चैत्रादि नव-वर्ष विक्रम संवत् 2066 शक संवत् 1931 के नवीन सूर्य को नमन
सभी पाठकों को नव-वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएँ!
-दिनेशराय द्विवेदी-
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चित्र- जैसलमेर (राजस्थान) का एक सूर्योदय
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हे, पाठक!
हे, पाठक!
हाड़ौती से दो लोक सभा सदस्य चुने जाने हैं। एक झालावाड़ से और दूसरा कोटा से। झालावाड़ क्षेत्र में बारां जिला भी शामिल है। वहाँ से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सुपुत्र भाजपा के उम्मीदवार हैं। इस क्षेत्र के लिए वे अब भी पराए हैं। उन्हें इसी लिए चुना गया था कि वे भाजपा की दिग्गज नेता और मुख्यमंत्री के पुत्र हैं और शायद क्षेत्र की तरक्की के कुछ काम आएँ। उन की तरक्की को जनता ने ऐसा परखा कि उन के क्षेत्र के आठ विधानसभा क्षेत्रों में से छह में कुछ माह पहले ही कांग्रेस के उम्मीदवारों को चुन कर भेजा। यदि मतदान का पैटर्न वही रहा तो भाजपा वहाँ हारी हुई है। उन के मुकाबले एक महिला उर्मिला जैन को काँग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया है। ये अन्ता के विधायक प्रमोद भाया की धर्मपत्नी हैं और उन के सामाजिक कामों में उन के साथ कंधे से कंधा लगा कर चलती हैं। पहली बार राजनीति में उतर रही हैं। भाया जहाँ एक धनाड्य व्यापारी परिवार से आते हैं, उन्हों ने अपनी संपत्तियों में अपने बूते कई गुना इजाफा किया है और लगातार पिछले पन्द्रह वर्षों से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। यही कारण है कि पिछली बार काँग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर उन्हों ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और अपना दम दिखाते हुए विधायक बने, बाद में उन्हें काँग्रेस ने स्वीकार कर लिया। इस बार काँग्रेस से चुनाव लड़ा और जीता। अपने प्रभाव के कारण बाराँ जिले की चारों विधानसभा सीटें काँग्रेस को दिलवाईं। इस क्षेत्र पर काँग्रेस अध्यक्षा कुछ कृपालु दीख पड़ती हैं। तभी तो बाराँ जिले के आदिवासी क्षेत्र में जब तब खुद सोनिया और राहुल आते-जाते हैं और कभी कभी अचानक भी। यदि यह सीट भाजपा से छीन ली जाती है तो भाजपा को तो हानि होगी ही। वसुंधरा का अहं भी कई गुना पराजित हो चुका होगा।
कोटा क्षेत्र में बूंदी जिला भी आता है। यहाँ से भाजपा ने अपना नया उम्मीदवार श्याम शर्मा को घोषित किया है। इन शर्मा जी की खसूसियत यह है कि ये उम्मीदवारी मिलने तक भाजपा के सदस्य नहीं थे और राज्य सरकार के निर्माण विभाग में अफसरी कर रहे थे। अपने विभाग में उन की कोई उपलब्धि हो न हो पर उन्हों ने अपनी इंजिनियरिंग का कमाल बाहर बहुत दिखाया। किसी तरह भारत विकास परिषद में स्थान बना कर भाजपा की प्रान्तीय सरकार के अनुग्रह से एक बस्ती के बीच (जिस का एक निवासी मैं भी हूँ) भूमि आवंटित करवा कर उस पर एक औषधालय खोला। बिना किसी अनुमति के उस औषधालय को एक पाँच मंजिला अस्पताल में परिवर्तित कर दिया। जब वहाँ औषधालय बन रहा था तो बस्ती के लोग आशंकित थे कि उन की आवासीय शांति अब भंग होने वाली है। इस लिए इस औषधालय को बनने से रोका जाए। एक भले काम को रोकने के अभियान को रोकने में मेरी भी भूमिका रही। लेकिन कुछ समय बाद ही जब वह एक बड़े अस्पताल में तब्दील होने लगा और उस का कचरा और प्रदूषण बस्ती को प्रभावित करने लगा तो उन से बस्ती के लोगों को लड़ना पड़ा। वह लड़ाई अभी भी जारी है। जिस का केवल एक ही असर है कि बस्ती के पार्क की भूमि अस्पताल को नजर होने से बच गई। अस्पताल में चैरिटी और सरकारी अनुदानों का पैसा और मुफ्त सरकारी भूमि लगी है लेकिन अस्पताल पूरी तरह से एक निजि व्यावसायिक अस्पताल की तरह चल रहा है।
