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बुधवार, 5 जनवरी 2011

आह! मेरे, दुनिया के सब से उदार लोकतंत्र !

गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने कहा है कि नक्सलियों के साथ सम्बंध रखने पर मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन को यदि गलत तरीके से सजा दी गई है तो इसे कानूनी तरीके से सुधारा जाएगा। यदि उन्हें गलत तरीके से दोषी ठहराया गया है तो इसे कानूनी तरीके से सुधारा जाएगा।  डॉक्टर कार्यकर्ता बिनायक सेन को कानून की एक अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया है और जो लोकतंत्र में विश्वास करते हैं तो उन्हें लोकतंत्र की प्रक्रिया का भी सम्मान करना चाहिए। 
ब चिदम्बरम जी भारत सरकार के गृहमंत्री हैं, वे इस बात को कैसे सोच सकते हैं कि बिनायक सेन को 7 मई को गिरफ्तार किया गया था, अगस्त 2007 में उस मुकदमे में आरोप पत्र दाखिल किया गया और फैसला हुआ 24 दिसंबर 2010 को। यह भी तब जब सर्वोच्च न्यायालय ने अदालत को मुकदमे की शीघ्र सुनवाई करने का आदेश दिया था। वर्ना हो सकता था कि अभी इस फैसले में कुछ साल और लग जाते। चिदम्बरम जी के पास शायद कानून मंत्रालय कभी नहीं रहा। राज्य सरकार का अनुभव तो उन्हें है ही नहीं। उन्हें शायद यह भी पता नहीं कि इस देश को वर्तमान में 60000 अदालतों की जरूरत है, और हैं लगभग 15000 मात्र। हम चौथाई अदालतों से काम चला रहे हैं और  लोग कम से कम चार गुना अधिक समय तक मुकदमे झेल रहे हैं। केन्द्र सरकार हर बार चिंता जताती है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह चुके हैं कि अधीनस्थ न्यायालयों की स्थापना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है जिसे उठाने में उन्हें रुचि लेनी चाहिए। लेकिन उन की सुनता कौन है। कांग्रेसी सरकारें ही इस बात पर कान नहीं देतीं तो अन्य दलों की सरकारों का उस से क्या लेना-देना है।  
बिनायक सेन के मामले में अभी सत्र न्यायालय का निर्णय हुआ है। अब मामला उच्च न्यायालय में जाएगा। वहाँ जो हालात हैं उस में वहाँ से फैसला होने में तीन-चार वर्ष भी लग सकते हैं, उस के उपरांत फिर कहा जा सकता है कि न्यायिक प्रक्रिया यहीं तक नहीं रुकती, आगे सर्वोच्च न्यायालय भी है। जहाँ इस तरह के मामले में सुनवाई में और चार-पाँच वर्ष लग सकते हैं। तब जा कर न्यायिक प्रक्रिया का अंत हो सकेगा। यही  दुनिया के सब से उदार लोकतंत्र का सच है।  तब तक बिनायक सेन को जेल में रहना होगा। उन की पत्नी और दो बेटियों को उन के बिना रहना होगा, बिनायक सेन को सजा सुनाए जाने के बाद से ही पुलिस लगातार जिन का पीछा करती रही है।  इस के साथ ही देश की वंचित जनता को उन के दिल की सुनने वाले एक चिकित्सक से वंचित होना पड़ेगा। जब तक बिनायक सेन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय अंतिम निर्णय नहीं दे देता, तब तक इतने लोगों की सजाएँ साथ-साथ चलेंगी। डॉ. सेन बाइज्जत बरी हो भी जाएँ, तो क्या इन सजाओं का औचित्य क्या रह जाएगा? 
चिदम्बरम जी! आप को शायद छत्तीसगढ़ के जंगलों के नीचे छुपी संपदा को निकालने और भरी हुई थैलियों को और मोटी बनाने की अधिक चिंता है। इस देश के न्यायार्थी को न्यूनतम समय में न्याय प्रदान करने की नहीं। शायद आप तो भूल भी गए होंगे कि इसी देश की संसद ने यह संकल्प पारित किया था कि प्रत्येक दस लाख की जनसंख्या पर 50 अदालतें स्थापित होनी चाहिए, यह लक्ष्य 2008 तक पूरा कर लिया जाए। लेकिन इस संकल्प का क्या हुआ? यह भी आप को पता नहीं होगा। हम दुनिया के सर्वाधिक उदार लोकतंत्र जो हैं। हम मुकदमे का निर्णय इतनी जल्दी कर क्यों अपनी उदारता त्यागें?
लेकिन इतने सारे जो लोग डॉ. बिनायक सेन के साथ-साथ सजा पाएंगे, आप उन की आवाज ही बंद कर देना चाहते हैं। कि वे न तो फैसले पर उंगली उठाएँ और न ही देश की इस अमानवीय न्याय व्यवस्था पर, जो एक बार आरोप सुना कर निरपराध साबित करने की जिम्मेदारी उस अभियुक्त पर ही डाल देती है जो पहले से  ही जेल में  बंद है। इस मामले में आप की उदारता कहाँ गई? शायद ऐसा करते समय भारत दुनिया का सब से अधिक उदार लोकतंत्र तो क्या?  उदार लोकतंत्र भी नहीं रह जाता। आह! मेरे, दुनिया के सब से उदार लोकतंत्र!

