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मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बेटा

लघुकथा : दिनेशराय द्विवेदी

आठ साल का आयुष अपनी बहन शगुन की पीठ पर सवार होकर घोड़ा-घोड़ा खेल रहा था. शगुन दस साल की थी, पर आयुष के मुकाबले हड्डियों में हल्की-सी थी. फिर भी वह अपने भाई को पीठ पर लादकर पूरे कमरे का चक्कर लगा रही थी, और दोनों के खिलखिलाहट से कमरा गूंज रहा था.

"घोड़ा रुक! अब मैं राजा बनूंगा!" आयुष ने कहा और शगुन की पीठ से कूदकर बिस्तर पर चढ़ गया. उसने चादर को कंधों पर लपेटा और माथे पर कागज़ का ताज रख लिया. शगुन ने अपनी चुनी हुई गुड़िया को गोद में उठा ली. वह रानी बनी.

तभी दरवाज़ा खुला और उनके चाचा अनिल अंदर आए. उनकी नज़र सबसे पहले आयुष पर पड़ी, जो चादर ओढ़े खड़ा था, फिर शगुन पर जो गुड़िया को सुला रही थी.


चाचा का चेहरा कड़क हो गया. "आयुष! लड़के चादर नहीं ओढ़ते. लड़के घोड़ा-घोड़ा नहीं खेलते. तुम्हें पढ़ना चाहिए, क्रिकेट खेलना चाहिए."

आयुष स्तब्ध रह गया. "और तुम, शगुन, भाई को पीठ पर लादती हो? लड़कियाँ इतना शोर नहीं करतीं. जाओ, माँ के पास रसोई में मदद करो."

शगुन ने गुड़िया वहीं छोड़ी और बिना एक शब्द कहे कमरे से बाहर चली गई. आयुष ने देखा कि उसकी आँखें नम थीं.

"चाचा, हम तो बस खेल रहे थे," आयुष ने कहा, उसकी आवाज़ में एक कंपन था.

"खेल भी सीखना पड़ता है, बेटा," चाचा ने कहा, "तुम लड़के हो. तुम्हें मज़बूत बनना है. लड़के रोते नहीं, लड़के डरते नहीं. अपनी भावनाओं पर काबू रखो. यही मर्दानगी है."



चाचा के जाने के बाद, आयुष अकेला कमरे में खड़ा रहा. उसने चादर उतारकर बिस्तर पर फेंक दी. फिर उसने शगुन की छोड़ी हुई गुड़िया उठाई.

वह गुड़िया लेकर रसोई में गया. शगुन बर्तन साफ़ कर रही थी, उसकी आँखें अब भी लाल थीं.

"यह लो," आयुष ने गुड़िया बढ़ाते हुए कहा.

शगुन ने गुड़िया ले ली, पर उसने आयुष की आँखों में नहीं देखा.

"चाचा ने कहा लड़के रोते नहीं," आयुष ने कहा, "पर तुम रो सकती हो, है न?"

शगुन ने सिर हिलाया, "लड़कियाँ रो सकती हैं. पर खेल नहीं सकतीं."



अगली सुबह, शगुन ने फिर से अपना खिलौना लेकर आयुष के कमरे में दस्तक दी. "चलो, आज मैं राजा बनूँगी!" वह बोली.

आयुष ने उसे देखा. फिर अचानक उसकी नज़र दरवाज़े पर गई—जहाँ कल चाचा खड़े थे. एक क्षण के लिए, उसके मन में चाचा की आवाज़ गूँज उठी. उसने शगुन की ओर हाथ बढ़ाया, फिर रुक गया.

"नहीं... मुझे पढ़ना है," आयुष ने कहा, और किताबें लेकर बैठ गया.

शगुन कुछ पल वहीं खड़ी रही, फिर धीरे से चली गई. आयुष किताब की ओर देखता रहा, पर अक्षर धुंधले पड़ गए थे.



चार साल बाद, आयुष बारह साल का हो गया.

स्कूल की क्रिकेट टीम के चयन में उसका नाम नहीं आया. वह पूरा दिन मैदान में बैठा रहा, टीम की प्रैक्टिस देखता रहा. घर लौटते हुए, उसकी आँखों में पानी भर आया. गले में एक गाँठ सी बन गई, जो साँस लेने में रुकावट डाल रही थी.

वह बाथरूम में गया और शीशे के सामने खड़ा हो गया. आँखें लाल थीं, गाल गीले हो रहे थे. तभी उसके कानों में अपने चाचा की आवाज गूंजी, साफ़ और कठोर: "लड़के रोते नहीं. अपनी भावनाओं पर काबू रखो. यही मर्दानगी है."

उसने अपने सब ओर देखा, चाचा कहीं नहीं थे. पर कानों में उनकी आवाज गूंज रही थी.

आयुष ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं. नाखून हथेलियों में चुभने लगे. उसने अपना सिर ऊपर उठाया, आँखें फैलाकर ताका जिससे आँसू बहने न पाएँ और एक गहरी, कँपकँपी भरी साँस ली.

फिर उसने नल खोला और ठंडे पानी से अपना चेहरा धोया. पानी और आँसू एक हो गए. जब वह बाहर आया, तो उसके चेहरे पर कोई नमी नहीं थी. केवल एक खालीपन था, जैसे किसी ने उसके भीतर का एक कोना साफ़ कर दिया हो.



उस रात खाने की मेज़ पर शगुन ने पूछा, "टीम में चुन लिए?"

आयुष ने सिर हिलाया, "नहीं. कोई बात नहीं."

उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे कोई समाचार पढ़ रहा हो. शगुन ने उसे देखा, उसकी पीठ एकदम सीधी थी और होंठ जैसे हिले ही न हों. वह कुछ कहना चाहती थी, पर चुप रही. उसे पता था, आयुष अब वह बच्चा नहीं रहा जो गुड़िया वाली बात करता था.

आयुष ने अपनी प्लेट साफ़ की. उस दिन वह रोया नहीं था, और उस दिन के बाद भी वह कभी नहीं रोया.

लड़के रोते नहीं.

और उसने सीख लिया था.

और शगुन समझ गयी थी कि अब वह और आयुष अपने माता पिता के बच्चे होते हुए भी बेटी और बेटे हो गए हैं.

सोमवार, 5 जनवरी 2026

अपनी ही ज़मीन

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी

जब दुर्घटना ने पति को निगल लिया, तो नियति का 'नाम' भी अँधेरे में खो गया. अब वह 'विधवा' थी. उसे एक ऐसा नया संबोधन मिला था जिसकी चुभन उसकी पहचान से ज़्यादा गहरी थी. सात वर्ष के वैवाहिक जीवन ने उसे एक और चुपचाप सहे जाने वाला दर्द दिया था. वह माँ नहीं बन पाई थी. इस 'कमी' ने उसके और सास-ससुर के बीच धीरे-धीरे एक अदृश्य खाई खोद दी थी. अब वह दर्द एक 'दोष' बन गया. "हमारा तो वंश ही बूढ़ गया, अब और न जाने कितने दिन हमारे सिर बनी रहेगी?" सास की यह फुसफुसाहट दीवारों के पार से भी साफ़ सुनाई देती थी.

