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गुरुवार, 29 जनवरी 2026

कार, लिफाफा और लड्डू

पिंजरा और पंख-16

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

घर के अहाते में खड़ी शगुन की चमकदार साइकिल के साथ अब एक चमकदार कोरल-रेड मारुति 800 और आ चुकी थी. पूरा मोहल्ला उसे देख जा रहा था. पापा चाबियाँ हाथ में हिलाते, खुशी से चाचा को बता रहे थे, "कंपनी की योजना थी... सालाना सिर्फ चार प्रतिशत ब्याज पर लोन. वाहन भत्ता इतना कि किस्त आराम से निकल आएगी. बस पेट्रोल का खर्च अपना."

"शानदार है!" चाचा ने कार के बोनट पर हाथ फेरते हुए कहा, "अब आयुष को कोटा छोड़ने-लाने में आसानी हो जाएगी. और... हाँ, शगुन के लिए अच्छे रिश्ते मिलने में भी आसानी होगी. प्रतिष्ठानुकूल रिश्ता मिल सकेगा." उनकी नज़र में कार सामाजिक प्रतिष्ठा में उछाल पैदा करना वाली और पारिवारिक दायित्वों हेतु नया साधन थी.

चाचा के शब्दों ने शगुन पर एक भारी, अदृश्य छाया सी डाल दी. यह कार उपयोग के लिए नहीं, बल्कि परिवार की प्रतिष्ठा, भाई की सुविधा तथा उसके भविष्य के 'रिश्तों' की तलाश के लिए थी. उसे अपनी यात्रा अभी भी उस पुरानी साइकिल से जुड़ी लग रही थी, जिसके पहिए अब धीमे पड़ गए थे.

दो दिन बाद वह सुबह आई.

डाकिया आया और दरवाज़े की जाली में एक खाकी लिफाफा अटका गया. शगुन के हाथों ने उसे छुआ तो कागज़ की सख्ती ने उसकी नब्ज तेज़ कर दीं. ऊपर हरे अक्षरों में लिखा था; ‘बनस्थली विद्यापीठ’.

उसका दिल जोरों से धड़कने लगा. उसने डरते हुए लिफाफा खोला, कहीं नज़रों का धोखा न हो. पर वह उसके सीनियर सेकेंडरी के अंकों के आधार पर, बी.ए. (ऑनर्स) मनोविज्ञान में सीधे प्रवेश का प्रस्ताव था.

एक पल के लिए सब कुछ थम सा गया. फिर एक गर्म, मीठी लहर, जो उसके पैरों की उँगलियों से दौड़ गयी और उसके चेहरे पर एक चमकदार, अनियंत्रित मुस्कान के रूप में फूट पड़ी. उसने पत्र को छाती से लगा लिया और पलटकर रसोई की ओर दौड़ी, "मम्मा! एडमिशन मिल गया!"

माँ के हाथ गीले थे. उन्होंने उन्हें अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछा, फिर पत्र लेकर उलटा-सीधा देखा. उनकी आँखों में चमक के साथ-साथ एक धुँधलापन भी तैर गया. "अरे वाह, बेटा! बहुत बढ़िया... अब तो तू पक्की ग्रेजुएट बन जाएगी." आवाज़ में गर्व था, पर उसकी गहराई में वही पुरानी चिंता कुलबुला रही थी, “बेटी का दूर जाना”.

तभी चाची रसोई से बाहर आईं. बात सुनकर नहीं, महसूस करके. उनके हाथ में एक छोटी थाली थी, जिस पर दो सुनहरे बेसन के लड्डू रखे थे. उन्होंने कुछ नहीं पूछा. शगुन की चमकती आँखें और माँ के भीगे पलकों के बीच की कहानी उन्होंने एक नज़र में पढ़ ली थी.

"खोल मुहँ," चाची ने आदत के अनुसार कहा, जैसे शगुन अभी भी पाँच साल की बच्ची हो. शगुन ने मुस्कुराकर मुहँ खोल दिया. चाची ने एक लड्डू उसके मुहँ में रख दिया. बेसन की मीठी महक और घी का गाढ़ा स्वाद उसकी जुबान पर फैल गया; “सफलता का पहला, निजी और बिना शोर का स्वाद.”

"शाम को पापा और चाचा को दिखाना," चाची ने कहा, दूसरा लड्डू माँ की ओर बढ़ाते हुए.

