@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: 2026

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

काउंटर-इंटेलिजेंस

देहरी के पार, कड़ी - 13
रामजी काका के कर्मचारियों की सूचना से स्पष्ट हो गया कि अभी प्रिया का पीछा करने वाले मेवाड़ भोजनालय तक नहीं पहुँचे. प्रशांत बाबू ने अपनी कॉफी का आखिरी घूंट लेकर अपने हैंड बैग से पेंसिल और खाली कागज निकाला, कागज को मेज पर फैला कर पेंसिल से कागज पर एक अजीब सा डायग्राम बनाया. फिर प्रिया से बोले, “प्रिया, तुम डरो मत.”

“मैं डरी कहाँ हूँ, सर. मैं स्कॉर्पियो को चकमा देकर आई हूँ. प्रिया ने पूरी शिद्दत से जवाब दिया. “आखिर वह दोपहर से मेरी निगरानी कर रहा था और पहली बार में ही मेरी निगाह में आ गया.”

"प्रिया, फिर ठीक है, वो फिल्मी डायलॉग बिलकुल सही है कि ‘जो डर गया, सो मर गया, तो जीवन में कभी डरना नहीं है, हर स्थिति में मुसीबत का मुकाबला करना है. अब हम इस काली स्कॉर्पियो को एक सॉफ्टवेयर 'बग' की तरह देखेंगे, जो तुम्हारे सिस्टम में घुसने की कोशिश कर रहा है," प्रशांत बाबू की आवाज़ में एक अजीब ठहराव था.

प्रिया ने गहरी सांस ली और अपना फोन निकाला. "सर, वह मेरा पीछा कर रहा है, तो वह 'डेटा' भी छोड़ रहा है. अब पूरी संभावना है कि वह कल सुबह मेरे ऑफिस पहुँचने के पहले ही वहाँ आ खड़ा होगा." उसने तुरंत एक एक्सेल शीट जैसा मानसिक खाका तैयार किया—समय, स्थान और वाहन का प्रकार. उसने महसूस किया कि 'पैटर्न रिकग्निशन' (नियत ढाँचों की पहचान) ही सुरक्षा की पहली सीढ़ी है. यदि हम पीछा करने वाले के समय और रास्ते को समझ लें, तो उसकी अगली चाल का अंदाज़ा लगा सकते हैं.

“बिलकुल, तुमने ठीक पहचाना. अब वह जानना चाहता है कि तुम कहाँ रहती हो? और ऑफिस के सिवा और कौनसी जगहें हैं जहाँ तुम अक्सर जाती हो. तुमने उसे चकमा देकर बहुत ही बुद्धिमत्ता और बहादुरी का काम किया है. एक आम व्यक्ति से ऐसी आशा कोई नहीं करता. तुम ज़रूर जासूसी उपन्यास पढ़ती होगी?”

“नहीं सर बस कभी-कभी कुछ पढ़ लिया है.” प्रिया ने सकुचाते हुए उत्तर दिया.

“तभी तुमने यह होशियारी कर ली. लेकिन आगे भी यह होशियारी जारी रहनी चाहिए. कम से कम तुम्हारे फ्लैट का उन्हें पता नहीं लगना चाहिए. यहाँ भोजनालय वे पहुँच जाएंगे तो कोई बात नहीं यहाँ उनसे निपटने के लिए हमेशा कुछ लोग रहते हैं.”

“ठीक सर, मैं ध्यान रखूंगी.” कल हम उसकी गतिविधि पर और अधिक ध्यान रखेंगे. अब तुम चाहो तो जा सकती हो.”

“अरे, बिटिया ऐसे कैसे जाएगी? पहले खाना खाएगी. फिर मैं इसे इसके फ्लैट पर छोड़कर आउंगा.

...

अगली सुबह ऑफिस पहुँचते ही प्रिया ने सदा की भाँति टीम मीटिंग की. रोज़ से अलग आज उसने मीटिंग रूम को अंदर से बंद करवाया. उसने काली स्कॉर्पियो और विक्रांत के मुंबई में होने की बात सभी को बताई, तो एकदम सन्नाटा छा गया. लेकिन यह सन्नाटा डर का नहीं, बल्कि रणनीति बनाने का था.

राहुल ने तुरंत अपना लैपटॉप खोला. "प्रिया, सबसे पहले अपने 'डिजिटल फुटप्रिंट' साफ करो. हम अक्सर अनजाने में अपनी लाइव लोकेशन, सोशल मीडिया चेक-इन्स और यहाँ तक कि कैब बुकिंग के स्क्रीनशॉट साझा कर देते हैं. यह पीछा करने वाले के लिए 'जीपीएस' का काम करता है."

स्नेहा और आदित्य ने एक 'रोस्टर' बनाया. तय हुआ कि अगले दो दिन प्रिया अकेले कहीं नहीं जाएगी. टीम का एक सदस्य हमेशा उसके साथ रहेगा, लेकिन इस तरह कि दूर से देखने वाले को शक न हो. यह 'कम्युनिटी विजिलेंस' (सामूहिक सतर्कता) का एक पाठ था—कि सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपनों की एकजुटता और एकजुट कार्रवाई भी है.

...

उधर, अपने ऑफिस में विक्रांत शेखावत पर चिल्ला रहा था. "कल वह गायब कैसे हो गई? एक लड़की मुंबई की गलियों में तुम लोगों को चकमा कैसे दे गई?"

विक्रांत का अहंकार उसे यह मानने नहीं दे रहा था कि प्रिया अब इतनी बदल चुकी है और इतनी होशियार हो चुकी है कि उसके लोगों को आसानी से चकमा दे दे. उसे लगा कि शायद यह इत्तफाक था. उसने आदेश दिया, "आज रात वह जहाँ भी जाए, मुझे उसकी तस्वीर चाहिए. मुझे देखना है कि वह किसके साथ है." उसे नहीं पता था कि उसका 'शिकार' अब खुद उसे एक नियंत्रित वातावरण (Controlled Environment) में खींच रहा है.

...

अगले दिन दोपहर लंच के समय प्रिया और स्नेहा दोनों बाहर निकली और ऑटो लेकर कोई एक किलोमीटर दूर उतर कर एक रेस्टोरेंट में घुस गयीं, और तुरन्त ही पीछे गली में निकल कर अगली सड़क से ऑटो कर स्कॉर्पियो वाले को चकमा देकर वापस आफिस पहुँच गयीं. वहाँ प्रशांत बाबू उनका इंतजार कर रहे थे.

“कहाँ गई थी?” प्रशांत बाबू ने पूछ लिया?

“कुछ नहीं हम एक बार और स्कॉपियो वाले को चकमा दे आए हैं. अब वह घंटे दो घंटे बाद वापस इधर आएगा. बस उसके साथ थोड़ा मजाक था.” प्रिया की बात सुन कर प्रशांत बाबू को हँसी आ गई.

उन्होंने प्रिया को एक छोटा सा डिवाइस दिया. "यह वॉयस रिकॉर्डर और जीपीएस ट्रैकर है. आज तुम उसी रास्ते से जाओगी जहाँ वह स्कॉर्पियो खड़ी रहती है. लेकिन आज तुम 'शिकार' नहीं, बल्कि 'चारा' (Bait) बनोगी."

योजना सरल थी लेकिन प्रभावी. प्रिया को सामान्य तरीके से ऑफिस से निकलकर एक खास पॉइंट तक जाना था. पीछे स्कॉर्पियो होगी, लेकिन उस स्कॉर्पियो के पीछे टीम के लड़के अलग-अलग टैक्सियों में और प्रशांत बाबू की 'आईडिया' यूनियन के दो साथी बाइकों पर होंगे. प्रशांत बाबू कुछ और बातें प्रिया को समझाकर चले गए. प्रिया और उसके साथी अपने काम में जुट गए. आखिर उन्हें आज ही अपना प्रोजेक्ट पूरा करना था.

रात सवा आठ बजे तक प्रिया का प्रोजेक्ट पूरा हुआ. सबने एक दूसरे को बधाई दी. तय किया कि कल सुबह हम इसकी टेस्टिंग करेंगे और फिर क्लाइंट को हैंडओवर कर देंगे. इसके बाद प्रिया ने आईने में खुद को देखा. अपने फोन की सेटिंग बदली, अपनी टीम को 'सेंड' का बटन दबाया और ऑफिस से बाहर कदम रखा. उसे पता था कि काली स्कॉर्पियो की हेडलाइट्स चालू हो गई होंगी, लेकिन आज उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी. वह अब भाग नहीं रही थी, वह 'एविडेंस गैदरिंग' (सबूत जुटाने के) मिशन पर थी.
... क्रमशः

मंगलवार, 31 मार्च 2026

काली स्कॉर्पियो

देहरी के पार, कड़ी - 12
मुम्बई के अंधेरी वेस्ट के अपने एक्सपोर्ट दफ्तर में विक्रांत फाइलें पलट रहा था. वह यहाँ आते ही बुरी तरह फँस गया था. हिसाब में बहुत गड़बड़ियाँ थीं; खर्च अधिक दिखाए गए थे. बिलों की जाँच करने पर पता चला कि उसका अकाउंटेंट और मैनेजर दोनों मिलकर ग़बन कर रहे हैं. उसने कोटा से अपने अकाउंटेंट और मैनेजर के सहायकों को बुला लिया. ग़बन की रिपोर्ट कराकर दोनों बेईमान कर्मचारियों को गिरफ्तार करवाया. इन सब में उसे पूरा एक सप्ताह गुजर गया. थोड़ी राहत मिली तो उसे प्रिया का खयाल आया. बिजनेस की गड़बड़ी में वह उसे भूल ही गया था.

उसने अपने सबसे वफादार कारिंदे, शेखावत को बुलाया. मेज पर प्रिया की तस्वीरें रखते हुए उसने भारी आवाज़ में कहा, "यह रही लड़की. इसकी कंपनी का पता मैंने निकाल लिया है. कल सुबह तुम ऑफिस के बाहर रहोगे. मुझे यह देखना है कि यह मुम्बई में कितनी 'आज़ाद' घूम रही है. इसके फ्लैट का पता, इसके उठने-बैठने की जगह... सब मुझे कल शाम तक चाहिए."

प्रिया के लिए पिछला सप्ताह किसी तपस्या से कम नहीं था. प्रशांत बाबू के 'सामूहिक नेतृत्व' वाले सूत्र ने टीम के भीतर जो ऊर्जा फूँकी थी, उसका परिणाम साफ दिख रहा था. जिस प्रोजेक्ट का समय से पूरा होना असंभव लग रहा था, वह दौड़ पड़ा था. सुबह की पंद्रह मिनट की मीटिंग अब केवल काम की चर्चा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए प्रेरणा बन गई थी. राहुल, स्नेहा और आदित्य अब केवल अपने-अपने 'मॉड्यूल' पर काम नहीं कर रहे थे, बल्कि जहाँ भी कोई अटकता, पूरी टीम उसे सुलझाने में जुट जाती. प्रिया ने महसूस किया कि जब 'बॉस' का डर खत्म होता है, तो 'जिम्मेदारी' का भाव अपने आप जन्म लेता है. प्रोजेक्ट डेडलाइन से दो दिन पहले ही पूरा हो जाने की संभावना थी.

सोमवार सुबह आठ बजे ही उसके कोटा के मित्र समीर का फोन आया, “मैं सुबह मुम्बई पहुँचा हूँ. आज ही कोटा वापसी की ट्रेन भी है. तुम्हारे ऑफिस के नजदीक ही काम है, दोपहर दो बजे के तुम मिलोगी?”

कोटा से निकलने के बाद किसी मित्र से रूबरू मिलने का पहला अवसर था, प्रिया उसे कैसे गँवाती. उसने समीर को ऑफिस के निकट ही रेस्टोरेंट में लंच का न्यौता दे दिया. उसने अपनी टीम से सामूहिक लंच से गैरहाजिर रहने की छूट ली और दो बजे ऑफिस से निकल कर ऑटो लिया और रेस्टोरेंट पहुँची. वह ऑटो वाले को भुगतान कर रही थी, तभी उसकी नजर एक काले रंग की पुरानी फाइव-सीटर स्कॉर्पियो पर पड़ी. इस एसयूवी को उसने ऑफिस के गेट से कुछ दूर खड़े देखा था. उसका ऑटो रवाना होने तक वह वहीं थी. अब उसका ऑटो रुकते ही पीछे आकर रुकी हुई थी. उसका माथा ठनका. लेकिन वह उसकी उपेक्षा करके रेस्टोरेंट में घुस गई.

समीर वहाँ पहले से मौजूद था. दोनों ने साथ लंच किया. समीर ने कोटा से जयपुर और मुम्बई तक की उसकी कहानी सुनी और कोटा की जानकारियाँ दीं. उसने बताया कि विक्रांत ने उसके पिता ब्रज मोहनजी की मंडी में साख और उसके साथ होने वाले विवाह का लाभ उठा कर मंडी में अनेक सौदे कर लिए थे. उसने एक्सपोर्ट के लिए माल उठाया, लेकिन समय निकल जाने पर भी भुगतान नहीं किया था. जिससे उसकी मंडी में और उनकी बिरादरी में भारी बदनामी हो गई थी. विक्रांत कोटा छोड़कर मुम्बई आ चुका है और मंडी में किए गए सौदों के रुपए अदा करने की व्यवस्था किए बिना अब कोटा में मुहँ नहीं दिखा सकता. समीर ने उसे सावधान भी किया कि वह भी विक्रांत की हरकतों से सावधान रहे.

