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शुक्रवार, 27 मार्च 2020

कोविद-19 महामारी, चीन, अमरीका और दुनिया के देश



चीन पर कोविद-19 वायरस को जन्म देने के लिए चीन पर सन्देह व्यक्त करने के लिए चीन ने ट्रम्प को बुरी तरह लताड़ा है। सीएनए की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अमरीका में  85505 लोग कोविद-19 से प्रमाणित रूप से संक्रमित हो चुके हैं। यह लेख लिखने तक उन की संख्या में और वृद्धि हो चुकी होगी। जहाँ संक्रमित लोगों के स्वस्थ होने वालों की संख्या 681 और मरने वालों की संख्या 1288 है। अमरीका की स्थिति से ऐसा प्रतीत होता है कि जल्दी ही कोविद-19 से प्रभावितों और मरने वालों की संख्या में वह दुनिया के सभी देशों के रिकार्ड को चन्द दिनों में ही पीछे छोड़ देगा। भले ही अमरीकी सरकार को जनता चुनती हो और दुनिया का सर्वोत्तम जनतन्त्र होने का लगातार ढोल पीटती हो। लेकिन अब कोविद-19 से निपटने के उसके तरीके से यह स्पष्ट हो रह है कि वहाँ की सरकार पर अमरीकी पूंजीपतियों का नियन्त्रण बहुत मजबूत है। वहाँ जनता के नहीं बल्कि पूंजीपतियों के हित सर्वोपरि हैं।

चीन से आने वाली रिपोर्टों से पता लगता है कि उन्हों ने कोविद-19 के संक्रमण को अच्छी तरह से नियन्त्रित कर लिया है। दस दिन पहले भारत से चीन लौटने वाले एक व्यापारी ने सोशल मीडिया पर अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा है कि चीन में एयरपोर्ट से अपने फ्लैट तक पहुँचने तक उसे अनेक बार स्क्रीनिंग से गुजरना पड़ा। प्लेन से उतरते ही, बस में बैठने के पहले, बस से उतरते ही,  स्टेशन में घुसने के पहले, ट्रेन में बैठने के पहले, ट्रेन में, ट्रेन से उतरने के तुरन्त बाद स्टेशन पर, टैक्सी में बैठने के पहले, सोसायटी के प्रवेश द्वार पर, फिर अपनी बिल्डिंग में लिफ्ट में प्रवेश करने के पहले उसकी स्क्रीनिंग हुई। शायद किसी भी अन्य देश में इतनी बड़ी तादाद में होना संभव नहीं है। उन्हों ने कोविद-19 वायरस की जन्मस्थली वुहान शहर की ओद्योगिक गतिविधियाँ पुनः आरम्भ कर दीं हैं। उद्योगपति, व्यापारी, विद्यार्थी और अन्य लोग जो संक्रमण के कारण चीन छोड़ गए थे वापस चीन और वुहान वापस लौटने लगे हैं। चीन में रह रहे भारतीय सुभम पाल के अनुभव को आज राजस्थान पत्रिका ने अपने संपादकीय पृष्ठ के अग्रलेख का स्थान दिया है उसे पढ़ें और समझें कि चीन कैसे इस महामारी पर नियंत्रण किया है  और इस महामारी से लड़ने का सही तरीका क्या होना चाहिए।

