@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: आलोचना, चाटुकारिता और निन्दा - अपराध और परिवीक्षा

शुक्रवार, 14 मई 2010

आलोचना, चाटुकारिता और निन्दा - अपराध और परिवीक्षा

मारे पास माध्यम के रूप में सब से पहले काव्य कृतियाँ सामने आईं जो लिखित न होते हुए भी श्रुति से हमारे बीच थीं। इन कृतियों में सब कुछ था। जीवन था, जीवन का दर्शन था, जगत की व्युत्पत्ति की व्याख्या थी, सौन्दर्य था, अभिव्यक्ति थी और भी बहुत कुछ था। श्रुति के रूप में काव्य  का विस्तार सीमित था। लेकिन जैसे ही लिपि और लेखन सामग्री अस्तित्व में आई लोगों तक इस के विस्तार में वृद्धि हुई। लेकिन जब छापाखाने का आविष्कार हो गया और लेखन की एक से अधिक प्रतियाँ बनाना संभव हुआ तो इस के विस्तार में उछाल आ गया। तब अपने अपने दृष्टिकोण से उपलब्ध रचनाओं का मूल्यांकन आरंभ हो गया। फिर समाचार पत्र  और पत्रिकाएँ अस्तित्व में आए तो दायरा औऱ बढ़ा, पाठक संख्या बढ़ने लगी। पुस्तकें, समाचार पत्र और पत्रिकाएँ एक ऐसे माध्यम के रूप में सामने आए जिस से अपने विचार, सूचनाएँ और रचनाएँ औरों तक पहुँचाना अत्यंत सुगम हो गया। विचार, रचनाएँ और सूचनाओं को पहुँचाने के लिए अनेक रूप सामने आए। कविता, कहानी, लेख, निबंध आदि सामान्य रूप थे लेकिन इन के अलावा और भी रूप दुनिया में मौजूद थे जिसमें मूर्ति शिल्प और चित्रकारी प्रमुख हैं, नाटक, नृत्य और संगीत भी सदियों  से अभिव्यक्ति का साधन बने रहे हैं। फिर चलचित्र एक नया माध्यम सामने आया। आज हमारे सामने टेलीविजन और अंतर्जाल ऐसे साधन हैं जिन के माध्यम से हम सूचनाएँ, विचार और रचनाओं को लोगों तक पहुँचा सकते हैं।
रंभिक काव्य कृतियों के जमाने से ही उन का मूल्यांकन और विश्लेषण होता रहा है। वे मनुष्य समाज के लिए कितनी उपयोगी हैं या नहीं? अथवा उन में गेयता कितनी है? या फिर उन की कला कैसी है? वे आकर्षक हैं या नहीं? क्या वे ऐसी हैं जिन्हें लोग ग्रहण करना पसंद करेंगे अथवा नहीं। ऐसे बहुत से आधार रहे हैं जिन पर किसी भी कृति का मूल्यांकन होता रहा है। समाचार पत्रों, या टेलीविजन चैनलों या पत्रिकाओं का भी मूल्यांकन और समीक्षा किया जाता रहा है। अब अंतर्जाल ने वह सब अपने अंदर समेट लिया है। यहाँ सब कुछ है। साहित्य, समाचार, विचार, दर्शन, चित्र, छायाचित्र, वीडियो, ओडियो आदि आदि। विकृत और विभत्स से ले कर सुंदरतम और आकर्षक तक यहाँ उपलब्ध है और कराया जा सकता है। इसी ने हमें यह अवसर दिया है कि हम अपने अपने ब्लाग बनाएँ और उन पर जो कुछ भी, जैसे भी अभिव्यक्त कर सकते हैं, करें। इन्ही अवसरों में ब्लाग भी एक अवसर है जिस का उपयोग  हम सभी लोग जो ब्लागीरी के माध्यम से कर रहे हैं। ब्लागीरी में भाषाई समूह भी हैं और हिन्दी ब्लागीरी ब्लागों का एक भाषाई समूह है जो तेजी से विकसित हो रहा है। अब तक इतने ब्लाग और उन पर इतनी सामग्री आ चुकी है कि ब्लागों और ब्लागीरों का मूल्यांकन किया जा सकता है। बल्कि यह होना चाहिए। जब हम मूल्यांकन करने लगेंगे तो उस में किसी भी ब्लाग पर प्रकाशित अथवा