Saturday, May 25, 2019

गांधीजी का छल

21 अक्टूबर, 1928 को ‘नवजीवन’ में गांधीजी ने लिखा - ‘बोल्शेविज्म को जो कुछ थोड़ा-बहुत मैं समझ सका हूं वह यही कि निजी मिल्कियत किसी के पास नहीं हो— प्राचीन भाषा में कहें तो व्यक्तिगत परिग्रह न हो। यह बात यदि सभी लोग अपनी इच्छा से कर लें, तब तो इसके जैसा कल्याणकारी काम दूसरा नहीं हो सकता। परंतु बोल्शेविज्म में जबरदस्ती से काम लिया जाता है। ...मेरा दृढ़ विश्वास है कि जबरदस्ती से साधा गया यह व्यक्तिगत अपरिग्रह दीर्घकाल तक नहीं टिक सकता। ...फिर भी बोल्शेविज्म की साधना में असंख्य मनुष्यों ने आत्मबलिदान किया है। लेनिन जैसे प्रौढ़ व्यक्ति ने अपना सर्वस्व उसपर निछावर कर दिया था; ऐसा महात्याग व्यर्थ नहीं जा सकता और उस त्याग की स्तुति हमेशा की जाएगी।’ 


गांधीजी ने उक्त कथन में बोल्शेविज्म शब्द का प्रयोग किया है। बोल्शेविज्म शब्द से आज कुछ भी पता नहीं लगता है कि यह क्या है। क्या यह कम्युनिज्म है, या फिर वैज्ञानिक समाजवाद है या कुछ और। हम यदि रुसी बोल्शेविक क्रांति के बाद के दिनों में जाएँ तो उन दिनों क्रान्ति के बाद लेनिन के नेतृत्व में बनी राज्य-व्यवस्था को बोल्शेविज्म के रूप में जाना जाता था। हमें कुछ शब्दकोशो में भी उस का यही अर्थ मिलता है। हम जानते हैं कि लेनिन वैज्ञानिक समाजवाद की स्थापना करना चाहते थे उस के बिना एक कम्युनिस्ट व्यवस्था में संक्रमण संभव नहीं है। उन्हों ने जो सरकार स्थापित की थी वह सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद था। 

लेकिन गांधीजी पहले कहते हैं – “बोल्शेविज्म को जो कुछ थोड़ा-बहुत मैं समझ सका हूं वह यही कि निजी मिल्कियत किसी के पास नहीं हो— प्राचीन भाषा में कहें तो व्यक्तिगत परिग्रह न हो.” इस तरह वे यहाँ सीधे सीधे कम्युनिज्म की बात करते हैं। 

वे इस अवस्था को सही मानते हुए कहते हैं कि “यह बात यदि सभी लोग अपनी इच्छा से कर लें, तब तो इसके जैसा कल्याणकारी काम दूसरा नहीं हो सकता.” लेकिन फिर आगे कहते हैं “परंतु बोल्शेविज्म में जबरदस्ती से काम लिया जाता है. ...मेरा दृढ़ विश्वास है कि जबरदस्ती से साधा गया यह व्यक्तिगत अपरिग्रह दीर्घकाल तक नहीं टिक सकता। ...फिर भी बोल्शेविज्म की साधना में असंख्य मनुष्यों ने आत्मबलिदान किया है। लेनिन जैसे प्रौढ़ व्यक्ति ने अपना सर्वस्व उसपर निछावर कर दिया था; ऐसा महात्याग व्यर्थ नहीं जा सकता और उस त्याग की स्तुति हमेशा की जाएगी।” 

उन का मतभेद यहाँ उस अवस्था अर्थात कम्युनिज्म तक पहुँचने में नहीं है। लेकिन उस तक पहुँचने के लिए जो सर्वहारा के अधिनायकवाद या “वैज्ञानिक समाजवाद” की स्थापना लेनिन करते हैं उस की आलोचना वे करते हैं क्यों कि वे कहते हैं कि “इस में जबर्दस्ती से काम लिया जाता है”। इस के समानान्तर वे “ट्रस्टीशिप” का सिद्धान्त ईजाद कर लेते हैं। 

