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शनिवार, 27 दिसंबर 2025

कच्ची ईंटें

'लघुकथा'

- दिनेशराय द्विवेदी
सूरज के उगने से पहले ही रामलाल के हाथ चिपचिपी मिट्टी में डूबे थे. हर ईंट को साँचे में ढालते हुए उसकी उँगलियों के छाले पुराने पड़ चुके थे, पर मन अब भी कोमल था. एक ईंट रखते हुए अचानक मुन्नी का चेहरा आँखों में तैर गया—कल ही उसने टूटी स्लेट पर कोयले से लिखा था, “बाबूजी, देख लेना, एक दिन मैं भी बड़ी मास्टरनी बनूँगी.”

उसका सपना रामलाल की रगों में खून बनकर दौड़ता, तभी भट्ठा मालिक की आवाज़ कोड़े सी बरसी -
“ऐ रामलाल! हाथ चला, दिमाग नहीं. कल भट्ठा लगाना है.”

रामलाल ने गर्दन झुका ली. ज़बान खोलने की कीमत मज़दूरी कटने से चुकानी पड़ती थी.

एक तपती दोपहरी में अचानक धड़ाम की आवाज़ हुई. ईंटों की कच्ची दीवार ढह गई थी, और रामलाल उसके नीचे दबा था. उसे बाहर निकाला गया तो पैर लहूलुहान था. मालिक ने आकर घड़ी देखी और चिल्लाया-
“मरा तो नहीं! काम रुकना नहीं चाहिए.”

उस रात रामलाल की झुग्गी में दर्द से ज्यादा एक दबी हुई आग धधक रही थी. डॉक्टर ने प्लास्टर चढ़ाया था और आराम करने को कहा था. पर जब मुन्नी ने पूछा, “बाबूजी, फिर स्कूल कब जाऊँगी?” तो रामलाल को लगा जैसे उसकी चुप्पी ही उस स्लेट को हमेशा के लिए तोड़ देगी.

देर रात, जब भट्ठे का धुआँ आसमान को काला कर रहा था, रामलाल लंगड़ाता हुआ सुक्खू, गफूर और चंदर के पास पहुँचा.

“मित्रो,” उसकी आवाज़ में दर्द से ज्यादा आग थी, “आज मेरा पैर दबा, कल किसी का सपना दबेगा. क्या हमारे बच्चे भी इसी भट्ठे में ईंट बनकर पकेंगे?”

सुक्खू डरा हुआ था, “बोलेंगे तो भूखे मरेंगे.”

रामलाल की आँखों में बिजली कौंधी, “साथ बोलेंगे तो मालिक का गुरूर मरेगा. ये ईंटें हमारे पसीने से पकती हैं. हमें जीने लायक मज़दूरी चाहिए.”

त हवा से फैली. अगले कई दिनों तक, रामलाल के पैर से प्लास्टर कटने तक, अंधेरी रातों में मजदूर उसकी झोंपड़ी में जुटते रहे. उन्हें समझ आने लगा—उनकी आपबीती एक ही दास्तान है.

जिस दिन रामलाल काम पर लौटा, उस रात उसने कोयले से एक फटे बोरे पर लिखा: 'मजदूर यूनियन'. अगली शाम, काम खत्म होते ही सभी मजदूर शिव मंदिर के लॉन में इकट्ठे हुए. रामलाल ने कहा, “हम एक होकर लड़ेंगे. पहला कदम—यूनियन बनाएँगे. जो शामिल नहीं होना चाहते, वे हाथ ऊपर उठाएँ.”

चारों तरफ सन्नाटा छा गया. केवल भट्ठे की चिमनी से उठता काला धुआँ हवा में लहरा रहा था, मानो स्वयं आकाश सुन रहा हो. एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा.

रामलाल की आवाज़ गूँजी, “इंकलाब जिन्दाबाद!”

नारे से हवा काँप उठी. और उसी क्षण मुन्नी ने, जो एक कोने में खड़ी सब देख रही थी, अपनी टूटी स्लेट पर फिर से कोयले से कुछ लिखना शुरू किया—शायद अपना नाम, शायद एक नई शुरुआत.

भट्ठे से उठता धुआँ अब केवल कालिख नहीं, एक संकल्प बनकर फैल रहा था. कच्ची ईंटें अब सिर्फ दीवारें नहीं, एक नई नींव की पहली परत थीं.