कल मेरी बेटी ने मुझे बताया कि चीन में कोविद-19 के संक्रमण से मरने वालों की संख्या बहुत अधिक होने की संभावना व्यक्त की जा रही है जिसका आधार यह है कि वहाँ दिसम्बर से अभी तक 70 लाख से अधिक सेलफोन और 8 लाख से अधिक बेसिक फोन कनेक्शन बन्द हुए हैं।  यह सन्देह खुद चीन सरकार द्वारा जारी किए गए अधिकारिक आँकड़ों पर आधारित हैं। चीन ने उस पर व्यक्त किए जा रहे इस सन्देह पर अभी तक कोई बयान नहीं दिया है। लेकिन अनेक विष्लेषकोंल ने  यह बताया है कि बन्द टेलीफोन कनेक्शनों की यह संख्या असाधारण नहीं है। चीन में बन्द हुए टेलीफोन कनेक्शनों की यह संख्या जो एक करोड़ से भी कम है वहाँ के कुल टेलीफोन कनेक्शनों की संख्या 162 करोड़ के मुकाबले मात्र आधा प्रतिशत है और नगण्य है। कोविद-19 से निपटने के क्रम में लाखों आप्रवासी मजदूर अपने काम के नगरों और प्रान्तों से अपने प्रान्तों में अपने गाँवों को लौट गए हैं और हजारों छोटी औद्योगिक इकाइयाँ और व्यापारिक प्रतिष्ठान बन्द हुई हैं। चीन में एक व्यक्ति को पाँच सेलफोन तक उपयोग करने की छूट है। आय के बन्द या कम होने और बचत किए जाने के लिए ये टेलीफोन बन्द किए गए हो सकते हैं।

आज सोशल मीडिया में कुछ पोस्टें ऐसे लोगों की हैं जो अमरीका को दुनिया में जनतंत्र का ईश्वर मानते हैं। उन्होंने लिखा है कि यह वायरस चीन सरकार का षड़यन्त्र है। और यदि चीन के स्थान पर कोई साधारण देश होता तो अमरीका वहाँ डेमोक्रेसी लाने पहुँच चुका होता। तो अमरीका के डेमोक्रेसी का भगवान होने सच यह है कि उस ने अब तक कहीं जनतन्त्र नहीं बनाया। जहाँ भी उसने जनतंत्र के नाम पर हस्तक्षेप किया, वहाँ अपनी दलाल सरकार बना कर लौटा। हाल ही में अफगानिस्तान का उदाहरण देखें। वह उसे फिर से उन्हीं कबीलावादी तालिबान के हाथों सौंप चुका है और तालिबान की छाया के तले वहाँ आईएस ने सिखों को कत्ल कर दिया है।

अमरीका जहाँ भी जाता है उस देश को वह राजशाही में, कबीलाई हालत में फिर तानाशाही में बदल देता है। अमरीका के तथाकथित शासक खुद भी अपने जनतंत्र से कम नहीं डरते। ट्रम्प की जनतंत्र के प्रति बिलबिलाहट बार-बार प्रकट होती है और वैश्विक समाचार बन जाती है। ट्रम्प का बस चले तो वह अमरीका का फ्यूहरर बन जाए। अमरीका और उसके जनतंत्र पर मर मिटने की हद तक फिदा लोगों के सन्देह कम्युनिस्ट शब्द से उन के मन में साम्राज्यवादी-पूंजीवादी मीडिया द्वारा पैदा किए गए भय का परिणाम हैं। दुनिया के कुल मीडिया के 95 प्रतिशत पर साम्राज्यवादियों-पूंजीपतियों का कब्जा है। वे नए नए आँकड़े रचते हैं, अधिकारिक आँकड़ों का विश्लेषण मान्य स्टेटिकल रीति से करने के स्थान पर सन्देहपूर्ण तरीकों से करते हुए तमाम समाजवादी, साम्यवादी, जनप्रतिबद्ध ताकतों के प्रति घृणा उत्पन्न करने के लिए करते हैं और दुनिया भर में झूठ फैलाते हैं। साम्राज्यवादी-पूंजीवादी ताकतें यह काम पिछली सदी के आरंभ में हुए पहले विश्वयुद्ध के समय से खूब कर रहा है।

हम आज की बात करें तो कथित जनतंत्र के भगवान अमरीका के कोविद-19 से निपटने के तरीकों  के सामने आने के बाद मैं यह मानने लगा हूँ कि यह दुनिया का सौभाग्य और कौविद-19 का दुर्भाग्य था कि वह चीन में पैदा हो गया। यदि उसने इटली, स्पेन, अमरीका या किसी अन्य पूंजीवादी देश में जन्म लिया होता तो सारी दुनिया अब तक इससे उत्पन्न महामारी से घायल पड़ी होती। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण में पूंजीवाद को समाजवाद की और धकेलते चीन ने इस वायरस के विरुद्ध लड़ाई को पूरी तरह से वैज्ञानिक पद्धति प्रदान की और उस पर सफलता पूर्वक नियंत्रण पाया। दूसरा समाजवादी देश क्यूबा है जिस क्रूज को कोई देश अपने बंदरगाह पर लंगर डालने की इजाजत नहीं दे रहा था उसे क्यूबा ने पनाह दी और संक्रमित लोगों का इलाज किया। अब जिस के डाक्टर्स अनेक देशों में जा कर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में बनी केरल राज्य की सरकार है जिस ने भारत में सब से बेहतर तरीके से इस वायरस पर नियंत्रण पाया है।