घर की दीवारों ने उसके बदन पर 'अशुभ', 'बोझ' और 'वंश चलाने में अक्षम' शब्द उकेर दिए. जिस घर को उसने सात सालों तक अपनी साँसों से सींचा था, कानून की किताबें कहतीं कि उसमें उसका कोई हिस्सा नहीं. एक दिन वह अपने पहनने के कपड़े लिए उस आंगन की और चल पड़ी जिस पर उसके असंख्य पद चिन्ह छपे हुए थे.

जहाँ उसने अपनी गुड़िया की शादी रचाई थी, उसी आँगन ने अब उसकी वापसी पर एक लंबी और ठंडी साँस छोड़ी. अब वहाँ हवा में तैरती बचपन की खुशबुओं के बीच एक अदृश्य दीवार थी, जो दिखती नहीं थी, लेकिन महसूस होती थी. माँ का आंचल तो उसके हाथ पीले होने के पहले ही छिन चुका था, पिता की मृत्यु ने भाइयों, दिनेश और महेश के भीतर के लालच को नंगा कर दिया था.

"बहनें विदा हो जाएँ तो घर की दीवारों से उनका हक भी मिट जाता है, नियति." दिनेश ने एक दिन दफ्तर से लौटने के बाद चाय का सिप लेते हुए दो-टूक कह दिया. "और तू तो... जानती ही है, तेरे हिस्से का वारिस भी कोई है नहीं." उसकी आवाज़ में उपहास का एक तीखा स्वर था.

नियति ने शांत भाव से उसे देखा. यह शांति एक तूफान के बाद की शांति थी. उसकी आवाज़ में कोमलता थी, पर लौह जैसी दृढ़ता भी: "भैया, कानून कहता है कि 1956 के पूर्व पिता को उत्तराधिकार में अपने पुरुष पूर्वज से मिली सहदायिक संपत्ति में बेटियों का जन्म से अधिकार है, पिताजी की कोई वसीयत भी नहीं है, इसलिए उनकी स्वअर्जित संपत्ति में भी मेरा हिस्सा बराबर है.

महेश ने चाय का कुछ कप टेबल पर पटकते हुए कहा, "कानून और शास्त्र अलग होते हैं. बड़े शहर के ससुराल से क्या लौटी, ज़बान कैंची की तरह चलने लगी है तुम्हारी. इस सप्ताह में तुम अपनी राह देख लेना, वरना..."

उसने हार नहीं मानी थी. वह चुपचाप कब की शिक्षक की नौकरी के लिए आवेदन कर चुकी थी, साक्षात्कार हो चुका था. बस निर्णय आना शेष था. उसी सप्ताह उसे नौकरी मिल गयी. अगले सप्ताह उसने नगर के निकट ही एक गाँव के स्कूल में शिक्षक का पद संभाल लिया. उसे अपनी लड़ाई लड़ने के लिए संबल मिल गया था.

घर के भीतर छिड़ा युद्ध अब भाभियों की ज़ुबान पर आ गया था. उनके ताने हवाओं में तीर की तरह तैरते थे; "अपना तो वंश ही नहीं चला सकी, अब बाप की संपत्ति हड़पने चली है." नियति के लिए उसके भतीजे-भतीजियाँ मरहम बने. वे बच्चे, जो राजनीति नहीं जानते थे, शाम को छिपकर अपनी बुआ के पास पहुँच जाते.

इस संघर्ष में उसका सहारा बना आर्यन, उसके वकील का सहायक. एक रोज़ कोर्ट की कैंटीन में, भावनाओं के उफान में, नियति ने अपने मन की बात कहनी चाही, तो आर्यन ने कोमलता से उसे रोक दिया.

"नियति," आर्यन ने पूरी गरिमा के साथ कहा, "मैं तुम्हारे संघर्ष का हिस्सा हूँ, लेकिन तुम मेरी क्लाइंट हो. आज अगर हम किसी रिश्ते में बँधते हैं, एक तो यह मेरे पेशे की शुचिता के विपरीत होगा. तुम्हारे भाइयों को भी तुम्हारी शुचिता पर कीचड़ उछालने का अवसर मिलेगा. हम इंतज़ार करेंगे. जिस दिन तुम यह मुकदमा जीतोगी, मैं तुम्हारा वकील न रहूंगा, उस दिन मैं एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह तुम्हारा हाथ चाहूंगा."

मुकदमा लंबा चला. भाइयों ने पिता की कोई वसीयत ले आए थे. उसी के आधार पर उनके वकील ने उनका पक्ष प्रस्तुत किया. "माननीय, परिवार में कोई सहदायिक संपत्ति नहीं है. परिवार की पुश्तैनी जमीन कब की बिक चुकी थी. जो हैं वे सब पिता की स्वअर्जित संपत्तियाँ हैंपिता की वसीयत रिकार्ड पर मौजूद है जिसमें पिता ने अपनी बेटी का उल्लेख तक नहीं किया है. यदि इसका कोई हिस्सा है तो इसके पति के परिवार की संपत्तियों में है. यह वहाँ अपना हिस्सा मांगे. इसे अपने पिता की संपत्तियों पर कोई अधिकार नहीं. लिहाजा दावा खारिज किया जाए."

नियति के वकील चट्टान की तरह डटे रहे. अदालत के फैसले ने सदियों पुरानी पितृसत्ता की जड़ें हिला दीं. अदालत ने प्रारंभिक डिक्री पारित कर सहदायिक और पिता की स्वअर्जित संपत्तियों में दोनों भाइयों के समान हिस्सा तय किया और उसके एक तिहाई हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार को मान लिया गया. उसे संपत्तियों का बँटवारा अंतिम होने तक पैतृक घर में सम्मान पूर्वक अबाध निवास करने के उसके अधिकार को स्पष्ट करते हुए. उसके निवास में किसी तरह की बाधा न डालने की हिदायत देने वाली स्थायी निषेधाज्ञा भी जारी की.

अदालत की सीढ़ियों से उतरते हुए नियति ने देखा, दिनेश और महेश हार के बोझ से दबे तेज़ कदमों से निकल गए. वे पीठ पर अब भी नफरत लादे हुए थे.

पीछे खड़े आर्यन के चेहरे पर मुस्कराहट थी. नियति ने उसकी ओर देखा, और फिर उस धूल भरी सड़क की ओर जो उसके स्कूल को जाती थी. उसने अपना हिस्सा जीत लिया था, पर वह जानती थी कि असली लड़ाई तो अब शुरू होगी.

नियति ने अपना बैग सँभाला. हवा में घुली भाइयों की नफरत अब उसे प्रभावित नहीं कर रही थी. उसकी साँसों में आज़ादी तैर रही थी. उसने न केवल सिर्फ़ कानूनी लड़ाई जीती थी, बल्कि उस सामाजिक कलंक को भी अपने शरीर से अलग कर दिया था जो एक स्त्री को उसके शरीर के आधार पर परिभाषित करता है. आँगन अब भी वही था, पर उस पर उसके हिस्से के अधिकार की मुहर लग चुकी थी. वह उसकी जमीन ही जमीन थी.