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

बेनकाब उजाले

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
महानगर की उमस भरी नसों में आज एक अजीब सी बेचैनी थी। एक तरफ कई सौ एकड़ में फैला वह महलनुमा आवास था, जो आज पूरी दुनिया की चकाचौंध को खुद में समेटे हुए था। अरबपति के बेटे की शादी थी। सड़कों पर गाड़ियों का हुजूम नहीं, बल्कि सत्ता और संपत्ति का प्रदर्शन रेंग रहा था।

महल के भीतर बने आधुनिक ऑडिटोरियम में संगीत की थाप तेज हुई। नर्तकियां मंच पर थीं। दर्शक दीर्घा में देश के सबसे रसूखदार चेहरे बैठे थे। जैसे-जैसे नर्तकियों के बदन से कपड़े कम हो रहे थे, हॉल में तालियों का शोर और सिगार का धुआँ घना होता जा रहा था। जब मुख्य नर्तकी के साथ केवल उसकी दो सहायिकाएँ रह गईं, तो एक रईस ने जाम छलकाते हुए कहा, "यही तो असली विकास है, जहाँ मर्यादा की बेड़ियाँ टूट रही हैं।"


उसी जगमगाते महल की ऊँची दीवारों के साये में 'नील गगन' झुग्गी बस्ती थी, जहाँ नाम के उलट आसमान भी काला और धुएँ भरा था।

श्यामू रिक्शा चालक अपनी फटी हुई बनियान से पसीना पोंछते हुए बैठा था। उसका छोटा बेटा सुबक रहा था, "पापा, वहाँ से हलवे की खुशबू आ रही है। क्या हम जा सकते हैं?"

श्यामू की पत्नी राधिका ने पास पड़े खाली मटके को पटकते हुए कहा, "वहाँ जाने की कीमत हमारी जान से ज्यादा है बेटा। वहाँ पहरे नहीं, लोहे की दीवारें हैं। सुना है आज पी.एम. साहब भी आए हैं आशीर्वाद देने। हमारी भूख उनके कैमरों के फ्लैश में कहीं खो गई है।"


ऑडिटोरियम में अब केवल मुख्य नर्तकी बची थी। रोशनी मद्धम हुई और उसके बदन से एक और वस्त्र सरक गया।

"शानदार!" एक अफसर ने फुसफुसाया। तभी कोने में खड़े एक पत्रकार ने अपनी डायरी में लिखा— 'उतरते हुए वस्त्र केवल नग्नता नहीं, इस लोकतंत्र की उतरती हुई खाल हैं। व्यवस्था आज स्टेज पर नंगी नाच रही है और रक्षक तालियाँ बजा रहे हैं।'

अचानक, आसमान में एक जोरदार धमाका हुआ। आतिशबाजी का एक बड़ा गोला फटा और उसकी रंगीन रोशनी ने झुग्गियों के अंधेरे को एक पल के लिए चीर दिया।

श्यामू चौंक कर खड़ा हो गया। उसे लगा जैसे आसमान से आग के गोले गिर रहे हों। उसने गुस्से में चिल्लाकर कहा, "देख राधिका! ये रोशनी नहीं है। ये हमारी बेबसी का जश्न है। वो आसमान में बारूद नहीं, हमारे हिस्से की रोटियाँ जला रहे हैं।"


मंच पर अब अंतिम दृश्य था। मुख्य नर्तकी ने अपना अंतिम वस्त्र भी त्याग दिया। संगीत रुक गया, रोशनी मद्धम होकर शून्य हो गई। मदहोश दर्शकों के गले से एक सामूहिक चीख निकली—उत्साह की या हवस की, यह तय करना मुश्किल था।

तभी पी.एम. की आवाज गूँजी, "आज दुनिया के सबसे अमीर लोगों में हमारा नाम है। यह नया भारत है, यह नग्न सत्य है!"

पत्रकार ने अपनी कलम बंद की और बुदबुदाया, "हाँ, नग्न और बेनकाब। सत्य भी और सत्ता भी।"


झुग्गी में अंधेरा फिर लौट आया था। बिजली का बिल न भर पाने की वजह से कटा कनेक्शन अब एक स्थायी सन्नाटा बन चुका था।

बच्चा फिर रोया, "पापा, दूध..."