लंच के बाद वह रेस्टोरेंट से बाहर आई. काली स्कॉर्पियो वहीं रेस्टोरेंट से कुछ दूर खड़ी थी. उसने वहीं से समीर को विदा किया और एक ऑटो रोककर उसे अपने ऑफिस छोड़ने को कहा. आटो जैसे ही रवाना हुआ. काली स्कॉर्पियो भी उसके पीछे हो ली. ऑफिस पहुँच कर प्रिया अपनी टीम के साथ रात काम करती रही.

अपने फ्लैट जाने के लिए प्रिया ऑफिस से बाहर आई तो उसने देखा कि काली स्कॉर्पियो वहीं तैयार खड़ी है. उसके चेहरे पर मुस्कुराहट फैल गई. स्कॉर्पियो ने उसका इरादा बदल दिया. वह ऑटो में बैठी और उसे मेवाड़ भोजनालय चलने को कहा. उस दिन वह ऑटो को कोई डेढ़ सौ मीटर पहले ही उतरकर एक छोटी गली में घुस गई. उसके पीछे आ रही स्कॉर्पियो का चालक कुछ समझे और उतरकर पैदल उसका पीछा करे, तब तक वह आगे चल कर एक और छोटी गली में मुड़ गयी. अब वह स्कॉर्पियो चालक की नजर से पूरी तरह दूर थी. उसे दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. पर वह घूम फिर कर मेवाड़ भोजनालय में थी.

साढ़े आठ बज चुके थे. भोजनालय में इक्का-दुक्का ग्राहक डिनर कर रहे थे. प्रशांत बाबू सदा की तरह कॉर्नर टेबल पर बैठे, अखबार के साथ कॉफी पी रहे थे. रामजी काका काउंटर पर बैठे अपने कर्मचारी को निर्देश दे रहे थे. काका को अभिवादन कर वह सीधी कॉर्नर टेबल पर पहुँची. अपना बैग टेबल पर रखकर प्रशांत बाबू को नमस्ते करते हुए बैठ गई.

“नमस्ते, प्रिया कैसी हो? आज ऑफिस से देर से छूटी? तुम्हारा प्रोजेक्ट कैसा चल रहा है?

“बिलकुल ठीक हूँ, ऑफिस समय से ही छूटा है, बस कोई डेढ़ सौ मीटर पहले उतर कर पीछे की बस्ती में पैदल घूमकर आई हूँ, और मेरा प्रोजेक्ट तय समय से दो दिन पहले परसों पूरा हो जाएगा. आपका सामूहिक नेतृत्व का सूत्र बहुत काम आया.” प्रशांत बाबू ने एक साथ तीन सवाल किए थे; प्रिया ने उसी तरह उत्तर भी दे दिया. तभी रामजी काका खुद प्रिया के लिए कॉफी लेकर टेबल पर पहुँच गए.

“काका, आज आपको थोड़ी देर बैठना पड़ेगा. कुछ काम है.”

कॉफी टेबल पर रखकर रामजी प्रिया के पास बैठ गए. प्रिया ने काली स्कॉर्पियो का पीछा करने की बात दोनों को बताई. रामजी ने तुरन्त अपना एक नौकर स्कॉर्पियो की तलाश में भेजा. बीस मिनट बाद नौकर ने लौटकर बताया कि काली स्कॉर्पियो कोई डेढ़ सौ मीटर पहले खड़ी थी. फिर कोई दस मिनट बाद एक आदमी आकर उसमें बैठा और स्कॉर्पियो को मोड़कर चला गया.
... क्रमशः

सोमवार, 30 मार्च 2026

टीम खुशबू

देहरी के पार, कड़ी - 11

प्रशांत बाबू से बातचीत के बाद प्रिया के अशांत मन को बहुत राहत मिली. उसे जल्दी ही नींद आ गई. सुबह आँखें खुली, वह बिस्तर से नीचे भी न उतरी थी कि अलार्म बजने लगा. वह मन ही मन मुस्कुरा उठी कि आज उसके शरीर की घड़ी ठीक काम कर रही थी. थकान पूरी तरह गायब थी, मन का भारीपन भी जाता रहा था, जिससे वह पिछले कई दिनों से परेशान थी. उसने आईने में खुद को देखा—आज अक्स साफ़ था. प्रशांत बाबू ने सही कहा था, डर केवल एक पुरानी आवाज है जिसे हम अनजाने में अपना मान लेते हैं.

ऑफिस पहुँचते ही प्रिया ने अपनी टीम की एक अनौपचारिक मीटिंग बुलाई. कॉन्फ्रेंस रूम का माहौल हमेशा की तरह थोड़ा औपचारिक और थका हुआ था. प्रिया ने अपनी डायरी मेज पर रखी और मुस्कुराते हुए शुरू किया.

"साथियों, कल तक मैं आप पर एक 'डेडलाइन' का दबाव डाल रही थी, लेकिन कल शाम मुझे अहसास हुआ कि मैं गलत थी. यह प्रोजेक्ट सिर्फ मेरी जिम्मेदारी नहीं है, यह हम सबकी साझी विरासत है."

वह अपनी टीम के एक-एक सदस्य का नाम लेकर बोलने लगी. "आदित्य, तुम्हारे कोडिंग के लॉजिक ने हमारा हफ़्तों का समय बचाया है. स्नेहा, तुम्हारा डिजाइन क्लाइंट की उम्मीदों से कहीं ऊपर है. राहुल, तुम्हारी टेस्टिंग की बारीकियों ने हमें बड़े खतरों से बचाया है."

प्रिया ने महसूस किया कि जैसे-जैसे वह उनके योगदान का उल्लेख करते हुए उनकी प्रशंसा कर रही थी, कमरे की हवा बदल रही थी. लोगों के कंधों का तनाव कम हो रहा था और उनकी आँखों में एक चमक लौट रही थी. उसने अंत में कहा, "मैं यहाँ आपकी बॉस नहीं हूँ, आपकी साथी हूँ. मैं भी टीम का वैसा ही हिस्सा हूँ जैसे आप सब हैं. बस कंपनी ने मुझे टीम की लीड बना दिया है. पर मेरी भूमिका क्या है? हम सब मिलकर काम कर रहे हैं. सबका प्रोजेक्ट में समान योगदान है. मैं एक माध्यम भर हूँ जिससे हमारी कंपनी का प्रबंधन और कंपनी का क्लाइंट हमारी टीम के साथ कम्युनिकेट करते हैं. यह वैसे ही है जैसे किसी खास मैच के लिए टीम में से एक खिलाड़ी को कप्तान बना दिया जाता है. हम सब ठान लें तो इस प्रोजेक्ट को समय से पहले पूरा कर सकते हैं, और हम करेंगे. इसलिए नहीं कि हमें डर है, बल्कि इसलिए क्योंकि यह हमारी सामूहिक काबिलीयत का सबूत होगा."

प्रिया के इन चंद वाक्यों ने सबके मन पर से प्रोजेक्ट का दबाव हटा दिया. सब खुश नजर आ रहे थे.

तभी राहुल ने कहा, “प्रिया, हमें रोज सुबह एक मीटिंग करनी चाहिए, इससे हमें अपने लक्ष्य पर पहुँचने में बहुत मदद मिलेगी.”

राहुल से ‘प्रिया’ संबोधन सुनकर एक क्षण के लिए वह चौंकी. राहुल हमेशा उसे मैम कहता था. आज उसने उसके नाम से संबोधित किया. लेकिन अगले ही क्षण वह मुस्कुरा उठी. यह टीम में समानता की भावना का आरंभ था. प्रिया ने कहा, “हाँ, हम रोज दिन के आरंभ में मीटिंग करेंगे और उसके बाद कैंटीन चल कर एक साथ कॉफी पीकर ताजगी हासिल करेंगे और फिर काम में जुट जाएंगे. अब हम कॉफी के लिए कैंटीन चल सकते हैं.”

आदित्य ने हलकी आवाज में नारा लगाया, “हिप हिप हुर्रे.”

सबने उसका जवाब दिया, प्रिया भी उनमें शामिल थी.

उस दिन उनकी टीम के काम में एक जादुई ऊर्जा थी. लंच ब्रेक में भी उसका असर दिखा. टीम के सब लोग एक साथ खाने बैठे. सबने एक दूसरे से खाना शेयर किया. खाते हुए भी वे चर्चा करते रहे. खाने के बाद भी सुस्ती सिरे से गायब थी. शाम को प्रिया ने देखा कि जिस काम के लिए अनुमान था कि वह तीन दिन का समय तो लेगा. लेकिन उसका आधे से अधिक शाम के पहले ही पूरा हो चुका था. प्रशांत बाबू का 'टीम लीडर बनाम सुपरवाइजर' वाले सूत्र ने वाकई चमत्कार कर दिखाया था.

उधर कोटा की 'मोहन विला' में सन्नाटा था. पर यह एक बड़े बदलाव की आहट थी. ब्रज मोहनजी की चुप्पी ने विक्रांत को और ज्यादा हिंसक बना दिया था. वह सुबह-सुबह पहुँच गया और चिल्लाते हुए व्यापारिक साख की दुहाई देने लगा.

तभी मयंक कमरे में दाखिल हुआ. उसके हाथ में कुछ दस्तावेज़ थे. "विक्रांत भाई, अब बहुत हुआ. ये उन व्यापारियों की लिस्ट है जिनसे आपने हमारे नाम पर झूठे वादे किए थे. मैंने उनसे बात कर ली है. कोटा की मंडी अब आपकी धमकियों से नहीं डरेगी."

विक्रांत गुस्से से तमतमा उठा. उसने ब्रज मोहनजी की ओर देखा, पर उन्होंने अपनी नज़रें फेर लीं. मयंक ने आगे बढ़कर कहा, "हम आपकी बातों में नहीं आएंगे. हमने आपसे प्रिया के रिश्ते की बात करके ही गलती की थी. आप एक जीती जागती इंसान को अपनी संपत्ति ही समझने लगे. मुम्बई पुलिस की एफआईआर आपके लिए एक चेतावनी है कि सुधर जाओ."

अपनी जड़ें हिलते देख विक्रांत वहाँ से पैर पटकता हुआ निकल गया. उसकी आँखों में खतरनाक चमक थी. उसे समझ आ गया था कि कोटा की ज़मीन उसके पैरों के नीचे से खिसक चुकी है, अब उसे मुम्बई जाकर ही आखिरी दांव खेलना होगा.

रात नौ बजे विक्रांत मुम्बई जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस में था. उसने तय किया था कि अब वह मुम्बई का कारोबार संभालेगा, और  प्रिया को भी सबक सिखाएगा.

शाम के आठ बजे प्रिया ऑफिस से सीधे 'मेवाड़ भोजनालय' पहुँची. रामजी काउंटर पर थे, प्रशांत बाबू अभी नहीं आए थे.

"काका, आज चमत्कार हो गया. टीम ने वह कर दिखाया जो नामुमकिन लग रहा था," प्रिया ने उत्साह से कहा.

रामजी ने मुस्कुराकर उसे पानी दिया. "प्रशांत बाबू कहते हैं कि जब इंसान खुद को छोटा समझना बंद कर देता है, तो पहाड़ भी हिला सकता है. आज उनकी एसोसिएशन की मीटिंग है, वे देर से आएंगे."

प्रिया ने बाहर सड़क की ओर देखा. भीड़ भाग रही थी. अब उसे कोई डर नहीं था. उसने महसूस किया कि उसका अक्स अब आईने से बाहर आकर खुशबू हो रहा था. 

... क्रमशः

रविवार, 29 मार्च 2026

जड़ों की समझ

देहरी के पार, कड़ी - 10
प्रिया को जिस प्रोजेक्ट का लीड बनाया गया था उसकी डेडलाइन निकट थी. फेक आईडी प्रकरण ने उसके काम को प्रभावित किया था. उसे लगा कि प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो सकेगा. टीम लीड के रूप में उसका यह पहला प्रोजेक्ट था. वह अब कर्मचारी के साथ एक 'लीडर' की भूमिका में थी. उसे अपनी टीम को साथ लेकर काम करना था. विक्रांत की हरकत ने उसका मनोबल तोड़ने की कोशिश की थी. यदि रामजी काका, प्रशांत बाबू, आकाश, उसके पापा और उसके मैनेजर देसाई ने उसका साथ नहीं दिया होता तो वह सफल हो ही गया था.

अब वह पूरी क्षमता से इस प्रोजेक्ट में लगना चाहती थी. लेकिन अभी भी ‘विक्रांत और उसे पिता के मौन समर्थन’ की बात उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी. काम के दौरान यह याद आता और उसका सारा उत्साह शांत पड़ जाता और अवसाद हावी होने लगता. जैसा सोचा था, काम उसके हिसाब से नहीं हुआ. पूरी टीम में खुद वही सबसे सुस्त रही. इसका असर तमाम टीम मेंबरों पर भी पड़ा, वे भी धीमे हो गए. शाम तक वह लगभग हताशा की स्थिति में पहुँच गई. जैसे-तैसे आठ बजे, उसने अपना लैपटॉप ऑफ करके बैग में डाला और ऑफिस से निकल पड़ी.

बाहर आते ही उसे लगा कि अपने फ्लैट में वह अकेली होगी और अवसाद बढ़ेगा. उसने अपना इरादा बदल दिया. वह रामजी के भोजनालय जा पहुँची. आटो से उतरकर भोजनालय में प्रवेश करते ही उसने देखा, प्रशांत बाबू कॉर्नर टेबल पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे.

प्रिया ने ‘राम-राम काका’ कह कर काउंटर पर बैठे रामजी का अभिवादन किया और कॉर्नर टेबल पर जा बैठी. प्रशांत बाबू ने सिर उठा कर उसे देखा. “अरे तुम, लगता है तुम भी ऑफिस से सीधे इधर आ गई.”

