Friday, November 27, 2009

रात की बारिश और फरीदाबाद से दिल्ली का सफर


रात सोने के पहले तारीख बदल चुकी थी। सर्दी के लिहाज से हलका कंबल  लिया था, एक चादर भी साथ रख लिया। केवल कंबल में भी गर्मी लगी तो उसे हटा कर चादर से काम चलाना पड़ा। सुबह पाँच के आसपास एक बार नींद खुली, यह लघुशंका के लिए थी।  बाथरूम गया तो  रास्ते में बालकनी गीली दिखाई दी। गौर किया तो पता लगा रात बारिश हुई है। सर्दी कम होने का कारण यही था। अभी रात शेष थी। दुबारा बिस्तर पर लेटा तो नींद फिर लग गई।  इस बार उठा तो आठ बज चुके थे। निपटते-निपटाते साढ़े नौ बज गए। झटपट नाश्ता किया और चल दिया। मैं सोचता था कि डेढ़ नहीं तो दो घंटे में तो निश्चित स्थान पर पहुँच ही लूंगा। गंतव्य के लिए मुझे बदरपुर बॉर्डर से जिस बस को पकड़ना था उस का रूट नंबर मुझे अजय झा बता चुके थे। बॉर्डर तक कैसे पहुँचना है इतना जानना था। इस के लिए मकान मालिक ने मदद की और मैं पहुँचा सेक्टर तीन की पुलिया पर।  दो-तीन मरियल से ठुकपिट कर शक्ल बिगाड़े रिक्शा आए लेकिन बॉर्डर के नाम से ही बिदक गए। फिर एक हरे रंग का नया सा मिला, उसने बिठा लिया और बदरपुर बॉर्डर उतारा। मोबाइल ग्यारह में आठ मिनट कम बता रहा था।
विचित्र नजारा था। मेट्रो के लिए चल रहे काम और शायद निर्माणाधीन फ्लाई ओवर के कारण  बेहद अफरातफरी थी। यहाँ भी स्थाई-अस्थाई बाजार उगे थे। पता ही नहीं लग रहा था कि कहाँ से बस मिलेगी? मुझे कुछ पान की दुकानें दिखीं। पूरा एक दिन हो गया था, पान खाए। पास गया तो उन में गुटखे लटक रहे थे और भी बहुत कुछ था पर पान नहीं था। तलाश करने पर एक जगह पान भी दिखे दुकानदार उस की दीवार घड़ी दुरुस्त करने में जुटा था। मैं ने उसे पान बनाने को कहा तो उस ने बस एक नजर मेरी और देख वापस अपने काम में जुट गया। मैं ने एक मिनट उस का इंतजार किया और खुद को उपेक्षित पा कर वहाँ से चल दिया। रास्ते में कुछ लोग मोजे, रुमाल, बटुए आदि बेच रहे थे। मुझे याद आया मैं रुमाल लेना भूल गया हूँ। मैंने दस रुपए में एक रुमाल खरीदा और उसी से पूछा कि बस कहाँ मिलेगी? उस ने दूर खड़ी बसों की ओर इशारा किया। मैं तकरीबन पौन किलोमीटर चल कर बसों तक पहुँचा तो मेरे रूट की बस बिलकुल खाली थी, ड्राइवर-कंडक्टर  अंदर बैठ कर अपना सुबह का टिफिन निपटा रहे थे। मैंने पूछा तो उन्हों ने आगे जाने का इशारा किया। आधा किलोमीटर और आगे चल कर मैं बस तक पहुँचा। सवारियाँ बैठ रही थीं। मैं चढ़ा और खुद को खुशकिस्मत पाया कि वहाँ एक सीट बैठने के लिए खाली मौजूद थी। कुछ देर बैठे रहने के बाद कंडक्टर को पूछा तो उस ने बताया कि बस 11: 38 पर चलेगी। मैं लेट हो चुका था।
चे समय के इस्तेमाल का मेरे पास कोई जरिया नहीं था, लेकिन लोगों के पास था। एक बच्ची हाथ में कमंडल और उस में बिठाई तस्वीर ले कर मांगने के लिए बस में चढ़ गई। वह कुछ नहीं बोल रही थी। हर सवारी के आगे कुछ देर खड़ी होती, कुछ मिलता तो ठीक नहीं तो आगे बढ़ जाती। ऐसे ही बच्चे, महिलाएँ कोटा अदालत में खूब आते हैं, सब के सब पक्के प्रोफेशनल। मेरे एक साथी उन्हें कई बार नसीहतें दे चुके हैं। उन से काम कराने के बदले मजदूरी देने का प्रस्ताव भी करते हैं। पर कौन स्थाय़ी रोजगार छोड़ अस्थाई की और झाँकता है। बच्ची बस से उतरी तो एक युवक नारियल की फांके लिए बेचने चढ़ा, कुछ लोगों ने उस का स्वागत किया। उस के बाद एक पैंसिल बेचने वाला चढ़ा। मेरे पास की सीट पर बेटी के साथ बैठे सज्जन ने पैंसिलें खरीदीं। तभी बस ने हॉर्न दिया। पैंसिल बेचने वाला उतर गया, बस चल दी।