श्यामू ने आतिशबाजी से चमकते उस महल की ओर देखा और मुट्ठियाँ भींच लीं। उसने अपने पास पड़े खाली पीपे को जोर से लात मारी। आवाज़ गूँजी और बस्ती के दूसरे घरों से भी सिसकियों की जगह अब गुस्से की सुगबुगाहट आने लगी।

"हमें तुम्हारी ये झूठी रोशनी नहीं चाहिए साहब," बस्ती के कोने से एक बुजुर्ग की आवाज आई, "हमें तो बस हाथ को काम और पेट को रोटी चाहिए।"

आसमान में आखिरी पटाखा फटा और उसकी राख धीरे से श्यामू के खाली हाथ पर आकर गिरी। वह रोशनी नहीं, ठंडी पड़ चुकी एक चिंगारी थी।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

उम्मीद

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

मॉल रोशनियों से नहाया हुआ था. लाल-सुनहरी गेंदें और टिमटिमाते सितारे हर किसी को अपनी ओर खींच रहे थे. बाहर लॉन में हजारों बल्बों से सजा क्रिसमस ट्री किसी सजीली दुल्हन की तरह मुस्करा रहा था. सड़क पार फुटपाथ पर राघव सुबह से अपने ठेले पर बच्चों के लिए सांताक्लॉज की लाल ड्रेसें बेच रहा था. उसकी अधिकांश ड्रेसें बिक चुकी थीं. बस चार-पाँच बची थीं. वह सोच रहा था कि ये भी बिक जाएँ तो सुकून से घर जाए; दो ड्रेसें तो वह अपने बच्चों, श्याम और सरिता के लिए ले ही जाएगा.

तभी एक स्कूटर वाला आकर रुका और ड्रेसें देखने लगा. राघव उम्मीद से बोला, “देख क्या रहे हैं बाबूजी, ले लीजिए. बस यही पाँच-छह बची हैं, आधी दर पर दे दूंगा.”

राघव आगे कुछ बोल पाता, तभी एक आटो रिक्शा उसके सामने आकर धीमा हुआ और ड्राइवर चिल्लाया— “सामान समेटो और भागो राघव! गुंडों की फौज आ रही है!”

राघव ने मुड़कर देखा, पंद्रह-बीस लोगों का हुजूम लाठी-डंडे लिए चीखता-चिल्लाता चला आ रहा था. ये वही लोग थे जो अक्सर त्यौहारों का उल्लास बिगाड़ने को ही अपना धर्म समझते थे. राघव ने फुर्ती से सांताक्लॉज की ड्रेसें चादर में लपेटकर गठरी बाँधी और ठेले को गली में धकेल दिया. स्तब्ध खड़ा स्कूटर वाला भी अपनी गाड़ी स्टार्ट कर राघव के पीछे उसी गली में घुस गया.

गली के सुरक्षित कोने से उन्होंने देखा—भीड़ मॉल में घुस चुकी थी. उन्होंने सजावटी ट्री को पीट-पीटकर गिरा दिया और उसमें आग लगा दी. गार्ड्स, जो सांता की ड्रेस में थे, उनके कपड़े फाड़ दिए गए. दस मिनट के तांडव में मॉल के शीशे चकनाचूर हो गए. कुछ लोग हाथों में कीमती सामान दबाए बाहर निकले और शोर मचाते हुए आगे बढ़ गए.
सन्नाटा छाने पर ग्राहक ने पूछा, “ये ड्रेसें कितने में दे रहे हो?” राघव की आवाज काँप रही थी, “सौ की एक है बाबूजी, आप जो दे दें. अब बस घर जाना चाहता हूँ.” “सौ में दो दोगे? मेरे पास पैसे कम हैं, बाकी से बच्चों के लिए कुछ मीठा लेना है,” ग्राहक ने मोल भाव किया. राघव ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “ले जाइए बाबूजी, कम से कम आपके बच्चे तो खुश होंगे.”

राघव ने नोट जेब में रखा और खाली सड़क को देखा. ग्राहक बोला, “मॉल में बहुत नुकसान कर गए ये लोग.” राघव ने लंबी सांस ली, “ये हर त्यौहार पर यही करते हैं. पुलिस भी सब बरबाद होने के बाद जमीन पर लाठियाँ बजाने आती है.”

राघव ठेला लुढ़काते हुए अपनी बस्ती की ओर चला, जो चर्च के पीछे नाले के किनारे थी. चर्च के पास पहुँचते ही उसके पैर ठिठक गए. तीन दिन से जगमगाती रोशनियाँ बुझ चुकी थीं. चर्च के एक कोने से धुआँ उठ रहा था. पता चला कि भीड़ ने पादरी जॉन साहब पर हमला किया, उनका सिर फट गया है और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है. राघव की रूह काँप उठी— "क्या ईश्वर इतना कमजोर है कि उसे बचाने के लिए खुशियों का कत्ल करना जरूरी है?"