ब्लागीर द्वारा प्रस्तुत की गई सामग्री के संबंध में अपने विचार प्रकट करेंगे। उस में उस की खूबियों का भी उल्लेख होगा और कमियों का भी। हो सकता है किसी मूल्यांकनकर्ता ने ब्लाग या ब्लागर की जिन खूबियों का वर्णन किया है वह दूसरों की निगाह में खूबियाँ न हों या उल्लेखनीय न हों। यह भी हो सकता है कि जिन कमियों का वह वर्णन कर रहा है वे कमियाँ ही नहीं हों। यह भी हो सकता है कि ऐसा मूल्यांकन किसी को पसंद आए और किसी को न आए। फिर इस मूल्यांकन का भी मूल्यांकन किया जा सकता है। 
बात कुछ भी हो अब वह वक्त आ पहुँचा है जब हिन्दी ब्लाग और ब्लागीरों का मूल्यांकन होना चाहिए। साहित्य में इसी मूल्यांकन को आलोचना या समालोचना कहा जाता है। साहित्य में आलोचना या समालोचना का अपना महत्व है इसी कारण से अच्छे अच्छे साहित्यकार आलोचना और समालोचना के लिए तरसते दिखाई पड़ते हैं। वहाँ उस आलोचना और समालोचना की भी आलोचना और समालोचना होती रहती है। साहित्य के क्षेत्र के लिए वह आम बात है। 
ब यदि मूल्यांकन या समालोचना हो तो उस का आधार और रूप क्या होना चाहिए? हम पहले रूप की बात करें तो निश्चित रूप से जब हम किसी ब्लाग या ब्लागीर की समालोचना करने लगेंगे और अपने निष्कर्ष रखेंगे तो हमें यह तो करना ही होगा कि समालोचना में जो बात हम कहें उस के समर्थन में पर्याप्त तथ्य और साक्ष्य भी उसी रचना में अवश्य ही हों। मसलन यदि हम यह कहते हैं कि दिनेशराय द्विवेदी के ब्लाग इस कमी से या इस खूबी से युक्त हैं तो हमें उन कमियों और खूबिय़ों के उदाहरण भी सामने रखने चाहिए। यदि हम बिना किसी उदाहरण, तथ्य और साक्ष्य के अपनी बात कहते हैं तो प्रशंसा करने की स्थिति में यह चाटुकारिता और कमियों का उल्लेख करने पर यह निंदा का रूप ले लेगी। 
ज्ञानदत्त जी पाण्डेय की मानसिक हलचल पर समीरलाल जी और अनूप शुक्ल जी के बारे में जो तीन-तीन पंक्तियाँ कही गईं और जिन्होंने तीन दिनों से हिन्दी ब्लाग जगत में बवाल मचा रखा है उन की सबसे बड़ी कमी यही है कि उन्हों ने इन दोनों ब्लागीरों के बारे में जो कुछ भी कहा वह बिना किसी साक्ष्य, तथ्य और उदाहरण के कह दिया। इस दृष्टिकोण से उसे समालोचना, समीक्षा या मूल्यांकन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। उस के वर्गीकरण के लिए दो ही श्रेणियाँ बचती हैं, चाटुकारिता या निंदा। लेकिन मैं नहीं समझता कि ज्ञानदत्त जी की मंशा किसी की निंदा करना या चाटुकारिता करना हो सकती है। मेरा विनम्र मत है कि इसे हम आलोचना, मूल्यांकन या समीक्षा का आरंभ करने का एक प्रयत्न माना जाना चाहिए, लोगों का सोचना है कि इस में उन से एक अपराधिक गलती हो गई है।  लेकिन पहले अपराध के लिए तो कानून में भी सजा न दे कर परीवीक्षा (probation) पर छोड़े जाने का कायदा है।

25 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

यदि हम बिना किसी उदाहरण, तथ्य और साक्ष्य के अपनी बात कहते हैं तो प्रशंसा करने की स्थिति में यह चाटुकारिता और कमियों का उल्लेख करने पर यह निंदा का रूप ले लेगी।

यही हुया भी है!