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

मैं एक विस्फोट भी हूँ ......

ज उस का जन्मदिन है, और वह जेल में है। क्या था उस का कुसूर? बस यही न कि उस ने उस सरकारी कारखाने में काम करने वाले ठेकेदार मजदूरों के लिए एक अस्पताल विकसित किया था, जो अपने स्थाई कर्मचारियों के लिए बेहतर से बेहतर सुविधाएँ प्रदान करता है, लेकिन वही अस्पताल एक मरती हुई मजदूरिन को अपने यहाँ चिकित्सा सुविधा नहीं दे सकता। कि उस ने गाँव गाँव में चिकित्सा सुविधाएँ पहुँचाने के काम में अपने जीवन के बेहतरीन साल गुजारे। जिस ने सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं द्वारा बंदूकों की नोंक अपने गाँवों से हाँक कर सरकारी केम्पों में ले जाए गए आदिवासियों के स्वास्थ्य की दुर्दशा के विरुद्ध आवाज उठाई। यही आवाज न केवल सलवा जुडूम योजना पर अपितु सरकार की नीयत पर भी प्रश्न चिन्ह बन गई। बस उसे देशद्रोही करार दिया गया और जेल में बंद कर दिया जीवन भर के लिए। 
लेकिन क्या, उसे बंद करने से जंगलों, गाँवों, कस्बों, नगरों और महानगरों से न्याय के लिए उठ रही आवाजें रुक जाएँगी। निश्चय ही वे आवाजें ऐसे नहीं रुक सकतीं। रुकना होगा तो उन्हें जो इन आवाजों को रोकने में लगे हैं। वे नहीं रुकेंगे, तो खत्म हो जाएँगे, जनता की यह आवाज तो उठेगी, कोलाहल बन कर न सुनने वालों को बहरा कर देगी, कि वे सुनने के काबिल नहीं रहेंगे। 
डॉ. बिनायक सेन के 61 वें जन्मदिन पर मुझे अपने दिवंगत साथी शिवराम की यह कविता स्मरण हो आती है - - -

मैं एक विस्फोट भी हूँ

-शिवराम

कुचल दो मुझे
मैं उठा हुआ सिर हूँ
मैं तनी हुई भृकुटि हूँ
मैं उठा हुआ हाथ हूँ
मैं आग हूँ
बीज हूँ
आंधी हूँ
तूफान हूँ

और उन्हों ने 
सचमुच कुचल दिया मुझे

एक जोरदार धमाका हुआ
चिथड़े-चिथड़े हो गए वे

उन्हें नहीं मालूम था
मैं एक विस्फोट भी हूँ।

**********************

मेरे दोस्त !
जन्मदिन मुबारक हो, तुम्हें,

उन्हें पता है, 
तुम्हें अंदर कर के 
उन्हों ने कितनी बड़ी गलती की है

पर अब  करें तो क्या?
तीर तो कमान से निकल चुका
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सोमवार, 3 जनवरी 2011

