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गुरुवार, 5 मार्च 2026

ब्रह्मपुत्र की हवाएँ

पिंजरा और पंख-48

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

गुवाहाटी में दीवाली के पहले से ही सुबह की धुंध और गहरी होने लगी थी. पहले सेमेस्टर की परीक्षा के नतीजे आ चुके थे और आयुष ने अपनी जगह 'टॉप-10' में सुरक्षित कर ली थी. लेकिन इस सफलता से अधिक जिस चीज़ ने उसे बदला था, वह था यहाँ का खुला 'इंटरेक्शन'.

उस दोपहर, वह 'कम्प्यूटर सेंटर' में लैब असाइनमेंट पूरा कर रहा था. तभी उसके साथ वाली डेस्क पर ईशा ने अपनी कुर्सी खिसकाई. वह कोलकाता से थी और फिजिक्स की 'ब्राइट' छात्राओं में गिनी जाती थी.

"आयुष, तुमने 'डिस्क्रीट मैथ' वाले लॉजिक गेट्स का असाइनमेंट कर लिया? मुझे उस 'ट्रुथ टेबल' में थोड़ी दिक्कत आ रही है," ईशा ने सहजता से पूछा.

आयुष एक पल के लिए ठिठका. उसके पुराने बोर्डिंग स्कूल में लड़कियाँ केवल 'एनुअल डे' पर दिखती थीं, और घर (रामगंजमंडी) में लड़कियों से बात करने का मतलब था, ‘संदेह की नज़रें’. लेकिन यहाँ ईशा की आँखों में कोई संकोच नहीं था, केवल एक सहपाठी की जिज्ञासा थी.

"हाँ... वो, मैंने कर लिया है. तुम चाहो तो मेरा लॉजिक देख सकती हो," आयुष ने अपना रजिस्टर उसकी ओर बढ़ा दिया.

अगले एक घंटे तक दोनों ने 'बाइनरी लॉजिक' पर चर्चा की. क्लास के बाद वे दोनों कॉफी पीने कैंपस के मशहूर कैंटीन एरिया 'खोका' (Khokha) चले गए. वहाँ ब्रह्मपुत्र की ठंडी हवाएँ सीधे उनके बदन से टकरा रही थीं. आयुष ने देखा, आसपास कई और लड़के-लड़कियाँ समूहों में बैठे थे, हँस रहे थे, बहस कर रहे थे. वहाँ न तो अनिल चाचा का डर था, न ही समाज की 'मर्यादा' वाली घुटन.

ईशा ने कॉफी का घूँट लेते हुए कहा, "तुम्हें पता है आयुष, घर पर सब सोचते हैं कि मैं यहाँ सिर्फ पढ़ रही हूँ, लेकिन यहाँ आकर मुझे अहसास हुआ कि मैं पहली बार 'जी' रही हूँ. कोलकाता में पाबंदियाँ थीं, पर यहाँ हम अपनी पहचान खुद गढ़ते हैं."

आयुष को अपनी दीदी, शगुन की याद आई. उसे महसूस हुआ कि शगुन जिस 'आज़ादी' के लिए बनस्थली विद्यापीठ के परकोटा वाले दायरे में लड़ रही है, वह यहाँ कितनी सहज उपलब्ध है. उसने मन ही मन सोचा— "क्या रामगंजमंडी में कभी ऐसा हो पाएगा? जहाँ शगुन दीदी जैसी किसी लड़की को अपनी शिक्षा के लिए किसी 'मुहूर्त' या 'सगाई' से न लड़ना पड़े?"

रात को हॉस्टल लौटकर आयुष ने ईशा के साथ बिताए समय के बारे में सोचा. यह सिर्फ 'दोस्ती' नहीं थी, यह उसके भीतर की उस ग्रंथि का खुलना था जिसने उसे हमेशा सिखाया था कि स्त्री और पुरुष के बीच केवल 'रिश्ते' या 'दूरी' हो सकती है, 'सहज मित्रता' नहीं.