शरद कोकास ने कहा…

इस लेख के सन्दर्भ मे^ सर्वप्रथम मै आलोचना पर श्री नामवर सिंह का यह वक्तव्य उद्ध्रत करना चाहता हूँ "आलोचना वकालत नहीं है । वह सफाई का वकील नहीं है जो मुजरिम को बचाने का काम करे । आलोचना किसी को कटघरे में खड़ा कर किसी के खिलाफ फैसला भी नहीं सुना सकती । मेरा काम है समालोचना । पहले खुद देखना और दूसरों को दिखाना ,दिखानेवाले का क्या काम होगा मैं नही जानता । लेकिन क्या आलोचक- समलोचक की अविधा कुछ कम है कि हम दूसरे पेशे में अपना नाम लें । । समालोचना का धर्म "देखने" और "दिखाने" का है । जो दिखाई नहीं दे रहा है , पर्दे के पीछे जो छिपा है उस पर्दे को हटाकर दिखा सकूँ कि देखो ! सच यहाँ छिपा है । इस तरह जो दूसरे सच को नहीं देख सके हैं उन्हे भी दिखा सकूँ । फिलहाल मेरी नज़र में मेरा धर्म यही है । आलोचना का भी शायद यही धर्म होगा । आलोचक का एकमात्र अस्त्र है उसका -लोचन । मै आलोचना में उसका इस्तेमाल करना चाहता हूँ बस । "
नामवर जी के इस कथन का अर्थ यही है कि आलोचक का काम दिखाना है ।देखने का काम तो पाठक भी कर सकता है लेकिन छुपी हुई कई चीज़ों को दिखाने का काम आलोचक ही कर सकता है और इस तरह दिखाने में साक्ष्य सर्वाधिक ज़रूरी है अन्यथा इसके अभाव में मूल्यांकन पूर्ण नहीं होगा । फिर हम जिसे रचना कहते हैं वह ही प्रमुख लक्ष्य होना चाहिये न कि व्यक्ति । व्यक्तित्व और कृतित्व में अंतर हो सकता है ।
इसीलिये आलोचना आसान काम नहीं है क्योंकि इसके लिये एक अलग दृष्टि की दरकार होती है जो केवल एकांगी न हो । यदि वह खुद चौतरफा नहीं देख सकता तो वह औरों को क्या दिखायेगा ?
द्विवेदी जी यह आपने बहुत अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है । सूचना ,विचार और रचना यह सब कुछ हम इन दिनों ब्लॉगजगत में देख रहे हैं । और इन पर अलग अलग तरीके से आलोचना का समय आ गया है । किसी भी विधा के विकास के लिये स्वस्थ्य आलोचना की आवश्यकता होती है जिसके अभाव में विकास ठहर जाता है ।
आपके इस आलेख में बहुत सारे विषयों पर चिंतन है । मैं कोशिश करूंगा कि आगे चलकर आपके साथ ब्लॉगीरी के विकास में सहयोग कर सकूँ ।

Sanjeet Tripathi ने कहा…

आपने काफी कुछ स्पष्ट किया और उसके बाद शरद भैया ने जो कहा वह और भी अधिक स्पष्ट हुआ।

मुझे लगता है ब्लॉगजगत में हम आलोचना सहन नहीं कर सकते ( यहां हम से आशय करीबन सभी ब्लॉगर्स से है)

शायद इसीलिए सब बवाल खड़े होते हैं।

आगे और पढ़ना चाहूंगा इस मुद्दे पर

अजित वडनेरकर ने कहा…

सटीक और संतुलित अभिव्यक्ति रहती है आपकी।
हमेशा की तरह इस बार भी इस प्रसंग की खबर नहीं थी। यहां आकर ही पता चला और फिर संबंधित पोस्टें पढ़ने के बाद टिपिया रहे हैं :)
शुक्रिया..