रविवार, 4 जनवरी 2026

नई जनता बना लेंगे

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी
कंप्यूटर मॉनिटर स्क्रीन पर नीली रोशनी फैली हुई थी. रिकार्डो की उंगलियाँ कीबोर्ड पर एक लयबद्ध ताल बजा रही थीं. उसके सामने, कोड की लाइनें एक जीवित प्राणी की तरह सरक रही थीं—“जीरो, इफ-एल्स लूप्स, न्यूरल नेटवर्क आर्किटेक्चर”. यह कोई साधारण प्रोजेक्ट नहीं था. इस प्रोजेक्ट में थिरेनियन सागर के मेडीसी द्वीप की सरकार अपने नागरिकों की सूची में से सरकार समर्थकों, सरकार विरोधियों और तटस्थ व्यक्तियों की पृथक सूचियाँ बनवा रही थी. फ़ाइल का नाम था: “ऑपरेशन_क्लीनस्लेट.पीवाई”.

"तुम्हारा एल्गोरिदम 'शोर' को 'सिग्नल' से अलग करने में कितना कारगर है, रिकार्डो?" एलेसेंड्रा की आवाज़ ठंडी और स्टील के ब्लेड सी तीखी थी.

"99.8 प्रतिशत," रिकार्डो ने बिना स्क्रीन से नज़र हटाए जवाब दिया. "यह सोशल मीडिया पोस्ट, लाइब्रेरी इश्यू रिकॉर्ड, ऑनलाइन गतिविधि और एसोसिएशन मैपिंग को क्रॉस-रेफरेंस करता है. अवांछित विचार पैटर्न को पहचानता है."

"अवांछित नहीं, रिकार्डो. जोखिम भरा," एलेसेंड्रा ने सुधारा. "हम एक स्वस्थ राजनीतिक पारिस्थितिकी तंत्र बना रहे हैं. गेहूँ में से कंकड़ अलग कर रहे हैं."

रिकार्डो ने सिर हिलाया. उसने खुद को यही समझाया था—यह सिर्फ़ डेटा था. बस आँकड़े. वे किसी को नुकसान नहीं पहुँचा सकती थीं.


पहली पायलट रन रिपोर्ट सुबह पाँच बजे आई. रिकार्डो ने कॉफ़ी का घूँट लिया और पीडीएफ़ खोला. पहले पन्ने पर एक ग्राफ़ था: "जोखिम स्कोर बनाम जनसंख्या घनत्व." वह आगे बढ़ा. नामों की सूची शुरू हुई.

नाम #127: एंटोनियो रोस्सी. कारण: 'क्रान्ति' शब्द का अत्यधिक उपयोग.

नाम #128: सोफिया कोंटे. कारण: विरोध प्रदर्शनों की फ़ोटो लाइक करना.

फिर नाम #129 आया.

एनरिको रोस्सी. आयु: 64. जोखिम स्कोर: 8.7/10.

रिकार्डो का दिल एक धड़कन के लिए रुक सा गया. उसकी सांसें अटक गईं.

कारण-

1. सार्वजनिक पुस्तकालय में साप्ताहिक उपस्थिति 95% (सामान्य से 400% अधिक).
2. पठन सामग्री: इतिहास, राजनीतिक सिद्धांत, नाटक. उप-श्रेणी: व्यंग्य.
3. स्थानीय नगर परिषद बैठकों में 12 बार प्रश्न पूछे गए.
4. ऑनलाइन खोज इतिहास में "जनतंत्र में जवाबदेही" शब्द समूह शामिल.

रिकार्डो ने माउस को स्क्रोल किया. स्क्रीन धुंधली हो गई. यह उसके पिता थे. इतिहास के सेवानिवृत्त प्रोफेसर. वह व्यक्ति जिसने उसे पढ़ना सिखाया था, जो उसे हर रविवार को पुस्तकालय ले जाता था.

उस रात रिकार्डो बिना बताए पिता के घर पहुँचा. ड्राइंग रूम में पुराने कागज़ और किताबों की गंध थी. एनरिको चश्मे के ऊपर से देखते हुए एक किताब पढ़ रहे थे.

"बेटा, इतनी रात को? कुछ हुआ तो नहीं?"

"नहीं पापा... बस... आप से मिलने आ गया."

रिकार्डो की नज़र डेस्क पर पड़ी एक फटी हुई, पीली पड़ चुकी किताब पर गई. —"जनता पागल हो गयी है — शिवराम."

"आप यह क्या पढ़ रहे हैं?" रिकार्डो ने पूछा, आवाज़ में एक कंपकंपी.

"अरे, एक पुराना भारतीय नाटक है. पचास साल पहले लिखा गया. लेखक का नाम है शिवराम, देख." पिता ने किताब खोली. एक पन्ना मुड़ा हुआ था, एक पैराग्राफ पर पेंसिल से गहरी रेखाएँ खिंची हुई थीं.

रिकार्डो ने पढ़ा:

"सरकार : मर जाने दो... हम और नई जनता बना लेंगे.

पूंजीपति: हाँ हम नई जनता बना लेंगे, और जनता चुन लेंगे..."

उसके शरीर में बिजली-सी दौड़ गई. यह वही शब्द थे जो एलेसेंड्रा ने इस्तेमाल किए थे—"नई जनता". पचास साल पहले एक भारतीय नाटककार ने भविष्यवाणी कर दी थी जो आज हकीकत बन रही थी.

"यह... यह क्या है, पापा?"

"इतिहास, बेटा. या शायद भविष्य का आईना. जब सत्ता जनता से डरने लगे, तो वह उसे बदलने की कोशिश करती है. तुम्हारा काम कैसा चल रहा है? तुम्हारा वह 'स्पेशल प्रोजेक्ट'?"

रिकार्डो ने जवाब नहीं दिया. वह केवल उस पन्ने को देखता रहा, जहाँ शब्द उसकी आँखों के सामने नाच रहे थे.

अगले दिन ऑफिस में, एलेसेंड्रा ने उसे कॉन्फ्रेंस रूम में बुलाया.

"रिपोर्ट देखी? कल तक फाइनल लिस्ट चाहिए. प्रोडक्शन में डालनी है."

"एलेसेंड्रा... इस लिस्ट में... मेरे पिता का नाम है."

एलेसेंड्रा की आँखों में कोई हलचल नहीं हुई. "तो क्या हुआ? एल्गोरिदम तटस्थ है. इमोशनल बायस मत डालो."

"पर वे कोई खतरा नहीं हैं! वे सिर्फ एक शिक्षक हैं जो पढ़ना पसंद करते हैं!"

"पढ़ना खतरनाक हो सकता है, रिकार्डो. विचार संक्रामक होते हैं. अब तुम यह तय करो—क्या तुम इस प्रोजेक्ट के लिए कमिटेड हो या नहीं? तुम्हारा कोड, या तुम्हारी भावनाएँ?"

उस पल, रिकार्डो को पिता की किताब वाला पन्ना याद आया. "हम नई जनता बना लेंगे." वह एक मशीन नहीं था. वह एक इंसान था.

"मैं इसे ठीक कर दूँगा," उसने धीरे से कहा.

रात के दो बजे थे. रिकार्डो अकेला ऑफिस में था. स्क्रीन पर उसका कोड खुला हुआ था. उसने एक नई फ़ाइल खोली—"क्लीनस्लेट_फिक्स.पीवाई".

उसने एक फ़ंक्शन लिखा. नाम दिया: इनोसेंट_अंडर_स्कोर. यह फ़ंक्शन, मास्टर एल्गोरिदम चलाने से पहले, डेटाबेस में हर नाम के साथ एक छोटा, अदृश्य बिट जोड़ देगा. यह बिट, रिपोर्ट जनरेट होते समय, डेटा को ऐसे मिला देगा कि हर व्यक्ति का 'जोखिम स्कोर' एक सामान्य सीमा में दिखेगा. गेहूँ और कंकड़ का अंतर धुंधला हो जाएगा. पूरी फसल एक जैसी दिखेगी.

