Thursday, May 26, 2011

दूसरा दिन ...................... डाक्टर देवता-3




स कहानी के वाचक को दाहिने हाथ में तंत्रिका संबंधी शिकायत हुई थी, उस ने अपने मित्रों से सहज उल्लेख किया तो एक मित्र ने न्यूरोफिजिशियन से समय ले लिया। वाचक ने डॉक्टर के पास अकेले जाने के स्थान पर अपने एक दवा प्रतिनिधि मुवक्किल को साथ ले लिया। वहाँ उसे एक और दवा प्रतिनिधि मुवक्किल मिल गया। उन्हों ने वाचक को क्रम तोड़ कर डाक्टर के कक्ष में घुसा दिया जिस पर डाक्टर ने नाराज हो कर उन्हें बाहर निकाल दिया। वाचक डाक्टर को दिखाए बिना ही वापस जाना चाहता था। लेकिन दोनों दवा प्रतिनिधियों ने उसे डाक्टर को दिखाने के लिए मना लिया। डाक्टर ने वाचक को ठीक से देखा और दवाइयाँ लिख दीं। अगले दिन सुबह से उस ने दवाइयाँ लेना आरंभ कर दिया। उस ने दिन में तीन बार दवाइयाँ लीं, लेकिन उसे हर बार दवा लेने के कुछ घंटे बाद नींद सताने लगती और वह सो जाता। अब आगे पढ़िए .....

भाग-3

गले दिन सुबह उठा तो एक दम ताजा महसूस हुआ। डाक्टर की बताई पेट ठीक रहने की गोली कल सुबह खाई थी। फिर भी मैं ने छह गिलास पानी एक साथ पी डाला, मेरी सोच थी कि इस से गोली के काम में मदद मिलेगी और शौच में आसानी होगी। इस के बाद घर में ही इधर-उधर टहलने लगा, लेकिन हाजत का कोई नामोनिशाँ तक न था। पत्नी रसोई में थी। कुछ देर बाद उस ने कॉफी ला कर दी। मैं ने बैठ कर उसे पिया और ताजा अखबार की सुर्खियाँ देखता रहा। कॉफी खत्म हो जाने के बाद फिर से टहलने लगा। दस मिनट तक भी कोई हलचल न हुई तो मैं परेशान होने लगा। अब मुझे समझ आ रहा था कि डाक्टर ने यह पेट वाली गोली क्यों दी थी। उस की दीगर दवाओं से कब्ज होने वाली थी और उसी से बचाने को उस ने यह गोली दी थी। पर शायद यह पर्याप्त नहीं थी और दूसरी दवाओं ने अपना काम कर दिया था। मैं ने गोली, छह गिलास पानी, एक कॉफी की ताकत के ऊपर अपनी मसल पावर भी आजमाने का निश्चय किया और सीट पर जा बैठा। इतनी सारी शक्तियाँ एक साथ होने ने असर तो दिखाया पर परिणाम लगभग चौथाई ही रहा। इस से कम ही सही पर कुछ संतुष्टि तो हुई। मैं ने हाथ साफ करते हुए सोचा कि आधे घंटे बाद एक आजमाइश और की जा सकती है। बाहर निकल कर फिर चार गिलास पानी पिया और शेव बनाने लगा। शेव के बाद कंप्यूटर पर बैठ कर मेल देखा। आधा घंटे बाद की कोशिश बिलकुल नाकामयाब रही। मैं ने खाली पेट वाली गोली खाई और स्नान करने चला गया। अदालत जाने के पहले नाश्ते के ठीक बाद कल वाली तीन गोलियाँ लेना कतई न भूला। 