इस तरह गांधीजी वस्तुतः “वैज्ञानिक समाजावाद”, सर्वहारा अधिनायकवाद” और साम्यवाद की अवधारणा को ठीक से समझ ही नहीं सके थे। उन्हों ने उसे समझने की चेष्टा भी नहीं की थी। अन्यथा वे देख पाते कि पूंजीवाद में जनता का जितना दमन पूंजीवादी सरकारें करती हैं, उतना सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद में नहीं होता। समाजवाद में सिर्फ पूंजीपतियों के हाथों से उत्पादन के साधन छिन जाते हैं। लेकिन शेष जनता को जो नए अधिकार मिलते हैं उस का दुनिया में इस से पहले कोई सानी नहीं था। “सर्वहारा के अधिनायकवाद”, “वैज्ञानिक समाजवाद” और “साम्यवाद” के सिद्धान्त गांधीजी के बहुत पहले अस्तित्व में आ चुके थे। यदि “समाजवाद” के समानान्तर उन्हें “ट्रस्टीशिप की व्यवस्था” की बात करने के पहले उनके लिए आवश्यक था कि वे पहले मार्क्सवाद के “सर्वहारा के अधिनायकवाद”, “वैज्ञानिक समाजवाद” और “साम्यवाद” की अवधारणाओं को ठीक से समझकर खंडन करते और फिर “ट्रस्टीशिप” के सिद्धान्त को तार्किक तरीके से स्थापित करने की कोशिश करते। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। 

सही बात तो यह है कि गांधीजी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत की आजादी के लड़ रहे थे और उनकी इस लड़ाई में देश के अनेक सामंत और पूंजीपति भी उन के साथ थे। इस तरह वे जिस पूंजीवादी व्यवस्था की उच्चतर अवस्था साम्राज्यवाद से लड़ रहे थे, उस लड़ाई में वे पूंजीपतियों को भी साथ लिए थे। जिस से पूंजीवाद की आलोचना उन के लिए संभव नहीं थी। साम्यवादी व्यवस्था की आलोचना संभव नहीं थी। उसकी आलोचना से उन के साथ जमीनी लड़ाई लड़ रहे करोडों किसान, मजदूर और मेहनतकश जनता उन के आंदोलन से दूर हो जाती। इस कारण उन्हों ने साम्यवाद तक पहुँचने के लिए एक पूरी तरह अव्यवहारिक “ट्रस्टीशिप” सिद्धान्त खड़ा कर दिया। यह सीधे-सीधे भारत के करोडों किसानों, मजदूरों और मेहनतकश जनता के साथ गांधीजी का छल था।

Saturday, May 18, 2019

सल्फास एक्सपोजर

रसों 16 मई को दोपहर कोर्ट से वापस आने के बाद लंच लिया। मेरा सहायक शिवप्रताप कार्यालय का काम निपटा रहा था। मुझे याद आया कि साल भर के लिए गेहूँ के बैग खरीदे सप्ताह भर हो गया है, उन्हें अभी तक खोल कर स्टोरेज में नहीं डाला है। शिव के निपटते ही मैं ने उसे कहा- तुम मदद कर दो। मैं ने उस की सहायता से गेहूँ को स्टोरेज में डाला। शिव के जाने के बाद मुझे ऊँघ सी आने लगी तो मैं शयनकक्ष में जा कर लेट गया। बावजूद इसके कि एसी चल रहा था। मुझे नीन्द नहीं आई, कुछ बैचेनी से महसूस हुई। जैसे श्वासनली या भोजन नली में कुछ अटका सा है। मैं उठ कर शयनकक्ष से बाहर आया और अपनी टेबल पर बैठ कर अगले दिन का और लंबित काम देखने लगा। बैचेनी का जो अहसास हो रहा था वह काम करते हुए बिलकुल महसूस नहीं हुआ। 

