इस कहानी के वाचक को दाहिने हाथ में तंत्रिका संबंधी शिकायत हुई थी, उस ने अपने मित्रों से सहज उल्लेख किया तो एक मित्र ने न्यूरोफिजिशियन से समय ले लिया। वाचक ने डॉक्टर के पास अकेले जाने के स्थान पर अपने एक दवा प्रतिनिधि मुवक्किल को साथ ले लिया। वहाँ उसे एक और दवा प्रतिनिधि मुवक्किल मिल गया। उन्हों ने वाचक को क्रम तोड़ कर डाक्टर के कक्ष में घुसा दिया जिस पर डाक्टर ने नाराज हो कर उन्हें बाहर निकाल दिया। वाचक डाक्टर को दिखाए बिना ही वापस जाना चाहता था। लेकिन दोनों दवा प्रतिनिधियों ने उसे डाक्टर को दिखाने के लिए मना लिया। वाचक फिर से हॉल में जा कर अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा। अब आगे वाचक से ही सुनें उस की कहानी ...
भाग-2
कोई तीन-चार मिनट के बाद दरवाजा खुला और एक मरीज व उस का साथी बाहर निकला। रिसेप्सनिस्ट ने मुझे अंदर जाने को कहा। मैं और नवानी आगे-पीछे अंदर घुसे। डाक्टर बारदाना अब अकेला था। उस ने मुझे उस के दाहिनी और रखे स्टील के एक गोल स्टूल पर बैठने का संकेत किया। नवानी डाक्टर के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। मैं ने उसे बताना आरंभ किया।
-कोई दस दिन पहले रात को सोने के समय जब मैं बाईं करवट लेटा तो मुझे दायीँ भुजा में असहनीय दर्द हुआ। कोई आधा घंटा बाद दर्द गायब हो गया। लेकिन उस के बाद से दायाँ हाथ कुछ खास स्थितियों में रखने पर अचानक कंधे से पंजे की ओर करंट सा दौड़ने लगता है, लेकिन हाथ की स्थिति बदलते ही सामान्य हो जाता है। इस कारण से उन खास स्थितियों में हाथ को रखने में भय सा लगने लगा है। मैं ने डाक्टर को वे स्थितियाँ भी बतानी चाही जिन में ऐसा होता था। लेकिन डाक्टर इस के पहले ही उठ खड़ा हुआ और मुझे दीवार के नजदीक लगी एक ऊंची बैंच पर लेटने को कहा। मैं वहाँ से उठा और बैंच पर जा लेटा। इस बीच डाक्टर ने अपने पीछे की मेज से एक हथौड़ीनुमा औजार उठाया और मेरे पास आ गया। पहले उस ने औजार को पास रख दिया। मुझे हाथ पीछे की ओर दबाने को कहा और उसी समय उस ने हाथ को आगे की ओर दबाया। यह क्रिया उस ने दोनों हाथों, पैरों और मेरी गर्दन के साथ की। मुझे दस वर्ष पहले की याद आ गई। जब मुझे गर्दन में जबर्दस्त दर्द हुआ था और मैं गर्दन को मोड़ भी नहीं सकता था। डाक्टर ने मुझे फीजियोथेरेपिस्ट के हवाले कर दिया था। उस ने कुछ दिन मेरी गर्दन को ट्रेक्शन दिया था। उस के बाद कुछ नियमित व्यायाम बताए थे। मेरा दर्द दूर हो गया था और उन व्यायामों के लगातार चलते आज तक किसी तरह की कोई परेशानी नहीं आई थी।
