@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

रविवार, 8 फ़रवरी 2026

अदृश्य विभाजन

पिंजरा और पंख-24
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
बनस्थली आए हुए छह माह से अधिक हो चुके थे. इस बीच शगुन स्त्री-शिक्षा के निमित्त निर्मित इस नयी दुनिया का खूब जायजा ले चुकी थी. इस दुनिया के बाहर के समाज के तमाम लक्षण यहाँ मौजूद थे. लगता था कि विद्यापीठ सुरक्षित ढंग से लड़कियों को शिक्षित वाला एक किला है, जहाँ पुरुष उपस्थिति नगण्य है. यहाँ लड़कियाँ अध्ययन के दौरान प्रेम प्यार के चक्करों से बची रहेंगी और फिर यहाँ से वे पितृसत्ता के लिए एक बेहतरीन उत्पाद के रूप में अपने घरों को वापस लौटेंगी. लेकिन क्या यह किला है? इसके भीतर वे सामाजिक विभाजन मौजूद थे, जिनसे बचाने का दावा विद्यापीठ करता था. शांता निकेतन हॉस्टल का कमरा 106 इन विभाजनों का सूक्ष्म नमूना था. 

सुबह हुई, शगुन ने अपनी आँखें खोलीं और पल भर के लिए सिर्फ देखती रही; एक ही छत के नीचे फैली चार समानांतर वास्तविकताएँ.

प्रियंका जाग चुकी थी. वह अपने बिस्तर के पास बैठी, आँखें बंद किए, मन ही मन मंत्र पढ़ रही थी. ब्राह्मण परिवार की नियमित सुबह की प्रार्थना.

किरण अपने बिस्तर पर वज्रासन की मुद्रा में थी. वह खादी के स्थान पर एक महंगे ट्रैकसूट में थी. और राजपूत परिवार की फिटनेस के प्रति सचेतता अभिव्यक्त कर रही थी.

सीमा चुपचाप अपना बिस्तर समेट रही थी. कोई मंत्र नहीं, कोई योग नहीं. बस काम. उसने अपने तकिए के नीचे से एक फोटो निकाली; उसका समूचा परिवार एक डेयरी फार्म के सामने खड़ा था, जिसमें मुखिया के हाथ में अंबेडकर की तस्वीर थी. एक पल उसे देखा, फिर वापस रख दिया. दलित परिवार की सादगी, प्रदर्शन से दूर. हमेशा अध्ययन के प्रति बहुत सचेत और शायद बाबा साहेब के प्रति आभार.

शगुन उठ बैठी. वह जानती थी कि वह भी इन विभाजनों का हिस्सा थी और उनकी अवलोकक भी. एक वैश्य लड़की, जो देख रही थी कि कैसे वर्ण, जाति, धर्म; सब किले में मौजूद हैं, भले ही सबने खादी पहन ली हो.

नाश्ते के लिए मैस जाते हुए, प्रियंका ने कहा, "कल माघ पूर्णिमा है. मैं प्रार्थना सभा में जाऊँगी."

"क्या वह सबके लिए है?" सीमा ने पूछा, आवाज़ में एक सहज जिज्ञासा.

प्रियंका रुक कर बोली. "हम... यानी जो जाना चाहें." उत्तर सही था, पर अपूर्ण. शगुन ने समझा’ "हम" का अर्थ "ब्राह्मण" था.

मैस में, फातिमा उनकी मेज पर आकर बैठ गई. "सुप्रभात," उसने कहा, मुस्कुराते हुए.

"कल जुम्मे की नमाज़ के लिए जाओगी?" प्रियंका ने पूछा, आवाज़ में एक अजीब सी औपचारिकता.

"हाँ," फातिमा ने कहा, "दोपहर को. पर यहाँ... उचित जगह ढूँढनी पड़ती है."

"उचित जगह?" शगुन ने पूछा.

"जहाँ लोग घूरें नहीं," फातिमा ने साधारण से कहा, पर उसकी आँखों में एक कसक थी.

शगुन ने महसूस किया; प्रार्थना के लिए भी "उचित जगह" चाहिए. और कभी-कभी, वह जगह सिर्फ भौतिक नहीं, सामाजिक भी होती है.

कैंटीन में चाय पीते हुए, बातचीत कक्षा के प्रोजेक्ट पर आ गई.

"हमें चार लोगों का समूह बनाना है," किरण ने कहा.