बस्ती पहुँचा तो देखा, अनीता की झुग्गी राख के ढेर में बदल चुकी थी. अनीता एक पुराने बक्से पर बैठी शून्य में ताक रही थी. उसका पति और बेटा पहले ही एक हादसे में गुजर चुके थे. पादरी  जॉन साहब की मदद से वह फिर से खड़ी हो सकी। उनकी सहृदयता को देख उसने ईसाई धर्म अपनाया था, और आज शायद इसी की कीमत उसने अपना आशियाना खोकर चुकाई थी. सलीम उसके पास खड़ा उसे ढाढ़स बँधा रहा था.

सलीम ने राघव को देखते ही बुझी हुई आवाज में कहा, "वाह! धर्म बच गया! किसी का सिर झुकाकर, किसी की छत छीनकर और किसी के दिल में नफरत भरकर... उन्होंने अपने भगवानों को खुश कर दिया." सलीम की आँखों में आक्रोश से ज्यादा शर्मिंदगी थी.

राघव ने आगे बढ़कर अनीता के सिर पर हाथ रखा और पूरी दृढ़ता से बोला, “अनीता बहन! घर लकड़ी और ईंटों का था, जो टूट गया. पर हम जो साथ खड़े हैं, वह 'विश्वास' है, जिसे कोई नहीं तोड़ सकता. हम सिर्फ ईंटें नहीं जोड़ेंगे, हम टूटे हुए भरोसे को भी जोड़ेंगे. अदालत से लेकर सड़क तक, तुम अकेली नहीं हो. यह देश नफरत की आग में जलने के लिए नहीं बना है.”

अनीता ने सिर उठाकर दोनों भाइयों को देखा और खड़ी होकर बोली, “उन्होंने नफरत को धर्म मान लिया है, पर तुम दोनों ने प्यार का धर्म नहीं छोड़ा. वे कितना भी तोड़ें, मैं अपना विश्वास नहीं खोऊँगी.”

सलीम और राघव ने अनीता को सहारा दिया. जलते हुए चर्च की लपटें अब शांत हो रही थीं, लेकिन उस ढहे हुए घर के पास तीन दिलों की धड़कनें एक सुर में थीं. वहां न कोई हिंदू था, न मुसलमान, न ईसाई—वहां सिर्फ तीन 'इंसान' थे, जो एक नए सवेरे की नींव रख रहे थे.

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

दीवार

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
गाँव के चौक में बड़ी हलचल थी. गाँव की बहू, सत्या, ने राज्य स्तर पर अवॉर्ड जीता था. पंचायत भवन में उसके सम्मान में एक समारोह रखा गया था. लोग इकट्ठा हुए थे, ढोल-नगाड़े बज रहे थे.

सत्या मंच पर पहुँची. सिर पर घूंघट था. साथ में उसकी ननद राधा भी थी.
 
सत्या को घूंघट में देख कर भीड़ में खुसर-फुसर होने लगी. तभी एक नौजवान ने जोर से कह दिया ...
“देखो, इतनी पढ़-लिख कर भी घूंघट में आई है!”

“चुप्प¡ तुम्हें तमीज भी नहीं, भरी सभा में चिल्ला रहे हो. यही तो असली संस्कार है. बड़े पद पर है, अवार्ड जीता है, फिर भी घमंड नहीं. अपनी परंपरा को कैसे अच्छे से निबाह रही है.” पास ही बैठे बुजुर्ग ने नौजवान को डाँट पिलाई. कुछ लोग ताली बजाने लगे तो कुछ हँस पड़े.

तभी पास खड़ी सत्या की ननद राधा, जो कॉलेज में पढ़ रही थी, आगे बढ़ कर माइक पर आ गयी और सहज स्वर में बोली...
“इसे मेरी गुस्ताखी कहें कि मैं बिना बुलाए भाभी के साथ मंच पर आई और यहाँ अपनी बात कह रही हूं. आप खुद देखें यह संस्कार है? या बाध्यता? अगर सच में हमारी शिक्षा ने आज़ादी दी होती, तो सत्या भाभी को घूंघट की ज़रूरत ही न पड़ती. कोई स्त्री घूंघट में नहीं रहना चाहती. आप लोग समझ ही नहीं सकते कि यह घूंघट एक स्त्री को कैसी कैसी तकलीफें देता है.”

