@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

शनिवार, 22 अक्टूबर 2022

जज, या ............... ?

कोलिसिस्टेक्टोमी (पित्ताशय उच्छेदन) का ऑपरेशन 8 अक्तूबर 2022 को हुआ, 10 अक्तूबर को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। पाँच दिन बाद दिखाने को कहा गया। मैं 15 अक्तूबर को खुद कार ड्राइव करके डाक्टर को दिखाने गया तो टाँके हटा दिए गए। अदालत जाने की इजाजत मिल गयी। लेकिन न झुकने का प्रतिबंध था। फिर भी मैं 17 अक्तूबर को अदालत चला गया। चैम्बर में बैठा, कैन्टीन चाय पीने के लिए भी गया। लेकिन किसी अदालत में पैरवी के लिए नहीं गया। शाम को घर लौटा तो थकान से लगा कि अभी मुझे कम से कम एक सप्ताह और अदालत जाने से बचना चाहिए। मैंने तय किया कि अब दीवाली के बाद ही अदालत जाउंगा। अपने घर वाले ऑफिस में बैठ कर ही केस स्टडी करता रहा। लेकिन बुधवार 19 अक्तूबर को ही अदालत जाने की नौबत आ गयी।

हुआ ये कि उस दिन मेरे दो केस लगे हुए थे, मुझे इसबात की पूरी आशंका थी कि मौजूदा जज साहब ये मुकदमे हमें सुने बिना ही खारिज कर देंगे। जब कि यह कानून के मुताबिक गलत था। मैंने उस दिन अदालत जाने का निश्चय किया और अपने सहायक यादव को कहा कि वह 12 बजे तक मेरे मुकदमों की स्थिति बताए। तो यादव ने मुझे बताया कि रीडर से पूछने पर उसने कहा है कि उन केसेज को तो खारिज करने का आदेश कर दिया गया है। जब यादव ने उससे कहा कि हमें बिना सुने ऐसा कैसे हो सकता है। तो उसने कहा कि सब मुकदमों में यही तो हो रहा है। उसने जज साहब से बात करने को कहा। जब यादव ने जज साहब से बात की तो उन्होंने रीडर को निर्देश दिया कि इनके इस तरह के सारे मुकदमे दिसंबर के अंत में एक साथ लगा दो। इस पर रीडर ने हमारे मुकदमों में दिसम्बर अन्त की तारीख दे दी। यादव ने कहा भी कि वे इस बिन्दु पर बहस के लिए अदालत आने को तैयार हैं तो जज साहब ने कहा कि उनका आपरेशन हुआ है यहाँ आना उनके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। उन्हें यहाँ क्यों बुला रहे हैं।

मुकदमों में अगली तारीख मिल जाने पर मेरा अदालत जाना जरूरी नहीं रह गया था। लेकिन मुझे एक बात कचोट रही थी कि मेरे मुकदमे खारिज होने से बच जाएंगे लेकिन बहुत सारे मजदूरों के केस खारिज कर दिए जाएंगे। उन्हें उच्च न्यायालय से निर्णय बदलवाकर लाना होगा। एक मजदूर के लिए श्रम न्यायालय में मुकदमा लड़ना बेहद खर्चीला और श्रम साध्य होने के कारण दूभर होता है। उसके लिए उच्च न्यायालय जाने की सोचना ही प्राणलेवा होता है। मैंने अदालत जाना और जज से उसी दिन बहस करना उचित समझा। मैं सूचना मिल जाने के बावजूद अदालत पहुँच गया। मैंने यादव को फाइल लेकर अदालत में तैयार रहने को कहा था। जैसे ही मैं अदालत में जा कर बैठा, जज की मुझ पर निगाह पड़ी। तत्काल वह हड़बड़ाया हुआ दिखाई दिया।