जिन लोगों को जनतंत्र के भगवान अमरीका पर बहुत विश्वास है, और जो पहला अवसर मिलते ही तो वहाँ पलायन करने कौ तैयार बैठे रहते हैं। उसी अमरीका में कोविद-19 की महामारी से मरने वालों की संख्या बहुत तेजी से रिकार्ड तोड़ रही है। केवल साम्यवादी और समाजवादी ही हैं जो इस महामारी से सबसे बेहतर रीति से लड़ते हुए न केवल अपने अपने देशों की जनता की रक्षा कर रहे हैं। अपितु वे दूसरे देशों की मदद कर रहे हैं।  

गुरुवार, 26 मार्च 2020

लॉकडाउन में पंखा बन्द


कल रात 10:45 पर सोने जा रहा था। उत्तमार्ध शोभा सो चुकी थी। मैं शयन कक्ष में गया, बत्ती जलाई। पानी पिया और जैसे ही बत्ती बन्द की, कमबख्त   पंखा भी बन्द हो गया। गर्मी से अर्धनिद्रित उत्तमार्ध को बोला -पंखा बन्द हो गया है। मुझे जवाब मिला - मैने पहले ही कहा था, बिजली मिस्त्री को बुलवा कर पंखे वगैरा चैक करवा लो।

मैंने सप्ताह भर पहले ही बात भी की थी। तकनीशियन को गए रविवार को आना था। पर राजस्थान में शुक्रवार से ही लॉक डाउन हो चुका था। रविवार को जनता कर्फ्यू हो गया।  अब अगले 20 दिन तक कोई संभावना नहीं कि कोई इलेक्ट्रिशियन आ कर पंखा चैक कर ले।

उत्तमार्ध का उलाहना, कुछ तो खून गरम कर ही देता है। मैं ने तुरन्त अपनी ड्राअर से टेस्टर पेंचकस और प्लायर लिया और बोर्ड खोल डाला। मैं ने पंखे का स्विच और रेगुलेटर दोनों खूब चैक किए पर पंखा चालू न हुआ। वहाँ कोई खराबी नहीं थी। खराबी पंखे में ही थी। अब पंखा चैक करना होगा। बोर्ड खोला तो पता लगा कि उस में दो स्विचों को बोर्ड में अटकाए रखने वाली प्लास्टिक की अटकन टूटी पड़ी है, स्विच जैसे तैसे अटके थे। शायद पिछली बार जब इलेक्ट्रिशिन ने खोला था तभी उन में क्रेक आ गया था। कल खोला तो उनका टूटा हिस्सा निकल पड़ा। अब स्विच लूज हो गये हैं। स्थिर रहने के बजाए आगे पीछे हिल रहे हैं। बोर्ड के दो स्विच बदलने पड़ेंगे और शायद बोर्ड भी।

जितना इलेक्ट्रिशियन कर सकता है, सैद्धान्तिक रूप से वह मैं भी करने में सक्षम हूँ। कोई दस साल पहले की बात होती तो कर ही लेता। लेकिन यह घुटनों का ऑस्टियो आर्थराइटिस? उत्तमार्ध समझती हैं कि स्टूल पर चढ़ कर 10-15 मिनट तक खड़े रह कर पंखे को चैक करना मेरे लिए शायद मुश्किल होा।  बेडरूम का पंखा है, मुश्किल तो हो ही गयी है। अगले 20 दिन किसी इलेक्ट्रिशियन का आना मुमकिन नहीं लगता। फिर बोर्ड और स्विच भी तो चाहिए। उन की दुकानें तो बन्द ही रहेंगी।