उसकी बात सुनकर बुज़ुर्गों में खुसर-फुसर शुरू हो गई. एक बुजुर्ग ने जोर से कहा...
“लड़कियाँ अब बहुत बोलने लगी हैं. “ये सब पढ़ाई का असर है. अंग्रेजी पढ़ाई बदतमीजी सिखाती है.”

अचानक मंच पर खड़ी सत्या ने अपनी ननद राधा को एक ओर किया और माइक पर खुद बोलने लगी. उसका स्वर धीमा था, लेकिन शब्दों में आग थी...
“आप कहते हैं कि घूंघट संस्कार है. लेकिन जब कोई पुरुष किसी स्त्री का घूंघट उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक स्थान पर हटाने की कोशिश करता है, तब वह किस तरह का संस्कार है?
आप कहते हैं कि हम पढ़-लिख कर भी आगे नहीं बढ़ पाए. लेकिन सच यह है कि शिक्षा का दरवाज़ा ही आधा खुला रखा गया है.
और जब हम बड़े पद पर पहुँचते हैं, तब भी आप हमें घूंघट में देखना चाहते हैं, ताकि आपके गर्व का झूठा आईना चमकता रहे.”

सभा में सन्नाटा छा गया. किसी नौजवान ने सन्नाटे को चीर कर जोर से कहा हिप हिप हुर्रे. कुछ लड़के लड़कियों ने उसके जवाब में फिर से हिप हिप हुर्रे को दोहराया.

तभी, सत्या ने आहिस्ता से घूंघट हटाया. उसकी आँखों में डर नहीं था, बल्कि दृढ़ता थी. वह फिर बोलने लगी...
“बदलाव की शुरुआत पुरुषों से होनी चाहिए. जब आप हमें सहजता और सम्मान देंगे, तब हम बिना डर के चल पाएंगी. और अगर आप ऐसा नहीं कर सकते, तो कम से कम हमसे सवाल करने का अधिकार मत छीनिए.”

भीड़ में खामोशी थी. कुछ चेहरों पर शर्म थी, कुछ पर सोच.

राधा ने ताली बजाई. धीरे-धीरे और लोग भी ताली बजाने लगे. भीड़ में उपस्थित अनेक स्त्रियों ने जो घूंघट किए हुए थीं, अपना-अपना घूंघट हटाना शुरू किया. एक- एक कर पर्दों में कैद सभी चेहरे आजाद हो गए

गाँव में घूंघट की दीवार टूट चुकी थी.

ट्रेन में बहस

लघुकथा
दिनेशराय द्विवेदी
यह कोई 45-47 साल पहले का वाक़या है। मुझे अपने नगर से कोटा आना था. जनरल क्लास का कोच खचाखच भरा था, खिड़की के पास बैठा यात्री मेरा परिचित था वह उतरने वाला था. उसने मेरा बैग ले कर अपनी जगह रख दिया. मैं जैसे तैसे उस जगह जा कर बैठा. एक सफेद झक्क कुर्ता पायजामा पहने गोल टोपी लगाए गोरे सज्जन ठीक मेरे सामने वाली सीट पर खिड़की से दूसरे स्थान पर बैठे थे. अपने लिबास से वे सबसे अलग ही दिखाई दे रहे थे.
मैंने उन सफेदपोश सज्जन से पूछ लिया, “ जनाब कहाँ से तशरीफ ला रहे हैं?”

“यहीं से बैठा हूँ.”

"जनाब, सफ़र कहाँ तक है?"

“फिलहाल तो ट्रेन कोटा तक ही है, वैसे लखनऊ जाना है? उन्होंने बताया. आगे बातचीत से पता लगा वे मुफ्ती हैं. उन दिनों मोबाइल तो हुआ नहीं करते थे. ट्रेन में आसपास के यात्रियों से बातचीत या कोई किताब हो तो उसे पढ़ते जाना ही यात्रा का वक्त बिताने के तरीके हुआ करते थे. मैंने इसीलिए मुफ्ती साहब को छेड़ा...

“मुफ्ती साहब आप तो धार्मिक इंसान हैं, और आपने मजहबी तालीम भी हासिल की है. मेरे जेहन में बार-बार यह सवाल उठता है कि क्या कोई ईश्वर है?”

