@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: श्रीमद्भगवद्गीता के साथ मेरे अनुभव

गुरुवार, 20 मई 2010

श्रीमद्भगवद्गीता के साथ मेरे अनुभव

डॉ. अरविंद मिश्र ने आज समूचे ब्लागजगत से पूछ डाला -आपने कभी गीता पढी है ? अब मैं इस प्रश्न का क्या उत्तर देता? हमारे यहाँ श्रीमद्भगवद्गीता की यह स्थिति है कि उस की कम से कम पाँच-दस प्रतियाँ हर वर्ष घर में अवश्य आ जाती हैं, और उन्हें फिर आगे भेंट कर दिया जाता है। एक सेवानिवृत्त मेजर साहब हैं वे हर किसी को गीता का हिन्दी और अंग्रेजी संस्करण वितरित करते रहते हैं। अभी कुछ दिन पहले विवाहपूर्व यौन संबंधों की बात सर्वोच्च न्यायालय पहुँची और न्यायाधीशों ने अपना निर्णय सुरक्षित रखा तो उस दिन न्यायाधीशों द्वारा अधिवक्ताओं से पूछे गए कुछ प्रश्नों में राधा-कृष्ण के संबंध का उल्लेख हुआ तो देश में बवाल उठ खड़ा हुआ। मेजर साहब ने मुझे फोन कर के पूछा कि क्या मैं न्यायाधीशों को पत्र लिख सकता हूँ। मैं ने कहा आप की इच्छा है तो अवश्य लिख दीजिए। उन्हों ने पीठ के सभी न्यायाधीशों को पत्र लिखा और साथ में श्रीमद्भगवद्गीता की अंग्रेजी प्रतियाँ उन्हें डाक से प्रेषित कर दीं। गीता हमारे देश में बहुश्रुत और बहुवितरित है। उस का पाठ भी लाखों लोग नियमित रूप से करते हैं। 