शाम को चाचा घर लौटे, पर उन्हें किसी ने कुछ न बताया, फिर दो घंटे बाद पापा ने घर में कदम रखा. लिविंग में शगुन उनके लिए चाय लेकर गयी तो साथ में खाकी लिफाफा भी उन्हें पकड़ा दिया. पापा ने लेटर लेकर ध्यान से पढ़ा. "ये तो बहुत अच्छी खबर है. अब बनस्थली जाने की तैयारी करो."

बड़े भाई के मुहँ से बनस्थली का नाम सुन कर चाचा चौंके. तुरन्त शगुन की और गुस्से से देखा. “तुमने मुझे नहीं बताया, शैतान¡

“आपने पूछा ही नहीं.” यह कह कर शगुन वापस किचन की ओर चली गयी.


रात को भोजन के समय जब सब साथ थे. माँ कहने लगीं. "नए कपड़े भी सिलवाने पड़ेंगे, तीन-चार सलवार-सूट तो बनाने ही होंगे."

"कपड़ों की फिक्र न करो," चाची की आवाज़ ने बातचीत में दखल दिया. वे गर्म चपातियाँ लिए वहाँ थीं. खड़ी थीं. "बनस्थली में तो खादी पहननी पड़ती है. कुर्ता-पायजामा या सलवार-कमीज, सब खादी का. मेरी भांजी बताया था. और किताबें भी वहीं से मिलेंगी. कॉलेज बताएगा कि क्या चाहिए, और कैम्पस में ही प्रकाशक से भी कम दाम में मिल जाएंगी. खादी का कपड़ा और दर्जी भी वहीं मिल जाएंगे. उनका अपना सिस्टम है."

यह नई जानकारी थी. माँ हैरान थीं, "सारे कपड़े नए खादी के? यह तो बहुत... सादगी है."

पापा ने, जिनकी नज़र पहले ही कार के खर्च के बाद के बजट पर थी, राहत की सांस ली. "अच्छी बात है. कार के खर्च के बाद यह तो बहुत छोटी बचत है. सिस्टम से ही सब ले लेंगे, आसान रहेगा."

शगुन सुनती रही. उसकी तैयारियों में "नयापन" का कोई स्थान नहीं था. न नए कपड़े, न नई किताबें. सब कुछ एक पहले से तय, सादे, एक समान व्यवस्था का हिस्सा था. एक पल को उसे अजीब लगा, फिर एहसास हुआ; शायद यही तो बनस्थली का सबक था: बाहरी चमक-दमक से परे, भीतरी विकास पर ध्यान.

उस रात, डायरी के सामने बैठकर, शगुन के मन में एक तीव्र इच्छा उठी, आयुष से मिलने की. बिना उसे बताए, बिना उसकी थकी आँखों में अपनी खुशी की चमक देखे, यह सफलता अधूरी लग रही थी. वह जानती थी कोटा में रविवार को अवकाश होता है.


अगले दिन उसने पापा से कहा, "पापा, मैं बनस्थली जाने से पहले आयुष से मिलना चाहती हूँ. हम रविवार को ही कोटा चले जाएंगे. उससे मिलेंगे, रात कंपनी के गेस्ट हाउस में रुक लेंगे. सोमवार सुबह सीधे वहीं से बनस्थली के लिए रवाना हो जाएंगे."

पापा ने इस प्रस्ताव पर सोचा. यह व्यावहारिक था. एक ही यात्रा में दो काम और भावनात्मक संतुष्टि भी. उन्होंने शगुन को आश्चर्य से देखा, फिर सोचकर खुश भी हुए कि वह प्लानिंग में भी माहिर होती जा रही है. उन्होंने शगुन की ओर प्यार भरी नजरों से मुस्कुराते हुए देखा.

“तुमने ठीक कहा बेटा, ऐसा ही करेंगे.”

शगुन ने खिड़की से बाहर कार की ओर देखा. अब वह सिर्फ चमकदार साधन नहीं लग रही थी. वह एक पुल लग रही थी; उसके वर्तमान और भविष्य के बीच, उसके और उसके भाई के अलग-अलग संघर्षों के बीच. कल का रविवार उस पुल की पहली यात्रा होगी.

 क्रमशः


बुधवार, 28 जनवरी 2026

प्रोसेसिंग प्लांट

पिंजरा और पंख-15

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

नतीजे आए, फैसला हुआ, और अब आयुष के सामने एक तारीख टंगी थी, ‘22 जून’. इस तारीख को, कोटा के सबसे अग्रणी कोचिंग संस्थान "संबल कोचिंग" का आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए पहला बैच आरम्भ होने वाला था.

