@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

शनिवार, 10 जनवरी 2026

चिनगारी

पिंजरा और पंख-4

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

आयुष के बोर्डिंग स्कूल चले जाने के बाद शगुन को कई नए काम मिल गए. पहले आयुष बाहर के छोटे-मोटे काम कर देता था. अब उनमें से अधिकांश उसे करने पड़ते थे. उसका स्कूल के अलावा मोहल्ले की सीमा से बाहर जाना सिमट गया. पहले वह जाती तो आयुष को साथ ले जाती थी. अब उसे अकेले जाने की इजाज़त नहीं थी. शगुन 'घर की बड़ी बेटी' होने का अर्थ समझ रही थी, उसका अपना समय सिकुड़ गया था. उसकी दुनिया अब अधिक से अधिक घर की चारदीवारी में सिमट रही थी. जिज्ञासावश खरीदी गई उसकी विज्ञान की किताबें वह यदा-कदा ही पढ़ पाती थी.

शगुन ने सैकण्डरी स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी. गणित और विज्ञान के अंकों ने उसे यहाँ तक पहुँचाया था. अब उसे अध्ययन के लिए अपनी स्ट्रीम चुननी थी. वह जीव विज्ञान लेना चाहती थी. सोचती, यदि डॉक्टर बन सकी तो परिवार और लोगों के काम आ सकती हूँ. खुद का और परिवार का नाम भी रोशन होगा.

चाचा स्कूल से उसका प्रवेश फॉर्म ले आए. रात के खाने के समय पिता और चाचा बैठे थे. वह रसोई में रोटियाँ बेल रही थी, माँ परोस रही थी. अचानक माँ ने कहा, “रोटियाँ मुझे बेलने दे, खाना तू परोस दे. पापा तेरे एडमिशन के बारे में बात करना चाहते हैं.”

उसने बेलन माँ को थमाया, आटा सने हाथ धोए और गर्म रोटियाँ लेकर डाइनिंग में पहुँची.

"आर्ट्स ही ठीक रहेगा," पिता ने शगुन को बिना देखे ही कहा, "लड़कियों के लिए आसान है. इतिहास-समाजशास्त्र शादी के बाद बच्चों को पढ़ाने में भी काम आएंगे."

सुनकर शगुन की साँसें थम सी गईं. “पर पापा, मेरे सबसे ज़्यादा नंबर तो साइंस और गणित में आए हैं," उसने पिता और चाचा की थाली में रोटियाँ परोसते हुए कहा, "मैं बायोलॉजी पढ़ना चाहती हूँ.”

“अब तक की जो साइंस-गणित तुमने पढ़ी, वह प्रारंभिक थी, जो सब को सीखनी चाहिए," चाचा ने बिना रुके कह दिया, "आगे जब ये मुख्य विषय होंगे तो बहुत मुश्किल होंगे. आयुष भी यहाँ नहीं है. घर के इतने काम करते हुए तुम बायोलॉजी नहीं कर सकोगी. एक बार फेल हुई तो बहुत इज्ज़त खराब होगी.”

“पर गणित में मैं कभी 90-95 प्रतिशत से कम नहीं लाई. वह मेरी पसंदीदा है," शगुन ने हिम्मत जुटाकर कहा.

“क्या?” पिता की आवाज़ कड़ी हो गई, “तुम बायोलॉजी लेकर क्या करोगी? मेडिकल के लिए प्री-मेडिकल देना पड़ेगा, कोचिंग करनी पड़ेगी, बहुत मेहनत. और कॉम्पिटीशन निकाल भी लिया तो मेडिकल की पढ़ाई बहुत महंगी है. एक-सवा करोड़ खर्च होता है. हम जैसे मध्यवर्गीय के बस की बात नहीं.”

“और डॉक्टर बन भी गई तो शादी में कितना दहेज देना होगा, पता है?” चाचा ने आगे जोड़ा, “आजकल तो डेढ़-दो करोड़ मांग चल रही है. मेडिकल की तो हम सोच भी नहीं सकते.”