मेरे परिवार में परंपरा से किसी की मृत्यु के तीसरे दिन से नवें दिन तक गरुड़ पुराण के पाठ की परंपरा रही है जो मेरी दृष्टि में विभत्स रस का विश्व का श्रेष्ठतम ग्रंथ है। यह अठारह मूल पुराणों के अतिरिक्त पुराणों में सम्मिलित है। जिस परिवार में मृत्यु हुई हो उस समय परिजनों की विह्वल अवस्था में गरुड़ पुराण के सार्वजनिक वाचन की परंपरा कब आरंभ हो गई? कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन मुझे यह कोमल और आहत भावनाओं का शोषण अधिक लगा। नतीजा यह हुआ कि जब परिवार में मेरा बस चलने लगा मैं ने इस पाठ को बंद करवा दिया जो अब सदैव के लिए बंद हो गया है। तब यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि तब परिवार में एकत्र सभी व्यक्ति कम से कम एक बार तो एकत्र हों और कुछ चिंतन करें। माँ ने सुझाव दिया कि इस के स्थान पर गीता का पाठ किया जाए। कुल अठारह अध्याय हैं जिन्हें तीसरे दिन से ग्यारहवें दिन तक नित्य दो अध्याय का वाचन किया जाए। सब को यह सुझाव पसंद आया। अब एक नई समस्या आ खड़ी हुई कि गीता वाचन कौन करे, अर्थ कौन समझाए? माँ ने यह दायित्व मुझे सौंपा और मुझे निभाना पड़ा। हमारे परिवार की देखा-देखी अनेक परिवारों में गरुड़ पुराण के स्थान पर अब गीता पाठ आरंभ हो गया है।
क और घटना जो गीता के संदर्भ में घटी उसे यहाँ रखने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। बात उन दिनों की है जब मैं गीता को अपने तरीके से समझने का प्रयत्न कर रहा था। अलग अलग भाष्यों को पढ़ते समय मुझे लगा कि जो भी कोई गीता का भाष्य करता है उस के लिए गीता माध्यम भर है वास्तव में वह अपनी बात, अपना दर्शन गीता की सीढ़ी पर चढ़ कर कह देता है। तब वास्तव में गीता का अर्थ क्या होना चाहिए। यह तभी जाना जा सकता है जब उसे बिना किसी भाष्य के समझने का प्रयत्न किया जाए। गीता की अनेक प्रतियाँ पास में उपलब्ध होते हुए भी एक नयी प्रति खरीदी जिस में केवल श्लोक और उन का अन्वय उपलब्ध था। मैं गीता समझने का प्रयत्न करने लगा। हर समय गीता मेरे साथ रहती, जब भी फुरसत होती मैं गीता खोल लेता और एक ही श्लोक में घंटों खो जाता। 
न्हीं दिनों एक मित्र ने गाढ़ी कमाई से एक जमीन रावतभाटा में खरीदी और कर्ज ले कर उस पर अपना वर्कशॉप बनाने लगे। कुछ पचड़ा हुआ और जमीन बेचने वाले के पुत्र ने दीवानी मुकदमा कर निर्माण पर रोक लगवा दी। मित्र उलझ गए। मुकदमा लड़ने को पैसा भी न था। वे मेरे पास आए। मैं ने उन का मुकदमा लड़ना स्वीकार कर लिया। जिस दिन तारीख होती मुझे रावतभाटा जाना होता। मेहनताना मिलने का प्रश्न नहीं था। बस आने-जाने का खर्च मिलता। उन की पेशी पर जाना था। एक दिन मैं भोजन कर घर से निकला झोले में मुकदमे की पत्रावली और गीता रख ली। बस स्टॉप पर जा कर पान खाया। पान वाले को पैसा देने के लिए पर्स निकाला तो उस में केवल पंद्रह रुपए थे। घऱ वापस जा कर रुपया लाता तो बस निकल जाती। मैं ने तीन रुपए पान के चुकाए। बस का किराया 12 रुपया सुरक्षित रख लिया। बस आने में देर थी, रावतभाटा जाने वाली एक जीप आ गई।  किराया 12 रुपया तय कर लिया। सवारियाँ पूरी होने पर जीप को चलना था। मैं जीप में बैठा गीता निकाल कर पिछले पढ़े हुए के आगे पढ़ने लगा और एक श्लोक को समझने में अटक गया। मेरे पास ही एक महिला शिक्षक आ बैठी। जीप चली तो उस शिक्षिका ने पूछा -भाई साहब! आप गीता पढ़ रहे हैं? मैं ने कहा हाँ। मुझे तीसरे अध्याय का एक श्लोक समझ नहीं आया, क्या आप समझा सकते हैं?
मैं कुछ समझा नहीं, मुझे लगा कि शायद वह मेरी परीक्षा लेना चाहती है। फिर दूसरे ही क्षण सोचा शायद वह सच में ही जानना चाह रही हो। मैं ने मौज में कहा -अभी समझा देते हैं। फिर मैं ने इंगित श्लोक निकाला, उसे पढा़ और समझाने लगा। तब बस कोटा के इंजिनियरिंग कॉलेज के सामने से गुजर रही थी। उस एक श्लोक पर चर्चा करते-करते मैं ने क्या क्या कहा मुझे खुद को स्मरण नहीं। लेकिन जब चर्चा पूर्ण हुई तो बाडौली आ चुका था। अर्थात रावतभाटा केवल तीन किलोमीटर रह गया था। हम पैंतीस किलोमीटर की यात्रा तय कर चुके थे और मुझे इस का बिलकुल ध्यान नहीं था। शिक्षिका स्वयं भी विज्ञ थी। उस ने बीच में एक ही प्रश्न पूछा -आप मार्क्सिस्ट हैं? मैं ने उत्तर दिया -शायद! उस की प्रतिक्रिया थी -तभी आप इतना अच्छे से समझा सके हैं। 