उस तारीख तक पहुँचने का रास्ता सूचनाओं और अफवाहों के बियाबान से होकर गुजरता था. आयुष उसी में भटक रहा था.

वह अपने दोस्त अभिषेक से मिला, उसका बड़ा भाई पिछले साल कोटा से पढ़कर लौटा था.
“भैया, वहाँ कैसा है?” आयुष ने पूछा.

अभिषेक के भाई ने चश्मे के पीछे से थकी आँखें उठाईं. “जैसा सुना है वैसा ही है. दिन में चौदह घंटे क्लास, रात को दो टेस्ट. शुरुआत में लगता है सब कुछ कर लेंगे… फिर धीरे-धीरे पता चलता है कि तुम नहीं, तुम्हारा दिमाग ही दौड़ रहा है रेस में.”

आयुष की रूह काँप गई. “और… अगर नहीं हुआ?”

भाई की आवाज़ और भी भारी हो गई. “तो फिर वहीं रह जाता है इंसान… पीछे. बस ‘अटेम्प्ट’ रह जाता है.”

राजेश एक अलग ही कहानी सुनाई. उसके चचेरे भाई ने आईआईटी क्रैक किया था. “अरे यार, इतना गंभीर मत हो. शहर बढ़िया है! भैया बता रहे थे. वीकेंड पर मूवी चलती है, चाय की दुकानें हैं. पढ़ाई भी सिस्टम से होती है, बस फॉर्मूला पकड़ो, फटाफट!”

एक ने डर दिखाया, दूसरे ने रास्ता. लेकिन आयुष के दिमाग में सवालों का झुंड भिनभिना रहा था, “कौन सच कह रहा है? अठारह घंटे पढ़ने वाला लड़का, या वीकेंड पर मूवी देखने वाला?

रातों को नींद उचट जाती, वह बोर्डिंग स्कूल के दिन याद करने लगता. हॉस्टल के लॉन में शाम को दोस्तों के साथ गप्पें, क्रिकेट मैदान में गेंदबाजी, बल्लेबाजी, प्रीफेक्ट की नज़र बचाकर चॉकलेट खाना. वह कोटा के ‘होस्टल’ की कल्पना करता. उसे वह “स्टडी सैल” लगता. क्या वह फिर से कुछ अलग तरह की कैद में लौट रहा था? या यह एक “प्रोसेसिंग प्लांट” था, जहाँ से या तो ‘आईआईटीयन’ निकलता था, या फिर… ‘रिजेक्ट’.

‘रिजेक्ट’… शब्द उसके मन के सबसे अंधेरे कोने में बैठा था. अगर वह नहीं कर पाया, तो? पापा की नजरें, क्या कहेंगी? चाचा, जो हर किसी को कहते, “हमारे खानदान का पहला ‘आईआईटीयन’ होगा!” और रिश्तेदार? पड़ोसी? वे सब क्या कहेंगे? “देखो, वर्मा साहब का लड़का कोटा गया था न? वापस आ गया… कुछ नहीं हुआ.” केवल पैसा ही नहीं, घर की पूरी शान बर्बाद हो जाएगी. ये, नहीं तो फिर? बी.एससी.? लोकल डिग्री कॉलेज से? उसके बाद? कुछ साक्षात्कार और एक साधारण सी नौकरी? उस चमकदार कैरियर के सपने का क्या, जो हर कोई उसे दिखा रहा था ... विदेश, बड़ी कार, पैरेंट्स को सम्मान…

एक रात चाय पीते हुए, शगुन ने उसके चेहरे पर उलझन पढ़ ली.

“क्या सोच रहे हो, भाई?” वह धीरे से बोली.

आयुष ने अपने मग में देखते हुए कहा, “कुछ नहीं… बस… पता नहीं यह सब हो पाएगा या नहीं.”
शगुन ने एक पल की चुप्पी के बाद कहा, “मैं भी नहीं जानती भाई… बनस्थली में क्या होगा. हम दोनों किसी नई नाव पर चढ़ने जा रहे हैं. किनारा नजर नहीं आता.”

वह आगे कुछ कहना चाहता, पर माँ किचन से आ गईं. बात अधूरी रह गई. उस अधूरेपन में एक सच्चाई थी. दोनों के सामने संघर्ष था, लेकिन दोनों का अलग. क्या अब वे एक-दूसरे से अपने संघर्ष के बारे में बात भी पाएंगे?