“हाँ, सर!” मैंने आज दिनभर काम के बीच अवसाद महसूस किया. मेरी टीम का काम भी सुस्त रहा. मुझे लगा कि कुछ देर रामजी काका से बात करूंगी तो मन को तसल्ली मिलेगी. फ्लैट पर जाकर अकेले रहने से अधिक अवसाद में आ जाती. अब तो आप मिल गए हैं तो मेरे लिए यह सोने में सुहागा हो गया.”

प्रशांत बाबू ने हाथ का अखबार समेटकर साइड में रखा और कहने लगे, "प्रिया, जिसे तुम 'अवसाद' कह रही हो, दरअसल यह तुम्हारे भीतर का द्वंद्व है. तुम यहाँ मुम्बई में अपने लिए एक नई दुनिया गढ़ रही हो, लेकिन तुम्हारी पुरानी दुनिया, तुम्हारे पापा और उनका वर्चस्व तुम्हारे काम में लगातार बाधा बन रहे हैं.

तुम कहती हो कि 'विक्रांत की हरकतें' और उसे 'पापा का मौन समर्थन' तुम्हें कमजोर कर रहे हैं, तो समझो कि ऐसा क्यों है. विक्रांत ने तुम्हें एक 'इंसान' नहीं, केवल शरीर और 'संपत्ति' समझा. और जब संपत्ति किसी के हाथ से निकलती है, तो उसका स्वामी समझने वाला उसे वापस पाने के लिए हर हथकंडा अपनाता है. तुम्हारे पिता का मौन भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है जहाँ बेटी की आज़ादी को 'कुल की मर्यादा' से तौला जाता है. तुम्हें आज ऑफिस में जो हताशा हुई, वह इसलिए कि तुमने अनजाने में उनकी उन आवाजों को अपने भीतर जगह दे दी, है जो कहती हैं कि 'तुम अकेले कुछ नहीं कर सकतीं'.”

“हाँ, यह तो है. मैं कोशिश करूंगी कि उन आवाजों को अपने भीतर से निकाल डालूँ.” प्रशांत बाबू की बात प्रिया को ठीक लगी. “लेकिन इस सबके बीच मेरे प्रोजेक्ट का पता नहीं क्या होगा? डेडलाइन में दो सप्ताह भी नहीं बचे.”

“ऐसा कुछ नहीं कि तुम्हारा प्रोजेक्ट समय सीमा में पूरा न हो सके. यदि एक दो दिन की देरी भी हो जाए तो हर प्रोजेक्ट के लिए कंपनी के पास कुछ स्पेयर समय होता है, और तुम्हारे मैनेजर तुम्हें समझते हैं. तुम्हारी टीम की तुम सिर्फ लीड हो, उनके ऊपर सुपरवाइजर नहीं. तुम्हारी टीम के सभी मेंबर, सीनियर या जूनियर महत्वपूर्ण हैं. प्रोजेक्ट के काम में सभी का योगदान है. तुम्हें हर मेंबर के अब तक के काम का उल्लेख करते हुए उनके योगदान की प्रशंसा करनी चाहिए और उन्हें अहसास कराना चाहिए कि ‘वे सभी समान हैं, अब तक सबने बहुत अच्छा काम का किया है, सभी को मिल कर प्रोजेक्ट को समय सीमा से पहले पूरा करना है, इस प्रोजेक्ट की कामयाबी सभी टीम मेंबरों की होगी, केवल लीड की नहीं’. जब तुम्हारे टीम मेंबरों को अहसास होगा कि वे सब एक टीम हैं और टीम में सब समान हैं, तुम खुद को उनसे ऊपर नहीं समझती और सबसे अधिक काम करते हुए सबकी काम में मदद करती हो तो वे सब मेहनत से काम करेंगे. तुम्हारा प्रोजेक्ट समय से पहले पूरा हो लेगा. अब तुम तुम्हारे पिता और विक्रांत के बारे में सोचना बंद करो और अपने प्रोजेक्ट पर ध्यान दो.”

प्रिया तन्मयता से प्रशांत बाबू को सुन रही थी. तभी रामजी काका दो चाय लेकर खुद आ गए. “प्रशांत बाबू, हमारी बिटिया को लंबे लेक्चर से परेशान मत करो, वैसे ही ऑफिस से थकी हुई लौटी है. दोनों चाय पीजिए थोड़ी थकान उतरेगी.” वे चाय रख कर वापस अपने काउंटर की ओर बढ़ गए.

प्रशांत बाबू ने अपनी बात जारी रखी, “यह अवसाद नहीं, बल्कि तुम्हारी मानसिक थकान का प्रतिबिंब है. तुमने घर छोड़ दिया, आज तुमने अकेले फ्लैट में बंद होकर हार मानने के बजाय संवाद को चुना. यह तुम्हारी जीत है. विक्रांत और तुम्हारे पापा समाज के पुराने सामंती और पितृसत्ता के ढाँचे में ढले हुए लोग हैं. वे अपनी सोच और स्थिति के समान व्यवहार कर रहे हैं. जब तुम समझ लोगी कि तुम्हारी लड़ाई उस सोच के खिलाफ है जो तुम्हें 'वस्तु' मानती है, उस दिन तुम्हारा अवसाद ‘संकल्प’ में बदल जाएगा."

प्रशांत बाबू की बात तर्कपूर्ण थी. प्रिया को समझ आ रहा था कि जो कुछ उसके साथ हो रहा है, उसके पीछे गहरे सामाजिक और व्यवहारिक कारण हैं.

तभी रामजी आ गए. “सवा नौ बज रहे हैं बिटिया. प्रशांत बाबू के खाने का समय हो रहा है. तुम भी अब इतनी रात क्या बनाओगी. तुम्हारा भी लगवा देता हूँ.”

प्रिया ने सिर उठाकर रामजी की ओर देखा, उनकी बात प्रश्न नहीं बल्कि आदेश थी. वह क्या कहती, उसने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया.

उस रात प्रिया बहुत गहरी नींद सोई.
 ... क्रमशः

शनिवार, 28 मार्च 2026

अक्स

देहरी के पार, कड़ी - 9

रविवार की रात सोने के पहले प्रिया ने फोन देखा. पुलिस के साइबर सेल का मैसेज था. उसकी शिकायत दर्ज कर ली गई थी. उसे सोमवार सुबह दस बजे बयान देने के लिए गोरेगाँव थाने बुलाया था. वह जानती थी कि उसे अब संपत्ति नहीं समझा जा सकता, बल्कि 'प्रिया' होने का गर्व महसूस हो रहा था.

सुबह वह जल्दी उठकर तैयार होने लगी. तभी उसे विचार आया कि अकेले थाने जाने पर पुलिस सोच सकती है कि उसके साथ कोई नहीं. उसे रामजी याद आए, उसने तुरंत उन्हें फोन लगाया. रामजी कहने लगे, “बिटिया हम तुम्हारे साथ पुलिस स्टेशन चलेंगे, पर हम आईटी वालों की आईडिया यूनियन वाले प्रशांत बाबू को साथ ले चलें तो बढ़िया रहेगा. वे सुबह का नाश्ते के लिए अभी थोड़ी देर में आते होंगे. मैं उनसे बात कर लूंगा. तुम इधर ही आ जाओ”

प्रिया सवा नौ बजे भोजनालय पहुँच गई. प्रशांत बाबू पैंतालीस बरस के रहे होंगे. वह पहुँची, तब वे नाश्ता कर रहे थे. रामजी ने उसे उनसे मिलवाया. फिर बोले, “बिटिया तुम भी नाश्ता कर लो मैं भिजवाता हूँ. थाने में न जाने कितनी देर लगे.”

बातचीत में पता लगा कि प्रशांत बाबू आईटी और टेक्नोलॉजी का उपयोग करने वाली नॉन-आईटी कंपनियों के कर्मचारियों की एसोसिएशन (IIDEA) के सचिव हैं. वे बिहार से हैं और छात्र जीवन से ही वाम राजनीति में आ गए थे. वे अभी यहाँ टीसीएस में एसएसई सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट हैं. उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर लड़कियों को बदनाम करने की ऐसी हरकतें बहुत होती हैं. वे उसके साथ चलेंगे. प्रिया को लगा कि अब रामजी को थाने ले जाने की जरूरत नहीं. प्रिया ने रामजी को कहा कि काका आप भोजनालय देखें, मेरे साथ प्रशांत बाबू हैं ही.

दोनों ठीक दस बजे गोरेगांव पुलिस स्टेशन में थे. साइबर सेल की महिला अधिकारी, इंस्पेक्टर शीला ने उसकी बात सुनी. "मैडम, 'इम्पर्सोनेशन' (Impersonation) और 'साइबर स्टॉकिंग' गंभीर अपराध हैं. आपने अच्छा किया कि आपने इसे रिपोर्ट किया. हम मुलजिम को छोडेंगे नहीं." इंस्पेक्टर ने आश्वासन दिया कि वे उसकी सभी फेक आईडी को तुरंत 'टेक डाउन' कराएंगे. प्रिया को लगा कि आज़ादी की लड़ाई सिर्फ भावनाओं की नहीं, बल्कि कानूनों और डिजिटल सबूतों की भी है, और इसमें कुछ लोगों का साथ भी जरूरी है. प्रशांत बाबू कह रहे थे कि अधिकांश आईटी कर्मचारी अकेले रहते हैं. ऐसे में एसोसिएशन के साथी अच्छी भूमिका अदा करते हैं. एसोसिएशन अपने सदस्यों के प्रोफेशनल हितों के लिए भी काम करती है. प्रिया को लगा कि उसे भी एसोसिएशन का सदस्य होना चाहिए. पर वह इसके लिए कुछ समय लेना चाहिए.

प्रिया ऑफिस पहुँची, तो उसे माहौल में एक अजीब सा तनाव महसूस हुआ. वह जानती थी कि वह 'लिंक' सब देख चुके होंगे. वह सीधे अपने मैनेजर, मिस्टर देसाई के केबिन में गई. वे एक अनुभवी व्यक्ति थे. उन्होंने शांत स्वरों में कहा, "प्रिया, हमने फेक प्रोफाइल और तस्वीरें देखी हैं. यह बहुत ही ओछी हरकत है. मैंने एचआर को कहा है कि इसे कंपनी की किसी भी छवि के साथ न जोड़ा जाए और टीम को निर्देश दिए हैं कि इस पर कोई गपशप न हो. कंपनी तुम्हारी सुरक्षा और निजता के साथ खड़ी है." मिस्टर देसाई के कथनों से उसे बहुत मजबूती मिली. उसने टीम मीटिंग में अपना सिर ऊँचा रखकर हिस्सा लिया. उसने महसूस किया कि कुछ नज़रों में सवाल थे, तो अनेक उसके समर्थन में, पर एकजुट भी हो रहे थे. शाम को उसने देखा कि उसके नाम से बनाए गए सभी फेक अकाउंट गायब थे, पुलिस एक्शन में आ चुकी थी.

शाम को घर लौटते समय भोजनालय गयी. रामजी को बताया कि एफआईआर भी दर्ज हुई और पुलिस ने सारे फेक अकाउंट भी बंद करवा दिए हैं.

रामजी कहने लगे, “मुम्बई पुलिस जब काम करती है तो तेजी से करती है. फिर प्रशांत बाबू जाएँ तो पुलिस को फौरन एक्शन में आना पड़ता है. बिटिया, तुम्हें मेरे रहते मुंबई में किसी तरह की फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है.” रामजी का स्नेह उसे अपनी पुरानी ज़मीन से जोड़ता था.

तभी आकाश का कॉल आया. "प्रिया, मैंने साइबर विंग के उच्च अधिकारियों से बात की थी. सभी फेक आईडी ब्लॉक कर दी गई हैं. वे जल्दी ही विक्रांत का आईपी एड्रेस ट्रैक करके कोटा पुलिस को सूचित करेंगे. जिससे उसे मुंबई लाया जा सके. तुम अपने काम पर ध्यान दो." आकाश का प्रेम उसे नए आसमान में उड़ना सिखा रहा था.

प्रिया ने महसूस किया कि वह अकेली नहीं है. एक तरफ रामजी का निस्वार्थ वात्सल्य और दूसरी तरफ आकाश का सुरक्षात्मक और सशक्त साथ. उसने तय किया कि वह डरेगी नहीं. अगले दिन उसने अपने ऑफिस के कंप्यूटर पर वह इंटरनेशनल प्रोजेक्ट का 'डेटाबेस' खोला और एक नई ऊर्जा के साथ काम करना शुरू कर दिया. अब उसे 'सीनियर लीडर' की तरह अपनी टीम को दिशा देनी थी.

उधर कोटा में विक्रांत को जैसे ही पता चला कि उसकी वह फेक आईडी उड़ गई है, वह बौखला गया. वह समझ गया कि यह पुलिस का काम है. प्रिया उसकी करतूतों से घबराई नहीं, बल्कि उसने एफआईआर करके पुलिस को एक्टिव कर दिया है. वह सीधा प्रिया के पिता के पास के 'मोहन विला' पहुँचा.

"अरे अंकल, आपकी बेटी ने तो हद्द कर दी! अब तो पुलिस केस हो गया है. पूरे व्यापारिक जगत में बदनामी होगी."

ब्रज मोहन गुप्ता चुप रहे. उनके चेहरे पर अब गुस्से से ज़्यादा एक गहरा 'अविश्वास' और 'हताशा' थी. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे विक्रांत पर विश्वास करें, जो उनकी प्रतिष्ठा के घाव पर नमक छिड़क रहा था, या अपनी बेटी के उस 'अक्स' पर जो मुम्बई की भीड़ में अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहा था. प्रिया के भाई मयंक ने धीरे से कहा, "पापा, प्रिया ने गलत नहीं किया. विक्रांत ने उसकी तस्वीरें चोरी करके गंदी हरकत की है." गुप्ताजी ने मयंक को डाँटा नहीं, बस एक गहरी साँस लेकर रह गए. विक्रांत भी गुप्ता पर कोई प्रतिक्रिया न देख वापस लौट गया.

