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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

संकल्प

देहरी के पार, कड़ी - 8 

शनिवार का अवकाश फ्लैट की सफाई और नए लाए गए सामानों को सही स्थान देने में पूरा हुआ. अब वह अपना खाना, नाश्ता, चाय, कॉफी आदि फ्लैट में बना सकती थी. कोई मिलने आए तो उससे हॉल में मिल सकती थी. दिन भर के काम ने उसे थका दिया था. थोड़ी देर के लिए वह बिस्तर पर लेटी तो उसे नींद लग गई. नींद टूटी तो आठ बजे थे. उसने बिस्तर से उठने की कोशिश की, लेकिन शरीर की ज्यादातर मांसपेशियाँ दर्द से चीख रही थीं. बहुत दिनों बाद इतना शारीरिक काम किया था, तो यह स्वाभाविक था. उसने अपने मेडिसिन बॉक्स से पैरासिटामोल की गोली निकाली और पानी के साथ गटक ली. एक कड़क ब्लैक कॉफी बना कर पीने बैठी. उसे लगा कि आज किचन तैयार हो जाने पर भी खाना बनाना संभव नहीं, उसने ऑर्डर कर दिया. उसे ध्यान आया कि मम्मी से बात करना था. कॉफी का खाली मग सिंक में पहुँचाने के बाद उसने मम्मी को फोन लगाया. बातचीत के शुरुआती औपचारिक वाक्यों के बाद ही मम्मी सिसक पड़ी. उनकी सिसकियाँ थमने के बाद बात आरंभ हो सकी.

"बेटा, तेरे पापा बहुत पछताते हैं," माँ ने धीमी आवाज़ में कहा. "अक्सर तेरी तस्वीरें देखते रहते हैं. पर जैसे ही विक्रांत का फोन आता है या अखबार में कोई खबर पढ़ते हैं, उनकी आँखों में खून उतर आता है. उन्हें लगता है कि उनकी उम्रभर की सामाजिक और व्यापारिक प्रतिष्ठा तूने मिट्टी में मिला दी है. विक्रांत उन्हें बार-बार उकसाता है कि लड़की हाथ से निकल गई तो समाज थूकेगा. तब वे अपना पछतावा भूलकर तुझे ही अपराधी मानकर कोसने लगते हैं."

प्रिया को अहसास हुआ कि उसके पिता एक ऐसे द्वंद्व में हैं जहाँ कोई बाहर वाला उनका दुश्मन नहीं, बल्कि उनका अपना 'अहंकार' और 'सामाजिक भय' है. वह समझ गई कि अभी पिता का समर्थन तो दूर, बल्कि मामूली सहानुभूति की उम्मीद करना व्यर्थ है.

सोमवार सुबह की चाय पीते हुए प्रिया ने अपने ऑफिस का व्हाट्सएप ग्रुप देखा, वहाँ सन्नाटा पसरा था. लेकिन व्यक्तिगत संदेशों की भरमार थी, जिनमें एक लिंक शेयर किया गया था. लिंक खोला तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. विक्रांत ने उसके सोशल मीडिया अकाउंटों से उसकी तस्वीरें चोरी कर उसके नाम से एक 'फेक प्रोफाइल' बना ली थी. उन तस्वीरों को भद्दे तरीके से एडिट किया गया था और नीचे उसके मुम्बई के ऑफिस का पता लिखा था. कैप्शन था, "शादी से भागकर मुंबई में आजाद घूमने वाली कन्या की हकीकत."

उसका दिल धक से रह गया. यह सीधे-सीधे उसके चरित्र पर हमला था. एक पल के लिए प्रिया को लगा कि वह फिर से उसे उसी अंधेरी कोठरी में धकेल देने की तैयारी है, जहाँ से वह भागी थी. आज जब वह ऑफिस जाएगी तो सबकी नजरें उससे सवाल पूछ रही होंगी. वह क्या जवाब देगी? सवाल पूछती इन नजरों से बिंधती हुई, वह कैसे काम कर सकेगी और करवा सकेगी? वह अपना सुबह का नाश्ता तक नहीं बना सकी, लंच के लिए टिफिन तैयार करना तो दूर की बात थी. उसे कुछ नहीं समझ आया. वह तैयार हो कर सीधे रामजी के मेवाड़ भोजनालय पहुँच गयी.

जैसे ही प्रिया ने भोजनालय में प्रवेश किया. रामजी ने उसे देखते ही जान लिया कि बिटिया तकलीफ में है. वे उठे और भोजनालय के आखिरी कोने की टेबल पर उसे बिठाकर खुद भी सामने की कुर्सी पर बैठ गए. उसके लिए पानी मंगा कर पिलाया, फिर पूछा, उसे क्या तकलीफ है. प्रिया ने बताने के लिए मुहँ खोला, लेकिन बजाए बोल के उसकी रुलाई फूट पड़ी. रामजी ने उसे ढाढ़स बंधाया, तब वह बता सकी कि बात क्या है.

प्रिया की बात सुनते हुए रामजी के चेहरे का रंग बदलता रहा. बात पूरी होने तक उनका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था. पर उन्होंने संयम रखा. रामजी ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा,"पगली, रोती क्यों है? यह दुनिया गंदी है, पर तू साफ़ है. तू चंबल की बेटी है, तुझे डरने की जरूरत नहीं. फिर रामजी का हाथ तेरे सिर पर है."

रामजी के निस्वार्थ, वात्सल्यपूर्ण और बिना शर्त स्नेह में उसे पुराने बरगद की छाँव महसूस हुई. उसका मन शांत हुआ तो रामजी कहने लगे, “बिटिया, तुमने सुबह से कुछ खाया भी नहीं होगा. मैं नाश्ता भेजता हूँ, कुछ पेट में जाएगा तो कोई हल सूझेगा.” इतना कह कर वे काउंटर की तरफ बढ़ गए.

तभी उसके फोन की घंटी बजी. आकाश का कॉल था. उसने भी वह 'फेक आईडी' देख ली थी. उसका बहुत ही शांत स्वरों में उसने बात शुरू की. "प्रिया, सुनो. पैनिक मत हो. मैंने और पापा ने जयपुर के साइबर सेल में लिखित शिकायत दर्ज करा दी है. वहां के अधिकारियों से भी बात की है. मैंने अपनी कंपनी के आईटी एक्सपर्ट भी लगा दिए हैं ताकि उस आईडी को तुरंत 'टेक डाउन' कराया जा सके. तुम मुंबई पुलिस स्टेशन जाओ और एफआईआर दर्ज कराओ. विक्रांत डरा हुआ है, इसलिए वह ओछी हरकतों पर उतर आया है. तुम बिल्कुल, घबराना नहीं. ये विक्रांत की हार की निशानी है."

आकाश और उसके परिवार का व्यवहार उसे सिर्फ छाँह ही नहीं, बल्कि उसे लड़ने के लिए ढाल-तलवार और हिम्मत भी दे रहा था.