रावतभाटा के निकट बाडौली स्थित प्राचीन शिव मंदिर
 रावतभाटा बाजार में पाँच-छह सवारियाँ उतरी तो हर सवारी मुझे बड़ी श्रद्धा के साथ नमस्कार कर के गई, मुझे लगा कि यदि मैं ने पेंट-शर्ट के स्थान पर धोती-कुर्ता पहना होता तो शायद चरण स्पर्श भी होने लगता। जीप ऊपर टाउनशिप में पहुँची जहाँ सभी सवारियाँ उतर गईं। वहाँ भी उन्हों ने बाजार में उतरने वाली सवारियों की भांति ही श्रद्धा का प्रदर्शन किया। मैं जीप से उतरा और जीप वाले को किराया बारह रुपए दिया। जीप वाले ने पूछा -आप वापस कितनी देर में जाएंगे? मैं ने कहा -भाई, मैं तो यहाँ मुकदमे में पैरवी करने आया हूँ, अदालत में काम निपट गया तो घंटे भर में भी वापस जा सकता हूँ और शाम भी हो सकती है। -तो साहब! मैं भी एक घंटे बाद वापस कोटा जाऊंगा। आप एक घंटे में वापस आ जाएँ तो मेरी ही जीप में चलिएगा, वापसी का किराया नहीं लूंगा।  मैं एक घंटे में तो वापस न लौट सका। पर मुझे आम लोगों में गीता के प्रति जो श्रद्धा है उस का अवश्य अनुभव हो गया। इतना आत्मविश्वास जाग्रत हुआ कि मैं सोचने लगा कि यदि मैं दो जोड़ा कपड़े और एक गीता की प्रति ले कर निकल पड़ूँ, तो इस श्रद्धा की गाड़ी पर सवार हो कर बिना किसी धन के पूरी दुनिया की यात्रा कर के वापस लौट सकता हूँ।

32 टिप्‍पणियां:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रसंग हैं! बहुत अच्छा लगा इन्हें पढ़कर.
अब एक ब्लौग बना डालिए 'गीताजी' पर. सब मिलजुल कर रोजाना एक श्लोक पढेंगे और गुनेंगे.
समय आने पर वकालत से निवृत्ति लेकर निकल चलिए दो जोड़ी कपडा और 'गीताजी' को साथ लेकर. राम जी सब अच्छा करेंगे.

राज भाटिय़ा ने कहा…

दिनेश जी जब कोई ग्याणी, किसी भी धामिक किताब को दिल लगा कर पढे ओर उस के अर्थ बिलकुल सही रुप मै समझा सके तो, तो लोगो को ध्यान अपने आप ही खींच जाता है, मै आप के लेख से सहमत हुं,
अगर आप रोजाना या सप्ताह मै एक बार अपनी आवाज मै गीता का एक श्लोक ओर उस का अर्थ बोल कर या लिख कर ब्लांग मै डाले तो हम सब एक साल मै ही गीता का पुरा पाठ पढ ओर सुन सकते है.
आप का धन्यवाद

डा. अमर कुमार ने कहा…


पँडित जी, आपका गीता में आस्था का होना कोई अचरज नहीं ।
मोटे तौर पर गीता में क्रियात्मक भाव ही उभर कर दिखता है,
जबकि इसके मनोगत भाव को पकड़ पाना बड़ा असाध्य है ।
और इसी बिन्दु से गीता के श्लोकों के अर्थों का अनर्थ होना प्रारम्भ होता है ।
वह कौन सी मनोदशा रही होगी, जिसने श्रीकृष्ण के मुख से यह श्लोक निकलावाये,
उसी अवस्था में अपने को निरुपित कर इन श्लोकों को ग्रहण करना मँत्र को जागृत करने जैसा प्रभाव रखता है ।

आपकी रुचि देख कर मैं आपसे भक्तिवेदाँत स्वामी प्रभुपाद की 'Bhagavad-Gita As it is ' को भी देखने की सलाह दूँगा ।
साथ ही स्वामी अड़गड़ानँद जी का भाष्य ’ यथार्थ गीता ’ पढ़ने का आग्रह करूँगा । यह ऑनलाइन www.yatharthgeeta.com पर पढ़ने और डाउनलोड करने के लिये उपलब्ध है ।

जब भी यदि दो जोड़ा कपड़े और एक गीता की प्रति ले कर निकल पड़ने की सोचें, तो निट्ठल्ले को अवश्य याद करियेगा । चटाई कमँडल तो मैं सँभालूँगा ही, साथ ही आपकी शिष्याओं में विदेशी बालाओं को सँभालने का जिम्मा भी मेरा... वह आपसे तो न सँभरेंगी, गुरु जी !