22 जून से तीन दिन पहले, आयुष और मम्मी, पापा दोनों कोटा जाने वाली ट्रेन में सवार थे. चाचा, शगुन और चाची सब प्लेटफॉर्म आए थे. ट्रेन ने गति करना शुरु किया तो चाचा ने साथ चलते हुए उसका हाथ दबाया और छोड़ दिया.


“चम्बल रेजीडेंसी” यह एक निजी होस्टल था. रूम नं. 203. एक वार्ड रोब, एक दर्पण लगी अलमारी और एक बुक शेल्फ. एक तख्त जिसपर बिस्तर लगा था, एक टेबल-चेयर, खिड़कियों पर पर्दे, छत पर पंखा, एक कूलर और एक अटैच बाथरूम. आयुष और माँ को कमरा सही लगा. मम्मी उसके साथ रुकीं, उसकी दिनचर्या सामान्य होने तक, पिता वापस मंडी लौट गए.

अगले दिन वह कोचिंग के दफ्तर गया. वहाँ से उसे कोचिंग का नाम और लोगो छपी दो यूनिफोर्म, एक छाता, आई कार्ड, जरूरी किताबें और स्टेशनरी मिली. अब वह कायदे से संबल कोचिंग का स्टूडेंट था.

तीसरा दिन खाली था. उसने होस्टल, कोचिंग के ऑफिस और जहाँ उसकी क्लास लगनी थी उसके आसपास का पूरा इलाका पैदल घूमा. कहाँ से वह क्या खरीद सकता है, यह सब वह देख आया. जिससे अचानक किसी चीज की जरूरत होने पर किसी से पूछना न पड़े.

चौथे दिन से क्लासेज शुरू हो गयीं. उसकी शेड्यूल निरन्तर थी. सुबह 07:00 से 10:00 बजे तक फिजिक्स, 10:10 से 01:00 बजे दोपहर तक केमिस्ट्री, 01:00 से 02:00 बजे लंच ब्रेक, फिर 02:00 से शाम 05:00 बजे तक गणित की क्लासेज और लैक्चर्स. शाम 05:00 से 06:00 बजे तक अवकाश और फिर 06:00 से 09:00 बजे तक सेल्फ स्टडी, दैनिक अभ्यास और डाउट क्लासेज, 09:00 से 10:00 बजे तक डिनर और विश्राम और रात्रि 10:00 से 12:00 बजे तक दिन में पढ़े गए टॉपिक्स का रिविजन. सुबह सात बजे से रात 12 बजे तक सोचने की फुरसत नहीं. पहले दिन उसे बहुत घबराहट हुई. मन हुआ कि वह वापस अपने बोर्डिंग चला जाए. लेकिन सप्ताह बीतते वह इस दिनचर्या का अभ्यस्त होने लगा. इस अभ्यस्त होने में माँ की बड़ी भूमिका थी.

अगले रविवार को पापा आ गए. कहने लगे माँ को वे मंडी लेकर जाएंगे.

मम्मी के जाने की बात सुनकर आयुष का गला सूख गया. उसने पापा से कहा, "बस एक सप्ताह और माँ को यहाँ रहने दें." पापा-मम्मी मुस्कुरा दिए। उस मुस्कुराहट में आयुष ने एक चुनौती देखी, 'अब तू बड़ा हुआ.' उसने महसूस किया कि अगले सप्ताह से उसकी असली परीक्षा शुरू हो जाएगी, और वह परीक्षा क्लास रूम से पहले, उसके अपने कमरे में ही होगी. आयुष का दिल डूबने लगा. वह अकेला खुद को कैसे संभालेगा. उसने पापा से कहा, बस एक सप्ताह और माँ को यहाँ रहने दें. पापा बोले, “माँ बस एक सप्ताह और रुकेंगी. उसके बाद आयुष को सब कुछ खुद देखना होगा. वे उसे मोबाइल दिला देंगे. वह रोज घर बात कर सकेगा. अपनी हर परेशानी बता सकता है.”

                                                                                                                                                        क्रमशः

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

दो राहें, दो निर्णय

पिंजरा और पंख-14

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी


सब शाम की चाय के लिए बैठे. चाय का आखिरी घूँट गले से नीचे उतार कर चाचा बोले, "अब फैसले का वक्त आ गया है. आयुष और शगुन के नतीजे अच्छे आए हैं. अब इन्हें आगे का रास्ता तय करना है."

माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू सँभाला. चाची चुपचाप बैठी थीं, पर उनकी आँखें शगुन पर टिकी थीं.

"पहली बात, हमारे शहर में इकलौता डिग्री कॉलेज है, शगुन उसमें प्रवेश ले, बी.ए. करे, डिग्री हाथ में आए, तब तक इसकी शादी की उम्र हो जाएगी. बी.ए. के आखिरी साल में हम रिश्ते भी देखने लगें."

शगुन दृढ़ता से बोली, "चाचा, यहाँ कॉलेज में आधे विषयों के भी लेक्चरर नहीं हैं. खास तौर पर मेरे मनोविज्ञान का तो कोई है ही नहीं. पढ़ाई में बहुत मुश्किल होगी. पढ़ाई का स्तर वैसा नहीं है जैसा मुझे चाहिए."

चाचा ने भौंहें सिकोड़ीं. "दूसरा रास्ता, तू खुद दिल्ली की जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के लिए इंटरनेट छान रही है."

शगुन ने सिर हिलाया. "जी, पर ...."

"पर कुछ नहीं!" चाचा का स्वर तीखा हुआ. "दिल्ली दूर है, बड़ा महानगर है और जेएनयू में बच्चे पढ़ाई कम और आंदोलन ज्यादा करते हैं. वहाँ पढ़ने वाले अधिकांश लड़के लड़की कम्युनिस्ट बन जाते हैं. वहाँ बात-बात पर राजनीति होती है. मेरे विचार में यह शगुन के लिए ठीक नहीं."

तभी माँ बोल उठी, "इतनी दूर... इतने बड़े शहर में अकेली लड़की, कैसे रहेगी, हलकान हो जाएगी? मैं तो वहाँ बिलकुल न भेजूंगी मेरी शगुन को."

तभी चाची ने शब्दों को तौलते हुए धीरे से कहा, "एक रास्ता बनस्थली विद्यापीठ भी है. मेरी भांजी वहाँ पढ़ी है. कहती है, वहाँ सिर्फ लड़कियाँ ही पढ़ती हैं, और अधिकांश स्टाफ भी स्त्रियों का है. पूरा कैंपस रेजिडेंशियल है, होस्टल के रूम बड़े-बड़े है और हर रूम में 2 से 4 लड़कियाँ रहती हैं. वहाँ घुड़सवारी और हवाई जहाज उड़ाना और दूसरी बहुत सारी चीजें भी सिखाते हैं."

“सुझाव तो यह भी ठीक है”, चाचा ने चाची की बात का समर्थन किया. “ज्यादा दूर भी नहीं, बस ढाई सौ किलोमीटर है यहाँ से सीधी ट्रेन भी है.”

बनस्थली का उल्लेख चाची शगुन से पहले भी कर चुकी थी. उसने वहाँ का ब्रोशर भी डाउनलोड कर लिया था. पर वह उसकी पहली पसंद नहीं था. पर जेएनयू की आज़ादी और उसके शहर रामगंजमंडी के स्थानीय कॉलेज के बीच यह एक संभव रास्ता था. कम से कम वहाँ की पढ़ाई तो अच्छी है.

“वैसे भी अंतिम निर्णय तो भाई साहब ही करेंगे. उन्होंने भी दोनों के लिए खासी मालूमात की है. सीमेंट फैक्ट्री में होने से उनके ताल्लुकात बहुत हैं. इस बारे में क्यों न हम रात को खाने के समय बात करें. तब भाई साहब भी साथ होंगे.” इतना कह कर चाचा आयुष की ओर मुड़े. "तेरा मामला सीधा है. तू साइंस मैथ्स लेगा. इंजीनियरिंग करेगा, फिर फौज में भी जा सकता है."

आयुष ने सिर झुकाकर हाँ भर दी. उसके स्वर में कोई उत्साह नहीं था, बस एक स्वीकार्यता थी. शगुन ने देखा; उसके भाई के हाथ मेज पर रखे थे, मुट्ठियाँ थोड़ी सिकुड़ी हुईं.

"भाई," शगुन ने धीरे से पूछा, "तुम्हें सच में साइंस पसंद है?"

आयुष ने ऊपर देखा. "पसंद-नापसंद से क्या फर्क पड़ता है? अच्छे लड़कों को साइंस ही लेना चाहिए." पर उसकी आँखों में एक खालीपन था, जैसे उसे अपने ही शब्दों पर यकीन न हो.