प्रिया ने रामजी और आकाश के प्रेम को महसूस किया. जहाँ एक उसे सुरक्षा का अहसास देता था, दूसरा उसे सशक्त बनाता था. उसने अपनी आँखों के आंसू पोंछे. उसने तय किया कि वह न तो पिता के पछतावे के जाल में फंसेगी और न ही विक्रांत के इस 'साइबर आतंक' से डरेगी. नाश्ता करके उसने टिफिन लिया और ऑफिस के लिए चल दी.

ऑफिस से घर लौटी तो रात के साढ़े आठ बज रहे थे. उसने अपने कपड़े बदले, फिर आईने में खुद को देखा. अपने ही प्रतिबिंब को निहारते हुए बुदबुदाई, "विक्रांत, तू मेरी तस्वीरें चुरा सकता है, मेरा अक्स नहीं. मैं कोई वस्तु नहीं, जीती जागती इंसान हूँ, मैं किसी की 'अमानत' नहीं हो सकती. मैं 'प्रिया' हूँ." उसने लैपटॉप चालू किया, साइबर सेल की वेबसाइट पर अपनी शिकायत तैयार करके अपलोड की और फिर एक गहरी नींद सोने चली गई. उसे पता था कि कल की सुबह और भी कठिन होगी, पर वह अब अकेली नहीं थी.
... क्रमशः

गुरुवार, 26 मार्च 2026

परछाइयाँ

देहरी के पार कड़ी - 7

फ्लैट में शिफ्ट होने के दिन प्रिया ने केवल चाय-कॉफी बनाने के लिए सामान लिया था. शनिवार सुबह चाय पीकर वह सामानों की लिस्ट बनाने बैठी, सुबह के नाश्ते के लिए उसने इडली-सांभर फ्लैट पर ही मंगा लिए. नाश्ता करके ग्यारह बजे सामान लेने निकली. सामान लेते-लेते उसे ढाई बाजार में ही बज गए. उसे वहाँ मेवाड़ वैष्णव भोजनालय दिखा. उसे भूख लगी थी, वह अंदर जा बैठी. लड़का पानी का जग और गिलास रखकर जाने लगा तो उसने पूछ लिया, “भोजनालय किसका है?”


“रामजी का है, वे रहे.” लड़के ने इशारे से बताया.

दुकान के सड़क की ओर एक चूल्हा था, दीवार की ओर सब्जियों के बड़े पतीले रखे थे, दीवार के विपरीत जहाँ दुकान में प्रवेश-निकास स्थान था वहीं काउंटर था. वहाँ पचास-पचपन की उम्र का व्यक्ति कमीज पाजामा पहने कंधे पर गुलाबी गमछा डाले सब्जी छौंक रहा था, वही कुछ देर पहले काउंटर पर ग्राहक से बिल का भुगतान ले रहा था. भोजनालय राजस्थान के ढाबों की तरह था. राजस्थानी थाली उपलब्ध थी, उसने वही मंगा ली. फ्राइड भिंडी और बेसन गट्टे की सब्जियाँ थीं, चावल, छाछ का रायता और बढ़िया फूली हुई गर्म चपातियाँ. लड़के ने बताया कि संडे को दाल-बाटी-चूरमा भी बनता है. प्रिया को अपने देस का स्वाद मिला. पेट तो भरा ही, मन भी तृप्त हो गया. काउंटर पर बिल देने आई तो उसने रामजी से पूछ लिया, “वे मेवाड़ में कहाँ से हैं?” रामजी ने बताया कि “वे भैंसरोड़गढ़ से हैं, भोजनालय की इमारत भी वहीं के एक सेठजी की है, उन्होंने मामूली किराए पर दे रखी है.”

जब प्रिया ने बताया कि वह कोटा से है तो कहने लगे, “बिटिया आप तो हमारी भतीजी हुई, कोटा और हमारा गाँव दोनों चम्बल किनारे हैं, बस पचास किलोमीटर की दूरी है.” उन्होंने थाली के पैसे लेने से भी इन्कार कर दिया. “आज पैसे नहीं लूंगा, फिर कभी आओगी तब देखूंगा.” रामजी ने खुद को प्रिया का चाचा घोषित कर दिया. कहने लगे, “बिटिया आते रहना अच्छा लगेगा.” रामजी ने उससे पैसे नहीं ही लिए. इतनी दूर ऐसा अपनापन देख उसकी आँखें नम हो गईं.

ऑफिस में प्रिया को एक महत्वपूर्ण इंटरनेशनल प्रोजेक्ट का 'लीड' बनाया गया था. जिम्मेदारी और काम का बोझ दोनों बढ़ गए. वह सुबह ग्यारह बजे ऑफिस पहुँचती, वापस लौटने में रात के आठ-नौ बज जाते हैं. एक शाम जब वह गोरेगाँव स्टेशन से पैदल अपने फ्लैट की ओर बढ़ रही थी, उसे अहसास हुआ कि कोई उसका पीछा कर रहा है. वह रुकी, पीछे मुड़कर देखा, लेकिन पीछे केवल मुंबई की कभी न खत्म होने वाली लोगों की भीड़ थी.

घर पहुँचकर उसने दरवाजा बंद किया और हमेशा की तरह अपने बैग को टेबल पर रख उसने खुद को बिस्तर पर गिरा लिया. तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन चमका. एक 'फेक' इंस्टाग्राम आईडी से उसे उसकी ही एक धुंधली तस्वीर भेजी गई थी, जो शायद स्टेशन के बाहर ली गई थी. नीचे संदेश था— "मुम्बई की भीड़ में छिपना आसान तो है, प्रिया. पर फिर भी हकदार अपनी ‘अमानत’ तलाश कर ही लेते हैं." प्रिया के हाथ कांपने लगे. यह विक्रांत के सिवा कोई नहीं था. वह यहाँ तक पहुँच चुका था या उसका कोई गुर्गा उस पर नजर रख रहा था.

उसी रात उसके भाई मयंक का फोन आया. मयंक ने अपनी आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन रखा था. "दीदी, पापा की तबीयत कल रात फिर बिगड़ गई थी. डॉक्टर कह रहे हैं कि यह ब्लड प्रेशर नहीं, मानसिक तनाव है. वे किसी से बात नहीं करते, बस खिड़की के बाहर देखते रहते हैं. विक्रांत भी अक्सर उन्हें फोन करता रहता है. क्या तेरा स्वाभिमान उनके जीवन से बड़ा है?"

प्रिया समझती थी कि यह 'इमोशनल ब्लैकमेल' का पुराना तरीका है, लेकिन फिर भी एक टीस उठी. क्या वह वाकई अपने पिता की बीमारी का कारण है? या पिता अपनी बीमारी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं? उसने इतना ही कहा, “मैं प्रोजेक्ट में व्यस्त हूँ, तुरंत नहीं आ सकती”, और फोन काट दिया. वह उस रात सो नहीं सकी. उसे 'मोहन विला' याद आ रहा था जहाँ वह बचपन में खेलती थी.