राम त्यागी ने कहा…

गरुण पुराण हमारे यहाँ भी होता है , मोरेना/ग्वालियर और कोटा में रीती रिवाज एक जैसे ही है, इसलिए जब आपके लेख पड़ता हूँ तो लगता है की गाँव में पहुँच गया.
आप के लेख को एक बार पढ़ने बैठूं तो फिर पूरा समाप्त करके ही चैन मिलता है, बहुत अच्छा लिखते है.

मेरे पिताजी भी गीता के बहुत बड़े भक्त है और इसलिए मेरे पास छोटो, बड़ी, नयी पुरानी पता नहीं कितनी प्रतियाँ पड़ी होंगी, उनको तो शायद सारे श्लोक याद भी है. जब शिकागो आये थे तो फिर से मेरे लिए और ले आये , मेरे पास वैसे पहले से भी गीता की २ प्रतियाँ थी. अब ऐसा हो गया है की मेरे ऑफिस बैग में भी गोरखपुर गीता प्रेस की एक प्रति पड़ती रहती है. एक समस्या है, इस वजह से में कभी कभी बैग को ट्रेन या ऑफिस में नीचे जमीन पर रखने में असहज महसूस करता हूँ, पर गीता साथ होने से एक सुकून सा रहता है.

लोग कहते है की मेरे पिताजी ने गीता ज्यादा पढ़ी है इसलिए उनको घर से ज्यादा गरीबों और दूसरी की फिक्र रहती है. मेरे पिताजी कभी किसी गरीब को भूखा और नंगे पैर या नंगे बदन नहीं देख सकते, कभी कभी खेतो से या नौकरी से लौटते समय उनके पैर में चप्पल नहीं होती , पता चला की वो किसी गरीब को दे आये. भूख लगी तो मेहतर के घर भी खाना खा लेंगे और उसके साथ गले में हाथ डालकर बैठ लेंगे ....ये सब मुझे तो बढ़िया लगता है पर में लिख इसलिए रहा हूँ की मोरेना के गावो में ये असहज लगता है. और आपसे बेहतर ये कौन जानेगा .... शायद उनके पुण्यों और गरीबो के प्रति स्नेह का लाभ मैं यहाँ रहकर ले रहा हूँ.

लेख इतना अच्छा था की मेरी टिपण्णी आवश्यकता से अधिक बड़ी हो गयी. :)

Baljit Basi ने कहा…

बहुत खूब, दिल करता है आप से गीता सीखने को.

Smart Indian ने कहा…

श्रंखला शुरू करने का धन्यवाद. अगली कड़ियों की प्रतीक्षा रहेगी.

मार्क्सिस्ट हैं? ... तभी आप इतना अच्छे से समझा सके हैं।
एक मार्क्सवादी के मुख से गीता की व्याख्या सुनना रोचक होगा.

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } ने कहा…

मेरे पितामह जब बहुत बीमार थे कई महीने से अस्पताल मे थे और कोमा मे थे एक दिन होश मे आये और मेरे पिता से बोले गीता का १८ वा अध्याय पढो . यकीन मानिये जब अध्याय समाप्त हुआ उसी समय उन्होने शरीर त्याग दिया . और हमारे यहा भी गरुण पुराण की जगह गीता का ही पाठ होता है .

उम्मतें ने कहा…

स्मार्ट इन्डियन के कथन में मार्क्सवादी के पूर्व 'शायद' जोड़ कर हमें भी सहमत मानिये !

गिरिजेश राव, Girijesh Rao ने कहा…

बहुत आनन्द आएगा महराज ! आप सीधा दच्छिना तो लेंगे नहीं सो मुफत की ज्ञानगंगा में गोते लगाएँगे। तो पंडीज्जी ! शुरू कीजिए
:

" धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:
मामाका पाण्डवाश्चैव किम् कुर्वत संजय?