 ... क्रमशः

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

संकल्प

देहरी के पार, कड़ी - 8 

शनिवार का अवकाश फ्लैट की सफाई और नए लाए गए सामानों को सही स्थान देने में पूरा हुआ. अब वह अपना खाना, नाश्ता, चाय, कॉफी आदि फ्लैट में बना सकती थी. कोई मिलने आए तो उससे हॉल में मिल सकती थी. दिन भर के काम ने उसे थका दिया था. थोड़ी देर के लिए वह बिस्तर पर लेटी तो उसे नींद लग गई. नींद टूटी तो आठ बजे थे. उसने बिस्तर से उठने की कोशिश की, लेकिन शरीर की ज्यादातर मांसपेशियाँ दर्द से चीख रही थीं. बहुत दिनों बाद इतना शारीरिक काम किया था, तो यह स्वाभाविक था. उसने अपने मेडिसिन बॉक्स से पैरासिटामोल की गोली निकाली और पानी के साथ गटक ली. एक कड़क ब्लैक कॉफी बना कर पीने बैठी. उसे लगा कि आज किचन तैयार हो जाने पर भी खाना बनाना संभव नहीं, उसने ऑर्डर कर दिया. उसे ध्यान आया कि मम्मी से बात करना था. कॉफी का खाली मग सिंक में पहुँचाने के बाद उसने मम्मी को फोन लगाया. बातचीत के शुरुआती औपचारिक वाक्यों के बाद ही मम्मी सिसक पड़ी. उनकी सिसकियाँ थमने के बाद बात आरंभ हो सकी.

"बेटा, तेरे पापा बहुत पछताते हैं," माँ ने धीमी आवाज़ में कहा. "अक्सर तेरी तस्वीरें देखते रहते हैं. पर जैसे ही विक्रांत का फोन आता है या अखबार में कोई खबर पढ़ते हैं, उनकी आँखों में खून उतर आता है. उन्हें लगता है कि उनकी उम्रभर की सामाजिक और व्यापारिक प्रतिष्ठा तूने मिट्टी में मिला दी है. विक्रांत उन्हें बार-बार उकसाता है कि लड़की हाथ से निकल गई तो समाज थूकेगा. तब वे अपना पछतावा भूलकर तुझे ही अपराधी मानकर कोसने लगते हैं."

प्रिया को अहसास हुआ कि उसके पिता एक ऐसे द्वंद्व में हैं जहाँ कोई बाहर वाला उनका दुश्मन नहीं, बल्कि उनका अपना 'अहंकार' और 'सामाजिक भय' है. वह समझ गई कि अभी पिता का समर्थन तो दूर, बल्कि मामूली सहानुभूति की उम्मीद करना व्यर्थ है.

सोमवार सुबह की चाय पीते हुए प्रिया ने अपने ऑफिस का व्हाट्सएप ग्रुप देखा, वहाँ सन्नाटा पसरा था. लेकिन व्यक्तिगत संदेशों की भरमार थी, जिनमें एक लिंक शेयर किया गया था. लिंक खोला तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. विक्रांत ने उसके सोशल मीडिया अकाउंटों से उसकी तस्वीरें चोरी कर उसके नाम से एक 'फेक प्रोफाइल' बना ली थी. उन तस्वीरों को भद्दे तरीके से एडिट किया गया था और नीचे उसके मुम्बई के ऑफिस का पता लिखा था. कैप्शन था, "शादी से भागकर मुंबई में आजाद घूमने वाली कन्या की हकीकत."

उसका दिल धक से रह गया. यह सीधे-सीधे उसके चरित्र पर हमला था. एक पल के लिए प्रिया को लगा कि वह फिर से उसे उसी अंधेरी कोठरी में धकेल देने की तैयारी है, जहाँ से वह भागी थी. आज जब वह ऑफिस जाएगी तो सबकी नजरें उससे सवाल पूछ रही होंगी. वह क्या जवाब देगी? सवाल पूछती इन नजरों से बिंधती हुई, वह कैसे काम कर सकेगी और करवा सकेगी? वह अपना सुबह का नाश्ता तक नहीं बना सकी, लंच के लिए टिफिन तैयार करना तो दूर की बात थी. उसे कुछ नहीं समझ आया. वह तैयार हो कर सीधे रामजी के मेवाड़ भोजनालय पहुँच गयी.

जैसे ही प्रिया ने भोजनालय में प्रवेश किया. रामजी ने उसे देखते ही जान लिया कि बिटिया तकलीफ में है. वे उठे और भोजनालय के आखिरी कोने की टेबल पर उसे बिठाकर खुद भी सामने की कुर्सी पर बैठ गए. उसके लिए पानी मंगा कर पिलाया, फिर पूछा, उसे क्या तकलीफ है. प्रिया ने बताने के लिए मुहँ खोला, लेकिन बजाए बोल के उसकी रुलाई फूट पड़ी. रामजी ने उसे ढाढ़स बंधाया, तब वह बता सकी कि बात क्या है.

प्रिया की बात सुनते हुए रामजी के चेहरे का रंग बदलता रहा. बात पूरी होने तक उनका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था. पर उन्होंने संयम रखा. रामजी ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा,"पगली, रोती क्यों है? यह दुनिया गंदी है, पर तू साफ़ है. तू चंबल की बेटी है, तुझे डरने की जरूरत नहीं. फिर रामजी का हाथ तेरे सिर पर है."

रामजी के निस्वार्थ, वात्सल्यपूर्ण और बिना शर्त स्नेह में उसे पुराने बरगद की छाँव महसूस हुई. उसका मन शांत हुआ तो रामजी कहने लगे, “बिटिया, तुमने सुबह से कुछ खाया भी नहीं होगा. मैं नाश्ता भेजता हूँ, कुछ पेट में जाएगा तो कोई हल सूझेगा.” इतना कह कर वे काउंटर की तरफ बढ़ गए.

तभी उसके फोन की घंटी बजी. आकाश का कॉल था. उसने भी वह 'फेक आईडी' देख ली थी. उसका बहुत ही शांत स्वरों में उसने बात शुरू की. "प्रिया, सुनो. पैनिक मत हो. मैंने और पापा ने जयपुर के साइबर सेल में लिखित शिकायत दर्ज करा दी है. वहां के अधिकारियों से भी बात की है. मैंने अपनी कंपनी के आईटी एक्सपर्ट भी लगा दिए हैं ताकि उस आईडी को तुरंत 'टेक डाउन' कराया जा सके. तुम मुंबई पुलिस स्टेशन जाओ और एफआईआर दर्ज कराओ. विक्रांत डरा हुआ है, इसलिए वह ओछी हरकतों पर उतर आया है. तुम बिल्कुल, घबराना नहीं. ये विक्रांत की हार की निशानी है."

आकाश और उसके परिवार का व्यवहार उसे सिर्फ छाँह ही नहीं, बल्कि उसे लड़ने के लिए ढाल-तलवार और हिम्मत भी दे रहा था.

प्रिया ने रामजी और आकाश के प्रेम को महसूस किया. जहाँ एक उसे सुरक्षा का अहसास देता था, दूसरा उसे सशक्त बनाता था. उसने अपनी आँखों के आंसू पोंछे. उसने तय किया कि वह न तो पिता के पछतावे के जाल में फंसेगी और न ही विक्रांत के इस 'साइबर आतंक' से डरेगी. नाश्ता करके उसने टिफिन लिया और ऑफिस के लिए चल दी.

ऑफिस से घर लौटी तो रात के साढ़े आठ बज रहे थे. उसने अपने कपड़े बदले, फिर आईने में खुद को देखा. अपने ही प्रतिबिंब को निहारते हुए बुदबुदाई, "विक्रांत, तू मेरी तस्वीरें चुरा सकता है, मेरा अक्स नहीं. मैं कोई वस्तु नहीं, जीती जागती इंसान हूँ, मैं किसी की 'अमानत' नहीं हो सकती. मैं 'प्रिया' हूँ." उसने लैपटॉप चालू किया, साइबर सेल की वेबसाइट पर अपनी शिकायत तैयार करके अपलोड की और फिर एक गहरी नींद सोने चली गई. उसे पता था कि कल की सुबह और भी कठिन होगी, पर वह अब अकेली नहीं थी.
... क्रमशः

गुरुवार, 26 मार्च 2026

परछाइयाँ

देहरी के पार कड़ी - 7

फ्लैट में शिफ्ट होने के दिन प्रिया ने केवल चाय-कॉफी बनाने के लिए सामान लिया था. शनिवार सुबह चाय पीकर वह सामानों की लिस्ट बनाने बैठी, सुबह के नाश्ते के लिए उसने इडली-सांभर फ्लैट पर ही मंगा लिए. नाश्ता करके ग्यारह बजे सामान लेने निकली. सामान लेते-लेते उसे ढाई बाजार में ही बज गए. उसे वहाँ मेवाड़ वैष्णव भोजनालय दिखा. उसे भूख लगी थी, वह अंदर जा बैठी. लड़का पानी का जग और गिलास रखकर जाने लगा तो उसने पूछ लिया, “भोजनालय किसका है?”


“रामजी का है, वे रहे.” लड़के ने इशारे से बताया.

दुकान के सड़क की ओर एक चूल्हा था, दीवार की ओर सब्जियों के बड़े पतीले रखे थे, दीवार के विपरीत जहाँ दुकान में प्रवेश-निकास स्थान था वहीं काउंटर था. वहाँ पचास-पचपन की उम्र का व्यक्ति कमीज पाजामा पहने कंधे पर गुलाबी गमछा डाले सब्जी छौंक रहा था, वही कुछ देर पहले काउंटर पर ग्राहक से बिल का भुगतान ले रहा था. भोजनालय राजस्थान के ढाबों की तरह था. राजस्थानी थाली उपलब्ध थी, उसने वही मंगा ली. फ्राइड भिंडी और बेसन गट्टे की सब्जियाँ थीं, चावल, छाछ का रायता और बढ़िया फूली हुई गर्म चपातियाँ. लड़के ने बताया कि संडे को दाल-बाटी-चूरमा भी बनता है. प्रिया को अपने देस का स्वाद मिला. पेट तो भरा ही, मन भी तृप्त हो गया. काउंटर पर बिल देने आई तो उसने रामजी से पूछ लिया, “वे मेवाड़ में कहाँ से हैं?” रामजी ने बताया कि “वे भैंसरोड़गढ़ से हैं, दुकान वहीं के एक सेठजी की है, उन्होंने मामूली किराए पर दे रखी है.”

जब प्रिया ने बताया कि वह कोटा से है तो कहने लगे, “बिटिया आप तो हमारी भतीजी हुई, कोटा और हमारा गाँव दोनों चम्बल किनारे हैं, बस पचास किलोमीटर की दूरी है.” उन्होंने थाली के पैसे लेने से भी इन्कार कर दिया. “आज पैसे नहीं लूंगा, फिर कभी आओगी तब देखूंगा.” रामजी ने खुद को प्रिया का चाचा घोषित कर दिया. कहने लगे, “बिटिया आते रहना अच्छा लगेगा.” रामजी ने उससे पैसे नहीं ही लिए. इतनी दूर ऐसा अपनापन देख उसकी आँखें नम हो गईं.

ऑफिस में प्रिया को एक महत्वपूर्ण इंटरनेशनल प्रोजेक्ट का 'लीड' बनाया गया था. जिम्मेदारी और काम का बोझ दोनों बढ़ गए. वह सुबह ग्यारह बजे ऑफिस पहुँचती, वापस लौटने में रात के आठ-नौ बज जाते हैं. एक शाम जब वह गोरेगाँव स्टेशन से पैदल अपने फ्लैट की ओर बढ़ रही थी, उसे अहसास हुआ कि कोई उसका पीछा कर रहा है. वह रुकी, पीछे मुड़कर देखा, लेकिन पीछे केवल मुंबई की कभी न खत्म होने वाली लोगों की भीड़ थी.


घर पहुँचकर उसने दरवाजा बंद किया और हमेशा की तरह अपने बैग को टेबल पर रख उसने खुद को बिस्तर पर गिरा लिया. तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन चमका. एक 'फेक' इंस्टाग्राम आईडी से उसे उसकी ही एक धुंधली तस्वीर भेजी गई थी, जो शायद स्टेशन के बाहर ली गई थी. नीचे संदेश था— "मुम्बई की भीड़ में छिपना आसान तो है, प्रिया. पर फिर भी हकदार अपनी ‘अमानत’ तलाश कर ही लेते हैं." प्रिया के हाथ कांपने लगे. यह विक्रांत के सिवा कोई नहीं था. वह यहाँ तक पहुँच चुका था या उसका कोई गुर्गा उस पर नजर रख रहा था.

उसी रात उसके भाई, मयंक का फोन आया. मयंक ने अपनी आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन रखा था. "दीदी, पापा की तबीयत कल रात फिर बिगड़ गई थी. डॉक्टर कह रहे हैं कि यह ब्लड प्रेशर नहीं, मानसिक तनाव है. वे किसी से बात नहीं करते, बस खिड़की के बाहर देखते रहते हैं. विक्रांत भी अक्सर उन्हें फोन करता रहता है. क्या तेरा स्वाभिमान उनके जीवन से बड़ा है?"

