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सोमवार, 9 मार्च 2026

सन्नाटे की गूँज

पिंजरा और पंख-52

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
श्रृंखला फाइनल-2
शनिवार की शाम हवा में एक अजीब सा भारीपन था. अनिल चाचा ऑफिस से जल्दी आ गए. झटपट चाय पी, कपड़े बदले और खड़े हो गए, “मैं होटल ऋतुराज जा रहा हूँ, मेहमान आने वाले होंगे. वहाँ उन्हें रिसीव करने वाला कोई होना चाहिए.”

करीब सात बजे इंदौर वाले मेहमान अपनी बड़ी गाड़ी के साथ होटल पहुँचे. अनिल चाचा होटल में मेहमानों को चाय पिला कर वापस घर पहुँचे तब तक गुप्ताजी भी फैक्ट्री से वापस आ चुके थे. चाचा का उत्साह सातवें आसमान पर था. "भाई साहब, मेहमान होटल पहुँच गए हैं. थोड़ी देर आराम करके वे डिनर के लिए तैयार हो जाएंगे. हमें नौ बजे तक डिनर के लिए होटल पहुँच जाना चाहिए. वहीं लड़का देख लेंगे और दोनों परिवार मिल लेंगे, बातचीत हो जाएगी. शगुन घर ही रहेगी, वैसे भी मेहमानों के सामने उसे कल सुबह ही आना चाहिए."

शगुन अपने कमरे की खिड़की से देख रही थी कि कैसे पापा, मम्मा, चाचा और आयुष होटल के लिए निकल रहे हैं. आयुष ने जाते-जाते एक नज़र शगुन की ओर देखा, उसकी आँखों में एक चेतावनी थी.

घर अब खाली था. शगुन के लिए यह सन्नाटा नया नहीं था, लेकिन आज इस सन्नाटे में एक अजीब सी ताकत थी. उसने रसोई में जाकर अपने लिए चाय बनाई. उसने सोचा, "वहाँ होटल में इस वक्त मेरे भविष्य के बारे में बातें हो रही होंगी. शादी कैसे करनी है? क्या लेन-देन होना है, सारी शर्तों पर बातें हो रही होंगी. वहाँ पूरा परिवार है, बस मैं ही नहीं हूँ, जिसके बारे में उन्हें निर्णय करने हैं. कितना विचित्र है यह? और बरसों से चला आ रहा है कि एक लड़की के भविष्य के बारे में पूरा परिवार विमर्श करता है बस उस लड़की को ही छोड़ दिया जाता है. क्या यही मैं भी होने दूँ? नहीं, मैं यह कैसे होने दे सकती हूँ? मैं अपने अस्तित्व को किसी अनजान के अस्तित्व में विलीन नहीं होने दूंगी. मुझे अपनी पहचान खुद बनाना है.”

रात ग्यारह बजे घर के बाहर कार रुकी. मम्मा के हाथ में शगुन के लिए खाने का बैग था. वे थकी हुई और उदास लग रही थीं. अनिल चाचा और पापा नीचे लिविंग रुम में ही बातें करने बैठ गए.

आयुष सीधे ऊपर शगुन के कमरे में पहुँचा. उसके हाथ में शगुन के खाने का बैग था. वह बहुत उत्तेजित और गुस्से में था. "दीदी, वहाँ जो हुआ वह अपमानजनक था. विवेक के पापा और चाचा तो ऐसे बात कर रहे थे जैसे आप कोई वस्तु हों. विवेक की माँ ने तो मम्मा से यहाँ तक कह दिया कि, 'शगुन को समझा दीजियेगा कि शादी के बाद उसे अपनी पढ़ाई और नौकरी की ज़िद छोड़नी होगी. उसे उसकी कोई जरूरत नहीं. हमारे घर में किसी बहू ने आज तक बाहर काम नहीं किया. घर में सब कुछ है. वह घर संभाले, वही उसके लिए बहुत बड़ा काम होगा.' और पापा? वे बस चुपचाप गर्दन झुकाए सुन रहे थे. उनके पास कोई जवाब नहीं था."

