Tuesday, May 24, 2011

डाक्टर देवता

ह पिछले सोमवार की बात है। कुछ दिनों से दाएँ हाथ को कुछ विशेष स्थितियों में दो तीन मिनट रखे रखने पर कंधे से पंजे की तरफ कंरट सा दौड़ता महसूस होता था। हाथ की स्थिति बदलने पर वह सामान्य हो जाता। मैं सोचता कि ऐसा क्यों हो रहा होगा। जो बात समझ आई वह यह थी कि कहीं कोई तंत्रिका घायल है और उस पर दबाव पड़ने पर ऐसा होता है। मैं ने इस का उल्लेख अपने मित्रों से किया।  सब ने तत्काल किसी न किसी चिकित्सक को दिखाने की सलाह दी। मैं अपने काम में लग गया। दो घंटे बाद वापस लौटा तो  मिस्टर पाल बोले -मेरी अपने मित्र मेडीकल कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल डाक्टर पी. के. शर्मा से बात हो गई है, उन्हों ने प्रोफेसर बारदाना से बात कर के शाम सात बजे का समय लिया है। आप शाम सात बजे दिखा आएँ, प्रोफेसर बारदाना नगर के सब से अच्छे न्यूरोफिजिशियन हैं। मैं भौंचक्का रह गया। वस्तुतः मैं फँस गया था। पॉल ने अपना मित्रता का कर्तव्य पूरा कर दिया था। अब मैं उस की बात न  मानता तो गलत ही नहीं, बहुत गलत होता। वह सोचता कि उस ने अपने मित्र का अहसान भी लिया और मुझे डाक्टर को दिखाने में ही संकोच हो रहा है। मैं सोच में पड़ गया।
मुझे हमेशा चिकित्सकों से बहुत परेशानी होती है। विशेष रूप से उन चिकित्सकों से जिन के पास अपने मरीज के लिए समय नहीं होता। मरीज एक भी सवाल पूछ ले, तो उन्हें परेशानी होने लगती है। मुझे कई लोगों ने कहा था कि उस न्यूरोफिजिशियन के यहाँ शाम को मेला सा लगता है, और वह मरीजों को ऐसे निपटाता है जैसे रेलवे की टिकट खिड़की पर टिकट बाबू पैसेंजरों को निपटा रहा हो। मुझे इन चिकित्सक महोदय का मरीज देखने का स्थान भी पता न था, न उन की शक्ल कभी देखी थी। मैं ने कभी किसी चिकित्सक के यहाँ रोगियों को हमेशा किसी न किसी के साथ देखा था। रोगी कभी अकेला नहीं होता था।  मैं ने भी सोचा कि मुझे भी अकेले नहीं जाना चाहिए। मुझे अकेला देख डाक्टर न जाने क्या सोच बैठे। पर मैं  किसे साथ ले जाता?  मेरे अनेक मुवक्किल दवा प्रतिनिधि हैं, जिन का काम  चिकित्सकों से मिलना ही होता है। मुझे नवानी का खयाल आया। मैने तुरंत उसे फोन किया और सारी बात बताई। उस ने वादा किया कि वह शाम को अवश्य आ जाएगा। अब मैं निश्चिंत हो गया था। अब डाक्टर से निपटने की जिम्मेदारी दवा प्रतिनिधि नवानी की थी। 
शाम को नवानी समय पर आ गया। हम डाक्टर बारदाना के यहाँ पहुँचे। घर के बाहर बहुत सी कारें और मोटरसायकिलें खड़ी थीं, कुछ लोग भी खड़े थे। किसी सामान्य व्यक्ति के घर के बाहर ऐसा होता तो लोग सोचते, जरूर इस घर में कोई गमी हो गई है। घर के बाहर लॉन में बहुत सी कुर्सियाँ पड़ी थीं उन पर भी लोग बैठे थे, कुछ लोग नीचे दूब पर ही बैठे थे, कुछ टहल रहे थे। अंदर एक बडे से हॉल में तकरीबन पंद्रह लोग बेंचों पर बैठे थे। हॉल में से एक दरवाजा अंदर की ओर खुलता था जो अभी बंद था। उस दरवाजे के ठीक बाहर एक आदमी  टेबल कुर्सी लगाए बैठा था, वह डाक्टर का रिसेप्सनिस्ट था। नवानी ने उस से डाक्टर के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि डाक्टर अभी विजिटिंग रूम में नहीं हैं। नवानी ने तुरंत मुझे कहा कि कुछ इंतजार करना पड़ेगा। 
कुछ देर बाद ही वहाँ एक और दवा प्रतिनिधि नरेश आ गया। उस के साथ एक स्त्री और एक पुरुष था। उस ने मुझे देखते ही पूछा -भाई साहब, आप! यहाँ कैसे?