Amrendra Nath Tripathi ने कहा…

kokas jee kee baat se sahmat hun !

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सटीक और सधा हुआ विश्लेषण किया है आपने. साधुवाद!

M VERMA ने कहा…

आलोचक/समालोचक न तो वकील की भूमिका में हो सकता है और न जज की भूमिका में. सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात है तटस्थता की. यदि वह वकील होगा तो तटस्थ नहीं रह सकता और जज तो वह कतई नहीं हो सकता जज तो पाठक ही होगा.
(हलाँकि ज्यादा मामले में ऐसा नहीं हैं)
और फिर परीवीक्षा (probation) काल में भी चेतावनी तो दी ही जाती होगी.

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

सटीक और संतुलित अभिव्यक्ति के लिए आभार

honesty project democracy ने कहा…

मैं आपसे सहमत हूँ,आलोचना और प्रत्यालोचना होनी चाहिए लेकिन ब्लॉग जगत तो आपस में ईमेल और फोन पर भी एक दुसरे की कमियों और खूबियों की चर्चा कर सकता है ,ब्लॉग पर तथ्यों के बिना किसी ब्लोगर की ही निंदा या चाटुकारिता से ब्लॉग की मर्यादा को आघात लगता है / ब्लॉग जगत के लिए ये शर्म की बात है की ,हम देश और समाज को नरक बनाने वालों को निशाना बनाने के वजाय एक दुसरे ब्लोगर को ही निशाना बनाने पे तुले हुए हैं और दुःख तब और ज्यादा होता है जब इस कार्य में कुछ समझदार और गंभीर ब्लोगर भी शामिल हो जाते हैं /

अनूप शुक्ल ने कहा…

हमारा विनम्र मत है कि:
१. ज्ञानजी ने जो लिखा वह अपने विचार लिखे।
२. वे हमेशा इसी तरह लिखते हैं।
३.उनका लिखने का अंदाज विषय प्रवर्तन की तरह होता है। उन्होंने एक-दो वाक्यों में अपनी बात कही और आपसे कहा अब आप बताओ आगे।
४. आगे की कहानी उनका पाठक समुदाय करता है। वैल्यू एडीशन करता है।
५. यहां भी उन्होंने यही किया। अपनी बात कही और खोल दिया टिप्पणी बक्सा। लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाओं की झोली खोल दी। इस तरह वे अपने लिखने के अंदाज में पूरी तौर से सफ़ल रहे।
६. इस मामले में वे नामवरजी के आगे की चीज साबित हुये।
७. इस बहाने ब्लॉग जगत की और तमाम प्रवत्तियां सामने आईं। लोगों ने अनामी/बेनामी नामों से ज्ञानजी या फ़िर अनूप शुक्ल की ऐसी-तैसी करना शुरू किया।
८. इसके अलावा और प्रवत्तियां भी सामने आई हैं। सबसे बड़ी बात कि आलोचना सहन का माद्दा बहुत कम है। जरा सा किसी ने कुछ खिलाफ़ कह दिया तो आप रोने लगे और आपके प्रशंसक कपड़े फ़ाड़ने लगे।
९.आप कुछ कहिये न! आपके पास भी तो तमाम तथ्य हैं! विनम्र मत जो आपने व्यक्त किया उस राह पर अमल करते हुये कुछ विचार व्यक्त करिये।
१०. मेरा विनम्र मत है कि ब्लॉग जगत में अधिकांश लोग बातों को अपने पूर्व गठित धारणाओं के आधार पर अधिक ग्रहण करते हैं।
११.अब आप कहेंगे बिन्दु १० के समर्थन में प्रमाण लाओ। तो सब काम क्या हमीं करेंगे? आप भी तो कुछ करिये।