यह एक वायरस था, लेकिन नैतिकता का. एक डिजिटल विद्रोह.

उसने 'रन' बटन दबाया. प्रोग्राम चलने लगा. "सिलेक्टिंग न्यू पीपल... प्रक्रिया रद्द." फिर एक एरर मैसेज: "दूषित डेटा. कोई स्पष्ट पैटर्न नहीं."

रिकार्डो ने एक लंबी सांस ली. उसने सारा कोड, सारी फाइलें एक यूएसबी ड्राइव पर कॉपी कीं. फिर अपनी निजी मेल पर एक मेल ड्राफ्ट तैयार किया, जिसमें सभी फाइलें अटैच थीं.

रिसीवर: कुछ चुनिंदा पत्रकार. विषय: "ऑपरेशन क्लीन स्लेट: कैसे आपका देश आपको चुन रहा है."

सेंड बटन पर उंगली रखने से पहले, उसने अपने फोन से पिता को मैसेज किया: "पापा, आप ठीक कहते थे. कभी-कभी किताबें, कोड से ज्यादा ताकतवर होती हैं."

एक सप्ताह बाद, अखबार की सुर्खियाँ थीं: "बड़ा डाटा स्कैंडल: सरकारी ठेकेदार नागरिकों को 'रिस्क' के आधार पर चिन्हित कर रहा था!"

रिकार्डो अपने पिता के साथ पुस्तकालय में बैठा था. उनके सामने शिवराम का वही नाटक खुला हुआ था.

"तुमने जो किया, वह साहसिक था, बेटा," पिता ने कहा.

"मैंने सिर्फ एक बग ठीक किया, पापा. सिस्टम में नहीं... अपने अंदर के सिस्टम में."

बाहर, सूरज निकल रहा था. लोग सामान्य जीवन जी रहे थे, इस बात से अनजान कि उनके नाम एक डिजिटल सूची से हटा दिए गए हैं. रिकार्डो ने किताब के अंतिम पैराग्राफ को देखा, जहाँ जनता चिल्लाती है:

"मत भूलो जुल्म जब हद से गुजरता है तो मिट जाता है... जनता पागल हो गई है..."

उसने मुस्कुराते हुए पन्ना पलट दिया. असली नई जनता को बनाने की ज़रूरत नहीं थी. उसे बस पुरानी, सच्ची जनता को उसके मूल स्वरूप में रहने देने की ज़रूरत थी. और कभी-कभी, उसकी रक्षा के लिए, एक आदमी को अपने कोड में एक छोटा सा, नेक बग डालना पड़ता है.

शनिवार, 3 जनवरी 2026

रास्ता

 लघुकथा  : दिनेशराय द्विवेदी

अवनि उस रात के बाद कभी नहीं सो पायी. जिस रात डीजल पम्प की चौंधियाती रोशनी में उसकी बहन तारा को विक्रम सिंह के बेटे और उसके दोस्त उसे उठा कर पीछे जंगल में ले गए थे... फिर कुछ घंटों बाद न जाने कैसे वह घिसटते हुए सड़क तक पहुँची थी. पीसीआर वैन ने उसे अस्पताल पहुँचाया था. उस दिन के बाद से तारा की आँखें नाइट बल्ब की मद्धिम रोशनी को एक टक देखा करतीं — जैसे वह रोशनी ही अब उसकी एकमात्र गवाह हो, जो उसके जागते सवालों का जवाब दे सके. देखने वाले को पता नहीं लगता कि वह सो रही है या जाग रही है.

पुलिस दरोगा उसी पर सवाल दाग रहा था, "अच्छी लड़कियाँ शाम ढलने के बाद वहाँ क्यों जाती हैं?" मीडिया ने सुर्खी बनाई: "दोनों पक्षों में समझौते की बातचीत जारी." समाज ने... सिर्फ अपने कपाट बंद कर लिए.

तारा की एक दम चुप थी. उसकी यह चुप्पी अब एक जीवित, साँस लेता ज़ख़्म थी, जिससे हर पल नई पीड़ा रिस रही थी. उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक ऐसा शून्य था जिसने उसका होना ही उससे छीन लिया था. वह अब सिर्फ एक खोल थी, जिसकी आत्मा उसी डीजल पम्प की रोशनी में कहीं छूट गई थी.

पुलिस स्टेशन के सामने का नज़ारा देखकर अवनि और उसके पिता पत्थर हो गए. विक्रम सिंह का बेटा, गले में मालाएँ डाले, मीडिया के कैमरे के लैंस में अपनी आँखें डालकर कह रहा था—"यह मेरे खिलाफ राजनीतिक साजिश है." पीछे खड़े विक्रम सिंह की मुस्कुराहट में जीत का उल्लास सहज दिखाई दे रहा था.

उसी शाम, "शहर का सम्मान बचाना है" के नारे लगते हुए जुलूस निकला रहा था. उसमें वही सब चेहरे थे जो कभी लड़कियों के 'छोटे कपड़ों' पर टिप्पणी करते थे और वेलेंटाइन डे पर जोड़ों को पकड़ कर तंग करते थे. आज वे ही 'शहर के कथित भविष्य' को बचाने के 'महान कार्य' पर निकले थे.

घटना का बस एक गवाह मिला—बूढ़ा मास्टर राजन, जो उस रात सड़क किनारे अपनी साइकिल ठीक करवा रहा था. एकमात्र साहसी आवाज़ जिसने पुलिस को अपराधियों के नाम बताए. पर अदालत की पहली तारीख पर ही वह गायब था. अगले दिन अखबार के एक कोने में खबर थी: "वृद्ध शिक्षक अचानक बीमार हुआ, उसे विशेषज्ञों के पास भेजा गया."

अवनि समझ गई. यह गवाह की बीमारी नहीं थी, उसके लिए एक संदेश था, “वह चुप हो जाए, अपनी लड़ाई को यहीं समेट ले”.

साल दर बीतते गए. तारा की आँखों का खालीपन अब पूरे घर में फैल चुका था. पिता की नौकरी जा चुकी थी—"कंपनी की प्रतिष्ठा का सवाल जो था." माँ का शरीर रोज़ एक नया पीड़ा से पिराने लगा था. और अदालत का कमरा... वहाँ केवल पंखे की घरघराहट और कागज़ों की सरसराहट सुनाई देती थी. यह वह जगह थी जहाँ समय रुक जाता था, जहाँ हर तारीख एक नई कब्र बन जाती थी. एक श्मशान, जहाँ न्याय के शवों का अन्तिम-संस्कार धीमे-धीमे चलता ही रहता था. कभी-कभी अवनि को लगता, वह अपने ही भविष्य की कब्र खोदने आई है.

एक दिन, जमानत पर आजाद हुए आरोपी को अवनि ने एक विशाल राजनीतिक रैली में मंच से भाषण देते देखा. उसकी आवाज़ गूँज रही थी—"मैं युवा शक्ति का नेता हूँ, समाज का नया सवेरा लाऊँगा!" उसके साहस को ऊँचाइयाँ देने को जन-समुद्र गर्जना कर उठा था.