प्रिया समझती थी कि यह 'इमोशनल ब्लैकमेल' का पुराना तरीका है, लेकिन फिर भी एक टीस उठी. क्या वह वाकई अपने पिता की बीमारी का कारण है? या पिता अपनी बीमारी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं? उसने इतना ही कहा, “मैं प्रोजेक्ट में व्यस्त हूँ, तुरंत नहीं आ सकती”, और फोन काट दिया. वह उस रात सो नहीं सकी. उसे 'मोहन विला' याद आ रहा था जहाँ वह बचपन में खेलती थी.

आखिर अगले दिन उसने आकाश को फोन किया. आकाश ने शांति से उसकी पूरी बात सुनी—विक्रांत की फोटो वाली बात भी और भाई के संदेश वाली भी.

​"प्रिया, विक्रांत वही कर रहा है जो एक हारा हुआ इंसान करता है. वह तुम्हें कमजोर करना चाहता है. तुम्हारे पिता की अस्थिरता का कारण तुम्हारा फैसला नहीं, बल्कि समाज का दबाव है जिसे विक्रांत हवा दे रहा है. तुम बस अपने काम पर ध्यान दो. जयपुर से मैं और मेरा परिवार तुम्हारे साथ हैं. अगर ज़रूरत पड़ी, तो मैं खुद कोटा जाकर तुम्हारे भाई और पापा से मिलूँगा. तुम अकेली नहीं हो."

​आकाश की इन बातों ने प्रिया के भीतर की दरारों को जैसे भर दिया. उसे अहसास हुआ कि जहाँ एक तरफ विक्रांत उसे नीचे खींचने की फिराक में है, वहीं दूसरी तरफ एक ऐसा परिवार भी है जो हर पल उसके साथ खड़ा दिखाई देता है.

उसने तय किया कि वह डरेगी नहीं. अगले दिन उसने ऑफिस की आईटी सिक्योरिटी टीम को उस 'फेक आईडी' रिपोर्ट की और पुलिस को ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई.

शनिवार सुबह, प्रिया ने अपने फ्लैट की खिड़की से आरे कॉलोनी के पेड़ों को देखा. उसने खुद से कहा, "यह घर छोटा है, अकेलापन भी है, और डर भी. लेकिन यहाँ मैं 'प्रिया' हूँ, किसी की 'अमानत' नहीं." अलमारी में उसे अपनी माँ की दी हुई एक पुरानी साड़ी दिखी. उसे याद आया कि माँ हमेशा उसके साथ है. उसने तय किया कि वह आज शाम माँ से बात करेगी.
... क्रमशः

 

मंगलवार, 24 मार्च 2026

कंक्रीट का जंगल

देहरी के पार कड़ी - 6
ड्यूटी से ऑफ होकर प्रिया गेस्ट हाउस पहुँची तब 9 बजे थे. सुबह 5 बजे सोकर उठने के बाद से अभी तक वह चल ही रही थी., आकाश के घर से शुरू करके कितने सफर कर लिए थे उसने आज? कार, प्लेन, टैक्सी, टैक्सी और टैक्सी. गेस्ट हाउस के अपने कमरे में पहुँचते ही उसने पर्स को बेड पर एक ओर फैंका और अपने शरीर को भी उसी बेड पर पटक दिया. कुछ देर आँखें मूंदे पड़ी रही. वह अपने पिछले और आने वाले जीवन के बारे में सोचना चाहती थी, लेकिन दिमाग साथ नहीं दे रहा था. उसे लगा कि यदि कुछ देर और ऐसे ही बिस्तर पर पड़ी रही तो उसे नींद आ जाएगी. फिर दो-तीन घंटे बाद खुलेगी और उसे जोर की भूख लगेगी. तब कुछ खाने को नहीं होगा. वह घर में तो थी नहीं कि किचन में जाकर कुछ बना ले. फिर सारी रात सो न सकेगी और कल दिन भर उबासियाँ लेती रहेगी. उसे याद आया सुबह प्लेन में नाश्ता किया था उसके बाद तीसरे पहर चाय के साथ कुछ बिस्कुट, लंच पूरी तरह स्किप हो गया था. अचानक उसे बहुत तेज भूख का अहसास हुआ. उसने इंटरकॉम पर रूम सर्विस का नंबर डायल किया और उठाने पर पूछा कि क्या गेस्ट हाउस में खाने की व्यवस्था है, और क्या खाना उसके रूम में भेजा जा सकता है?

“हाँ, मैम खाना आपके रूम पर पहुँच जाएगा, आप ऑर्डर कर दें.” सर्विस काउंटर से उसे उत्तर मिला तो वह खुश हो गयी. उसने दाल, चपाती, चावल और दही ऑर्डर किया और फ्रेश होने के लिए बाथरूम में घुस गयी.

खाना खाने के बाद सो जाना ठीक न समझ वह कुर्सी लेकर रूम की बालकनी में आ बैठी. वहाँ से दिख रही मुम्बई की रोशनियाँ जितनी सम्मोहक थीं, उतनी ही पराई भी. तभी उसे ध्यान आया कि आज का दिन जाया हो गया है. उसे यह गेस्ट हाउस केवल सात दिन उपलब्ध था. इस तरह तो ये दिन रेत की तरह फिसल जाएंगे. उसे कल से ही इस 'कंक्रीट के जंगल' में अपने लिए एक कोना तलाशना होगा.

मुम्बई में घर ढूँढना किसी हिमालय चढ़ने जैसा था. ऑफिस के सहकर्मियों ने उसे अंधेरी या मलाड में जगह देखने की सलाह दी. ब्रोकर उसे माचिस की डिबिया जैसा कमरा दिखाते, जिसका किराया किसी महल की याद दिलाता. "मैडम, सिंगल वर्किंग वूमन? एनओसी (NOC) लगेगी, पुलिस वेरिफिकेशन होगा और हाँ, रात को 10 बजे के बाद एंट्री नहीं." एक अधेड़ उम्र के ब्रोकर ने अपनी शर्तें गिनाईं. प्रिया को हैरत हुई कि मुम्बई की आधुनिकता की परतों के नीचे भी पितृसत्ता की बेड़ियाँ पैर जमाए हुए थीं. अंत में, गोरेगांव ईस्ट की एक पुरानी बिल्डिंग के चौथे माले पर उसे एक छोटा सा 1BHK फ्लैट मिला. खिड़की से आरे कॉलोनी के पेड़ दिखते थे, जो उसे कोटा की याद दिलाते. उसने भारी मन से तीन महीने का डिपॉजिट और एक माह का रेंट ब्रोकरेज में दिया. यह घर 'मोहन विला' के हॉल जितना भी नहीं था, पर यहाँ की चाबी सिर्फ उसके पास थी.

शुक्रवार की शाम घर शिफ्ट किया. रात का खाना उसने जोमेटो के जरीए ऑर्डर कर दिया. खाने का इंतजार करते हुए प्रिया ने हिम्मत जुटाकर माँ का नंबर लगाया. पहली बार में किसी ने नहीं उठाया. दुबारा किया तो दूसरी ओर से माँ का स्वर सुनाई दिया, “कौन?”

“मम्मी, मैं प्रिया.”

"प्रिया? बेटा, तू ठीक है न? तूने एक बार भी माँ की सुध नहीं ली." उसका नाम लेते ही माँ का स्वर रुंधने लगा था.

माँ ने बताया कि पापा अब ज़्यादातर चुप रहते हैं और उन्होंने विक्रांत के परिवार से सारे रिश्ते तोड़ लिए हैं. लेकिन प्रिया के मन में एक गहरा संशय बैठा था. क्या पिता वाकई बदल गए हैं? या यह उसे वापस बुलाने की कोई नई भावनात्मक चाल है? माँ ने कहा, "तेरे पापा कहते हैं कि जो हुआ सो हुआ, अब वह तुझे अपनी मर्ज़ी से जीने देंगे." प्रिया ने शांत स्वर में जवाब दिया, "माँ, पापा की इस 'मर्ज़ी' की मैंने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है. उन्हें कहना कि अभी मुझे समय चाहिए." उसे डर था कि कहीं यह नरमी केवल उसे वापस बुलाकर फिर से किसी और 'समझौते' में बाँधने की भूमिका तो नहीं?

ऑफिस में काम का बोझ प्रिया को व्यस्त रखने लगा था, पर 'विक्रांत' का डर उसके अवचेतन में घर कर गया था. उसे रह-रहकर उसकी वह आवाज़ गूँजती—"वह उसे देख लेगा." उसने ऑफिस की सिक्योरिटी को साफ़ निर्देश दिए थे कि कोई भी अजनबी बिना अपॉइंटमेंट के अंदर न आए. शाम को जब वह लोकल ट्रेन से उतरकर अपने फ्लैट की ओर बढ़ती, तो उसे लगता जैसे कोई पीछे चल रहा है. वह अपनी सोशल मीडिया प्राइवेसी को बार-बार चेक करती. वह जानती थी कि विक्रांत जैसे अहंकारी लोग इतनी आसानी से हार नहीं मानते.

फ्लैट फर्निश्ड था लेकिन कुछ ज़रूरी बर्तन, बेड के लिए चादर, तकिए के गिलाफ और कुछ किराना के सामान वह ले आई थी. पहली रात उसने खुद के लिए चाय बनाई. वह सोच रही थी कि उसे अपनी जरूरतों के लिए जो सामान चाहिए सुबह उनकी लिस्ट बनानी पड़ेगी. जिससे सप्ताहांत के इन दो दिनों में सारा जरूरी सामान खरीद ले. उसने सोने की कोशिश की लेकिन सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही सांसें सुनाई दे रही थीं. उसने उठ कर खिड़की से बाहर देखा, जहाँ मुम्बई कभी नहीं सोती. उसे समझ आया कि आज़ादी की सबसे बड़ी चुनौती 'अकेलापन' है. तभी फोन पर आकाश का मैसेज चमका— "फ्लैट कैसा है? तान्या कह रही है कि अब वह अपनी छुट्टियाँ मुम्बई में दीदी के साथ ही बिताएगी."

मैसेज पढ़कर प्रिया के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई. उसने महसूस किया कि वह एक साथ दो लड़ाइयाँ लड़ रही है—एक बाहर की दुनिया से और दूसरी अपने ही परिवार के प्रति उपजे उस 'अविश्वास' से, जो उसे अपनी ही जड़ों से दूर कर रहा था.
... क्रमशः

सोमवार, 23 मार्च 2026

नई सुबह

देहरी के पार कड़ी - 5:
विक्रांत और उसके साथियों को थाने ले जाने के बाद सभी ड्राइंगरूम आ गए. घर में जो तनाव रात विक्रांत का फोन सुनने के बाद पैदा हुआ था, उससे मुक्ति मिली. सबने सुकून की साँस ली. सब उसी घटना पर बातें करने लगे. तान्या ट्रे में पानी के गिलास लेकर आई, तो सबने महसूस किया कि उन्हें प्यास लगी है, सबने पानी पिया. आकाश ने पूछ लिया, “तान्या, तुमने कैसे जाना कि सबको पानी की जरूरत है?”

“बिलकुल सीधी-सिंपल बात है, पुलिस जाने के बाद मुझे प्यास लगी. . मैंने किचन जाकर पानी पिया. तभी मुझे लगा कि सभी को प्यास लगी होगी, तो मैं पानी ले आई.”

“बस?” आकाश ने कहा.

“अब इसमें बस का क्या?” तान्या ने आकाश की ओर मुहँ बनाते हुए पूछा?”

“घड़ी देख, चार बज गए हैं. चाय का टाइम हो गया है. सबको चाय भी तो चाहिए.”

आकाश की इस बात पर तान्या ने एकदम जीभ बाहर निकाली और अपने ही दाँतों से दबाकर दिखाने लगी.

तभी श्रीमती मल्होत्रा खड़ी हुईं. “तू यहीं बैठ तान्या, मैं चाय बनाकर लाती हूँ” इतना कहकर वे रसोई की ओर चल दीं.

आकाश ने फिर तान्या को चिढ़ाकर कहा, “मुझे तो पहले ही पता था कि चाय मम्मी ही बनाएंगी.”

“वो कैसे?” प्रिया ने आकाश से पूछा.

“मम्मी को खुद और पापा के सिवा किसी और के हाथ की बनी चाय पसंद नहीं. तो सिंपल है, वही बनाएंगी.”

थोड़ी देर में चाय आ गई, साथ में कुछ नमकीन और बिस्कुट भी थे. सब देर तक बातें करते रहे.

शान्ति के बावजूद प्रिया जानती थी कि यह एक पड़ाव मात्र है, मंजिल अभी दूर है. आकाश जब उसके लैपटॉप के लिए प्रिया के घर गया था, तब उसे अपने पिता को अपना नंबर देना पड़ा था. वे लगातार आकाश के फोन पर कॉल किए जा रहे थे. आकाश उनका फोन ले ही नहीं रहा था. अब जैसे विक्रांत ने मल्होत्राजी का पता जाना, वैसे उसके पिता भी जान सकते थे. विक्रांत ही कोटा पहुँचकर बता सकता था. प्रिया को आशंका हो गई थी कि उसके पिता कभी भी वहाँ आ सकते हैं. रात के खाने पर प्रिया ने मल्होत्राजी को अपनी आशंका बता दी.

मल्होत्राजी ने उसे तसल्ली दी, वे आएंगे तो उनसे मैं बात कर लूंगा. कोई दिक्कत नहीं होगी.

सोमवार सुबह प्रिया ने लॉग इन किया और काम करने लगी. दोपहर 1 बजे प्रिया के मैनेजर का फोन आया. "प्रिया, तुम्हारी सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है. कंपनी ने तुम्हारा ट्रांसफर मुम्बई हेड ऑफिस कर दिया है. कल सुबह की फ्लाइट की टिकट तुम्हारे ईमेल पर भेज दी है. कंपनी गेस्ट हाउस में एक हफ्ते के लिए तुम्हारे रुकने की व्यवस्था कर दी है. अब कल फ्लाइट पकड़ कर तुम मुम्बई पहुँचो."