शगुन ने आयुष की बात शांति से सुनी. उसने आयुष का हाथ थाम लिया. "आयुष, पापा की चुप्पी उनका डर है, और विवेक की माँ का अहंकार उनकी कंडीशनिंग. उन्हें लगता है कि स्त्रियों का जीवन परिवार और घर के पिंजरे के लिए है. उन्होंने खुद इसे जिया है. उसी में वे खुद को और तमाम स्त्रियों को सुरक्षित समझती हैं. उन्होंने अपनी बहू के लिए अपने यहाँ सुन्दर 'पिंजरा' तैयार किया है. उस पिंजरे के गुण भी उन्होंने खूब बताए होंगे. पर उन्हें पता नहीं कि शगुन उस पिंजरे में रहने को तैयार नहीं है, वह उड़ना सीख चुकी है उसके पंख अब पेरालाइज नहीं हैं."

आयुष ने खाने का बैग मेज़ पर रख दिया. "मम्मा ने कहा है कि खाना खा लेना, लेकिन दीदी, कल सुबह वे लोग तुम्हें देखने आएंगे, और उसी समय दस्तूर के लिए तैयार रहेंगे. चाचा ने पापा को लगभग मना लिया है कि कल ही बात पक्की कर दी जाए और लड़के का तिलक कर दिया जाए. तुम खाना खा लो. मैं छत पर हूँ."

शगुन अपनी 'संबल' नोटबुक के पास गई. उसने फातिमा वाले उस सूखे गुलाब को हाथ में लिया. "कल सुबह का सूरज रामगंजमंडी के लिए एक सामान्य रविवार होगा, पर मेरे लिए यह अपनी मर्यादा और अस्मिता की लड़ाई होगी. आयुष मेरे साथ है, बाकी बात मैं खुद संभालूँगी."

आयुष के जाने के बाद मम्मा आईं. कहने लगी, “लड़का सुन्दर है, उनके कपड़े का होलसेल का बिजनेस है. लड़का भी पहले एमबीए करके एमपीएससी की तैयारी में लगा था. उसके लिए उसने कोचिंग भी की थी. लेकिन बिजनेस में पूरा परिवार लगता है, इसलिए बहुत समझाने पर वह तैयारी छोड़ कर बिजनेस में आ गया. उसके बाद उसने बिजनेस को बहुत बढ़ा लिया. उसके पापा कह रहे थे. ‘शगुन पढ़ी लिखी है. वह भी मनोविज्ञान से. वह लड़कियों और औरतों के वस्त्रों के बिजनेस को घर से ही देख सकती है.’ मुझे तो लड़का और परिवार पसंद आया है. तुम्हारा भविष्य सुरक्षित रहेगा. कल तुम भी उन सब से मिल लोगी. तब तुम्हारे लिए मना करना कठिन होगा.”

शगुन चुपचाप सुनती रही. उसने इतना ही कहा, “माँ, कल का कल देखेंगे.”

माँ वापस नीचे चली गयीं, वह खाना खाकर ऊपर छत पर चली गयी.

देर रात तक भाई-बहन छत पर बैठे रहे. नीचे लिविंग रूम में अनिल चाचा पापा को रवि-पुष्य योग में तिलक कर देने से शगुन का भविष्य सुघड़ होने की बात कर रहे थे, और ऊपर छत पर दोनों उस 'अदृश्य पिंजरे' की सलाखों को गिन रहे थे जिन्हें कल सुबह टूटना था.

शगुन ने नोटबुक में लिखा, "जब सन्नाटा बहुत गहरा हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि आवाज़ अब गूँजने वाली है."
... क्रमशः

रविवार, 8 मार्च 2026

मोर्चेबन्दी

पिंजरा और पंख-51

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
श्रृंखला फाइनल-1
एम.एससी. मनोविज्ञान बनस्थली विद्यापीठ से करने की अंडरटेकिंग देने पर शगुन की टीचिंग असिस्टेंट के पद पर नियुक्ति पुख्ता हो गयी. अब उसे 27 जून को पदभार ग्रहण करना था.