शगुन का गला रुंध गया. उसकी सारी हसरतों पर पानी फिर चुका था. तभी उसके मन में एक तर्क कौंधा ‘आजकल आर्ट्स में ऑप्शनल गणित या मनोविज्ञान भी ले सकते हैं. मनोविज्ञान से तर्कशक्ति बढ़ती है... वह विज्ञान का ही एक हिस्सा है.’

“तो... क्या मैं आर्ट्स में मनोविज्ञान ले सकती हूँ?” उसकी आवाज़ धीमी, पर स्पष्ट थी, “वह भी तो... विज्ञान जैसा ही है.”

पिता और चाचा ने एक दूसरे की ओर देखा. एक क्षण की चुप्पी के बाद पिता बोले, “ठीक है... मनोविज्ञान ले सकती हो.”

चाचा की भृकुटियाँ तन गईं, पर वे चुप रहे.

शगुन डाइनिंग रूम छोड़कर सीधे अपने कमरे में गई और बिस्तर पर गिरकर तकिए में मुँह दबा रोने लगी. उसका मुख्य सपना तो टूट गया था, पर एक खिड़की... एक छोटी सी खिड़की खुली रह गई थी. “मनोविज्ञान”.

खाना खाने वह नीचे नहीं लौटी. सब काम निपटाने के बाद माँ उसके कमरे में आई. जैसे-तैसे समझाया और नीचे लाकर खाना खिलाया.

अगली सुबह शगुन नीचे नहीं उतरी. माँ उसे बुला कर लाई. पिता ने समझाना शुरू किया, “हम मध्यवर्गीय लोग हैं, बेटा. अपनी गुदड़ी देखकर चलना पड़ता है...” आखिरकार, शगुन आर्ट्स लेने को राजी हो गई, बशर्ते मनोविज्ञान उसका विषय हो.

दिन में चाचा के साथ वह स्कूल गई और आर्ट्स स्ट्रीम में मनोविज्ञान चुनते हुए आवेदन जमा करा दिया.

क्रिसमस की छुट्टियों में आयुष घर लौटा. वह लंबा हो गया था, बात करने का अंदाज़ भी बदल गया था. वह बोर्डिंग स्कूल के किस्से सुनाता — कंप्यूटर लैब, हॉस्टल की शरारतें. पूरा परिवार मंत्रमुग्ध सुनता रहता.

"देखो, कितना कुछ सीख रहा है!" माँ गर्व से कहतीं.

एक शाम चाचा ने वह तुलना फिर दोहराई, "आयुष को दुनिया देखने-सीखने को मिल रही है. शगुन, तुम्हें भी अब अपनी दुनिया, घर-परिवार को बेहतर सीखना है."

शगुन ने आयुष की ओर देखा. पर आयुष बेखबर अपनी प्लेट में खाना परोस रहा था. रात को दोनों जब अपने कमरे में सोने गए, तो शगुन ने पूछा, "बोर्डिंग स्कूल... कैसा लगा तुम्हें?"

आयुष ने कंधे उचकाए, "ठीक है. पर खाना बहुत बेकार है."

उसकी शिकायतें सतही थीं. शगुन की आँखों के गहरे सवालों को, उस चुप्पी के भार को, वह नहीं पढ़ पाया. उनके बीच नई दीवार अब देखी जा सकती थी.

छुट्टियाँ खत्म हुईं. आयुष वापस जाने के लिए तैयार हुआ. इस बार शगुन स्टेशन नहीं गई. वह अपनी खिड़की से उसे जाते देखती रही.

जब वह नज़रों से ओझल हुआ, तो उसकी नज़र अपनी अलमारी पर पड़ी जिसमें उसकी शौकिया तौर पर खरीदी विज्ञान पुस्तकें थी. फिर अपने स्कूल बैग पर, जिसमें मनोविज्ञान की नई किताब थी. वह अपने आप से ही कहने लगी, “पाठ्यक्रम में नहीं तो क्या हुआ? स्कूल लाइब्रेरी से लाकर विज्ञान की किताबें पढ़ सकती हूँ. इसी से मेरा ज्ञान बढ़ेगा.