माँ शगुन से कहने लगी, "बनस्थली में संतरे तो मिलते होंगे न? यहाँ तो हमारे शहर के आसपास इतने बगीचे हैं कि कहीं से भी ताजा तुड़वा कर ले आओ.... तुझे विटामिन सी कहाँ से मिलेगा?"

शगुन मुस्कुराकर बोली, "मम्मा आप भी न, अभी से न जाने क्या सोचने लगीं. अभी पक्का तो होने दो, फिर सोच लेना.” उसने देखा माँ की आँखें थीं. "तेरा भाई बोर्डिंग लौटेगा... वहाँ कोई मोबाइल नहीं रख सकता. हफ्ते में एक बार ही बात हो पाएगी."

रात को पापा फैक्ट्री से देर से लौटे, उनसे सुबह चाय पर बात हो सकी. वे कहने लगे, "बनस्थली विद्यापीठ में प्रवेश के लिए परीक्षा देनी पड़ेगी, लेकिन मनोविज्ञान में कम बच्चे आवेदन करते हैं. यदि अंतिम तिथि तक आवेदन कम होंगे तो शगुन को सीधे प्रवेश मिल जाएगा.”

फिर वे आयुष से मुखातिब होकर बोले, “तू साइंस ले तो रहा है, पर अभी समय है, अच्छी तरह सोच लेना, चल पाएगा कि नहीं?”

“मैं साइंस कर लूंगा. मेरे इस बार साइंस और गणित दोनों में अच्छे नंबर आए हैं.” आज वह दृढ़ता से बोला लेकिन स्वर में उत्साह कम था.”

“अच्छी तरह सोच ले, अभी वक्त है. तुझे इंजीनियरिंग करना है तो कोटा में भी प्रवेश लेकर वहाँ साथ में कोचिंग भी कर सकता है. हमारे स्टाफ मेम्बरों के बच्चों ने वहाँ से कोचिंग करके इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया है. कुछ को तो आईआईटी और ट्रिपल आई टी में भी प्रवेश मिला है.”

पापा के इस नए सुझाव से आयुष असमंजस में पड़ गया. “सोचता हूँ पापा.”

“हाँ आयुष¡ कोटा का सुझाव भी बढ़िया है. यहाँ से सिर्फ डेढ़ घंटे में बस और ट्रेन एक घंटे में पहुँचा देती है. यह बढ़िया है. और भाई साहब तो कंपनी के काम से महीने में चार पाँच बार कोटा जाते ही हैं.”

शगुन ने बनस्थली का ब्रोशर देखा, उसमें घोड़ों पर सवार लड़कियों की तस्वीर थी, उनके चेहरे पर आत्मविश्वास था.

आयुष दिन में दोस्तों के साथ सलाह करने निकला.


उस रात शगुन ने अपनी डायरी में लिखा;

"आज तय हुआ, मैं बनस्थली जाऊँगी. यह मेरी पहली पसंद नहीं, पर शायद यही वह रास्ता है जो मुझे खुद तक ले जाएगा.

भाई साइंस ले रहा है... पर क्या वह सच में चाहता है?

कभी-कभी लगता है, हम दोनों ही अपने-अपने पिंजरे तोड़ने निकले हैं.

मैं कोटा स्टोन की कठोर खदानों वाले इस शहर से निकलकर बनस्थली के गाँवों के बीच बसे हरे-भरे परिसर में जा रही हूँ... शायद यही सही है, पत्थर की कठोरता से पेड़ों की कोमलता की ओर."

बाहर बरामदे में शगुन की साइकिल खड़ी थी, उसके पहिए अब एक नई, दूर की यात्रा के इंतज़ार में थे.

आयुष अपनी खिड़की से उसे देख रहा था. उसे लगा, जैसे साइकिल के पहिए उससे कह रहे हों: "हम चल पड़े हैं. अब तुम्हारी बारी है, चलने की, या रुकने की?"