असल में मामला यह था कि केन्द्र सरकार ने 2016 में पाँच कानून पास करके हजार से भी अधिक कानूनों, संशोधन कानूनों को निरस्त (निरसन) और संशोधित कर दिया था। उसमें एक कानून औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम (2010) भी था। इस संशोधन के माध्यम से एक मजदूर को उसकी सेवा समाप्ति के विरुद्ध समझौता अधिकारी के यहाँ शिकायत प्रस्तुत करने और 45 दिनों की अवधि में श्रम विभाग के समझौता कराने में असफल रहने पर सीधे श्रम न्यायालय को अपना दावा प्रस्तुत करने का अधिकार मिला था। इस अधिकार के 2016 में समाप्त हो जाने पर 2016 से अब तक पिछले 6 सालों में अदालत में इस कानून के तहत पेश किए गए सभी मुकदमे खारिज हो जाने थे। इन मुकदमों की संख्या सैंकड़ों में है। जज का कहना था कि त्रिपुरा और बंगाल उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि संशोधन कानून का निरसन हो जाने से मूल कानून औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 जिस में संशोधन करके प्रावधान जोड़े गए उसमें से वे संशोधन भी खारिज हो गए हैं और इसी कारण से उक्त निरसन अधिनियम प्रभावी होने के बाद अदालत में सीधे पेश किए गए मजदूरों के विवाद पूरी तरह से अवैध अकृत हो गए हैं इस कारण उन्हें निरस्त कर दिया जाए।

संशोधन कानूनों के निरसन पर जिस कानून में उस संशोधन कानून के द्वारा संशोधन किया गया था उससे वह संशोधन खारिज हो जाने के बिन्दु पर “जेठानन्द बेताब बनाम दिल्ली राज्य {1960 AIR 89, 1960 SCR (1) 755}” में सुप्रीम कोर्ट ने 15.09.1959 को ही निर्णय दे दिया गया था। इस निर्णय में कहा गया था कि किसी संशोधन कानून का काम पहले से मौजूद किसी पुराने कानून में संशोधन करना होता है। इस संशोधन कानून के प्रभावी होने के बाद वह संशोधन पुराने कानून का हिस्सा बन जाता है। यहीं संशोधन कानून का काम पूरा हो जाता है। वह कानूनों की सूची में अवशेष के रूप में बचा रहता है, उसका कोई उपयोग नहीं रह जाता। उस संशोधन कानून का निरसन कर दिए जाने पर उसका कोई प्रभाव उस पुराने कानून पर नहीं पड़ता जिसे संशोधित किया गया था। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने जनरल क्लॉजेज एक्ट की धारा 6-ए का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें ऐसा ही प्रावधान किया गया है। इसी पूर्व निर्णय का उल्लेख करते हुए दिनांक 29.08.2022 को सुप्रीम कोर्ट ने इंडिपेंडेंट स्कूल फेडरेशन ऑफ इंडिया बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया एवं अन्य के मामले में पारित निर्णय में फिर से इसी बात को दोहराया है।

जज को पहली फुरसत मिलते देख मैं सामने जा कर खड़ा हुआ तो जज साहब बोले -आप क्यों आए? आपको अभी आराम करना चाहिए। हमने तो आपके मुकदमों में तारीख दे दी है।

-सर¡ उससे क्या होगा? आपने दिसम्बर में तारीख दी है। तब तक तो आप इसी बिन्दु पर दूसरे सैंकड़ों मुकदमे खारिज कर चुके होंगे। जो कानून के हिसाब से गलत फैसला होगा। मेरी ड्यूटी है कि मैं अदालत को गलत निर्णय पारित करने से रोकूँ।

-दूसरे मुकदमों से आपका क्या लेना देना? हम खारिज कर देंगे और उच्च न्यायालय ने इसे गलत बताया तो हम वापस रेस्टोर कर देंगे।

-सर¡ रेस्टोर तो तब कर पाएंगे जब आपको ऐसा करने का क्षेत्राधिकार होगा। इस अदालत को अपने निर्णय रिव्यू करने की पावर नहीं है।