एक क्षण चुप्पी छा गई. स्वाभाविक रूप से, वे चारों एक समूह बनातीं. प्रियंका, किरण, सीमा, शगुन. पर फातिमा? वह किसके साथ जाती?

"तुम किसके साथ रहोगी?" शगुन ने फातिमा से पूछा.

"मेरी दो और सहेलियाँ हैं," फातिमा ने कहा, "हम तीनों मिलकर करेंगे."

शगुन ने सोचा, ‘क्या यह संयोग था? या फिर धर्म के आधार पर स्वाभाविक समूहन?’ शायद कक्षा में भी कमरा 106 वाली वही अदृश्य रेखाएँ थीं मौजूद थीं?

दोपहर के बाद, कमरे में वापस आकर, शगुन ने देखा कि तीनों अपने-अपने कोने में समा गईं. उसे भी अपने कोने में आना पड़ा.

प्रियंका का कोना: धार्मिक पुस्तकें, पूजा का सामान, एक छोटा तुलसी का पौधा.
किरण का कोना: फैशन मैगजीन, आयातित स्किनकेयर, एक महँगा हेयर ब्रश.
सीमा का कोना: पाठ्य पुस्तकें, एक पुरानी नोटबुक, सादा पेन और कॉपी.
शगुन का कोना: मनोविज्ञान की किताबें, एक नक्शा, और... खालीपन.

वह खालीपन भरना चाहती थी. जो इन कोनों के बीच से गुजरता.

रात को, शगुन ने अपनी नोटबुक निकाली. डायरी नहीं, एक साधारण नोटबुक. वह आयुष को पत्र लिखना चाहती थी. उसे बताना चाहती थी कि कैसे यह "किला" अभेद्य नहीं है. कैसे यहाँ भी वही विभाजन हैं.

पर वह रुक गई. आयुष कोटा में था, टेस्ट, रैंक, आईआईटी की तैयारी में. क्या उसे इन "अदृश्य विभाजनों" की चिंता थी? शायद नहीं, या शायद थी, पर उसके पास समय नहीं था.

उसने पेन रख दिया. आज नहीं. आज वह नोटबुक में कुछ और लिखेगी.

उसने लिखना शुरू किया:

अवलोकन

1. चार लड़कियाँ: प्रियंका (ब्राह्मण), किरण (राजपूत), सीमा (दलित), मैं (वैश्य)

2. चार आस्थाएँ: पूजा, योग, अंबेडकर का आभार और नमाज़ (फातिमा)

3. चार आर्थिक स्तर: उच्च-मध्य, उच्च, मध्य, मध्य

4. हिन्दी के विभिन्न रूप: संस्कृतनिष्ठ, अंग्रेजी मिश्रित, साधारण हिन्दी, अरबी-फारसी प्रेरित उर्दू, और मेरी भाषा मेरी? शायद जिसमें सब.

प्रश्न:
क्या ये विभाजन टूट सकते हैं?
मैं क्या कर सकती हूँ?
क्या पहला कदम, बस... पूछना है?

उसने नोटबुक बंद की. कमरे में अँधेरा था, पर चारों के सोने के तरीके भी अलग थे. प्रियंका की नियमित, शांत साँसें. किरण की गहरी, आरामदायक साँसें. सीमा की हल्की, सतर्क साँसें. और खुद उसकी... विचारमग्न साँसें.

वह जानती थी, कल फिर सारी दुनियाएँ जागेंगी. वही कोने. वही अदृश्य रेखाएँ.

पर शायद... कल वह सवाल पूछेगी. प्रियंका से: "तुम्हारी पूजा में क्या है जो तुम्हें शक्ति देती है?" सीमा से: "तुम्हारे परिवार की डेयरी कैसे चलती है?" किरण से: "तुम्हारे योग का रहस्य क्या है?" फातिमा से: "तुम्हारी नमाज़ में क्या शांति मिलती है?"

सिर्फ सवाल. कोई उत्तर की अपेक्षा नहीं. बस... शुरुआत.

एक सवाल मैं खुद से भी पूछती हूँ. क्या हिन्दी की यह विविधता कभी एकरूप हो पायेगी? शायद हाँ और शायद नहीं. क्या एकरूपता से विविधता समाप्त हो जाएगी, सौन्दर्य खो जाएगा? आज यह सौंदर्य शायद विविधता से ही है.

यह सोचना ही शायद पहला कदम है. दीवारों को पहचानना नहीं, बल्कि उनमें खिड़कियाँ बनाना. और शायद सवाल ही खिड़की है.