RAJENDRA ने कहा…

आदरणीय द्विवेदी जी हिंदी में बच्चों को आरंभ से ही आलोचना और समालोचना करने को कहा जाता है जब भी परीक्षा के प्रश्नपत्र में समालोचना की बात आती है तो बात योग्यता की शायद उतनी नहीं होती जितनी एक बालक की प्रतिक्रिया जानने की होती है इस लिहाज से तो आपके आलेख ने मन प्रफुल्लित किया कि ब्लोगरों की
दुनिया में समालोचना विकास के लिए जरूरी है

उम्मतें ने कहा…

द्विवेदी जी अगर मै समीर लाल समीर और अनूप शुक्ल फुरसतिया के रचनाकर्म पर बतौर पाठक कोई धारणा बनाता हूं तो इसमे गलत क्या है ? ...मुझे या किसी भी अन्य पाठक को यह अधिकार तो है कि अध्ययन करें और धारणा बनाये ...मेरे ख्याल से इस सीमा तक ज्ञानदत्त पान्डेय भी सही हैं किंतु ...किंतु जब उन्होने इन दोनो के श्रेष्ठिक्रम निर्धारण का यत्न किया तो दो बाते स्पष्ट हुईं कि या तो उन्होने अपने आपको इन दोनो के बाद गिना ...जोकि विनम्रता है अथवा वे स्वयं को इस सूची से इतर / ऊपर मानकर जजमेन्टल हुए ... आप इसे दम्भ कह सकते है ! अब उन्होंने विनम्रता से काम लिया याकि दंभ से ...अंततः ये भी तो उन्हें ही निर्धारित करना है...क्योंकि ब्लाग उनका ...आलेख उनका...और मुद्दा भी उनका अपना है !

संजय बेंगाणी ने कहा…

शांत पानी में पत्थर मारने का काम ज्ञानजी कर गए. हिन्दु-मुस्लिम के बाद लिखने के लिए एक मुद्दा थमा दिया. भूल गए हम भारतीय भावुक होते है. परदे पर देखे से हीरो का मुल्यांकन करते है. भाषण से नेता का मुल्यांकन करते है. समीरजी व अनूपजी की आपस में तुलना ही बेतुक्की बात है.

Ashok Kumar pandey ने कहा…

मैने वह पोस्ट पढ़ी नहीं है…अब पढ़ने की इच्छा भी नहीं रही।

मेरा मानना है कि अभिव्यक्ति के इस नये साधन में अभी बहुत अराजकत है। आलोचना भी वही सह पाते हैं जिन्होंने लेखन की लंबी परंपरा में वह ताक़त हासिल की है। आलोचना का अर्थ तो शरद भाई ने साफ़ कर ही दिया है। परंतु यहां मैने अक्सर टीप आकर्षित करने के लिहाज़ से लिखे जाने का जो दबाव देखा है वह इन सबके मूल में है शायद

अन्तर सोहिल ने कहा…

मुझे भी नहीं लगता की ज्ञान जी का मंतव्य चाटुकारिता या निंदा रहा होगा। किस भाव, मानसिकता या कौन सा विचार आने पर उन्होंनें यह पोस्ट लिखी थी, यह तो ज्ञानजी खुद ही बता सकते हैं।

प्रणाम

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आदरणीय ज्ञानदत्तजी की लेखन शैली इस पोस्ट के माध्यम से टिप्पणीकर्ताओं को समालोचना में उद्धृत करना चाह रही थी । गुण-दोष का संक्षिप्त उल्लेख आलोचना का हिस्सा है । टिप्पणियों समेत पूरी पोस्ट इस विषय एक समालोचना का वक्तव्य होता । टिप्पणीकर्ताओं ने यथोचित के अतिरिक्त सब कुछ लिखा । कुछ श्रेष्ठ और संतुलित ब्लॉगर ही इस मर्म को समझे, उनके प्रति मेरा आदर और बढ़ गया ।
जहाँ तक आलोचना सहन करने की बात है तो लोगों को सदाशयता के लिये भी आलोचना झेलनी पड़ती है । सागर की गहराई सा मन रखने के लिये सब समाहित कर लेने का गुण आना चाहिये । नदियाँ अपना वेग सागर में जाकर भूल जाती हैं ।