बी.एससी. फाइनल का अन्तिम पेपर समाप्त हुआ. 20 मई को बाद मम्मा-पापा उसे लेने आ रहे थे, उसी दिन वापस लौटना था. बी.एससी. फाइनल हो जाने से शगुन होस्टल रूम रिटेन नहीं कर सकती थी. अगले साल उसे नया होस्टल मिलना था. शगुन ने अपना सारा सामान पैक करना शुरू कर दिया. आयुष भी 21 मई को सुबह गुवाहाटी से कामाख्या एक्सप्रेस पकड़ कर 23 को दोपहर होने तक रामगंजमंडी पहुँच रहा था. उसके घर पहुँचने के दो दिनों मे ही आयुष का वहाँ पहुँचना उसके लिए अच्छा था.

कार घर के बाहर पहुँचते ही एक-दो बार हॉर्न बजाने पर चाची बाहर आई, उन्होंने गेट खोला, गुप्ताजी ने कार अंदर खड़ी की. एसी कार से बाहर निकलते ही शगुन को रामगंजमंडी की तेज गर्मी का अहसास हुआ. वह चाची से गले मिली, लेकिन उसकी आँखें मुक्ति को तलाश रही थीं. तभी उसे ड्राइंग रूम के दरवाजे के परदे के पीछे वह छुपती हुई दिखाई दी.

“दो दिन से रट रही है शगुन दी आएंगी आयुष भैया आएंगे. अब तुम आ गयी हो तो परदे के पीछे छुप रही है.” चाची ने बताया.

मुक्ति अब डेढ़ साल की थी. अब दौड़ने और बोलने भी लगी होगी. शगुन का मन उसे गोद में उठाने और बातें करने का हुआ. शगुन ड्राइंग रूम में गयी तो मुक्ति परदे के पीछे से हंसती हुई भाग कर अंदर जाने लगी, तभी फिसल कर फर्श पर कालीन पर गिर गयी. उसे चोट नहीं लगी थी पर बच्चे का रुआँसा होना स्वाभाविक था. शगुन ने उसे गोद में उठा कर पुचकार लिया. तू दीदी से भाग रही थी तो गिर गयी. दीदी से भागी क्यों? दीदी को प्यार नहीं करेगी? प्यार में भीगे शब्द सुन कर मुक्ति मुस्कुराने लगी.

इस बीच मम्मा, चाची और पापा सामान निकाल लाए. चाची उन्हें लेकर जीने से ऊपर जाने लगी. शगुन ने रोका तो कहने लगी, “एक बैग तुम्हारे लिए रख छोड़ा है, उसे लेकर आओ.”

चाची ने शगुन और आयुष का कमरा तैयार कर रखा था. सामान वे रख चुकी थीं. शगुन ने भी बैग रखा. फिर चाची से बतियाने लगी. उन्होंने बताया कि “इंदौर वाले मेहमान 26 मई की शाम को रामगंज मंडी पहुँच रहे हैं.

उस रात किसी ने शगुन से मेहमानों का कोई जिक्र नहीं किया. पापा के पूछने पर शगुन ने इतना जरूर बताया कि बी.एससी. में उसके विद्यापीठ में प्रथम स्थान पर रहने की पूरी संभावना है कि. ऐसा हुआ तो उसे स्वर्ण पदक मिलेगा. तीसरे दिन सुबह ग्यारह बजे आयुष भी घर पहुँच गया. उसे देख शगुन की बाँछें खिल उठीं. अब घर में उसका एक मजबूत समर्थक मौजूद था, और वह अपनी बात मजबूती से कह सकती थी.

