आज हम जानते हैं कि इंसान ही खुद ही खुद को बदला है, उस ने दुनिया को बदला है और उसी ने समाज को भी बदला है। यह दुनिया वैसी नहीं है जैसी इंसान के अस्तित्व में आने के पहले थी। वही इकलौता प्राणी इस ग्रह में है जो अपना भोजन वैसा ही नहीं ग्रहण करता जैसा उसे वह प्रकृति में मिलता है। वह प्रकृति में मिलने वाली तमाम वस्तुओं को बदलता है और अपने लिए उपयोगी बनाता है। उस ने सूत और ऊन से कपड़े बुन लिया। उस ने फलों और मांस को पकाना सीखा, उस ने अनाज उगा कर अपने भविष्य के लिए संग्रह करना सीखा। यह उस ने बहुत पहले कर लिया था। आज तो वह पका पकाया भोजन भी शीतकों और बंद डिब्बों में लंबे समय तक रखने लगा है। बस निकाला और पेट भर लिया। इंसान की तरक्की रुकी नहीं है वह बदस्तूर जारी है।
उस ने एक समय पहिए और आग का आविष्कार किया। इन आविष्कारों से उस की दुनिया बदली। लेकिन समाज वैसे का वैसा जंगली ही रहा। लेकिन जिस दिन उस ने पशुओं को साधना सीखा उस दिन उस ने अपने समाज को बदलने की नींव डाल दी। उसे शत्रु कबीले के लोगों को अब मारने की आवश्यकता नहीं थी, वह उन की जान बख्श सकता था। उन्हें गुलाम बना कर अपने उपयोग में ले सकता था। कुछ मनुष्यों को कुछ जीवन और मिला। लेकिन उसी ने मनुष्य समाज में भेदभाव की नींव डाल दी। अब मनुष्य मनुष्य न हो कर मालिक और गुलाम होने लगे। पशुओं के साथ, गुलामों के श्रम और स्त्रियों की सूझबूझ ने खेती को जन्म दिया। गुलाम बंधे रह कर खेती का काम नहीं कर सकते थे। मालिकों को उन के बंधन खोलने पड़े और वे किसान हो गए। दास समाज के गर्भ में पल रहा भविष्य का सामंती समाज अस्तित्व में आया। हम देखते हैं कि मनुष्य ने अपने काम को सहज और सरल बनाने के लिए नए आविष्कार किए, नई तकनीकें ईजाद कीं और समाज आगे बढ़ता रहा खुद को बदलता रहा। ये तकनीकें वही, केवल वही ईजाद कर सकता था जो काम करता था। जो काम नहीं करता था उस के लिए तो सब कुछ पहले ही सहज और सरल था। उसे तो कुछ बदलने की जरूरत ही नहीं थी। बल्कि वह तो चाहता था कि जो कुछ जैसा है वैसा ही चलता रहे। इस लिए जिन्हों ने दास हो कर, किसान हो कर, श्रमिक हो कर काम किया उन्हीं ने तकनीक को ईजाद किया, दुनिया को बदला, इंसान को बदला और इंसानी समाज को बदला। इस दुनिया को बदलने का श्रेय केवल श्रमजीवियों को दिया जा सकता है, उन से अलग एक भी इंसान को नहीं।
पर क्या अब भी कुछ बदल रहा है? क्या तकनीक विकसित हो रही है? जी, दुनिया लगातार बदल रही है। तकनीक लगातार विकसित हो रही है। पूंजीवाद के विकास ने लोगों को इधर-उधर सारी दुनिया में फैला दिया। पहले एक परिवार संयुक्त रूप से साथ रहता था। आज उसी परिवार का एक सदस्य दुनिया के इस कोने में है तो दूसरा उस कोने में। एक सोने जा रहा है तो दूसरा सो कर उठ रहा है। लेकिन दुनिया भर में बिखरे लोगों ने जुड़ने के तकनीकें विकसित कर ली हैं और लगातार करते जा रहे हैं। आज की सूचना प्रोद्योगिकी ने इंसानी समाज को आपस में जो़ड़े रखने की मुहिम चला रखी है। हों, इस प्रोद्योगिकि के मालिक भले ही पूंजीपति हों, लेकिन कमान तो वही श्रमजीवियों के हाथों में है। वे लगातार तकनीक को उन्नत बनाते जा रहे हैं। नित्य नए औजार सामने ला रहे हैं। हर बार एक नए औजार का आना बहुत सकून देता है। तकनीक का विकसित होना शांति और विश्वास प्रदान करता है। कि इतिहास का चक्का रुका नहीं है। दास युग और सामंती युग विदा ले गए तो यह मनुष्यों के शोणित से अपनी प्यास बुझाने वाला पूंजीवाद भी नहीं रहेगा। हम, और केवल हम लोग जो श्रमजीवी हैं, जो तकनीक को लगातार विकसित कर रहे हैं, एक बार फिर दुनिया को बदल डालेंगे।

14 टिप्पणियां:
चाहे पूंजीवाद हो, साम्यवाद हो,समाजवाद हो,सामंतवाद हो या पंडावाद किसी ने जनता का आज तक भला नहीं किया वह तो पीसती आई है और पीसती ही रहेगी|
हम, और केवल हम लोग जो श्रमजीवी हैं, जो तकनीक को लगातार विकसित कर रहे हैं, एक बार फिर दुनिया को बदल डालेंगे।
@ ये बदलाव भी प्रकृति का नियम है,बदलता ही रहेगा|
चलो गाँव की ओर. मजदूर को मिले उसका हक़. समाज अवश्य बड़ा जाएगा.
जानकारी से भरी है पोस्ट,आभार.
कोई भी वाद गरीब पिछड़े या मेहनतकशो की आशाव को पुरा नहीं कर सकता है आगे बढ़ने के लिए सभी को खुद की आवाज बुलंद करनी होगी | बदलाव तो होगा ही और वो हमेसा आगे बढ़ने के लिए ही होगा |
बहुत उम्दा पोस्ट...बदलाव तो प्रकति का नियम है...सतत होता ही रहेगा.
पानी मेहनत खेत सब, आपन कहे किसान।
नेताजी के पेट में, चहुँपल सारा धान॥
गुरुवर जी, आपका आलेख कहता कि-यह बदलाव भी प्रकृति का ही एक नियम है, बदलता ही रहेगा.आपकी बात सही है.आजकल एक चार सदस्यों का परिवार भी एक साथ नहीं है.एक कहीं, दूसरा कहीं और दो कहीं. एक-दूसरे का साथ देने के लिए किसी के पास समय ही नहीं है.दुःख और सुख में कोई दिलासा देने के लिए या बात करने के आधुनिक संचार माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है.
दूसरे पैराग्राफ में एक छोटी गलती रह गई है कि-आज हम जानते हैं कि इंसान ""ही*"" खुद ही खुद को बदला है, उस ने दुनिया को बदला है और उसी ने समाज को भी बदला है।
*मेरे विचार से यहाँ पर "ने" होना चाहिए.
संकलन करने लायक चित्र और लेख ...आभार भाई जी !
श्रमजीवियों और श्रम शोषकों ने ही इतिहास को बदला है
तकनीक बाजार की दिशा सदा ही बदलता रहा है।
सुन्दर और प्रभावी प्रस्तुति ||
आपकी पोस्ट पढ़कर उम्मीद बंधती दिखाई दे रही है...
दुनिया को बदलना चाहिए पर प्रगती के नाम पर पर्यावरण की दुर्गति नहीं होनी चाहिए ॥
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