-नहीं है तो क्या? हम फिर भी कर देंगे। आप ही तो कहते रहे हैं कि इस अदालत को इन्हेरेंट पावर है।

-सर¡ रिव्यू की पावर कभी भी इन्हेरेंट नहीं हो सकती।

-तो क्या हुआ, हम फिर भी कर देंगे। जज साहब ने कहा तो मैं दंग रह गया कि कैसे जज अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर भी जा कर आदेश पारित करने को तैयार है।

-ठीक है मेरा तो आपसे आग्रह है कि इस बिन्दु पर आप बहस सुन लें। जहाँ तक मेरा मुकदमा आज नहीं होने की बात है तो मैं ऐसे तमाम मुकदमों में मजदूरों से पावर हासिल कर लूंगा और कल आपके सामने दुबारा इसी बहस के लिए हाजिर होउंगा। तब आप इससे बच नहीं सकते। इससे बेहतर है आप इस बहस को आज ही सुन लें।

-ठीक है सुन लेता हूँ। आखिर जज साहब बहस सुनने को तैयार हो गए।

बहस वही थी, जो मैं ऊपर लिख चुका हूँ। मैंने बहस शुरु की। मैंने उन्हें निरसन कानून की धारा-4 पढ़ाई जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा था। “The repeal by this Act of any enactment shall not effect any other enactment in which the enactment has been applied, incorporated or referred to;”

इस धारा के पढ़ते ही जज साहब बीच में ही बोल पड़े। कि इस कानून को पढ़ कर तो कलकत्ता और त्रिपुरा उच्च न्यायालयों ने निर्णय पारित किए हैं। जिसमें बहुत सारे वकीलों ने बहस की है तो वे गलत कैसे हो सकते हैं?

मैंने उन्हें कहा कि उन दो फैसलों को कुछ देर के लिए भूल जाइए और मेरी बहस सुन लीजिए। मैंने उन्हें सुप्रीम कोर्ट के 1959 में पारित “जेठानन्द बेताब के केस और 29.08.2022 को पारित इंडिपेंडेंट स्कूल फेडरेशन के मुकदमों का हवाला दिया।

जज साहब ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर बिलकुल ध्यान न देते हुए तर्क दिया जेठानन्द बेताब किसी और कानून के मामले में था और इंडिपेंडेंट स्कूल फेडरेशन का मुकदमा ग्रेच्युटी एक्ट के मामले में है इन दोनों में औद्योगिक विवाद अधिनियम के बारे में कुछ नहीं कहा है।

मैं ने उन्हें कहा कि ग्रेच्युटी संशोधन अधिनियम को निरस्त किया गया है उसी कानून की उसी सूची में औद्योगिक विवाद संशोधन अधिनियम भी शामिल है और यहाँ प्रश्न किसी खास कानून के निरसन का नहीं है बल्कि संशोधन अधिनियम के निरसन का है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि संशोधन अधिनियम निरसित कर दिए जाने पर जिस एक्ट में उसके द्वारा संशोधन किया गया है उस एक्ट के उस संशोधन पर कोई प्रभाव नहीं होता, वह जीवित रहता है।

जज साहब फिर से कहने लगे त्रिपुरा और कलकत्ता उच्च न्यायालय के जज और वहाँ बहस करने वाले वकील कैसे गलती कर सकते हैं?

मैं ने उन्हें कहा कि गलती तो कोई भी कर सकता है। “अरब के घोड़े प्रसिद्ध होने का मतलब ये नहीं होता कि वहाँ गधे नहीं होते।“

जज साहब ने मुझे घूर कर देखा। फिर रीडर को आदेश दिया कि मैं इस मामले को देखूंगा अभी कुछ दिन इस तरह के मुकदमों में कोई आदेश पारित न किया जाए।

बहस पूरी हुई। मैं अदालत से घर आ गया। उस दिन बहुत थकान हो गयी। अगले दो दिन मैं अदालत नहीं जा सका। अब दीवाली के बाद अदालत जाना हो सकेगा।