सोचा था आज एक बार पंखे को चैक तो करूंगा। हो सकता है उसे कनेक्ट करने वाले तारों में कोई खराबी तो  उसे चालू किया जा सकता है। पंखे का मोटर भी जला हो सकता है। तब उसे चालू करना असंभव होगा। फिर या तो दूसरे बेडरूम का पंखा खोल कर इधर लगाना होगा। या फिर हमें बेडरूम ही बदलना होगा। सुबह सारी कथा उत्तमार्ध को सुनाई तो बोलीं - सोने की बहुत जगह है, हॉल है, दूसरा बेडरूम है। वैसे भी स्विच बोर्ड लाना पड़ेगा। जब तक इलेक्ट्रिशियन और बिजली के सामानों की दुकान उपलब्ध नहीं होती तब तक काम चलाने में कोई परेशानी नहीं होगी। वैसे भी हम दोनों को ही तो रहना है कोई आ थोड़े ही रहा है, इस लॉकडाउन में।

बुधवार, 25 मार्च 2020

कोरोना और दाढ़ी-मूँछ


उम्र का 14वाँ साल था। नाक और ऊपरी होठ के बीच रोआँली का कालापन नजर आने लगा था। एक दम सुचिक्कन चेहरे पर काले बालों वाली रोआँली देख कर अजीब सा लगने लगा था। समझ नहीं आ रहा था कि इस का क्या किया जाए। स्कूल में लड़के मज़ाक बनाने लगे थे कि मर्दानगी फूटने लगी है, अब लड़कियाँ फ़िदा होने लगेंगी। मज़ाक क्लास की लड़कियों के कानों तक भी पहुँच जाता था। जब कभी किसी लड़की से आँखें मिलतीं तो वह मुहँ दबा कर हँस पड़ती। साथ की लड़कियाँ साथ देतीं। लड़कों को फिर से मज़ाक करने का मौका मिल जाता।

घर में दादाजी, पिताजी, बड़े काका मोहनजी, और छोटे काका बाबू मर्द थे। दादाजी गाँव से अपने साथ पड़ौसी बनिए के लड़के को पढ़ने के लिए साथ ले आए थे जो उनके साथ मन्दिर में ही रहता था। वह उम्र में मुझ से तीन-चार साल बड़ा था। उसकी रोआँली बालों में  परिवर्तित हो चुकी थी।  नाई ने उसे तराश कर बाकायदे मूँछों का आकार दे दिया  था। दो महीने में जब वो कटिंग कराने जाता तो नाई से मूँछे तराशवा कर आता। नाई मुझे भी  2-3 दफा   कह चुका था कि मेरे भी अब मूँछे आकार लेने लगी हैं। चार-छह महीने बाद इन्हें तराशना पड़ेगा।

दादाजी हमारे पारिवारिक नाई को हर इतवार दोपहर साढ़े बारह बजे  बुलाते थे। वे बड़े मंन्दिर के पुजारी थे। दोपहर 12 बजे मन्दिर बन्द होने के बाद ही उन्हें समय मिलता। इतवार को वे मन्दिर के काम से निपट कर नाई के पास हजामत कराने बैठ जाते। नाई  साथ लाए काले पत्थर पर उस्तरा तैयार करता और  हजामत शुरू कर देता। पहले सिर के सारे बाल उतारता, बाद में दाढ़ी-मूँछ भी उस्तरे से साफ कर देता। नाई के जाने के बाद वे दोबारा स्नान कर के  भोजन करते। थोड़ी देर आराम करने पर तीन बज जाते और उन की मन्दिर की ड्यूटी  शुरू हो जाती। उनके सिर, दाढ़ी और मूँछ के बाल नौरात्रों के अलावा कभी 1-2  सूत से अधिक नहीं बढ़े। उन दिनों सब जवान  लोग सिर पर अच्छे-खासे बाल रखने लगे थे। लेकिन दादाजी को लंबे बाल अच्छे नहीं लगते। वे अक्सर हमारे नाई को हिदायत देते रहते कि कटिंग करो तब बाल छोटे जरूर कर दिया करो। जब कि कटिंग कराने जाने पर हम नाई से कहते केवल दिखावे के लिए छोटे करना, बस सैटिंग कर देना। कटिंग के बाद दादाजी को बाल छोटे हुए दिखाई नहीं देते तो वे डाँट देते।

