Friday, February 8, 2008

धूप की पोथी

मुंम्बई किसकी? दिल्ली किसकी?
बड़ी बहस छिड़ी है। नतीजा सभी को पता है।
भारत सभी भारतीयों का है।
इस बीच मराठियों, बिहारियों, उत्तर भारतीयों - सभी की बातें होंगी, हो रही हैं
इस बीच आदमी गौण हो रहेगा और राजनीति प्रमुख
राजनीति वह जो जनता को बेवकूफ बनाने और अपना उल्लू सीधा करने की है।
मुझे इस वक्त महेन्द्र 'नेह' की कविता 'धूप की पोथी' का स्मरण हो रहा है।
आप भी पढ़िए .......

धूप की पोथी

-महेन्द्र 'नेह'


रो रहे हैं

खून के आँसू

जिन्हों ने

इस चमन में गन्ध रोपी है !

फड़फड़ाई सुबह जब

अखबार बन कर

पांव उन के पैडलों पर थे

झिलमिलाई रात जब

अभिसारिका बन

हाथ उन के सांकलों में थे

सी रहे हैं

फट गई चादर

जिन्हों ने

इस धरा को चांदनी दी है !

डगमगाई नाव जब

पतवार बन कर

देह उन की हर लहर पर थी

गुनगुनाए शब्द जब

पुरवाइयाँ बन

दृष्टि उन की हर पहर पर थी

पढ़ रहे हैं

धूप की पोथी

जिन्हों ने बरगदों को छाँह सोंपी है !

छलछलाई आँख जब

त्यौहार बन कर

प्राण उन के युद्ध रथ पर थे

खिलखिलाई शाम जब

मदहोश हो कर

कदम उन के अग्नि-पथ पर थे

सह रहे हैं

मार सत्ता की

जिन्होंने

इस वतन को जिन्दगी दी है !

6 comments:

अनुनाद सिंह said...

दिनेश जी,

यह कविता काफी अच्ची लगी। पढ़वाने के लिये साधुवाद।


मैं आपसे बहुत दिनो से एक निवेदन करना चाहता था। आप विधि और न्याय से जुड़े हुए हैं। मै आपसे हिन्दी विकिपीडिया पर इस विषय से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण उपविषयों (टापिक्स) पर १०-१५ लेखों का योगदान करने का आग्रह कर रहा हूं। जब सब लोग अपने-अपने विशेषज्ञता के क्षेत्रों में लेखों का योगदान करने लगेंगे तो यह हिन्दी के लिये अत्यन्त कल्याणकारी होगा। जब तक हिन्दी में अनेकानेक विषयों की सूचना और ज्ञान नहीं होगा तब तक हिन्दी और हिन्दीभाषियों का कल्याण सम्भव नहीं है। हिन्दी विकिपीडिया इसके लिये एक महान अवसर बनकर आया है। कृपया यहाँ सतत योगदान करते रहें और अपने मित्रों से भी इसी तरह का आग्रह करें।

Mired Mirage said...

यह कविता पढ़वाने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती

दिनेशराय द्विवेदी said...

अनुनाद सिंह जी आप निवेदन नहीं अपितु मुझे अधिकार पूर्वक आदेश दे सकते हैं। यह काम करते हुए अच्छा लगेगा। कर्मण्यवाधिकारस्ते तो अपने रग रग में है। आप के हर आदेश के पालन का प्रयत्न भरपूर होगा।

Anonymous said...

aapne bilkul sahi kaha. jo log is tarah ki ladai ka shikar bante hain unmain se to adhiktar logon ko is sab se koi matlab nahin hota. unhain chinta hoti hai to sirf apna ghar chalane ki. is tarah ki bahas ya ladai neta sirf apna ullu seedha karne ke liye hi khadi karte hain.

Lavanyam - Antarman said...

ऐसी भावना का बारम्बार जिक्र होना जरुरी है

Gyandutt Pandey said...

सँकीर्णता के विरुद्ध जंग व्यापक होनी चाहिये। साथ ही बीमारू राज्योँ का विकास भी; जिससे व्यापक पलायन की आवश्यकता उत्तरोत्तर कम हो।

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