दो दिन शान्ति से गुज़र गए. नन्ही मुक्ति शगुन और आयुष से खूब हिल गई थी. वे बाहर जाते तो उनके साथ जाने की जिद करती, वे साथ ले भी जाते. अभी तक उनके सामने मेहमानों के आने का कोई जिक्र नहीं हुआ था. पच्चीस मई की शाम अनिल चाचा दफ्तर से लौट कर आयुष के साथ लिविंग रूम में चाय पी रहे थे. शगुन ऊपर अपने कमरे में थी. तभी चाचा ने बताया कि, "कल शाम इन्दौर वाले मेहमान यहाँ होंगे. उनके ठहरने का इंतजाम होटल ऋतुराज में कर दिया है. रात को शगुन के सिवा हम सब उनके साथ होटल में ही डिनर कर लेंगे, हम परिवार और लड़के को देख लेंगे. अगली सुबह वे शगुन को देखने घर आएंगे. लंच यहीं करेंगे. उसके बाद वे होटल लोटेंगे और यदि उन्होंने हाँ कर दी तो हम होटल चल कर टीका करके दस्तूर कर देंगे. शगुन का ग्रेजुएशन हो चुका है, अब और क्या इंतज़ार करना?"

आयुष चाचा को सुन कर मुस्कुरा कर रह गया.

रात को छत पर, आयुष और शगुन एक साथ बैठे. चाची ने शाम को ही छत पर पानी छिड़क दिया था, वह ठंडी थी. हवा में भी कुछ ठंडक आ चुकी थी. यह वही जगह थी जहाँ कभी उन्होंने बचपन के सपने साझा किए थे.

"दीदी, अपना नियुक्ति पत्र लाई हो न?" आयुष ने धीमी आवाज़ में पूछा.

"हाँ आयुष, वह मेरे पास नीचे बैग में रखा है. मुझे ‘रोका’ हो जाने का कोई डर नहीं है, मुझे डर पापा की चुप्पी का है. मैं नहीं चाहती कि मेरा स्वावलंबन उन्हें समाज के सामने छोटा महसूस कराए."

आयुष ने दीदी का हाथ थाम लिया. "पापा को छोटा आप नहीं, बल्कि चाचा के थोपे हुए थोथे तर्क बना रहे हैं. जब आप यह पत्र दिखाएंगी, तो आप सिर्फ एक नौकरी की बात नहीं करेंगी, आप उस 'पिंजरे' की सलाखों को भी हटा देंगी जिसे पापा भी महसूस करते हैं पर कह नहीं पाते."

सीढ़ियों पर किसी के पैरों की आहट हुई. मम्मा ऊपर आ रही थीं. उन्होंने दोनों को साथ देखा और उनके पास आकर बैठ गईं. "परसों की तैयारी पूरी है. अनिल चाचा ने सब व्यवस्था कर दी है. पर शगुन, तेरे पापा कुछ बोल नहीं रहे हैं, वे अंदर ही अंदर बहुत बेचैन हैं."

शगुन ने मम्मा का हाथ पकड़ लिया. "मम्मा, क्या पापा को मुझ पर भरोसा नहीं है? क्या मेरी तीन साल की मेहनत इस एक दिन की रस्म से कमज़ोर पड़ जाएगी?"

मम्मा की आँखों में आँसू थे, पर वे मुस्कुराईं. "भरोसा तो बहुत है बेटा, बस वे उस दुनिया से डरे हुए हैं जहाँ उन्होंने जन्म लिया है, जिसमें हम सब रहते हैं."

उस रात शगुन को नींद नहीं आई. उसने अपनी नोटबुक निकाली. उसमें उसने आज कुछ नहीं लिखा. बस एक पुराना सूखा हुआ गुलाब देखा, वही गुलाब जो फातिमा ने उसे इंटरव्यू वाले दिन दिया था.

नीचे लिविंग रूम में अनिल चाचा पापा को रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र होने से रवि-पुष्य योग के लाभ गिना रहे थे. उधर गुवाहाटी की ब्रह्मपुत्र की लहरों की याद और बनस्थली के संकल्प के बीच आयुष और शगुन खुद को मजबूत कर रहे थे. रविवार को उन्हें साबित करना था कि पंख अब उड़ान के लिए तैयार हैं.
... क्रमशः

