@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

लाल बस्ता

देहरी के पार, कड़ी - 39
प्रिया की आँख खुली तो खिड़की से बहुत तेज प्रकाश अंदर आ रहा था. उसने अचकचाकर घड़ी देखी तो उसे डिजिटल घड़ी के अंक ठीक से दिखाई नहीं दिए. उसकी आँखें पूरी खुल ही नहीं पा रही थीं. उसने अपनी आँखों की पुतलियों पर हल्के से उंगलियाँ चलाकर उन्हें साफ किया. फिर सिरहाने की टेबल पर रखा चश्मा आँखों पर चढ़ाया, तब अंक दिखे. घड़ी सवा आठ बजा रही थी. ऐसी गहरी नींद उसे बहुत दिनों बाद आई थी. रात को एक बार भी उसकी नींद नहीं टूटी थी. आठ घंटे से भी अधिक सो लेने के बाद भी उसे लगा कि कल की थकान अभी निकली नहीं है. उसकी इच्छा हुई कि फिर से सो जाए. लेकिन कुछ देर लेटे रहने के बाद उठी. अपने लिए चाय बनाकर पीने बैठी.

आज दो मई थी. एएसएल के यहाँ सुनवाई की अंतिम तारीख. रात एमबी में बातचीत के बीच प्रशांत बाबू ने बातचीत में कहा था, कल अधिक कुछ नहीं होना है. एएसएल दोनों पक्षों के तर्क सुनेगा और फिर घंटे-दो घंटे में या फिर तीन मई को अपनी रिपोर्ट मंत्रालय भेज देगा जहाँ श्रम मंत्री से सलाह के बाद लेबर सेक्रेटरी अंतिम निर्णय लेगा. उसे लगा, उसका आज वहाँ कोई काम नहीं है, बेहतर है कि वह ऑफिस चली जाए.

उसने चव्हाण साहब को फोन करके पूछ लिया, उन्हें उसकी कोई जरूरत नहीं थी. उसने तय किया कि वह आज सुनवाई में न जाकर अपने ऑफिस जाएगी. शाम को ऑफिस समाप्त होने के बाद एमबी होते हुए अपने फ्लैट लौटेगी. वहाँ उसे पता चल ही जाएगा कि आज एएसएल के यहाँ क्या हुआ.

प्रिया ऑफिस से छूटी तो आठ बज चुके थे. वह सीधे एमबी पहुँची. प्रशांत बाबू अपनी खास टेबल पर बैठे आज का अखबार पढ़ रहे थे. वह उनके सामने की कुर्सी पर जा बैठी.


प्रिया को देखते ही प्रशांत बाबू ने अखबार मेज पर रख दिया और चश्मा उतारते हुए मुस्कुराए. "आओ प्रिया, आज तुम कोर्ट नहीं आईं तो इजलास थोड़ा शांत लग रहा था."

प्रिया ने कुर्सी खींचते हुए पूछा, "शांत? मुझे तो लगा था आज भट्ट साहब ने आसमान सिर पर उठा लिया होगा. क्या हुआ आज?"

इससे पहले कि प्रशांत बाबू कुछ कहते, रामजी काका तीन कप चाय लेकर वहाँ पहुँच गए. उनके चेहरे पर एक अजब सी चमक थी, जैसे कोई बड़ी जंग जीतकर लौटे हों.

"बिटिया, आज तुम नहीं आई तो तुमने बहुत बड़ा तमाशा छोड़ दिया!" रामजी ने चाय मेज पर रखते हुए चहक कर कहा. "आज तो चव्हाण साहब ने वो धोबी पछाड़ दी है कि भट्ट साहब के चेहरे का रंग ऐसे उड़ गया था जैसे सरकारी दफ्तरों की पुरानी दीवारों का चूना गिरता है."

प्रशांत बाबू ने बीच में टोकते हुए कहा, "रामजी, थोड़ा तसल्ली से बताओ. प्रिया, मुख्य बात यह है कि एएसएल ने दोनों पक्षों को विस्तार से सुना. भट्ट ने अपनी वही पुरानी राग अलापी कि कंपनी 'वेंटिलेटर' पर है और उसे बंद करना ही एकमात्र रास्ता है."

"हाँ! और फिर देखो तमाशा..." रामजी काका ने अपनी चाय का एक बड़ा घूँट भरा और हाथ नचाते हुए बोले, "भट्ट साहब कह रहे थे कि मैनेजमेंट बहुत 'उदार' है, मजदूरों को पैसा दे रहा है. तभी चव्हाण साहब अपनी जगह से ऐसे खड़े हुए जैसे कोई शेर झाड़ी से निकलता है. उन्होंने एएसएल से कहा— 'सर, ये उदारता नहीं, ये तो कसाई का दाना है जो बकरे को हलाल करने से पहले डाला जाता है.' यह सुनते ही जीएम साहब, जो भट्ट के पीछे बैठे थे, उनके चेहरे का रंग एकदम उड़ गया, वे बार-बार अपनी टाई ढीली करने लगे. इजलास में एसी और पंखा चलते रहने के बावजूद वे पसीने-पसीने हो गए. "

प्रिया और प्रशांत बाबू दोनों हंस पड़े. रामजी काका ने आगे मजे लेते हुए कहा, "और वो भट्ट साहब! बहस के बीच में बार-बार अपनी फाइलें ऐसे टटोल रहे थे जैसे कोई चोर जेब काटने के बाद खुद पीड़ित का बटुआ ढूंढने लगता है. जब चव्हाण साहब ने 'ट्रक सिस्टम' और डिफेंस सप्लाई की बात छेड़ी, तो भट्ट साहब का गला ही सूख गया. वे बार-बार पानी की खाली हो गई बोतल को हाथ लगाने लगे. एएसएल ने उन्हें देखा तो अपने ही चपरासी को भेज कर उनके लिए पानी मंगा दिया."

प्रशांत बाबू ने बात को आगे बढ़ाया, "मजाक अपनी जगह है प्रिया, पर कानूनी रूप से चव्हाण साहब ने आज बेहतरीन काम किया. उन्होंने साबित कर दिया कि क्लोजर 'बोनाफाइड' नहीं है. अंत में एएसएल ने बता दिया कि वे मंत्रालय जाकर अपनी रिपोर्ट आज ही तैयार कर रहे हैं."

"और वो लाल पोटली!" रामजी काका ने आँखों को बड़ा करते हुए कहा. "प्रिया बिटिया, तुमने देखा नहीं... जैसे ही बहस खत्म हुई, एएसएल के रीडर ने इस केस की भारी-भरकम फाइल को लाल सूती कपड़े के बस्ते में लपेटा और चपरासी से उसे साहब की गाड़ी में रखने को बोला. जीएम और भट्ट साहब उस लाल बस्ते को ऐसे देख रहे थे जैसे उनके घर की चाबी कोई छीन कर ले जा रहा हो."

रामजी काका की आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी. उन्होंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, "गाड़ी जब मंत्रालय की तरफ रवाना हुई, तो भट्ट साहब का चेहरा देखने लायक था. कल तक जो शेर बने घूम रहे थे, आज भीगी बिल्ली बने अपनी चमचमाती कार में दुबक कर निकल गए."

प्रिया ने चाय का प्याला हाथ में लिया. उसे अहसास हुआ कि भले ही वह आज कोर्ट में मौजूद नहीं थी, लेकिन रामजी काका के इस 'आँखों देखे हाल' ने उसे उस पूरी विधिक लड़ाई का अहसास करा दिया था.