पिताजी एक दिन छोड़ कर एक दिन खुद शेव बनाते थे वे दाढ़ी पूरी तरह साफ कर देते थे। लेकिन मूँछों के बाल छोटी कैंची से इस तरह छाँटते थे कि बालों के सिर मात्र चमड़ी से बाहर दिखाई देते रहें। उन्हेँ मूँछ कहना उचित नहीं था। बड़े काका मोहनजी ने भी पिताजी वाली ही पद्धति अपना रखी थी। अलबत्ता छोटे काका बाबू को मूंछ रखने का शौक था। वे खुद दाढ़ी नहीं बनाते थे, सप्ताह में एक बार नाई से बनवाते। तभी मूँछों को तराशवा आते।

जब से स्कूल में लड़के मेरा मजाक बनाने लगे थे। तब से मैं सोचता था कि ये होठों पर उग आई मूँछों का क्या किया जाए। धीरे-धीरे दाढ़ी पर भी बाल नजर आने लगे। यह एक नई समस्या थी। घर में बहुत सारे भगवानों के चित्र थे। उन में से किसी के भी दाढ़ी मूँछ नहीं थीं। आखिर एक दिन मैं ने फैसला ले लिया कि दाढ़ी मूँछ साफ कर ली जाए। उस दिन सब लोग कहीं बाहर गए हुए थे। घर पर मैं अकेला था। बस उस दिन मैने पिताजी का शेव वाला डब्बा उठाया और रेजर से दाढ़ी और मूँछ साफ कर डाली।

अगले दिन स्कूल में एक नए तरह का मजाक बना। कुछ दिन बनता रहा। अब हर पन्द्रह दिन में दाढ़ी मूँछ बनाने का सिलसिला आरंभ हो गया था। फिर सप्ताह में एक बार, उसके बाद दो बार। तीन साल ऐसे ही निकल गए। आखिर तीन दिन की दाढ़ी-मूँछ भी बुरी लगने लगी। मैं सप्ताह में तीन दिन बनाने लगा। शादी के बाद तो जब कभी दाढ़ी बनाए तीन दिन हो जाते तो    उत्तमार्ध टोकना शुरू कर देती। क्या ब्लेड खत्म हो गयी है या शेविंग क्रीम। मैं पलट कर पूछता तो जवाब देती कि बस दाढ़ी नहीं बनी इसलिए पूछा। जल्दी ही मुझे पता लग गया था कि उसे दाढ़ी का बढ़े रहना पसंद नहीं। जब तक जिला मुख्यालय आ कर वकालत शुरू नहीं की तब तक उत्तमार्ध का मेरे साथ रहना कैजुअल सा था। साल में आधे दिन वह मायके में रहती। जिला मुख्यालय आ जाने के बाद तो निरन्तर साथ हो गया था। अब प्रतिदिन शेव करना शुरू हो गया जो आज तक चला आ रहा है।

आज सुबह  ब्लागर  मित्र विवेक रस्तोगी जी ने सुझाया कि अब 21 दिन घर ही रहना है तो दाढ़ी बढ़ा कर देख लिया जाए कि शक्ल कैसी लगती है। एक बार तो मुझे भी लगा कि बात ठीक है। इस होली पर ब्लागर मित्र राजीव तनेजा ने दाढ़ी वाला मीम बनाया था। उसमें दाढ़ी में अपना चेहरा देख चुका था। इस कारण खुद को दाढ़ी में देखने का कोई  चार्म नहीं रहा था। फिर याद आया, कोरोना महामारी के चलते इस वक्त हर कोई कह रहा है कि हाथ से मुहँ, नाक, कान और आँखें न छुएँ।  दाढ़ी बढ़ाई  तो बार बार हाथ वहीं जाएगा, रोका न जाएगा। मुहँ, नाक, कान और आँखे  भी नजदीक ही हैं।  वैसे भी दो महीने से कोरोना वायरस के इलस्ट्रेशन देख रहा हूँ। उन पर भी बढ़ी हुई दाढ़ी-मूँछ के बालों जैसे बाल होते हैं। आखिर उत्तमार्ध से कहा कि मन कर रहा है कि 21 दिन दाढ़ी न बनाई जाए। तो कहने लगीं कि क्या शेविंग क्रीम खत्म हो गया है? मैं समझ गया कि उधर भी अच्छा नहीं लगेगा। मैं फौरन उठा और जा कर बिलकुल रोज की तरह क्लीन शेव बनाई और घुस गया बाथरूम में।