एक सवाल जो पूछे: 'तुम कौन हो? और मैं... तुम्हें जानना चाहती हूँ.’

जिससे ये कोने मिल सकें. ये दुनियाएँ बात कर सकें. और यह किला... सचमुच एक घर बन सके.

सुबह होगी. और शगुन सबसे एक-एक सवाल पूछेगी.

... क्रमशः

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

अलग-अलग लड़ाइयाँ

पिंजरा और पंख-23
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
मिड-टर्म परीक्षा क्रिसमस के पहले हो चुकी थी. परिणाम का इन्तजार था. तेज सर्दी रात नौ बजे बाद सड़कें सूनी रहतीं. “मकर संक्रांति के बाद सर्दी कम होने लगेगी” कहते हुए लोग कड़कड़ाती सर्दी के अहसास से मुक्ति की कोशिश करते. आयुष आज पढ़े का रिविजन करने बैठ रहा था. तभी उसके फोन की घंटी बजी. पापा थे.

"बेटा, मिड-टर्म के रिजल्ट आए?" आवाज़ में वही उत्सुकता, वही चिंता.

"नहीं पापा, एक-दो दिन में आएंगे."

"कैसी संभावना है?”

“पेपर सब अच्छे किए थे. नंबर अच्छे ही आएंगे.” स्वर में आत्मविश्वास के बावजूद थोड़ा कंपन था.

“याद है न तुम्हें, दोहरी परीक्षा है, अगले साल बोर्ड निकालना है और आईआईटी एंट्रेंस भी.”

“हाँ पापा.”


“बेटा, सारा दारोमदार तुम्हीं पर है.”

“मैं समझता हूँ, पापा.”

“ठीक है, तुम पढ़ाई का ध्यान रखो.. तुम्हारी मम्मा पड़ोस में गयी है, आएगी तब बात कर लेगी.”

कॉल समाप्त हुई. वही बात. वही दबाव. पर आज का दबाव कुछ अलग था.

उसने "युद्ध-योजना" बनाई थी:

शत्रु: शिक्षा का पाखंड

युद्ध-मैदान: यह कोचिंग

शस्त्र: ज्ञान

सहयोगी: वह उत्कृष्ट कैडेट

उसे लगा इसमें कमी है, पर क्या? वह सोचने लगा. उसे शगुन के मंत्र की याद आई.

उसे शगुन का कथन याद आया, "हम सब पिंजरों में हैं. तुम्हारा अलग, मेरा अलग. पर पिंजरा तो पिंजरा है."

आयुष को लक्ष्य पता है? लेकिन उसका पिंजरा क्या है?

अचानक उसके जेहन में बिजली कौंधी. “यह लक्ष्य ही उसका पिंजरा है.”

यही बात है. उसने अपने आपको लक्ष्य की लक्ष्मण रेखा के अंदर कैद कर लिया है, यही उसका पिंजरा है. वह इस पिंजरे से कैसे निकले?

उसने रफ कॉपी के पन्ने पर लिखा. “लक्ष्य ही उसका पिंजरा है, उसकी सीमा है.”

कुछ देर सोचने के बाद उसने लिखा, “सीमा से आगे जाना होगा......पर कैसे?”

“अब इस पर बाद में सोचूंगा. अभी बस आज का रिविजन.” उसने रिविजन के लिए फिजिक्स नोटबुक उठा ली.



अगले दिन कोचिंग में, मिड-टर्म के पेपर वापस मिले. आयुष के मार्क्स ठीक थे, 88%. उसने सोचा था इस बार 90 पार करेगा. लेकिन, कोई बात नहीं. अब वह 95 से ऊपर की कोशिश करेगा.

विशाल केवल 59% ला पाया.

टिफिन ब्रेक में विशाल बोला, "मैं छोड़ रहा हूँ, आयुष. मैं नहीं कर सकता. यह लड़ाई मेरी नहीं."

"पर..."

"पापा को बोल दिया है. वे नाराज़ हैं, पर... मैं बोर्ड पर फोकस करूंगा. सीनियर में गुड फर्स्ट डिवीजन निकाल लूंगा. फिर ग्रेजुएशन के स्तर पर सोचूंगा क्या करना है. सीनियर पीसीएम से होगा तो वहाँ बहुत विकल्प रहेंगे."