-कोई दस दिन पहले रात को सोने के समय जब मैं बाईं करवट लेटा तो मुझे दायीँ भुजा में असहनीय दर्द हुआ। कोई आधा घंटा बाद दर्द गायब हो गया। लेकिन उस के बाद से दायाँ हाथ कुछ खास स्थितियों में रखने पर अचानक कंधे से पंजे की ओर करंट सा दौड़ने लगता है, लेकिन हाथ की स्थिति बदलते ही सामान्य हो जाता है। इस कारण से उन खास स्थितियों में हाथ को रखने में भय सा लगने लगा है। मैं ने डाक्टर को वे स्थितियाँ भी बतानी चाही जिन में ऐसा होता था। लेकिन डाक्टर इस के पहले ही उठ खड़ा हुआ और मुझे दीवार के नजदीक लगी एक ऊंची बैंच पर लेटने को कहा। मैं वहाँ से उठा और बैंच पर जा लेटा। इस बीच डाक्टर ने अपने पीछे की मेज से एक हथौड़ीनुमा औजार उठाया और मेरे पास आ गया। पहले उस ने औजार को पास रख दिया। मुझे हाथ पीछे की ओर दबाने को कहा और उसी समय उस ने हाथ को आगे की ओर दबाया। यह क्रिया उस ने दोनों हाथों, पैरों और मेरी गर्दन के साथ की। मुझे दस वर्ष पहले की याद आ गई। जब मुझे गर्दन में जबर्दस्त दर्द हुआ था और मैं गर्दन को मोड़ भी नहीं सकता था। डाक्टर ने मुझे फीजियोथेरेपिस्ट के हवाले कर दिया था। उस ने कुछ दिन मेरी गर्दन को ट्रेक्शन दिया था। उस के बाद कुछ नियमित व्यायाम बताए थे। मेरा दर्द दूर हो गया था और उन व्यायामों के लगातार चलते आज तक किसी तरह की कोई परेशानी नहीं आई थी।

मैं ने रिसेप्सनिस्ट को दो सौ रुपए दिए, उस ने पचास रुपए मुझे लौटाए। लेकिन उन रुपयों की कोई रसीद नहीं दी। पहले घट चुके घटनाक्रम के कारण मेरी रसीद मांगने की हिम्मत भी न हुई। हम बाहर आ गए। नवानी तब तक पर्चा पढ़ चुका था और उस में लिखी दवाइयों पर टिप्पणी कर रहा था। मैं ने उस की टिप्पणी पर ध्यान नहीं दिया। मैं ने सामने की दुकान से सब दवाइयाँ लेने के लिए कहा तो नवानी ने मना कर दिया और कहा कि को-ऑपरेटिव की दुकान से लेंगे। यह दुकान अस्पताल परिसर में थी। हम अस्पताल परिसर में आ गए। वहाँ दवाइयाँ लेने में कोई आधा घंटा लगा। मैं दवाइयाँ उसी रात से आरंभ करना चाहता था। लेकिन नवानी ने कहा कि सुबह से लेना अन्यथा क्रम बिगड़ जाएगा। घर आ कर नवानी ने बताया कि किस किस काम के लिए हैं। मुझे इतना ध्यान रहा कि एक गोली रोज सुबह पेट साफ रखने के लिए दी गई हैं। मैं ने उस की इन बातों पर कोई गौर नहीं किया। डाक्टर ने मुझे किसी दवा के लिए नहीं बताया था कि कौन सी कब लेनी है और कैसे लेनी है। वैसे मैं ने आम तौर पर देखा है कि डाक्टरों के पास इतना समय नहीं होता। यह काम उन्हों ने उन केमिस्टों के लिए छोड़ दिया है जहाँ से दवा खरीदी जाती है। लेकिन मुझे तो केमिस्ट ने भी कुछ नहीं बताया था। मैं ने भी नवानी के साथ होने के कारण नहीं पूछा। अब मैं ने नवानी को कहा कि वह मुझे सिर्फ इतना बता दे कि कौन सी गोली कब-कब लेनी है। नवानी यह बता कर कि कौन सी दवा कब लेनी है, अपने घर चला गया।

मेरी नींद खुली तो शाम ढल रही थी। घड़ी छह से ऊपर का समय बता रही थी। मैं कोई ढाई घंटे सोया था। पत्नी ने कॉफी बना कर दी। तो मुझे स्मरण हुआ कि आज दूध लाना तो छूट गया है। मैं ने पत्नी को उलाहना दिया कि उसने जगाया ही नहीं दूध लाना था। उस ने कहा -आप गहरी नींद में थे तो मैं ने जगाया नहीं।
-अब दूध का क्या होगा?