उसने तय किया, वह ऐसा करती रहेगी. यही छोटी सी आदत, यही अध्ययन की ललक... उसकी चिंगारी को बचाए रखेगी.   ...   क्रमशः 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

बोर्डिंग या जेल

पिंजरा और पंख-3

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

जब आयुष प्राथमिक विद्यालय की अंतिम कक्षा में था तभी अनिल चाचा उसे नवोदय विद्यालय में प्रवेश की तैयारी करा रहे थे. प्रवेश के लिए आवेदन किया और उसे वहाँ प्रवेश मिल गया. यह एक बोर्डिंग स्कूल था. उसके वहाँ जाने के पहले मम्मा ने उसके लिए बेसन के लड्डू और मठरियाँ बनाईं उन्हें नए एयरटाइट डब्बे मंगवा कर उनमें पैक किया. उसके सूटकेस में हर चीज सावधानी से रखी गई. कपड़े, किताबें और भी बहुत कुछ. पापा ने सभी दस्तावेज अच्छी तरह जाँच कर रखे. मम्मा-पापा दोनों उसे बोर्डिंग स्कूल तक छोड़ कर गए शगुन और अनिल चाचा उन्हें स्टेशन छोड़ने आए. ट्रेन में चढ़ने के बाद वह अपनी सीट पर खिड़की के पास जा बैठा. ट्रेन चलने तक खिड़की से बाहर झाँकता रहा. शगुन चुप थी लेकिन एकटक उसे देखे जा रही थी, जैसे सोच रही हो कि आयुष नहीं उसका बचपन जा रहा है. अनिल चाचा ने ट्रेन में चढ़ने के पहले आयुष के कंधे पर हाथ रख कर कहा था, "बेटा, बोर्डिंग स्कूल से तुम्हें मर्द बन कर निकलना है."

जब ट्रेन ने रवाना होने की सीटी दी तो शगुन ने धीमे से उसे कहा, “आयुष वहाँ से मुझे पत्र लिखना.

"हाँ, जरूर लिखूंगा", आयुष ने कहा. तभी ट्रेन चल दी. वह शगुन और चाचा की ओर तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक कि वे उसकी नजरों से ओझल न हो गए.


आयुष को बोर्डिंग स्कूल छोड़ कर माता-पिता वापस घर पहुँचे. शगुन ने दरवाजा खोला और माँ के हाथ से बैग ले लिया. सामान रखने के बाद माँ ने शगुन की ओर देखा, और हाथ पकड़ कर अपने पास बिठाया और बोली, "अब आयुष दूर है, उसकी याद आएगी. अब तुम्हें भी समझदार बनना होगा. घर के काम-काज में तुम्हारी ज्यादा हिस्सेदारी रहेगी. पर मैं धीरे-धीरे सब सिखा दूँगी."

अनिल चाचा ने सहमति में सिर हिलाया, "बिल्कुल सही. लड़कियों को घर की जिम्मेदारियाँ सीखनी ही चाहिए. आयुष को तो बाहर की दुनिया का अनुभव करना है."

शगुन चुपचाप सुनती रही. उसने महसूस किया कि अब उसकी अपनी भूमिका भी बदल रही थी. वह "घर की बड़ी बेटी" हो गयी थी. एक ऐसा अलंकरण जिसमें आज़ादी नहीं, जिम्मेदारियों का बोझ था.

बोर्डिंग स्कूल पूरी तरह ‘मर्दों की दुनिया था. वहाँ कहीं लड़कियाँ, स्त्रियाँ नहीं थीं, न शिक्षक, न रसोइया, न और कोई. उनके न होने पर यहाँ गर्व किया जाता था, मानो स्त्रियाँ तपस्या भंग कर डालने वाली व्यवधान हों. कुछ दिन बाद ही आयुष ने महसूस किया कि स्त्रियों का यह अभाव बहुत भारी था.

