@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: परिस्थितियाँ निर्णायक होती हैं

बुधवार, 3 अगस्त 2011

परिस्थितियाँ निर्णायक होती हैं

हजीवन मनुष्य का स्वाभाविक गुण भी है और आवश्यकता भी। बालक को जन्मते ही अपनी माँ का साथ मिलता है। उसी के माध्यम  से उसे विकसित होने का अवसर प्राप्त होता है और उसी के माध्यम से वह जगत से परिचित होता है। फिर आते हैं पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची, बुआ, मामा, नाना .... आदि। फिर जैसे जैसे बड़ा होता है उसे अपने हम उम्र मिलते चले जाते हैं। वह माँ से सीखना आरंभ कर के सारी दुनिया में जो कोई भी उस के संपर्क में आता है उस से सीखता जाता है। ये सीखें कभी समाप्त नहीं होती, जीवन पर्यन्त चलती रहती हैं। जो सोच लेता है कि अब उसे सीखने को कुछ शेष नहीं वह मुगालते में रहता है। उस के सीखने की प्रक्रिया मंद पड़ जाती है और धीरे-धीरे बंद भी हो जाती है। बस यही वह क्षण है जब वह मृत्यु की और कदम बढ़ाने लगता है। कभी लगता है सीखते जाना, लगातार सीखते जाना ही जीवन है। 

बालक बड़ा होता है विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करता है, अपने जीवन यापन के लिए सीखता है। इसी बीच वह जवान होता है। उस का शारीरिक विकास विपरीत लिंगी साथी की आवश्यकता महसूस कराने लगता है। वे भाग्यशाली हैं जिन्हें एक अच्छा जीवनसाथी मिल जाता है।  जीवन की अगली पायदान आरंभ हो जाती है।  जीवन संघर्ष यहीं से आरंभ होता है। अब दोनों को मिल कर जीवन चलाना है, एक सहजीवन। वे मिल कर श्रम करते हैं, साधन अर्जित करते हैं, गाड़ी के दो पहियों की तरह। यदि एक भी बराबर साथ न दे तो गाड़ी डगमगाने लगती है। पथ पर चलने में कठिनाई आने लगती है। कभी गाड़ी पथ से उतर जाती है, कभी रुक जाती है, कभी गलत राह पर चल पड़ती है। मंजिल पर पहुँचने के स्थान पर किसी अनजान पथ पर अनजान दिशा में चलने लगती है। 

सलिए जरूरी है, दोनों पहियों के बीच तालमेल और बराबरी से एक दूसरे का साथ निभाते चलना। यह तभी संभव है जब दोनों पहिए साथ चले ही नहीं अपितु एक दूसरे का ध्यान भी रखें। जब कभी कोई मोड़ आए और एक पर भार कम और एक पर अधिक हो तो कोई किसी का साथ न छोड़े। समझे कि यह मोड़ है, मोड़ पर तो यह होगा ही कि एक पर भार कम औऱ एक पर अधिक होगा। हो सकता है, अगले ही मोड़ पर दूसरे को अधिक भार उठाना पड़े। दोनों पहिए कब हर मोड़ पर यह समझ पाते हैं? जरा सी असुविधा में एक पहिया दूसरे को दोष देने लगता है।  दूसरा जान रहा है कि यह उस का नहीं मार्ग का, परिस्थितियों का दोष है। उसे अच्छा नहीं लगता। उसे चोट पहुँचती है। यह अक्सर होने लगे तो चोट गहरी होने लगती है। चोट खाने वाला बिलबिला उठता है। यही वह समय है, जब दोनों पहियों को सोचना चाहिए, एक दूसरे के बारे में सोचने से अधिक उन परिस्थितियों के बारे में जो दोनों में भेद उत्पन्न कर रही हैं।  उन्हें सोचना चाहिए कि प्रयास और परिश्रम करने पर भी कभी कभी इच्छित परिणाम नहीं मिलते। विचार, प्रयास और परिश्रम तो मनुष्य के हाथ में है, वे इन पर काम कर सकते हैं। लेकिन ये निर्णायक नहीं होते। निर्णायक होती हैं परिस्थितियाँ। उन्हें एक दूसरे को दोष देने के स्थान पर परिस्थितियों को समझना चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार अपने विचारों, प्रयासों और परिश्रम का उपयोग करना चाहिए। अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा करते हुए, एक दूसरे को पहुँचाई गई चोटों को सहलाते हुए, आगे इस बात का ध्यान रखते हुए कि वे दूसरे को चोट नहीं पहुँचाएंगे पथ पर चलते रहना चाहिए।