आखिर अगले दिन उसने आकाश को फोन किया. आकाश ने शांति से उसकी पूरी बात सुनी—विक्रांत की फोटो वाली बात भी और भाई के संदेश वाली भी.

​"प्रिया, विक्रांत वही कर रहा है जो एक हारा हुआ इंसान करता है. वह तुम्हें कमजोर करना चाहता है. तुम्हारे पिता की अस्थिरता का कारण तुम्हारा फैसला नहीं, बल्कि समाज का दबाव है जिसे विक्रांत हवा दे रहा है. तुम बस अपने काम पर ध्यान दो. जयपुर से मैं और मेरा परिवार तुम्हारे साथ हैं. अगर ज़रूरत पड़ी, तो मैं खुद कोटा जाकर तुम्हारे भाई और पापा से मिलूँगा. तुम अकेली नहीं हो."

​आकाश की इन बातों ने प्रिया के भीतर की दरारों को जैसे भर दिया. उसे अहसास हुआ कि जहाँ एक तरफ विक्रांत उसे नीचे खींचने की फिराक में है, वहीं दूसरी तरफ एक ऐसा परिवार भी है जो हर पल उसके साथ खड़ा दिखाई देता है.

उसने तय किया कि वह डरेगी नहीं. अगले दिन उसने ऑफिस की आईटी सिक्योरिटी टीम को उस 'फेक आईडी' रिपोर्ट की और पुलिस को ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई.

शनिवार सुबह, प्रिया ने अपने फ्लैट की खिड़की से आरे कॉलोनी के पेड़ों को देखा. उसने खुद से कहा, "यह घर छोटा है, अकेलापन भी है, और डर भी. लेकिन यहाँ मैं 'प्रिया' हूँ, किसी की 'अमानत' नहीं." अलमारी में उसे अपनी माँ की दी हुई एक पुरानी साड़ी दिखी. उसे याद आया कि माँ हमेशा उसके साथ है. उसने तय किया कि वह आज शाम माँ से बात करेगी.
... क्रमशः

 

मंगलवार, 24 मार्च 2026

कंक्रीट का जंगल

देहरी के पार कड़ी - 6
ड्यूटी से ऑफ होकर प्रिया गेस्ट हाउस पहुँची तब 9 बजे थे. सुबह 5 बजे सोकर उठने के बाद से अभी तक वह चल ही रही थी., आकाश के घर से शुरू करके उसने आज कितने सफर कर लिए थे? कार, प्लेन, टैक्सी, टैक्सी और टैक्सी. गेस्ट हाउस के अपने कमरे में पहुँचते ही उसने पर्स को बेड पर एक ओर फैंका और अपने शरीर को भी उसी बेड पर पटक दिया. कुछ देर आँखें मूंदे पड़ी रही. वह अपने पिछले और आने वाले जीवन के बारे में सोचना चाहती थी, लेकिन दिमाग साथ नहीं दे रहा था. उसे लगा कि यदि कुछ देर और ऐसे ही बिस्तर पर पड़ी रही तो उसे नींद आ जाएगी. फिर दो-तीन घंटे बाद खुलेगी और उसे जोर की भूख लगेगी. तब कुछ खाने को नहीं होगा. वह घर में तो थी नहीं कि किचन में जाकर कुछ बना ले. फिर सारी रात सो न सकेगी और कल दिन भर उबासियाँ लेती रहेगी. उसे याद आया सुबह प्लेन में नाश्ता किया था उसके बाद तीसरे पहर चाय के साथ कुछ बिस्कुट, लंच पूरी तरह स्किप हो गया था. अचानक उसे बहुत तेज भूख का अहसास हुआ. उसने इंटरकॉम पर रूम सर्विस का नंबर डायल किया और उठाने पर पूछा कि क्या गेस्ट हाउस में खाने की व्यवस्था है, और क्या खाना उसके रूम में भेजा जा सकता है?

“हाँ, मैम खाना आपके रूम पर पहुँच जाएगा, आप ऑर्डर कर दें.” सर्विस काउंटर से उसे उत्तर मिला तो वह खुश हो गयी. उसने दाल, चपाती, चावल और दही ऑर्डर किया और फ्रेश होने के लिए बाथरूम में घुस गई.

खाना खाने के बाद सो जाना ठीक न समझकर वह कुर्सी लेकर रूम की बालकनी में आ बैठी. वहाँ से दिख रही मुंबई की रोशनियाँ जितनी सम्मोहक थीं, उतनी ही पराई भी. तभी उसे ध्यान आया कि आज का दिन जाया हो गया है. उसे गेस्ट हाउस केवल सात दिन उपलब्ध था. इस तरह तो ये दिन रेत की तरह फिसल जाएंगे. उसे कल से ही इस 'कंक्रीट के जंगल' में अपने लिए एक कोना तलाशना होगा.

मुंबई में घर ढूँढना किसी हिमालय चढ़ने जैसा था. ऑफिस के सहकर्मियों ने उसे अंधेरी या मलाड में जगह देखने की सलाह दी. ब्रोकर उसे माचिस की डिबिया जैसा कमरा दिखाता, जिसका किराया किसी महल की याद दिलाता है. "मैडम, सिंगल वर्किंग वूमन? एनओसी (NOC) लगेगी, पुलिस वेरिफिकेशन होगा और हाँ, रात को 10 बजे के बाद एंट्री नहीं." एक अधेड़ उम्र के ब्रोकर ने अपनी शर्तें गिनाईं. प्रिया को हैरत हुई कि मुम्बई की आधुनिकता की परतों के नीचे भी पितृसत्ता की बेड़ियाँ पैर जमाए हुए थीं. अंत में, अंधेरी ईस्ट की एक बिल्डिंग के सातवें माले पर उसे एक छोटा सा 1BHK फ्लैट मिला. खिड़की से किसी पार्क के पेड़ दिखते थे, जो उसे कोटा की याद दिलाते. उसने भारी मन से तीन महीने का डिपॉजिट और एक माह का रेंट ब्रोकरेज में दिया. यह घर 'मोहन विला' के हॉल जितना भी नहीं था, पर यहाँ की चाबी सिर्फ उसके पास थी.

शुक्रवार की शाम घर शिफ्ट किया. रात का खाना उसने जोमैटो के जरिए ऑर्डर कर दिया. खाने का इंतजार करते हुए प्रिया ने हिम्मत जुटाकर माँ का नंबर लगाया. पहली बार में किसी ने नहीं उठाया. दुबारा किया तो दूसरी ओर से माँ का स्वर सुनाई दिया, “कौन?”

“मम्मी, मैं प्रिया.”

"प्रिया? बेटा, तू ठीक है न? तूने एक बार भी माँ की सुध नहीं ली." उसका नाम लेते ही माँ का स्वर रुंधने लगा था.