उसने प्रशांत बाबू की तरफ देखा, "तो अब गेंद मंत्रालय के पाले में है?"

प्रशांत बाबू गंभीर हो गए, "हाँ, और मंत्रालय की इमारत में एएसएल के इजलास से बहुत अधिक पेच हैं. वहां फाइलें बोलती नहीं हैं, दबाई जाती हैं. हम 14 मई तक इंतजार करते नहीं रह सकते, हमें कुछ ऐसा करना होगा कि सरकार हर हालत में 11 मई तक ही अपना निर्णय दे दे क्योंकि उसे फैक्ट्री प्रबंधन को पहुँचाकर उसका सबूत भी रखना होगा. 13-14 को शनिवार-रविवार हैं, इन दिनों वीकेंड के नाम पर कुछ भी गड़बड़ की जा सकती है."
... क्रमशः

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

लाल समंदर

देहरी के पार, कड़ी - 38
अंधेरी ईस्ट के चकाला औद्योगिक क्षेत्र की सड़कों पर आज सन्नाटा नहीं था. सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे, लेकिन रोशनी की पहली किरणों के साथ ही सड़कों पर मजदूर और लाल झंडों की हलचल दिखाई देने लगी थी. ईसीआई के मजदूरों पर उद्योग बंदी की तलवार लटकी थी. उनका साथ देने की गरज से चकाला क्षेत्र की लाल झंडे वाली मजदूर यूनियनों ने तय किया था कि इस बार पहली मई को मजदूर दिवस का जलसा ईसीआई फैक्ट्री गेट से ही आरंभ होगा. ईसीआई के गेट पर मजदूरों का जमावड़ा लगने लगा था. प्रिया व उसके तीनों साथी, जो अब तक केवल ऑफिस की फाइलों और विधिक बारीकियों तक सीमित थे—आज इस श्रमिक उत्सव का हिस्सा बनने के लिए समय से पहले ही वहाँ पहुँच गए थे. कुछ देर बाद ही प्रशांत बाबू और रामजी भी पहुँच गए.

ईसीआई फैक्ट्री के मुख्य द्वार से बायीं ओर हट कर जहाँ यूनियन का झंडा साल भर लहराता था. वहाँ का पुराना झंडा उतार दिया गया था. उसके स्थान पर एक नया झंडा चढ़ा दिया गया था, बस उसे लहराना शेष था. सूरज पूरब से झाँकने लगा था. कुछ देर बाद ठीक सवा छह बजे यूनियन के अध्यक्ष ने प्रशांत बाबू को आगे आने को कहा, उन्होंने आगे बढ़ कर झंडा लहरा दिया. तभी पास खड़े रामजी आगे आए और ‘इंटरनेशनल गान’ गाने लगे --- ‘उठ जाग ओ भूखे बंदी अब खींच लाल तलवार, कब तक सहोगे तुम जालिम का अत्याचार ......” रामजी एक पंक्ति गाते थे, उसके बाद सभी उसे दोहराते थे. गान खत्म होते ही यूनियन सेक्रेटरी ने नारे लगाना शुरू किया, मजदूर जवाब देने. ‘इंकलाब-जिन्दाबाद’, ‘दुनिया भर के मजदूरों एक हो’, ‘हमारे हक-ले के रहेंगे. ‘इंटरनेशनल गान’ के दौरान प्रिया के रोंगटे खड़े हो गए. उसने देखा कि जो मजदूर कल तक एएसएल के सामने झुकी कमर के साथ खड़े थे, आज एक नई ऊर्जा से लबरेज थे.

झंडा फहराने के बाद, फैक्ट्री गेट पर ही प्रबंधन के विरुद्ध एक जोरदार प्रदर्शन हुआ. "ट्रक सिस्टम बंद करो", "मैलाफाइड क्लोजर वापस लो" के नारों से पूरा औद्योगिक क्षेत्र गूँज उठा. उसके बाद सारे मजदूरों ने इस क्षेत्र की सड़कों पर प्रभावशाली जलूस निकाला. वे क्षेत्र के हर उद्योग के सामने से गुजरे. हर उद्योग के मजदूर अपने उद्योग पहुँचकर जलूस छोड़कर अपने कार्यक्रम के लिए रुक जाते थे.

जलूस वापस ईसीआई के गेट पर पहुँचा, तब उसमें केवल ईसीआई के ही मजदूर शेष रह गए थे. यहाँ उनकी एक आमसभा होनी थी. उससे पहले मजदूर बैठकर सुस्ताने लगे. सुस्ताते हुए मजदूरों में आपस में चर्चा होने लगी. प्रिया ने सुना कि कल शाम ही सुपरवाइजरों ने कुछ कमजोर कड़ियों को 'स्पेशल पैकेज' और 'कमीशन' का लालच दिया था. मैनेजमेंट का वह 'चारा' अभी भी उनके दिमाग में घूम रहा था.

कुछ देर बाद आमसभा शुरू हो गई. एक अधेड़ श्रमिक ने बोलना शुरू किया. उसने फैक्ट्री में सुपराइजरों और मैनेजरों द्वारा फैलाई जाने वाली भ्रामक बातों का उल्लेख करते हुए कहा, "साथियों, जब मालिक तुम्हें 'सेटलमेंट' का लालच दे, तो समझ लेना कि वह डर गया है. वह तुम्हारी एकता को खरीदना चाहता है क्योंकि उसे पता है कि कानून की मेज पर वह हार चुका है. हमें इस तरह जो चंद रुपयों का लालच दिया जा रहा है वह हमारे स्वाभिमान और आने वाली पीढ़ियों के हक की कीमत है. क्या हम में से कोई बिकने को तैयार है?"

पूरे मैदान से एक स्वर में आवाज़ आई— "नहीं!" प्रिया ने देखा कि ईसीआई के वे मजदूर जो कल तक संशय में थे, अब मुट्ठियां भींचकर खड़े थे. मैनेजमेंट का वह 'समझौते का चारा' आज उस विराट एकता के सामने बौना साबित हो गया था.

आमसभा जल्दी ही खत्म हो गई. प्रशांत बाबू, रामजी काका, प्रिया और उसके तीनों साथियों ने पहले से तय कार्यक्रम के तहत अंधेरी स्टेशन का रुख किया.

अंधेरी स्टेशन से लोकल पकड़कर २८ किलोमीटर का सफर तय कर वे चर्चगेट स्टेशन उतरे. वहाँ से आजाद मैदान पहुँचने में उन्हें दस मिनट लगे. यहाँ अलग ही दृश्य था. यहाँ पूरे मुंबई और महाराष्ट्र से आए लाखों कामगारों का सैलाब था. चारों ओर लाल झंडों का एक ऐसा समंदर था लहरा रहा था जैसे अभी वह दुनिया के सारे सरमाए को निगल लेगा.

प्रिया ने पहली बार महसूस किया कि ईसीआई की लड़ाई कितनी बड़ी जंग का एक छोटा सा हिस्सा है. रामजी काका ने भीड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, "बिटिया, अंधेरी में हमने अपनी जमीन पर हक माँगा, लेकिन यहाँ हम यह बताने आए हैं कि यह पूरी दुनिया हमारे पसीने से चलती है. यहाँ पूंजीपतियों और उनके एजेंटों को यह अहसास कराया जाता है कि मजदूर अकेले नहीं हैं."