दालत की अपनी सीट पर आ कर बैठा और अपनी आज की कार्यसूची देख ही रहा था कि मुहँ खुला और खुलता ही चला गया। मैं चाहता था उस का खुलना कहीं रुक जाए। लेकिन वह अपनी अधिकतम सीमा तक खुला। यहाँ तक कि पेशियों ने और अधिक खुलने के लिए जोर भी लगाया। लेकिन अब और अधिक खुलना संभव नहीं रहा था। कुछ देर जोर लगाने के बाद पेशियाँ सुस्त हो गईं और मुहँ अपने ठिकाने आ गया। इस सारी क्रिया को मेरे सहायक वकीलों ने अत्यन्त आश्चर्य के साथ देखा। मैं ने कुछ पेशियों पर जाने के लिए सहायकों को निर्देश दिया और सोचने लगा कि मुझे उस वक्त किस मुकदमे की पेशी पर जाना चाहिए। तभी पेशियों ने फिर मुहँ पर अपनी ताकत आजमाई। पहले वाली क्रिया ठीक उसी तरह दोहराई गई। इस बार तो मैं ने अपनी गर्दन को इधर-उधर हिलाया भी कि उस के ऊपर विराज रहे सिर के अंदर कहीं कुछ अटक रहा हो तो निकल जाए और पेशियाँ अपनी क्रिया दोहराना बंद कर दें। किसी पेशी पर अदालत में जज के सामने यदि पेशियों ने अपनी हरकत दोहरा दी तो अपना तो सारा इंप्रेशन ही कचरा हो जाएगा।  मैं ने अपनी सीट पर ही बैठ कर केस फाइलें  देखना आरंभ कर दिया। कुछ देर बाद मोबाइल की घंटी बजने लगी। मैं ने देखा यह पंडित की कॉल थी यह याद दिलाने के लिए कि चाय का समय हो गया है। मैं ने समय देखा तो दस बजने वाले थे। मुझे यह कॉल अच्छी लगी। जैसे अचानक डूबते को कोई सहारा मिल गया हो। मैं तुरंत उठ कर केंटीन की ओर चल दिया। रास्ते में पंडित और मुरारी भी मिल गए। 

केंटीन में जा कर बैठते ही मुहँ फिर खुल गया। क्रिया संपूर्ण होने के बाद मुरारी ने पूछ ही लिया। आज रात सोये नहीं क्या, अभी तक मुहँ खुल रहा है? मैं क्या कहता। उन्हें बताया कि कल खूब सोया हूँ। सुबह ताजा भी था लेकिन यहाँ अदालत आते ही यह सब शुरू हो गया, यह तीसरी है। मुझे लग रहा है कि यह डाक्टर की दवा का असर है। इस के बाद मुरारी ने पूरा उपदेश झाड़ डाला। 
- तुम्हेँ उस डाक्टर के पास जाना ही नहीं चाहिए था। तु्म्हें सिर्फ और सिर्फ गरदन की कसरत करनी चाहिए। सब ठीक हो जाते। तु्म्हें तो पैसा फालतू खर्च करते आनंद आता है। जितने पैसे उसे दे कर आए हो उतने में तो दो दिन की शाम की ठंडाई का प्रबंध हो जाता।   बढ़िया बादाम में छनती। तुम ने ये आंनद लेने का काम तो बंद कर दिया है। इसीलिए ये सब चक्कर हो रहे हैं। तुम शाम को आ जाओ पावर हाउस के पास हनुमान मंदिर पर। शाम को तुम्हें बढ़िया बादाम छनवा देते हैं। कल ही गर्दन और हाथ का करंट बन्द समझो। 
उस के इस उपदेश पर मैं क्या कहता? मैं ने उसे बस इतना कहा -यहाँ साला हाथ में करंट दौड़ता फिर रहा है और तुम्हें मजाक सूझ रहा है। 
-अब मजाक पर नाराज मत होओ। तुम्हारा इलाज अभी से किए देते हैं। इतना कह कर उस ने केंटीन वाले छोकरे को जोर से आवाज लगाई और कहा -समौसे भेज दे, एक-एक। फिर ऑर्डर संशोधित किया - नहीं दो समौसे और एक कचौड़ी लाओ। बड़े वकील साहब को कचौड़ी पसंद है।  
मैं उसे मना करता ही रह गया कि मैं नाश्ता कर आया हूँ, मैं कुछ न लूंगा। कुछ देर में कचौड़ी समौसे आ गए और चाय के पहले निपटा दिये गये। हम पान की दुकान तक साथ आए पान खाया। वापस लौटते वक्त पेड़ से छन कर आ रही धूप की चिलकियों में मुझे इंद्रधनुष जैसे रंग दिखाई दिए। 
मैं ने मुरारी को कहा- आज तो दुनिया बड़ी रंगीन लग रही है। 
मुरारी कहने लगा -क्यों न लगेगी? शाम को हनुमान मंदिर का न्यौता जो मिल गया है। अभी शाम तक ऐसे ही रंगीन  लगेगी और छनने के बाद दुगनी हो जाएगी। कल सुबह एक दम तरोताजा अदालत न पहुँचो तो नाम बदल देना। 

