Wednesday, May 25, 2011

दवाइयाँ शुरु ...................... डाक्टर देवता-2

अब तक आपने पढ़ा  ...

स कहानी के वाचक को दाहिने हाथ में तंत्रिका संबंधी शिकायत हुई थी, उस ने अपने मित्रों से सहज उल्लेख किया तो एक मित्र ने न्यूरोफिजिशियन से समय ले लिया। वाचक ने डॉक्टर के पास अकेले जाने के स्थान पर अपने एक दवा प्रतिनिधि मुवक्किल को साथ ले लिया। वहाँ उसे एक और दवा प्रतिनिधि मुवक्किल मिल गया। उन्हों ने वाचक को क्रम तोड़ कर डाक्टर के कक्ष में घुसा दिया जिस पर डाक्टर ने नाराज हो कर उन्हें बाहर निकाल दिया। वाचक डाक्टर को दिखाए बिना ही वापस जाना चाहता था। लेकिन दोनों दवा प्रतिनिधियों ने उसे डाक्टर को दिखाने के लिए मना लिया। वाचक फिर से हॉल में जा कर अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा। अब आगे वाचक से ही सुनें उस की कहानी ...

भाग-2
कोई तीन-चार मिनट के बाद दरवाजा खुला और एक मरीज व उस का साथी बाहर निकला। रिसेप्सनिस्ट ने मुझे अंदर जाने को कहा। मैं और नवानी आगे-पीछे अंदर घुसे। डाक्टर बारदाना अब अकेला था। उस ने मुझे उस के दाहिनी और रखे स्टील के एक गोल स्टूल पर बैठने का संकेत किया। नवानी डाक्टर के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। मैं ने उसे बताना आरंभ किया।
 -कोई दस दिन पहले रात को सोने के समय जब मैं बाईं करवट लेटा तो मुझे दायीँ भुजा में असहनीय दर्द हुआ। कोई आधा घंटा बाद दर्द गायब हो गया। लेकिन उस के बाद से दायाँ हाथ कुछ खास स्थितियों में रखने पर अचानक कंधे से पंजे की ओर करंट सा दौड़ने लगता है, लेकिन हाथ की स्थिति बदलते ही सामान्य हो जाता है। इस कारण से उन खास स्थितियों में हाथ को रखने में भय सा लगने लगा है। मैं ने डाक्टर को वे स्थितियाँ भी बतानी चाही जिन में ऐसा होता था। लेकिन डाक्टर इस के पहले ही उठ खड़ा हुआ और मुझे दीवार के नजदीक लगी एक ऊंची बैंच पर लेटने को कहा। मैं वहाँ से उठा और बैंच पर जा लेटा। इस बीच डाक्टर ने अपने पीछे की मेज से एक हथौड़ीनुमा औजार उठाया और मेरे पास आ गया। पहले उस ने औजार को पास रख दिया। मुझे हाथ पीछे की ओर दबाने को कहा और उसी समय उस ने हाथ को आगे की ओर दबाया। यह क्रिया उस ने दोनों हाथों, पैरों और मेरी गर्दन के साथ की। मुझे दस वर्ष पहले की याद आ गई। जब मुझे गर्दन में जबर्दस्त दर्द हुआ था और मैं गर्दन को मोड़ भी नहीं सकता था। डाक्टर ने मुझे फीजियोथेरेपिस्ट के हवाले कर दिया था। उस ने कुछ दिन मेरी गर्दन को ट्रेक्शन दिया था। उस के बाद कुछ नियमित व्यायाम बताए थे। मेरा दर्द दूर हो गया था और उन व्यायामों के लगातार चलते आज तक किसी तरह की कोई परेशानी नहीं आई थी। 

डाक्टर बारदाना ने इसी तरह के कुछ व्यायाम कराने के बाद मुझे फिर लिटा दिया और मेरे पैरों व हाथों की हड्डियों के जोड़ों  पर हथौड़ीनुमा औजार से ठकठकाया। मुझे लगा कि वह हथौड़ी से हड्डी को मारने पर निकलने वाली आवाज को ध्यान से सुन रहा है। फिर उस ने मुझे अपने पास आने को कहा। डाक्टर ने बताया कि मुझे यह समस्या गर्दन की वजह से है। उस ने गर्दन का एक्स-रे कराने का सुझाव दिया और पर्चे पर दवाइयाँ लिखने लगा। दवाइयाँ लिख चुकने के बाद उस ने आठ दिन दवाइयाँ लेने के बाद फिर से दिखाने को कहा। पर्चा नवानी ने अपने हाथ में थाम लिया। मैं ने डाक्टर को धन्यवाद दिया और फीस देने लगा तो उस ने बाहर रिसेप्सनिस्ट को देने को कहा। हम बाहर निकल आए। हमारे निकलते ही एक मरीज अपने साथी के साथ फिर डाक्टर के कमरे में घुस गया। 