उसी रात, अवनि ने अपनी डायरी लिखना शुरू किया.

पहला पन्ना:

"हम वह समाज हैं जो बेटियों को गर्भ में ही मार दिया करते हैं, और बलात्कारी को गर्भनाल से ही पालते हैं — वे हमारे वंश के वृक्ष की जड़ें हैं, हम उन्हें काट नहीं सकते. हम वह समाज हैं जो धर्म के नाम पर खून तो बहा सकते हैं, लेकिन एक बेटी के आँसू पोंछने का धर्म — एक सनातन मानवीय धर्म — भूल चुके हैं."

उसने ये शब्द सोशल मीडिया के अपने सभी अकाउंट पर अपलोड किए. पहले कुछ घंटे सन्नाटा रहा. फिर एक आवाज़ ने दस्तक दी... फिर दस... फिर सैकड़ों की आवाज गूँजने लगी.

फिर वह दिन आया. राजन मास्टर अब व्हीलचेयर पर, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे. उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर हर शब्द लोहे की तरह था:

"मैंने देखा है. मैं घटना का आई विटनेस हूँ. और अगर इस नगर में अब भी कोई इंसान बचा है, तो उसे भी यह कहना होगा—'मैंने देखा है'. हम सब गवाह हैं. हमारी चुप्पी ही हमारा सबसे बड़ा अपराध है."

चुप्पी का बाँध अब टूट चुका था. अवनि अकेली नहीं थी. अनेक ताराएँ, अनेक राजन, अब एक मानव-श्रृंखला बनाकर खड़े थे.

अब उनके हाथों में आँसू बहाती मोमबत्तियाँ नहीं, मशालें थीं. उनकी लपटें न केवल अँधेरा लील रही थीं, बल्कि चुप्पी के बवंडर को भी उन्होंने जला दिया था. समाज का वह घिनौना मौन, जो किसी जघन्य अपराध से कम नहीं था, अब टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर रहा था. न्याय अभी बहुत दूर था, पर उस तक पहुँचने वाला रास्ता अब बन रहा था — एक ऐसा रास्ता जो चुप्पी के जंगलों को चीरता हुआ, डर के दलदलों को पार करता हुआ, सीधे हमारे अपने घर के दरवाज़े तक आता था. लोग उसे लक्ष्य तक पहुँचाने को जुट पड़े थे. और एक भरोसा कि, इस बार, यह रास्ता टूटेगा नहीं.

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

तारों और न्यूरॉन्स के बीच

लघुकथा :  दिनेशराय द्विवेदी 
डॉ. आर्यन मिश्रा ने अपनी कॉफ़ी की चुस्की ली और कम्प्यूटर स्क्रीन से नज़र हटाकर प्रोफेसर राजीव सेठ की ओर देखा. "सर, कल रात मैंने एक कहानी 'घिरनियाँ' पढ़ी. उसमें प्रोफेसर पात्र का वह कथन – 'सारे विचार भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं' – मुझे मेरे न्यूरोसाइंस के शोध का सार प्रतीत हुआ."
प्रोफेसर सेठ मुस्कुराए. "तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारे शोध के निष्कर्ष उस साहित्यिक कथन की वैज्ञानिक पुष्टि करते हैं?"

"बिल्कुल!" आर्यन उत्साहित हो गया. "हमारे मस्तिष्क में लगभग 100 अरब न्यूरॉन्स हैं, सर. ये आपस में करीब 1000 ट्रिलियन कनेक्शन बनाते हैं. यह आकाशगंगा के तारों से भी जटिल नेटवर्क है. और हर विचार..." आर्यन ने अपनी उँगलियों से हवा में एक जाल सा बनाया, "सिर्फ इन न्यूरॉन्स के बीच इलेक्ट्रोकेमिकल संकेतों का एक विशिष्ट पैटर्न है. बिल्कुल 'घिरनियाँ' कहानी के उस गियर सिस्टम की तरह, जहाँ एक घिरनी की गति दूसरी को चलाती है, और यह शृंखला एक विचार या क्रिया को जन्म देती है."

"विस्तार से समझाओ," प्रोफेसर ने कहा, अपनी कुर्सी पर आराम से बैठते हुए, उनकी आँखों में एक जिज्ञासु चमक थी. वे जानते थे कि आर्यन न सिर्फ़ एक होनहार शोधकर्ता था, बल्कि विज्ञान के दर्शन पर गहराई से विचार करने वाला दिमाग़ भी था.

आर्यन ने एक नोटबुक खोली, जिसमें रंग-बिरंगे डायग्राम और समीकरण भरे हुए थे. "देखिए सर, एक न्यूरॉन आराम की अवस्था में -70 मिलीवोल्ट पर होता है. जब उसे संकेत मिलता है, तो सोडियम आयन अंदर आते हैं – इस तरह डिपोलराइज़ेशन की प्रक्रिया आरंभ होती है. एक सीमा पार करते ही +40 mV एक्शन पोटेंशियल बनता है, जो एक विद्युत तरंग की तरह एक्सॉन के सहारे दौड़ता है. फिर एक समय के बाद पोटेशियम आयन बाहर जाने लगते हैं – इस तरह रिपोलराइज़ेशन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, और न्यूरॉन फिर से आराम की अवस्था में लौट आता है. यही चक्र... यही भौतिक प्रक्रिया हर विचार, हर अनुभव, हर सपने की नींव है. जब आप अभी 'घिरनियाँ' शब्द सुन रहे हैं, तो आपके मस्तिष्क के वर्निके एरिया (Wernicke's Area) में न्यूरॉन्स का एक विशिष्ट समूह इसी तरह के इलेक्ट्रोकेमिकल तूफान से गुजर रहा है."

"प्रभावशाली," प्रोफेसर ने कहा, अपनी उँगलियों को एक पिरामिड की शक्ल में जोड़ते हुए. "पर कौशिक नामक वह छात्र जब पहली बार गियर को छूता है, तो उसे एक 'अहसास' होता है – एक आंतरिक झनझनाहट, एक जागृति. तुम्हारी FMRI और EEG मशीनें उस 'अहसास' को कैसे मापती हैं? क्या वह महज न्यूरल फायरिंग का एक और पैटर्न है, या कुछ और?"

आर्यन कुछ पल को चुप रहा, कॉफ़ी के मग को घूमता हुआ देखने लगा. "सर, हम न्यूरल एक्टिविटी के कोरेलेट माप सकते हैं. प्रेम के लिए ऑक्सीटोसिन और डोपामाइन का स्राव, डर के लिए एमिग्डाला की सक्रियता, ध्यान के लिए प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स का दोलन... पर..."

"पर 'अहसास' स्वयं?" प्रोफेसर ने पूछा, अपनी आवाज़ को कोमल बनाते हुए. "वह 'मैं' जो इन रसायनों को 'अपना' अनुभव बताता है? वह घिरनी जो सभी घिरनियों के घूमने को देख रही है, और अपने घूमने को भी महसूस कर रही है? वह चेतना, जो इन सब भौतिक प्रक्रियाओं का साक्षी है – क्या वह भी एक घिरनी है, या घिरनियों के जाल से उपजी कोई नई, अदृश्य वास्तविकता?"