शाम चार बजे करीब शोभा ने आ कर पूछा चाय बना लें। तो मैं ने हाँ कर दी। कुछ देर में उस ने मुझे कॉफी बना कर दे दी। मैं काम से निपटा तो मुझे लगा बाईं तरफ छाती में कुछ दर्द सा है फिर कुछ देर बाद दोनों कंधों और बाजुओं में भी दर्द का अहसास होने लगा। जो बैचेनी मुझे दोपहर के भोजन के बाद हुई थी वह फिर महसूस होने लगी, जो धीरे धीरे बढ़ रही थी। मैं ने तुरन्त तय किया कि मुझे डाक्टर के पास जाना चाहिए। डाक्टर गुप्ता शाम 5 बजे से बैठते हैं, मैं करीब साढ़े पाँच बजे उन के क्लिनिक के बाहर पहुँच गया। सामने ही मित्र दिनेश का डायग्नोस्टिक सेन्टर है। मैं जब कार पार्क कर रहा था तो वह दिखाई दे गया। मैं ने उसे इशारे से बुलाया। वह तुरन्त आ गया। मैं ने कहा मुझे सीने में दर्द और बैचेनी हो रही है, डाक्टर को दिखाने आया हूँ। मुझे अकेला देख वह भी मेरे साथ हो लिया। डाक्टर ने मेरी जाँच की। बीपी और पल्स बिलकुल नॉर्मल थे। डाक्टर ने मुझे तुरन्त ईसीजी कराने को कहा और दिनेश को हिदायत दी कि वह आ कर दिखाए। 

हम दिनेश के डायग्नोस्टिक सेंटर पर आ गए। बिजली गयी हुई थी। करीब आधा घंटा बाद आई। दिनेश ने सब से पहले मेरा ईसीजी किया और तुरन्त दिखाने के लिए डाक्टर के क्लिनिक पर दौड़ गया। दस मिनट बाद आ कर उस ने बताया कि ईसीजी नॉर्मल है बस एक स्थान पर मामूली वेरिएशन है इस कारण कल सुबह 2डी-इको कराने को कहा है, यह भी कहा है कि कोटा हार्ट अस्पताल में कराएँ तो बेहतर है। दो गोलियाँ लिख दी थीं। 

मैं घर आ गया। डाक्टर को दिखाने से मुझे और शोभा को संतुष्टि हो गयी थी। मैं ने अपने पड़ौसी केमिस्ट राज को डाक्टर का प्रेस्क्रिप्शन व्हाट्स एप्प पर भेजा और फोन किया। उसने तुरन्त मुझे गोलियाँ भिजवा दीं। इन में एक गोली एसिडिटी से बचाने को थी तो दूसरी खून का तनुकरण करने वाली। मैं ने डाक्टर की हिदायत के अनुसार तुरन्त ले ली। कुछ देर बाद मुझे अचानक याद आया कि दोपहर बाद जब हम गेहूँ को स्टोरेज में डाल रहे थे तो हरेक डिब्बे में एक-एक 10 ग्राम वाला सेल्फोस का पाउच डाला था। एक डिब्बे में गेहूँ का दूसरा कट्टा ठीक से खाली होने में समय लगा था। उस समय करीब आधा-पौन मिनट तक सल्फास की गंध नाक में चली गयी थी। यह बात मुझे तब तक याद ही नहीं आई थी। मैं डाक्टर को नहीं बता सका था। मैं ने गूगल किया तो पता लगा कि सल्फास से एक्सपोजर हो जाने पर मायोकार्डाइटिस (हृदय की पेशियों की सूजन) हो सकता है। मुझे एक्सपोजर अधिक नहीं हुआ था, लेकिन कुछ तो हुआ ही था,. मामूली असर तो हुआ ही होगा। 

रात को हलका भोजन, खिचड़ी खाई। दस बजे सोने गया तो फिर से बैचेनी महसूस हुई। छाती में रह रह कर हलका दर्द होने लगता था। कंधे और बाजू भी हलके दर्द कर रहे थे।, ऐसा लगता था जैसे उन की शक्ति का ह्रास हो गया हो। मैं निर्णय नहीं कर पा रहा था कि मुझे अस्पताल जाना चाहिए या रात घर पर ही निकाल देनी चाहिए। आखिर रात ग्यारह बजे बाद मैं ने केमिस्ट राज को फोन किया तो वह तुरन्त मेरे पास आया। मैं ने उसे बताया कि सल्फास एक्सपोजर हुआ था। उस के चेहरे पर मुस्कुराहट आई और कहा कि ऐसी कोई परेशानी वाली बात नहीं है। यदि दर्द बढ़े तो तुरन्त फोन करना मैं आ जाउंगा और किसी भी वक्त अस्पताल चल चलेंगे। 