रात नौ बजे डाइनिंग पर यही चर्चा थी कि प्रिया की सुबह 8 बजे की फ्लाइट है, उसे छह बजे तक एयरपोर्ट पहुँचना होगा. एयरपोर्ट पहुँचने में आधा घंटा लगेगा, तो सुबह साढ़े पाँच से पहले उसे निकलना होगा. वह अपनी तैयारी अभी पूरी कर ले. यह तय हुआ कि सुबह आकाश उसे छोड़ने एयरपोर्ट जाएगा. तभी तान्या कहने लगी, “मैं भी दीदी को छोड़ने सुबह एयरपोर्ट चलूंगी.”

“तू बड़ी कब होगी, तान्या?” आकाश ने हमेशा की तरह उसे चिढ़ाने के स्वर में कहा.”

“मैं बड़ी ही हूँ भैया. बस आप ही बड़े नहीं हुए. हर दम मुझे चिढ़ाते रहते हो.” तान्या जवाब दिया और उठ कर चल दी.

मंगलवार सुबह तान्या और आकाश प्रिया को छोड़ने जयपुर एयरपोर्ट पर आए. प्रिया के बोर्डिंग के लिए चले जाने के बाद भी उन्होंने एयरपोर्ट न छोड़ा. जब जहाज टेक ऑफ कर आकाश में पहुँच गया तभी वे रवाना हुए.

तीन घंटे बाद, मुम्बई की नम हवाओं ने प्रिया का स्वागत किया. यहाँ कोई उसे 'गुप्ता जी की बेटी' या 'विक्रांत की अमानत' के रूप में नहीं जानता था. यहाँ वह केवल प्रिया थी, एक ‘सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर’. प्लेन से बाहर आते ही उसने आकाश को सूचित किया कि उसकी फ्लाइट उतर गई है. कंपनी गेस्ट हाउस में सामान रखा, फ्रेश हुई और ऑफिस पहुँची.

उसने दो बजे जॉइनिंग दी. उसे काम करने के लिए स्थान आवंटित कर दिया गया था. मैनेजर ने उसे टीम के सभी इंजीनियरों से मिलवाया और जाते हुए कहा, सबको जान लो और चाहो तो गेस्ट हाउस जाकर आराम करो. कल से समय पर काम पर आना होगा.

रात आठ बजे आकाश का फोन आया. उसने बताया कि “सुबह 11 बजे तुम्हारे पिता और भाई उनके घर पहुँच गए थे. पापा ने उन्हें बड़े प्रेम से ड्राइंग रूम में बिठाया, उन्हें चाय पिलाई और दोपहर के खाने के लिए पूछा. कुछ हुआ, उसके लिए वे खुद को शर्मिंदा महसूस कर रहे थे. बता रहे थे, तुमने तो उन्हें बता दिया था कि तुम अभी शादी नहीं करना चाहती. लेकिन वे ही पीछे लगे रहे. सोचा था एक बार शादी हो जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा. विक्रांत के परिवार का अच्छा बिजनेस है और विक्रांत ने उसे बढ़ाया भी है. लेकिन जिस तरह वह जयपुर पहुँचा और अपने व्यवहार के कारण शांति भंग में गिरफ्तार होकर रात भर हवालात में रहा, उससे उसके बारे में उनका भ्रम टूट गया है. जमानत पर छूटकर आधी रात को कोटा पहुँचने के बाद उसने ही बताया कि तुम कहाँ हो. वे तुमसे माफी मांगने और विक्रांत की ओर से सावधान करने ही यहाँ आए हैं. जाते हुए कह कर गए हैं कि प्रिया को कहना कि वह अपनी माँ से बात जरूर कर ले.”

प्रिया को यकायक विश्वास नहीं हुआ. फिर भी उसने मन ही मन तय कर लिया कि अभी नहीं, लेकिन सप्ताह भर बाद जब वह फ्लैट में शिफ्ट हो जाएगी, तब मम्मी को फोन अवश्य करेगी और सब कुछ सही लगा तो पापा से भी बात करेगी.
... क्रमशः


रविवार, 22 मार्च 2026

कवच

 देहरी के पार कड़ी - 4:

उस डरावनी धमकी के बाद कोशिश करके भी प्रिया सो नहीं सकी. उसकी रात करवटें बदलते ही गुजरी. तान्या के कमरे की खिड़की से उसे जयपुर की सड़कें शांत नजर आ रही थीं, बस कभी कोई वाहन सड़क से गुजर जाता. उसके मन में विक्रांत की वह आवाज़ गूंज रही थी— "पराई अमानत". वह किसी की अमानत कैसे हो सकती थी? उसका स्वतंत्र अस्तित्व था. वह एक स्वतंत्र नागरिक थी. लेकिन उसे लगा कि उसे अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए बहुत लड़ाइयाँ लड़नी पड़ेंगी. घर से निकल लेना तो केवल आग़ाज था. सुबह जैसे ही उसे लगा कि आकाश की माँ विमलाजी जाग गयी हैं, वह भी उठ बैठी. वे रसोई में थीं और अपने लिए चाय गैस पर चढ़ा चुकी थीं. प्रिया को देख पूछा, “तुम्हारे लिए भी बना लूँ चाय?”

प्रिया ने ‘हाँ’ कह दी और डाइनिंग की कुर्सी खिसका कर वहीं विमलाजी के पास बैठ गयी. 

चाय पीकर लौटी तब तक तान्या जागी नहीं थी. प्रिया बाथरूम में घुस गयी. वह स्नान करके लौटी तब तान्या कमरे में नहीं थी. वह सुबह 8:00 बजे वह तैयार होकर निपटी. तभी तान्या आ पहुँची.


“दीदी नाश्ता तैयार है आकाश और पापा डाइनिंग में आपका इन्तजार कर रहे हैं. मैं बस फ्रेश हो कर पाँच मिनट में मैं भी आती हूँ, आप चलिए.”

वह डाइनिंग में पहुँची तो आकाश और के पापा, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी, प्रकाश मल्होत्रा  बैठे नाश्ता कर रहे थे. मल्होत्राजी ने प्रिया को भी बैठने को कहा. विमलाजी उसके लिए नाश्ता रख गईं.

"देखो बच्चों, कानून डरपोक के लिए नहीं, जागरूक नागरिक के लिए बना है,"मल्होत्राजी ने गंभीर स्वर में कहा. "विक्रांत ने जो 'अमानत' शब्द इस्तेमाल किया है, वह उसकी कुंठित मानसिकता है. हम सबसे पहले 'पुलिस थाना' में एक इन्फोर्मेटिव रिपोर्ट (Informative Report) दर्ज करवाएंगे. इसमें हम साफ़ लिखेंगे कि प्रिया बालिग है, अपनी मर्ज़ी से यहाँ रह रही है और उसे एक अज्ञात नंबर से जान का खतरा है. इससे यह होगा कि हमें फोन करते ही तुरन्त मदद मिल सकेगी."

प्रिया को पहली बार महसूस हुआ कि सुरक्षा केवल बंद दरवाजों में नहीं, बल्कि सही कानूनी प्रक्रिया में है. वह आकाश और उसके पापा तुरन्त पुलिस स्टेशन गए. दस बजने के पहले रिपोर्ट की एक कॉपी उनके हाथ में थी.

लौटते ही प्रिया ने सबसे पहले अपने मैनेजर और एचआर (HR) हेड को एक 'अर्जेंट मीटिंग' के लिए मैसेज किया. आकाश भी पास ही बैठा था. कुछ देर बाद हुई वीडियो कान्फेंस पर प्रिया ने अपनी स्थिति साफ़ कर दी:

"सर, मेरे मंगेतर ने मेरे सहकर्मी को फोन पर धमकी दी है. मुझे लगता है कि मेरी जान और प्राइवेसी खतरे में है. मुझे तुरंत मुम्बई ऑफिस शिफ्ट होने की अनुमति चाहिए और मेरा बेस लोकेशन कोटा से मुम्बई बदल दिया जाए."

मैनेजर ने उसकी हिम्मत की दाद दी और तुरंत आईटी (IT) टीम को निर्देश दिए कि प्रिया के क्रेडेंशियल्स को 'हाई-सिक्योरिटी' पर रखा जाए ताकि कोई बाहरी व्यक्ति उसे ट्रेस न कर सके.

दोपहर के ठीक तीन बजे थे. प्रिया और तान्या ऊपर वाले कमरे की धूल झाड़ रही थीं, जिसे प्रिया का नया 'होम ऑफिस' बनना था. तभी अचानक बाहर एक भारी एसयूवी (SUV) के टायर चरचराए. प्रिया ने खिड़की से नीचे झांका और उसका खून जम गया. नीचे विक्रांत खड़ा था, उसके साथ दो और गठीले बदन के युवक थे.

"आकाश! बाहर निकल!" विक्रांत का गला फटने को था. "मेरी अमानत को लेकर तू बहुत बड़ा सूरमा बन रहा है? इज़्ज़त से उसे बाहर भेज दे, वरना तेरा ये छोटा सा घर और तेरी सरकारी नौकरी... दोनों मिट्टी में मिला दूंगा."

विक्रांत को वहाँ देख उसके शरीर में सिहरन दौड़ गयी. उसने दो मिनट बैठ कर अपने आपको शान्त किया और नीचे की ओर चल दी.

मल्होत्राजी ने आकाश को कहा कि वह थाने को फोन करे. फिर शांत भाव से कुर्ता पहना और बिना किसी घबराहट के गेट की ओर बढ़े.  आकाश ने थाने फोन किया, "सर, वे आ गए हैं. सिद्धार्थ नगर, मकान नंबर 42." फोन जेब में डालकर वह भी अपने पिता के पीछे चल दिया.

मल्होत्राजी ने गेट की जाली के पीछे से ही कहा, "बेटा विक्रांत, यह घर है, कोई मंडी नहीं जहाँ तुम 'अमानत' लेने आए हो. यहाँ स्वतंत्र नागरिक हैं. तुम मर्यादा लांघ रहे हो, बेहतर होगा यहाँ से चले जाओ."

विक्रांत ने गेट पर जोर से लात मारी, "बुड्ढे, ज्ञान मत दे! वो मेरी होने वाली पत्नी है. मेरा उस पर कानूनी और सामाजिक हक है." उसके साथी डराने के लिए अपनी जेबों में हाथ डालकर आगे बढ़े, जैसे कोई हथियार छिपा हो.

तभी दूर से सायरन की आवाज़ गूँजी. विक्रांत के चेहरे का रंग यकायक उड़ गया. अगले ही पल पुलिस की एक जीप तेज़ी से मुड़कर उनके ठीक सामने रुकी. जीप से एक इंस्पेक्टर और चार हट्टे-कट्टे कांस्टेबल उतरे.

"क्या तमाशा है यह?" इंस्पेक्टर ने अपनी बेल्ट ठीक करते हुए कड़क आवाज़ में पूछा.

विक्रांत की अकड़ धुआं हो गई. वह हकलाने लगा, "सर... वो... पारिवारिक मामला है. मेरी मंगेतर यहाँ छिपी है."

"मंगेतर? बालिग लड़की को तुम 'अमानत' बोलकर डराओगे?" इंस्पेक्टर ने आगे बढ़कर विक्रांत की कलाई पकड़ ली.  . "सुबह ही रिपोर्ट दर्ज हुई है तुम्हारी धमकी की. चलो, अब थाने में बैठकर विस्तार से बताना कि 'अमानत' की परिभाषा क्या है."

इंस्पेक्टर ने एक कांस्टेबल को निर्देश दिया कि वह विक्रांत की गाड़ी खुद ड्राइव करके थाने ले आए. विक्रांत और उसके साथियों को अपराधियों की तरह जीप में बिठाया गया. जिस गली में वे शोर मचा रहे थे, अब वहाँ सन्नाटा था, पर यह सन्नाटा खौफ का नहीं, सुकून का था.

प्रिया ड्राइंगरूम की खिड़की से यह सब देख रही थी. उसकी आँखें नम हो गईं. उसने अपने रूमाल से उन्हें पोंछा और बाहर बरामदे में आ गई. आकाश के पिता ने प्रिया को देखा और धीरे से मुस्कुराए. प्रिया ने समझ लिया था कि अब वह अकेली नहीं है. अंदर कमरे में पहुँच कर उसने अपना लैपटॉप खोला और मुम्बई ऑफिस के मैनेजर को मेल किया— "मैं कल सुबह से ही काम पर हूँ. और हाँ, मेरा मुम्बई शिफ्टिंग का प्रोसेस शुरू कर दीजिए."

... क्रमशः

शनिवार, 21 मार्च 2026

आश्रय

देहरी के पार कड़ी : 3
आकाश की कार ने चंबल के पुल को पार कर महाराणा प्रताप की प्रतिमा वाले गोल चक्कर से आगे जयपुर रोड पर बढ़ गयी थी. प्रिया खिड़की से बाहर देखती रही. बहुमंजिला इमारतें हर तरफ उग रही थीं. शहर कितना विस्तार कर गया था. बड़गाँव बावड़ी तक बस्तियाँ हो गई थीं. यहाँ से बूंदी जिला आरंभ हुआ और कार हाईवे पर आ गई और उसके साथ ही उसकी गति भी बढ़ गई. प्रिया ने मुड़कर एक बार अपने शहर को देखा. यहीं पैदा हुई, यहीं सारी पढ़ाई हुई, बस एमसीए करने के लिए उसे तीन वर्ष इंदौर में रहना पड़ा था. इस शहर ने उसे पाला-पोसा, लेकिन अंत में वही उसका सौदा करने पर आमादा हो गया. चंबल का पानी शांत था, पर प्रिया के मन में समंदर उमड़ रहा था.