शाम की लाली खिड़की से उनके कमरे में घुस रही थी, दीवारों को एक नारंगी आभा से रंगते हुए. प्रोफेसर ने खिड़की की ओर इशारा किया, जहाँ आकाश धीरे-धीरे गहरा हो रहा था. "देखो, 'घिरनियाँ' कहानी सरल थी – एक गियर सिस्टम, एक कुएँ की घिरनी. पर उसका सिद्धांत गहरा था. आज तुम मुझे मस्तिष्क की घिरनियाँ दिखा रहे हो – न्यूरॉन्स, सिनैप्स, न्यूरोट्रांसमीटर. और बाहर... ब्रह्मांड की घिरनियाँ."

"सितारे?" आर्यन ने पूछा, उसकी नज़र भी अब खिड़की के बाहर टिक गई थी.

"हाँ. मिल्की वे में 100 से 400 अरब तक तारे हैं. हमारे दिमाग़ में लगभग 100 अरब न्यूरॉन्स. क्या यह महज संयोग है?" प्रोफेसर ने अपनी कुर्सी से उठकर खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए. "या फिर जटिलता का एक सार्वभौम नियम है – कि जब भी अरबों इकाइयाँ आपस में जुड़ती हैं, तो कुछ 'नवीन' का उद्भव होता है? तारों के जाल से ग्रह और जीवन उभर आया... न्यूरॉन्स के जाल से... चेतना उभर आई? क्या यह सब एक ही महा-प्रक्रिया के विभिन्न स्तर हैं? जैसे फ्रैक्टल पैटर्न, जो हर स्केल पर खुद को दोहराते हैं?"

डॉ. आर्यन ने गहरी साँस ली. उसके मन में एक साथ कई विचार-घिरनियाँ घूमने लगी थीं. "तो आप कह रहे हैं कि चेतना, भौतिक प्रक्रियाओं का ही एक ऐसा उच्चस्तरीय गुण है, जिसे हम अभी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं? जैसे पानी के अणुओं की व्यवस्था से 'तरलता' का गुण उभरता है, वैसे ही न्यूरॉन्स की अत्यंत जटिल व्यवस्था से 'चेतना' उभर आती है?"

"हाँ," प्रोफेसर ने कहा, वापस अपनी कुर्सी की ओर मुड़ते हुए. "मैं यह नहीं कहता कि कोई गैर-भौतिक आत्मा है, जो मशीन में घुसी हुई है. मैं कहता हूँ कि भौतिकता ही इतनी जटिल, इतनी सुंदर हो सकती है कि वह... स्वयं को देखने लगे. 'घिरनियाँ' कहानी का वह प्रोफेसर सही था – “सभी विचार भौतिक यथार्थों से जन्म लेते हैं”. पर वह यथार्थ इतना विशाल, इतना गहरा है, इतना परस्पर जुड़ा हुआ है कि उससे 'चेतना' जैसा अद्भुत, रहस्यमय गुण उभर आया है. और शायद, हमारी यह चेतना ही उस यथार्थ को समझने की कोशिश कर रही है – यह एक दर्पण में दर्पण को देखने जैसा है."

आर्यन ने अपनी कॉफ़ी की चुस्की ली, जो अब पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी, पर उसे इसका एहसास भी नहीं हुआ. "शायद हमारा काम इस भौतिक यथार्थ को समझने की कोशिश जारी रखना है – एक स्तर से दूसरे स्तर तक. हर नया शोध, हर नया तथ्य... एक नई घिरनी शुरू करता है, जो दूसरी घिरनियों को चलाती है, और ज्ञान का एक नया चक्र आरंभ होता है. और शायद, एक दिन, हम उस अंतिम घिरनी तक पहुँच जाएँगे... या फिर पाएँगे कि घिरनियों का अंत ही नहीं है, बस अनंत संपर्क है."

"बिल्कुल," प्रोफेसर ने कहा, एक संतुष्ट मुस्कान के साथ. "और सबसे सुंदर बात यह है कि ये सभी घिरनियाँ – मस्तिष्क की, ब्रह्मांड की, विचारों की, भावनाओं की – आपस में जुड़ी हैं. हम स्वयं उस संपर्क का प्रमाण हैं. एक ऐसा बिंदु जहाँ ब्रह्मांड स्वयं को प्रतिबिंबित करने लगा है. तारों की धूल से बने इस शरीर में, तारों जितने ही न्यूरॉन्स घूम रहे हैं, और उनसे उपजी चेतना, तारों के रहस्यों को जानने की चाह रखती है. यह एक स्व-संदर्भित कविता है, आर्यन, और हम उसके शब्द हैं."

बाहर, पहला तारा टिमटिमाया – शायद वह भी कोई दूर का सूर्य था, जिसके चारों ओर ग्रह घूम रहे होंगे, और शायद किसी ग्रह पर कोई और प्राणी, किसी और प्रयोगशाला में, इसी पल न्यूरॉन्स और तारों के बीच के संबंध पर विचार कर रहा होगा. अंदर, उस शांत कमरे में, दो वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में, अरबों न्यूरॉन्स की घिरनियाँ एक नए, गहरे विचार को जन्म दे रही थीं. वही पुराना सिद्धांत था, पर एक नए, विस्तृत स्तर पर – कि सभी घिरनियाँ एक दूसरे से जुड़ी हैं, और हर घूर्णन, हर संपर्क, इस विशाल ब्रह्मांडीय ताने-बाने में एक थ्रेड है. और शायद, चेतना ही वह वह चमकदार धागा है जो इन सभी थ्रेड्स को एक सार्थक पैटर्न में बुनता है – अस्थायी रूप से, नाज़ुक रूप से, अद्भुत रूप से.

नोट : डॉक्टर मित्र Navmeet Nav को धन्यवाद करते हुए. इस कहानी के लिए तकनीकी जानकारी प्राथमिक रूप से उन्हीं के एक लेख से प्राप्त हुई हैं.

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बयान

'लघुकथा'  
: दिनेशराय द्विवेदी

अशोक ने अपनी कार रोकी. सामने घर के दरवाजे से वही मिट्टी का आँगन था, जहाँ उसकी लाड़ली भाँजी प्रिया दौड़ती हुई ‘मामा’ कह कर उसके दौड़ती हुई उसके गले लग जाती थी. आज वह आँगन सूना था. सोलह साल की प्रिया, नर्स बनने का सपना देखने वाली. अब केवल एक पुलिस फाइल, एक पोस्टमार्टम नंबर और तालाब किनारे चाक से खींची गई रेखा हो कर गयी थी. वह भांजी की वीभत्स मृत्यु से दुःखी अपनी बहिन के दुःख और दर्द को बाँटने को आया था.

अंदर आंगन में पहुँचने पर जीजा शिवदीन की निगाहें उस पर पड़ी. उसने देखा, वे बिलकुल टूटे हुए लग रहे थे. उनकी आँखों में कोई आशा नहीं, बस एक गहरी थकान थी. कमला दीदी चूल्हे के पास बैठी थीं. उसे देखते ही उनकी रुलाई फूट पड़ी. क्षण भर में ही उसकी तीव्रता ने अशोक का मन चीख उठा. वह दौड़ कर कमला दीदी के पास पहुँचा और उसे अपने सीने से चिपका लिया. बमुश्किल चार-पाँच मिनट रो लेने के बाद दीदी के मुहँ से बोल निकले, “तेरी प्यारी प्रिया चली गयी”. वह देर तक कमला को ढाढ़स दिलाता रहा. फिर जीजा के पास जाकर बैठा.
"जीजा, आप बताइए... सब कुछ, "अशोक ने नोटबुक खोली.