प्रिया के तीनों साथी—जो अब तक ईसीआई के बंदीकरण के मुकदमे को केवल एक 'असाइनमेंट' की तरह देख रहे थे—आज दंग थे. उन्होंने देखा कि कैसे एक अनपढ़ मजदूर भी विधिक अधिकारों और वर्ग-चेतना की बात कर रहा है. प्रिया को अहसास हुआ कि कानून की किताबों से बाहर भी एक बड़ी अदालत है—'जनता की अदालत'.

उसने प्रशांत बाबू से कहा, "अब तक मैं केवल विधिक रिपोर्टों की चिंता कर रही थी, लेकिन आज समझ आया कि असली ताकत इन मजदूरों का अपनी एकता पर भरोसा है. अगर हम सचिवालय में फाइल ट्रैक कर रहे हैं, तो हमें इन संघर्षरत मजदूरों की एकता और उनके जमीर की भी रक्षा करनी होगी."

शाम ढलते-ढलते जब वे वापस अंधेरी की ओर लौटने लगे, तब दिन भर की थकान के बावजूद, लेकिन उनमें से हर कोई अपने भीतर एक फौलादी संकल्प लिए हुए था. प्रिया ने मुड़कर पीछे छूटते आजाद मैदान को देखा. उसने आज सीखा था कि 'ट्रक सिस्टम' से आजादी की लड़ाई केवल कोर्ट-रूम में नहीं, बल्कि मजदूरों के एकजुटता से जीती जाएगी.

अंधेरी स्टेशन उतरते समय रात हो चुकी थी. प्रशांत बाबू को तो डिनर के लिए मेवाड़ भोजनालय ही जाना था. रामजी काका ने प्रिया और उनके साथियों को भी डिनर के लिए न्यौत दिया, “प्रिया तुम सब अब इतना थक चुके हो कि यदि सीधे घर चले गए तो कोई भी खाना नहीं बनाएगा. बेहतर है कि तुम भी एमबी पर ही डिनर कर लो. चारों ने एक दूसरे की ओर देखा, फिर आँखों ही आँखों में तय कर लिया कि न्यौता ठुकराना ठीक नहीं.

डिनर के बाद घर लौटते वक्त प्रिया की आँखों में एक नई चमक थी. वह जान चुकी थी कि अब वह केवल एक सहायक नहीं रह गयी है, बल्कि मजदूर वर्ग के संघर्षों का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है.
... क्रमशः

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

दो मोर्चे

देहरी के पार, कड़ी - 37
तीस अप्रैल को जब इजलास में सुनवाई चल रही थी. दूसरी शिफ्ट के मजदूर फैक्ट्री में अपने काम पर पहुँच चुके थे. फैक्ट्री के भीतर एक अलग ही 'ऑपरेशन' शुरू हो चुका था. प्रबंधन ने अब अपनी रणनीति बदल दी थी. वह अपने चहेते सुपरवाइजर और मैनेजरों को अब मजदूरों को धमकाने के बजाय 'हमदर्द' बनकर उनके पास पहुँचने के लिए ट्रेंड कर रहा था.

दूसरी शिफ्ट शुरू होते ही कैंटीन और वर्कशॉप में काम के दौरान कुछ सुपरवाइजरों ने जुमले फेंकने शुरू किए. "अरे भाई, ये चव्हाण साहब और यूनियन के नेता तो अपनी राजनीति कर रहे हैं. आखिर में भुगतना तो हमें और तुम्हें ही है. सुना है एएसएल साहब को अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को देनी है. लेकिन वहाँ तो पहले ही फैसला हो चुका है. मंत्री जी ने तो मौखिक परमिशन दे ही दी है, बस ये 15 मई की तारीख का इंतज़ार है."

मैनेजमेंट ने अब उन 'कमजोर कड़ियों' को निशाना बनाना शुरू किया जो कर्ज में डूबे थे या घर की मजबूरियों से परेशान थे. प्रोडक्शन फ्लोर के एक कोने में, मैनेजर खन्ना ने तीन मजदूरों को किनारे ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा. "देखो, तुम लोग पुराने और वफादार हो. मैं नहीं चाहता कि क्लोजर के बाद तुम सड़कों पर भटको. अगर तुम अपने साथ 10-15 मजदूरों की टोली तैयार कर लो, जो शांति से अपना हिसाब (Settlement) लेकर हटने को तैयार हों, तो मैं एमडी साहब से बात करके तुम्हें 'स्पेशल पैकेज' दिलाऊँगा. और हाँ, हर तैयार मजदूर के पीछे तुम्हें अलग से 'इनाम' भी मिलेगा."

मजदूरों के चेहरों पर दुविधा थी. एक तरफ सालों का साथ था, तो दूसरी तरफ सामने खड़ा अनिश्चित भविष्य और हाथ में आने वाला पैसा. दीमक ने जड़ों पर वार करना शुरू कर दिया था.
...
एएसएल के यहाँ कार्यवाही समाप्त होने के बाद प्रिया ने राहत की एक लंबी सांस ली. उसे लगा कि आज का दिन जीत का दिन है. उसने उत्साह से चव्हाण साहब की ओर देखकर मुस्कुराना चाहा, लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. वे अपनी फाइलों को सहेजने में इतने मग्न थे जैसे उनके दिमाग में कोई और ही गणित चल रहा हो. प्रिया की नज़र प्रशांत बाबू पर पड़ी, उनके चेहरे पर भी उत्साह के स्थान पर चिंता की गहरी लकीरें दिखाई दीं. वह परेशान हो उठी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि इतनी शानदार जिरह और पुख्ता सबूतों के बाद भी ये लोग इतने गंभीर क्यों हैं?

शाम के छह बजने को थे. इजलास खाली हो चुका था, लेकिन प्रिया का अपने घर जाने का बिल्कुल मन नहीं हुआ. मन में उठते सवालों का जवाब चाहिए था. वह बाहर आई तो उसे रामजी काका दिखाई दिए. रामजी काका—जो इस पूरी विधिक यात्रा में बेनागा कार्यवाही में हाजिर होते थे और मजदूरों के सुख-दुख के साक्षी थे. वह उनकी ओर बढ़ गई.

“सुनवाई का क्या रहेगा काका? आप अपने अनुभव से बताएँ.” प्रिया ने सीधे मुद्दे की बात पूछी.

रामजी काका ने एक ठंडी सांस भरी और अपनी टोपी ठीक करते हुए बोले, “बिटिया, यदि अंतिम फैसला इस एएसएल ने ही देना होता तो मजदूर ही जीतता. हमारे चव्हाण साहब ने उन्हें लाचार कर दिया है. लेकिन कानून का पेच समझो—यह केवल रिपोर्ट देगा, फैसला सेक्रेटरी और मंत्री करेंगे. सचिवालय सत्ता का गलियारा है बिटिया, वहाँ पूंजीपतियों और भूस्वामियों के एजेंट बैठे हैं जो हमेशा ध्यान रखते हैं कि उनके मालिकों को किसी तरह की हानि न हो. यदि होनी भी हो तो ऐसा रास्ता निकाला जाए कि कम से कम हो.”

रामजी की बात सुनकर प्रिया चिंतित हो उठी. उसे लगा कि वह जिस जीत को मुट्ठी में समझ रही थी, वह तो अभी कोसों दूर है. रामजी उसकी चिंता समझ गए. उन्होंने माहौल हल्का करने के लिए पूछा, “बिटिया, अब ऑफिस जाओगी?”