-दाहिने हाथ में कुछ समस्या है, इसीलिए दिखाने आया हूँ। मैंने कहा। 
-आप ने मुझे बताया ही नहीं। मैं पहले से डाक्टर से समय ले कर आप को मिला देता। इस तरह के कामों  के लिए तो आप को मुझे सेवा का अवसर देना चाहिए। नरेश ने यह सब इतनी जोर से कहा था कि हॉल में बैठे सब लोगों ने सुना था। सब मेरी ओर देखने लगे थे। मुझे लगा कि मैं तुरंत ही एक विशिष्ठ व्यक्ति में तब्दील हो गया हूँ। शायद सब लोग सोचने रहे थे कि अब कम से कम और दो रोगी उन के और डाक्टर के बीच आ गए हैं। उन में से कुछ ने घड़ी भी देखी कि अब उन का नंबर कितने बजे आएगा। मुझे शर्म आने लगी थी कि मैं इंतजार कर रहे रोगियों और उन के साथ आने वाले लोगों की निगाहों में चुभने लगा था। नरेश ने विजिटिंग रूम का दरवाजा खोल कर देखा तो डाक्टर वहाँ आ चुके थे। पहले से अंदर बैठे किसी रोगी को देख रहे थे। उस ने साथ आए स्त्री-पुरुष को अपने साथ अंदर चलने को कहा और उन्हें साथ ले कर अंदर घुस गया। इस बीच नवानी बाहर चला गया था। मुझे भी लोगों की चुभती नजरों से दूर होने का यही तरीका नजर आया कि मैं बाहर जा कर उसे तलाश करूँ। मैं बाहर आया तो वह मोबाइल पर किसी से बात कर रहा था। मुझे देखते ही उस ने फोन बंद कर पूछा -डाक्टर आ गए? 
मैं ने कहा - हाँ आ गए हैं। नरेश किसी स्त्री-पुरुष को साथ ले कर आया था, उन्हे ले कर डाक्टर के पास अंदर चला गया है। 
-तब हम भी चलते हैं। वह मुझे साथ ले कर फिर हॉल में आ गया। कुछ ही देर में नरेश स्त्री-पुरुष के साथ बाहर आ गया। नवानी ने रिसेप्सनिस्ट को बताया कि मेरे लिए स्वयं डाक्टर पी.के. शर्मा ने प्रो. बारदाना से समय ले रखा है। इस पर उस ने बताया कि अंदर मरीज हैं। वे बाहर आ जाएँ तो आप चले जाइएगा। 
कुछ ही मिनटों में एक मरीज बाहर आ गया। नवानी मुझे साथ ले कर अंदर घुस लिया। वहाँ प्रोफेसर बारदाना एक रोगी को देख रहे थे। वे नवानी को देख कर भड़क गए। आप अंदर कैसे आ गए? मैं यहाँ से उठ कर चला जाता हूँ। प्रोफेसर अपनी कु्र्सी से उठ कर खड़ा हो गया। बेचारा नवानी सकपका गया। उस ने प्रोफेसर से कहा मैं बाहर चला जाता हूँ। नवानी तुंरत बाहर चला गया। मैं वहीं खड़ा रह गया। प्रोफेसर मुझे देखता रह गया। मैं ने उसे बताया कि मैं भी जा रहा हूँ। पर इतना बता देना चाहता हूँ कि मुझे डाक्टर पी. के. शर्मा ने आप से मिलने को कहा था। डाक्टर कुछ कहता इस के पहले मैं बाहर निकल आया। 
वानी बाहर खड़ा था। मुझे अब वहाँ रुकना वाजिब नहीं लग रहा था। मैं ने नवानी को कहा -बाहर चलो। मैं बाहर आ गया। पीछे-पीछे नवानी भी बाहर आ गया। 
मैं ने नवानी से कहा -वापस चलते हैं। हमें इस डाक्टर को नहीं दिखाना। शहर में बहुत डाक्टर हैं।
-भाई साहब! केवल दस मिनट रुको। हम दिखा कर ही चलेंगे। 
-कोई लाभ नहीं। इस वक्त डाक्टर जिस मूड में है, उसे दिखाना मूर्खता से कम नहीं। 
इस बीच नरेश भी वहाँ आ गया। कहने लगा -मैं डाक्टर से समय ले कर आता हूँ। कैसे नहीं देखेगा? 
मैं ने उसे कहा कि मुझे अब दिखाना ही नहीं है। वह कहने लगा -अभी मत दिखाओ, कल सुबह आप किस समय आ सकते हैं मैं डाक्टर से वही समय ले लेता हूँ। 
-मुझे इस डाक्टर को दिखाना ही नहीं है। शहर में बहुत डाक्टर हैं। 
तभी अंदर से कोई आया और कहने लगा -डाक्टर साहब ने आप को बुलाया है। अब नवानी और नरेश दोनों मेरे पीछे पड़ गए। कहने लगे जब डाक्टर खुद आप को बुला रहा है तो आप दिखा कर ही जाना चाहिए। मैं भी डाक्टर को दिखाने के इस झंझट से मुक्त होना चाहता था। मैं उन के साथ फिर हॉल में आ गया। वहाँ रिसेप्सनिस्ट ने मुझे देखते ही कहा -अन्दर एक मरीज है। उस के निकलते ही आप अंदर चले जाइएगा। मैं फिर उस के पास पड़ी खाली कुर्सी पर बैठ गया।
... क्रमशः
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