यूँ तो हम नगर में रहते थे। लेकिन नगर इतना बड़ा भी नहीं था कि आसानी पैदल नहीं नापा जा सके। नगर से बाहर जाने के लिए बसें और ट्रेन थी। नगर में सामान ढोने का काम हाथ ठेले करते थे। बाकी इन्सान अधिकतर पैदल ही चलते थे। कुछ लोग जिन्हें काम से शहर के बाहर ज्यादा जाना होता था उनके पास सायकिलें थीं। मोटर सायकिलें बहुत कम थीं। चौपाया वाहन तो इक्का-दुक्का ही थे। हाँ सरकारी जीपें बहुत थीं। पिताजी अध्यापक थे, अक्सर बाहर पोस्टिंग रहती थी। बाकी हम सब का काम पैदल चलने से हो जाता था। पर जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया सोचता जरूर था कि घर में एक साइकिल तो होनी चाहिए। आसपास के बच्चे किराए पर साइकिल ले आते और कैंची चलाते रहते। मेरा भी दिल तो करता था। पर सोचता साइकिल सीख भी लूंगा तो किस काम की, जब तक घर में न हो। बिना साइकिल के काम चलता रहा।
गुरुवार, 3 जून 2021
साइकिल
यूँ तो हम नगर में रहते थे। लेकिन नगर इतना बड़ा भी नहीं था कि आसानी पैदल नहीं नापा जा सके। नगर से बाहर जाने के लिए बसें और ट्रेन थी। नगर में सामान ढोने का काम हाथ ठेले करते थे। बाकी इन्सान अधिकतर पैदल ही चलते थे। कुछ लोग जिन्हें काम से शहर के बाहर ज्यादा जाना होता था उनके पास सायकिलें थीं। मोटर सायकिलें बहुत कम थीं। चौपाया वाहन तो इक्का-दुक्का ही थे। हाँ सरकारी जीपें बहुत थीं। पिताजी अध्यापक थे, अक्सर बाहर पोस्टिंग रहती थी। बाकी हम सब का काम पैदल चलने से हो जाता था। पर जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया सोचता जरूर था कि घर में एक साइकिल तो होनी चाहिए। आसपास के बच्चे किराए पर साइकिल ले आते और कैंची चलाते रहते। मेरा भी दिल तो करता था। पर सोचता साइकिल सीख भी लूंगा तो किस काम की, जब तक घर में न हो। बिना साइकिल के काम चलता रहा।
बुधवार, 26 मई 2021
रामायण में बुद्ध की उपस्थिति
बुद्ध पूर्णिमा पर मेरी एक फेसबुक पोस्ट पर यह प्रश्न उठा कि पहले बुद्ध आए कि राम। मेरी वह पोस्ट वाल्मिकी रामायण के गीताप्रेस से प्रकाशित संस्करण के एक श्लोक पर आधारित था, जिसमें बुद्ध का उल्लेख आया है। यह सभी जानते हैं कि बुद्ध एक वास्तविक ऐतिहासिक चरित्र हैं। राम का चरित्र भी प्राचीन है, वह वास्तविक है या काल्पनिक यह कोई नहीं जानता। लेकिन जिस तरह इस चरित्र के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं उससे लगता है कि इस चरित्र का सदियों में विकास हुआ है। मैं इस विवाद में नहीं जाना चाहता। केवल यह कहना चाहता हूँ कि वाल्मिकी रामायण बुद्ध के बाद की रचना है। यह ईसा पूर्व की पहली या दूसरी शताब्दी में रची गयी है। महाभारत की भी ऐसी ही स्थिति है। यहाँ मैं रामायण का वह प्रसंग और श्लोक चित्रों सहित प्रस्तुत कर रहा हूँ।
शनिवार, 17 अप्रैल 2021
मैंने नहीं, तुमने बुलाया है
मैंने नहीं, तुमने बुलाया है
गुरुवार, 15 अप्रैल 2021
राधा नाम पर विचार - रामधारी सिंह दिनकर
संस्कृति के चार अध्याय से ...