“नहीं काका, वहाँ से तो आज छुट्टी ली है. सोच रही हूँ घर चली जाऊँ.” प्रिया ने बुझे मन से कहा.

“वहाँ अकेले क्या करोगे? तुम ‘एमबी’ (मेवाड़ भोजनालय) चलो. गर्मी बहुत हो रही है. वहाँ बेहतरीन राजस्थानी ठंडाई पीएंगे. गर्मी से कुछ आराम मिलेगा.” रामजी काका ने स्नेह से कहा.

“आप ठंडाई के बहाने ले जाएंगे और डिनर के पहले आने नहीं देंगे.” प्रिया ने उलाहना दिया, पर उसके स्वर में एक अपनापन था.

“अब अपनी बेटी के लिए इतना तो करने का हक है काका को.” रामजी के इस तर्क के आगे प्रिया क्या कहती, उसे उनके साथ एमबी आना पड़ा.

मेवाड़ भोजनालय पहुँचते ही वहाँ के कर्मचारी खिल उठे. प्रिया इस जगह की पुरानी और चहेती ग्राहक थी. सब आते-जाते उसे नमस्ते करके कहने लगे, “दीदी अब के बहुत दिन में आई.” प्रिया भी अपनी चिंता भूलकर सबके हाल-चाल जानने में लग गई. कुछ देर में रामजी दो गिलास गाढ़ी और ठंडी ठंडाई बनवा कर ले आए. प्रिया को पता था कि साढ़े सात तक प्रशांत बाबू भी यहीं पहुँचते होंगे, वह उनसे बात करने के लिए रुकी रही.

प्रशांत बाबू आए, उनकी चाय आई तो प्रिया भी उनके साथ जा बैठी. इजलास की उस गर्माहट के बाद एमबी की शाम कुछ शांत थी.

“एएसएल के यहाँ हमारा परफॉर्मेंस बहुत अच्छा था. हमने प्रबंधक के आवेदन को हर काउंट पर ध्वस्त किया है. इसलिए उन्हें फैक्ट्री बन्द करने की परमिशन तो नहीं मिलेगी.” प्रिया ने चर्चा शुरू की.

प्रशांत बाबू ने चाय का घूँट लिया और धीमी आवाज़ में बोले, “परमिशन तो बिल्कुल नहीं मिलेगी, प्रिया. दो मई को बहस के बाद एक-दो दिन में एएसएल अपनी रिपोर्ट सचिवालय भेज देगा. बस वहीं असली चक्रव्यूह शुरू होगा. हमें अंदेशा है कि सचिवालय में जानबूझकर देरी करके मामले को डीम्ड परमिशन में बदलने का दुश्चक्र चलेगा. प्रबंधन का पूरा जोर अब इस बात पर होगा कि 14 मई की रात तक सरकार का आदेश प्रबंधन को न मिल पाए.”

प्रिया सन्न रह गई. "डीम्ड परमिशन? यानी अगर फैसला नहीं आया तो वे इसे अपनी जीत मान लेंगे?"

"हाँ प्रिया, और इसीलिए अब प्रबंधन अपनी रणनीति बदल रहा है. वे केवल मंत्रालय में फाइल नहीं रोकेंगे, बल्कि फैक्ट्री के भीतर कर्मचारियों के बीच भी दरार पैदा करने का पूरा प्रयत्न करेंगे." प्रशांत बाबू ने अपनी चिंता स्पष्ट की.

प्रिया ने एमबी की खिड़की से बाहर अंधेरे को देखते हुए पूछा, "तो अब हमारे पास रास्ता क्या है?"

प्रशांत बाबू ने गंभीर स्वर में कहा, "कानून के मैदान में हम तथ्यों से लड़ रहे थे, लेकिन अब मैनेजमेंट मजदूरों के 'जमीर' से लड़ रहा है. हमें दोनों मोर्चों पर लड़ना होगा—सचिवालय में फाइल की पल-पल की जानकारी रखनी होगी और फैक्ट्री के भीतर फैलने वाली इस दीमक को रोकना होगा. अगर मजदूर लालच में आकर टूट गए, तो एएसएल की यह जीत केवल कागजी रह जाएगी."

प्रिया ने देखा कि रामजी काका दूर खड़े होकर उन दोनों को देख रहे थे. उनकी आँखों में वही पुराना डर था जो सत्ता के गलियारों के नाम से आता है.

'चक्रव्यूह' अब इजलास से निकलकर मजदूरों के दिल और दिमाग तक पहुँच चुका था.
... क्रमशः

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

सर्जिकल स्ट्राइक

देहरी के पार, कड़ी - 36
ईसीआई फैक्ट्री के मजदूरों ने तय किया था कि मंगलवार, 30 अप्रैल, 2019 को दूसरी शिफ्ट वाले साढ़े दस बजे तक एएसएल ऑफिस पहुँच जाएंगे और शिफ्ट समय से आधे घंटे पहले वहाँ से रवाना होकर सीधे फैक्ट्री पहुँचेंगे और पहली शिफ्ट वाले फैक्ट्री से छूट कर सीधे एएसएल ऑफिस पहुँचेंगे. कुछ मजदूरों ने आज फैक्ट्री से अवकाश ले लिया था. वे एएसएल के यहाँ होने वाली आज की पूरी कार्यवाही देखना चाहते थे. सुबह ग्यारह बजे एएसएल (ASL) के इजलास में तिल रखने की जगह नहीं थी. प्रिया ने भी आज अपने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी.

कार्यवाही शुरू होते ही प्रबंधन के वकील मनोज भट्ट ने एक प्रार्थना पत्र पेश किया. "हुज़ूर, यूनियन ने अपनी साक्ष्य में कल ही दो गवाहों के शपथ-पत्र पेश किए हैं उनके साथ कुछ दस्तावेज भी पेश किए हैं. हमें ये कल शाम साढ़े चार बजे मिले. उनके तकनीकी पहलुओं को समझने के लिए हमें समय चाहिए. जो दस्तावेज इंटरनेट से डाउनलोड करके पेश किए गए हैं, उनकी साक्ष्य में ग्राह्यता का भी प्रश्न है. इस कारण हम चाहते हैं कि कृपया सुनवाई अगले शुक्रवार तक स्थगित (Adjourn) कर दी जाए."

वकील रमेश चव्हाण, जो आज अपनी कोर्ट यूनिफॉर्म में बहुत प्रभावशाली लग रहे थे, तुरंत अपनी जगह से उठे. "सर, यह 'तकनीकी पहलू' केवल बहाना हैं. वे हमारे लिए अचंभा हो सकते थे लेकिन प्रबंधन के लिए इन्हें परखना और जाँचना मिनटों का काम है. यह शुद्ध रूप से डिले टेक्टिक्स (Delay Tactics) है. प्रबंधन का एकमात्र लक्ष्य 60 दिन की समय-सीमा को पार करना है ताकि 'डीम्ड परमिशन' का लाभ ले सकें. आज यूनियन के गवाह मौजूद हैं, इन्हें हर हालत में उनसे जिरह करनी चाहिए."

एएसएल ने घड़ी देखी और भट्ट की ओर सख्त नज़रों से देखा. "मिस्टर भट्ट, मैंने पहले ही कहा था कि यह टाइम-बाउंड मामला है. मैं सुनवाई नहीं टालूँगा. मैं जिरह के लिए दोपहर ढाई बजे तक का समय देता हूँ. यदि उस समय तक आप तैयार नहीं हुए, तो मैं जिरह का अवसर समाप्त मानकर कार्यवाही पूरी करूँगा."