आयुष ने देखा विशाल की आँखों में हार नहीं थी, बल्कि आत्म स्वीकार की शांति थी... और निश्चय भी.

"तुम्हारे लिए अच्छा है," आयुष ने कहा, "अगर तुम खुश हो."

विशाल मुस्कुराया, "खुश तो शायद नहीं हूँ. पर संतुष्ट हूँ. मैं अब इस रेस का हिस्सा नहीं बनूंगा. मैं वह चुनूंगा, जो मैं सबसे बेहतर कर सकूँ."

विशाल सही था.

“कल मूवी चलें? नयी लगी है.” उसने आयुष को प्रस्ताव दिया.

“बिलकुल, तुम्हारा निश्चय सेलिब्रेट करना बनता है, और मेरे 89 भी, पहले से अधिक हैं. कुछ फ्रेशनेस आ जाएगी, 3 से 6 वाला शो देखेंगे.”

“पक्का?”

“बिलकुल पक्का.”



शाम को आयुष का मन किया. उसने शगुन को कॉल लगाई.

“हेलो भाई, तेरे को बात करने की फुरसत हो गयी?” शगुन का स्वर उलाहना जैसा था.

“हाँ शगुन, व्यस्त रहता हूँ तो किसी को फोन की याद नहीं आती.”

“अरे, तेरा मिड-टर्म रिजल्ट आ गया होगा न?”

“आज ही आया है. 89% रह गए.”

“इतने तो बढ़िया हैं, और तू ऐसे कह रहा है जैसे फेल हुआ हो. 12वीं के मिड टर्म तक 95 से ऊपर पकड़ लेगा. .... अच्छा बता, सेलिब्रेट कर रहा है कि नहीं?” शगुन ने हौसला बढ़ाते हुए पूछा.

“क्यों न मनाऊँ, पहले से आगे बढ़ा हूँ. कल विशाल के साथ मूवी देखूंगा. बाद में बढ़िया सा खाएंगे.”

“ये हुई न बात. अब तू सचमुच मेरा भाई लगता है. पापा मम्मा से बात हुई?

“नहीं, पापा देर से घर आते हैं, वे खुद फोन करेंगे.”

“फिर भी आज दस बजे तक न आए तो तू कर लेना.”

“विशाल ने आईआईटी एंट्रेंस की रेस छोड़ दी. 12वीं पीसीएम से करेगा. कहता है वह करूंगा जो मैं सबसे बेहतर कर सकता हूँ.”

“यह तो बढ़िया बात है. यदि रेस नहीं दौड़ सकते तो उससे निकल आओ. खेलों की कमी थोड़े ही है. वह खेलो जो सबसे बढ़िया खेल सकते हो. उसे मेरी ओर से बधाई देना.”

“और, तेरा क्या चल रहा है?” आयुष ने शगुन से पूछा.

“बढ़िया चल रहा है. खूब नया सीख रही हूँ. महीन-महीन चीजें, सिलेबस से भी और उसके बाहर से भी. बस मजा आ रहा है. मेरी फिक्र मत कर. मैं यहाँ सबसे बढ़िया करूंगी.”

“हाँ, वहाँ जा कर चैम्पियन हो गयी है न, कोई रोकने वाला तो है नहीं.” आयुष ने उलाहना दिया.

“अरे नहीं आयुष. यहाँ भी कम चीजें नहीं हैं रोकने वाली. बस कुछ समझ ली हैं, कुछ समझ रही हूँ.”

“मतलब, लड़ाई जारी है?”

“यह दुनिया ही ऐसी ही है. हर जगह कोई न कोई लड़ाई तैयार रहती है.”

“कैसी लड़ाई, तेरा किसी से झगड़ा हुआ क्या?” आयुष ने थोड़ा चिन्ता से कहा.

“नहीं रे, झगड़े की बात नहीं. पर यहाँ आकर जान रही हूँ कि कैसे लोग दूसरों को बिना कारण ही खुद से नीचा समझने लगते हैं. दुःख होता है. पर यह मेरे विषय मनोविज्ञान से संबंधित है. मैं अभी समझ रही हूँ. इस पर फिर फुरसत में बात करेंगे. अभी पापा मम्मा को रिजल्ट बता. क्या पता उन्हें फोन एंगेज मिल रहा हो.”

“हाँ, रखता हूँ. तू ठीक से रहना.”

“हाँ, तू बड़ा हो गया है न, ऐसे बात करेगा? तू ठीक से रहना. अब रखती हूँ.”