चर्चा या ब्लाग-पोस्ट सूची

द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायालय, रायपुर (छत्तीसगढ़) ने साल के अंतिम सप्ताह में जिस मामले पर निर्णय दिया वह बिनायक सेन मामले से जाना गया। यह एक ऐसा मुकदमा था जिस का लक्ष्य किसी अपराध विशेष के लिए किसी अभियुक्त अभियोजित करना और दंड देना था ही नहीं। इस मुकदमे का लक्ष्य सीधे तौर पर बिनायक सेन को दंडित करना था। यही कारण था कि यह मुकदमा बिनायक सेन के नाम से चर्चित हुआ।  उस मुकदमे को कोई और नाम नहीं दिया जा सकता था, आखिर कोई कृत्य या घटना होती तो उस के नाम से उस मुकदमे को जाना जाता। साल के अंतिम सप्ताह में दिया गया यह निर्णय देश भर के मीडिया में चर्चा का विषय  रहा। पहले समाचार के माध्यम से कि बिनायक सेन व अन्य दो को राजद्रोह में आजीवन कारावास का दंड दिया गया। फिर उस निर्णय की आलोचना आरंभ हो गई। इस आलोचना में बिनायक सेन के साथ संबद्ध लोगों से ले कर तटस्थ और बिनायक सेन की विचारधारा से असहमत और विरोधी तक शामिल थे। जैसे ही निर्णय सुनाया गया मेरे जैसे लोगों में यह जिज्ञासा हुई कि आखिर फैसले में जज ने क्या लिखा है? बिनायक सेन के खिलाफ क्या आरोप थे? उन्हें साबित करने के लिए क्या सबूत प्रस्तुत किए गए? और कैसे बिनायक सेन आरोपित अपराध के दोषी साबित हुए। फैसला प्रकाशित होता तो देखने में आता। डॉ. बिनायक सेन की तरफदारी करने वाले लोगों (पीयूसीएल) ने सब से अच्छी बात यह की कि उन्हों ने उस फैसले की प्रतिलिपि ज्यों की त्यों इंटरनेट पर उपलब्ध करा दी। उस फैसले का अंग्रेजी अनुवाद भी जितनी जल्दी संभव हो सकता था, उन्हीं लोगों ने नेट पर उपलब्ध कराया। जिस से न केवल उन के समर्थक अपितु तटस्थ और उन के विरोधी विचार के लोग भी उस का अध्ययन कर अपनी राय प्रकट कर सकें, एक तथ्यपरक बहस मीडिया में सामने आ सके। इस तरह पीयूसीएल ने अपनी परंपरा के अनुसार सब के बीच उस फैसले पर एक खुली बहस आरंभ करने की पहल की। 
हर मामले का तथ्यपरक अन्वेषण करना और साक्ष्यों सहित लोगों के सामने रखते हुए जहाँ भी नागरिकों के सिविल अधिकार आहत होते हों वहाँ उन की पैरवी करने के लिए ही पीयूसीएल का गठन हुआ और इसी के लिए वह काम भी कर रहा है। संगठन के उपाध्यक्ष की हैसियत से यही काम करना शायद वह अपराध बना जिस के लिए उन्हें सजा सुनाई गई है। 
ह सहज ही था कि हिन्दी ब्लाग जगत में भी इस घटना और निर्णय की चर्चा होती, जो हुई। कुछ चिट्ठों ने उस पर लिखा। हि्न्दी के कुल चार ब्लागों पर जो कुछ लिखा गया  उस की चर्चा डॉ. अनुराग ने चिट्ठा चर्चा पर की। डॉ. अनुराग डॉ.बिनायक सेन के हमपेशा हैं। बिनायक सेन के बारे में जो कुछ उन का स्वयं अनुभव और भावनाएँ थीं, चर्चा करते समय चर्चा की भूमिका और उपसंहार में उन का उल्लेख होना बिलकुल भी अस्वाभाविक न था। लेकिन उसी चर्चा को चिठ्ठाचर्चा की एकतर्फियत कहते हुए विवादित बनाने का प्रयत्न किया गया। जहाँ तक उस चर्चा के लिखे जाने तक बिनायक सेन मामले में फैसले के समर्थन में किसी हिन्दी ब्लाग पर कोई उल्लेखनीय पोस्ट नहीं लिखी गई थी। यदि लिखी जाती और उस का उल्लेख उस चर्चा में