शनिवार, 7 मार्च 2026

स्वावलंबन

पिंजरा और पंख-50

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी

सघन वृक्षावली के बीच बनस्थली विद्यापीठ कैम्पस को जनवरी के पहले सप्ताह की सुबह ने हमेशा की तरह कड़कड़ाती ठंड और कोहरे की चादर ओढ़ा रखी थी. लेकिन शगुन को इस तेज सर्दी का बिलकुल अहसास नहीं था. वह अपने भीतर एक अलग ही तपिश महसूस कर रही थी. वह और दिनों की अपेक्षा आज जल्दी तैयार होने लगी थी. आज उन सबकी पहली क्लास ग्यारह बज कर दस मिनट से आरंभ होने वाली थीं, लेकिन शगुन को सुबह दस बजे 'टीचिंग असिस्टेंट' (TA) के पद के साक्षात्कार के लिए चयन बोर्ड के सामने उपस्थित होना था. जब दूसरी लड़कियाँ सुबह का नाश्ता करके अभी अलसा रही थी, शगुन सुबह नौ बजे तैयार होकर सबसे बाद नाश्ते के लिए पहुँची. मेस का डाइनिंग हॉल लगभग खाली हो चुका था, दो लड़कियाँ अपना नाश्ता समाप्त कर रही थीं. वह तुरन्त नाश्ता करके अपने रूम में लौटी. अपनी ड्रेस को एक बार फिर जाँचा और जरूरी दस्तावेज चैक करके फोल्डर में रखे. उसकी तीनों रूम मेट ने उसे शुभकामनाएँ दीं कि उसका साक्षात्कार सफल रहे और उसे टी.ए. का यह पद मिले. वे तीनों जानती थीं कि शगुन ने तेजी से पारिवारिक और सामाजिक कंडीशनिंग को समझा है और उनसे छुटकारा पाया है. जबकि वे अभी इसकी हिम्मत नहीं जुटा पायी हैं.

अपने कमरे से बाहर निकलते ही शगुन को सामने से फातिमा आती दिखाई दी. उसने मुस्कुराते हुए शगुन को एक ताजा सुन्दर गुलाब भेंट किया और कहा, “इंशा अल्लाह, यह पद तुम्हें ही मिले”.

“तो तुमने मुझे भी तुम्हारे अल्लाह के भरोसे छोड़ दिया.” शगुन ने मुस्कुराकर जवाब दिया तो फातिमा ने जोर का ठहाका लगाया, शगुन भी उसमें शामिल हो गयी. ठहाके की आवाज सुन कर पास वाले कमरे के दरवाजे से एक लड़की ने झाँक कर देखा कि ठहाका किसने लगाया.

शगुन ने आज बादामी रंग का खादी का कुर्ता पाजामा और हलके भूरे रंग का ऊनी फुल स्वेटर पहना था. बाल सलीके से बंधे थे. मनोविज्ञान विभाग की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसे रामगंजमंडी की उस शगुन की याद आई जिसने बनस्थली विद्यापीठ के इसी कैंपस में तीन साल पहले सहमे हुए अपने कदम रखे थे.

विभागाध्यक्ष के केबिन के बाहर पाँच और उम्मीदवार थीं, सभी एम.एससी. (M.Sc.) अंतिम वर्ष के विद्यार्थी. शगुन अकेली थी जो अभी बी.एससी. (B.Sc.) के आखिरी सेमेस्टर में थी. उसकी धड़कनें तेज़ थीं, पर इरादा स्थिर. एक-एक कर सभी को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. शगुन सबसे आखिरी थी.

अंदर पैनल में तीन वरिष्ठ प्रोफेसर बैठे थे. बीच में बैठे प्रोफेसर ने उसकी फाइल बंद करते हुए पूछा, "शगुन, तुम्हारा एकेडमिक रिकॉर्ड शानदार है. लेकिन 'टीचिंग असिस्टेंट' के लिए केवल ज्ञान काफी नहीं है. तुम 'असामान्य मनोविज्ञान' (Abnormal Psychology) की जटिलताओं को उन छात्राओं को कैसे समझाओगी जो खुद किसी मानसिक या पारिवारिक दबाव में हों?"

