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Saturday 27 June 2009

बेरोजगारी से लड़ने का उद्यम कौन करेगा?

पिछले आलेख में मैं ने चार-चार बच्चों वाली औरतों और लाल बत्ती पर कपड़ा मारने का नाटक कर के भीख मांगने वाले बच्चों का उल्लेख किया था।  अनेक बार इन से व्यवहार करने पर लगा कि यदि इन्हें प्रेरित किया जाए और इन्हें अवसर मिले तो ये लोग काम पर लग सकते है। यह भी नहीं है कि समाज में इन के लिए काम उपलब्ध न हो।  लेकिन यह तभी हो सकता है जब कोई इस काम उपलब्ध कराने की परियोजना पर काम करे।

वकालत में आने के पहले जब मुझ पर पत्रकारिता के उच्च स्तर में प्रवेश का भूत सवार हुआ तो मुम्बई जाना हुआ था। वहाँ मैं जिन मित्र के घर रुका वे प्रतिदिन कोई 9 बजे अंधेरी के घर से अपने एयरकंडीशन मार्केट ताड़देव स्थित अपने कार्यालय निकलते थे और कोई दो किलोमीटर की दूरी पर एक पार्किंग स्थान पर रुकते थे। वहाँ एक पान की थड़ी से अपने लिए दिन भर के लिए पान लिया करते थे। जब तक उन का पान बनता तब तक एक लड़का आ कर उन की कार को पहले गीले और फिर सूखे कपड़े से पोंछ देता था। उस के लिए 1978 में एक या दो रुपया प्रतिदिन उस लड़के को मिल जाता था।  इसी तरह अभी फरवरी में जब मुझे फरीदाबाद में पाँच-छह दिन रुकना पड़ा था तो वहाँ सुबह सुबह कोई आता था और घरों के बाहर खड़े वाहनों को इसी तरीके से नित्य साफ कर जाता था।  प्रत्येक वाहन स्वामी से उसे दो सौ रुपये प्राप्त होते थे।  यदि यह व्यक्ति नित्य बीस वाहन भी साफ करता हो तो उसे चार हजार रुपए प्रतिमाह मिल जाते हैं जो राजस्थान में लागू न्यूनतम वेतन से तकरीबन दुगना है।

बाएँ जो चित्र है वह बाबूलाल की पान की दुकान का है जो मेरे अदालत के रास्ते में पड़ती है।  बाबूलाल इसे सुबह पौने नौ बजे आरंभ करते हैं। दिन में एक बजे इसे अपने छोटे भाई को संभला कर चले जाते हैं। शाम को सात बजे आ कर फिर से दुकान संभाल लेते हैं।  दुकान इतनी आमदनी दे देती है कि दो परिवारों का सामान्य खर्च निकाल लेती है। लेकिन बाबूलाल के दो बेटियाँ हैं, जिन की उन्हें शादी करनी है एक बेटा है जो अजमेर में इंजिनियरिंग पढ़ रहा है।  उस ने अपनी सारी बचत इन्हें पढ़ाने में लगा दी है।  नतीजा भी है कि बेटियाँ नौकरी कर रही हैं।  लेकिन शादी बाबूलाल की जिम्मेदारी है और उस के लिए उस के पास धन नहीं है। उसे कर्जा ही लेना पड़ेगा।  मैं ने बाबूलाल से अनेक बार कहा कि उस की दुकान पर कार वाले ग्राहक कम से कम दिन में बीस-तीस तो आते ही होंगे। यदि उन्हें वह अपना वाहन साफ कराने के लिए तैयार कर ले और एक लड़का इस काम के लिए रख ले तो पाँच छह हजार की कमाई हो सकती है।  लड़का आराम से 25-26 सौ रुपए में रखा जा सकता है जो बाबूलाल के उद्यम का छोटा-मोटा काम भी कर सकता है।  लेकिन बाबूलाल को यह काम करने के लिए मैं छह माह में तैयार नहीं कर सका हूँ।


मुझे ज्ञानदत्त जी का उद्यम और श्रम आलेख स्मरण होता है जिस में उन्हों ने कहा था कि उद्यमी की आवश्यकता है।  उन का कथन सही था।  श्रम तो इस देश में बिखरा पड़ा है उसे नियोजित करने की आवश्यकता है।  इस से रोजगार भी बढ़ेगा और मजदूरी मिलने से बाजार का भी विस्तार होगा।  लेकिन इस काम को कौन करे।  जो भी व्यक्ति उद्यम करना चाहता है वह अधिक लाभ उठाना चाहता है और इस तरह के मामूली कामों की ओर उस का ध्यान नहीं है।  सरकारों पर  देश  में रोजगार बढ़ाने का दायित्व है वह पूरी तरह से नौकरशाही पर निर्भर है जो कोई भी परियोजना आरंभ होते ही पहले उस में अपने लिए काला धन बनाने की जुगत तलाश करने लगते हैं।  यह काम सामाजिक संस्थाएँ कर सकती हैं।  लेकिन शायद इन कामों से नाम  श्रेय नहीं मिलता। संस्था के पदाधिकारियों को यह और सुनने को मिलता है कि इस धंधे में उस ने अपना कितना रुपया बनाया। इसी कारण वे भी इस ओर प्रेरित नहीं होते।  न जाने क्यों समाजवाद लाने को उद्यत संस्थाएँ और राजनैतिक दल भी इसे नहीं अपनाते।  जब कि इस तरह वे अपनी संस्थाओं और राजनैतिक दलों के लिए अच्छे पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी कर सकते हैं।