माँ ने बताया कि पापा अब ज़्यादातर चुप रहते हैं और उन्होंने विक्रांत के परिवार से सारे रिश्ते तोड़ लिए हैं. लेकिन प्रिया के मन में एक गहरा संशय बैठा था. क्या पिता वाकई बदल गए हैं? या यह उसे वापस बुलाने की कोई नई भावनात्मक चाल है? माँ ने कहा, "तेरे पापा कहते हैं कि जो हुआ सो हुआ, अब वह तुझे अपनी मर्ज़ी से जीने देंगे." प्रिया ने शांत स्वर में जवाब दिया, "माँ, पापा की इस 'मर्ज़ी' की मैंने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है. उन्हें कहना कि अभी मुझे समय चाहिए." उसे डर था कि कहीं यह नरमी केवल उसे वापस बुलाकर फिर से किसी और 'समझौते' में बाँधने की भूमिका तो नहीं?

ऑफिस में काम का बोझ प्रिया को व्यस्त रखने लगा था, पर 'विक्रांत' का डर उसके अवचेतन में घर कर गया था. उसे रह-रहकर उसकी वह आवाज़ गूँजती—"वह उसे देख लेगा." उसने ऑफिस की सिक्योरिटी को साफ़ निर्देश दिए थे कि कोई भी अजनबी बिना अपॉइंटमेंट के अंदर न आए. शाम को जब वह लोकल ट्रेन से उतरकर अपने फ्लैट की ओर बढ़ती, तो उसे लगता, जैसे कोई पीछे चल रहा है. वह अपनी सोशल मीडिया प्राइवेसी को बार-बार चेक करती. वह जानती थी कि विक्रांत जैसे अहंकारी लोग इतनी आसानी से हार नहीं मानते.

फ्लैट फर्निश्ड था लेकिन कुछ ज़रूरी बर्तन, बेड के लिए चादर, तकिए के गिलाफ और कुछ किराना के सामान वह ले आई थी. पहली रात उसने खुद के लिए चाय बनाई. वह सोच रही थी कि उसे अपनी जरूरतों के लिए जो सामान चाहिए, सुबह उनकी लिस्ट बनानी पड़ेगी. जिससे सप्ताहांत के इन दो दिनों में सारा जरूरी सामान खरीद ले. उसने सोने की कोशिश की लेकिन सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही सांसें सुनाई दे रही थीं. उसने उठकर खिड़की से बाहर देखा, जहाँ मुम्बई कभी नहीं सोती. उसे समझ आया कि आज़ादी की सबसे बड़ी चुनौती 'अकेलापन' है. तभी फोन पर आकाश का मैसेज चमका— "फ्लैट कैसा है? तान्या कह रही है कि अब वह अपनी छुट्टियाँ मुम्बई में दीदी के साथ ही बिताएगी."

मैसेज पढ़कर प्रिया के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई. उसने महसूस किया कि वह एक साथ दो लड़ाइयाँ लड़ रही है—एक बाहर की दुनिया से और दूसरी अपने ही परिवार के प्रति उपजे उस 'अविश्वास' से, जो उसे अपनी ही जड़ों से दूर कर रहा था.
... क्रमशः

सोमवार, 23 मार्च 2026

नई सुबह

देहरी के पार कड़ी - 5:
विक्रांत और उसके साथियों को थाने ले जाने के बाद सभी ड्राइंगरूम आ गए. घर में जो तनाव रात विक्रांत का फोन सुनने के बाद पैदा हुआ था, उससे मुक्ति मिली. सबने सुकून की साँस ली. सब उसी घटना पर बातें करने लगे. तान्या ट्रे में पानी के गिलास लेकर आई, तो सबने महसूस किया कि उन्हें प्यास लगी है, सबने पानी पिया. आकाश ने पूछ लिया, “तान्या, तुमने कैसे जाना कि सबको पानी की जरूरत है?”

“बिलकुल सीधी-सिंपल बात है, पुलिस जाने के बाद मुझे प्यास लगी. . मैंने किचन जाकर पानी पिया. तभी मुझे लगा कि सभी को प्यास लगी होगी, तो मैं पानी ले आई.”

“बस?” आकाश ने कहा.

“अब इसमें बस का क्या?” तान्या ने आकाश की ओर मुहँ बनाते हुए पूछा?”

“घड़ी देख, चार बज गए हैं. चाय का टाइम हो गया है. सबको चाय भी तो चाहिए.”

आकाश की इस बात पर तान्या ने एकदम जीभ बाहर निकाली और अपने ही दाँतों से दबाकर दिखाने लगी.

तभी श्रीमती मल्होत्रा खड़ी हुईं. “तू यहीं बैठ तान्या, मैं चाय बनाकर लाती हूँ” इतना कहकर वे रसोई की ओर चल दीं.

आकाश ने फिर तान्या को चिढ़ाकर कहा, “मुझे तो पहले ही पता था कि चाय मम्मी ही बनाएंगी.”

“वो कैसे?” प्रिया ने आकाश से पूछा.

“मम्मी को खुद और पापा के सिवा किसी और के हाथ की बनी चाय पसंद नहीं. तो सिंपल है, वही बनाएंगी.”

थोड़ी देर में चाय आ गई, साथ में कुछ नमकीन और बिस्कुट भी थे. सब देर तक बातें करते रहे.

शान्ति के बावजूद प्रिया जानती थी कि यह एक पड़ाव मात्र है, मंजिल अभी दूर है. आकाश जब उसके लैपटॉप के लिए प्रिया के घर गया था, तब उसे अपने पिता को अपना नंबर देना पड़ा था. वे लगातार आकाश के फोन पर कॉल किए जा रहे थे. आकाश उनका फोन ले ही नहीं रहा था. अब जैसे विक्रांत ने मल्होत्राजी का पता जाना, वैसे उसके पिता भी जान सकते थे. विक्रांत ही कोटा पहुँचकर बता सकता था. प्रिया को आशंका हो गई थी कि उसके पिता कभी भी वहाँ आ सकते हैं. रात के खाने पर प्रिया ने मल्होत्राजी को अपनी आशंका बता दी.

मल्होत्राजी ने उसे तसल्ली दी, वे आएंगे तो उनसे मैं बात कर लूंगा. कोई दिक्कत नहीं होगी.

सोमवार सुबह प्रिया ने लॉग इन किया और काम करने लगी. दोपहर 1 बजे प्रिया के मैनेजर का फोन आया. "प्रिया, तुम्हारी सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है. कंपनी ने तुम्हारा ट्रांसफर मुम्बई हेड ऑफिस कर दिया है. कल सुबह की फ्लाइट की टिकट तुम्हारे ईमेल पर भेज दी है. कंपनी गेस्ट हाउस में एक हफ्ते के लिए तुम्हारे रुकने की व्यवस्था कर दी है. अब कल फ्लाइट पकड़ कर तुम मुम्बई पहुँचो."