मैं ने एक दर्द निवारक गोली और खाई और सो गया। रात दो बजे नीन्द खुली तो हालत वैसी ही थी। मैं पानी पी कर फिर सो गया। चार बजे फिर नीन्द खुल गयी और फिर दोबारा नहीं आयी। पाँच बजे मेरा वैसे ही उठने का समय होता है। मैं शयनकक्ष से हाल में आ गया और अपना कम्प्यूटर चालू कर अपना काम करने लगा। जिस से मेरा ध्यान मेरी बेचैनी से हट जाए। पाँच बजे शोभा भी उठ गयी। उसने मुझे कॉफी बना कर दी और उस के पहले खाली पेट खाने वाली गोली खाने को कहा। मैं ने शोभा के निर्देशों का अक्षरश अनुसरण किया। स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होते ही शोभा ने उपमा बना दिया। मैं ने कुछ खाया। फिर कुछ आलस आने लगे तो मैं जा कर लेट गया। मुझे झपकी लग गयी। कोई बीस मिनट बाद उठा तो लगा कि अब बैचेनी नहीं है, किसी तरह का कोई दर्द नहीं है। कंधों और बाजुओँ में फिर से जान आ गयी है। मुझे लगा क सल्फास का असर जा चुका है। 

हम कोटा हार्ट अस्पताल साढ़े आठ बजे पहुँच गये। पता लगा कि हम बहुत जल्दी आ गये हैं। इको करना तो दस बजे आरंभ होगा। हम वापस घर आ सकते थे पर हमने वहीं रुकना ठीक समझा। फीस जमा की, नम्बर लगाया और वेटिंग लाउंज में आ बैठे। ओपीडी मे सफाई की जा रही थी। हमारा नंबर सवा दस बजे आया। दो मिनट में इको कर लिया। टेक्नीशियन ने बताया कि सब कुछ नोर्मल है। बीस मिनट में उस ने रिपोर्ट भी पकड़ा दी। हम घर लौट आए। सब कुछ ठीक था पर रात नीन्द न निकली थी। इसलिए दोपहर का भोजन कर के मैं सोया। खूब अच्छी नीन्द आई। शाम की चाय के बाद डाक्टर को दिखा कर आया। उसे बताया कि क्या हुआ था। वह सुन कर मुस्कुराया फिर उस ने सल्फास खाने से मर गए एक मरीज का किस्सा सुनाया। मैं वापसी में दिनेश के सेंटर हो कर आया। उस ने रिपोर्ट पढ़ कर कहा आप की हार्ट हेल्थ बहुत अच्छी है, आप दो-चार साल हार्ट की तरफ से निश्चिंत रह सकते हैं। 

Thursday, February 21, 2019

बच्चा-ईश्वर का मनोरंजक खिलौना


बचपन में परिवार और समाज का वातावरण पूरी तरह भाववादी था। उस वातावरण में एक ईश्वर था जिस ने इस सारे जगत का निर्माण किया था। जैसे यह जगत जगत नहीं था बल्कि कोई खिलौना था जो किसी बच्चे ने अपने मनोरंजन के लिए बनाया हो। वह अपनी इच्छा से उसे तोड़ता-मरोड़ता, बनाता-बिगाड़ता रहता दुरुस्त करता रहता था। कभी जब उसे लगता कि अब यह खिलौना उस का मनोरंजन कतई नहीं कर सकेगा तो वह उसे पूरी तरह नष्ट कर देता था। उस खिलौने और उस के अवयवों की तो पूरी तरह प्रलय हो जाती थी। वह बच्चा (ईश्वर) फिर से एक नया खिलौना बनाता था जो नई सृष्टि होती थी। 

यह पूरा रूपक मेरे बाल मन को बिलकुल रुचिकर नहीं लगता था। मैं एक बच्चा उस स्वयंभू बच्चे के किसी एक खिलौना का बहुत ही उपेक्षित अवयव, एक स्क्रू, एक कील या सजावट का कोई सामान वगैरा में से कुछ होता था। मेरा बालमन कभी यह स्वीकार कर ही नहीं पाता था कि मैं उस खिलौने का अवयव हूँ। मेरा मन करता था कि इस खिलौने को मैं ही तोड़ फैंकूँ। पर कैसे? यह समझना चाहता था। 