मेरे बैठने का स्थान आ गया था, वे मुझे छोड़ आगे बढ़ गए। मेरे लिए सहायकों की रिपोर्ट मौजूद थी। कि मुझे किन किन अदालतों में जाना है। मैं आवश्यक फाइलें उठा कर चल दिया। काम से निबटते-निबटते दो बज गए। जैसे ही घर आने को तैयार हुआ मिस्टर पॉल ने टोक दिया -अब तो हमारे साथ कॉफी पी सकते हैं? मैं उन के आग्रह को कैसे ठुकरा सकता था, उन्हों ने ही तो मेरे लिए डाक्टर बारदाना से समय लिया था। कुछ समय उन के साथ कॉफी पीने में लगा। कैंटीन से वापसी में उन्हों ने पूछा -दवाओँ से आराम तो हुआ होगा। मैं ने उन्हें बताया कि कंरट के दौरे कम हो गए हैं,  पर डाक्टर ने दवा ऐसी दी है कि दुनिया रंगीन नजर आने लगी है।
-ये तो अच्छी बात है, दुनिया रंगीन नजर आने लगे। वैसे क्या हुआ है? उन्हों ने पूछा। 
-बस कुछ नहीं हर चीज ऐसे नजर आ रही है जैसे चित्र की शार्पनेस समाप्त हो जाए। सारे चेहरे एक जैसे खूबसूरत दिखाई देने लगे हैं। मिस्टर पॉल हँस पड़े। 
मैंने उन्हें कहा -कुछ भी हो आठ दिन की दवा तो अवश्य ही लूंगा। जिस से कोई न कहे कि मैं ने इलाज को बीच में त्याग दिया। मिस्टर पॉल को उन की सीट पर छोड़ कर मैं अपनी कार की ओर चल दिया। कार धूप में तप कर बिलकुल गर्म हो रही थी। मैं ने मुंशी से कपड़ा गीला कर मंगवाया और स्टेयरिंग को ठंडा किया तो वह पकड़ने काबिल हुई। मैं घर चला आया। लंच के साथ फिर दो गोलियाँ गटकीं, ऑफिस में दस-पंद्रह मिनट काम निपटाया। फिर मुझे नींद सी आने लगी। मैं अपने कमरे में आ कर बिस्तर शरण हो गया। सुबह तो पत्नी ने फेरी वाले से दूध ले कर काम चला लिया था। शाम साढ़े चार पर दूध लेने जाना था। पत्नी को कहा कि वह मुझे ठीक साढ़े चार पर जगा दे। 

शाम को दूध ले कर आया। जैसे ही दफ्तर में घुसा। पता नहीं दायाँ पैर कुछ तिरछा चला गया और दीवार के पास लकड़ी की बुक रैक से टकराया। एक दम तेज दर्द उठा जो बहुत देर तक बना रहा। मुझे लगा कि चोट गहरी लगी है। शायद पैर की किसी उंगली का डिसलोकेशन हुआ हो या फिर कोई लाइन फ्रेक्चर। दर्द कम हुआ तो मैं फिर से काम में जुट गया। रात्रि के भोजन के साथ फिर गोलियाँ लीं तो दस बजे ही निद्रा सताने लगी और मैं फिर से बिस्तर पर था। मैं ने पैर की उंगली को टटोला तो वहाँ दबाने पर दर्द होता था। कहीं कोई सूजन नहीं थी। मैं ने आश्वस्ती की साँस ली कि कम से कम फ्रेक्चर तो नहीं होगा। होता तो पैर अवश्य सूज गया होता। कुछ ही देर में मैं सो रहा था। 
... क्रमशः
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