दोपहर ढाई बजे तक के लिए कार्यवाही स्थगित होने की सूचना श्रमिकों को दे दी गई. जिससे दूसरी शिफ्ट वाले श्रमिक अपने काम पर चले जाएँ. कुछ ही देर में वहाँ मजदूरों की संख्या दस-बारह मात्र रह गई. लेकिन पहली शिफ्ट वाले लगभग सभी मजदूर ढाई बजे तक एएसएल के ऑफिस पहुँच गये थे और उनकी संख्या सुबह से अधिक थी.

ठीक ढाई बजे एएसएल इजलास में आ बैठे. पाँच मिनट बाद ही जिरह शुरू हो गई. प्रशांत बाबू कठघरे में थे. वकील भट्ट ने उन्हें उलझाने की कोशिश की. "क्या यह सच नहीं है कि मार्केट में मंदी के कारण आपके द्वारा बनाई गई आई.सी. (IC) का कोई खरीदार नहीं है और स्टॉक डंप पड़ा है?"

प्रशांत बाबू ने शांति से उत्तर दिया. "जी नहीं, यह कहना गलत है. सच तो यह है कि ईएसआई फैक्ट्री डिफेंस आर्म्स इंडस्ट्री के लिए 'क्रिटिकल कंपोनेंट्स' बनाती है. इन आई.सी. की मांग कभी कम नहीं होती क्योंकि यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है."

वकील भट्ट हक्के-बक्के रह गए. "यह आप कैसे कह सकते हैं? आपके पास क्या सबूत है?"

चव्हाण साहब ने तुरंत प्रिया द्वारा तैयार किया गया वह 'कलर प्रिंटआउट' एएसएल की मेज पर रखा. "यह देखिए, सर, कंपनी का अपना प्रोफाइल और उनके पिछले सप्लाई ऑर्डर्स का डेटा. यह फैक्ट्री केवल निजी मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए ज़रूरी कल-पुर्जे बनाती है. इसका बंद होना 'जनहित' (Public Interest) के विरुद्ध है."

इजलास में सन्नाटा पसर गया. हर कोई समझ रहा था कि डिफेंस सप्लाई वाला तर्क एकदम सर्जिकल स्ट्राइक जैसा था. एएसएल ने उस दस्तावेज को बड़ी गंभीरता से पढ़ा. डिफेंस सप्लाई वाला यह तथ्य प्रबंधन के 'घाटे' और 'मंदी' वाले हर तर्क को काट चुका था.

प्रशांत बाबू के बाद यूनियन के सचिव शिंदे कठघरे में आए. उन्होंने अपने शपथ पत्र में बताया था कि बारह वर्ष पहले यूनियन के महंगाई के अनुसार वेतन बढ़ाने की मांग करने पर ‘ट्रक सिस्टम’ आरंभ हुआ था और कैसे वह समय के साथ अमानवीय होता गया था. उन्होंने समाप्त करने और फेयर वेजेज की मांग करने वाला मांग पत्र, हड़ताल का नोटिस, प्रबंधन द्वारा वार्ता से इन्कार करने संबंधी दस्तावेजों को प्रदर्शित किया और प्रबंधन के अड़ियल रवैये संबंधी तथ्य सामने रखे. प्रबंधन वकील भट्ट ने उनसे लंबी जिरह की जो शाम साढ़े पाँच बजे तक चलती रही. शिंदे से हुई जिरह के अंत में एएसएल ने अपनी फाइल पर दोनों पक्षों की साक्ष्य पूर्ण होने की नोटिंग की और आदेश सुनाया कि दोनों पक्ष इस मामले के कानूनी पक्ष पर जो कुछ कहना चाहते हैं उसका लिखित प्रतिवेदन दो मई दोपहर एक बजे तक प्रस्तुत कर दें. उसके उपरान्त यह एक सदस्यीय कमीशन अपनी जांच रिपोर्ट (Inquiry Report) और अनुशंसा तैयार करके सरकार के अंतिम निर्णय के लिए मंत्रालय को भेज देगा."

इस पर मजदूरों की ओर से वकील चव्हाण ने आपत्ति की, “नहीं सर, यह प्रक्रिया ठीक नहीं है. उद्योग बंद करने की अनुमति का आवेदन प्रबंधन का है. वह अपने लिखित प्रतिवेदन की प्रतिलिपि कल शाम 5 बजे तक मेरे कार्यालय पहुँचा दे. जिससे उनके तर्कों और कानूनी पक्ष पर मजदूर पक्ष भी अपनी राय दे सके. हम अगले दिन दो मई को दोपहर एक बजे तक अपने तर्क आपके कार्यालय में प्रस्तुत कर दें.”

एएसएल ने प्रबंधन वकील की ओर देखा, “मिस्टर भट्ट, आपकी क्या राय है?”

“सर, चव्हाण साहब की बात सही है, हमारे लिखित प्रतिवेदन के बाद उन्हें जवाबी लिखित प्रतिवेदन देना चाहिए. लेकिन जवाबी लिखित प्रतिवेदन के नए तथ्यों पर हमें पुनः जवाब का अवसर मिलना चाहिए. और सर, कल शाम तक अपना लिखित प्रतिवेदन तैयार करने के लिए बहुत कम समय है. हम यह दो मई को सुबह प्रस्तुत कर सकते हैं. वैसे भी कल महाराष्ट्र दिवस और मजदूर दिवस दोनों हैं. तो दोनों ही पक्ष कल सुबह व्यस्त रहेंगे.”

एएसएल समझ गए कि प्रबंधन देरी करने की जुगत में है. उन्होंने रीडर को डायरी देखकर बताने को कहा कि दो मई को कोई विशेष अपॉइंटमेंट तो नहीं है? रीडर ने बताया कि दो मई को शाम चार बजे मंत्रालय में मीटिंग है.

“ठीक है, दोनों पक्ष दो मई को सुबह 11 बजे उपस्थित हों. मैं दोनों के तर्क सुनूंगा. और मिस्टर भट्ट, आपको चव्हाण साहब की बहस का जवाब देने का उसी वक्त मौका दिया जाएगा. और यदि आप दोनों को लिखित में कुछ देना हो तो बहस के पहले उसे प्रस्तुत कर सकते हैं. दो मई को शाम तीन बजे के पहले हर हालत में कार्यवाही समाप्त कर दी जाएगी.

इजलास से बाहर निकलते वक्त मजदूरों ने 'इंकलाब' के नारे नहीं लगाए, बल्कि एक-दूसरे का हाथ मजबूती से थामा. प्रिया चव्हाण साहब की ओर देखकर मुस्कुराई, लेकिन प्रशांत बाबू का दिमाग अभी भी सचिवालय की ओर अटका हुआ था. वे जानते थे कि दो मई की शाम एएसएल की मेज से फाइल हटने के बाद 'मंत्रालय वाला असली चक्रव्यूह' शुरू होगा.
... क्रमशः

रविवार, 26 अप्रैल 2026

कसौटी

देहरी के पार, कड़ी - 35
शनिवार 27 अप्रैल 2019 की रात 11 बजे सीनियर एडवोकेट चव्हाण का दफ्तर एक ऑपरेशन थिएटर बना हुआ था. ईसीआई फैक्ट्री के क्लोजर की परमिशन के केस की फाइल उनकी चार गुणा आठ फुट की टेबल पर खुली पड़ी थी. चव्हाण साहब के अतिरिक्त उनका एक सहायक, प्रशांत बाबू, प्रिया, ईसीआई यूनियन का सचिव और रामजी काका मौजूद थे. रामजी काका अभी-अभी सबके लिए कॉफी बनाकर लाए थे. प्रबंधन के आवेदन और साक्ष्य का 'पोस्टमार्टम' जारी था. मेज पर औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के बेयर एक्ट की किताब खुली रखी थी. धारा 25-ओ (2) वाले पन्ने पर क्लिपर लगा हुआ था. प्रबंधन के आवेदन में फैक्ट्री के क्लोजर के कारणों को पर्याप्त और संतोषप्रद 'Adequate and Sufficient' होने की पहली कसौटी पर जाँचा जा रहा था. सभी के चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में आत्मविश्वास चमकता था.