"क्या बताएँ, बेटा?" शिवदीन की आवाज़ टूटी हुई थी. "हमने मना किया था. उम्र थी उसकी... पंद्रह साल से ज्यादा का फर्क. ब्याहता था वो आदमी. पर बेटी कहती थी — 'बाबू, वह मेरी मदद करेगा. पढ़ाएगा. शहर ले जाएगा.' हम क्या कहते? हमारी हैसियत में सपने देखना भी पाप होता है?"

कमला दीदी ने अचानक फुसफुसाकर कहा, "उस... उस रंजन साहब के घर की औरत... उसने प्रिया को गली में रोक-रोक कर डाँटा था. कहा था — 'अपनी औकात याद रखो. हमारे घर की तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत?'

अशोक ने अपनी डायरी में नोट किया: 'प्यार का झाँसा? नहीं. जाति और सत्ता का हथियार.'


अगला पड़ाव सरोज थी, प्रिया की सहेली. उससे गाँव से दूर, एक सूखे पेड़ के नीचे मुलाकात हुई. सरोज की आँखों में डर का साया था.

"सरोज, मुझ पर भरोसा करो. मैं तुम्हारा रिश्तेदार हूँ, और वकील भी."

सरोज ने गहरी साँस ली. "उस रात... हम दोनों गए थे. मैं पीछे रुक गयी थी. प्रिया कुछ दूर पेड़ों के झुरमुट में बैठ बातें करने ही लगे थे. अचानक पाँच लोग आ गए... करन चाचा सबके आगे थे."

"करन? पंचायत वाले?" अशोक ने पूछा.

"हाँ. वे चिल्लाए, 'हमारी बहन-बेटियों को भ्रष्ट करोगे? इस गाँव की मर्यादा मिट्टी में मिला दोगे?' फिर... मारना शुरू कर दिया. दोनों को."

सरोज की आवाज़ लड़खड़ा गई. "प्रिया के सिर पर... करन चाचा ने खुरपी से वार किया. वह चीखी... और फिर गिर गई. खून... बहुत खून था."

"फिर?" अशोक ने कोमलता से पूछा.

"फिर..." सरोज ने आँखें मूँद लीं, जैसे उस दृश्य को भगाना चाहती हो. "जब वह बेहोश पड़ी थी... तब... उनमें से दो... महेश और बलवंत... उन्होंने उसे... छुआ. उसके कपड़े... फाड़े. मैं दूर झाड़ियों में छिपी थी... रो भी नहीं सकी. सब देखा. फिर वे सब, खुसर-फुसर करते हुए, चले गए. रंजन साहब वहीं ज़मीन पर बैठे थे... डरे हुए, काँपते हुए."

अशोक का दिल ज़ोर से धड़का. पुलिस रिपोर्ट में बलात्कार का जिक्र तक नहीं था. यह सामूहिक हिंसा का चरम, 'मर्यादा' के नाम पर किया गया सामूहिक अधिकार जताना था. उसने डायरी में नोट किया: 'मर्यादा = सामूहिक हिंसा + सामूहिक बलात्कार का बहाना.'

"तुमने पुलिस को यह क्यों नहीं बताया, सरोज?"

"कौन सुनता?" सरोज की आँखों में आँसू आ गए. "करन चाचा कहते, अगर किसी ने मुँह खोला, तो उसका वही हाल होगा. और पुलिस... पुलिस तो उनकी ही सुनती है."

अशोक समझ गया. पुलिस बलात्कार से इनकार कर रही थी क्योंकि आरोपी 'गाँव के सम्मानित' लोग थे. प्रिया का शोषण शुरू हुआ था एक सवर्ण पुरुष के झाँसे से, और पूरा हुआ था गाँव के दंबंगों की सामूहिक क्रूरता से. और अंत में, रंजन ने, उस सामूहिक हिंसा के बाद, सिर्फ अपने बचाव के लिए, उसी लड़की का गला घोंट दिया जिससे वह 'प्यार' करने का नाटक करता था. शव तालाब में फेंक दिया, जैसे कोई कूड़ा.


उस रात, अशोक का छोटा सा कार्यालय रोशनी से जगमगा रहा था. दीवार पर प्रिया की एक धुंधली सी तस्वीर टंगी थी. उसके सामने तीन कॉलम बने थे:

पहला ¬: रंजन: छल, शोषण, हत्या.
दूसरा : करन और गिरोह: सामूहिक हिंसा, सामूहिक बलात्कार (छिपाया हुआ), धमकी.
तीसरा : पुलिस जानबूझकर लापरवाही, सबूत दबाना.

वह जानता था, कोर्ट में सिर्फ पहला कॉलम ही चलेगा. दूसरा गाँव की सामूहिक चुप्पी और डर में दफन रहेगा. तीसरा सिस्टम की लाचारी कहलाएगा.

तभी उसकी नज़र अपनी पुरानी पत्रकारिता की डायरी पर पड़ी. पहले पन्ने पर लिखा था: "सच कोई तथ्य नहीं, एक प्रतिबद्धता है."

उसने फोन उठाया. राहुल का नंबर डायल किया, वह उसका पुराना साथी था, अब एक बड़े अखबार का निर्भीक एडिटर.

"राहुल, तैयार हो जाओ."

"क्या हुआ, अशोक? फिर किसी केस में उलझ गए?"

"यही समझ लो.”

“इस बार मेरी खुद की भांजी का मामला है.”

"क्या?

"सच का जिसे दफनाने की पूरी कोशिश हुई है. एक दलित लड़की के सपनों, उसके शोषण और उसकी हत्या का. और सिर्फ एक इंसान की नहीं... एक पूरे तंत्र की हत्या का."

फोन के दूसरे छोर पर एक पल की चुप्पी थी. फिर राहुल की आवाज़ आई, दृढ़ और स्पष्ट.

"बताओ क्या करना है?"

"मैं रिपोर्ट भेजता हूँ.

...........

अशोक ने प्रिया की तस्वीर की ओर देखा. वह अब केवल एक वकील नहीं था. वह कमला दीदी और जीजा शिवदीन के दर्द, सरोज के डर, और अपने ही समुदाय के अपमान का जीता-जागता साक्षी था. उसे अब खुद उस सिस्टम से लड़ना होगा, जो जाति के नाम पर हिंसा को अनदेखा कर देता है.

उसने कलम उठाई. शिकायत का मसौदा शुरू किया. पहली पंक्ति लिखी:

"यह केवल एक हत्या का मुकदमा भर नहीं होगा. यह सदियों पुरानी सड़ी-गली व्यवस्था के खिलाफ, एक साक्षी का बयान होगा..."

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

खाई

"लघुकथा" : दिनेशराय द्विवेदी

शहर में हुई ताज़ा बड़ी रैली के बाद, हवा का स्वाद बदल सा गया था. चाय की दुकान पर आवाज़ें ऊँची थीं, और व्हाट्सएप ग्रुप्स नोटिफिकेशन की बौछार से भरे हुए थे. रैली शांतिपूर्ण रही थी, पर उसके बाद मोहल्ले में एक अजीब सा सन्नाटा था, जैसे किसी आने वाली आंधी या तूफान की सूचना दे रहा हो.