शगुन ने एक पल के लिए डॉ. शास्त्री की ओर देखा और फिर बोर्ड की ओर मुखातिब हुई. "सर, मनोविज्ञान केवल किताबों का हिस्सा नहीं है. जब हम 'लर्नड हेल्पलेसनेस' (Learned Helplessness) की बात करते हैं, तो हमें छात्राओं को यह समझाना होगा कि समाज ने उन्हें जो बेड़ियाँ पहनाई हैं, वे उनका स्वभाव नहीं हैं. एक काउंसलर के रूप में मेरा काम उन्हें यह अहसास दिलाना होगा कि उनकी 'ना' कहना सीखने की क्षमता ही उनका सबसे बड़ा मानसिक उपचार है."

अगले बीस मिनट तक शगुन ने 'सांख्यिकी' (Statistics) और 'संगठनात्मक व्यवहार' (Organizational Behavior) के उन कठिन सवालों के जवाब दिए जो आमतौर पर पोस्ट-ग्रेजुएट स्तर पर पूछे जाते हैं. उसकी आवाज़ में एक ऐसी स्पष्टता थी जो केवल अनुभव और संघर्ष से आती है.

साक्षात्कार पूरा हुआ तब एक बज चुका था. उसे भूख लगने लगी थी. मैस के भोजन का वक्त भी था. वह होस्टल पहुँची और कपड़े बदल कर सीधे डाइनिंग हॉल. प्रियंका, किरन, सीमा और फातिमा चारों वहीं थीं. उन्होंने उसे घेर लिया. पूछने लगीं, “इंटरव्यू कैसा रहा?”

“इंटरव्यू ठीक रहा. लेकिन चयन हो ही जाएगा, नहीं कह सकती. वहाँ मेरे अलावा सभी एम.एस.सी. फाइनल की लड़कियाँ थीं. हो सकता है उनमें से किसी का इंटरव्यू मुझसे बेहतर रहा हो.” शगुन ने सहजता से कहा.

“नहीं, तेरा ही होगा, मैंने तुझे अल्लाह को जो सौंप रखा है. वे तेरे साथ गलत नहीं करेंगे.” इतना कह कर फातिमा फिर हँस पड़ी. उसकी हँसी में बाकी चारों भी हँसने लगीं. तीन बजे से उनकी क्लासेज थीं. कुछ देर लड़कियों ने अपने होस्टल रूम में आराम किया फिर सभी क्लासेज के लिए निकल लीं.

आखिरी क्लास समाप्त होने के पहले परिचारिका क्लास में आई और बताया कि विभागाध्यक्ष ने क्लास के बाद शगुन को बुलाया है. क्लास के बाद जब सब लड़कियाँ होस्टल जा रही थीं. तब वह विभागाध्यक्ष के आफिस पहुँची

"शगुन, तुम्हारी समझ और परिपक्वता ने चयन समिति को प्रभावित किया है. हमने तुम्हें इस पद के लिए चुन लिया है. इस वर्ष तुम्हारा ग्रेजुएशन पूरा हो जाएगा. उसके बाद अगला सत्र 27 जून से आरंभ हो रहा है. उस दिन तुम्हें कार्यभार संभालना होगा, बस तुम्हें एक सप्ताह में यह अंडरटेंकिंग देनी होगी की पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स बनस्थली विद्यापीठ से ही करोगी. तुम्हें बधाई. तुम्हारा नियुक्ति पत्र एक दो दिन में तुम्हें मिल जाएगा."

हॉस्टल लौटने के पहले शगुन विभाग के कंप्यूटर रूम गयी और आयुष को मेल लिखा-

"प्रिय आयुष, आज मेरा चयन 'टीचिंग असिस्टेंट' के पद पर हो गया है. यह सफलता मेरी जितनी है, उतनी ही तुम्हारी भी. उस दिन तुमने पापा को फोन करके चाचा के 'धावे' को नहीं रुकवाया होता, तो शायद आज मैं इस चयन बोर्ड के सामने इतनी मजबूती से खड़ी नहीं हो पाती. तुम्हारे हस्तक्षेप ने मुझे वह 'समय' दिया आज मैं स्वावलंबी होने के मुहाने पर खड़ी हूँ. इस मई में जब हम घर पर होंगे, तो वहाँ मेरी अपनी एक नई स्वतंत्र पहचान होगी. इस पहचान में तुम्हारे योगदान के लिए थैंक्यू, मेरे संबल!"