बहुत जल्दी पढ़ने लगा था। घर में किताबें थीं, ज्यादातर धार्मिक। जब बच्चा जल्दी पढ़ना सीख लेता है तो वह दुनिया की हर वह इबारत बाँच लेना चाहता है जो वह बाँच सकता है। मेरा भी वैसा ही हाल हुआ। जेब खर्च की इकन्नी के दो पैसों के कड़के सेव और दो पैसों का कलाकंद लेता जिसे कन्दोई अखबार के टुकड़ों पर रख कर देता। उस जमाने का यह सब से अच्छा नाश्ता करते हुए मैं अखबार के उन टुकड़ों को बांचना कभी नहीं भूलता। वह आदत अभी तक भी है। जब कभी अखबार के टुकड़ों पर कैन्टीन वाला कोई चीज देता है तो अखबार का वह टुकड़ा पढ़े बिना अभी भी नहीं रहा जाता। 

जल्दी ही पहुँच धार्मिक पुस्तकों तक हुई। रामचरित मानस, भागवत, अठारह पुराण, दुर्गा शप्तशती बांच ली गयी। मनोरंजन के लिए बनाए गए खिलौने की थ्योरी सब जगह भरी पड़ी थी। पर कहीं से भी तार्किक नहीं थी और गले नहीं उतर रही थी, न उतरी। इस बीच बाइबिल का न्यू-टेस्टामेंट हत्थे चढ़ गया। वह उस से भी गया बीता निकला, जो पुराणों और उन दो महाकाव्यों में था। 

इन किताबों के अलावा जिस चीज ने सब से अधिक आकर्षित किया वह विज्ञान की पुस्तकें थीं। उन में सब कुछ तार्किक था। उन्हें समझने के लिए सीधे-सादे प्रयोग थे जो कबाड़ का उपयोग कर किए जा सकते थे। मंदिर में रहता था जिस में बहुत सारा पुराना कबाड़ था। बचपन से प्रयोग कर विज्ञान को परखने लगा। हर बार नया सीखता और उस में मजा भी बहुत आने लगा। उन प्रयोगों के बीच बहुत कुछ ऐसा भी था जिस से लोग अनभिज्ञ थे। हम सिद्धान्तों से अनजान लोगों को उन के बहाने बेवकूफ बना कर खुद को जादूगर और चमत्कारी सिद्ध कर सकते थे। पर अंदर की ईमानदारी वह नहीं करने देती थी। 

विज्ञान ने एक दिन मुझे डार्विन पढवाया, आनुवंशिकी बँचवाई। कोशिका विज्ञान पढ़वाया। तब यह सिद्ध हो गया कि यह दुनिया किसी बच्चानुमा ईश्वर का मनोरंजन के लिए बनाया खिलौना नहीं है। बल्कि एक बहुत बड़ा सिस्टम है जो अपने नियमों से चल रहा है। मैं फिर भी संशयवादी बना रहा। जितना बाँचता गया, जितना जानता गया। नए नए सवाल सामने आते गए। उन्हें तलाशता तो और नए सवाल आ खड़े होते। ऐसे सवाल जो उन लोगों के लिए बहुत अनजान थे, उन की समझ से बिलकुल परे जो लोग अभी तक उस बच्चा ईश्वर के मनोरंजक खिलौने में उलझे पड़े थे। उन की दुनिया के सारे झंझट, सारे संशय वहीं खत्म हो चुके थे, जहाँ उन्हों ने खुद को उस खिलौने का एक अवयव, एक स्क्रू, एक कील या सजावट का कोई सामान समझ लिया था। 

- दिनेशराय द्विवेदी

Friday, January 11, 2019

मुलाकात गोर्की के आधुनिक पात्र से ...


दिसंबर के आखिरी सप्ताह अवकाश का होता है, मन यह रहता है कि इस सप्ताह कम से कम पाँच दिन बाहर अपनी उत्तमार्ध शोभा के साथ यात्रा पर रहा जाए। इस बार भी ऐसा ही सोचा हुआ था। लेकिन संभव नहीं हुआ। केवल एक दिन के लिए अपने शहर से महज 100 किलोमीटर दूर रामगढ़ क्रेटर की यात्रा हुई। यात्रा के मुख्य आकर्षण रामगढ़ क्रेटर के बारे में बाद में फुरसत में बताता हूँ। फिलहाल यात्रा के अंत में हुई एक विचित्र व्यक्ति से मुलाकात के बारे में बताता हूँ। 