पर कल मैंने फिर सुना है कि जज साहब ने सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय को नकार दिया है और कुछ मुकदमे खारिज कर दिए गए हैं।

सवाल यह है कि जज साहब इस तरह की जिन्दा मक्खी क्यों निगल रहे हैं? बात सिर्फ इतनी सी है कि रोज दो मुकदमे खारिज होने से उनका निर्णय का कोटा आसानी से पूरा हो रहा है। वे आसानी से कह भी रहे हैं कि उच्च न्यायालय का निर्णय आने पर मैं उन्हें फिर से रेस्टोर कर दूंगा। पर सैंकड़ों मजदूरों को उच्च न्यायालय जा कर हजारों रुपए खर्च करने होंगे। बहुत से तो अर्थाभाव में जा भी नहीं सकेंगे। लेकिन जज साहब को अपने कोटे की पड़ी है। उन्हें न्याय करने से और मजदूर वर्ग की दुर्दशा से क्या लेना देना?

रविवार, 7 नवंबर 2021

एक दिए का जलना बहुत भला है

एक दिए का जलना
बहुत भला है

जहाँ अभी हाल के बरसों में
बुझ गए हों अनेक दीपक
महामारी से मरने वालों की संख्या
कम पड़ गई हो
आत्महत्या करने वालों से
उस देश का राजा सदा निन्दनीय रहेगा
इतिहास में
ये दीपमालिकाएं,
चुंधियाती रोशनी वाले लाखों लाख बल्ब
नहीं मिटा पाते अमावस का अंधकार
वह और गहराता जाता है.
तब,
एक दिए का जलना
बहुत भला है.