चव्हाण साहब ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और प्रिया की ओर देखा. "प्रिया, प्रबंधन ने 'वर्किंग कैपिटल' की कमी को मुख्य कारण बताया है. क्या हमारी ऑडिट रिपोर्ट इसे ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त है?"

प्रिया ने फाइल आगे बढ़ाई. "सर, उनकी बैलेंस शीट में 'देनदारियाँ' (Liabilities) कृत्रिम रूप से गुब्बारे की तरह फुलाकर पेश की गई हैं. सिंगापुर वाला ट्रांजैक्शन साबित करता है कि फंड्स की 'कमी' कृत्रिम है. वरना उद्योग संचालन के लिए उनके पास संसाधन पर्याप्त 'Adequate' हैं, बस उन्हें कहीं और दफ्न कर दिया गया है. उद्योग घाटे में नहीं बल्कि मुनाफे में है और मुनाफा भी कम नहीं है."

अगली कसौटी थी 'Good Faith' (नेक नियत). क्या उद्योग बंद करने की अनुमति का आवेदन नेक नियत से पेश किया गया है. "यहाँ हम मार करेंगे," प्रशांत बाबू ने मेज थपथपाई. "हड़ताल के पहले जिस तरह से उन्होंने मजदूरों को 'ट्रक सिस्टम' में फँसाए रखा और अब 'डीम्ड परमिशन' की ताक में बैठे हैं, यह 'Good Faith' कतई नहीं है. यह पूरी तरह से 'Mala fide' (दुर्भावनापूर्ण) है." यूनियन सचिव ने जोड़ा, "और सर, जीएम का जिरह में झूठ बोलना और 80% प्रोसेस लॉस का तकनीकी रूप से असंभव तर्क देना भी उनकी बदनीयती को साफ़ करता है."

तीसरी कसौटी थी अत्यंत अनुचित या अन्यायपूर्ण 'Grossly Unfair or Unjust'. इस पर प्रिया ने संवेदनशीलता के साथ पक्ष रखा. "सर, प्रबंधन का यूनियन की ट्रक सिस्टम को समाप्त कर फेयर वेजेज की मांग पर बिलकुल तवज्जोह नहीं देना और उन्हें हड़ताल पर जाने को विवश करना. हड़ताल पर जाने के कुछ ही दिन बाद इस कारखाने को बंद करने की अनुमति प्राप्त करने के इस आवेदन को पेश करना पूरी तरह अनुचित और अन्यायपूर्ण है. जबकि एम्पलॉइज को फेयर वेजेज देकर भी मुनाफे में चलाया जा सकता है."

“अब हमें देखना है कि एक इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने वाले कारखाने का बंद होना किस तरह सामान्य जनता के हितों 'Interest of the General Public' के विपरीत हो सकता है.” चव्हाण साहब ने प्रश्न सबके सामने रख दिया.

“सर, हमारा कारखाना डिफेंस आर्म इंडस्ट्रीज के लिए ऑर्डर पर इंटीग्रेटेड सर्किट बनाता है, उस काम में हमारी फैक्ट्री को महारत हासिल है. हमारी कंपनी का टेंडर कभी कैंसल नहीं हुआ. कई विदेशी फर्में आयीं, पर हमारे उद्योग का मुकाबला नहीं कर सकीं.” यूनियन सचिव हिमांशु शिंदे ने कहा.

उसकी बात सुनकर सबके-सब पूरी मीटिंग में अब तक बिल्कुल चुपचाप रहे शिंदे की ओर देखने लगे. कुछ पल के लिए ऑफिस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया.

फिर सबसे पहले चव्हाण साहब बोले, “मग बाबा, तुम्ही आतापर्यंत गप्प का राहिलात, मला आधी का नाही सांगितलंत?” ("तो अब तक चुप क्यों रहा मेरे बाप, पहले क्यों नहीं बताया.") उन्हें मराठी में बोलते देख रामजी काका को हँसी आ गई. वे बोल पड़े, “तुम्ही अगदी बरोबर म्हणालात चव्हाण साहेब.” (“तुमने खूब कहा चव्हाण साहब.”)

इस बार चव्हाण साहब सहित सभी हँस पड़े. फिर चव्हाण साहब कहने लगे, “वाकई यह अत्यन्त गंभीर बात है, इसे तो मुकदमे के शुरुआत में बतानी चाहिए थी. यदि पता होता तो उनके गवाह से पूछते कि ‘क्या आप डिफेंस आर्म इंडस्ट्री के ऑर्डर्स पर आई.सी. बनाते हैं?’ उनके जवाब से यह तथ्य आसानी से स्थापित हो जाता. अब हमें खुद इस तथ्य को स्थापित करना पड़ेगा. उसके लिए कुछ दस्तावेज तलाशने पड़ेंगे. मौखिक बयान की अहमियत कम होती है.”

तभी प्रिया बोल पड़ी. “डिफेंस इंडस्ट्री को आई.सी. सप्लाई करना व्यवसाय में महत्वपूर्ण तथ्य है यह जरूर कंपनी के प्रोफाइल में दर्ज होगा. मैं अभी ढूंढ निकालती हूँ. पर मुझे आपके कंप्यूटर का हैंडल चाहिए.” तभी चव्हाण साहब का सहायक विनय बोल पड़ा, “इधर कंप्यूटर पर आ जाओ दीदी, कंप्यूटर चालू है और लॉग-इन भी कर रखा है.”

प्रिया उठकर दफ्तर के कोने में रखे डेस्कटॉप पर जाकर बैठी, उसने कंपनी की प्रोफाइल तलाश की जहाँ सब कुछ मिल गया. पास ही रखे कलर प्रिंटर से उसने तुरंत प्रोफाइल का प्रिंट निकाला और उसे किसी झंडे की तरह लहराते हुए वापस टेबल की ओर आई. “ये देखिए चव्हाण सर!”

“वाह, क्या कमाल का काम किया है प्रिया तुमने. पर इस का श्रेय हमें कॉमरेड शिंदे को देना पड़ेगा कि उन्हें देर से ही सही पर ठीक वक्त पर यह सब याद आ गया. अब हम साबित कर सकते हैं कि इंडस्ट्री के क्लोजर से डिफेंस इंडस्ट्री को भी फर्क पड़ेगा और फौज के लिए जरूरी हथियारों के निर्माण में देरी हो सकती है. यह हमारा सबसे मजबूत पक्ष होगा. 350 परिवारों का सड़क पर आना केवल उन मजदूरों की हार नहीं है, बल्कि यह उस पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था, सामाजिक ढांचे और देश की सुरक्षा के लिए भी घातक है. यह 'Prejudicial to the public interest' है."