"बिलकुल है. जो कुछ भी इस कायनात में है, उसका बनाने वाला ख़ुदा ही है."

सुन कर मैं मुस्कराने से खुद को रोक नहीं सका. मैंने बात आगे बढ़ाई...

“लेकिन जनाब, कायनात मतलब पूरा यूनिवर्स है. अभी तक तो हमें यह भी नहीं पता कि यह कायनात कितनी विशाल है. अरबों खरबों तारे, उनके गिर्द चक्कर काटते ग्रह, उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, पुच्छल तारे वगैरा-वगैरा. अरबों खरबों तारों बनी अरबों खरबों गैलेक्सियाँ. यह यूनिवर्स तो बहुत विशाल है. अभी तक जितनी इंसान जितनी क्षमता की दूरबीनें बना सका है उनसे यूनिवर्स का केवल हमारी धरती के गिर्द वाला हिस्सा ही हम ऑब्जर्व कर पाते हैं. उसके अलावा उसका कितना हिस्सा शेष है, उसका विस्तार कहाँ तक है, हम नहीं जान पाए हैं. हम जितना ऑब्ज़र्व कर सकते हैं, उतना ही देख पाते हैं. तो इतना बड़ा यूनिवर्स किसी ख़ुदा ने बनाया है.”

“यक़ीनन उसी ने बनाया है. आखिर हम देखते हैं कि बिना बनाए कुछ नहीं बनता है, तो जो बना बनाया है उसे ख़ुदा ने ही बनाया है. उन तमाम चीजों का होना ही तो ख़ुदा के होने का सबूत है.” मुफ्ती साहब बोले. अब वे मंद-मंद मुस्करा रहे थे.


“यानी ख़ुदा का होना यक़ीनन है?”

“जी बिलकुल यक़ीनन है.” मुफ्ती साहब ने फिर से ख़ुदा के होने की ताईद की.

“ग़र ख़ुदा है तो फिर उसको बनाने वाला भी होना चाहिए?” मैंने अपना नया सवाल दागा.

“देखिए ख़ुदा ऑब्जर्वेबल नहीं है, इसलिए हम कहते हैं कि वह खुद-ब-खुद है. वह खुद-ब-खुद है इसीलिए ख़ुदा है.”

“यानी पहले हम यह मानें कि इस यूनिवर्स को बनाने वाला कोई है, फिर यह मानें कि वह अनऑब्जर्वेबल है. इसके बाद यह मानें कि वह खुद-ब-खुद बना है. बड़ा झंझट है. हमें तीन-तीन चीजें मानें तब ख़ुदा सिद्ध हो. आपका ये ख़ुदा तो तीन-तीन बातों पर डिपेंडेबल है. इससे बेहतर तो यह है कि हम इस यूनिवर्स को ही ख़ुदा मान लें. कम से कम वह ऑब्जर्वेबल तो है और सिर्फ एक बात मानने पर डेपेंडेबल है कि आखिर कोई चीज तो है जो खुद-ब-खुद है.”

मेरा तर्क सुन कर मुफ्ती साहब की भौंहें चढ़ गईं. कहने लगे...
“यह यूनिवर्स ख़ुदा कैसे हो सकता है? यह तो ऑब्जर्वेबल है.”

“फिर तो ख़ुदा को मानने वालों और न मानने वालों में यही फर्क रहा कि ख़ुदा मानने वालों को तीन चीजें माननी पड़ेंगी. जब कि न मानने वालों को एक ही चीज माननी पड़ेगी.” यात्री अब तक मुस्करा रहे थे अब उनमें से किसी की हँसी भी फूट पड़ी और मुफ्ती साहब की भौंहें और चढ़ गयीं. मैंने अपना कहना जारी रखा...

“तो फिर बेहतर तो वह हुआ न जो एक ही चीज को मान लेता है.” इससे ख़ुदा का होना भी उसने मान लिया. बस वह मानता है कि यह यूनिवर्स ही ख़ुदा है. कोई ईश्वर, अल्लाह, गॉड वगैरा नहीं जो अक्सर ख़ुदाई किताबों में होना बताया जाता है.”

“नहीं जनाब, यह फेयर प्ले नहीं है. हमने जब बात शुरू की तो पहले ही कह दिया था कि जो ऑब्जर्वेबल नहीं है वह ख़ुदा है. चूंकि यूनिवर्स पूरा नहीं थोड़ा ही सही पर ऑब्जर्वेबल है, इसलिए ख़ुदा नहीं हो सकता.” मुफ्ती साहब ने अपनी आपत्ति पेश की.