रात दस बजे हॉस्टल का वार्डन लाइट बंद करके चला जाता था. उसके बाद आवाज़ें ज़ोर पकड़ने लगतीं थी. छात्रों के बीच "दुनिया" पर चर्चा होने लगती. ऐसी दुनिया जिससे आयुष यहाँ आने तक पूरी तरह अनजान था.

"अरे यार, तुझे मेरे दोस्त अमित की बहन का फोटो दिखाता हूँ?" राजन ने चारपाई पर पलटते हुए कहा, “क्या क्लासिक ब्यूटी है."

"ब्यूटी क्या होती है, असली देखी है कभी?" विजय ने कहा" फिल्मों हीरोइनें ही तो ब्यूटी हैं."

आयुष चुपचाप लेटा सब सुन रहा था. उसके लिए "लड़की" शब्द अब तीन हिस्सों में बंट गया था.

एक, स्कूल की ऊँची दीवारों से दूर वाली एक अमूर्त अवधारणा. जिसकी भाषा उसे नहीं आती थी.

दो, होस्टल की अंधेरी कोरिडोरों और शौचालयों की दीवारों पर लिखे गंदे किस्से और फोन नंबर. जिनकी लड़की एक रहस्य थी, एक पाप, एक गुप्त कोड.

तीन, उसकी बहन शगुन, जिसकी पीठ पर बैठ वह घोड़ा-घोड़ा खेलता था. पर अब उसकी घर की यादें पुराने एलबम की तस्वीर जैसी फीकी पड़ रही थी. उनके बीच का अंतिम सार्थक बात कब हुई थी? शायद उस दिन जब उसने शगुन की गुड़िया लौटाई थी. उसके बाद केवल गर्मियों की छुट्टियों की औपचारिक बातें ही रह गई थीं. अब वह सोलह की है. वह कैसी होगी? उसे कुछ भी पता नहीं था.

"सुनो आयुष," राजन ने रोबदार अंदाज में कहा, "तूने कभी किसी लड़की से बात की है? असली वाली से?"

सवाल सुनकर आयुष का दिमाग़ खाली हो गया. "बात?" उसने कहा, "मेरी... बहन से मैंने खूब बातें की हैं."

कमरे में एकाएक ठहाका फूट पड़ा. "अरे यार, बहन नहीं! बहन तो परिवार वाली होती है. असली लड़की. जैसे किसी दोस्त की बहन. या... कोई और."

आयुष के पास कोई जवाब नहीं था. उसके पास "असली" का कोई अनुभव नहीं था. उसकी पूरी जानकारी सुनी सुनाई थी. फिल्मी गानों, दोस्तों की डींगों और दीवारों पर लिखे शब्दों से मिली हुई. एक दिन विजय ने अपने फोन पर एक फोटो दिखाई, "देखो, मेरे बड़े भाई की गर्लफ्रेंड."

लड़कों का झुंड उस छोटी सी स्क्रीन के इर्द-गिर्द जमा हो गया. आयुष भी झाँका. तस्वीर में एक लड़की बिलकुल फेशनेबल कपड़ों में पेड़ के सहारे खड़ी थी.

"वाह! क्या फिगर है!"

"ऐसी गर्लफ्रेंड मिले तो जिंदगी बन जाए!"

आयुष ने ध्यान से देखा. लड़की के चेहरे पर एक भाव था, शायद खुशी का. पर झुंड की टिप्पणियों ने उस भाव को नष्ट कर दिया. वह तस्वीर अब एक "फिगर" बन गई थी. एक मापदंड. किशोर बच्चों की गोसिप्स का विषय.

रात को, जब बातें शांत हो गईं, आयुष ने अपनी आँखें बंद कीं. उसे शगुन याद आई. उसे याद आया कि कैसे उसने चाचा के जाने के बाद उसकी गुड़िया उसे लौटा दी थी, और कैसे अगले दिन उससे दूरी बना ली थी. अगर शगुन की तस्वीर किसी लड़के के फोन में होती तो? क्या वह भी ऐसी ही टिप्पणियों का विषय बनती?