उसने शगुन को ईमेल लिखा, "दीदी, आज मैंने जाना कि समानता केवल किताबों में नहीं होती, वह व्यवहार में होती है. यहाँ लड़कियां सिर्फ पढ़ नहीं रही हैं, वे नेतृत्व कर रही हैं. मुझे एक नई दोस्त मिली है, ‘ईशा’. उससे बात करके मुझे लगा कि पितृसत्ता का सबसे बड़ा हथियार 'अलगाव' (Separation) है. जब हम साथ मिलकर काम करते हैं, तो डर अपने आप खत्म हो जाता है. आप अपनी लड़ाई जारी रखिए, यहाँ की आबोहवा मेरे भीतर के 'अनिल चाचा' को रोज़ थोड़ा-थोड़ा मार रही है."

ईमेल भेजकर वह खिड़की के पास खड़ा हो गया. दूर ब्रह्मपुत्र का पानी चाँदनी में चमक रहा था. आयुष अब वह छोटा भाई नहीं रहा था जो केवल आज्ञा मानता था, वह अब एक 'स्वतंत्र-चेता' बन रहा था.

बनस्थली में शगुन का संघर्ष एक अलग स्तर पर था. दीवाली के बाद कैंपस में सन्नाटा था, लेकिन शगुन की मेज़ 'असामान्य मनोविज्ञान' की किताबों और केस स्टडी की फाइलों से अटी पड़ी थी. उसने हॉस्टल मेस की बाई नाथी और उसकी मदद से गाँव की अन्य स्त्रियों के जो इंटरव्यू लिए थे, वे उसके प्रोजेक्ट का आधार बन रहे थे.

उसी शाम मम्मा का फोन आया. "शगुन, अनिल चाचा बहुत नाराज़ हैं. वे कह रहे हैं कि तूने दीवाली पर न आकर उन लोगों का अपमान किया है. अब वे कह रहे हैं कि दिसंबर के अंत में वे खुद वहाँ बनस्थली आएंगे, उस लड़के और उसके परिवार के साथ. वे वहीं सब पक्का करना चाहते हैं."

शगुन का हाथ काँपा, पर आवाज़ नहीं. उसने पास रखे 'टीचिंग असिस्टेंट' (Teaching Assistant) के आवेदन फॉर्म को देखा. डॉ. शास्त्री ने उसे बताया था कि मनोविज्ञान विभाग में दो पद खाली हैं, और शगुन अपनी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर सबसे मजबूत दावेदार थी.

"मम्मा, चाचा को कह दीजिएगा कि दिसंबर में मेरे प्रैक्टिकल और फील्ड वर्क की प्रेजेंटेशन है. मुझे किसी से मिलने की फुरसत नहीं होगी. और मैं यह बहाना नहीं बना रही हूँ, स्थिति यही है कि अभी भी मेरी नींद पूरी नहीं होती. वे आए तो बहुत निराश होंगे," शगुन ने स्पष्ट कहा. “चाचा की बेसब्री बहुत डराती है, मम्मा. दिसंबर के बाद केवल तीन-चार माह बचेंगे. क्या वे तब तक नहीं रुक सकते.”

"बेटा, वे नहीं मानेंगे. वे पापा पर बहुत दबाव बना रहे हैं," मम्मा की आवाज़ में डर था.

शगुन ने फोन रखा और डॉ. शास्त्री के केबिन की ओर चल दी. शायद चाचा समझने लगे हैं कि, ‘यदि उसने बी.एससी. कर लिया तो लड़की हाथ से निकल जाएगी’. उसे पता था कि अब केवल 'ना' कहना काफी नहीं होगा, उसे खुद को आर्थिक रूप से स्वतंत्र साबित करना होगा. उसने ऑफिस जाकर टीचिंग असिस्टेंट के पद के लिए अपना आवेदन जमा किया और साक्षात्कार (Interview) की तैयारी में जुट गई.

उस रात उसने अपनी नई 'संबल' नोटबुक में लिखा, "आयुष गुवाहाटी में उस दुनिया को जीने का आरंभ कर चुका है, जिसे मैं यहाँ कागज़ों पर उतार रही हूँ. हम दोनों के बीच का यह संवाद ही हमारा असली हथियार है. दिसंबर में चाचा तो न आने पाएंगे लेकिन वापस लौटने पर युद्ध अब केवल उसके जीवन को सगाई में बांध देने के खिलाफ नहीं, बल्कि मेरी एक स्वतंत्र पहचान के लिए होगा."

खिड़की के बाहर बनस्थली के हरे वृक्षों के बीच छाया सन्नाटा और दूर गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र की लहरों को छूकर उठती हवाएँ, दोनों एक ही संकल्प से जुड़े थे.