Himanshu Mohan ने कहा…

आपका लिखा अच्छा लगा।
समीर लाल जी की टिप्पणी में भी बड़प्पन दिखा, अच्छा लगा।
अनूप शुक्ल जी की टिप्पणी में लिखा भी संतुलित, समझ से भरा, सटीक और अच्छा लगा।
शरद कोकास जी ने मर्म की बात टिप्पणी में दी, अच्छा लगा। प्रवीण पाण्डेय जी का नज़रिया भी अच्छा लगा।
ज्ञान जी का सवाल उठाना पूरे ब्लॉग-जगत की पोल खोल गया, इस अर्थ में सार्थक रहा।
कुल मिला कर प्रकरण भी अच्छा ही रहा, अगर इस से सीख ले कर कुछ सुधार आ सके, जहाँ - जहाँ चाहिए।

रंजन (Ranjan) ने कहा…

हम तो कहेंगें

जय हो!!!

अजय कुमार झा ने कहा…

इस मुद्दे पर , सच कहा तो जबरन बनाए गए इस मुद्दे पर आपकी राय पढी सर , यकीन मानिए ये बिल्कुल अपेक्षा के अनुरूप ही था । और सच बात शायद ये है कि हम सब आलोचना सहने लायक कलेजा अभी नहीं बना पाए हैं , और दूसरी ये कि नीयत अभी भी हमेशा ही संदेह के घेरे में रहती है ।

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

Very Nice!

प्रदीप वर्मा ने कहा…

हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा

"अनूप जी और ज्ञानदत्त जी दबे हुए संस्कार ऐसे ही बाहर निकल आते हैं" वाली पोस्ट के बाद ब्लॉगवाणी तिलमिलाई!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

जिसने धर्म के नाम पर आने वाली संवेदनशील ब्लोगों को नहीं निकाला उसने इस अनोखे ब्लोग को घबड़ाकर ब्लोगवाणि से निकाल दिया!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

आज की पोस्ट देखनी है तो आगे पढ़ें

Baljit Basi ने कहा…

एक आध बात कहनी चाहूँगा. बलाग जगत बहुत विशाल है.इस में केवल साहित्य ही नहीं, इस लिए साहितिक आलोचना की बात साहितिक स्वभाव वाले ब्लॉगों के बारे ही हो सकती है. बलाग अपने स्वभाव से अधिक निजी चीज़ है. बलाग विधा नहीं एक माध्यम है. इसमें साहितिक रचनायों में भी अधिक निज्जता होती है. ऐसा शायद इस लिए है की इस पर अभी कोइ बाहरी मापदंड लागू नहीं होते. ब्लाग की अधिकांश रचनाएँ डाइरी के अधिक नजदीक है. बलाग की आलोचना के लिए मापदंड निश्चित करने के लिए हमें अधिक उदार होना पड़ेगा.

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप के लेख से सहमत है जी, मुझे तो लगता है कि बात कुछ नही बस कुछ लोगो ने इसे बतगड बना दिया, मै आज भी इन तीनो को इज्जत ओर प्यार की नजर से ही देखता हुं, बस गलत फ़ेहमी कोदुर करने की जरुरत है, ओर एक दो नये ब्लांगरो से जो बहुत ही भद्दी टिपण्णीयां दे कर आग मै घी का काम कर रही है उन्हे अन्देखा करने कि जरुरत है,आप का धन्यवाद इस अति सुंदर विचारो के लिये

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

अच्छा विश्लेषण.

Himanshu Pandey ने कहा…

आप का यह आलेख तो अब पढ़ पाया !
सुन्दर स्थिति विश्लेषण ! आभार ।