एक अजीब सी ग्लानि ने उसे घेर लिया. उसने सोचा, "हम लड़कियों के बारे में कुछ नहीं जानते. बस, बातें बनाते हैं. और ऐसे ही एक काल्पनिक दुनिया गढ़ लेते हैं."

उसकी यह सोच अकेलेपन में दब गई. अगली सुबह दर्पण के सामने यूनिफॉर्म में खड़े आयुष ने अपने कंधे सीधे किए। शीशे में वह खुद को नहीं, अपनी नई भूमिका को देख रहा था. एक ऐसी भूमिका जिसमें अभिनेता की खुद की आवाज़ दब रही थी। उसकी दुनिया में लड़कियाँ केवल तस्वीरें, किस्सों और दीवारों पर लिखे नंबर थीं। वह सोच रहा था की जेलें भी स्कूल और होस्टल जैसी ही होती होंगी. आयुष को फिलहाल उसी हवा में सांस लेनी थी.    ... क्रमशः 

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

बीज

पिंजरा और पंख-2

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

शगुन चार बरस की होने को थी. दीवाली के पहले पापा कपड़े खरीद कर लाए. उसके लिए एक खूबसूरत गुलाबी चमकदार फ्रॉक थी जिस पर मखमली कपड़े के बने फूल लगे थे. उसे पसंद आई थी. लेकिन उसने उसे छूकर छोड़ दिया. गर्मियों में जब मामा के घर थी तब मामा भी उसके लिए फ्रॉक ही लाए थे और मुन्नू भैया के लिये टी शर्ट और पैंट. मुन्नू भैया उन कपड़ों में बहुत सुन्दर लग रहे थे. तब उसने लौट कर पापा से कहा भी था कि उसे भी टी शर्ट पैंट ही चाहिए. पापा फिर फ्रॉक ले आए. वह रूठ गयी कि उसे तो शर्ट पैंट ही चाहिए. पापा ने उसे मनाते हुए कहा था. पैंट शर्ट लड़कों की ड्रेस है उसमें वह अच्छी नहीं लगेगी. लड़कियाँ तो फ्रॉक में ही सुन्दर सजीली लगती हैं. उसे नहीं मनाया जा सका तो उन्होंने कोशिश छोड़ दी और मम्मा से कहा कि इसे समझाओ, ऐसी जिदें ठीक नहीं. शगुन को पहली बार समझ आया कि : कुछ चीजें लड़कियों के लिए नहीं हैं.

सात साल की होते होते, उसके पास दो दुनियाएँ थीं एक घर के दरवाजे के अन्दर और एक बाहर. बाहर की दुनिया में उसका दखल सीमित था. जबकि एक तरफ छोटा भाई आयुष था, जो शाम को मैदान में खेल रहे लड़कों के पास जा बैठता और उन्हें देखता. जब भी उसे मौका मिलता वह फुटबॉल को किक मारता. दूसरी तरफ वह थी, दादी रंगोली के डिब्बे लाकर उससे बोलती-"चलो, तुम्हें रंगोली बनाना सिखाऊँ. खूबसूरत बनाओगी तो सब की प्रशंसा मिलेगी. लड़कों का क्या, उनके लिए सड़कों-मैदानों की धूल और कीचड़ ही भले हैं. अभी आयुष धूल-मिट्टी में सन कर आएगा और मम्मा की डाँट खाएगा उसे ठंडे पानी से हाथ पैर धोने पड़ेंगे तब नानी याद आ जाएगी."

शगुन ने रंगों के डब्बे थाम लिए और रंगोली बनाना सीखा. बाहर से आयुष की खिलखिलाहट आती. उसने सीखा: खूबसूरती गढ़ना उसका काम था और उसकी जगह घर के भीतर थी.

आठ बरस की उम्र में उसने 'हक' का पहला पाठ पढ़ा. दिवाली पर माँ ने बेसन के लड्डू बनाए. पहला लड्डू आयुष की थाली में रखा गया.