अब अपना तो कहना है कि जब तक कोरोना है, जिन लोगों ने दाढ़ी-मूँछ रख रखी हैं, उन्हें भी क्लीन-शेव हो जाना चाहिए, रोज दाढ़ी बनानी चाहिए। जी, बिलकुल मोदी जी को भी और शाह जी को भी।

सोमवार, 23 मार्च 2020

लंगोटों वाला देश



धरती पर कर्क रेखा के आसपास एक देश था। उस देश के लोगों के पास एक बहुत पुरानी  किताब थी। जिसकी भाषा उनके लिए अनजान थी। वह उनके पूर्वजों की भाषा रही होगी। वे ऐसा ही मानते थे। उस किताब की लिपि तो वही थी जो वे इस्तेमाल करते थे। किताबो को वे पढ़ तो सकते थे, लेकिन समझ नहीं सकते थे।  जिन्हों ने पढ़ने की कोशिश की उन की समझ में कुछ नहीं आया। उन्हों ने थोड़ी ही देर में अपना माथा पीट लिया और किताब पढ़ना छोड़ दिया। लेकिन वे नहीं चाहते थे कि उन्हें अज्ञानी कहा जाए।

उन्हों ने किताब को सबसे अच्छे खूब अच्छी तरह सजे हुए कपड़ों में बांध कर रख दिया और उसकी पूजा करने लगे। उन्हों ने लोगों को कहा कि ये किताबें आसमानी हैं, अबूझ हैं। इन्हीं में संसार का सारा ज्ञान भरा पड़़ा है। लोग उन्हें ज्ञानी कहने लगे।  वे नहीं जानते थे कि किस मंत्र का क्या मतलब है? लेकिन उन्होंने उनका उपयोग तलाश लिया। फिर उन्होंने उन किताबों के पन्नों की लंगोटें बना लीं। पहनने वाली नहीं, घुमाने वाली।

जब भी किसी को बहुत बुखार होता। कोई शरीर में  हो रहे दर्द से तड़पता रहता। किसी को साँप या कीड़े ने काट लिया होता। किसी की बीवी भाग गयी होती। किसी की फसल नष्ट हो गयी होती। किसी के पालतू खो गए होते या चोरी हो गए होते। वे सब बीमार को, पीड़ित को लेकर किसी ज्ञानी के पास जाते।  ज्ञानी उन्हें गंभीरता से सुनता। बहुत से ऊल-जलूल सवाल पूछता। फिर एक लंगोट निकालता और उसे घुमा कर बताते। फिर कहता: इसे ले जाओ। सुबह-शाम छत के बारजे पर खड़े होकर इसे घुमाना, फिर वापस दीवार पर अपनी छाती से ऊँची जगह पर खूंटी पर लटका देना। तुम ठीक हो जाओगे,  तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी। लोग ठीक हो जाते। बहुत से लंगोट घुमाते घुमाथे मर जाते। जो मर जाता वह ज्ञानी के पास कभी नहीं लौटता। इस तरह ज्ञानियों के घर आने वाले लोगों को पता नहीं लगा कि लंगोट असफल भी होती है। देश में ज्ञानियों का डंका बजने लगा। तब से देश के लोग समझते हैं कि लंगोट घुमाना हर बीमारी का इलाज है, हर समस्या का हल है।

बस तब से लोग उस देश को लंगोटों वाला देश कहने लगे।

कोटा, 23.03.2020