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गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बयान

'लघुकथा'  
: दिनेशराय द्विवेदी

अशोक ने अपनी कार रोकी. सामने घर के दरवाजे से वही मिट्टी का आँगन था, जहाँ उसकी लाड़ली भाँजी प्रिया दौड़ती हुई ‘मामा’ कह कर उसके दौड़ती हुई उसके गले लग जाती थी. आज वह आँगन सूना था. सोलह साल की प्रिया, नर्स बनने का सपना देखने वाली. अब केवल एक पुलिस फाइल, एक पोस्टमार्टम नंबर और तालाब किनारे चाक से खींची गई रेखा हो कर गयी थी. वह भांजी की वीभत्स मृत्यु से दुःखी अपनी बहिन के दुःख और दर्द को बाँटने को आया था.

अंदर आंगन में पहुँचने पर जीजा शिवदीन की निगाहें उस पर पड़ी. उसने देखा, वे बिलकुल टूटे हुए लग रहे थे. उनकी आँखों में कोई आशा नहीं, बस एक गहरी थकान थी. कमला दीदी चूल्हे के पास बैठी थीं. उसे देखते ही उनकी रुलाई फूट पड़ी. क्षण भर में ही उसकी तीव्रता ने अशोक का मन चीख उठा. वह दौड़ कर कमला दीदी के पास पहुँचा और उसे अपने सीने से चिपका लिया. बमुश्किल चार-पाँच मिनट रो लेने के बाद दीदी के मुहँ से बोल निकले, “तेरी प्यारी प्रिया चली गयी”. वह देर तक कमला को ढाढ़स दिलाता रहा. फिर जीजा के पास जाकर बैठा.
"जीजा, आप बताइए... सब कुछ, "अशोक ने नोटबुक खोली.

"क्या बताएँ, बेटा?" शिवदीन की आवाज़ टूटी हुई थी. "हमने मना किया था. उम्र थी उसकी... पंद्रह साल से ज्यादा का फर्क. ब्याहता था वो आदमी. पर बेटी कहती थी — 'बाबू, वह मेरी मदद करेगा. पढ़ाएगा. शहर ले जाएगा.' हम क्या कहते? हमारी हैसियत में सपने देखना भी पाप होता है?"

कमला दीदी ने अचानक फुसफुसाकर कहा, "उस... उस रंजन साहब के घर की औरत... उसने प्रिया को गली में रोक-रोक कर डाँटा था. कहा था — 'अपनी औकात याद रखो. हमारे घर की तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत?'

अशोक ने अपनी डायरी में नोट किया: 'प्यार का झाँसा? नहीं. जाति और सत्ता का हथियार.'


अगला पड़ाव सरोज थी, प्रिया की सहेली. उससे गाँव से दूर, एक सूखे पेड़ के नीचे मुलाकात हुई. सरोज की आँखों में डर का साया था.

"सरोज, मुझ पर भरोसा करो. मैं तुम्हारा रिश्तेदार हूँ, और वकील भी."

सरोज ने गहरी साँस ली. "उस रात... हम दोनों गए थे. मैं पीछे रुक गयी थी. प्रिया कुछ दूर पेड़ों के झुरमुट में बैठ बातें करने ही लगे थे. अचानक पाँच लोग आ गए... करन चाचा सबके आगे थे."

"करन? पंचायत वाले?" अशोक ने पूछा.

"हाँ. वे चिल्लाए, 'हमारी बहन-बेटियों को भ्रष्ट करोगे? इस गाँव की मर्यादा मिट्टी में मिला दोगे?' फिर... मारना शुरू कर दिया. दोनों को."

सरोज की आवाज़ लड़खड़ा गई. "प्रिया के सिर पर... करन चाचा ने खुरपी से वार किया. वह चीखी... और फिर गिर गई. खून... बहुत खून था."

"फिर?" अशोक ने कोमलता से पूछा.

"फिर..." सरोज ने आँखें मूँद लीं, जैसे उस दृश्य को भगाना चाहती हो. "जब वह बेहोश पड़ी थी... तब... उनमें से दो... महेश और बलवंत... उन्होंने उसे... छुआ. उसके कपड़े... फाड़े. मैं दूर झाड़ियों में छिपी थी... रो भी नहीं सकी. सब देखा. फिर वे सब, खुसर-फुसर करते हुए, चले गए. रंजन साहब वहीं ज़मीन पर बैठे थे... डरे हुए, काँपते हुए."