भक्त (कामरेड भी कह सकते हैं ;) जनों! यह प्रकरण बहुत प्राचीन है ......."

Khushdeep Sehgal ने कहा…

@द्विवेदी सर,
आप धोती-कुर्ता पहने या पैंट-शर्ट, जब भी मिलेंगे, मैं तो पैर छूऊंगा...

@डॉ अमर कुमार जी,
बात बन जाए तो आगे-आगे झाड़ू-पोचा करते हुए चलने के लिए अपने इस चेले को मत भूलिएगा...

जय हिंद...

Khushdeep Sehgal ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गीता पढ़ना, सुनना व चर्चा, सभी अच्छा लगता है । आमजन में गीता के प्रति अगाध श्रद्धा है ।

Ashok Kumar pandey ने कहा…

गीता मैने भी पढ़ी है…पर वह मुझे हमेशा ही तर्कहीन आस्था की प्रणेता लगी…एक ही बात का कहीं समर्थन है कहीं विरोध्…अर्जुन को युद्ध लड़ाने के लिये कहीं मोक्ष का लालच है, कहीं धमकी, कहीं कर्तव्यबोध का आभास कराने की कोशिश।

अभी अमर्त्यसेन ने इसे हिंसा को बढ़ावा देने वाली किताब भी बताया है। लब्बोलुआब यह कि मुझे इससे हर बार निराशा ही हुई है…

विष्णु बैरागी ने कहा…

मैंने गीता कभी नहीं पढी। बस, उसे सुना ही सुना। घर में दो प्रतियॉं रखी हुई हैं। दो-एक बार पढने की इच्‍छा हुई तो अनपेक्षित व्‍यवधान आ गया। जितना कुछ पढ पाया उससे पहली अनुभूति हुई - गीता आत्‍म बल बढाती है। आपकी यह पोस्‍ट पढने के बाद, गीता पठन का प्रयास एक बार फिर करुँगा।

आपके अनुभव प्रेरक भी हैं और रोचक भी। अपने ब्‍लॉग पर गीता पर सामग्री देने वर विचार अवश्‍य कीजिएगा।

Amit Sharma ने कहा…

जिस गीता के कारण अपने कर्म से विमुख अर्जुन पुनः कर्म में प्रवृत हुआ, उसी गीता को माता-पिता अपने बच्चों को इसलिए नहीं पढने देते की बाबाजी बन जायेंगे. गीता सत्कर्म में प्रवृत करती है ना कि सर्व-कर्म से विमुख ----------
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुम कर्मान्यशेषतः /
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते //११//


निस्संदेह किसी भी देहधारी प्राणी के लिए समस्त कर्मों का परित्याग कर पाना असंभव है. लेकिन जो कर्मफल का परित्याग करता है, वह वास्तव में त्यागी कहलाता है.

vandan gupta ने कहा…

shrimadbhagvadgeeta.........hum sab ki aastha ka punj hai.......aur jo bhi geeta mein kaha gaya hai akshraksha sahi hai magar uske liye uski gahrayi mein utarna jaroori hai use samajhna jaroori hai.........bahut hi gahan aur vrihad vyakhya ki hai gunijano ne apne apne hisab se ......maine jyada to nahi padhi magar sirf ek hi geeta padhi aur sati zindagi ka nichod usmein aa gaya aur ab lagta hi nahi ki usse aage kuch hai........SWAMI RAMSUKHDAS JI KI LIKHI HUYI SADHAK SANJIVANI.......SHRIMADBHAGVADGEETA...... yun samajhiye ki itni vrihad vyakhya hai ki agar insaan use padh le to phir uski zindagi ko sahi disha mil jaye aur wo apne aapko is duniya ke prapanchon se mukt kar le........jeete ji mukti ka sadhan hai wo geeta.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