अगले चार घंटे खामोशी और बीच-बीच में आकाश से कंपनी के कामों से संबंधित हुई बातों के बीच निकल गए. टोंक पहुँचे तो दोनों को कुछ भूख सी महसूस हुई. आकाश न प्रिया से पूछ कर सड़क किनारे एक रेस्टोरेंट पर कार खड़ी कर दी. वे नाश्ता और चाय पीकर उठे तो प्रिया को कुछ दूर नया सिम बेचने वाले सड़क पर ही स्टाल लगाए दिख गए. उसने अपने लिए दो सिम ले लिए और अपने फोन के सिम बदल कर उसने फोन चालू किया. अपना फोन उसने घर से निकलने के बाद ऋचा से बात होते ही बंद कर दिया था. "अब कम से कम लोकेशन ट्रेस नहीं होगी," उसने एक लंबी सांस लेते हुए कहा.

रात के आठ बजे, कार जयपुर के गोपालपुरा बाईपास के निकट एक शांत कॉलोनी 'सिद्धार्थ नगर' में रुकी. आकाश ने कार बाहर साइड में खड़ी की. घर का गेट खोला, गेट खुलने की आवाज सुन कर ही आकाश के माता-पिता और उसकी छोटी बहन, तान्या बाहर बरामदे में निकल आए, जैसे वे तीनों बहुत देर से उनकी प्रतीक्षा कर रहे हों. तीनों ने प्रिया का स्वागत किया. आकाश के मम्मी-पापा उसके साथ ही ड्राइंगरूम में बैठ गए, उससे बातें करने लगे. आकाश फ्रेश होने चला गया. थोड़ी देर में तान्या चाय बनाकर कुकीज़ के साथ ले आई. चाय पर आकाश के मम्मी पापा प्रिया से उसकी पढ़ाई, और कैरियर सम्बन्धी बातें करते रहे. एक बार भी उसके अचानक घर छोड़ने और विवाह से संबंधित बातों का उल्लेख तक नहीं किया. प्रिया को लगा कि आकाश के परिवार का माहौल बेहतर है, उसके मम्मी पापा बच्चों की असहजता के बारे में सजग रहते हैं.

चाय आने के कुछ देर बाद आकाश भी फ्रेश होकर आ गया. आते ही उसने कहा कि, "मैंने मुम्बई ऑफिस सूचित कर दिया है कि मैं प्रिया के लैपटॉप के साथ प्रिया स्वयं भी जयपुर आ गयी है. यह भी बता दिया है कि तुम सोमवार को जयपुर से लॉग-इन करोगी".

चाय खत्म हुई. प्रिया ने कहा, तुम मुझे होटल छोड़ने को तैयार हो जाओ मैं बाथरूम हो कर आती हूँ. होटल की बात सुनते ही. आकाश की माँ ने उसका अपने हाथ में ले लिया.

"बेटे, इस शहर में तुम अकेली होटल में रहोगी, यह हमें मंज़ूर नहीं. मैं जानती हूँ, आकाश तुम्हें जो होटल बताएगा, वह सुरक्षित ही होगा. लेकिन जिस परिस्थिति में तुम्हें घर छोड़ना पड़ा है, उसमें होटल में ठहरना किसी तरह सुरक्षित नहीं है. यहाँ तुम हर तरह सुरक्षित हो, घर में तुम्हारे सिवा चार और लोग हैं. आज रात तुम तान्या के साथ उसके कमरे में सो जाओ. ऊपर एक कमरा खाली है, कल सफाई करवाकर उसे पेइंग गेस्ट की तरह तैयार कर देंगे. तुम यहीं रहकर अपना 'वर्क फ्रॉम होम' कर सकती हो," माँ के शब्दों में वैसी ममता थी जैसी प्रिया अपनी सगी माँ से इस समय उम्मीद कर रही थी. प्रिया इस निस्वार्थ आग्रह को टाल न सकी. प्रिया को होटल जाने का इरादा छोड़ना पड़ा . तान्या उसे अपने कमरे में ले गयी. कमरा करीने से सजा हुआ था जिसमें एक वर्किंग टेबल और एक डबल बेड था जिसे दो अलग-अलग बिस्तरों के रूप में भी उपयोग में लिया जा सकता था.

“दीदी वैसे तो हम दोनों इस डबल बेड पर सो सकते हैं. लेकिन आपको अच्छा न लगे तो मैं इसके दोनों हिस्सों को अलग करके उन पर सिंगल बेड चादर लगा दूंगी.”

“नहीं, तान्या, उसकी जरूरत नहीं. हम दोनों साथ सो लेंगे. हमें दोस्ती भी तो करनी है.”

कुछ देर बाद तान्या प्रिया को खाने के लिए डाइनिंग में ले आई. आकाश और उसके पापा टेबल पर थे; आकाश की माँ किचन में चपातियाँ उतारने की तैयारी कर रही थी. प्रिया टेबल पर बैठने के बजाय किचन में चली गई.

“माँ मैं आपके साथ खाना खाऊंगी, पहले इन तीनों को खा लेने दें.” माँ ने प्रिया को बहुत कहा कि वह भी सब के साथ बैठ जाए. लेकिन वह नहीं बैठी. तान्या ने फुर्ती से खाना खाया और हाथ धोकर रसोई में पहुँच गई.

“माँ, आप और प्रिया दीदी भी खाना खाइए, मैं गर्म चपातियाँ लाती हूँ.”

खाने में रात के करीब 11 बज गए. सभी ड्राइंग रूम में बैठ कर बातें कर रहे थे. तभी आकाश के फोन की स्क्रीन जगमगा उठी. एक अनजान नंबर था. आकाश ने फोन उठाया, "हेलो?"

"सुन बे आकाश!" दूसरी तरफ से एक भारी और अहंकार से भरी आवाज़ गूंजी. वह प्रिया का मंगेतर, विक्रांत था. "हमें पता है प्रिया को तू जयपुर ले गया है. गुप्ता जी भले ही सीधे आदमी हों, पर मैं नहीं हूँ. उसे समझा दे कि अपनी मर्ज़ी से कोटा लौट आए, वरना जयपुर ज्यादा दूर नहीं है. और तू... पराई अमानत पर हाथ डालने की कोशिश मत कर, वरना नौकरी और सलामती दोनों खतरे में पड़ जाएंगे."

आकाश ने बिना कुछ कहे फोन काट दिया, पर उसके चेहरे पर तनाव की लकीरें उभर आईं. प्रिया ने शायद सब सुन लिया था.

"वह मुझे अपनी 'अमानत' समझता है, "प्रिया की आवाज़ में कंपन था, पर इरादा चट्टान जैसा. "उसे लगता है कि वह डराकर मुझे वापस ले जाएगा."

आकाश ने दृढ़ता से कहा, "उसे गलतफहमी है प्रिया. कल सुबह लॉग-इन करते ही हम सबसे पहले तुम्हारी मुम्बई शिफ्टिंग की बात पक्की करेंगे. और जब तक तुम यहाँ हो, यह घर तुम्हारा किला है."                              ... क्रमशः

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

पहचान

देहरी के पार कड़ी : 2
तलवंडी कोटा के ‘ए’ सेक्टर के 'मोहन विला' में अभी भी मातम और गुस्से का मिला-जुला माहौल था. गृहस्वामी ब्रज मोहन गुप्ता जवाहर नगर थाना में रिपोर्ट कराने गए थे, किन्तु उनकी सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेटी प्रिया के बालिग होने के कारण पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने से इन्कार कर दिया. बोले लड़की खुद कहीं भी जा सकती है. हाँ हम 24 घंटे बाद गुमशुदा रिपोर्ट दर्ज कर सकते है, यह नियम की बात है. वे घर लौट आए. अगले दिन सुबह फिर थाने गए तो उन्हें पता लगा कि प्रिया खुद एक वकील के साथ आकर बयान दे चुकी है कि, “उसने खुद अपनी मर्ज़ी से घर छोड़ा है. वह अपनी इच्छा के विरुद्ध विवाह नहीं करना चाहती, उसका कोई अफेयर नहीं है.” गुप्ताजी मायूस हो कर फिर लौट आए. यह पहली बार था जब उनकी किसी शिकायत पर पुलिस ने काम करने से इन्कार कर दिया हो. वे अनेक वर्ष से स्माल स्केल इंडस्ट्री ऑनर्स एसोसिएशन के सचिव थे, शहर के एसपी और रेंज के आईजी तक उनका सम्मान करते थे. लेकिन इस मामले में कोई उनके लिए सहायक सिद्ध न हो सका. उन्होंने प्रिया के कमरे को ताला लगा दिया, जैसे स्मृतियों को कैद करने से लज्जा मिट जाएगी.

लेकिन शुक्रवार की दोपहर जयपुर से प्रिया की कंपनी के किसी प्रतिनिधि, आकाश का फोन आया कि “प्रिया से संपर्क नहीं हो रहा है. तो पिता के पास उसे टालने का कोई बहाना नहीं था. कंपनी के लिए वह 'उद्योगपति की बेटी' नहीं, बस एक महत्वपूर्ण कर्मचारी थी जिससे संपर्क नहीं हो पा रहा था. “उसकी सहेली बीमार होने के कारण उसे अचानक इन्दौर जाना पड़ा, कंपनी का लैपटॉप तक ले कर नहीं गयी.” गुप्ताजी ने यही जवाब दिया. आकाश ने बताया कि “प्रिया की टीम जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी, वह उसकी वजह से अटक गया है, उसके लैपटॉप की तुरन्त जरूरत है, वह कल लेने कोटा आ रहा है.”

शनिवार की दोपहर, जब आकाश कोटा पहुँचा, तो उसे अंदाज़ा नहीं था कि वह एक सामाजिक रणभूमि में कदम रख रहा है. प्रिया के पिता ने भारी मन से उसे लैपटॉप सौंपा, यह कहते हुए कि "सहेली की बीमारी के कारण उसे अचानक जाना पड़ा. फिर भी फोन पर संपर्क तो करना चाहिए था. उनका भी उससे फोन संपर्क नहीं हो पा रहा है. अब तो उन्हें भी चिन्ता होने लगी है."

लेकिन आकाश, प्रिया की टीम का हिस्सा था, उसे पता था कि प्रिया के ड्यूटी न करने से प्रोजेक्ट को अधिक फर्क नहीं पड़ा था. उसकी मैनेजर ने बस इतनी हिदायत दी थी कि प्रिया ने घर में विवाद के कारण घर छोड़ दिया है और कोटा में ही किसी सहेली के यहाँ है. उसे उसके पिता के यहाँ से लैपटॉप लाकर प्रिया को सौंपना है.

प्रिया ने अपनी मैनेजर को फोन पर पूरी स्थिति स्पष्ट कर दी थी कि उसका विवाह उसकी मर्जी के बिना किया जा रहा था, जिसके कारण उसे घर छोड़ना पड़ा. मैनेजर ने संवेदनशीलता दिखाते हुए आकाश को केवल 'लैपटॉप कलेक्ट' करने के बहाने भेजा था, ताकि कंपनी से आवंटित लैपटॉप प्रिया को मिल जाए और वह काम शुरू कर सके.

ऋचा के फ्लैट पर माहौल कम गरम नहीं था. अमित, समीर और नेहा वहाँ पहले से मौजूद थे. सभी का विचार था कि परिवार से विवाद चलते प्रिया का कोटा में रहकर शांतिपूर्वक काम करना संभव नहीं होगा. या तो वह अपना ‘वर्क फ्रॉम होम’ समाप्त करके मुम्बई अपनी ड्यूटी जॉइन कर ले या फिर जयपुर या उदयपुर में किसी वर्किंग वूमन होस्टल में या कहीं पेइंग गेस्ट स्पेस में रह कर काम करे. एक-दो माह का समय मिल जाएगा. तब माहौल देख कर आगे के निर्णय ले. जब आकाश वहां लैपटॉप लेकर पहुँचा और प्रिया की निगाह अपने लैपटॉप पर पड़ी, तो उसकी आँखें चमक उठीं. कंपनी का लैपटॉप इस समय केवल एक मशीन नहीं था, उसकी 'आज़ादी का औज़ार' था.

समीर कह रहा था, "कोटा अब तुम्हारे लिए सुरक्षित नहीं है प्रिया. यहाँ हर मोड़ पर कोई न कोई तुम्हें पहचानता है. पुलिस और तुम्हारे पापा के रसूख वाले दोस्त तुम्हें चैन से जीने नहीं देंगे."

नेहा ने ठोस दलील दी, "जयपुर बड़ा शहर है. बढ़िया तो यह है कि कोटा से काम करने के बजाय, तुम जयपुर चली जाओ. इससे तुम्हें सुरक्षा भी मिलेगी और एक नया सामाजिक दायरा भी."

आकाश ने भी साथ दिया, "हाँ प्रिया, कंपनी तुम्हारी स्थिति समझती है. मेरे घर के पास ही वर्किंग वुमन हॉस्टल या पेइंग गेस्ट स्पेस मिल जाएगी. मैं अपनी कार लेकर आया हूँ. तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकती हो. मैं वहाँ अपने घर से नजदीक ही किसी होटल में कमरा बुक करवा देता हूँ."

खिड़की से हवा के एक झोंके ने अंदर प्रवेश किया. कोटा की यह हवा जो कभी उसे अपनी लगती थीं, अब उसे अजनबी लग रही थी. उसने तय किया कि वह आज ही आकाश के साथ प्रस्थान करेगी. कल से वह जयपुर शहर में काम करने वाली एक प्रोफेशनल होगी
... क्रमशः

गुरुवार, 19 मार्च 2026

देहरी के पार

रात डेढ़ बजे ऋचा को प्रिया का व्हाट्सएप मैसेज मिला, “मैंने घर छोड़ दिया है. मुझे छुपना नहीं है, बस खड़ा होना है.”