रात नौ बजे डाइनिंग पर यही चर्चा थी कि प्रिया की सुबह 8 बजे की फ्लाइट है, उसे छह बजे तक एयरपोर्ट पहुँचना होगा. एयरपोर्ट पहुँचने में आधा घंटा लगेगा, तो सुबह साढ़े पाँच से पहले उसे निकलना होगा. वह अपनी तैयारी अभी पूरी कर ले. यह तय हुआ कि सुबह आकाश उसे छोड़ने एयरपोर्ट जाएगा. तभी तान्या कहने लगी, “मैं भी दीदी को छोड़ने सुबह एयरपोर्ट चलूंगी.”

“तू बड़ी कब होगी, तान्या?” आकाश ने हमेशा की तरह उसे चिढ़ाने के स्वर में कहा.”

“मैं बड़ी ही हूँ भैया. बस आप ही बड़े नहीं हुए. हर दम मुझे चिढ़ाते रहते हो.” तान्या जवाब दिया और उठ कर चल दी.

मंगलवार सुबह तान्या और आकाश प्रिया को छोड़ने जयपुर एयरपोर्ट पर आए. प्रिया के बोर्डिंग के लिए चले जाने के बाद भी उन्होंने एयरपोर्ट न छोड़ा. जब जहाज टेक ऑफ कर आकाश में पहुँच गया तभी वे रवाना हुए.

तीन घंटे बाद, मुम्बई की नम हवाओं ने प्रिया का स्वागत किया. यहाँ कोई उसे 'गुप्ता जी की बेटी' या 'विक्रांत की अमानत' के रूप में नहीं जानता था. यहाँ वह केवल प्रिया थी, एक ‘सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर’. प्लेन से बाहर आते ही उसने आकाश को सूचित किया कि उसकी फ्लाइट उतर गई है. कंपनी गेस्ट हाउस में सामान रखा, फ्रेश हुई और ऑफिस पहुँची.

उसने दो बजे जॉइनिंग दी. उसे काम करने के लिए स्थान आवंटित कर दिया गया था. मैनेजर ने उसे टीम के सभी इंजीनियरों से मिलवाया और जाते हुए कहा, सबको जान लो और चाहो तो गेस्ट हाउस जाकर आराम करो. कल से समय पर काम पर आना होगा.

रात आठ बजे आकाश का फोन आया. उसने बताया कि “सुबह 11 बजे तुम्हारे पिता और भाई उनके घर पहुँच गए थे. पापा ने उन्हें बड़े प्रेम से ड्राइंग रूम में बिठाया, उन्हें चाय पिलाई और दोपहर के खाने के लिए पूछा. कुछ हुआ, उसके लिए वे खुद को शर्मिंदा महसूस कर रहे थे. बता रहे थे, तुमने तो उन्हें बता दिया था कि तुम अभी शादी नहीं करना चाहती. लेकिन वे ही पीछे लगे रहे. सोचा था एक बार शादी हो जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा. विक्रांत के परिवार का अच्छा बिजनेस है और विक्रांत ने उसे बढ़ाया भी है. लेकिन जिस तरह वह जयपुर पहुँचा और अपने व्यवहार के कारण शांति भंग में गिरफ्तार होकर रात भर हवालात में रहा, उससे उसके बारे में उनका भ्रम टूट गया है. जमानत पर छूटकर आधी रात को कोटा पहुँचने के बाद उसने ही बताया कि तुम कहाँ हो. वे तुमसे माफी मांगने और विक्रांत की ओर से सावधान करने ही यहाँ आए हैं. जाते हुए कह कर गए हैं कि प्रिया को कहना कि वह अपनी माँ से बात जरूर कर ले.”

प्रिया को यकायक विश्वास नहीं हुआ. फिर भी उसने मन ही मन तय कर लिया कि अभी नहीं, लेकिन सप्ताह भर बाद जब वह फ्लैट में शिफ्ट हो जाएगी, तब मम्मी को फोन अवश्य करेगी और सब कुछ सही लगा तो पापा से भी बात करेगी.
... क्रमशः


रविवार, 22 मार्च 2026

कवच

 देहरी के पार कड़ी - 4:

उस डरावनी धमकी के बाद कोशिश करके भी प्रिया सो नहीं सकी. उसकी रात करवटें बदलते ही गुजरी. तान्या के कमरे की खिड़की से उसे जयपुर की सड़कें शांत नजर आ रही थीं, बस कभी कोई वाहन सड़क से गुजर जाता. उसके मन में विक्रांत की वह आवाज़ गूंज रही थी— "पराई अमानत". वह किसी की अमानत कैसे हो सकती थी? उसका स्वतंत्र अस्तित्व था. वह एक स्वतंत्र नागरिक थी. लेकिन उसे लगा कि उसे अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए बहुत लड़ाइयाँ लड़नी पड़ेंगी. घर से निकल लेना तो केवल आग़ाज था. सुबह जैसे ही उसे लगा कि आकाश की माँ विमलाजी जाग गयी हैं, वह भी उठ बैठी. वे रसोई में थीं और अपने लिए चाय गैस पर चढ़ा चुकी थीं. प्रिया को देख पूछा, “तुम्हारे लिए भी बना लूँ चाय?”

प्रिया ने ‘हाँ’ कह दी और डाइनिंग की कुर्सी खिसका कर वहीं विमलाजी के पास बैठ गयी. 

चाय पीकर लौटी तब तक तान्या जागी नहीं थी. प्रिया बाथरूम में घुस गयी. वह स्नान करके लौटी तब तान्या कमरे में नहीं थी. वह सुबह 8:00 बजे वह तैयार होकर निपटी. तभी तान्या आ पहुँची.


“दीदी नाश्ता तैयार है आकाश और पापा डाइनिंग में आपका इन्तजार कर रहे हैं. मैं बस फ्रेश हो कर पाँच मिनट में मैं भी आती हूँ, आप चलिए.”

वह डाइनिंग में पहुँची तो आकाश और के पापा, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी, प्रकाश मल्होत्रा  बैठे नाश्ता कर रहे थे. मल्होत्राजी ने प्रिया को भी बैठने को कहा. विमलाजी उसके लिए नाश्ता रख गईं.

"देखो बच्चों, कानून डरपोक के लिए नहीं, जागरूक नागरिक के लिए बना है,"मल्होत्राजी ने गंभीर स्वर में कहा. "विक्रांत ने जो 'अमानत' शब्द इस्तेमाल किया है, वह उसकी कुंठित मानसिकता है. हम सबसे पहले 'पुलिस थाना' में एक इन्फोर्मेटिव रिपोर्ट (Informative Report) दर्ज करवाएंगे. इसमें हम साफ़ लिखेंगे कि प्रिया बालिग है, अपनी मर्ज़ी से यहाँ रह रही है और उसे एक अज्ञात नंबर से जान का खतरा है. इससे यह होगा कि हमें फोन करते ही तुरन्त मदद मिल सकेगी."