16 टिप्‍पणियां:

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

सही कह रहे हैं,सहमत.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सहजीवन और दोनों पहियों में बराबर की गति, यही बस एक आवश्यकता है।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

यह समझदारी जरूरी है।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

सहमत हूँ...जीवन की गहरी बात सरलता से समझाती पोस्ट.....

S.M.Masoom ने कहा…

दोनों पहियों के बीच तालमेल ज़रूरी और यह तभी संभव है जब दोनों पहिए साथ चले ही नहीं अपितु एक दूसरे का ध्यान भी रखें.
.
अच्छी नसीहत. सहमत हूँ . एक दूसरे का ध्यान भी रखें यही उसूल दोस्ती मैं भी अपनाया जाना चाहिए

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

मार्गदर्शन करती पोस्ट... जीवन में सामजस्य आवश्यक है..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज 03- 08 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
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anshumala ने कहा…

सही कहा अनुकूल परिस्थितियों में तो सब अच्छा ही रहता है प्रतिकूल परिस्थितियों में ही पता चलता है की कौन कितना धैर्यवान है अपना और अपने जीवन साथी का जीवन आराम से वहा से निकाल लेता है |

sushmaa kumarri ने कहा…

sahi kaha aapne...

vidhya ने कहा…

sahi kaha aapne...

सागर ने कहा…

theek hi kaha aapne...

रमेश कुमार जैन उर्फ़ निर्भीक ने कहा…

गुरुवर जी, आपके लेख से पूर्णता सहमत हूँ. आपने बहुत सही लिखा कि-जो सोच लेता है कि अब उसे सीखने को कुछ शेष नहीं वह मुगालते में रहता है। उस के सीखने की प्रक्रिया मंद पड़ जाती है और धीरे-धीरे बंद भी हो जाती है। बस यही वह क्षण है, जब वह मृत्यु की और कदम बढ़ाने लगता है। कभी लगता है सीखते जाना, लगातार सीखते जाना ही जीवन है और दोनों पहियों के बीच तालमेल ज़रूरी और यह तभी संभव है जब दोनों पहिए साथ चले ही नहीं अपितु एक दूसरे का ध्यान भी रखें.

गुरुवर जी, लेकिन अगर कहीं पर एक साईकिल का पहिया हो और दूसरा पहिया ट्रंक का हो.तब क्या होगा? साईकिल का पहिया तो ट्रंक का पहिया बन नहीं सकता है और ट्रंक का पहिया भी साईकिल का पहिया नहीं बन सकता है.वहाँ समस्या विकट हो जाती है. इसका क्या हल है? जबकि ट्रंक का पहिया जैसा बनने के लिए साईकिल का पहिया कुछ समय मांग रहा है,मगर ट्रंक का पहिया हाथ पर ही सरसों उगाना चाहता है. तब बेचारा साईकिल का पहिया क्या करें?

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

poorn jiwan chakr samjha diya aur bilkul samajh gaye hain. ab ham ek pahiye par pade bhaar ko ek mod samjh kar apni soch badalne ki koshish karenge.

abhar.

Satish Saxena ने कहा…

बढ़िया लेख भाई जी शुभकामनायें !

Khushdeep Sehgal ने कहा…

बस एक पहिया मर्सिडीज़ का और एक पहिया साइकल का नहीं होना चाहिए...

जय हिंद...

Udan Tashtari ने कहा…

जीवन जीने की जरुरी सीख बहुत सहजता से प्रस्तुत की है...साधुवाद!!