दो दिन बाद ही तो प्रिया की शादी होने वाली थी. उसे पता भी था कि प्रिया को लड़का पसंद नहीं था, उसने अपने मम्मी पापा को बता भी दिया था कि वह इस लड़के से शादी नहीं करना चाहती. फिर भी वे न केवल रिश्ता पक्का कर आए, बल्कि शादी की तारीखें भी तय हो गयीं. पापा के सामने कभी प्रिया ने अपनी इच्छा प्रकट नहीं की, लेकिन माँ से अवश्य वह रोज कहती रही कि, मैं यह शादी किसी हालत में न करूंगी. उसके बावजूद उसके पापा को न जाने क्यों ऐसा विश्वास था कि उन्होंने जो वर और घर देखा है उससे बेहतर कोई प्रिया के लिए कोई और नहीं हो सकता. वे दहेज और शादी पर भी लाखों खर्च कर रहे थे.

... तो आखिर प्रिया के सब्र का बांध टूट ही गया. उसने फौरन प्रिया को फोन लगाया और कहा, “तुम जहाँ भी हो वहाँ से फौरन मेरे फ्लैट में आ जाओ”. इसके बाद उसने तीनों दोस्तों अमित, समीर और नेहा को मैसेज किया कि, “प्रिया मेरे यहाँ पहुँच रही है, तुम भी पहुँचो.”

कुछ देर बाद प्रिया ऋचा के वन बीएचके फ्लैट में थी. आधे घंटे में अमित और समीर नेहा भी पहुँच गए. सबने मिल कर तय किया कि प्रिया रात को ऋचा के साथ उसके बेडरूम में रहेगी और अमित और समीर बाहर हॉल में रहेंगे. जिससे कोई आए तो उसे संभाला जा सके. समीर ने बताया कि उसने नेहा को अपने घर पर रुकने और सुबह जल्दी से जल्दी उसकी कंपनी के वकील को संपर्क करने को कहा है.

प्रिया अपने साथ ज्यादा कुछ नहीं लायी थी. उसने शाम को ही एक पुराने झोले में अपनी ज़रूरी डिग्रियाँ, लैपटॉप और कुछ जोड़ी कपड़े एक ठूँस कर रख लिए थे. घर के बाहर शामियाना लग रहा था, हलवाई की कड़ाही में चाशनी उबल रही थी और घर के बड़े-बुजुर्ग 'लाखों के लेनदेन' और 'खानदान की नाक' की चर्चा में मशगूल थे. प्रिया के लिए यकायक अपना ही घर एक ऐसी जेल बन चुका था जिसकी दीवारें नोटों और गहनों से चुनी गई थीं.

जिस लड़के से उसकी शादी तय हुई थी, उससे प्रिया दो बार मिली थी. दूसरी मुलाक़ात में ही उसने साफ़ कह दिया था, "नौकरी छोड़ देना, हमारे यहाँ बहुएं बाहर हाथ-पैर नहीं मारतीं." पिता ने जब यह सुना तो मुस्कुराकर बोले थे, "राज करेगी मेरी बेटी, कमाने की ज़रूरत ही क्या है?"

प्रिया के लिए वह 'राज' नहीं, अपनी पहचान की आहुति थी.

वह रात सवा बजे जब पूरा घर थकान और उत्सव के बीच गहरी नींद में था, हलवाई भी घर जा चुका था, प्रिया ने अपनी सैंडल हाथ में ली और पिछले दरवाज़े से बाहर निकल आई. उसके पास कोई 'ठिकाना' नहीं था. उसे पता था कि सुबह होते ही वह एक 'भगोड़ी' कहलाएगी.

शहर की पुलिस, समाज और खुद उसका परिवार—सब एक तरफ होंगे. उसके भागने को किसी 'अफेयर' या 'चरित्रहीनता' से जोड़ने की कोशिशें शुरू हो जाएंगी, क्योंकि समाज यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि एक लड़की सिर्फ अपनी आज़ादी के लिए भी घर छोड़ सकती है.

सुबह होते ही तूफान आया. पुलिस स्टेशन में प्रिया के पिता दहाड़ रहे थे, "बहला-फुसलाकर ले गया है कोई उसे!" पुलिस का पहला सवाल था, "लड़के का नंबर दो, किससे बात करती थी?" किसी ने यह नहीं पूछा कि क्या वह अपनी मर्ज़ी से गई है.

प्रिया के पुलिस के पास जाकर संरक्षण मांगने के प्रस्ताव को उसके दोस्तों ने खारिज कर दिया था. उन्हें पता था कि वहां उसे 'समझा-बुझाकर' वापस घर पहुँचा दिया जाएगा या फिर उसके पेरेंट्स को सूचना दी जाएगी और वे खुद पहुँच जाएंगे.

अगले तीन दिन प्रिया के लिए अग्निपरीक्षा जैसे निकले. मोहल्ले में चर्चाएँ हो रही थी, "इतना पैसा खर्च कर रहे थे माँ-बाप, नमकहराम निकली." प्रिया ने फेसबुक पर एक छोटा सा वीडियो पोस्ट किया:

"मैं किसी के साथ नहीं भागी हूँ. मैं उस शादी से भागी हूँ जहाँ मेरा वजूद खरीदा जा रहा था. मैं बालिग हूँ, कमाती हूँ और मुझे अपनी ज़िंदगी का फैसला लेने का हक है. पुलिस से मेरी विनती है कि इसे 'अपहरण' का रंग न दें."

यह वीडियो जंगल की आग की तरह फैल गया. कुछ ने उसे 'कुलटा' कहा, तो कुछ कामकाजी लड़कियों ने उसके साहस की तारीफ की.

चौथे दिन, प्रिया अपने दोस्तों और कंपनी के वकील के दफ्तर के एक सहायक वकील के साथ खुद पुलिस स्टेशन पहुँची. वहाँ उसके पिता और होने वाले ससुराल वाले मौजूद थे. माहौल तनावपूर्ण था. पुलिसवालों ने उसे झिड़का, "पागल हो गई हो? मां-बाप की इज़्ज़त की धूल उड़ा दी."

प्रिया ने शांति से अपना आई कार्ड और बैंक स्टेटमेंट मेज़ पर रखा. उसने कहा, "सर, मैं बालिग हूँ. कानून मुझे अपनी मर्ज़ी से रहने का अधिकार देता है. न तो मेरा अपहरण हुआ है, न मैं किसी दबाव में हूँ. मैं बस उस घर में नहीं रह सकती जहाँ मेरी मर्ज़ी के बिना मेरा सौदा हो रहा हो."

पुलिस के पास उसे रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं था. प्रिया के पिता की आँखों में गुस्सा था, पर प्रिया की आँखों में एक अजीब सी शांति. वह जानती थी कि अब उसके पास परिवार नहीं है, समाज का समर्थन नहीं है और न ही कोई बड़ा एनजीओ उसके पीछे खड़ा है.

उसके पास बस उसके चंद दोस्त थे और वह 'खुद' थी. उस रात प्रिया ने एक नए शहर के एक छोटे से हॉस्टल में सिर छिपाया. वह अकेली थी, डरी हुई भी थी, लेकिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसकी साँसों पर सिर्फ उसका हक है.

बुधवार, 18 मार्च 2026

बंकर महाराज


नगर के मध्य में स्थित 'ज्ञान निकेतन' स्कूल की दीवारों पर अब कालिख और भित्तिचित्रों का कब्जा था. जहाँ कभी गणित के सूत्र गूँजते थे, वहाँ अब भारी पर्दों के पीछे 'चमत्कारों की कार्यशाला' चल रही थी. स्कूल के मुख्य द्वार पर एक बड़ा बोर्ड लगा था— "तर्क त्यागिए, मोक्ष पाइए."

मंच पर भव्य रेशमी वस्त्रों में लिपटे 'महाराज' विराजमान थे. उनके गले में स्फटिक की मालाएँ थीं, लेकिन आँखों में व्यापारिक धूर्तता और रह-रहकर उभरने वाला एक अनजाना भय था. उनके सामने हजारों की भीड़ मंत्रमुग्ध बैठी थी, पर उस भीड़ की आँखों में भी एक अजीब सा द्वंद्व था—वे मानना तो चाहते थे कि उनके हाथ में हीरा है, पर कोयले की कालिख उनके अंतर्मन को कचोट रही थी.

"भक्तों!" महाराज दहाड़े, "ये स्कूल, ये किताबें, ये सब भ्रम हैं! देखो इस पत्थर को!" उन्होंने हाथ में कोयले का एक काला टुकड़ा उठाया. "तुम्हारी आँखों को यह कोयला दिख रहा होगा, क्योंकि तुम्हारी दृष्टि मैली है. पर वास्तव में यह हीरा है."

भीड़ में से एक युवक खड़ा हुआ. उसके चेहरे पर डर नहीं, एक शांत दृढ़ता थी. "पर महाराज, यह तो कोयला ही है. आप इजाजत दें तो हम इसे जला कर सिद्ध कर देंगे कि यह कोयला है, हीरा नहीं..."

महाराज के माथे पर पसीने की एक बारीक बूंद उभरी. उसके साथ ही मन द्वंद्व से घिर गया. महाराज को लगा कि अगर इस युवक को बोलने दिया गया, तो बरसों से खड़ा किया गया झूठ का यह महल ढह जाएगा. उन्हें उस युवक में अपना 'काल' नजर आया.

"मूर्ख!" महाराज ने उसे बीच में ही काट दिया. उनकी आवाज में अब क्रोध कम और असुरक्षा ज्यादा थी. "तुम परास्त विज्ञानियों के दूत हो! तुम इस युग के विद्रोही हो. सैनिकों, इसे पकड़ो!"

युवक को घसीटते हुए ले जाया गया. भीड़ के कुछ लोग खड़े हुए, फिर सहमकर बैठ गए. उनके भीतर एक युद्ध चल रहा था—सत्य का साथ दें या सुरक्षित झूठ का? अंततः 'सुरक्षा' जीत गई और वे फिर से जय-जयकार करने लगे.

महाराज की भृकुटियाँ तनी रहीं, पर जैसे ही युवक ओझल हुआ, उनके चेहरे पर एक कुटिल सुकून फैल गया. वे पुनः भीड़ से मुखातिब हुए, नेत्रों से बनावटी स्नेह-वर्षा करते हुए बोले, "हमने तर्क के स्कूल बंद कर दिए हैं. बनावटी इतिहास हटा कर इतिहास की पुस्तकों को निर्मल कर दिया है. अब वहाँ हमारा बताया हुआ 'सच्चा' इतिहास पढ़ाया जाएगा. हमारे प्राचीन गौरव की गाथाएँ गूँजेंगी."

मंच के पीछे खड़े वृद्ध शिक्षक ने देखा कि महाराज के हाथ हल्के से काँप रहे थे. पास खड़ा दरबारी हंसा, "देख रहे हो मास्टर जी? महाराज विश्व गुरु बन गए हैं!"

शिक्षक ने ठंडी आह भरी, "नायक का अभिनय करना और नायक होना, दो अलग बातें हैं. क्या तुम्हें भागवत पुराण के पात्र पौंड्रक का स्मरण है?? वह भी अपने मुकुट में मोर पंख खोंसकर, हाथ में नकली सुदर्शन चक्र लिए खुद को कृष्ण कहता था. जिसने भी उसकी असलियत उजागर कर खिल्ली उड़ाई, उसे कारागार में डाल दिया या मृत्युदंड दे दिया. भीतर से वह जानता था कि वह नकली है, और यही डर उसे विदूषक-खलनायक बनाता था. ये महाराज भी शेर की खाल ओढ़े सियार हैं. खाल के भीतर का सियार हमेशा काँपता रहता है."

तभी अचानक, बाहर भारी शोर मचा. सीमा पर संकट की घोषणा हुई. भीड़ की नजरें अपने 'रक्षक' पर टिक गईं. उन्हें उम्मीद थी कि अब 'चमत्कार' होगा.

परंतु, जैसे ही खतरे की पदचाप सुनाई दी, महाराज के भीतर का 'सियार' जाग गया. उनका 'वैश्विक नायक' वाला मुखौटा दरकने लगा.

"अंगरक्षकों! जल्दी करो!" वे फुसफुसाए. उनकी आँखों में वही पुरानी कायरता थी जो वे अब तक सत्ता के मुखौटे के पीछे छिपाते आए थे.

"पर महाराज, जनता आपकी वीरता देखना चाहती है!"

"वीरता भी देखेगी जनता, पहले सुरक्षा आवश्यक है." महाराज एक वातानुकूलित अभेद्य बंकर की ओर भागे. जाते-जाते उन्होंने चिल्लाकर वह अंतिम पाखंड किया, "मैं ध्यान मुद्रा में हूँ! सैनिकों की बलवृद्धि और उनकी विजय के लिए साधना-रत हूँ."

भीड़ ने देखा कि उनका 'शेर' बंकर के लोहे के पीछे लुप्त हो गया है. सन्नाटा पसर गया. अब वहाँ केवल धूल थी, धुआँ था और था कोयलों का ढेर, जिसकी कालिख अब सबके चेहरों पर साफ दिखने लगी थी.

वृद्ध शिक्षक ने अपनी पुरानी डायरी निकाली और लिखा:

"यह कोयला युग है. यहाँ नायक के वेश में सियार और लोमड़ विचर रहे हैं. पर याद रहे, इतिहास केवल मंच को नहीं देखता, वह बंकरों के अंधेरे में छिपी कायरता को भी पढ़ना जानता है."