क्रमशः


गुरुवार, 22 जनवरी 2026

फैसले की घड़ी

पिंजरा और पंख-13

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

आयुष को आए चार दिन हो चुके थे. घर का माहौल अभी असामान्य था. पापा हमेशा की तरह सुबह नौ बजे बैंक के लिए निकल जाते, फिर रात के आठ-नौ बजे तक घर लौटते. वे परिवार को अधिक समय नहीं दे पाते थे. घर के मामलों में चाचा बिना पूछे भी अपनी राय देते रहते. सुबह चाय पर उन्होंने फिर यही कहा, "अब आयुष आ गया है, सब ठीक हो जाएगा." पर आयुष खुद जान रहा था कि कुछ भी "ठीक" नहीं हुआ था. शगुन अब भी रोज दुपहर खाना खाने के बाद साइकिल उठा पुस्तकालय जाती और शाम को 4-5 बजे लौटती. उसकी आँखों में स्थिरता थी, जो आयुष को बेचैन कर देती.

दोपहर होने को थी. आयुष कहीं गया हुआ था. शगुन लिविंग रूम में बैठी "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप" पढ़ रही थी. तभी दरवाज़े की घंटी बजी, शगुन ने दरवाजा खोला. प्रकाश और विनय सामने खड़े थे. दोनों आयुष के बोर्डिंग जाने के पहले के दोस्त थे. उनका और आयुष का मिलना तभी होता जब वह बोर्डिंग स्कूल से छुट्टियों पर घर लौटता.

"दीदी, आयुष आया है न?"

शगुन ने मुस्कुराकर अंदर आने का इशारा किया. "वह बाहर गया है, अभी आता होगा. तुम बैठो."

वे अंदर आए. विनय की नज़र शगुन के हाथ में पकड़ी किताब पर पड़ी. "यह किताब...?" उसने पूछा.

शगुन ने बेहिचक कहा, "पढ़ रही हूँ. लड़कों के मनोवैज्ञानिक पिंजरे पर है. तुमने पढ़ी है?"

विनय हँसा. "नहीं, हम तो ऐसी किताबें देख कर छोड़ देते हैं. वे बड़ों के पढ़ने लायक हैं. मैं तो इसे आपके हाथ देखकर ही चकित हूँ. आप पढ़ रही हैं, तो बता सकती हैं कि इसमें क्या है?

प्रकाश ने टोका, "अरे यार, लड़कियाँ ऐसी किताबें पढ़ती हैं क्या?"

शगुन ने सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "लड़कियाँ वह सब पढ़ सकती हैं जो लड़के पढ़ते हैं. बल्कि, हर कोई वह पढ़ सकता है जो वह समझना चाहता है. मैं यह जानना चाहती हूँ कि क्यों इंसानों को 'पुरुषत्व' और 'नारित्व' के पिंजरों में बाँध देते हैं."

विनय ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया. प्रकाश चुप रह गया.

तभी आयुष आ गया. दरवाज़े से ही उसने दोस्तों की आवाज़ें सुनीं, और फिर शगुन का स्पष्ट, दृढ़ स्वर. वह तेजी से लिविंग रूम में आया. दोस्तों को देखकर उसका चेहरा खिला, पर शगुन को उनके साथ बैठे, आँख मिलाकर बात करते देखकर उसकी भौंहें तन गईं. उसने हमेशा चाहा था कि शगुन दूसरों के सामने "विनम्र" बनी रहे. पर आज वह दोस्तों के सामने ऊँचाई से बात कर रही थी.

"चलो, बाहर चलते हैं," आयुष ने जल्दी से कहा, जैसे शगुन की मौजूदगी उसे असहज कर रही हो.

वे तीनों शहर के एक छोटे से कैफ़े में बैठे. प्रकाश ने चाय मंगाई. आयुष चुपचाप बैठा था, मन ही मन शगुन के उस सवाल को दोहरा रहा था, "क्यों बाँध देते हैं पिंजरों में?"

"दीदी तो कमाल की है यार," प्रकाश ने कहा. "इतना कॉन्फिडेंस! पहले तो वह बात करते हुए भी शर्माती थी."

आयुष ने चाय का कप थामा. "वो बस... जिद्दी हो गईं है. समय के साथ."

विनय ने सीधे आयुष की आँखों में देखा. "जिद्दी नहीं, आयुष. मुझे तो वे साहसी लगीं. मैंने उन्हें बाज़ार में देखा था. साइकिल पर, अकेली, और बिल्कुल निडर. तेरे चाचा उसे रोकते होंगे, पर वो नहीं रुकतीं. उनके पास एक लक्ष्य है."

"लक्ष्य?" आयुष ने पूछा, आवाज़ में एक खीझ थी.

"हाँ. वो आगे पढ़ना चाहती है. मैंने सुना है वो दिल्ली की यूनिवर्सिटी जे.एन.यू. और बनस्थली विद्यापीठ जैसी जगहों के बारे में पूछताछ कर रही हैं."