उस रात शगुन ने अपनी पुरानी 'संबल' नोटबुक निकाली. उसमें लिखे 'पितृसत्ता' के सिद्धांतों के नीचे आज उसने एक नई लाइन जोड़ी— "जब ज्ञान स्वावलंबन तक पहुँच जाता है, तो भविष्य के मार्ग खुद-ब-खुद बनने लगते हैं."

खिड़की के बाहर गहराती रात अब उसे चुनौती नहीं, बल्कि एक नया अवसर दे रही थी.
... क्रमशः

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

इनकार

पिंजरा और पंख-49

लघुकथा श्रृखंला   : दिनेशराय द्विवेदी
नवंबर समाप्त होने को था. दिन में धूप अभी भी बर्दाश्त के बाहर थी. लेकिन सूरज के डूबते ही मौसम ठंडा हो जाता. रात को लोग गर्म कपड़ों में नजर आते. गुप्ता निवास के भीतर का माहौल आज गर्म था. गुप्ताजी फैक्ट्री से आठ बजे लौटे तो छोटा भाई अनिल उन्हें लिविंग रूम में ही मिला. वह अपनी जिद लिए बैठा था.

"भाई साहब, इंदौर वालों के पास रिश्ते आ रहे हैं, इतना अच्छा लड़का हाथ से निकल न जाए, इसलिए मैने उन्हें जुबान दे दी है. दिसंबर के आखिरी हफ्ते में हम सब बनस्थली चलेंगे. वहीं वे शगुन को देख लेंगे और हम कच्चा दस्तूर कर देंगे. लड़की की पढ़ाई अपनी जगह है, पर घर बसाना भी तो जिम्मेदारी है."

गुप्ताजी के मन में द्वंद्व का बवंडर फिर उठ खड़ा हुआ. फैक्ट्री में काम के दौरान वे सब भूले रहते. लेकिन घर आते ही पारिवारिक जिम्मेदारियों का अहसास होने लगता. जाति समाज में अधिकांश लड़कियों की शादियाँ ग्रेजुएट होने के पहले या फिर ग्रेजुएट होते ही हो जाती थीं. बाद में योग्य लड़के मिलने कठिन हो जाते. इस कारण से उन्हें अनिल की यह बात वाजिब ही लगती थी कि शगुन का भी अभी संबंध हो जाए और ग्रेजुएट होने के बाद उसकी शादी कर दें. लेकिन दूसरी और जब वे शगुन की मेहनत और उसका विकसित होता व्यक्तित्व देखते तो अत्यन्त प्रसन्न होते कि वह कितना सुंदर कर रही है. उन्हें लगता कि उसे अपने व्यक्तित्व के विकास का अवसर देना अधिक महत्वपूर्ण है. वे किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहे थे.

"पर अनिल, शगुन कह रही थी कि उसके प्रैक्टिकल और प्रेजेंटेशन हैं. इस समय हमारा वहां जाना..."

"अरे भाई साहब! ये पढ़ाई के बहाने कभी खत्म नहीं होंगे. एक दिन के कुछ घंटों में उसकी पढ़ाई का कुछ भी खराब नहीं होगा. हम वहाँ दोपहर तक पहुँचेंगे और शाम तक अपना काम समाप्त करके वापस लौट लेंगे. एक बार लड़के का तिलक कर दें. लड़का रुक जाएगा, उसके बाद शगुन को पढ़ाई में कोई बाधा नहीं होगी.” अनिल ने गुप्ताजी की बात काट दी.

मम्मा रसोई के दरवाजे पर खड़ी सब सुन रही थीं. उनकी आँखों में बेबसी थी. तभी घर के फोन की घंटी बजी. 

गुप्ताजी ने फोन उठाया. आयुष का फोन था.

 "कैसा है बेटा?"