बुधवार, 14 अप्रैल 2021
संघर्षरत जनता ही सब नेताओं की जननी है
हमारे देश की संविधान सभा ने बाबा साहेब को भारत के संविधान का प्रारूप बनाने का काम सौंपा था। उन्होंने उस काम को बेहतरीन तरीके से पूरा किया। संविधान सभा ने संविधान पारित किया। देश के संविधान का प्रारूप बनाने का जो बड़ा काम उन्होंने किया वह अकेला उन्हें सदियों तक स्मरण रखने के लिए पर्याप्त है। 26 जनवरी 1950 को संविधान प्रभावी होने के बाद भी अनेक क़ानूनों का प्रारूप उन्होंने ही तैयार किया। लेकिन इन क़ानूनी कामों को करने के साथ-साथ वे आज़ादी के आन्दोलन के एक प्रमुख सेनानी भी थे। उनके लिए आज़ादी की लड़ाई केवल अँग्रेजों से मुक्ति की लड़ाई नहीं थी अपितु देश की अछूत जातियों को अस्पृश्यता से मुक्त कराने और उन्हें देश के अन्य नागरिकों के समान जीवन प्रदान करने की लड़ाई भी थी। इसके लिए उन्होंने शोध का बड़ा काम किया, जो आज उनके लेखन में देखा जा सकता है। वे जानते थे कि संविधान में सभी नागरिकों को समानता का मूल अधिकार प्रदान कर देने और अस्पृश्यता विरोधी क़ानून बना देने मात्र से अछूत जातियों के लोगों को समानता के स्तर पर नहीं लाया जा सकता। इसके लिए उन्होंने कुछ समय के लिए इन जातियों और आदिवासी जन जातीय समूहों के लोगों को कुछ विशेष अधिकार और सुविधाएँ प्रदान करने के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा जिसे संविधान सभा ने मान लिया और यह दस वर्षों के लिए संविधान का अस्थायी भाग बन गया। भारतीय संसद इस अस्थायी प्रावधान को लगातार बढ़ाती रही और वह आज भी संविधान में विद्यमान है। आज नयी नयी जातियाँ भी जो न अछूत हैं और न ही आदिवासी आरक्षण की मांग कर रही हैं। हमारे देश की आजादी के बाद की राजनीति जो कल्याणकारी राज्य के सिद्धान्त से आरम्भ हुई थी, वाम राजनीति को छोड़ दें तो अब सीधे सीधे पूंजीपतियों के यहाँ बंधक रखी जा चुकी है, उसका केवल एक उद्देश्य रह गया है कि किसी तरह वोट प्राप्त कर सत्ता हथिया ली जाए और फिर पूंजीपतियों के हित साधे जाएँ। इस राजनीति ने वोट हासिल करने के अनेक दो-नम्बरी तरीके ईजाद कर लिए हैं।
मंगलवार, 13 अप्रैल 2021
साम्प्रदायिकता के विरुद्ध समन्वय के बीज बोएँ
सोमवार, 12 अप्रैल 2021
भारतीय नव-वर्ष
भारतीय और हिन्दू नववर्ष की बधाइयाँ शुरू हो गयी हैं. सोशल मीडिया पर संस्कृति का गुणगान किया जा रहा है उस पर गर्व प्रकट किया जा रहा है। यूँ तो जब से मोदी जी केन्द्र में प्रधानमंत्री बने हैं शायद ही कोई क्षण बीतता हो जब सोशल मीडिया पर हिन्दू और भारतीय संस्कृति का गुणगान न होता हो। उनके समर्थकों को लगता है कि हिन्दू और भारतीय संस्कृति का गुणगान न किया गया तो शायद मोदी जी का आधार खिसक जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो उनका क्या होगा?