प्रिया को पहली बार महसूस हुआ कि सुरक्षा केवल बंद दरवाजों में नहीं, बल्कि सही कानूनी प्रक्रिया में है. वह आकाश और उसके पापा तुरन्त पुलिस स्टेशन गए. दस बजने के पहले रिपोर्ट की एक कॉपी उनके हाथ में थी.

लौटते ही प्रिया ने सबसे पहले अपने मैनेजर और एचआर (HR) हेड को एक 'अर्जेंट मीटिंग' के लिए मैसेज किया. आकाश भी पास ही बैठा था. कुछ देर बाद हुई वीडियो कान्फेंस पर प्रिया ने अपनी स्थिति साफ़ कर दी:

"सर, मेरे मंगेतर ने मेरे सहकर्मी को फोन पर धमकी दी है. मुझे लगता है कि मेरी जान और प्राइवेसी खतरे में है. मुझे तुरंत मुम्बई ऑफिस शिफ्ट होने की अनुमति चाहिए और मेरा बेस लोकेशन कोटा से मुम्बई बदल दिया जाए."

मैनेजर ने उसकी हिम्मत की दाद दी और तुरंत आईटी (IT) टीम को निर्देश दिए कि प्रिया के क्रेडेंशियल्स को 'हाई-सिक्योरिटी' पर रखा जाए ताकि कोई बाहरी व्यक्ति उसे ट्रेस न कर सके.

दोपहर के ठीक तीन बजे थे. प्रिया और तान्या ऊपर वाले कमरे की धूल झाड़ रही थीं, जिसे प्रिया का नया 'होम ऑफिस' बनना था. तभी अचानक बाहर एक भारी एसयूवी (SUV) के टायर चरचराए. प्रिया ने खिड़की से नीचे झांका और उसका खून जम गया. नीचे विक्रांत खड़ा था, उसके साथ दो और गठीले बदन के युवक थे.

"आकाश! बाहर निकल!" विक्रांत का गला फटने को था. "मेरी अमानत को लेकर तू बहुत बड़ा सूरमा बन रहा है? इज़्ज़त से उसे बाहर भेज दे, वरना तेरा ये छोटा सा घर और तेरी सरकारी नौकरी... दोनों मिट्टी में मिला दूंगा."

विक्रांत को वहाँ देख उसके शरीर में सिहरन दौड़ गयी. उसने दो मिनट बैठ कर अपने आपको शान्त किया और नीचे की ओर चल दी.

मल्होत्राजी ने आकाश को कहा कि वह थाने को फोन करे. फिर शांत भाव से कुर्ता पहना और बिना किसी घबराहट के गेट की ओर बढ़े.  आकाश ने थाने फोन किया, "सर, वे आ गए हैं. सिद्धार्थ नगर, मकान नंबर 42." फोन जेब में डालकर वह भी अपने पिता के पीछे चल दिया.

मल्होत्राजी ने गेट की जाली के पीछे से ही कहा, "बेटा विक्रांत, यह घर है, कोई मंडी नहीं जहाँ तुम 'अमानत' लेने आए हो. यहाँ स्वतंत्र नागरिक हैं. तुम मर्यादा लांघ रहे हो, बेहतर होगा यहाँ से चले जाओ."

विक्रांत ने गेट पर जोर से लात मारी, "बुड्ढे, ज्ञान मत दे! वो मेरी होने वाली पत्नी है. मेरा उस पर कानूनी और सामाजिक हक है." उसके साथी डराने के लिए अपनी जेबों में हाथ डालकर आगे बढ़े, जैसे कोई हथियार छिपा हो.

तभी दूर से सायरन की आवाज़ गूँजी. विक्रांत के चेहरे का रंग यकायक उड़ गया. अगले ही पल पुलिस की एक जीप तेज़ी से मुड़कर उनके ठीक सामने रुकी. जीप से एक इंस्पेक्टर और चार हट्टे-कट्टे कांस्टेबल उतरे.

"क्या तमाशा है यह?" इंस्पेक्टर ने अपनी बेल्ट ठीक करते हुए कड़क आवाज़ में पूछा.

विक्रांत की अकड़ धुआं हो गई. वह हकलाने लगा, "सर... वो... पारिवारिक मामला है. मेरी मंगेतर यहाँ छिपी है."

"मंगेतर? बालिग लड़की को तुम 'अमानत' बोलकर डराओगे?" इंस्पेक्टर ने आगे बढ़कर विक्रांत की कलाई पकड़ ली.  . "सुबह ही रिपोर्ट दर्ज हुई है तुम्हारी धमकी की. चलो, अब थाने में बैठकर विस्तार से बताना कि 'अमानत' की परिभाषा क्या है."

इंस्पेक्टर ने एक कांस्टेबल को निर्देश दिया कि वह विक्रांत की गाड़ी खुद ड्राइव करके थाने ले आए. विक्रांत और उसके साथियों को अपराधियों की तरह जीप में बिठाया गया. जिस गली में वे शोर मचा रहे थे, अब वहाँ सन्नाटा था, पर यह सन्नाटा खौफ का नहीं, सुकून का था.

प्रिया ड्राइंगरूम की खिड़की से यह सब देख रही थी. उसकी आँखें नम हो गईं. उसने अपने रूमाल से उन्हें पोंछा और बाहर बरामदे में आ गई. आकाश के पिता ने प्रिया को देखा और धीरे से मुस्कुराए. प्रिया ने समझ लिया था कि अब वह अकेली नहीं है. अंदर कमरे में पहुँच कर उसने अपना लैपटॉप खोला और मुम्बई ऑफिस के मैनेजर को मेल किया— "मैं कल सुबह से ही काम पर हूँ. और हाँ, मेरा मुम्बई शिफ्टिंग का प्रोसेस शुरू कर दीजिए."

... क्रमशः

शनिवार, 21 मार्च 2026

आश्रय

देहरी के पार कड़ी : 3
आकाश की कार ने चंबल के पुल को पार कर महाराणा प्रताप की प्रतिमा वाले गोल चक्कर से आगे जयपुर रोड पर बढ़ गयी थी. प्रिया खिड़की से बाहर देखती रही. बहुमंजिला इमारतें हर तरफ उग रही थीं. शहर कितना विस्तार कर गया था. बड़गाँव बावड़ी तक बस्तियाँ हो गई थीं. यहाँ से बूंदी जिला आरंभ हुआ और कार हाईवे पर आ गई और उसके साथ ही उसकी गति भी बढ़ गई. प्रिया ने मुड़कर एक बार अपने शहर को देखा. यहीं पैदा हुई, यहीं सारी पढ़ाई हुई, बस एमसीए करने के लिए उसे तीन वर्ष इंदौर में रहना पड़ा था. इस शहर ने उसे पाला-पोसा, लेकिन अंत में वही उसका सौदा करने पर आमादा हो गया. चंबल का पानी शांत था, पर प्रिया के मन में समंदर उमड़ रहा था.