"लड़का है, पहले उसका हक बनता है," चाचा ने कहा, जैसे कोई पुराना नियम सुना रहे हों.
दूसरा लड्डू शगुन को मिला. मिठाई तो एक जैसी थी, पर वह पल उसे अलग कर रहा था. उसने सीखा: उसका हक... दूसरे नंबर पर आता है.

वह नौ की हुई. उसे गुस्सा आया तो उसने ऊँची आवाज में कह दिया, "मैं नहीं करुँगी!"

माँ ने फौरन उसे तीखी आवाज में उसे डाँटा, "शगुन! इतनी तेज़ आवाज़? तुम्हें शर्म नहीं आती इतना जोर से बोलते हुए? लड़कियाँ ऐसे नहीं बोलतीं. उन्हें आहिस्ता बोलना चाहिए. उसकी आवाज़ पर लगाम कस दी गई.

उसी हफ्ते आयुष किसी बात पर चिल्लाया, तो पापा ने मम्मा से कहा, "देखो, कितना जोश है बेटे में!"

शगुन ने सीखा: उसकी आवाज़ का स्वर कोमल और धीमा होना चाहिए. उसका गुस्सा 'अशोभनीय' था, जबकि भाई का गुस्सा 'जोश'.

ग्यारह बरस की उम्र में उसने आयुष की साइकिल ली और चलाना सीखने लगी. उस का संतुलन बिगड़ा और वह गिर पड़ी, घुटने में खरोंच आ गई. उसका पायजामा घुटने पर से रगड़ खाने से फट गया और पता नहीं कैसे उसी समय कुर्ता भी कंधे के यहाँ से उधड़ गया, उसका कंधा दिखने लगा.

पिता खबर मिलते ही दौड़े आए, चेहरे पर चिंता थी. पर चिंता के साथ आया एक वाक्य जो चोट से ज्यादा गहरा था: "देखो, इसीलिए कहता था, लड़कियों को ये सब नहीं करना चाहिए. खतरा होता है."
फौरन डिस्पेंसरी ले जाया जाता उसके पहले मम्मा ने यह कहते हुए कि उसका कंधा दिख रहा है, उसके कपड़े बदलवा दिए. उसके घुटने पर पट्टी कराई गयी, एटीएस इंजेक्शन लगा और खाने को दवाएँ दी गयीं. साइकिल चलाने की अनुमति जो कभी उसे नहीं मिली थी, उससे छिन गई.

उसने सीखा: 'सुरक्षा' के नाम पर लड़कियों की दुनिया सिकुड़ी हुई होती है. उसकी हिम्मत, उसकी जोखिम उठाने की क्षमता का कोई अर्थ नहीं. उस पर सभी लड़कियों की तरह एक लेबल चिपकी थी : 'नाजुक' और उसके शरीर के हिस्से नहीं दिखने चाहिए.

बारहवाँ साल चल रहा था. एक दोपहर वह माँ के साथ किचन में बैठी थी, आलू छील रही थी. एक सहज प्रश्न उसके मन में उठा. वह पूछ बैठी, मम्मा कभी साइकिल चलाई है, तुमने?

काम करती हुई माँ के हाथ रुक गए. एक पल को वह चुप रह गयी, फिर बिना शगुन की ओर देखे, धीरे से बोलीं, "नहीं बेटा... हमारे ज़माने में तो लड़कों को भी साइकिल नहीं मिलती थी. हमारे तो वह सपने में भी नहीं थी."

फिर माँ ने तुरंत टॉपिक बदल दिया, "ये लो, आलू छील लो, तो प्याज़ भी काट देना."

उस पल शगुन को एक झटका-सा लगा. यह सिर्फ उसके लिए नहीं था. ये नियम... ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आते थे, वे एक विरासत थे. परिवार और समाज जिन्हें चुपचाप नयी पीढ़ी को सौंप देता था. इस विरासत में डर, सीमाएँ और 'नहीं' शब्द भरे हुए थे. उसकी माँ भी इसी कंडीशनिंग का उत्पाद थीं, और अब अचेतन में, उसी विरासत को आगे बढ़ा रही थी.