भाई साहब ! आज आदमी ने अपने जीवन का मक़सद ही रूपया और ऐश बना ली है । इसी लिए वह दो बच्चे पैदा करता है । रिश्वतें लेकर और हराम माल कमाकर उन्हें डाक्टर इंजीनियर बनाता है । लड़की के विवाह में खूब दहेज देकर उम्दा सा दूल्हा ख़रीदता है । लड़का समाज में जिस भी पद पर बैठता है , वह समाज से अपनी एजुकेशन में आया खर्च सूद समेत वसूल करता है । हरेक आदमी आज अपनी ऐश के लिए दूसरों के हिस्से का सुख भी छीन लेना चाहता है और अपने हिस्से का दुख भी वह दूसरों पर डाल देना चाहता है । रूपया देकर अमीर आदमी आज ग़रीबों के गुर्दे तक निकलवा कर अपने लगवा लेते हैं । इनसान बनने के लिए इनसान को अपने मालिक के हुक्म को मानना पड़ेगा लेकिन क्या आज का आदमी इसके लिए तैयार है ?
http://vedquran.blogspot.com/2010/05/hope-for-life.html

Arvind Mishra ने कहा…

धोती कुर्ता धारण कर जब चल पड़ेगें तो बनारस तो रास्ते में आएगा ही -यहाँ गीता उपदेश की राजन साजन जोड़ी बन जायेगी !
गीता का व्यासीय विवेचन मुझे नहीं रुचता .....सहज तरीके से समझने और आत्मानुशासन से उसके निर्देशों को पालन करने से सांसारिकता के दंश से मुक्ति अवश्य मिल सकती है ......कहिये तो मैं ही गीता चर्चा शुरू कर दूं -भाष्य आप विद्वानों के रहेगें !

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

आप शुरू करिये,विलम्ब न कीजे.

PARAM ARYA ने कहा…

वेद में केवल जीव का वर्णन आया है अपाहिज भ्रूण का नहीं । हत्या जघन्य अपराध है । ये जो मुरगे हलाल करते हो उनको जीव नहीं मानते क्या ? ये खा जाएं पूरा बकरा और तुमसे मारा न जाय एक भ्रूण , आश्चर्यजनक !
http://vedquran.blogspot.com/2010/05/no-problem.html

sandeep sharma ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत प्रसंग हैं... और यह बता रहे हैं. की हमारी धार्मिक पुस्तकों में अभी भी लोगों की कितनी रूचि है...

Dr. Shreesh K. Pathak ने कहा…
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Dr. Shreesh K. Pathak ने कहा…

आदरणीय द्विवेदी जी, आपसे करबद्ध प्रार्थना है, श्रृंखला शुरू करें..इसे कई बार पढना चाह है..ठीक-ठीक समझ नहीं सका हूँ..इसे समझने का उछाह बहुत है मन में..! यह टिप्पणी आपकी इस बात से प्रेरित हो लिख रहा हूँ.."अलग अलग भाष्यों को पढ़ते समय मुझे लगा कि जो भी कोई गीता का भाष्य करता है उस के लिए गीता माध्यम भर है वास्तव में वह अपनी बात, अपना दर्शन गीता की सीढ़ी पर चढ़ कर कह देता है। तब वास्तव में गीता का अर्थ क्या होना चाहिए। यह तभी जाना जा सकता है जब उसे बिना किसी भाष्य के समझने का प्रय्त्न किया जाए। गीता की अनेक प्रतियाँ पास में उपलब्ध होते हुए भी एक नयी प्रति खरीदी जिस में केवल श्लोक और उन का अन्वय उपलब्ध था। मैं गीता समझने का प्रयत्न करने लगा।"

गीता का भाष्य एक विद्वान करे और वो एक प्रखर अधिवक्ता भी हो तो फिर क्या कहना..!

शुरू करिये श्रृंखला..