आयुष सोचने लगा. शगुन लड़ाई अलग है, उसकी अलग. दोनों लड़ रहे हैं. क्या दुनिया हर जगह लड़ाई माँगती है? और हर किसी को अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होती है?

विशाल ने अपनी लड़ाई चुनी, वह बाहर निकल आया.

शगुन अपनी लड़ाई लड़ रही है उसे समझ रही है.

वह अपनी लड़ाई लड़ रहा है, सीमाओं से आगे जाने की.

तीन अलग राहें, तीन अलग लड़ाइयाँ. सबकी मंज़िल, खुद को पाना.

शायद लड़ाई ही वह चाबी है जो पिंजरे को खोल सकती है.

... क्रमशः

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

परतें

पिंजरा और पंख-22
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
शांता निकेतन होस्टल के कमरा 106 में सुबह की धूप प्रवेश कर चुकी थी. शगुन ने अपना खादी का सादा हल्के भूरे रंग का कुर्ता, सफेद पायजामा पहना, सफेद दुपट्टा गले में डाला. किरण अपना कुर्ता प्रेस कर रही थी. "हमारे यहाँ तो खादी भी अलग होती है," उसने गर्व से कहा, "सुघड़ हाथों से काती हुई, एकदम महीन."

शगुन ने ध्यान से देखा. किरण के कपड़ों की खादी वाकई महीन थी. उसकी खुद के कपड़े बाजार की साधारण खादी के थे. प्रियंका की वर्दी और भी सादी थी, पर साफ-सुथरी. सीमा की वर्दी थोड़ी मोटी, जैसे टिकाऊपन ज्यादा मायने रखता हो.

"कल मंगलवार है," प्रियंका ने कैलेंडर देखते हुए कहा, "साप्ताहिक छुट्टी का दिन. कोई क्लास नहीं और ऊपर से मैस में स्पेशल डिश भी.”.


सीमा मुस्कुराई, "हमारे घर में भी मंगलवार को मीठा बनता है. यहाँ तो मैस में कल पूरी, सब्जी और खीर बनेंगी."

किरण ने उत्साह से कहा, "हाँ! मंगलवार को तो हमेशा विशेष भोजन होता है. सबसे अच्छे भोजन का दिन."

प्रियंका ने सिर हिलाया, "शाकाहारी, शुद्ध भोजन. अच्छा है."

शगुन ने सोचा, “सप्ताह में एक दिन की छुट्टी, पर मैस में विशेष भोजन. बनस्थली की अपनी लय. पर क्या इस ‘विशेष’ में भी सबके लिए एक जैसा ‘विशेष’ है?

भोजनशाला में नाश्ते के समय, सबका खाना एक जैसा था. दलिया और दूध. फातिमा, एक मुस्लिम लड़की जो अक्सर उनके साथ बैठती थी, ने धीरे से कहा, "हमारे यहाँ तो जुम्मे (शुक्रवार) का दिन खास होता है. पर यहाँ का मंगल भी अच्छा है."

"अच्छा है". शगुन ने शब्द पकड़े. पर क्या वास्तव में अच्छा है? क्या जो उसके लिए "विशेष" है, वह फातिमा के लिए भी उतना ही "विशेष" है?

दोपहर की कक्षा में, अंग्रेजी की मैडम ने एक कविता पढ़ी, "भारत की विविधता" पर. फिर चर्चा छिड़ गई.

"हमारे भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती है इसकी विविधता," मैडम ने कहा.

प्रियंका ने हाथ उठाया, "मैडम, पर विविधता में एकता भी तो होनी चाहिए. सबको एक सूत्र में बाँधने वाली कोई बात."

किरण बोली, "जैसे हम सब यहाँ खादी वस्त्रों में हैं."

सीमा चुप रही. शगुन ने देखा, वह कुछ कहना चाहती थी, पर शायद हिम्मत नहीं हुई.

फातिमा ने धीरे से कहा, "विविधता तभी सुंदर है जब सबको बराबर का सम्मान मिले."

प्रियंका ने फातिमा की ओर देखा. कोई प्रतिक्रिया नहीं. शगुन ने सोचा, क्या यह चुप्पी भी एक तरह की प्रतिक्रिया है?

शाम के भोजन का समय हुआ तो सब मैस की ओर चल पड़ीं. सीमा ने जाते समय अपनी अलमारी से एक डिब्बा निकाला और साथ ले लिये.