... क्रमशः 

बुधवार, 4 मार्च 2026

प्रोजेक्शन

पिंजरा और पंख-47

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
दशहरा गुजर चुका था, दीवाली में बस सत्रह दिन शेष थे. शगुन हर वर्ष दीवाली पर घर गयी थी. पर इस वर्ष वह सोच ही नहीं पा रही थी कि वह जा पाएगी या नहीं. शगुन के मन में विषयों का एक सघन कोहरा छाया हुआ था. अंतिम सेमेस्टर की चुनौतियां पिछले वर्षों से कहीं अधिक तकनीकी और मानसिक थीं. उसे असामान्य मनोविज्ञान (Abnormal Psychology) की उन परतों को समझना था जहाँ सामान्य और असामान्य के बीच की लकीर बहुत धुंधली हो जाती है.

दोपहर में वह साइकोलॉजी लैब में 'रोर्शा स्याही धब्बा परीक्षण' (Rorschach Inkblot Test) के कुछ परिणामों का विश्लेषण कर रही थी. यह एक 'प्रोजेक्शन' तकनीक है, जिसमें व्यक्ति स्याही के धब्बों में वही देखता है जो उसके अवचेतन में गहरे बैठा होता है. शगुन ने गौर किया कि कैसे अलग-अलग परिवेश से आई लड़कियाँ उन धब्बों में कभी उड़ते पक्षी देखती हैं, तो कभी बंद पिंजरे.

शाम को होस्टल पहुँची तो आराम के लिए कुछ देर के लिए लेट गयी. तभी उसके फोन की घंटी बज उठी. उसने अनमने ढंग से फोन उठाया, मम्मा का था. आम तौर पर वे इस समय फोन नहीं करतीं. रात को सब काम निपटाने के बाद अपने कमरे में जाकर ही फोन करती हैं. उसने सोचा कुछ तो जरूरी बात है. उसने फोन उठा लिया. "शगुन, इस बार दीवाली की भाई-दूज से अगले दिन अनिल चाचा इन्दौर वाले मेहमानों को खास तौर पर बुलाना चाहते हैं. कह रहे हैं कि तू यहाँ रहेगी तो बात बन जाएगी और उन्हें कच्चा दस्तूर दे सकते हैं."

शगुन तब तक निकल कर छत पर आ चुकी थी. पश्चिम में सूरज डूबने को था. शगुन के मस्तिष्क पटल पर सांख्यिकी के चार्ट उतर आए. अभी बहुत काम बाकी पड़ा था. दीवाली के तुरन्त बाद सेमेस्टर था. और उसके तुरन्त बाद आखिरी सेमेस्टर शुरू होना था. इस सेमेस्टर की केस स्टडी तैयार नहीं हुई थी जिसे सेमेस्टर के पहले जमा करना था.

“मम्मा, इस सेमेस्टर की केस स्टडी जमा करना है और दीवाली के तुरन्त बाद सेमेस्टर है, उसकी भी तैयारी करनी होगी. इस दीवाली पर मंडी आना नहीं हो सकेगा.”

"लेकिन बेटा, घर में सब तेरा इंतज़ार कर रहे हैं. चाचा कह रहे थे कि ऐसा बढ़िया लड़का हाथ से निकल जाएगा तो फिर अच्छे रिश्ते ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे.” मम्मा की आवाज़ में वही पुरानी घबराहट थी.

"मम्मा, मेरा करियर ही मेरा सबसे बड़ा मुहूर्त है. मैं दीवाली अवकाश में यहीं हॉस्टल में रहकर अपनी रिसर्च रिपोर्ट पूरी करूँगी और सेमेस्टर की तैयारी भी."

“शगुन, जैसा तू उचित समझे. मेरी खुशी तो तेरे साथ है. पर चाचा पापा से अपने सामने तुझे फोन करवा सकते हैं. तब उनसे क्या बात करनी है, सोच कर रखना.”

“ वह मैं देख लूंगी मम्मा, अब फोन रखती हूँ.”