रहा सवाल अपना, तो अपने राम इतना परिदृश्य देखने के बाद भी उदासीन ही हैं। राम जानते हैं, कोई जीते फर्क कुछ नहीं पड़ने का। इसी लिए भक्त तुलसीदास जी कह गए 'कोऊ नृप होऊ हमें का हानी'। अभी तक तो ऐसा ही चल रहा है। वे आएँगे तो भी जोड़ तोड़ से और ये आएँगे तो भी जोड़ तोड़ से। कल कोई कह रहा था कि दोनों की रस्सियाँ दिनों दिन टूट टूट के छोटी हुई जा रही हैं बस इधर उधर से टुकड़े जोड़ जोड़ के काम चला रहे हैं। आगे गली में रस्सियों के बहुत से छोटे छोटे टुकड़े आपस में मिल कर फुसफुसा रहे थे। इन पुरानी रस्सियों के साथ जुड़ जुड़ कर मजा नहीं आ रहा, ऐसा न करें कि सारे छोटे टुकड़े मिल कर उन से लंबे हो जाएँ। बीच में एक बंदा बोल रहा था कि एक बड़ी रस्सी तो होनी चाहिए। इन बातों से भी हमारी उदासी नहीं टूट रही है। हम तो रस्सी नहीं रेशा हैं। यह भी पता नहीं कि उस उधड़ती-टूटती रस्सी से निकले हैं या फिर सीधे कपास-जूट के खेत से आ रहे हैं। हाँ, इतना जरूर जानते हैं कि रस्सी बनती रेशे से है और बहुत सारे रेशे मिल कर एक साथ घूमने लगें तो नई रस्सी बन जाती है।
सारी सर्दी हलके गर्म पानी का इस्तेमाल किया स्नान के लिए। होली पर रंगे पुते दोपहर बाद 3 बजे बाथरूम में घुसे तो सोचा पानी गर्म लें या नल का। बेटी बोली नल का ठीक है। हम ने स्नान कर लिया। कोई परेशानी न हुई। लेकिन दूसरे दिन ही नहाने के लिए पानी गरम लेने लगे। बस दो दिनों से नल के पानी से नहाने लगे हैं। परसों तक रात को वही दस साल पुरानी एक किलो रुई की रजाई औढ़ते रहे जिस की रुई कंबल की तरह चिपक चुकी है। कोई गर्मी नहीं लगी। परसों तक उसे ही ओढ़ते रहे। लेकिन कल अचानक गर्मी हो गई। रात को अचानक पार्क के पेड़ों के पत्ते खड़खड़ाने लगे तो पता चला कि आंधी चल रही है। कोई 15 मिनट तक पत्तों की आवाजें आती रहीं। चादर ओढ़ा पर वह भी नहीं सुहाया तो बिना ओढ़े ही सोते रहे, सुबह जा कर वह किसी तरह काम आया।
मौसम बदल रहा है। दिन में अदालत में थे कि तीन बजे करीब बादल निकलने लगे। साढ़े चार अदालत से चले कि रास्ते में बून्दें टपकाने लगे पर रास्ते में ही बूंदें बन्द हो गईं। शाम को साढ़े छह- सात के करीब हम ब्लाग पर पोस्ट पढ़ रहे थे कि अचानक बिजली चली गई। कम्प्यूटर, रोशनी, पंखा सब बंद बाहर से टप टपा टप की आवाजें आने लगीं फिर पानी की रफ्तार तेज हो गई कोई बीस मिनट पानी बरसता रहा जोरों से। फिर पानी बंद हुआ। कोई पाँच मिनट बाद बिजली आ गई। अभी हवा चल रही है। पार्क के पेड़ डोल रहे हैं। पत्ते थरथरा कर एक दूसरे से टकराकर ध्वनियाँ कर रहे हैं, यहां मेरे दफ्तर तक सुनाई दे रही हैं।
लेकिन यह कुसमय रात की आंधी और अब शाम की बरसात। शायद किसानों के लिए तो शंका और विपत्ति ले कर आई है। इस साल सर्दियों की अवधि छोटी रहने से पहले ही फसल तीन चौथाई दानों की हो रही है। तिस पर यह बरसात न जाने क्या कहर बरसाएगी। ओले न हों तो ठीक नहीं तो आधा भी गेहूँ घर न आ पाएगा। मैं सोच ही रहा हूँ कि विष्णु जी कितने चिंतित और उदास होंगे? फसल को जल्दी कटवाने की जुगत में होंगे? वादे का एक बोरी गेहूँ भी आज नहीं पहुँचा है। वे जरूर परेशान होंगे। मैं भी सोचते हुए उदास हो गया हूँ।
काचरू ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक उदाहरण है। देश के सभी शिक्षण संस्थानों को इस आदेश को केवल औपचारिकता मात्र नहीं समझना चाहिए अपितु इस से सीखना चाहिए और इस का वास्तव में पालन करना चाहिए। उन्हों ने कहा कि मैं इस में रुचि नहीं रखता कि मेरे बेटे के अपराधी को क्या सजा मिलती है। मैं चाहता हूँ कि रेगिंग रुके और बच्चे इस का शिकार न बनें। सभी छात्रों के माता पिता को सुनिश्चित करना चाहिए कि उन की संताने रेगिंग में शामिल तो नहीं हैं। रेगिंग का उन्मूलन होना ही चाहिए।