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

स्त्री-पुरुष संवाद अगस्त 2021

- आखिर, यह नियम किसने बनाया कि स्त्री एक से अधिक पुरुषों से यौन सम्बन्ध नहीं बना सकती, जबकि पुरुष एक से अधिक स्त्रियों से एक ही काल खंड में यौन संबंध बना कर रख सकता है?
- निश्चित रूप से, समाज ने.
- तो उस समाज में स्त्रियाँ नागरिक नहीं रही होंगी. उन्हें नागरिकों के कुछ अधिकार रहे हो सकते हैं, लेकिन वे पुरुष समान नहीं थे. रहे होते तो समाज में यह नियम चल नहीं सकता था.
- लेकिन अब तो सभ्य समाजों में दोनों के लिए यही नरम है.
- है, लेकिन वहीं, जहाँ पुरुष कमजोर है और नियमों को मानना उसकी विवशता है. यह विवशता हटते ही वह अपनी मनमानी करने लगता है.
- हां, ऐसा तो है.
- तो सबको मनमानी क्यों न करने दिया जाए, जब तक कि किसीज्ञके साथ जबर्दस्ती न की जाए? पुरुषों के लादे गए इस नियम को क्यों न ध्वस्त कर दिया जाए?
- उससे तो समाज में अराजकता फैल जाएगी. पुरुष को यह पता ही नहीं चलेगा कि कौन उसकी सन्तान है, और कौन नहीं? सन्तान की पहचान ही मिट जाएगी. शब्दकोश से पिता शब्द ही मिट जाएगा.
- केवल स्त्री संतान की पहचान क्यों नहीं हो सकती? जैसे सदियों से पुरुष चला आ रहा है.
- जरूर हो सकती है. लेकिन पुरुष भी उसकी पहचान बना रहे तो क्या आपत्ति हो सकती है?
- मुझे कोई आपत्ति नहीं. लेकिन देखा जाता है कि स्त्री पुरुष के बीच संबन्ध समाप्त हो जाने पर पुरुष सन्तान को स्त्री से छीनने की कोशिश करता है और अक्सर कामयाब भी हो जाता है.
- हाँ, यह तो है. पर समाज में स्त्री-पुरुष समानता स्थापित हो जाने पर ऐसा नहीं हो सकेगा.
- हा हा हा, अब आई नाव में गाड़ी. स्त्री-पुरुष समानता स्थापित हो जाने पर तो स्त्री-पुरुष के लिए समाज के नियम बराबर हो जाएंगे. फिर या तो यौन संबंधों के मामले में स्त्रियों को आजादी देनी होगी. या यह नियम बनाना होगा कि साथ रहने के काल खंड में दोनों किसी दूसरे के साथ यौन संबंध न बनाए.
- हां, यह तो करना पड़ेगा. पर फिर भी, गर्भकाल और संतान की परवरिश के आरंभिक काल में स्त्री कोई उत्पादक काम नहीं कर पाएगी. तब उत्पादक काम पुरुष को ही करने होंगे.
- तुम शायद भूल रहे हो कि मानव विकास के आरंभिक काल में जब मनुष्य केवल फल संग्राहक या शिकारी था तब तक एक मात्र उत्पादक कार्य संतानोत्पत्ति था और मनुष्य समाज का सबसे महत्वपूर्ण काम भी.
- हाँ, तब तो समाज में स्त्रियों की ही प्रधानता थी. वे ही सबसे महत्वपूर्ण थीं. वे ही समाज को नया सदस्य देती थीं. समाज के लिए एक सदस्य को खो देना आसान था, नए को जन्म देना और वयस्क और खुद मुख्तार होने तक पालन पोषण करना बहुत ही दुष्कर.
- और एक लंबे समय तक तो पुरुषों को यह भी पता नहीं था कि संतानोत्पत्ति में उनका भी कोई योगदान था. स्त्री ने खिलखिलाते हुए कहा.
- वही तो, तब पुरुषों की स्थिति अत्यंत दयनीय रही होगी. तभी उन्होंने पितृसत्ता स्थापित कर बदला लिया. पुरुष भी इतना कह कर खिलखिलाया.
- बहुत हुआ, तुम्हारा यह बदला-सिद्धान्त नहीं चलने का. सदियों पुरुष ने स्त्रियों को हलकान रखा है, अब ऐसा नहीं चलेगा. स्त्रियां तेजी से समझदार हो रही हैं. देख नहीं रहे. अभी तालिबान को काबुल पहुंचे हफ्ता भी नहीं हुआ कि वहाँ स्त्रियाँ दमन के विरुद्ध आवाज उठाने लगी हैं.
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गुरुवार, 3 जून 2021

साइकिल


यूँ तो हम नगर में रहते थे। लेकिन नगर इतना बड़ा भी नहीं था कि आसानी पैदल नहीं नापा जा सके। नगर से बाहर जाने के लिए बसें और ट्रेन थी। नगर में सामान ढोने का काम हाथ ठेले करते थे। बाकी इन्सान अधिकतर पैदल ही चलते थे। कुछ लोग जिन्हें काम से शहर के बाहर ज्यादा जाना होता था उनके पास सायकिलें थीं। मोटर सायकिलें बहुत कम थीं। चौपाया वाहन तो इक्का-दुक्का ही थे। हाँ सरकारी जीपें बहुत थीं। पिताजी अध्यापक थे, अक्सर बाहर पोस्टिंग रहती थी। बाकी हम सब का काम पैदल चलने से हो जाता था। पर जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया सोचता जरूर था कि घर में एक साइकिल तो होनी चाहिए। आसपास के बच्चे किराए पर साइकिल ले आते और कैंची चलाते रहते। मेरा भी दिल तो करता था। पर सोचता साइकिल सीख भी लूंगा तो किस काम की, जब तक घर में न हो। बिना साइकिल के काम चलता रहा।