अगले दिन लैब पहुँच कर उसने सांख्यिकी (Statistics) के चार्टों को देखा. उन्हें तैयार कर लेने के बाद उसे सेमेस्टर की तैयारी में जुटना था. सेमेस्टर खत्म होते ही फाइनल सेमेस्टर के चार मुख्य पेपरों की तैयारी के साथ-साथ फील्ड वर्क और केस स्टडी का काम भी था. परामर्श मनोविज्ञान (Counselling Psychology) की इंटर्नशिप और ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर की केस रिपोर्ट बनानी थी. उसे यह सब पूरे करने था. पिछले चार सेमेस्टरों में अर्जित अंकों के आधार पर उसकी स्थिति यह थी कि उसने इन सबके लिए मेहनत की तो वह विद्यापीठ की मनोविज्ञान की सबसे बेहतर छात्रा होकर स्वर्ण पदक अर्जित कर सकती थी. परिवार-समाज की ओर से आ रही बाधाओं से पार पाने के लिए उसे यह जरूरी लगता था. एक सांख्यिकी चार्ट पूरा करने के बाद वह डॉ. शास्त्री के केबिन की ओर बढ़ गई. डॉ. शास्त्री उसके प्रोजेक्ट, "पितृसत्तात्मक ढांचे में महिलाओं की मानसिक स्थिति: एक केस स्टडी" के डेटा का मिलान कर रहे थे.

शगुन ने पूछा, "सर, क्या मेरा यह डेटा पर्याप्त है?"

डॉ. शास्त्री ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और बोले, "डेटा तो प्रभावशाली है और पर्याप्त भी शगुन, लेकिन क्या तुमने गौर किया कि तुम्हारी केस स्टडीज में 'कंडीशंड रिस्पांस' (Conditioned Response) कितना गहरा है? ये स्त्रियाँ अपनी बेड़ियों को ही अपना गहना मानने लगी हैं. मनोविज्ञान की भाषा में इसे 'लर्नड हेल्पलेसनेस' (Learned Helplessness) कहते हैं, जहाँ व्यक्ति यह मान लेता है कि वह अपनी स्थिति बदल ही नहीं सकता. क्या तुम इसे अपने जीवन के यथार्थ में चुनौती देने के लिए तैयार हो? अकादमिक सत्य और व्यक्तिगत साहस के बीच की खाई बहुत गहरी होती है."

शगुन को अहसास हुआ कि उसका प्रोजेक्ट केवल एक डिग्री के लिए नहीं, बल्कि खुद को उस 'लर्नड हेल्पलेसनेस' से बाहर निकालने की प्रक्रिया है.

उसी रात उसने आयुष को ईमेल किया. आयुष गुवाहाटी में अपने पहले सेमेस्टर की लैब रिपोर्ट्स में व्यस्त था. उसने अपने जवाब में लिखा:

"दीदी, आपकी हिम्मत देखकर मुझे भी ताकत मिलती है. यहाँ मेरी पहली दीवाली है और अवकाश केवल एक सप्ताह का, चार दिन आने जाने में टूटेंगे. तीन दिन के लिए कैम्पस से कोई भी घर नहीं जा रहा है. सब यहीं दीवाली मनाने की सोच रहे हैं. मैं हर हालत में घर नहीं जा रहा हूँ. हम दोनों अपनी-अपनी 'वर्कशॉप' में खुद को घिस कर माँज रहे हैं. आप फिक्र मत करो, मैं पापा को अलग से फोन करके समझा दूंगा कि आपकी अनुसंधान परियोजना (Research Project) कितनी गंभीर है. सगाई का दबाव फिलहाल टल जाएगा. आगे की फिर आगे देखेंगे."

दीवाली की रात रामगंजमंडी में दीये जले, आतिशबाजी भी हुई, लेकिन गुप्ता निवास में एक असहज सन्नाटा पसरा रहा. अनिल चाचा पूरी दीवाली अपना चेहरा गुस्से से लाल किए रहे. "पढ़ाई या बहाना? अब ये मनोवैज्ञानिक परीक्षण तय करेंगे कि सगाई कब होगी?" गुप्ताजी चुप रहे, पर उनकी आँखों में शगुन के प्रति एक अनजाना सम्मान और समाज के प्रति एक गहरा डर साथ-साथ तैर रहे थे.