न होता तो यह कहा जा सकता था कि चर्चा एक तरफा है। जहाँ तक मेरी जानकारी है चिट्ठा चर्चा भी एक सामुहिक ब्लाग ही है और उस पर जो भी चर्चा करता है वह चर्चा करते हुए अपना मत सदैव ही अभिव्यक्त करता भी है। ऐसे में किसी चर्चा को एकतरफी चर्चा कहना मैं तो उचित नहीं समझता। फिर चिट्ठा चर्चा में पाठकों को अपना मत रखने के लिए टिप्पणी करने की स्वतंत्रता बिना किसी मॉडरेशन के उपलब्ध है और वह चर्चा आरंभ कर के बंद नहीं कर दी जाती है। चर्चा का आरंभ सदैव ही किसी विषय पर एक विचार विशेष से होता है, फिर वहाँ उस के समर्थन में या विरोध में विचार आते हैं और विमर्श आरंभ होता है। यदि ऐसा नहीं है तो वह कैसी चर्चा है। क्या केवल कुछ चिट्ठों के लिंक लगा देने को चर्चा कहा जा सकता है? उसे तो "ब्लाग-पोस्ट सूची" कहना पर्याप्त होगा। ऐसा भी नहीं है कि उस चर्चा पर विरोधी मत न आए हों। लेकिन कोई विमर्श से ही बचना चाहे और बिना कुछ कहे सरक ले तो उस का कोई उपचार नहीं है। ब्लाग जगत में कोई किसी हितैषी को सद्भावना पूर्वक दी गई नितांत व्यक्तिगत सलाह को धमकी घोषित कर तमाशा खड़ा कर आनंद  लेने लगे तो इलाज तो उस का भी नहीं है। बात आरंभ करने के पहले ही कोई अपने मनोगत निर्णय के साथ किसी विवाद में एक पक्ष की और मजबूती से खड़ा हो जाए और फिर कहे कि हम जजमेंटल नहीं है, इस से बड़ी 'साफगोई' क्या कोई हो सकती है?
बिनायक सेन पर सुनाए गए निर्णय पर निर्णय के बचाव में यह तर्क तो सामने आया  है कि न्यायिक निर्णयों पर मीडिया में बात नहीं होनी चाहिए, लेकिन उस निर्णय के समर्थन में कोई तथ्यपरक बात अभी तक किसी के भी द्वारा नहीं कही गई है। लेकिन यह तर्क स्वयं जनतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। जनतंत्र में किसी भी निर्णय की आलोचना तथ्यों के आधार पर की जा सकती है, यदि इस आलोचना का जनता को अधिकार नहीं होगा तो न्यायपालिका निरंकुशता की ओर बढ़ेगी। इस के अतिरिक्त यह तर्क भी दिया जा रहा है कि क्या मानवाधिकार केवल डॉ. बिनायक सेन के ही हैं? उन के नहीं जो नक्सलियों के हाथों मारे जा रहे हैं। डॉ. बिनायक सेन के मामले में कोई भी मानवाधिकार की बात नहीं कर रहा है। उन पर सीधे-सीधे कुछ अपराध करने का आरोप है। बात मानवाधिकार की नहीं, सिर्फ इतनी है कि क्या उन्हें दंडित किए जाने का निर्णय उचित है? यह सब कानून के आधार पर ही परखा जाएगा, न कि भावनाओं से। वह फैसला सब के पढ़ने के लिए उपलब्ध है, जो भी उस की कानूनी विवेचना कर सकता है, करे। तथ्यों और तर्कों के आधार पर अपनी बात कहे, किस ने रोका है?  जहाँ तक नक्सलियों द्वारा मारे जा रहे लोगों की बात है तो यह मानवाधिकार का प्रश्न नहीं, सीधे-सीधे जन-सुरक्षा और अपराध नियंत्रण का प्रश्न है। संबंधित सरकारें वहाँ जन सुरक्षा और अपराध नियंत्रण में असफल रही हैं और अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए विशेष जनसुरक्षा अधिनियम बनाती हैं और उस अमानवीय कानून का विरोध करने वाले डॉ. बिनायक सेन जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को राजद्रोही कह कर दंडित करने में जुट जाती हैं।