जब भोजन परस दिया गया तो. सीमा ने कहा, “मैं अचार साथ लायी हूँ, माँ के हाथ का बना. मेरी माँ बहुत टेस्टी अचार बनाती हैं. चखोगी तो उंगलियाँ चाटती रह जाओगी.” उसने चम्मच की मदद से डिब्बे से अचार निकाल कर अपनी प्लेट में रखा और डब्बा किरण की तरफ बढ़ा दिया.

किरण ने उत्साह से अपनी प्लेट में रखा और चख कर एक चटकारा लेकर कहा. "बहुत स्वादिष्ट है!" शगुन ने भी प्रशंसा की.

प्रियंका ने हाथ के इशारे से अचार के लिए इनकार कर दिया. "मैं तो अभी भरपेट खा चुकी हूँ," उसने कहा.

शगुन ने देखा, प्रियंका की आँखों में वही हिचक थी. ब्राह्मण लड़की. एससी परिवार का अचार. पारंपरिक दूरी.

सीमा ने भी देख लिया. उसने डिब्बा बंद कर दिया. "कोई बात नहीं," उसने कहा, पर आवाज़ में एक टूटन थी. और किसी की निगाह नहीं पड़ी, पर शगुन ने देख लिया था कि उसकी आँखों में पानी छलक आया था.

सब अपने कमरे में पहुँची. कुछ देर बाद, प्रियंका ने अपनी अलमारी से एक पैक निकाला, चॉकलेट हैं, भैया ने भिजवायी थीं. "चलो, यह खाते हैं," उसने कहा, और सबको बाँटने लगी.

सीमा ने हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया. "नहीं... मैं तो मीठा कम खाती हूँ," उसने कहा.

अब प्रियंका का चेहरा उदास हो गया. शगुन ने देखा, एक चक्र पूरा हो गया था. अचार और चॉकलेट के बीच. दो दुनियाओं के बीच.

रात को, जब सब सो चुके थे, शगुन ने अपनी निकाल कर टॉर्च जलाई और डायरी लिखने बैठी.

"आज समझा: बनस्थली हमें बाहर से एक जैसा बनाती है.

एक जैसे खादी वस्त्र. एक जैसा भोजन. एक जैसे नियम.

पर अन्दर...

अन्दर हम अलग-अलग हैं.

किरण में राजपूत का गर्व है.

प्रियंका में ब्राह्मण का अहंकार.

सीमा में छुआछूत का दंश.

फातिमा में अल्पसंख्यक की असुविधा है.

और मुझ में...?

एक वैश्य लड़की की उलझन है.

जो देख रही है कि वर्ण, जाति, धर्म...

ये रेखाएँ वस्त्रों के नीचे भी जीवित हैं.

आज प्रियंका की हिचक...

सीमा के आँसू...

फातिमा की कसक...

बताते हैं कि, एकरूपता का दावा...

एक भ्रम है.

हम सब यहाँ हैं, अलग-अलग पृष्ठभूमि से.

हमारी एक जैसी किताबें, एक जैसे वस्त्र.

हमारे मन, वे फिर भी अलग हैं

अचार और चॉकलेट सिर्फ खाने का आदान-प्रदान नहीं

दो दुनियाओं का, दो सामाजिक वास्तविकताओं का मौन टकराव था.

किरण ने सीमा का अचार चखा.

प्रियंका ने नहीं चखा. दोनों सामाजिक रूप से ऊपर हैं

फिर ये अंतर क्यों?

सीमा ने प्रियंका की चॉकलेट क्यों नहीं ली?

अहं ने क्या अहं को जगाया

या केवल अपना सम्मान बचाया?

मैंने दोनों चखे,

पर क्या मैं दोनों की दुनियाओं को समझ पाई?

नहीं.
नियम हैं, और हम एक जैसे खादी वस्त्र पहन रहे हैं.

पर मन? वह तो नहीं बदला.

नियमों ने व्यवहार बदला,

संस्कार नहीं.

आज सीमा के आँसू कहते थे

लड़ाई सिर्फ पितृसत्ता से नहीं

इन अदृश्य दीवारों से भी है.

एक जैसे वस्त्र और भोजन

बन जाते हैं परतें

ढकते हैं भेदों को

हमें पहचानने होंगे ये भेद

और स्वीकारना होगा उन्हें.

मन मिलें और जुड़ें दृढ़ता से

पर कैसे?