शगुन ने अपनी नई नोटबुक, अपनी नयी 'संबल' को खोला और लिखा: "स्वतंत्रता का पहला कदम 'ना' कहना सीखना है, और दूसरा कदम उस 'ना' को तर्क और योग्यता से सिद्ध करना है."
... क्रमशः

मंगलवार, 3 मार्च 2026

सामाजिक लक्ष्य

पिंजरा और पंख-46

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
जुलाई में अच्छी बारिश हो गयी थी. सदियों से न जाने कितनी प्यास इस धरती के पास जमा है कि चाहे कितनी ही बरसात हो, सारा पानी घंटों में पी जाती है. बनस्थली और आसपास के इलाके में हरियाली अपनी पूरी रंगत में थी. रेतीली जमीन पर हरियाली की चादर बिछ गई थी. शगुन की व्यस्तता बढ़ गयी थी. ऑनर्स मनोविज्ञान में उसका आखिरी साल था. समय निकाल पाना बहुत कठिन था. लेकिन उसका मन रह-रहकर आयुष के ईमेल के इर्द-गिर्द घूमता रहता.

उस दोपहर, डिपार्टमेंट की लाइब्रेरी में बैठी शगुन को फिर से आयुष के ईमेल की याद आई. उसने कंप्यूटर पर जाकर फिर से अपना ई-मेल अकाउंट खोला और इस बार आयुष का ई-मेल को प्रिंट कमांड दिया. थोड़ी देर में प्रिंट उसके हाथ में था. वह उसे फिर से पढ़ने लगी.— "दीदी, यहाँ सब कुछ शून्य (0) और एक (1) के बीच है. लेकिन लगभग कुछ समय लैब में गुजारना पड़ता है. ड्राइंग्स ही ड्राइंग्स, रेखाएँ खींचने के बीच यहाँ की उमस पसीना बहाने लगती है. ऐसा लगने लगता है कि इंजीनियर बनने से पहले मजदूर होना जरूरी है. अब समझ आ रहा है कि बहुत सारे आविष्कार अनपढ़ और अल्पपढ़ मजदूरों ने कैसे कर दिखाए?"

शगुन के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान आ गई. उसने तुरंत रिप्लाई (Reply) बटन दबाया और लिखा:

"प्रिय आयुष, तुमने जो महसूस किया है, वही शिक्षा का असली 'क्यूआर कोड' है. जब हाथ श्रम से काले होते हैं, तभी मस्तिष्क में विचारों की उजली लकीरें उभरती हैं. यह घिसना बंद मत करना, हीरा रगड़ खाकर ही अपनी चमक पाता है."

ईमेल भेजकर शगुन ने अपनी 'ऑनर्स प्रोजेक्ट' की फाइल खोली. विषय था, "पितृसत्ता में स्त्री शिक्षा का वैचारिक संघर्ष". डॉ. शास्त्री ने उसे आगाह किया था कि यह विषय अकादमिक से ज़्यादा व्यक्तिगत हो सकता है, लेकिन शगुन अड़ी रही. उसे लगा कि जो लड़ाई वह घर के भीतर लड़ रही है, उसे शब्दों में ढालना ही उसका असली 'संबल' होगा. जब वह प्रोजेक्ट करने लगी तो उसे महसूस हुआ कि केवल उसके परिवार के तथ्य पर्याप्त नहीं होंगे. शेष तथ्य कहाँ से लाए जाएँ? फिर उसे होस्टल मेस में काम करने वाली नाथी का ध्यान आया. वह विद्यापीठ परिसर से बाहर बसे बनस्थली गाँव से आती थी. उसने उससे बात की तो उसने महसूस किया कि उसे उसके गाँव जाकर कुछ स्त्रियों से बात करनी चाहिए. नाथी उसे गाँव की स्त्रियों से बात कराने को तैयार हो गयी. एक मंगलवार साप्ताहिक अवकाश के दिन जब नाथी का भी अवकाश था, शगुन बनस्थली गाँव गई. उसने चार घंटे वहाँ बिताए और बहुत सारी स्त्रियों से बात करने के बाद बहुत से तथ्य एकत्र किए. उसने महसूस किया कि यह संघर्ष जितना उसने सोचा था उससे कहीं बहुत अधिक कठोर है. लेकिन अब प्रोजेक्ट लगभग तैयार था, बस एक बार डॉ. शास्त्री को दिखाने भर की देर थी.