“यह बात तो आपने कही थी, हमने मानी थोड़े ही थी. ये तो वही हुआ कि खुद ही नियम तय कर लें और खुद ही जीत की घोषणा कर दें. यह तो कोई बात नहीं हुई. मतलब तर्क का खात्मा और आस्था की शुरूआत.”

तब तक अगला स्टेशन आ चुका था. कोच में उतरने चढ़ने वालों में हलचल मच चुकी थी. वह बहस वहीं खत्म हो गयी. ट्रेन दुबारा चली तो बातचीत के दूसरे मुद्दे उठ गए.

रविवार, 21 दिसंबर 2025

तमगे की चमक

'लघुकथा'
दिनेशराय द्विवेदी

शहर की सड़कों पर सफ़ाई का शोर अखबारों के जरीए देश ही नहीं समूची दुनिया तक पहुँच चुका था। स्वच्छता सर्वेक्षण में वह देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया था। शहर के हर चौक पर होर्डिंग चमक रहे थे -
“स्वच्छता में अव्वल! हमारा शहर, हमारा गर्व।”

होटल से कैफ़े की ओर पैदल जा रही दो विदेशी महिला क्रिकेटर भी उस चमक को देख मुस्कुरा रही थीं।

“देखो, कितना साफ़ है यहाँ,” पहली ने कहा।

दूसरी ने सिर हिलाया, “हाँ, जैसे किसी किताब का पन्ना।”

तभी अचानक एक बाइक सवार युवक पास से गुज़रा। उसकी हरकत ने उनकी मुस्कान को भय में बदल दिया। पहली खिलाड़ी का चेहरा पीला पड़ गया। उसे लग रहा था जैसे उसकी समूची देह उस स्पर्श और दबाव से गंदगी में सन चुकी थी, ऐसी गंदगी जो शरीर से तो चली जाएगी लेकिन उसके मन से कभी नहीं। वह मन की दीवार पर हमेशा के लिए छप गयी थी। उसने अपने भीतर उठते डर को दबाने की कोशिश की, पर उसकी आँखों में असुरक्षा साफ़ झलक रही थी।

दूसरी ने तुरंत मोबाइल से एसओएस दबाया। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं, मानो यह काँपना सिर्फ़ डर का नहीं, बल्कि अपमान का भी था।

कुछ ही मिनटों में पुलिस की गाड़ी सायरन बजाती पहुँची। युवक गिरफ्तार हुआ।

खिलाड़ियों के मन में जो दरार पड़ चुकी थी, उसे कोई गिरफ्तारी भर नहीं भर सकती थी। कैफ़े के बाहर खड़े लोग सन्न रह गए।

एक बुज़ुर्ग ने धीमे स्वर में कहा, “सड़कें चाहे जितनी चमकदार हों, शहर भले ही देश का सबसे स्वच्छ शहर बन गया हो, लेकिन अगर मन गंदा है तो तमगे का क्या मतलब?”

अगले दिन अख़बारों में सुर्ख़ी थी, “स्वच्छता में अव्वल शहर का कारनामा!”

क्रिकेट बोर्ड के सचिव ने इसे “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया और सुरक्षा बढ़ाने का वादा किया।

लेकिन शहर के नागरिकों के मन में सवाल गूंजता रहा, “क्या असली स्वच्छता केवल कचरे के डिब्बे खाली करने से आती है, या फिर नागरिकता और आचरण की सफ़ाई से?”

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

‘निकाह मंजिल’

लघुकथा 
दिनेशराय द्विवेदी

‘निकाह मंजिल’ पुराने शहर के बीचों बीच खड़ी एक सदियों पुरानी इमारत थी, इसके सब ओर रास्ते गुजरते थे. पुरानी होने के बावजूद उसका रखरखाव ऐसा था कि अनेक आधुनिक इमारतें उसके सामने पुरानी लगतीं. इमारत बाहर से औरत-मर्द के बीच के करार का घर लगती थी, लेकिन उसकी भीतरी दीवारें काजियों के फतवों से सजी थीं.