सबके बीच लंबी बहस के बाद तय हुआ कि यूनियन की साक्ष्य केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि 'टेक्निकल और डेटा-ड्रिवन' होगी. तय हुआ कि यूनियन की ओर से प्रशांत बाबू एक 'एक्सपर्ट विटनेस' (Expert Witness) के रूप में अपना विश्लेषण पेश करेंगे. दूसरे गवाह सचिव शिंदे होंगे. ये दोनों केवल अपनी बातें नहीं कहेंगे, बल्कि उन दस्तावेजों को साक्ष्य में लाएंगे जो साबित करेंगे कि प्रबंधन ने रिकॉर्ड्स के साथ छेड़छाड़ की है.

चव्हाण साहब ने फाइल बंद करते हुए कहा, "प्रबंधन ने अपना जाल बिछाया था, लेकिन अब हम उनके ही दस्तावेजों को उनके खिलाफ हथियार बनाएंगे. 30 अप्रैल को इजलास में हमारे गवाह 'सर्जिकल स्ट्राइक' के मोर्चे पर होंगे."
... क्रमशः

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सत्य दस्तावेज

देहरी के पार, कड़ी - 34
फोन की घंटी की आवाज से प्रिया की नींद खुली, वह उठ बैठी. देसाई साहब का फोन था. बोल रहे थे आज राइट 11 बजे ऑफिस पहुँचना है. उसकी टीम के बनाए सॉफ्टवेयर सोल्यूशन में कोई गड़बड़ी आई थी और क्लाइंट तुरंत समाधान चाहता था. क्लाइंट सही था. उसके अनेक काम रुके पड़े होंगे तो जल्दी तो करेगा. अब वह एएसएल के ऑफिस में होने वाली सुनवाई में नहीं जा सकती थी. उसने घड़ी देखी, सुबह के साढ़े नौ बजे थे. वह पाँच घंटे सो चुकी थी. फौरन तैयार होकर वह ठीक सवा दस बजे चव्हाण साहब के ऑफिस में थी. उन्हें बताया कि वह सुनवाई में साथ नहीं रह सकेगी. उसने और उसके साथियों ने रात इंटरनेट पर खोजकर जिन जरूरी दस्तावेजों के प्रिंट निकाले थे वे उन्हें सौंपे और उनकी अहमियत बतायी. वह ऑफिस में अपनी सीट पर पहुँची तो ठीक 11 बजे थे.

एएसएल (ASL) के इजलास में आज सबसे महत्वपूर्ण सुनवाई थी, प्रबंधन के लिए साक्ष्य (Evidence) पेश करने का आखिरी मौका था. फिर भी मजदूरों की उपस्थिति बहुत कम थी. फैक्ट्री चालू हो जाने से ज्यादातर मजदूर ड्यूटी पर थे. चव्हाण साहब और यूनियन चाहती थी कि आज जिरह हो और अगली पेशी यूनियन की साक्ष्य के लिए नियत हो जाए. जिससे उन्हें डिफेंस करने का पर्याप्त अवसर मिले और एएसएल समय पर अपना निर्णय प्रबंधन को कम्युनिकेट कर सके.

सवा ग्यारह बज चुके थे. यूनियन की ओर से वकील चव्हाण प्रशांत बाबू और यूनियन के अध्यक्ष-सचिव ग्यारह बजे के पहले से मौजूद थे. लेकिन नियोजक पक्ष लापता था. प्रशांत बाबू ने रीडर को कहा कि ‘आज नियोजक की साक्ष्य का अंतिम अवसर है और वह अभी तक नहीं पहुँचा है, यह डिले टेक्टिक्स है.’

तभी प्रबंधन के वकील मनोज भट्ट ने अपने सहायकों सहित इजलास में प्रवेश किया. उन्होंने रीडर को बताया कि फैक्ट्री कई दिन बाद शुरू हुई है. काम शुरू होने में समस्या आने से जीएम साहब को देरी हो गई है. लेकिन वे बारह बजे के पहले हर हालत में पहुँच जाएंगे. रीडर ने एएसएल के चैम्बर में जाकर उन्हें सूचना दी. कुछ देर बाद वे इजलास में थे.

एएसएल ने आते ही पूछा जीएम साहब को देरी हो रही है तो आप अपने दूसरे गवाह को जिरह के लिए प्रस्तुत करें, आपके दूसरे गवाह कहाँ हैं?

“हूजूर, हमारे सभी दस्तावेज जीएम साहब प्रूव करेंगे. इस कारण और समय बचाने के लिए हमने तय किया कि हम जीएम साहब के अलावा कोई और गवाह प्रस्तुत नहीं करेंगे. और जीएम साहब 12 बजे तक अवश्य आ जाएंगे.” वकील मनोज भट्ट ने कहा.

“अब अदालत साढ़े बारह बजे बैठेगी, उस वक्त आपके गवाह हाजिर रहें, वरना आपकी साक्ष्य बंद कर दी जाएगी. आज दोपहर डेढ़ बजे मध्यान्ह अवकाश नहीं होगा और अदालत जब तक जिरह होगी बैठेगी.” इतना कहकर एएसएल साहब फिर से अपने चैम्बर में चले गए.

अब सुनवाई में समय था. चव्हाण साहब, प्रशांत बाबू और उनके साथी मध्यान्ह की चाय के लिए कैंटीन आ गए.

ठीक साढ़े बारह बजे एएसएल साहब ने इजलास में कदम रखा. अपनी सीट पर बैठते ही. आदेश दिया: मिस्टर भट्ट, आपके गवाह को कठघरे में भेजें, जिरह शुरू की जाए. जीएम साहब उठे और चुपचाप कठघरे में जा खड़े हुए. इजलास में एसी चल रहे थे, फिर भी जीएम के माथे पर पसीने की बूंदें उनकी घबराहट बयाँ कर रही थीं.

वकील मनोज भट्ट ने कार्यवाही शुरू करते हुए कहा, "हुज़ूर, जीएम साहब ने अपने शपथ-पत्र में स्पष्ट कर दिया है कि कंपनी के पास कच्चा माल खरीदने के लिए भी वर्किंग कैपिटल नहीं है. बैंकों ने हाथ खींच लिए हैं. क्लोजर ही एकमात्र रास्ता है."

वकील रमेश चव्हाण मुस्कुराए और धीरे से अपनी जगह से उठे और जिरह के लिए कठघरे के नजदीक जा खड़े हुए. "हुज़ूर! प्रबंधन कह रहा है कि वे कंगाल हैं. लेकिन मेरे पास ईसीआई के पिछले तीन महीनों के डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट की रिपोर्ट है." चव्हाण साहब की आवाज़ में गूँज थी.

उन्होंने जीएम की ओर रुख किया, "मिस्टर जीएम, आप पहले शपथ ले लें, कि आप यहाँ अदालत के सामने जो भी कहेंगे सच कहेंगे, सच के सिवा कुछ नहीं कहेंगे.”

जीएम ने शपथ ली, फिर उनकी जिरह आरंभ हुई. जीएम के शपथ पत्रों में दिए गए तथ्यों के बारे में सवाल पूछने के बाद चव्हाण साहब ने प्रिया और उसके साथियों द्वारा रात भर जागकर निकाली गई डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट की रिपोर्ट अपनी मेज से उठाई. उसकी एक प्रति अदालत के सामने रखी, दूसरी वकील भट्ट को दी. तीसरी प्रति गवाह को दिखा कर सवाल पूछने लगे.