शाम को अपने कमरे में, शगुन छोटे से आईने के सामने खड़ी हुई. उसमें वह बच्ची नहीं दिख रही थी जिसे रंगोली बनाना अच्छा लगता था. एक नई चेतना की किरण उसकी आँखों में थी. उसे एहसास हो रहा था कि उसका जीवन एक पूर्व-लिखित पटकथा का हिस्सा था, जिसके संवाद उसे बचपन से ही प्यार, डाँट, चिंता और परंपरा के माध्यम से याद करा दिए गए थे.

लड़कियाँ ऐसे नहीं करतीं.

तुम्हारे लिए यह ठीक नहीं.

शर्म नहीं आती?

वह आईने में अपनी परछाईं से आँख मिलाती रही. उसके भीतर एक सवाल ने जन्म लिया, धीमा पर स्पष्ट: "क्या मैं इस पटकथा को ही याद करती रहूँगी... या खुद इसे दोबारा लिख सकती हूँ?"


आईने में उसकी छवि मुसकुराई नहीं. बस, एक गहरी, शांत जिज्ञासा से देखती रही. अंकुरण के लिए छटपटा रहा एक बीज न जाने कहाँ से आ गया था. अब वह अंकुराएगा या उसे दबा दिया जाएगा? यह भविष्य के गर्भ में छिपा था.     
                                                                                                                                       ...   क्रमशः       


मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बेटा

पिंजरा और पंख-1

लघुकथा श्रंखला : दिनेशराय द्विवेदी

आठ साल का आयुष अपनी बहन शगुन की पीठ पर सवार होकर घोड़ा-घोड़ा खेल रहा था. शगुन दस साल की थी, पर आयुष के मुकाबले हड्डियों में हल्की-सी थी. फिर भी वह अपने भाई को पीठ पर लादकर पूरे कमरे का चक्कर लगा रही थी, और दोनों के खिलखिलाहट से कमरा गूंज रहा था.

"घोड़ा रुक! अब मैं राजा बनूंगा!" आयुष ने कहा और शगुन की पीठ से कूदकर बिस्तर पर चढ़ गया. उसने चादर को कंधों पर लपेटा और माथे पर कागज़ का ताज रख लिया. शगुन ने अपनी चुनी हुई गुड़िया को गोद में उठा ली. वह रानी बनी.

तभी दरवाज़ा खुला और उनके चाचा अनिल अंदर आए. उनकी नज़र सबसे पहले आयुष पर पड़ी, जो चादर ओढ़े खड़ा था, फिर शगुन पर जो गुड़िया को सुला रही थी.
 
चाचा का चेहरा कड़क हो गया. "आयुष! लड़के चादर नहीं ओढ़ते. लड़के घोड़ा-घोड़ा नहीं खेलते. तुम्हें पढ़ना चाहिए, क्रिकेट खेलना चाहिए."

आयुष स्तब्ध रह गया. "और तुम, शगुन, भाई को पीठ पर लादती हो? लड़कियाँ इतना शोर नहीं करतीं. जाओ, माँ के पास रसोई में मदद करो."

शगुन ने गुड़िया वहीं छोड़ी और बिना एक शब्द कहे कमरे से बाहर चली गई. आयुष ने देखा कि उसकी आँखें नम थीं.

"चाचा, हम तो बस खेल रहे थे," आयुष ने कहा, उसकी आवाज़ में एक कंपन था.

"खेल भी सीखना पड़ता है, बेटा," चाचा ने कहा, "तुम लड़के हो. तुम्हें मज़बूत बनना है. लड़के रोते नहीं, लड़के डरते नहीं. अपनी भावनाओं पर काबू रखो. यही मर्दानगी है."