शगुन ने डायरी बन्द की

बाहर ढका हुआ था

सब कुछ अंधकार से

सब कुछ था एकरूप

यह एकरूपता क्या कृत्रिम थी?

वह सोच रही थी.

फिर निद्रा ने उसे अपने आगोश में ले लिया

नए दिन में नयी ताजगी के लिए.

... क्रमशः





गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

नयी लड़ाई

पिंजरा और पंख-21
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
आयुष की आँखें खुलीं. सुबह के पाँच बजे थे. बोर्डिंग स्कूल की पीटी की घंटी अभी भी उसकी स्मृति में गूँजती थी. उसका शरीर उसी लय में साँस ले रहा था. उठो, सीधे खड़े हो जाओ. दौड़ने जाना है... नहीं दौड़ना नहीं, रिविजन के लिए बैठना है.

उसकी नजर अलमारी के फोटो फ्रेम पर पड़ी. बारहवीं क्लास का समूह चित्र. यूनिफॉर्म में, सिर ऊँचा—"उत्कृष्ट कैडेट". फिर नजर किताबों पर गई. हरेक पर छपा था: "IIT ASPIRANT - The Ultimate Guide to Excellence."

दो "उत्कृष्टताएँ". एक अतीत, दूसरा वर्तमान.

आयुष को प्रैक्टिकल रिकॉर्ड जमा करने आज स्कूल जाना था. "आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय" में नामांकन के पहले दिन ही स्पष्ट कर दिया गया था कि, “उसे प्रैक्टिकल के सिवा स्कूल नहीं आना है, उसकी उपस्थिति दर्ज कर ली जाएगी.”

स्कूल का प्रवेश द्वार कोचिंग की चकाचौंध से दूर था. बस एक फीका बोर्ड: "शिक्षा ही उन्नति है." पर अन्दर का दृश्य इस सिद्धान्त का मखौल उड़ा रहा था.

प्रिंसिपल के कार्यालय के बाहर भीड़ थी. एक शिक्षक चिल्ला रहा था: "जिसका प्रैक्टिकल नहीं हुआ, लैब में जाओ! दस बैच और हैं!"

लैब में बीस सीटें थीं, पर पचास बच्चे ठूँसे हुए थे. दो माइक्रोस्कोप पूरे विज्ञान विभाग के लिए. एक शिक्षक बिना देखे सिग्नेचर कर रहा था.

एक लड़का आयुष के पास आया; "पहली बार आ रहे हो? यहाँ कुछ नहीं सीखना. सिर्फ सिग्नेचर लो और भागो. असली पढ़ाई कोचिंग में होगी."

"फिर यह स्कूल क्यों है?"

लड़का हँसा: "बोर्ड का नियम है. यह हमारा 'लीगल एड्रेस' है. असली 'एजुकेशनल एड्रेस' तुम्हारा कोचिंग है."

लीगल एड्रेस. एजुकेशनल एड्रेस.

आयुष सोचने लगा: "यहाँ हमें 'विद्यार्थी' कहते हैं, पर यहाँ कोई विद्या नहीं. यहाँ बस बोर्ड परीक्षा में बैठने का लाइसेंस है."

प्रैक्टिकल रिकॉर्ड जमा हुआ. बिना देखे सिग्नेचर. पूरी प्रक्रिया में पाँच मिनट.

जाते-जाते उसने बोर्ड को फिर देखा: "शिक्षा ही उन्नति है." आज यह वाक्य झूठा लगा.

‘संबल कोचिंग’ के गेट पर लौटते ही वातावरण बदल गया. सब कुछ संगठित, उद्देश्यपूर्ण. स्क्रीन पर टिकर; "अगला टेस्ट: 48 घंटे बाद. तैयारी: 65% पूर्ण."

आयुष सोच रहा था: "यहाँ मेरा भविष्य बन रहा है. पर क्या सिर्फ एक और सर्टिफिकेट के लिए?"

फिजिक्स की कक्षा में डॉ. शर्मा ने प्रवेश किया. "आज का टॉपिक: रोटेशनल मोशन. पिछले पाँच वर्षों में 42 सवाल आए. हर सवाल 2.7 मिनट का. तुम्हें 1.5 मिनट में हल करना है."