रविवार, 2 जनवरी 2011

एक दिन हम इन सारी बाधाओं को हटा डालेंगे

ल हम ने बांग्ला साहित्य के शिखर पुरुष गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर और आधुनिक हिन्दी साहित्य के आधुनिक युग के मौलिक निबंधकार, उत्कृष्ट समालोचक एवं सांस्कृतिक विचारधारा के प्रमुख उपन्यासकार आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के कुछ उद्धरण स्मरण किये थे। द्विवेदी जी का कहना था "हम ऊपर से कितने ही खंड रूप और ससीम क्यों न हों, भीतर से निखिल जगत के साथ 'एक' हैं। साहित्य हमें प्राणीमात्र के साथ एक प्रकार की आत्मीयता का अनुभव कराता है। वस्तुतः हम अपनी उसी 'एकता' का अनुभव करते हैं।" 
गुरुदेव इस एकता में द्वैत के दर्शन भी कराते हैं, वे कहते हैं  "लोभ के इस संकीर्ण ऐक्य के साथ सृष्टि के ऐक्य का, रस-साहित्य, और ललित कला के ऐक्य का संपूर्ण प्रभेद है। निखिल को छिन्न करने से लोभ होता है और निखिल को एक करने से रस होता है। लखपति महाजन रुपए की थैली ले कर 'भेद' की घोषणा करता है, गुलाब 'निखिल' का दूत है, वह 'एक' की वार्ता को ले कर फूटता है। जो 'एक' असीम है, वही गुलाब के नन्हे हृदय को परिपूर्ण कर के विराजता है।"
म इस द्वैत का अनुभव हमारे जीवन में पग-पग पर करते हैं। हम पहले मनुष्य को ही खाँचों में बाँट देते हैं। वह अमरीकी है, यह जर्मन है, कोई अंग्रेज तो कोई जापानी, वह पाकिस्तानी है तो मैं भारतीय हूँ। हम भारतीय तक भी आ कर नहीं रुकते। मैं हिन्दू हूँ तो वह मुसलमान है और वह ईसाई। हिन्दुओं में भी सिक्ख अलग हैं और जैन अलग। हमारे इस पावन भारतवर्ष में पवित्रता और अपवित्रता का खास ध्यान भी रखा जाता है, वह अवर्ण है, क्यों कि वह अपवित्र काम करता है। मैं सवर्ण हूँ, क्यों कि मैं पवित्र काम करता हूँ। फिर सवर्णों में भी ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य हैं। महानगरों में यह पहचान धूमिल हुई है तो वहाँ धनसंग्रह ने वह काम कर दिखाया है। जिन लोगों के पास अकूत धनराशि है तो उन्हों ने अधिकांश साधनों पर अधिकार कर लिया है और वे अब काम नहीं करते सिर्फ कराते हैं। काम करने वाले और काम कराने वाले का प्रभेद दिखने लगा है। जो श्रम कर रहा है वह निम्न कोटि का है और जो श्रम खरीद रहा है वह श्रेष्ठ है। जिधर भी हम देखते हैं उधर द्वैत है। कहीं तो एक्य नहीं है। 
विज्ञान भी ऐसा ही कुछ दिखा रहा है। पहले सोचते थे अणु ही सब से छोटा कण है, फिर हमें परमाणु का पता लगा। फिर परमाणु में हमें इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन और न्यूट्रोन दिखाई देने लगे। एक को खोदा तो तीन निकल आए। फिर पता लगा कि प्रोटोन और न्यूट्रोन भी ऋणात्मक और धनात्मक प्रकार के समान संहति वाले कणों से बने हैं जिन्हें क्वार्क के नाम से जाना गया। वहाँ अभी आगे खोज जारी है। लेकिन यह खोज उस तरफ बढ़ रही है जिस के संकेत कहते हैं कि ऊर्जा और पदार्थ दोनों एक ही प्रकार के कणों या तरंगों से बने हैं। इस तरह विज्ञान संकेत दे रहा है कि आखिर एक ही वस्तु है जिस से निखिल विश्व निर्मित है। वह भी हमें इस असीम एक की और ले जा रहा है। 
मैं निखिल विश्व की उस असीम एकता का अनुभव कर के, आनंद से अभिभूत हो उठता हूँ। खो जाता हूँ, अपने आप में। मेरा अपना आप इतना विस्तार पा गया है कि मैं ब्रह्म हो उठा हूँ। मैं असीम हो चला हूँ। जो कुछ है सब मुझ में ही समाहित है। सभी कुछ मैं ही हूँ, सब मेरे ही अंग हैं। मुझ से परे कोई नहीं। काशी के घाट पर गंगास्नान करता हूँ और गीले वस्त्रों से ही चल पड़ता हूँ, विश्वनाथ के दर्शनों के लिए। राह में कोई छू देता है। देखता हूँ वह मेहतर है, सफाई करने का झाड़ू उठाए हुए। मेरा स्वप्न टूट जाता है। विश्व के प्रभेद सामने आ खड़े होते हैं। मुझे छू देने की हरकत के लिए मैं उसे डाँटता हूँ, उस ने कोई अपराध कर दिया  है, वह अपराधी है, मुझे अवसर मिले तो मैं उसे निश्चित ही कठोर दंड दूँ।
साहित्य  हमें इस एक्य की और ले जाता है, लेकिन बहुत सी चीजें हैं जो हमें पकड़ कर वापस द्वैत में ले आती हैं जैसे मेरे मन में पैठा हुआ छूत-अछूत का विचार। क्यों नहीं मैं उस विचार को अपने भीतर से निकाल फैंकता। पर भीतर से निकाल कर फैंकने से क्या होगा? समाज में तो ये प्रभेद भरे पड़े हैं, वह गुलाब नहीं है, वह कोई बदबूदार चीज बन गई है। मैं उसी का एक अंग बना हुआ हूँ। जैसी बदबू मैं महसूस कर रहा हूँ, वैसी ही बदबू मुझे मेरे अंदर से आने लगती है। मैं अपनी ही नाक बंद कर लेता हूँ। लेकिन कब तक नाक को बंद रख सकता हूँ। ऐसे तो श्वास ही बंद हो लेगी। फिर प्राणवायु कहाँ से मिलेगी? मैं जीवित कैसे रह पाउंगा? मैं नाक को खोल देता हूँ। बदबू का एक असहनीय भभका नाक के अंदर घुस पड़ता है। यह कैसी अवस्था है? एक ओर खाई तो दूसरी ओर कुआँ है। जीना दूभर है, कभी भी प्राण जा सकते हैं। अब तो कुछ करना ही होगा। 
मैं उन प्रभेदों को नष्ट करने का मार्ग तलाशने लगता हूँ। जात-पाँत तोड़ डालना चाहता हूँ, धर्मों की दीवारें समाप्त कर देना चाहता हूँ, मैं मालिक मजदूर का भेद समाप्त कर देना चाहता हूँ। क्यों रहें ये वर्ग? क्यों नहीं हो सकता मनुष्य एक? हो सकता है, अवश्य हो सकता है। सभी प्रकृति हैं, उसी से बने हैं, उन्हें तो एक होना ही है। हम बाधा बनेंगे तो देरी से होगा।  हम बाधाओं को हटाएंगे तो शीघ्रता से। मैं निकल पड़ता हूँ, उन बाधाओं को हटाने के लिए। बहुत से साथी मिलते हैं जो पहले से इन बाधाओं को हटाने में लगे हैं। कुछ इन बाधाओं को हटाते हटाते सदैव के लिए छोड़ चले जाते हैं। उन से कुछ अधिक नए साथ हो लेते हैं। पहले काफिला बना था। अब तो अनेक काफिले दिखाई देते हैं। हमें विश्वास है, एक दिन हम इन सारी बाधाओं को हटा डालेंगे। एक्य को प्राप्त कर लेंगे। 
आप क्या करना चाहते हैं? आ रहे हैं हमारे साथ एक्य के मार्ग की बाधाएँ हटाने, या बने रहना चाहते हैं, बाधा ही?