चाचा के जाने के बाद, आयुष अकेला कमरे में खड़ा रहा. उसने चादर उतारकर बिस्तर पर फेंक दी. फिर उसने शगुन की छोड़ी हुई गुड़िया उठाई.

वह गुड़िया लेकर रसोई में गया. शगुन बर्तन साफ़ कर रही थी, उसकी आँखें अब भी लाल थीं.

"यह लो," आयुष ने गुड़िया बढ़ाते हुए कहा.

शगुन ने गुड़िया ले ली, पर उसने आयुष की आँखों में नहीं देखा.

"चाचा ने कहा लड़के रोते नहीं," आयुष ने कहा, "पर तुम रो सकती हो, है न?"

शगुन ने सिर हिलाया, "लड़कियाँ रो सकती हैं. पर खेल नहीं सकतीं."

अगली सुबह, शगुन ने फिर से अपना खिलौना लेकर आयुष के कमरे में दस्तक दी. "चलो, आज मैं राजा बनूँगी!" वह बोली.

आयुष ने उसे देखा. फिर अचानक उसकी नज़र दरवाज़े पर गई—जहाँ कल चाचा खड़े थे. एक क्षण के लिए, उसके मन में चाचा की आवाज़ गूँज उठी. उसने शगुन की ओर हाथ बढ़ाया, फिर रुक गया.

"नहीं... मुझे पढ़ना है," आयुष ने कहा, और किताबें लेकर बैठ गया.

शगुन कुछ पल वहीं खड़ी रही, फिर धीरे से चली गई. आयुष किताब की ओर देखता रहा, पर अक्षर धुंधले पड़ गए थे.

चार साल बाद, आयुष बारह साल का हो गया.

स्कूल की क्रिकेट टीम के चयन में उसका नाम नहीं आया. वह पूरा दिन मैदान में बैठा रहा, टीम की प्रैक्टिस देखता रहा. घर लौटते हुए, उसकी आँखों में पानी भर आया. गले में एक गाँठ सी बन गई, जो साँस लेने में रुकावट डाल रही थी.

वह बाथरूम में गया और शीशे के सामने खड़ा हो गया. आँखें लाल थीं, गाल गीले हो रहे थे. तभी उसके कानों में अपने चाचा की आवाज गूंजी, साफ़ और कठोर: "लड़के रोते नहीं. अपनी भावनाओं पर काबू रखो. यही मर्दानगी है."

उसने अपने सब ओर देखा, चाचा कहीं नहीं थे. पर कानों में उनकी आवाज गूंज रही थी.

आयुष ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं. नाखून हथेलियों में चुभने लगे. उसने अपना सिर ऊपर उठाया, आँखें फैलाकर ताका जिससे आँसू बहने न पाएँ और एक गहरी, कँपकँपी भरी साँस ली.

फिर उसने नल खोला और ठंडे पानी से अपना चेहरा धोया. पानी और आँसू एक हो गए. जब वह बाहर आया, तो उसके चेहरे पर कोई नमी नहीं थी. केवल एक खालीपन था, जैसे किसी ने उसके भीतर का एक कोना साफ़ कर दिया हो.

उस रात खाने की मेज़ पर शगुन ने पूछा, "टीम में चुन लिए?"

आयुष ने सिर हिलाया, "नहीं. कोई बात नहीं."

उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे कोई समाचार पढ़ रहा हो. शगुन ने उसे देखा, उसकी पीठ एकदम सीधी थी और होंठ जैसे हिले ही न हों. वह कुछ कहना चाहती थी, पर चुप रही. उसे पता था, आयुष अब वह बच्चा नहीं रहा जो गुड़िया वाली बात करता था.

आयुष ने अपनी प्लेट साफ़ की. उस दिन वह रोया नहीं था, और उस दिन के बाद भी वह कभी नहीं रोया.

लड़के रोते नहीं.

और उसने सीख लिया था.
और शगुन समझ गयी थी कि अब वह और आयुष अपने माता पिता के बच्चे होते हुए भी बेटी और बेटे हो गए हैं.               ...   क्रमशः