विजय प्रकाश सिंह ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
विजय प्रकाश सिंह ने कहा…

वकील साहब , तीन बातें संक्षेप मे :

१. मेरे पिताजी की मृत्यु १९९८ मे हुई तो ताऊजी ने गरुड़ पुराण के पाठ के लिए कहा , मगर मेरी माता जी ने मना कर दिया । शायद उनके मन मे भी वही कारण रहे होगें जैसा आप बता रहे हैं । तब तक मुझे पता नही था कि गरुड़ पुराण मे क्या है । विवाद का हल ऐसे निकाला गया कि मै अपने आप मन मे उसे पढ़ लूं , मैने वही किया और तब बात समझ मे आयी कि माताजी क्यों विरोध कर रहीं थी ।

२. गीता पर आप की चर्चा पर लोगों का मुग्ध होना अजूबा नहीं बल्कि यह साबित करता है कि भारत मूलत: एक धार्मिक देश है और हर किसी को लगता है कि धर्म के आगे शीश झुकाने से ईश्वर की कृपा मिलेगी और इसी मे वह अपना कल्याण समझता है।

३. धार्मिक आख्यान करने पर लोग आर्थिक लाभ भी देते हैं , यह तो शाश्वत सत्य है , देखिये न कितने बाबा लोग प्रवचन से महाराजा जैसा जीवन जी रहे हैं , क‍इयों पर तो सुन्दरियों की भी कृपा दृष्टि हो रही है ।

आखरी बात , आपका अनुभव हमे भी सद्‌विचार की प्रेरणा देता है । सचमुच घनघोर समय मे गीता पढ़ने से कई भर मुझे भी सहारा मिला है ।

Unknown ने कहा…

‘गीता ने ऐसे बहुतेरे लोगों को आकृष्ट किया है जिनकी मनोवृत्ति एक-दूसरे से तथा अर्जुन से बिल्कुल भिन्न थी। गीता को भगवदवचन समझा जाता है और इसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न अभिरुचि वालों ने ऐसे निराले ढ़ंग से की है कि लगता है, मूल वस्तु ही कुछ ऐसी है जो आंतरिक भेदों को मिटाने के बजाए, ज़्यादा शंकाएं औए खंड़ित व्यक्तित्व पैदा करती है।
वह नीति-दर्शन निश्चय ही अत्यंत संदिग्ध होता है जिसकी व्याख्या विभिन्न समाजों में विकसित हुए दिमागों ने इतने विभिन्न रूपों में की हो। उसकी मौलिक मान्यता क्या रह जाती है, अगर उसका अर्थ इतना लचीला है? फिर भी, यह पुस्तक ( गीता )कई मायनों में उपयोगी तो है ही।’

ये एक भारतीय मानवश्रेष्ठ के शुभवचन हैं। जो गीता की वस्तुगतता पर कई महत्वपूर्ण इशारे करते हैं। गीता एक ऐसा धर्मग्रंथ है जिससे मान्य ब्राह्मण कर्मकांडों का तिरस्कार किये बिना, किसी भी तरह की सामाजिक कार्रवाई के लिए प्रेरणा और औचित्य प्राप्त किया जा सकता है, यही कारण है जो इसकी प्रतिष्ठा को सर्वव्यापक बनाता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय, सभी तरह की विरोधी विचारधाराओं वाले कई महापुरूष इस एक ही किताब से यही प्रेरणा और औचित्य प्राप्त कर रहे थे।

इसमें तत्कालीन उपस्थित सभी तरह की दर्शन विचारधाराओं का संश्लेषण है, इसलिए यह विरोधाभासों से भरी हुई है। गीता की अपनी जो विलक्षण त्रुटी है, अर्थात असंगति में संगति की प्रतीति कराने का कौशल, वही उसकी उपयोगिता का हेतु भी है।

इसलिए अपनी आस्था का विषयी बनाकर, गीता से अपने किसी भी तरह के कर्म का औचित्य प्राप्त करने की अवसरवादिता सिद्ध करने का जरिया बनाने की बजाए, इसके समुचित विश्लेषण की गहराइयों मे उतरकर चीज़ों को जैसी वह हैं, समझने का जरिया बनाने की राह प्रशस्त करनी चाहिए। इसके नये भाष्य और व्याख्याओं की जरूरत है, ना कि इसके प्रचलित धार्मिक अवसरवादी आख्यानों की प्रस्तुति भर।

आपने इस आलेख में इस पर कुछ इशारे किए हैं। यदि आप वाकई में यदि गीता पर कुछ प्रस्तुत करने का मन बनाते हैं जैसी की यहां अपेक्षाएं की जा रही हैं, तो यह अपेक्षा भी की जा सकती है कि आप उपरोक्त जरूरतों की पूर्ति का भरसक प्रयत्न करेंगे।

शुक्रिया।

Rakesh Shekhawat ने कहा…

बहुत खूब। साक्षात गीता का ही आनन्द आ गया।

गिरिजेश राव, Girijesh Rao ने कहा…

इति गीता भाष्ये प्रथम खण्डम्
कोई शंख बजाओ भाई !