अगले चार घंटे खामोशी और बीच-बीच में आकाश से कंपनी के कामों से संबंधित हुई बातों के बीच निकल गए. टोंक पहुँचे तो दोनों को कुछ भूख सी महसूस हुई. आकाश न प्रिया से पूछ कर सड़क किनारे एक रेस्टोरेंट पर कार खड़ी कर दी. वे नाश्ता और चाय पीकर उठे तो प्रिया को कुछ दूर नया सिम बेचने वाले सड़क पर ही स्टाल लगाए दिख गए. उसने अपने लिए दो सिम ले लिए और अपने फोन के सिम बदल कर उसने फोन चालू किया. अपना फोन उसने घर से निकलने के बाद ऋचा से बात होते ही बंद कर दिया था. "अब कम से कम लोकेशन ट्रेस नहीं होगी," उसने एक लंबी सांस लेते हुए कहा.

रात के आठ बजे, कार जयपुर के गोपालपुरा बाईपास के निकट एक शांत कॉलोनी 'सिद्धार्थ नगर' में रुकी. आकाश ने कार बाहर साइड में खड़ी की. घर का गेट खोला, गेट खुलने की आवाज सुन कर ही आकाश के माता-पिता और उसकी छोटी बहन, तान्या बाहर बरामदे में निकल आए, जैसे वे तीनों बहुत देर से उनकी प्रतीक्षा कर रहे हों. तीनों ने प्रिया का स्वागत किया. आकाश के मम्मी-पापा उसके साथ ही ड्राइंगरूम में बैठ गए, उससे बातें करने लगे. आकाश फ्रेश होने चला गया. थोड़ी देर में तान्या चाय बनाकर कुकीज़ के साथ ले आई. चाय पर आकाश के मम्मी पापा प्रिया से उसकी पढ़ाई, और कैरियर सम्बन्धी बातें करते रहे. एक बार भी उसके अचानक घर छोड़ने और विवाह से संबंधित बातों का उल्लेख तक नहीं किया. प्रिया को लगा कि आकाश के परिवार का माहौल बेहतर है, उसके मम्मी पापा बच्चों की असहजता के बारे में सजग रहते हैं.

चाय आने के कुछ देर बाद आकाश भी फ्रेश होकर आ गया. आते ही उसने कहा कि, "मैंने मुम्बई ऑफिस सूचित कर दिया है कि मैं प्रिया के लैपटॉप के साथ प्रिया स्वयं भी जयपुर आ गयी है. यह भी बता दिया है कि तुम सोमवार को जयपुर से लॉग-इन करोगी".

चाय खत्म हुई. प्रिया ने कहा, तुम मुझे होटल छोड़ने को तैयार हो जाओ मैं बाथरूम हो कर आती हूँ. होटल की बात सुनते ही. आकाश की माँ ने उसका अपने हाथ में ले लिया.

"बेटे, इस शहर में तुम अकेली होटल में रहोगी, यह हमें मंज़ूर नहीं. मैं जानती हूँ, आकाश तुम्हें जो होटल बताएगा, वह सुरक्षित ही होगा. लेकिन जिस परिस्थिति में तुम्हें घर छोड़ना पड़ा है, उसमें होटल में ठहरना किसी तरह सुरक्षित नहीं है. यहाँ तुम हर तरह सुरक्षित हो, घर में तुम्हारे सिवा चार और लोग हैं. आज रात तुम तान्या के साथ उसके कमरे में सो जाओ. ऊपर एक कमरा खाली है, कल सफाई करवाकर उसे पेइंग गेस्ट की तरह तैयार कर देंगे. तुम यहीं रहकर अपना 'वर्क फ्रॉम होम' कर सकती हो," माँ के शब्दों में वैसी ममता थी जैसी प्रिया अपनी सगी माँ से इस समय उम्मीद कर रही थी. प्रिया इस निस्वार्थ आग्रह को टाल न सकी. प्रिया को होटल जाने का इरादा छोड़ना पड़ा . तान्या उसे अपने कमरे में ले गयी. कमरा करीने से सजा हुआ था जिसमें एक वर्किंग टेबल और एक डबल बेड था जिसे दो अलग-अलग बिस्तरों के रूप में भी उपयोग में लिया जा सकता था.

“दीदी वैसे तो हम दोनों इस डबल बेड पर सो सकते हैं. लेकिन आपको अच्छा न लगे तो मैं इसके दोनों हिस्सों को अलग करके उन पर सिंगल बेड चादर लगा दूंगी.”

“नहीं, तान्या, उसकी जरूरत नहीं. हम दोनों साथ सो लेंगे. हमें दोस्ती भी तो करनी है.”

कुछ देर बाद तान्या प्रिया को खाने के लिए डाइनिंग में ले आई. आकाश और उसके पापा टेबल पर थे; आकाश की माँ किचन में चपातियाँ उतारने की तैयारी कर रही थी. प्रिया टेबल पर बैठने के बजाय किचन में चली गई.

“माँ मैं आपके साथ खाना खाऊंगी, पहले इन तीनों को खा लेने दें.” माँ ने प्रिया को बहुत कहा कि वह भी सब के साथ बैठ जाए. लेकिन वह नहीं बैठी. तान्या ने फुर्ती से खाना खाया और हाथ धोकर रसोई में पहुँच गई.

“माँ, आप और प्रिया दीदी भी खाना खाइए, मैं गर्म चपातियाँ लाती हूँ.”

खाने में रात के करीब 11 बज गए. सभी ड्राइंग रूम में बैठ कर बातें कर रहे थे. तभी आकाश के फोन की स्क्रीन जगमगा उठी. एक अनजान नंबर था. आकाश ने फोन उठाया, "हेलो?"

"सुन बे आकाश!" दूसरी तरफ से एक भारी और अहंकार से भरी आवाज़ गूंजी. वह प्रिया का मंगेतर, विक्रांत था. "हमें पता है प्रिया को तू जयपुर ले गया है. गुप्ता जी भले ही सीधे आदमी हों, पर मैं नहीं हूँ. उसे समझा दे कि अपनी मर्ज़ी से कोटा लौट आए, वरना जयपुर ज्यादा दूर नहीं है. और तू... पराई अमानत पर हाथ डालने की कोशिश मत कर, वरना नौकरी और सलामती दोनों खतरे में पड़ जाएंगे."

आकाश ने बिना कुछ कहे फोन काट दिया, पर उसके चेहरे पर तनाव की लकीरें उभर आईं. प्रिया ने शायद सब सुन लिया था.

"वह मुझे अपनी 'अमानत' समझता है, "प्रिया की आवाज़ में कंपन था, पर इरादा चट्टान जैसा. "उसे लगता है कि वह डराकर मुझे वापस ले जाएगा."