16 comments:

बालसुब्रमण्यम 27 June, 2009 10:05 PM  

बहुत सही चिंतन है। जब हम दोनों पति-पत्नी नौकरी करते थे, हमें घर का चौका बर्तन करने, खाना पकाने, बच्चों की देखभाल करने आदि के लिए सहायकों की खूब आवश्यकता रहती थी, पर इन सबके लिए कोई स्थायी व्यवस्था हम नहीं करा पाए। सहायक एक दो साल काम करते फिर किसी न किसी कारण से छोड़ देते, या हम ही उन्हें निकाल देते। मेरे अन्य पड़ोसियों और सहकर्मियों की भी यही समस्या थी। बड़े शहरों के लाखों, करोड़ों मध्यम-वर्गीय परिवारों की भी यही समस्या है। यदि कोई उद्यमी घर का काम करनेवाले लोगों की कंपनी बनाए, जैसे विदेशी कंपनियों के काम के लिए यहां कोल सेंटर बने हुए हैं और बीपीओ केंद्र बने हुए हैं, तो लाखों सामान्य शिक्षा प्राप्त भारतीयों को अच्छी नौकरी मिल सकती है, और मध्यम वर्गीय परिवारों को भी राहत मिल सकती है। इतना ही नहीं, घरेलू कामों के लिए गरीब परिवारों के बच्चों का जो शोषण होता है, वह भी रुक जाएगा। घरेलू नौकरों का शोषण भी रुक जाएगा, क्योंकि इनके पीछे एक बड़ी कंपनी होगी।

पर हमारे आईआईएम आदि के पढ़े हुओं को माईक्रोसोफ्ट, आईबीमी आदि हांक ले जाते हैं, और हमारे ही देश की समस्याओं का समाधान करने के बारे में ये संस्थाएं या इनके छात्र उपलब्ध नहीं रहते।

डॉ. मनोज मिश्र 27 June, 2009 10:30 PM  

बहुत सही सुझाव है .

राज भाटिय़ा 28 June, 2009 12:24 AM  

अजी हमारी आधी लिखी टिपण्णी कहा गई ?
दिनेश जी काम तो कोई भी छोटा नही, बस हमारी सोच छोटी होती है, आप ने बहुत सुंदर लिखा.
धन्यवाद

Udan Tashtari 28 June, 2009 4:01 AM  

बहुत बेहतरीन चिन्तक और उसका निष्कर्ष. विचारणीय!!

अजित वडनेरकर 28 June, 2009 4:01 AM  

बेहतरीन पोस्ट।

Arvind Mishra 28 June, 2009 6:31 AM  

सहमत हूँ पर यह संभव क्यों नहीं हो पाता !

विवेक सिंह 28 June, 2009 6:45 AM  

अच्छा लगा यह विमर्श ,

करने वाले के लिए काम की कमी नहीं !

cartoonist anurag 28 June, 2009 11:50 AM  

sahi kaha koi kaam chota nahi hota... aaj subah ki hi baat hai... main apne teler se kapde lene gaya tha.... usne kaha ki vo raat ko 9 baje ke baad khali rahta hai....usne raat ke liye press main mujhse kam manga...mujhe aashcharya hua subah 9 baje se raat 9 baje tak kaam karne ke bavjood vo raat main kam kaise karega... usne jo majboori batai vo main yaha likh nahi sakta lekin uski sahyata jaroor karoonga...

प्रवीण पाण्डेय 28 June, 2009 12:14 PM  

कार्य बहुत हैं सरकारी क्षेत्र में, कृषि में, उद्योग में और जहाँ भी हम सोच सकते हैं । जितने अवसर हैं उससे कम बेरोज़गार हैं । मैं तो हमेशा ही देखता हूँ कि रेलवे में काम करने के लिये ऐजेन्सी नहीं मिलती है और स्वीकृत कार्य वर्षों से लम्बित पड़े हैं । तो कमी कहाँ है ?
यदि नौकरशाहों ने सरकारी खजाने के चारों ओर भ्रष्टाचार का तिलिस्म खड़ा कर रखा है और धन पाने के लिये धन खर्च करना पड़ता है, तो शायद यह भी उतना ही सत्य है कि लोगों में मेहनत कर पैसा कमाने की प्रवृत्ति नहीं है । एक सरकारी नौकरी पाने के लिये बतौर घूस लोग लाखों रुपये लिये खड़े रहते हैं क्योंकि उनका विश्वास है कि यह पैसा उन्हे उसी प्रकार वापस मिल ही जायेगा । लेकिन उतना ही पैसा लगा कर एक छोटा उद्यम स्थापित करने में उनकी जातीय गरिमा आड़े आती है । एक छोटा उद्यम स्थापित करने में किसी एक को नौकरी मिलेगी, इससे अच्छा विकल्प क्या हो सकता है !