रामगढ़ पहुंचते पर जैसे हम कार से उतरे उस का एक टायर पंक्चर दिखा। वैसे इस की हवा कोई आधा किलोमीटर पहले ही निकली होगी। हमारे पास स्टेपनी थी इस कारण हम कार को वैसे ही खड़ा कर क्रेटर की सब से ऊँची पहाड़ी पर चढ़ने को चल दिए। वापसी में टायर बदला और चल दिए। घूमते हुए जब रात होने के आसार नजर आने लगे तो हम वापस रवाना हो गए। रात एक मित्र के फार्म हाउस पर गुजारी। सुबह वहाँ से रवाना हुए तो सोचा जहाँ भी साधन सब से पहले मिलेगा वहीं हम रुक कर टायर पंक्चर बनवा लेंगे। आखिर एक चौराहे पर हमें टायर पंक्चर का साधन मिल गया। 

हमने पंक्चर बनाने वाले से बात की तो उस ने स्टेपनी निकाल कर पंक्चर सुधारने का काम शुरू कर दिया। चौराहे पर लोगों का मजमा लगा था। लोग स्वागत द्वार बनाने में लगे थे। पता लगा प्रदेश में नयी सरकार में मंत्री बने स्थानीय विधायक मंत्री पद की शपथ लेने के बाद पहली बार आ रहे हैं। उसी मजमें में एक व्यक्ति साफा बांधे नए कपड़े जूतियाँ धारण किए सड़क पर चहल कदमी कर रहा था। किसी को भी कुछ कह कर लोगों को आकर्षित कर रहा था। उस ने हाथ में एक मूली व गाजर जो पत्तों सहित थीं पकड़ी हुई थीं। किसी ने उस से पूछा कि मिनिस्टर साहब कितने बजे तक आएंगे? उस ने कहा शाम तक तो आ ही जाएंगे। फिर तुरंत ही दाहिने हाथ में पकड़ी मूली और गाजर को अपने कान के इस तरह लगाया जैसे वह मोबाइल फोन हो, बात करने लगा। 

कान के लगाने के बाद, कुछ देर बाद बोला अच्छा मिनिस्टर साहब के पीए बोल रहे हो। उन से बोल देना मैं फँला बोल रहा हूँ। ये बताओ मिनिस्टर साहब कहाँ तक पहुँचे? और फलाँ चौराहे पर कितने बजे तक पहुँच जाएंगे? उस ने थोड़ी देर और फोन पर बात करने की एक्टिंग की और बताने लगा कि अभी तो वे कोटा तक ही नहीं पहुंचे हैं, यहाँ तक पहुँचने में उन्हें दो-तीन बज जाएंगे। 

कुछ देर बाद वह मेरे पास आ गया। कहने लगा बाबू साहेब कहाँ से आ रहे हो? गाड़ी पंक्चर हो गयी दिखती है। बच्चा अच्छा पंक्चर बनाएगा कई दिन तक हवा भी नहीं निकलेगी टायर की। इस के बाद वह एक बैंच पर बैठ गया। 

तब तक मेरे टायर का पंक्चर लगभग बन गया था। मैं पंक्चर बनाने वाले के पास गया। वह ट्यूब को टायर में डाल रहा था। मैं ने उससे गाजर मूली के टेलीफोन वाले बंदे के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि यह आदमी पास के गाँव में कुछ महीनों से आकर रहने लगा है। वहाँ के किसी किसान का रिश्तेदार है। इस का बाप अपने गाँव में काफी बड़ी जमीन छोड़ गया है। लेकिन भाइयों ने सारी जमीन पर कब्जा कर के इसे घर से निकाल दिया है। अब इसी तरह अर्ध पागल की तरह अजीब अजीब सी हरकतें करते हुए घूमता रहता है। इस चुनाव में मिनिस्टर बने नेताजी का अपने पागलपन से ही खूब प्रचार करता रहा और मिनिस्टर साहब से खूब अच्छी जानपहचान बढ़ा ली है। वे भी मजा लेने के लिए इस से खूब मजाक करते रहते हैं। 

पंक्चर सुधारने वाले ने स्टेपनी तैयार कर के कार में रख दी थी। मैं उसे मजदूरी देकर वहाँ से रवाना हुआ। लेकिन सारे रास्ते उस गाजर-मूसी के मोबाइल फोन वाले के बारे में सोचता रहा। मुझे गोर्की के उन विक्षिप्त पात्रों की याद आई, जो अच्छी खासी धन दौलत और संपत्ति के स्वामी होते हुए भी इस कारण जानबूझ कर विक्षिप्त बने घूमते थे जिस से अपनी संपत्ति को बचा सकें या वापस प्राप्त कर सकें।