जिस तरह बस चल रही थी लग रहा था कि कम से कम एक डेढ़ घंटा जरूर लेगी। मैंने कंडक्टर को अपना गंतव्य बताया। उसने मुझे आश्वस्त किया कि वह मुझे सही स्थान पर उतार देगा। एक स्टॉप पहले ही उस ने मुझे आगे के दरवाजे पर बुलाया और मेरे स्टॉप पर उतार दिया। बाद में पता लगा कि उस ने मुझे एक स्टॉप पहले ही उतार दिया था। अपने राम पैदल चल पड़े। मेट्रो स्टेशन के पास पहुँच कर मैं ने मोबाइल से अजय से संपर्क करना चाहा पर वहाँ सिग्नल गायब थे। मैं एक और चल दिया और सिग्नल मिलने तक चलता रहा। अजय से बात हुई तो वे मुझे लेने आ गए। हम मिलन स्थल पहुँच गए। पाबला जी तो वहाँ पहले से ही थे श्रीमती संजू तनेजा, राजीव तनेजा, कार्टूनिस्ट इरफान, और खुशदीप सहगल भी पहुँचे हुए थे। बातों के साथ नाश्ता चल रहा था। सभी बहुत आत्मीयता के साथ मिले। मैं बैठा ही था कि अचानक पीछे रोशनी चमकी। मुड़ कर देखा तो टेबल पर रखा पाबला जी का कैमरा हमें कैद कर रहा था।



11 comments:

ललित शर्मा said...

राम-राम सा-बढिया चल रहा है यात्रा वर्णन-आभार

ज्ञानदत्त G.D. Pandey said...

बहुत बढ़िया जी! लगता है सब सामने घटित हो रहा हो!

ताऊ रामपुरिया said...

बेहतरीन प्रस्तुती, आनंद आता है आपके ये सम्स्मरण पढकर.

रामराम.

cmpershad said...

लघुशंका......बाथरूम गया तो रास्ते में बालकनी गीली दिखाई दी। .... हम तो कुछ और ही समझे थे:) चलो बिलागर भेंट अच्छी रही, जानकर प्रसन्नता हुई॥

अशोक कुमार पाण्डेय said...

आप कहां-कहां से ढूंढ लाते हैं रोचकता?

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

प्रणाम !
बताते रहिये ....हम बहुत ध्यान से सुन रहे थे और सुन रहे हैं और ......

ravikumarswarnkar said...

बेहतर...

अजय कुमार झा said...

अरे सर हमें तो आपसे मिलने की सारी कथा मालूम थी ...उससे पहले की तो अब पता चल रही है ..कमाल का वर्णन

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लगी आप की यह यात्रा दिल करता है कभी इन बसो मै बेठने को, अगली बार आया तो एक बार बेठ कर देखेगे, वेसे तो जब भारत मै थे इन्ही बसो मै चढते, लटकते थे, लेकिन अब थोडे दिनो के लिये आते है तो समय ही नही मिलता

अनूप शुक्ल said...

कभी यह पोस्ट आगे पढ़ी जायेगी तो अंदाज लगायेगा ---सन २००९ तक ब्लागर लोग समय मिनटों में देखना सीख चुके थे और घड़ी-घड़ी, घड़ी देखते रहते थे।

चंद्रमौलेश्वरजी की टिप्पणियां हमेशा मजेदार और चुटीली रहती हैं। आज शायद वे यह कहना चाहते थे कि आप जो करने के लिये बाहर आये वह आपके पहले भी कोई कर गया था। :)

आगे की कहानी सुनाइये अभी तो।

खुशदीप सहगल said...

द्विवेदी सर,
अब पता चला कि आप के उस दिन लेट होने की वजह क्या थी...आप जब तक नहीं आए थे, अजय कुमार झा जी के माथे पर चिंता की लकीरें दौड़ने लगी थीं...आपका फोन आने पर सबकी जान में जान आई...फिर तो आपके आते
ही इंतज़ार की सारी कसक दूर हो गई थी...मुझे मलाल इस बात का रहेगा कि अगले दिन मेरे घर आने का प्रोग्राम सेट नहीं हो सका...चलिए अब जब भी अगली बार आएं तो सीधे घर ही आइएगा...

जय हिंद...