मैं ने रिसेप्सनिस्ट को दो सौ रुपए दिए, उस ने पचास रुपए मुझे लौटाए। लेकिन उन रुपयों की कोई रसीद नहीं दी। पहले घट चुके घटनाक्रम के कारण मेरी रसीद मांगने की हिम्मत भी न हुई। हम बाहर आ गए। नवानी तब तक पर्चा पढ़ चुका था और उस में लिखी दवाइयों पर टिप्पणी कर रहा था। मैं ने उस की टिप्पणी पर ध्यान नहीं दिया। मैं ने सामने की दुकान से सब दवाइयाँ लेने के लिए कहा तो नवानी ने मना कर दिया और कहा कि को-ऑपरेटिव की दुकान से लेंगे। यह दुकान अस्पताल परिसर में थी। हम अस्पताल परिसर में आ गए। वहाँ दवाइयाँ लेने में कोई आधा घंटा लगा। मैं दवाइयाँ उसी रात से आरंभ करना चाहता था। लेकिन नवानी ने कहा कि सुबह से लेना अन्यथा क्रम बिगड़ जाएगा। घर आ कर नवानी ने बताया कि किस किस काम के लिए हैं। मुझे इतना ध्यान रहा कि एक गोली रोज सुबह पेट साफ रखने के लिए दी गई हैं।  मैं ने उस की इन बातों पर कोई गौर नहीं किया।  डाक्टर ने मुझे किसी दवा के लिए नहीं बताया था कि कौन सी कब लेनी है और कैसे लेनी है। वैसे मैं ने आम तौर पर देखा है कि डाक्टरों के पास इतना समय नहीं होता। यह काम उन्हों ने उन केमिस्टों के लिए छोड़ दिया है जहाँ से दवा खरीदी जाती है। लेकिन मुझे तो केमिस्ट ने भी कुछ नहीं बताया था। मैं ने भी नवानी के साथ होने के कारण नहीं पूछा। अब मैं ने नवानी को कहा कि वह मुझे सिर्फ इतना बता दे कि कौन सी गोली कब-कब लेनी है। नवानी यह बता कर कि कौन सी दवा कब लेनी है, अपने घर चला गया।

गले दिन सुबह शौच से निवृ्त्त होते ही मुझे खाली पेट वाली गोली का स्मरण हुआ और उसे पानी के साथ ले लिया। अदालत के लिए रवाना होने के पहले नाश्ते के तुरंत बाद मैं ने दवाएँ देखीं। तीन गोलियाँ थीं जो मुझे लेनी थीं। उन में आठ गोलियाँ ऐसी थीं जो पहले दो दिन 40 मिग्रा की, अगले दो दिन 30 मिग्रा की, उस से अगले दो दिन 20 मिग्रा की और आखिरी दो दिन 10 मिग्रा की गोलियाँ लेनी थीं। मैं ने उन में से 40 मिग्रा वाली गोली चुनी और दो अन्य गोलियों में से एक-एक ले कर तीनों एक साथ पानी से गटक लीं। अदालत जा कर सामान्य कामकाज करने लगा। दस बजे मुझे उबासियाँ आने लगीं। हलका सा सिर भारी हुआ। मुझे लगा कि चाय का समय निकल गया है इसलए ऐसा हो रहा है। तभी मोबाइल की घंटी बज उठी। मित्र लोग चाय के लिए बुला रहे थे। काफी पीने के बाद मुझे कुछ अच्छा महसूस हुआ। मैं फिर काम पर लग गया। काम से निबट कर घऱ पहुँचा तो मुझे भूख सी लग आई थी। मैं ने भोजन किया और सुबह जो तीन गोलियाँ लेनी थीं उन में से मिग्रा वाली गोली के अतिरिक्त दो गोलियाँ और लीं और अपने कार्यालय में आ बैठा। कुछ देर काम करने के बाद ही मुझे लगा कि नींद आएगी। मैं उठा और अपने शयन कक्ष में आ लेटा। मुझे जल्दी ही नींद आ गई।

मेरी नींद खुली तो शाम ढल रही थी। घड़ी छह से ऊपर का समय बता रही थी। मैं कोई ढाई घंटे सोया था। पत्नी ने कॉफी बना कर दी। तो मुझे स्मरण हुआ कि आज दूध लाना तो छूट गया है। मैं ने पत्नी को उलाहना दिया कि उसने जगाया ही नहीं दूध लाना था। उस ने कहा -आप गहरी नींद में थे तो मैं ने जगाया नहीं।
-अब दूध का क्या होगा?
-सुबह तक का हो जाएगा। सुबह ले आएंगे। पत्नी का इस तरह बोलना मुझे अच्छा लगा।
रात के भोजन के बाद मैं ने फिर से वे दो गोलियाँ खाईँ। काम करता रहा लेकिन फिर से जल्दी ही नींद आने लगी। मैं ने भी सोचा कि सुबह जल्दी दूध लेने जाना पड़ेगा। हो सकता है नींद जल्दी न खुले। इसलिए जल्दी सो लो। मैं ने कार्यालय बंद कर अपने शयनकक्ष की राह ली। 
... क्रमशः
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