शाम को फोन पर मम्मा से बात हुई. उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोश बेचैनी थी. "शगुन, तू ठीक तो है न? पढ़ाई पर ध्यान देना, और... और अनिल चाचा ने आज फिर पापा से तेरे बारे में कुछ बात की थी." मम्मा की आधी-अधूरी बात ने शगुन के कान खड़े कर दिए. "क्या बात मम्मा? क्या फिर से कोई रिश्ता आया है?"

मम्मा ने लंबी साँस ली, "उनका कोई जानकार है, अच्छे लोग हैं, लड़का बैंक में है. चाचा कह रहे थे कि शगुन की पढ़ाई अब पूरी होने को है, तो क्यों न सगाई कर दी जाए? शादी का बीएससी का रिजल्ट आने के बाद देख लेंगे."

शगुन का गला सूख गया. वह जानती थी कि आयुष की सफलता ने चाचा के अहंकार को शांत जरूर किया था, लेकिन बदला नहीं था. अब वे शगुन की 'आज़ादी' को 'विवाह' की लक्ष्मण रेखा में बाँधकर अपना खोया हुआ वर्चस्व वापस पाना चाहते थे.

"मम्मा, आप पापा से कहिएगा कि मेरी उड़ान अभी बाकी है. अभी तो मुझे एमएससी (M.Sc) करनी है," शगुन ने दृढ़ता से कहा. "बेटा, मैं तो तेरे साथ हूँ, पर चाचा की बात टालना पापा के लिए मुश्किल होता जा रहा है. वे कहते हैं कि आयुष पर इतना खर्च हो रहा है, तो बेटी की ज़िम्मेदारी से जल्दी मुक्त होना ठीक है."

फोन रखने के बाद शगुन बहुत देर तक हॉस्टल की बालकनी में खड़ी रही. दूर क्षितिज पर चमकती बिजलियाँ उसे संकेत दे रही थीं कि रामगंजमंडी में एक बार फिर 'विचारों का युद्ध' छिड़ने वाला है. लेकिन वह सब सवालों का उत्तर जरूर देगी, चाचा को भी और जरूरत पड़ी तो पापा को भी. उसने सुना था कि बनस्थली में पोस्ट ग्रेजुएट छात्राओं को रिसर्च असिस्टेंट, टीचिंग असिस्टेंट आदि का काम मिल जाता है जो एक छात्रा के लिए पर्याप्त होता है. वह इसके लिए बात करेगी और अपने लिए काम प्राप्त करने की बात पुख्ता करके रखेगी. उसे विश्वास था कि पापा चाचा की बात को दरकिनार करके उसी की बात को तरजीह देंगे और चाची भी जरूर उसका साथ देंगी. वह इन छोटी चीजों के लिए अपने सामाजिक लक्ष्यों को नहीं छोड़ सकती. वह हार नहीं मानेगी.

अपने निश्चय को दृढ़ करके उसने आयुष को फोन किया.

“कैसी हो दीदी?” उधर से आयुष की आवाज आई.”

“मैं ठीक हूँ, तू तेरा बता. कैसा चल रहा है.”

“सब बढ़िया चल रहा है. थोड़ा मुश्किल तो लगता है. भागदौड़ और मेहनत खूब है. पर मजा भी खूब आ रहा है. नयी चीजें सीखने को मिल रही हैं. पढ़ने को खूब किताबें हैं, खेलने को खेल के मैदान हैं. वातावरण और मौसम तो जबर्दस्त है.”

“थोड़ी बहुत मौज-मस्ती ठीक है, तू भी करता है कि नहीं?”

“अभी नहीं दीदी, अभी तो मैं समझ रहा हूँ, एक बार अपना स्थान बना लूँ. फिर सब देखेंगे.”

“तू बहुत समझदार हो गया है.”

“अपनी दीदी का भाई जो हूँ.”

“अब रखती हूँ, आयुष. मैस जाने का वक्त हो गया. लड़कियाँ बुला रही हैं. फिर फोन करूंगी.”