-सुबह तक का हो जाएगा। सुबह ले आएंगे। पत्नी का इस तरह बोलना मुझे अच्छा लगा।
रात के भोजन के बाद मैं ने फिर से वे दो गोलियाँ खाईँ। काम करता रहा लेकिन फिर से जल्दी ही नींद आने लगी। मैं ने भी सोचा कि सुबह जल्दी दूध लेने जाना पड़ेगा। हो सकता है नींद जल्दी न खुले। इसलिए जल्दी सो लो। मैं ने कार्यालय बंद कर अपने शयनकक्ष की राह ली।
... क्रमशः
15 टिप्पणियां:
लेकिन उन रुपयों की कोई रसीद नहीं दी। पहले घट चुके घटनाक्रम के कारण मेरी रसीद मांगने की हिम्मत भी न हुई।
हर दूसरा व्यक्ति आज रसीद नहीं देता है. इस तरह की कमाई को ही काला धन कहा जाता है. कई क्लेम कम्पनियां बिल की रसीद न होने के कारण क्लेम का निपटारा नहीं करती हैं या बहाने बनती हैं.
विदेशों में मरीज का अधिकार होता है प्रश्न पूछना, यहाँ पर हड़बड़ी का माहौल बनाये रहते हैं सब।
अंतिम टिप्पणी तो पूरा पढने के बाद ही
चंद्रकांता संतति की तरह आज भी रहस्य अधूरा ही रहा ....मगर जल्दी के बावजूद पूरा पढ़ा ! शुभकामनायें आपको !
ज्यो-ज्यो कहानी आगे बढ़ रही है, उत्सुकता बढ़ रही है.... वैसे रसीद लेनी चाहिए, मैंने तो अक्सर लेता हूँ.... आयकर बचाने में काम जो आती है :-)
likhker phir so to nahi gaye ? ab kaisi hai tabiyat?
हाँ हाँ, लिखते जाइये..
मैं पढ़ रहा हूँ, पर, अभी बोलना उचित नहीं कि आपको फिज़िऑथेरॅपिस्ट के पास जाना चाहिये ।
हाँ तो आगे... ?
वैसे डॉक्टर को बताना चाहिये कि दवा को पानी से लिया जाये या दूध से...
सोचा होगा, ज़िरह से बचने का यही तरीका है.. मेडिकल कम्पनी वाले के ज़िम्मे कर दो ।
वरना... पानी से...?
किस पानी से, ठँडे या गरम पानी से, हैण्ड पम्प या कुँये के पानी से, फिल्टर्ड या गैर फिल्टर्ड पानी से, जी म्यूनिसपैलिटी का पानी चलेगा ? इत्यादि इत्यादि...
नहीं नहीं दूध से... !
किस दूध से.. गाय के दूध से या भैंस के दूध से, पहली ब्यान की गाय या दूसरी ब्यान की भैंस, गाँधी जी बकरी के दूध से लेते थे मैं अगर डेयरी के दूध से लूँ, तो चलेगा ? इत्यादि इत्यादि...
कुल जमा यह कि सँतुष्ट होने की एक स्थिर सीमा है, असँतुष्ट रहने और सँशय में रहने की सीमायें अनन्त हैं..... हाँ तो आगे... ?
हम तो समझ गए थे कि मामला स्पांडिलाइटिस का है और आप को शायद ज़रूरत से ज्यादा ट्रेंकुलाज़र दिया गया जिसके कारण आप घोडे बेच कर सोते रहे और भैंस दूध संजो कर चलती बनी:)
डॉ अमर कुमार हमें उलझा रहे हैं ....:-)
dukh dard ki baat bhi itne rochak dhang se........age ke liye akulahat
aane ko hai.......
pranam.
हाँ तो आगे... ?
उत्सुकता बढाती हुई बेहतरीन कहानी है यह.
तीसरा पहले पढ़ लिया मगर फिर भी उत्सुक्ता बनी थी...
@प्रवीनजी से सहमत....डॉअमर की टिप्पणी पढ्कर लग रहा है जैसे वार्ड में बैठे किसी मरीज़ की हक़ीकत सुन रहे हों.... :) और सतीश जी उन्हें देख परेशान हो रहे हों....
अरे आप तो पढे लिखे हे, फ़िर वकील भी आप भी दवा की रसीद नही लेते, यह भी एक जुर्म हे:) वैसे हम यहां कोई भी नयी दवा जब लेते हे तो हमारे डाक्टर ओर केमिस्ट उस दवा के बारे पुरी जानकारी देते हे, ओर कुछ भी अलग बात लगने पर उसी समय फ़ोन करने या सुचित करने या अस्पताल जाने की चेतावनी देते हे, कई दवाओ से कब्ज जैसी शिकायत होती हे, उन दवा को उसी समय बंद कर देते हे. चलिये मजा आ रहा हे आप के लेख को पढ कर देखे आगे क्या होता हे. राम भली करेगा
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