अशोक का दिल ज़ोर से धड़का. पुलिस रिपोर्ट में बलात्कार का जिक्र तक नहीं था. यह सामूहिक हिंसा का चरम, 'मर्यादा' के नाम पर किया गया सामूहिक अधिकार जताना था. उसने डायरी में नोट किया: 'मर्यादा = सामूहिक हिंसा + सामूहिक बलात्कार का बहाना.'

"तुमने पुलिस को यह क्यों नहीं बताया, सरोज?"

"कौन सुनता?" सरोज की आँखों में आँसू आ गए. "करन चाचा कहते, अगर किसी ने मुँह खोला, तो उसका वही हाल होगा. और पुलिस... पुलिस तो उनकी ही सुनती है."

अशोक समझ गया. पुलिस बलात्कार से इनकार कर रही थी क्योंकि आरोपी 'गाँव के सम्मानित' लोग थे. प्रिया का शोषण शुरू हुआ था एक सवर्ण पुरुष के झाँसे से, और पूरा हुआ था गाँव के दंबंगों की सामूहिक क्रूरता से. और अंत में, रंजन ने, उस सामूहिक हिंसा के बाद, सिर्फ अपने बचाव के लिए, उसी लड़की का गला घोंट दिया जिससे वह 'प्यार' करने का नाटक करता था. शव तालाब में फेंक दिया, जैसे कोई कूड़ा.


उस रात, अशोक का छोटा सा कार्यालय रोशनी से जगमगा रहा था. दीवार पर प्रिया की एक धुंधली सी तस्वीर टंगी थी. उसके सामने तीन कॉलम बने थे:

पहला ¬: रंजन: छल, शोषण, हत्या.
दूसरा : करन और गिरोह: सामूहिक हिंसा, सामूहिक बलात्कार (छिपाया हुआ), धमकी.
तीसरा : पुलिस जानबूझकर लापरवाही, सबूत दबाना.

वह जानता था, कोर्ट में सिर्फ पहला कॉलम ही चलेगा. दूसरा गाँव की सामूहिक चुप्पी और डर में दफन रहेगा. तीसरा सिस्टम की लाचारी कहलाएगा.

तभी उसकी नज़र अपनी पुरानी पत्रकारिता की डायरी पर पड़ी. पहले पन्ने पर लिखा था: "सच कोई तथ्य नहीं, एक प्रतिबद्धता है."

उसने फोन उठाया. राहुल का नंबर डायल किया, वह उसका पुराना साथी था, अब एक बड़े अखबार का निर्भीक एडिटर.

"राहुल, तैयार हो जाओ."

"क्या हुआ, अशोक? फिर किसी केस में उलझ गए?"

"यही समझ लो.”

“इस बार मेरी खुद की भांजी का मामला है.”

"क्या?

"सच का जिसे दफनाने की पूरी कोशिश हुई है. एक दलित लड़की के सपनों, उसके शोषण और उसकी हत्या का. और सिर्फ एक इंसान की नहीं... एक पूरे तंत्र की हत्या का."

फोन के दूसरे छोर पर एक पल की चुप्पी थी. फिर राहुल की आवाज़ आई, दृढ़ और स्पष्ट.

"बताओ क्या करना है?"

"मैं रिपोर्ट भेजता हूँ.

...........

अशोक ने प्रिया की तस्वीर की ओर देखा. वह अब केवल एक वकील नहीं था. वह कमला दीदी और जीजा शिवदीन के दर्द, सरोज के डर, और अपने ही समुदाय के अपमान का जीता-जागता साक्षी था. उसे अब खुद उस सिस्टम से लड़ना होगा, जो जाति के नाम पर हिंसा को अनदेखा कर देता है.

उसने कलम उठाई. शिकायत का मसौदा शुरू किया. पहली पंक्ति लिखी:

"यह केवल एक हत्या का मुकदमा भर नहीं होगा. यह सदियों पुरानी सड़ी-गली व्यवस्था के खिलाफ, एक साक्षी का बयान होगा..."