मैस से आने के बाद उसने आयुष का 'संबल' रजिस्टर याद आया जो अब गुवाहाटी में था. उसे लगा कि अब उसे भी अपने लिए भी एक नया “संबल रजिस्टर” खुद तैयार करना होगा.
... क्रमशः

सोमवार, 2 मार्च 2026

क्यू आर कोड

पिंजरा और पंख-45

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
'कामाख्या एक्सप्रेस' के कोटा जंक्शन से रवाना होते ही आयुष को विस्थापन का अहसास हुआ. वह घर से बहुत दूर, दो हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर गुवाहाटी जा रहा था. वहाँ उसे आईआईटी में कम्प्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग पढ़ना है. इससे उसे एक खास कुशलता मिलेगी जो एक अच्छी नौकरी हासिल करने में उसे मदद करेगी. उसके परिवार की आकांक्षाएँ पूरी होंगी. लेकिन उसकी खुद की आकांक्षाओं का क्या? तभी उसकी नजर उबासी लेते पापा पर पड़ी.

“पापा, आप लेट जाएँ, कुछ नींद ले लें, रात भर ठीक से सोए नहीं हैं.” आयुष ने सीट से खड़े होकर कहा.

“सही है, तुम भी मिडिल बर्थ खोल लो और लेट जाओ, दो-एक घंटे की नींद ले लेंगे तो सहज हो जाएंगे.”

आयुष ने मिडिल बर्थ खोल ली और वह उस पर चला गया. गुप्ताजी लोअर बर्थ पर लेट गए. दोनों पिता-पुत्र को दो दिन और दो रातों तक सफर करना था.

17 जुलाई की सुबह जब ट्रेन 'कामाख्या स्टेशन' पर रुकी, तो बाहर की नमी और पहाड़ियों की धुंध ने उन्हें चकित कर दिया. टैक्सी से ब्रह्मपुत्र का पुल पार कर जब वे अमिन्गाँव आईआईटी कैंपस पहुँचे, तो उसकी विशालता देख दोनों हतप्रभ रह गए.

उसे 'बराक' (Barak) हॉस्टल के बी-ब्लॉक में कमरा नंबर 112 मिला. इस होस्टल में सभी कमरे एक-एक स्टूडेंट के लिए बने थे. वह अपना सामान अपने कमरे में ले आया. पापा को कैम्पस के गेस्ट हाउस में स्थान मिला. 18 से 20 जुलाई के बीच 'एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक' की लंबी कतारों में खड़े होकर आयुष ने दस्तावेजी कार्रवाई पूरी की, गुप्ताजी उसके साथ लगे रहे. वे मन ही मन आयुष पर गर्व कर रहे थे कि आयुष ने खुद अपनी मेहनत से यहाँ तक पहुँचने की योग्यता हासिल की. उन्हें विश्वास था कि वह यहाँ भी अच्छा ही करेगा.

होस्टल में पास का कमरा नं. 111 कार्तिक को मिला था. वह हैदराबाद से था. कार्तिक की टूटी-फूटी हिंदी और आयुष की खामोशी के बीच पहले दो दिन केवल 'औपचारिक हेलो' में बीते. 23 जुलाई को पापा उसे गले लगाकर वापस राजस्थान के लिए रवाना होने लगे तो दोनों की आँखें नम थी. ट्रेन के रवाना होने के बाद पहली बार आयुष को अपने सीने पर एक भारी पत्थर जैसा महसूस हुआ. वह घर से हज़ारों मील दूर, बिल्कुल अकेला था. वह रात बहुत मुश्किल से गुजरी.

अगला दिन ओरिएन्टेशन का था. 'ऑडिटोरियम' में डीन का भाषण, परिचय का शोर. इन सबके बीच आयुष का ध्यान वहाँ के माहौल पर था. उसके स्कूल में अनुशासन का मतलब 'सजा' था, यहाँ अनुशासन का मतलब 'जिम्मेदारी' लग रहा था. लेकिन उसे सबसे अधिक प्रसन्नता इस बात से हुई थी कि हर होस्टल का अपना रीडिंग रूम था, जहाँ हर तरह की सैंकड़ों ताजा पत्रिकाएँ हर समय उपलब्ध थीं. इसके साथ ही आईआईटी की अपनी सेंट्रल लायब्रेरी थी, जिसमें सवा लाख से ऊपर पुस्तकें थीं. केवल विज्ञान से संबंधित नहीं बल्कि विश्व के हर तरह के ज्ञान से भरपूर. इसके अलावा कम्प्यूटरों के जरीए वे दुनिया भर की डिजिटल लायब्रेरियों से जुड़ा जा सकता था.