Abhishek Ojha ने कहा…

गीताप्रेस की ५ रूपया वाली लाल जिल्द वाली पुस्तक हमेशा मेरे बैग में होती है... पर अभी बहुत कुछ ('लगभग सब कुछ ही') समझना बाकी है.

RAJENDRA ने कहा…

आपके ब्लॉग पर यह पढ़ कर बहुत अच्चा लगा कभी मिलने पर अवश्य चर्चा होगी

अजित वडनेरकर ने कहा…

'जो भी कोई गीता का भाष्य करता है उस के लिए गीता माध्यम भर है वास्तव में वह अपनी बात, अपना दर्शन गीता की सीढ़ी पर चढ़ कर कह देता है। तब वास्तव में गीता का अर्थ क्या होना चाहिए। यह तभी जाना जा सकता है जब उसे बिना किसी भाष्य के समझने का प्रय्त्न किया जाए।'

आपने महत्वपूर्ण बात कही है। गीता या अन्य ग्रंथों में कही बातों के भावार्थ या विवेचनाएं ही महत्वूपूर्ण होती हैं और उन्हें विशिष्टता प्रदान करती हैं। मूल रूप में गीता कोई आकाशवाणी तो नहीं थी, एक वक्त का यथार्थ थी। उसे काल से जोड़कर ही उसकी व्याख्याएं होंगी। किसी वक्त कही गई किसी बात का भविष्य में क्या अर्थ होगा, इसकी कल्पना तो कहनेवाले को भी नहीं होती है। आपकी दृष्टि से देखें तो गीता महज अर्जुन को कर्मक्षेत्र में डटे रहने का उपदेश मात्र है। इसके लिए उसे किन किन चीज़ों से उसे निरपेक्ष रहने को कहा जाता है, वह मुझे कभी नहीं रुचता। उसकी दार्शनिक व्याख्या की जाए, तब यह कालातीत ज्ञान का स्रोत नजर आता है। किन्तु यह व्याख्या से ही संभव है। हो सकता है कृष्ण द्वैपायन कहें, " मैंने ऐसा तो कहना नहीं चाहा था, पर आपने बहुत खूब विवेचना की"

हमेशा की तरह दिलचस्प, ज्ञानवर्धक आलेख।

Himanshu Mohan ने कहा…

इस विषय पर कुछ भी बोलना कम भी होगा - और अधिक भी हो सकता है।
मगर यह दर्ज करना चाहूँगा कि गरुड़-पुराण की अपनी महत्ता रत्न ज्योतिष के बारे में आधिकारिक ग्रन्थ के बारे में है मगर उसमें वर्णित परलोक-गमन की यात्रा का विशद वर्णन हिन्दू समाज की भीरुता का दोहन - कर्मकाण्डी पण्डितों के द्वारा समाज से ऐंठने (जो कुछ संभव हो) के लिए - और इस बहाने यह कहना कि "धर्म बढ़ रहा है" ही लगता है।
श्रीमद्-भगवद्गीता का पारायण न केवल वैराग्य के समय ज्ञान और तदनुसार उपयोगी कर्मोन्मुख ज्ञान के प्रति प्रवृत्त करता है, बल्कि अपने जीवन काल में जिसे जो चाहिए - जो कामना हो - वही पाने की प्रेरणा देने वाला और मैं तो कहूँगा कि सामर्थ्य देने वाला कामधेनु सदृश ग्रन्थ है - वरदान है ईश्वर का साक्षात् !
सहज रूप में समजोपयोगी इस ज्ञान को बाँटने की इच्छा को धारण करने के लिए आपका आभार, अत्यन्त कृतज्ञता से पगी शुभेच्छाओं के साथ।