अनन्या और ज़रीना हमेशा की तरह उस शाम छत पर बैठी थीं, इस साल उन्हें सैकण्डरी बोर्ड की परीक्षा देनी थी. बोर्ड के नाम का बड़ा आतंक था. उन्हें चिन्ता थी कि वे इस रेखा को ठीक से पार कर पाएंगी या नहीं. सात साल की दोस्ती उनकी आवाज़ों में, उनकी हँसी में रच-बस गई थी.

"कल से तेरे घर पढ़ना पड़ेगी" ज़रीना ने कहा, "मेरी अम्मी बीमार हैं."

"ठीक है," अनन्या ने इस प्रस्ताव को सहज स्वीकार कर लिया.

रात के खाने की मेज पर भाई विक्रम का चेहरा उत्तेजना से चमक रहा था. "आज तो लोगों की आँखें खुल गई होंगी! हमें अपने लोगों की सुरक्षा खुद करनी होगी." पिताजी मौन सिर हिला रहे थे.

तभी विक्रम का ध्यान अनन्या पर गया. "सुन, कल से उस ज़रीना को घर मत बुलाना."

"क्यों भैया? हमें साथ पढ़ना है," अनन्या हैरानी से बोली.

"उनकी संस्कृति अलग है, अनन्या. हम नहीं जानते उनके मन में क्या चल रहा है."

अनन्या को उसकी आवाज़ में एक नई, कठोर निश्चय की ध्वनि सुनाई दी. सुन कर अनन्या का गला सूख गया. "पर... वह तो मेरी सबसे अच्छी दोस्त है."

पिताजी ने आवाज़ दबाकर कहा, "बेटे, विक्रम की बात मान लो. तुझे कुछ हो गया तो? हमारी इज्ज़त का क्या होगा? उनसे दूर ही रहना ठीक है."

इज्ज़त शब्द हवा में झूल गया, जैसे कोई भारी पत्थर है और कभी भी उसके सिर पर गिर पड़ेगा.

अगले दिन जब ज़रीना किताबें लेकर आई, तो अनन्या ने दरवाज़ा आधा खोला. "ज़री... आज मैं ठीक नहीं हूँ. सिर दर्द है. तू चली जा."

ज़रीना की मासूम आँखों में चिंता तैर गई. "अच्छा? ठीक है... दवा ले लेना. पढ़ नहीं पाई तो परीक्षा कैसे देगी." उसने अपने बैग से चॉकलेट की एक पट्टी निकाली और अनन्या के हाथ में थमा दी, फिर चली गई.

दरवाज़ा बंद करते हुए अनन्या के हाथ काँप रहे थे. वह जो सिर्फ ज़रीना थी. उसकी हँसी, उसकी शैतानियाँ, उसके रहस्य, अचानक सब 'संभावित खतरा' बन गए थे. वह उसका चेहरा भूल रही थी, पर भैया के शब्द, "उनके मन में क्या चल रहा हैं," उसके कानों में गूँज रहे थे. पहली बार, उसने अपनी ही सहेली से तनिक भय महसूस किया. उसके सारे शरीर में एक सिहरन दौड़ गयी. फिर एक लंबी सांस अपने अंदर खींच कर उसने अपने विश्वास को मजबूत किया कि प्यारी सी ज़रीना उसके लिए खतरे का बायस कैसे बन सकती है.

एक हफ़्ते तक बहानेबाजी करती रही. फिर एक दिन, स्कूल गेट पर, ज़रीना ने उसका रास्ता रोक लिया.
"तू मुझसे नाराज़ है क्या? मैंने कुछ गलत कहा?"

"नहीं... बस... अब हम बड़े हो गए हैं. अलग-अलग रहना चाहिए."

ज़रीना स्तब्ध रह गई. उसकी आँखों की चमक धूमिल पड़ गई. "क्या मतलब? 'अलग' क्यों?"

एक क्षण के लिए स्तब्धता ने उसे रोका. फिर उसने धीरे से सवाल कर ही लिया, "क्योंकि मैं मुस्लिम हूँ?"

अनन्या मौन रह गयी. लेकिन उसके इस मौन ने उसे बहुत कुछ कह दिया था.

ज़रीना के चेहरे पर आघात, और फिर एक ठंडी, दुखद समझदारी उभरी.

"समझ गई. तेरे भैया ने कहा होगा न? मैंने सुना है उसका भाषण." वह एक कदम पीछे हटी, जैसे कोई अदृश्य रेखा खींच रही हो. "ठीक है. तू सुरक्षित रह."

और फिर सब कुछ थम गया.

अब अनन्या अपनी खिड़की से कभी-कभी ज़रीना के घर की ओर देखती है, जहाँ वह अपनी छत पर अकेली बैठी रहती है. पहले जहाँ दोनों के बीच एक खुला आंगन था, साझी हँसी थी, अब दो घरों के बीच की सड़क, अब सड़क नहीं रह गयी थी. वहाँ रातों रात एक गहरी खाई बन गयी थी, एक अदृश्य खाई. उसे लगता कि वह कभी इस खाई के पार न जा सकेगी. बहुत सारे लोगों को यह खाई कभी नहीं दिखी. वे इस पार से उस पार आते जाते रहे. पर यह खाई हर पल अनन्या के ज़ेहन में मौजूद थी.

एक शाम, अपना बैग खंगालते हुए अनन्या को चॉकलेट की पट्टी हाथ लगी. इसे ज़रीना ने उसे दिया था और वह बैग में डाल कर भूल गयी थी. उस पर ज़रीना ने ख़ुश ख़त में लिखा था, "हमेशा तेरी दोस्त."

जैसे ही अनन्या के हाथ ने उस चॉकलेट की पट्टी को छुआ, वैसे ही उसके अंतर से 'कुछ हो जाने' का डर पता नहीं काफूर हो गया. डर केवल उसे दिखाया गया था, वह कभी आया ही नहीं. कोई अनहोनी नहीं हुई. उलटा, कुछ और ही 'हो गया' था. उसकी दुनिया सिमट गई थी. उसके मन की कोमल पंखुड़ियों के बीच संदेह के काँटे उग आए थे. उसकी सबसे कीमती चीज़, निश्छल और बिना शर्त दोस्ती टूटकर बिखर गई थी.

उस रात अनन्या जब अपने कमरे में बिलकुल अकेली रह गयी, बहुत कुछ सोचती रही. फिर अचानक वह उठी, पानी के अधभरे गिलास में अपनी उंगली डुबोई और अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर उँगली से एक शब्द लिखा: "क्यों?"

उस रात उसका पढ़ने में बिलकुल मन नहीं लगा. वह ठीक से सो भी नहीं सकी. जैसे ही सुबह की रोशनी ने खिड़की से कमरे में प्रवेश किया. उनींदी सी वह उठी और उसने खिड़की खोल दी. उसे चिड़ियों की चहचहाट सुनाई दी. सामने की छत पर ज़रीना टहल रही थी. उसके मन ने बस चाहा कि ज़रीना उसे देखे. तभी ज़रीना ने उसकी खिड़की की और देखा. दोनों की निगाहें मिलीं. उसने ज़रीना की ओर अपना हाथ हिलाया. ज़रीना ने भी अपना हाथ हिला कर जवाब दिया. दोनों के चेहरों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी. अनन्या ने महसूस किया कि उनके बीच की सड़क पर कभी कोई खाई थी ही नहीं.