आयुष का दिल धक से रह गया. जे.एन.यू. और बनस्थली? दूर? अकेले? उसके मन में तुरंत विरोध के शब्द उभरे, पर वह चुप रहा.

"लोग क्या कहेंगे?" आयुष ने अंततः कहा, अपनी ठंडी चाय को देखते हुए.

"लोग वही कहेंगे जो हमेशा से कहते आए हैं, "विनय ने शांत स्वर में कहा. "पर सवाल यह है कि तू क्या चाहता है? क्या तू चाहता है कि शगुन डरकर जिए, या जिए जैसे वह जीना चाहती है? और तू खुद... तू क्या चाहता है? तेरा स्ट्रीम का फैसला हुआ? तू तो साइंस ही ले रहा है न?"

आयुष ने कोई जवाब नहीं दिया. उसे एहसास हुआ कि उसके अपने दोस्त भी उसकी सोच से आगे निकल रहे हैं. वे शगुन को सम्मान से देख रहे थे, न कि कमजोरी या अवज्ञा से.

शाम को वे लौटे. शगुन बरामदे में साइकिल की चेन साफ़ कर रही थी. उसने दोस्तों को अलविदा कहा, फिर आयुष से पूछा, "सब ठीक रहा?"

आयुष ने हाँ में सिर हिलाया. फिर अचानक पूछ बैठा, "तू... जे.एन.यू. और बनस्थली के बारे में सोच रही है?"

शगुन ने रुई का टुकड़ा हाथ में रोककर कहा, "हाँ. क्या हुआ? जे.एन.यू. देश की सबसे बेहतर यूनिवर्सिटी है. वहाँ विदेश से भी विद्यार्थी पढ़ने आते हैं. और बनस्थली में तो सिर्फ लड़कियाँ होती हैं. घुड़सवारी सिखाते हैं, जहाज उड़ाना सिखाते हैं... और आज़ादी सिखाते हैं."

"पर वे बहुत दूर है."

"दोनों ही इतने दूर नहीं. अधिक से अधिक 7-8 घंटों में दोनों ही जगह पहुँचा जा सकता है. फिर दूर होना बुरा नहीं होता, भाई. कभी-कभी दूर जाने से ही हम खुद के पास लौट पाते हैं."

आयुष कहना चाहता था, "तू नहीं जा सकती. मैं नहीं होने दूंगा." पर वाक्य उसके गले में अटक गया. शगुन की आँखें सीधी थीं, उनमें लेश मात्र भी डर नहीं था, बल्कि वह अटल विश्वास से भरी हुई थी.

"तूने चाचा को बताया?" आयुष ने अंततः पूछा.

"अभी नहीं. पहले मैं खुद तो पूरी तरह तैयार हो लूँ. और तुम्हें भी इस साल अपनी स्ट्रीम तय करनी है तुमने कुछ सोचा कि नहीं?" यह कहकर शगुन अंदर चली गई. वह देखता रह गया.

रात में आयुष ने वह किताब उठाई, "द मैस्कुलिनिटी ट्रैप". उसने पहला अध्याय खोला; "डर: मर्दानगी का सबसे मजबूत ताला".

उसे विजय का वाक्य याद आया, "तेरा डर तेरी कैद है."

और शगुन का वाक्य, "दूर जाने से ही खुद के पास लौट पाते हैं."

बाहर बरामदे में शगुन की साइकिल खड़ी थी. आयुष ने खिड़की से देखा. चाँदनी में उसके पहिए चमक रहे थे, जैसे कह रहे हों: "हम घूमते रहेंगे. तुम चाहो या न चाहो. तुम रुक सकते हो, पर हम नहीं."

उसने किताब बंद की. आज पहली बार उसे लगा कि शगुन को "नियंत्रण" में करना उसके बस में नहीं, उसे समझना ज्यादा ज़रूरी है.

पर वह कहाँ से शुरू करे? इस सवाल का उत्तर अभी उसके पास नहीं था.

दोनों भाई बहनों का रिजल्ट आने वाला था. इस साल उसे स्ट्रीम चुनना था. साइंस, आर्ट्स, कॉमर्स और शगुन को कॉलेज?

दोनों के लिए यह फैसले की घड़ी थी. शगुन बाहरी दुनिया की ओर जा रही थी, और वह अपने भीतर के किले में वापस लौटना चाहता था.

क्रमशः