शबनम संवेदनशील, अपनी जिन्दगी में बराबरी की तलाशती एक आधुनिक और आजाद औरत, एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी. आरिफ एक दूसरी मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर. वे एक मीटिंग में मिले. दोनों को दोनों की कंपनियों के साझा प्रोजेक्ट पर काम करना था. प्रोजेक्ट चार माह में पूरा हो गया. दोनों के बीच लगाव पनपा. शबनम को आरिफ एक प्रगतिशील नजरिये वाला प्रतीत हुआ, उसे लगा कि दोनों के रिश्ते में बराबरी रहेगी.

आखिर दोनों ने अपने परिवारों को भी सहमत किया. दोनों का निकाह तय हो गया. वकील शबनम के पास आरिफ का इजाब लाया और शबनम ने उस पर हाँ कर कर अपनी मुहर लगा दी, गवाहों ने कहा इजाब क़बूल हुआ, मेहर तय हो गया, शादी मुकम्मल हुई. क़ाजी ने निकाहनामा लिख कर उन दोनों के तथा मौजूद गवाहों के दस्तखत करवाए और अपने दस्तखत करने के बाद दोनों को एक-एक कापी दे कर कहा यह तुम दोनों के बीच शादी का करार है. शबनम ने मुस्कुराकर सोचा, "करार में बराबरी होती है." दोनों बहुत खुश थे, दोनों को अपना मनपसंद हमराह मिल गया था.

विवाह के पहले विचारों से प्रगतिशील लगने वाले आरिफ अपनी जिन्दगी में जरा भी नहीं उतार सका था. मर्द औरत की बराबरी की बात जरूर करता, लेकिन रिश्ते में आने के बाद से ही उसके व्यवहार ने शबनम को समझा दिया कि वह उस पर नियंत्रण चाहता है. पर अपनी चाहतों को हमेशा उसकी चाहतों पर तरजीह देता. दोनों के बीच बहस होती और आखिर शबनम को ही झुकना पड़ता. वह झुकना नहीं चाहती थी, पर उसे लगता कि दोनों के बीच का अमन टूट जाएगा, उसका सुकून छिन जाएगा. निकाह की पहली सालगिरह तक शबनम को इस रिश्ते में घुटन महसूस होने लगी.

दिन बीतते गए. निकाह मंजिल की दीवारें अब उसकी हर आवाज को आरिफ के रंग में रंग कर फतवे में बदल जाती. आखिर एक दिन शबनम ने आरिफ को कह दिया, “हमारी जिन्दगी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, घुटन महसूस होती है. हमें अलग हो जाना चाहिए.” आरिफ चुप्पी खींच गया.

एक रात जब शबनम गहरी नींद में थी, आरिफ ने कहा, “शबनम, यहाँ निकाह मंजिल में बड़ा दरवाजा है, इसे तलाक कहते हैं और उससे मैं बाहर जा सकता हूँ, मुझे किसी वजह की जरूरत नहीं. तुम्हें इससे बाहर निकलने की इजाजत नहीं.”

शबनम ने कहा, “अगर मैं बाहर जाना चाहूँ?”

आरिफ ने छोटे दरवाजे की और इशारा करते हुए कहा, “तुम उस खुला दरवाजे से, बाहर जा सकती हो लेकिन उसके लिए भी तुम्हें मेरी मंजूरी की जरूरत है. और अगर मेरी मंजूरी न हो तो तुम्हारे लिए यह दरवाजा फस्ख होगा, तुम्हें खास वजह बतानी होंगी और अदालत में उसे साबित भी करना होगा.”

“मैं तो जानती थी कि निकाह एक करार है जिसमें दोनों पक्ष बराबर होते हैं.” शबनम ने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी. तभी दीवारें बोलने लगीं. “निकाह कोई करार नहीं बल्कि फतवा है. यहाँ बराबरी की चाबी भी खाविंद के पास होती है, बीवी के पास नहीं.”

शबनम दीवार के पास गयी और उस पर लिख दिया, “करार तब तक करार नहीं होता जब तक कि उसमें दोनों पक्ष बराबर न होते हों, मैं लड़ूंगी और इस निकाह मंजिल से बाहर निकलूंगी.”

शबनम ने अगले दिन ही अदालत में खुला (फस्ख) के लिए दरख्वास्त पेश कर दी. उसने अदालत के सामने साबित किया कि उसके पास ‘निकाह मंजिल’ से बाहर जाने की वजहें हैं. अदालत ने उसकी दलीलों को मंजूर करते हुए “निकाह मंजिल” से बाहर जाने की इजाजत के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी. शबनम फिर से आजाद औरत थी।