शाम को मेस में कार्तिक ने उसे एक पुराने छात्र से मिलवाया. उससे चेतावनी मिली, "भाई, कल से असली खेल शुरू होगा. ड्राइंग बोर्ड और वर्कशॉप के जूते तैयार रखना." इस चेतावनी ने आयुष की धड़कनें बढ़ा दीं.

अगले दिन 25 जुलाई को सुबह 8:00 बजे पहली क्लास शुरू हुई, “मैथेमेटिक्स-I (MA101)”. लेक्चर हॉल (L-2) में करीब 200 छात्र थे. प्रोफेसर ने आते ही बोर्ड पर 'कैलकुलस' के ऐसे जटिल समीकरण लिखने शुरू किए कि आयुष को लगा कि उसकी 1176वीं रैंक भी शायद कम पड़ जाएगी.

दोपहर के सत्र में उसकी पहली लैब थी, “इंजीनियरिंग ड्राइंग (ME111)”. आयुष ने बड़े से 'ड्राइंग बोर्ड' पर अपनी सफेद शीट लगाई. उसे 'पेंसिल ग्रेड' और 'प्रोजेक्शन' की सूक्ष्मताओं को समझना था. राजस्थान की सूखी गर्मी में पलने वाले आयुष के लिए गुवाहाटी की उमस में पसीना पोंछते हुए 'टी-स्क्वायर' संभालना भारी पड़ रहा था.

"यार, ये सीएसई (CSE) वालों को ड्राइंग क्यों सिखा रहे हैं? हमें तो कोड लिखना है," कार्तिक ने बगल वाली टेबल से फुसफुसाकर कहा.

आयुष मुस्कुराया. उसे शगुन दीदी की बात याद आई, "विराट हर जगह है." उसने मन ही मन सोचा कि शायद ये बारीक लकीरें भी उस विराट सत्य का ही हिस्सा हैं. ये कोड भी ड्राइंग ही हैं. वह कार्तिक की ओर मुस्कुरा कर रह गया. तभी उसे जापानी इंजीनियर ‘मासाहिरो हारा’ का ध्यान आया जिसने ‘क्यूआर कोड’ जैसी भाषा का आविष्कार किया है, जो एक ड्राइंग ही होती है. वह सीधा हो गया.

“तुमने ‘क्यूआर कोड’ सुना है? वह एक ड्राइंग ही होता है.” आयुष ने कार्तिक को जवाब देते हुए सवाल कर डाला.”

“ओह¡ ‘मासाहिरो हारा’, समझ गया. ड्राइंग सीखनी ही होंगी.” यह कह कर कार्तिक फिर से अपनी ड्राइंग पर झुक गया.”

शाम को वह वर्कशॉप (ME110) देखने गया. वहां की 'फोर्जिंग' और 'फिटिंग' शॉप से आती लोहे की महक ने उसे रामगंजमंडी की याद दिला दी, जहाँ अक्सर कहीं न कहीं मरम्मत का काम चलता रहता था.

रात 9:00 बजे, मेस से खाना खाकर जब वह कमरे में लौटा, तो थकान से चूर था. उसने अपना कंप्यूटर चालू किया. कैंपस के LAN (लोकल एरिया नेटवर्क) की जादुई रफ्तार ने उसे एक नई दुनिया से जोड़ दिया. उसने शगुन को ईमेल लिखा, "दीदी, यहाँ सब कुछ बहुत 'टेक्निकल' है. पहले दिन कोडिंग नहीं, बल्कि हाथ में पेंसिल और दिमाग में 'मैथेमेटिक्स' लेकर बैठा हूँ. गुवाहाटी की बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही, जैसे यहाँ की पढ़ाई भी कभी नहीं रुकेगी."

खिड़की के बाहर 'बराक' हॉस्टल के पीछे पहाड़ियों पर बादल मंडरा रहे थे. आयुष ने 'संबल' रजिस्टर खोला और आज की तारीख के नीचे लिखा, "सफलता का मतलब केवल कंप्यूटर नहीं, बल्कि हर विषय की गहराई को समझना है." उसे एहसास हुआ कि आईआईटी का पहला साल उसे सिखाएगा कि 'इंजीनियर' बनने से पहले एक 'मजदूर' होना जरूरी है.
... क्रमशः