शनिवार, 1 जनवरी 2011

साहित्य की साधना : निखिल विश्व के साथ ऐकत्व अनुभव करने की साधना

नुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए वह जिस प्रकार अपने क्रियाकलाप में सामाजिक बना रहता है, उसी प्रकार विकार में भी। उस के इस सामाजिकपन का ही परिणाम है कि वह -
  1. अपने आप को नाना रूपों में अभिव्यक्त करना चाहता है,
  2. अन्य लोगों के करने-धरने में रस लेता है,
  3. अपने इर्द-गिर्द की वास्तविक दुनिया को समझना चाहता है, तथा
  4. कल्पना द्वारा एक ऐसी दुनिया का निर्माण करने में रस पाता है जो वास्तविक दुनिया  के दोषों से रहित हो। 
ये ही चार मूल मनोभाव हैं जो मनुष्य को साहित्य की तथा अन्य अनेक प्रकार की रचनाओं के लिए उद्योगी बनाए रखते हैं। इस का अर्थ यह हुआ कि मनुष्य के जीवन में ही वे उपादान मौजूद हैं जो उसे साहित्य की सृष्टि के लिए प्रेरित करते हैं; साथ ही इन्हीं मूल मनोभावों का यह परिणाम है कि वह दूसरों की रचना देखने, सुनने और समझने में रस पाता है। वस्तुतः हम ऊपर से कितने ही खंड रूप और ससीम क्यों न हों, भीतर से निखिल जगत के साथ 'एक' हैं। साहित्य हमें प्राणीमात्र के साथ एक प्रकार की आत्मीयता का अनुभव कराता है। वस्तुतः हम अपनी उसी 'एकता' का अनुभव करते हैं।                                                                   -आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी  


इसी संदर्भ में गुरुदेव रविन्द्रनाथ कहते हैं-
... मैं जब रुपया कमाना चाहता हूँ तो मेरा रुपया कमाने की नाना भाँति की चेष्टाओं और चिंताओं के भीतर भी एकता वर्तमान रहती है। विचित्र प्रयास के भीतर केवल एक ही लक्ष्य की एकता अर्थकामी को आनन्द देती है। किन्तु यह एक्य अपने उद्देश्य में ही खंडित है, निखिल सृष्टि-लीला से युक्त नहीं है। पैसे का लोभी विश्व को टुकड़े-टुकड़े कर के -झपट्टा मार कर -अपनी धनराशियों को इकट्ठा करता है। लोभी के हाथ में कामना की वह लालटेन होती है जो केवल एक विशेष संकीर्ण स्थान पर अपने समस्त प्रकाश को 'संहत' करती है। बाकी सभी स्थानों से उस का सामंजस्य गहरे अन्धकार के रूप में घनीभूत हो उठता है। अतएव लोभ के इस संकीर्ण ऐक्य के साथ सृष्टि के ऐक्य का, रस-साहित्य, और ललित कला के ऐक्य का संपूर्ण प्रभेद है। निखिल को छिन्न करने से लोभ होता है और निखिल को एक करने से रस होता है। लखपति महाजन रुपए की थैली ले कर 'भेद' की घोषणा करता है, गुलाब 'निखिल' का दूत है, वह 'एक' की वार्ता को ले कर फूटता है। जो 'एक' असीम है, वही गुलाब के नन्हे हृदय को परिपूर्ण कर के विराजता है। कीट्स अपनी कविता में 'निखिल-एक' के साथ एक छोटे से ग्रीक पात्र की एकता की बात बता गए हैं; कह गए हैं कि 'हे नीरव मूर्ति ! तुम हमारे मन को व्याकुल कर के समस्त चिंताओं को बाहर ले जाते हो, जैसा कि असीम ले जाया करता है।' क्यों कि अखंड 'एक' ही मूर्ति, किसी आकार में भी क्यों न रहे, 'असीम' को ही प्रकाशित करती है; इसीलिए अनिर्वचनीय है। मन और वाक्य उस का  कूल-किनारा न पा कर लौट आया करते हैं। [ विश्वभारती पत्रिका चैत्र -1999, पृ.110-111]