थोड़ी देर बाद वह रुके. "तुमने अब तक स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की होगी. आज भी स्कूल गए होंगे. एक एस्पायरेंट को शिक्षा नहीं, उससे आगे की चीज ‘स्किल’ चाहिए. तुम्हारे लिए स्कूल सिर्फ बोर्ड परीक्षा में बैठने का लाइसेंस है. वहाँ तुमने 'शिक्षा' देखी होगी." उनकी आँखों में तीखी चमक थी. "यहाँ मैं तुम्हें 'स्किल' दे रहा हूँ; परीक्षा पास करने का स्किल. वहाँ तुम 'छात्र' हो. यहाँ 'योद्धा'. युद्ध में सिर्फ विजय या पराजय."

आयुष ने उनकी आँखों में देखा. कोई छल नहीं. स्पष्टवादिता. यह स्कूल के पाखंड से बेहतर थी.

लंच पर आयुष ने अपनी नोटबुक देखी. कवर पर लिखा था:

लक्ष्य: IIT

हथियार: टेस्ट -शगुन

आज यह मंत्र अधूरा लगा. उसने पेन निकाला. नीचे लिखा:

मैदान: आईआईटी एंट्रेंस

प्रवेश द्वार: स्कूल

प्रशिक्षण: कोचिंग

अभ्यास: हर टेस्ट

विजय: स्वयं पर

शाम को लाइब्रेरी में विशाल मिला. वह पिछले दो टेस्टों में फेल हो चुका था.

"स्कूल गया था? मजा आया?"

"मजा नहीं, सबक मिला. हम दो जिंदगियाँ जी रहे हैं. एक में 'छात्र', दूसरी में 'योद्धा'."

विशाल ने सिर हिलाया. "मैं तो हार मान चुका. पापा ने कहा, इस बार आईआईटी, या घर वापसी."

"और फिर?"

"शायद प्राइवेट कॉलेज... पर पापा को क्या बताऊँगा..."

आयुष ने उसकी आँखों में भय देखा. पिता के कोप का. समाज के तिरस्कार का.

"हम दोनों एक ही लड़ाई लड़ रहे हैं, विशाल. दुश्मन आईआईटी नहीं, यह ‘पूरी व्यवस्था’ है जो हमें दो हिस्सों में बाँट देती है."

रात को डेस्क पर आयुष ने एक नई कॉपी निकाली. पहले पन्ने पर लिखा:

युद्ध-योजना

1. शत्रु: शिक्षा का पाखंड

2. युद्ध-मैदान: यह कोचिंग

3. शस्त्र: ज्ञान (रटना नहीं, समझना)

4. सहयोगी: वह उत्कृष्ट कैडेट

5. लक्ष्य: एक ऐसी शिक्षा जो पाखंड न हो

नीचे लिखा; आज का सबक: स्कूल सर्टिफिकेट देगा. कोचिंग रैंक देगी. शिक्षा? मुझे खुद तलाशनी होगी.

बिस्तर पर लेटा आयुष अचानक उठ बैठा. उसने अपनी डायरी खोली. लिखने लगा:

तारीख: सितम्बर, 5

स्थान: कोटा

आज समझा शिक्षा दो हिस्सों में बंट गई है. एक औपचारिक, दूसरी वास्तविक. मेरी लड़ाई इस विभाजन के पाखंड से है, जो कहता है: "तुम्हें दो अलग व्यक्ति बनना होगा."

नहीं. मैं एक ही रहूँगा. वही उत्कृष्ट कैडेट जो अनुशासन जानता है. वही आईआईटी एस्पायरेंट जो ज्ञान चाहता है.

और अगर इस व्यवस्था में यह संभव नहीं... तो पहले खुद को बदलूँगा. ताकि कल को शायद व्यवस्था बदल सके.

शगुन,
तुम्हारा मंत्र अभी भी काम करता है. पर अब मैंने अपना मंत्र बना लिया है. तुम सोने के पिंजरे से लड़ रही हो. मैं इस शिक्षा के पाखंड से. शायद हमारी लड़ाइयाँ अलग हैं. पर दुश्मन एक ही है, वह व्यवस्था जो हमें "पूर्ण" होने से रोकती है.

कल से नया युद्ध शुरू.

आयुष ने डायरी बंद की. वह सोने के लिए अपने बिस्तर पर जा कर लेट गया. चेहरे पर थकान थी, पर एक नई दृढ़ता भी. वह दृढ़ता जो दुश्मन को पहचान लेने पर आती है.

सर्टिफिकेट नहीं... पाखंड.

रैंक नहीं... विभाजन.

जीत नहीं... समझ.

यही उसकी नई लड़ाई थी.
... क्रमशः