आकाश ने दृढ़ता से कहा, "उसे गलतफहमी है प्रिया. कल सुबह लॉग-इन करते ही हम सबसे पहले तुम्हारी मुम्बई शिफ्टिंग की बात पक्की करेंगे. और जब तक तुम यहाँ हो, यह घर तुम्हारा किला है."                              ... क्रमशः

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

पहचान

देहरी के पार कड़ी : 2
तलवंडी कोटा के ‘ए’ सेक्टर के 'मोहन विला' में अभी भी मातम और गुस्से का मिला-जुला माहौल था. गृहस्वामी ब्रज मोहन गुप्ता जवाहर नगर थाना में रिपोर्ट कराने गए थे, किन्तु उनकी सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेटी प्रिया के बालिग होने के कारण पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने से इन्कार कर दिया. बोले लड़की खुद कहीं भी जा सकती है. हाँ हम 24 घंटे बाद गुमशुदा रिपोर्ट दर्ज कर सकते है, यह नियम की बात है. वे घर लौट आए. अगले दिन सुबह फिर थाने गए तो उन्हें पता लगा कि प्रिया खुद एक वकील के साथ आकर बयान दे चुकी है कि, “उसने खुद अपनी मर्ज़ी से घर छोड़ा है. वह अपनी इच्छा के विरुद्ध विवाह नहीं करना चाहती, उसका कोई अफेयर नहीं है.” गुप्ताजी मायूस हो कर फिर लौट आए. यह पहली बार था जब उनकी किसी शिकायत पर पुलिस ने काम करने से इन्कार कर दिया हो. वे अनेक वर्ष से स्माल स्केल इंडस्ट्री ऑनर्स एसोसिएशन के सचिव थे, शहर के एसपी और रेंज के आईजी तक उनका सम्मान करते थे. लेकिन इस मामले में कोई उनके लिए सहायक सिद्ध न हो सका. उन्होंने प्रिया के कमरे को ताला लगा दिया, जैसे स्मृतियों को कैद करने से लज्जा मिट जाएगी.

लेकिन शुक्रवार की दोपहर जयपुर से प्रिया की कंपनी के किसी प्रतिनिधि, आकाश का फोन आया कि “प्रिया से संपर्क नहीं हो रहा है. तो पिता के पास उसे टालने का कोई बहाना नहीं था. कंपनी के लिए वह 'उद्योगपति की बेटी' नहीं, बस एक महत्वपूर्ण कर्मचारी थी जिससे संपर्क नहीं हो पा रहा था. “उसकी सहेली बीमार होने के कारण उसे अचानक इन्दौर जाना पड़ा, कंपनी का लैपटॉप तक ले कर नहीं गयी.” गुप्ताजी ने यही जवाब दिया. आकाश ने बताया कि “प्रिया की टीम जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी, वह उसकी वजह से अटक गया है, उसके लैपटॉप की तुरन्त जरूरत है, वह कल लेने कोटा आ रहा है.”

शनिवार की दोपहर, जब आकाश कोटा पहुँचा, तो उसे अंदाज़ा नहीं था कि वह एक सामाजिक रणभूमि में कदम रख रहा है. प्रिया के पिता ने भारी मन से उसे लैपटॉप सौंपा, यह कहते हुए कि "सहेली की बीमारी के कारण उसे अचानक जाना पड़ा. फिर भी फोन पर संपर्क तो करना चाहिए था. उनका भी उससे फोन संपर्क नहीं हो पा रहा है. अब तो उन्हें भी चिन्ता होने लगी है."

लेकिन आकाश, प्रिया की टीम का हिस्सा था, उसे पता था कि प्रिया के ड्यूटी न करने से प्रोजेक्ट को अधिक फर्क नहीं पड़ा था. उसकी मैनेजर ने बस इतनी हिदायत दी थी कि प्रिया ने घर में विवाद के कारण घर छोड़ दिया है और कोटा में ही किसी सहेली के यहाँ है. उसे उसके पिता के यहाँ से लैपटॉप लाकर प्रिया को सौंपना है.

प्रिया ने अपनी मैनेजर को फोन पर पूरी स्थिति स्पष्ट कर दी थी कि उसका विवाह उसकी मर्जी के बिना किया जा रहा था, जिसके कारण उसे घर छोड़ना पड़ा. मैनेजर ने संवेदनशीलता दिखाते हुए आकाश को केवल 'लैपटॉप कलेक्ट' करने के बहाने भेजा था, ताकि कंपनी से आवंटित लैपटॉप प्रिया को मिल जाए और वह काम शुरू कर सके.

ऋचा के फ्लैट पर माहौल कम गरम नहीं था. अमित, समीर और नेहा वहाँ पहले से मौजूद थे. सभी का विचार था कि परिवार से विवाद चलते प्रिया का कोटा में रहकर शांतिपूर्वक काम करना संभव नहीं होगा. या तो वह अपना ‘वर्क फ्रॉम होम’ समाप्त करके मुम्बई अपनी ड्यूटी जॉइन कर ले या फिर जयपुर या उदयपुर में किसी वर्किंग वूमन होस्टल में या कहीं पेइंग गेस्ट स्पेस में रह कर काम करे. एक-दो माह का समय मिल जाएगा. तब माहौल देख कर आगे के निर्णय ले. जब आकाश वहां लैपटॉप लेकर पहुँचा और प्रिया की निगाह अपने लैपटॉप पर पड़ी, तो उसकी आँखें चमक उठीं. कंपनी का लैपटॉप इस समय केवल एक मशीन नहीं था, उसकी 'आज़ादी का औज़ार' था.

समीर कह रहा था, "कोटा अब तुम्हारे लिए सुरक्षित नहीं है प्रिया. यहाँ हर मोड़ पर कोई न कोई तुम्हें पहचानता है. पुलिस और तुम्हारे पापा के रसूख वाले दोस्त तुम्हें चैन से जीने नहीं देंगे."

नेहा ने ठोस दलील दी, "जयपुर बड़ा शहर है. बढ़िया तो यह है कि कोटा से काम करने के बजाय, तुम जयपुर चली जाओ. इससे तुम्हें सुरक्षा भी मिलेगी और एक नया सामाजिक दायरा भी."

आकाश ने भी साथ दिया, "हाँ प्रिया, कंपनी तुम्हारी स्थिति समझती है. मेरे घर के पास ही वर्किंग वुमन हॉस्टल या पेइंग गेस्ट स्पेस मिल जाएगी. मैं अपनी कार लेकर आया हूँ. तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकती हो. मैं वहाँ अपने घर से नजदीक ही किसी होटल में कमरा बुक करवा देता हूँ."

खिड़की से हवा के एक झोंके ने अंदर प्रवेश किया. कोटा की यह हवा जो कभी उसे अपनी लगती थीं, अब उसे अजनबी लग रही थी. उसने तय किया कि वह आज ही आकाश के साथ प्रस्थान करेगी. कल से वह जयपुर शहर में काम करने वाली एक प्रोफेशनल होगी
... क्रमशः