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी पुनः कहते हैं -
साहित्य की साधना निखिल विश्व के साथ एकत्व अनुभव करने की साधना है, इस से वह किसी अंश में कम नहीं है। जो साहित्य नामधारी वस्तु लोभ और घृणा पर आधारित है, वह साहित्य कहलाने के योग्य नहीं है। वह हमें विशुद्ध आनंद नहीं दे सकता। 
हार, निद्रा, भय आदि मनोभाव समस्त प्राणियों में समान हैं। मनुष्य जब इन की पूर्ति करता रहता है तो वह अपने उस छोटे प्रयोजन में उलझा रहता है जो पशुओं के समान ही है। बहुत प्राचीन काल से पशु-सामान्य प्रवृत्तियों को मनुष्य ने तिरस्कार के साथ देखा है। वह इन तुच्छताओं से ऊपर उठ सका है, यही उस की विशेषता है। जो बातें हमें जिन तुच्छताओं का दास बना देती हैं; या तुच्छताओं को ही मनुष्य का असली रूप बताती हैं, वे मनुष्य के चित्त से उस के महत्व को, उस के वैशिष्ट्य को और उस के वास्तविक रूप को हटा देती हैं। वे लोभ और मोह का पाठ पढ़ाती हैं। साहित्य वे नहीं हो सकतीं, क्यों कि उन की शिक्षा से मनुष्य खंड की साधना करता है, विभेद और तुच्छता को बड़ा समझने लगता है और सारे विश्व के साथ एकत्व की अनुभूति से विरत हो जाता  है।  
...... सभी उद्धरण आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की पुस्तक साहित्य का साथी से

तो नये वर्ष में हम संकल्प लें,  कि हम मनुष्य हो कर मनुष्यता की ओर बढ़ेंगे, अपनी पशुता को सीमित करेंगे। सारे विश्व के ऐकत्व की ओर अपने कदम बढ़ाएंगे। 

कत्व के इसी नए संकल्प के साथ, नव-वर्ष सभी के लिए मंगलकारी हो!!!

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

राजद्रोह (Sedition) को देशद्रोह कहना क्या अपराध नहीं है?

जिस अपराध के लिए डॉ.बिनायक सेन को रायपुर (छत्तीसगढ़) के अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने दंडित  किया है, उसी अपराध के लिए राष्ट्रपिता महात्मागांधी और लोकमान्य तिलक दंडित किए जा चुके हैं और उन्हें उस के लिए ब्रिटिश भारत की जेलों में दिन बिताने पड़े। आज उस अपराध को हिन्दी मीडिया  का एक हिस्सा 'देशद्रोह' शब्द का प्रयोग कर रहा है जो पूरी तरह अनुचित है। अंग्रेजी मीडिया इस के लिए Sedition शब्द का प्रयोग कर रहा है। भारतीय दंड संहिता (IPC) में भी इस यही शब्द प्रयोग किया गया है। डॉ. हरदेव बाहरी के शब्दकोष में Sedition का अर्थ 'राजद्रोह' किया गया है, न कि देशद्रोह। यदि Sedition का अर्थ देशद्रोह हो तो हमें लोकमान्य तिलक और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के लिए कहना होगा कि वे देशद्रोही थे जिस के लिए उन्हों ने सजाएँ भुगतीं।
यह केवल एक शब्द के अनुवाद और प्रयोग का मामला नहीं है। दंड संहिता की जिस धारा के अंतर्गत डॉ. बिनायक सेन को दंडित किया गया है उसे इसी संहिता में परिभाषित किया गया है और इस का अंग्रेजी पाठ तथा हिन्दी पाठ निम्न प्रकार हैं -
अंग्रेजी पाठ-
Section 124A. Sedition
Whoever, by words, either spoken or written, or by signs, or by visible representation, or otherwise, brings or attempts to bring into hatred or contempt, or excites or attempts to excite disaffection towards. 2[* * *] the Government established by law in 3[India], 4[* * *] shall be punished with 5[imprisonment for life], to which fine may be added, or with imprisonment which may extend to three years, to which fine may be added, or with fine.
Explanation1 -The expression "disaffection" includes disloyalty and all feelings of enmity.
Explanation2 -Comments expressing disapprobation of the measures of the attempting to excite hatred, contempt or disaffection, do not constitute an offence under this section.
Explanation3 -Comments expressing disapprobation of the administrative or other action of the Government without exciting or attempting to excite hatred, contempt or disaffection, do not constitute an offence under this section.

