहिए।"

आसमान में आखिरी पटाखा फटा और उसकी राख धीरे से श्यामू के खाली हाथ पर आकर गिरी। वह रोशनी नहीं, ठंडी पड़ चुकी एक चिंगारी थी।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

उम्मीद

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

मॉल रोशनियों से नहाया हुआ था. लाल-सुनहरी गेंदें और टिमटिमाते सितारे हर किसी को अपनी ओर खींच रहे थे. बाहर लॉन में हजारों बल्बों से सजा क्रिसमस ट्री किसी सजीली दुल्हन की तरह मुस्करा रहा था. सड़क पार फुटपाथ पर राघव सुबह से अपने ठेले पर बच्चों के लिए सांताक्लॉज की लाल ड्रेसें बेच रहा था. उसकी अधिकांश ड्रेसें बिक चुकी थीं. बस चार-पाँच बची थीं. वह सोच रहा था कि ये भी बिक जाएँ तो सुकून से घर जाए; दो ड्रेसें तो वह अपने बच्चों, श्याम और सरिता के लिए ले ही जाएगा.

तभी एक स्कूटर वाला आकर रुका और ड्रेसें देखने लगा. राघव उम्मीद से बोला, “देख क्या रहे हैं बाबूजी, ले लीजिए. बस यही पाँच-छह बची हैं, आधी दर पर दे दूंगा.”

राघव आगे कुछ बोल पाता, तभी एक आटो रिक्शा उसके सामने आकर धीमा हुआ और ड्राइवर चिल्लाया— “सामान समेटो और भागो राघव! गुंडों की फौज आ रही है!”

राघव ने मुड़कर देखा, पंद्रह-बीस लोगों का हुजूम लाठी-डंडे लिए चीखता-चिल्लाता चला आ रहा था. ये वही लोग थे जो अक्सर त्यौहारों का उल्लास बिगाड़ने को ही अपना धर्म समझते थे. राघव ने फुर्ती से सांताक्लॉज की ड्रेसें चादर में लपेटकर गठरी बाँधी और ठेले को गली में धकेल दिया. स्तब्ध खड़ा स्कूटर वाला भी अपनी गाड़ी स्टार्ट कर राघव के पीछे उसी गली में घुस गया.

गली के सुरक्षित कोने से उन्होंने देखा—भीड़ मॉल में घुस चुकी थी. उन्होंने सजावटी ट्री को पीट-पीटकर गिरा दिया और उसमें आग लगा दी. गार्ड्स, जो सांता की ड्रेस में थे, उनके कपड़े फाड़ दिए गए. दस मिनट के तांडव में मॉल के शीशे चकनाचूर हो गए. कुछ लोग हाथों में कीमती सामान दबाए बाहर निकले और शोर मचाते हुए आगे बढ़ गए.
सन्नाटा छाने पर ग्राहक ने पूछा, “ये ड्रेसें कितने में दे रहे हो?” राघव की आवाज काँप रही थी, “सौ की एक है बाबूजी, आप जो दे दें. अब बस घर जाना चाहता हूँ.” “सौ में दो दोगे? मेरे पास पैसे कम हैं, बाकी से बच्चों के लिए कुछ मीठा लेना है,” ग्राहक ने मोल भाव किया. राघव ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “ले जाइए बाबूजी, कम से कम आपके बच्चे तो खुश होंगे.”

राघव ने नोट जेब में रखा और खाली सड़क को देखा. ग्राहक बोला, “मॉल में बहुत नुकसान कर गए ये लोग.” राघव ने लंबी सांस ली, “ये हर त्यौहार पर यही करते हैं. पुलिस भी सब बरबाद होने के बाद जमीन पर लाठियाँ बजाने आती है.”

राघव ठेला लुढ़काते हुए अपनी बस्ती की ओर चला, जो चर्च के पीछे नाले के किनारे थी. चर्च के पास पहुँचते ही उसके पैर ठिठक गए. तीन दिन से जगमगाती रोशनियाँ बुझ चुकी थीं. चर्च के एक कोने से धुआँ उठ रहा था. पता चला कि भीड़ ने पादरी जॉन साहब पर हमला किया, उनका सिर फट गया है और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है. राघव की रूह काँप उठी— "क्या ईश्वर इतना कमजोर है कि उसे बचाने के लिए खुशियों का कत्ल करना जरूरी है?"

बस्ती पहुँचा तो देखा, अनीता की झुग्गी राख के ढेर में बदल चुकी थी. अनीता एक पुराने बक्से पर बैठी शून्य में ताक रही थी. उसका पति और बेटा पहले ही एक हादसे में गुजर चुके थे. पादरी  जॉन साहब की मदद से वह फिर से खड़ी हो सकी। उनकी सहृदयता को देख उसने ईसाई धर्म अपनाया था, और आज शायद इसी की कीमत उसने अपना आशियाना खोकर चुकाई थी. सलीम उसके पास खड़ा उसे ढाढ़स बँधा रहा था.

सलीम ने राघव को देखते ही बुझी हुई आवाज में कहा, "वाह! धर्म बच गया! किसी का सिर झुकाकर, किसी की छत छीनकर और किसी के दिल में नफरत भरकर... उन्होंने अपने भगवानों को खुश कर दिया." सलीम की आँखों में आक्रोश से ज्यादा शर्मिंदगी थी.

राघव ने आगे बढ़कर अनीता के सिर पर हाथ रखा और पूरी दृढ़ता से बोला, “अनीता बहन! घर लकड़ी और ईंटों का था, जो टूट गया. पर हम जो साथ खड़े हैं, वह 'विश्वास' है, जिसे कोई नहीं तोड़ सकता. हम सिर्फ ईंटें नहीं जोड़ेंगे, हम टूटे हुए भरोसे को भी जोड़ेंगे. अदालत से लेकर सड़क तक, तुम अकेली नहीं हो. यह देश नफरत की आग में जलने के लिए नहीं बना है.”

अनीता ने सिर उठाकर दोनों भाइयों को देखा और खड़ी होकर बोली, “उन्होंने नफरत को धर्म मान लिया है, पर तुम दोनों ने प्यार का धर्म नहीं छोड़ा. वे कितना भी तोड़ें, मैं अपना विश्वास नहीं खोऊँगी.”

सलीम और राघव ने अनीता को सहारा दिया. जलते हुए चर्च की लपटें अब शांत हो रही थीं, लेकिन उस ढहे हुए घर के पास तीन दिलों की धड़कनें एक सुर में थीं. वहां न कोई हिंदू था, न मुसलमान, न ईसाई—वहां सिर्फ तीन 'इंसान' थे, जो एक नए सवेरे की नींव रख रहे थे.