"पापा, मैं ठीक हूँ. लेकिन शगुन दीदी से बात हुई थी, वह बहुत तनाव में है. उसने बताया कि चाचाजी मेहमानों को लेकर बनस्थली जाने की जिद कर रहे हैं. पापा, यह समय बिल्कुल ठीक नहीं है. दीदी का करियर इस समय सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर है. आपको पता है इस साल उनकी मेहनत कामयाब हुई तो वे विद्यापीठ में प्रथम स्थान हासिल कर सकती हैं. उन्हें इस समय जरा भी डिस्टर्ब करना ठीक नहीं. अगर आप जबरदस्ती वहाँ गए, तो न तो दीदी एकाग्र हो पाएगी और न ही उन मेहमानों के सामने हमारी कोई साख बचेगी. वहां कोई तमाशा हुआ तो वे लोग हमारी ही बदनामी करेंगे. अगर उन्हें इतनी ही जल्दी है, तो उन्हें साफ मना कर दीजिए."

आयुष की आवाज में एक नई मजबूती थी और बात तार्किक. उन्हें लगा कि उनके पैरों को डगमगाते देख बेटे ने मजबूती से उनका हाथ थाम लिया है. उनके आँखों में नमी उतर आई. उसने मम्मा से भी बात की और उन्हें भी यही समझाया. बेटे की इन दलीलों से गुप्ताजी के भीतर का असमंजस जाता रहा. उन्हें अहसास हुआ कि आयुष सही कह रहा है. शगुन का यह आखिरी साल है. मेहनत के बल पर वह ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम स्थान हासिल करने के निकट है. उसे डिस्टर्ब किया जाना ठीक नहीं. दूसरी ओर हम एक नया रिश्ता बनाने में इतनी जल्दी क्यों करें? जल्दबाजी मे तो कोई बढ़िया रिश्ता बनाया नहीं जा सकता. अचानक इस तरह बनस्थली जाना दोनों परिवारों के बीच वर्तमान संबंधों को भी खराब कर सकता है.

गुप्ताजी ने पलटकर अनिल चाचा की ओर देखा. उनकी आवाज़ एकदम शान्त और दृढ़ थी. "अनिल, मैंने सोच लिया है. हम दिसंबर में नहीं जाएंगे. शगुन को अपनी परीक्षा और प्रोजेक्ट बिना कोई बाधा उत्पन्न किए पूरा करने देंगे. इंदौर वालों से कहेंगे कि इस समय बनस्थली जाना ठीक नहीं. वे प्रतीक्षा करें. उन्हें ज्यादा ही जल्दी है, और उन्हें और रिश्ते मिल रहे हैं तो उनमें से किसी को देख लें. हम मई से पहले बात आगे नहीं बढ़ाएंगे. अभी हमें कोई जल्दी नहीं है."

अनिल चाचा अवाक रह गए. भाई साहब के मुंह से 'इनकार' सुनना उनके लिए अकल्पनीय था. वे बड़बड़ाते हुए बाहर निकल गए, लेकिन गुप्ताजी ने अपना रुख नहीं बदला.

उसी रात मम्मा ने शगुन को फोन किया. "बेटा, फिक्र मत कर. तेरे पापा ने मना कर दिया है. अब दिसंबर में कोई वहां नहीं आ रहा है. सब बातें मई तक टाल दी गई हैं. तू बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे."

फोन रखने के बाद शगुन ने एक गहरी और लंबी सांस ली. खिड़की के बाहर उतर आया अंधेरा अब उसे डरा नहीं रहा था. उसे पता था कि गुवाहाटी से आयुष के फोन ने और रामगंजमंडी में मम्मा ने पापा को निर्णय लेने में उसकी मदद की है. इस तरह पापा अपनी 'लर्नड हेल्पलेसनेस' (Learned Helplessness) से बाहर निकल सके और उसे उनका साथ मिल सका. यह साथ उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है. अब जनवरी का 'टीचिंग असिस्टेंट' का इंटरव्यू ही उसका अगला मोर्चा था.

उसने अपनी नई नोटबुक में लिखा, "वक्त मिल गया है.  अब उसे किसी भी हालत में स्वावलंबी बनना है."
... क्रमशः