 हिन्दी पाठ -
धारा 124 क. राजद्रोह 
जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यप्रस्तुति द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, या असंतोष उत्तेजित करेगा या उत्तेजित करने का प्रयत्न करेगा वह आजीवन कारावास से, जिस में जुर्माना भी जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से जिस में जुर्माना जोड़ा जा सकेगा, या जुर्माने से दंडित किया जा सकेगा। 
स्पष्टीकरण-1 'असंतोष' पद के अन्तर्गत अभक्ति और शत्रुता की सभी भावनाएँ आती हैं। 
स्पष्टीकरण-2  घृणा, अवमान या असंतोष उत्तेजित किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना सरकार के कामों के प्रति विधिपूर्ण साधनों द्वारा उन को परिवर्तित कराने की दृष्टि से आक्षेप प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियाँ इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं। 
स्पष्ठीकरण-3  घृणा, अवमान या असंतोष उत्तेजित किए बिना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न किए बिना सरकार की प्रशासनिक या अन्य प्रक्रिया के प्रति आक्षेप प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियाँ इस धारा के अधीन अपराध नहीं हैं।
क्त दोनों पाठों का अध्ययन करने के बाद किसी भी भाँति इस अपराध को देशद्रोह का अपराध नहीं कहा जा सकता है। इसे राजद्रोह ही कहा जा सकता है। मीडिया  ने जिस तरह इस अपराध के लिए देशद्रोह शब्द का प्रयोग किया है उस का आरंभ जानबूझ कर किया गया है, बाद में अनुकरण के माध्यम से इस शब्द को प्रचार मिला है और लोग इस का अंधानुकरण कर रहे हैं। मेरी स्वयं की मान्यता है कि जो ताकतें चाहती थीं कि बिनायक सेन को येन-केन-प्रकरेण सजा मिले जिस से कम से कम छत्तीसगढ़ का कोई सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी शासन के विरुद्ध बोलने-लिखने और आवाज उठाने की हिम्मत न करे वे ही शक्तियाँ इस शब्द के प्रचार के पीछे रही हैं और इरादतन Sedition को बार-बार देशद्रोह लिखा जा रहा है। यह कृत्य भी किसी अपराध से कम नहीं है।
मेरा सभी मीडियाकर्मियों, ब्लाग लेखकों और बुद्धिजीवियों से आग्रह है कि वे इस षड़यंत्र को समझें और Sedition को देशद्रोह लिखना बंद करें, इसे राजद्रोह ही लिखा जाए।

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

मरे ठंड से

सर्दी जोरों की है
दिल्ली में कोहरा है 
वायुयान देरी से उड़ रहे हैं 
या उड़ानें रद्द हैं
कहीं कहीं बरसात है
पीछे तेज हवा है
शीत लहर जारी है
अखबारों में लोगों के 
सर्दी से मरने की खबरें हैं

ह कोई कविता नहीं,  मौसम का जायजा भर है। आप यादवचंद्र जी से अवश्य परिचित होंगे यदि नहीं तो यहाँ इस ब्लाग पर यादवचंद्र वाली टैग को क्लिक कर देखें, आप उन्हें जानने लगेंगे। यहाँ उन की एक कविता प्रस्तुत है......


मरे ठंड से
  • यादवचंद्र
सूरज - चांद - सितारे सारे     अस्त आज दो हफ्तों से
मंगन - दाता - सेठ - मजूरे     त्रस्त आज दो हफ्तों से
रिक्सा चला, न गाड़ी निकली  पस्त आज दो हफ्तों से
सिर्फ शराबी - तस्कर - नेता व्यस्त आज दो हफ्तों से

जोर ठंड का ऐसा प्यारे
दूकानों से लकड़ी गायब
गाँव गाँव में जोर श्राद्ध का
कफन, दही, औ पगड़ी गायब
पाले के मारे खेतों से
आलू दलहन मसूरी गायब
पॉकिट कटी कमल साहु ने 
हुई भूख से अंतड़ी गायब

अन्न - वस्त्र के बिना मरे, पर
रपट हो गई - मरे ठंड से
खैर, सभी दल मिल - जुल उन की
शोक - सभा कर रहे ढंग से 
पारित  कर प्रस्ताव शोक का 
भाषण देंगे अंग - अंग से
भरे - पेट अखबार रहेंगे
फोटो - भाषण - ग़ज़ल - व्यंग से

बूढ़े, बच्चे नाक सुड़कते         खाँस रहे दो हफ्तों से 
कब दिन बदले, पंडित  पतरा  बाँच रहे दो हफ्तों से
कब ब्याहेगी गैया, दादी        आँक रही दो हफ्तों से 
गौने आई दुलहन सूरज        झाँक रही दो हफ्तों से