ताऊ रामपुरिया 28 June, 2009 1:43 PM  

बहुत लाजवाब.

रामराम.

somadri 28 June, 2009 4:42 PM  

कितने तूफानों से लड़ेगे..?
कोई तो है जो राह दिखा रहा है..


पर


सुझाव अच्छे है, कोई तो पहल करेगा

अनिल कान्त : 28 June, 2009 7:20 PM  

अच्छे सुझाव ....लाजवाब

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey 28 June, 2009 7:57 PM  

नौकरी को लालायित बहुत हैं, पर एम्प्लॉयेबिलिटी सब की नहीं है। श्रमिक को अपनी एम्प्लॉयेबिलिटी में वृद्धि करनी चाहिये।
करने वाले के लिए काम की कमी नहीं !

अभिषेक ओझा 28 June, 2009 10:04 PM  

मुझे तो लगता है कि समाज में कुछ लोगों के कारोबार की विफलता ने धीरे-धीरे यह धारणा बना दी कि सरकारी नौकरी के अलावा कुछ और उपाय नहीं. हर पीढी बच्चों को पढाई और फिर स्टेबल नौकरी की तरफ ठेलती गयी. और फिर धीरे धीरे ऐसे लोग होते जा रहे हैं जिनमें बिजनेस आइडियास की भी कमी होती है और बिजनेस से भय भी. और कुछ क्षेत्रों में तो काम की कमी भी दिखती है !

समय 28 June, 2009 11:20 PM  

जब तक समाज के सभी अंगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु श्रमशक्ति का समुचित नियोजन समाज का साझा उद्देश्य नहीं बनता तब तक यही नियति है।

अधिकतर श्रमशक्ति यूं ही फुटकर रूप से अपनी उपादेयता ढूंढ़ती रहेगी और बदले में न्यूनतम भी नहीं पाने को अभिशप्त रहेगी। दूसरी ओर मुनाफ़ों के उत्पादनों में उद्यमी उनकी एम्प्लॉयेबिलिटी को तौलकर वार्गनिंग के तहत विशेष उपयोगी श्रमशक्ति का व्यक्तिगत हितार्थ सदुपयोग करते रहेंगे।

बहुसंख्या के लिए जरूरी उत्पादन, और मूलभूत सेवाक्षेत्र राम भरोसे और विशिष्टों हेतु विलासिता के उद्यम मुनाफ़ाहेतु पूर्णनियोजित।

अधिकतर पूंजी इन्हीं में, फिर बढता उत्पादन, फिर उपभोक्ताओं की दुनिया भर में तलाश, फिर बाज़ार के लिए उपनिवेशीकरण, फिर युद्ध, फिर भी अतिउत्पादन, फिर मंदी, फिर पूंजी और श्रमशक्ति की छीजत, बेकारी...उफ़।

और टेलर बारह घंटे के बाद भी और श्रम करके ही अपनी आवश्यकताएं पूरी कर पाएगा। लाखों सामान्य शिक्षा प्राप्त श्रमशक्ति के नियोजन की, मध्यम-वर्गीय परिवारों के घरेलू कार्यों के लिए कितनी संभावनाएं हैं। सभी नियमित कार्यों के लिए भी अब तो निम्नतम मजदूरी पर दैनिकभोगी सप्लाई हो ही रही है, जिनमें आई टी आई, डिप्लोमा भी हैं इंजीनियर भी। नौकरी के लिए ज्यादा लोग एम्प्लॉयेबिलिटी रखेंगे, लालायित रहेंगे तभी ना सस्ता मिल पाएंगे। अभी साला विकसित देशों से काफ़ी कम देने के बाबजूद लाखों के पैकेज देने पडते हैं, ढेर लगा दो एम्प्लॉयेबिलिटी का, फिर देखों हजारों के लिए भी कैसे नाक रगडते हैं। उफ़।

मार्केट चलेगा, लॉटरियां होंगी, एक संयोग में करोडपति बनाने के नुस्खें होंगे। बिना कुछ किए-दिए, सब-कुछ पाने के सपने होंगे। पैसा कमाना मूल ध्येय होगा और इसलिए कि श्रम नहीं करना पडे, आराम से ज़िंदगी निकले योगा करते हुए। उंची शिक्षा का ध्येय ताकि खूब पैसा मिले और शारीरिक श्रम के छोटे कार्यों में नहीं खपना पडे। और दूसरों में हम मेहनत कर पैसा कमाने की प्रवृत्ति ढूंढेंगे, अब बेचारी कहां मिलेगी। उफ़।

उफ़!उफ़!उफ़!
और क्या कहा जा सकता है।

एक बहुत ही उम्दा पोस्ट, जिसकी वज़ह से ये सब भी कई दिमागों के चिंतन का विषय बन पाएगा।

बधाई।

प्रकाश गोविन्द 29 June, 2009 11:04 PM  

अत्यंत चिंतनपूर्ण लेख !
सार्थक पोस्ट !

आपके सुझाव बहुत महत्वपूर्ण हैं !


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