एक दिन पास के गाँव से जो चार किलोमीटर दूर था, किसी बिरादरी वाले के यहाँ से भोज का निमन्त्रण मिला। किसी न किसी का जाना जरूरी था। दादाजी जा नहीं सकते थे। घर में पुरुष मैं अकेला था। दादाजी ने आदेश दिया कि मैं चला जाऊँ। उन दिनों हमारे गाँव का लड़का गणपत गुप्ता पढ़ने के लिए हमारे साथ ही रहता था। मैंने दादाजी से कहा कि मैं गणपत को साथ ले जाऊँ, तो उन्होंने अनुमति दे दी।

भोज के लिए गाँव जाने के दो साधन थे। हम पैदल जा सकते थे, या फिर साइकिल से। साइकिल नहीं थी, पर किराए पर ली जा सकती थी। मुझे चलाना आता नहीं था। मैंने गणपत से पूछा, “तुम्हें चलाना आता है।”
उसने कहा, “आता है।”

मैं बहुत खुश था कि अब साइकिल किराए पर ले चलेंगे। गणपत चलाएगा, मैं कैरियर पर बैठ जाऊंगा। हम तीसरे पहर चार बजे करीब घर से निकले। नगर में आधा किलोमीटर चलने के बाद साइकिल की दुकान आई। हमने किराए पर एक साइकिल ले ली। साइकिल ले कर हम कुछ दूर पैदल चले। फिर मैंने गणपत से कहा, “तुम साइकिल चलाओ, थोड़ा धीरे रखना मैं उचक कर कैरियर पर बैठ जाउंगा।”

“मैं साइकिल तो चला लूंगा लेकिन मुझे पैडल से बैठना नहीं आता। कहीं ऊंची जगह होगी तो वहाँ पैर रख कर साइकिल पर चढ़ जाउंगा, तुम कैरियर पर बैठ जाना।” गणपत ने कहा।

“ठीक है”, मैंने कहा।
हम आधा किलोमीटर और चले। शहर खत्म हो गया। उसके बाद एक नाला आया। उसकी पुलिया पर पैर रख कर गणपत ने चालक की सीट संभाली। मुझे कहा तो मैं कैरियर पर बैठ गया।

“ठीक से बैठ गए?” गणपत ने मुझ से पूछा।

“हाँ, बैठ गया”.

“मैं पैडल मारूँ?”

“बिलकुल”, मैंने कहा।

गणपत ने पैडल मारा। साइकिल का हैंडल बायीं तरफ मुड़ा और पुलिया की मुँडेर खत्म होने के बाद सीधे नाले में। नीचे, साइकिल, ऊपर गणपत, उस पर मैं। एक दो बरसात हो चुकी थीं। नाले में मामली पानी था और खेतों से बहकर आई मुलायम मिट्टी। हमें चोट नहीं लगी। पर कपड़े उन पर मिट्टी पड़ गयी। हाथ पैर भी मिट्टी मे सन गए।

हम सोच रहे थे क्या करें? वापस जाने में बड़ी दिक्कत थी। शाम के खाने का क्या होगा? हमने आगे बढ़ना तय किया।

हम साइकिल लेकर पैदल चले। एक किलोमीटर बाद एक बावड़ी आई। उसमें हमने अपने कपड़ों से और शरीर से मिट्टी हटायी। फिर आगे चल पड़े। फिर उसी भोज में जाते कुछ परिचित मिले। उन्होंने कहा कि साइकिल होते हुए पैदल क्यों जा रहे हो? हमने अपनी दिक्कत बताई कि केवल गणपत को चलाना आता है लेकिन वह मुझे बिठा नहीं सकता। उनमें से एक ने मुझे अपनी साइकिल के कैरियर पर बिठा लिया। गणपत कहीं ऊँची जगह देख कर साइकिल पर चढ़ा और भोज वाले गाँव पहुँचे। वापसी में उन्हीं परिचित ने मुझे अपने घर के नजदीक छोड़ा। सुबह साइकिल दुकान वाले को जमा करा दी गयी। किराए सहित।
बाद में घर में साइकिल आई। उसके बाद के भी अनेक किस्से हैं। पर वे फिर कभी।