“देखिए यह आपकी कंपनी द्वारा किए गए भुगतान का सही-सही रिकार्ड है. इस रिकॉर्ड को देखिए. क्या आप यहाँ शपथ पर यह कह सकते हैं कि पिछले महीने आपकी कंपनी ने सिंगापुर की 'ईस्टर्न कंसल्टेंसी' को 2 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया? और क्या यह सच नहीं है कि उस कंसल्टेंसी कंपनी का डायरेक्टर आपकी कंपनी के एमडी का ही सगा साला है?"

अदालत में सन्नाटा छा गया. जीएम के हाथ कांपने लगे. उन्होंने पानी की बोतल की ओर देखा, पर वह खाली थी.

प्रबंधन का वकील भट्ट आगे आया और उसने स्थिति संभालने की कोशिश की, "हुज़ूर, यह कंपनी के एमडी के विरुद्ध व्यक्तिगत आरोप हैं. उनके पीछे से ऐसे आरोप पर सवाल नहीं पूछा जा सकता. हम इस सवाल का जवाब देने के लिए एमडी साहब को अगली पेशी पर पेश कर सकते हैं. इसलिए इनसे यह सवाल पूछने के बजाय दूसरे सवाल पूछ लिए जाएँ.

चव्हाण साहब तुरंत गरजे, "नहीं सर! यह नहीं हो सकता. आज प्रबंधन की गवाही के लिए अंतिम अवसर है. जो गवाह आज उपस्थित है उससे जिरह के बाद प्रबंधन की साक्ष्य बन्द होगी. यह कोई आम मुकदमा नहीं बल्कि एक उद्योग को बंद करने की परमिशन देने और न देने का मामला है, एक दम टाइम बाउंड. 60 दिनों में सरकार को अपना निर्णय देना ही नहीं, प्रबंधन को कम्युनिकेट भी करना है. प्रबंधन तो यही चाहता है कि ये दिन निकल जाएँ और वे (Deemed Permission) मानकर उद्योग को ताला लगा दें. सर, हम आज ही अपनी जिरह खत्म कर देंगे. हम न्याय की मांग करते हैं, तारीख की नहीं!"

एएसएल ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा. उनकी नज़रें सीधे वकील भट्ट से मिलीं. "देखिए, मिस्टर भट्ट, मैनेजमेंट ने इस अदालत का वक्त बर्बाद किया है. 80% प्रोसेस लॉस का तर्क और यह सिंगापुर ट्रांजैक्शन—'मेलाफाइड इंटेंशन' (Mala fide intention) साफ दिखाई देता है. यदि गवाह जवाब नहीं देना चाहता है तो मैं समझूंगा कि पूछा गया तथ्य सही है.”

“नहीं हुजूर, जिरह जारी रखिए.” मनोज भट्ट ने कहा और अपनी सीट पर बैठ गया. आगे की जिरह में जीएम ने दो करोड़ के ट्रांजैक्शन को ही नहीं पूरी ‘डिजिटल ट्रांजैक्शन ऑडिट रिपोर्ट’ को सही स्वीकार कर लिया.

एएसएल ने प्रबंधन साक्ष्य बंद (Close) करके आदेश दिया, "यूनियन अपनी साक्ष्य के शपथ पत्र सोमवार तक हर हालत में पेश करे. अगले मंगलवार 30 अप्रैल 2019 को सुबह 11 बजे यूनियन अपने गवाह हाजिर रखे और प्रबंधन उनसे जिरह के लिए तैयार रहे.

इजलास से बाहर निकलने के बाद आज मजदूरों ने 'इंकलाब-जिन्दाबाद' के नारे नहीं लगाए, बल्कि एक-दूसरे की आँखों में देखा. आज पहली बार उन्हें लगा कि कानून की देवी केवल अंधी नहीं है, वह सच देख भी सकती है.
... क्रमशः

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

साजिश

देहरी के पार, कड़ी - 33
प्रिया ने अपना कोड पूरा करके सिस्टम में छोड़ा. जब तक वह कंपाइल हो, उसके पास कुछ मिनटों की फुरसत थी. उसने अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में जोड़कर सिर के पीछे रखा और पेट व सीने को एक बार पूरी ताकत से आगे की ओर खींचकर छोड़ दिया. इससे उसके शरीर की अकड़न कुछ दूर हुई. उसने अपने वातानुकूलित ऑफिस की खिड़की से बाहर देखा. नीचे मुंबई की सड़क पर ट्रैफिक हमेशा की तरह दौड़ रहा था, लेकिन उसे लगा कि उसके भीतर कुछ अटक रहा है. उसके लैपटॉप की स्क्रीन पर कोड की पंक्तियाँ तैर रही थीं, पर उसका दिमाग उन 350 परिवारों के भविष्य के बीच उलझा था.

पिछले कुछ महीनों में वह गहरी 'लर्निंग और अनलर्निंग' से गुजरी थी. एक आईटी इंजीनियर होने के दौरान उसकी मध्यवर्गीय कंडीशनिंग ने उसे सिखाया था कि सफलता का मतलब व्यक्तिगत सुरक्षा और ऊँचा पैकेज है. लेकिन विक्रांत की उत्पन्न की गई परेशानियों से निपटने के दौरान रामजी काका, प्रशांत बाबू और IIDEA के उनके साथियों की अनकंडीशनल मदद ने उसे बहुत कुछ सिखाया था. उसके बाद ईसीआई के मजदूरों के संघर्ष में बिताए वक्त ने उसकी कंडीशनिंग के खोल को तोड़ दिया था. वह समझ गई थी कि चाहे वह हाई-टेक सॉफ्टवेयर लिख रही हो या कोई मजदूर क्लीन-रूम में सर्किट बोर्ड जोड़ रहा हो या फिर किसी रेडीमेड क्लॉथ इंडस्ट्री में कपड़े सिल रहा हो—पूँजी की नज़र में वे सभी एक जैसे हैं. इन सबको मौजूदा खिचड़ी व्यवस्था 'डिस्पोजेबल' समझती है.

शाम साढ़े सात बजे अपने ऑफिस से छूटकर वह खुद को IIDEA के जाने से नहीं रोक सकी. वहाँ का माहौल किसी युद्ध-स्तर की तैयारी जैसा था. हड़ताल खत्म हो चुकी थी, लेकिन जीत का उत्साह पूरी तरह नदारद था. प्रशांत बाबू एक फाइल पर उंगलियाँ फेरते हुए गंभीर सोच में डूबे थे. वह चुपचाप प्रशांत बाबू के निकट जाकर खड़ी हो गई. जब उन्हें प्रिया के आने का अहसास हुआ तो उसे पास की कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए बोल पड़े.

"बैठो प्रिया, हड़ताल खत्म हो गयी है, मजदूरों को हड़ताल अवधि का वेतन एडवांस रूप में भी मिल गया है, वे फिर से काम पर हैं. फैक्ट्री को बंद करने की अनुमति के आवेदन की सुनवाई में प्रबंधन पूरी तरह नंगा हो गया है. फिर भी मजदूरों के हाथ में जो वेतन वही ट्रक सिस्टम वाला है जिससे छुटकारा पाने और फेयर वेजेज प्राप्त करने के लिए उन्होंने लड़ाई शुरू की थी.”


“लेकिन उसे तो अब ट्रिबुनल तय करेगा, वह भी तीन महीनों में.” प्रिया ने कहा.

“ट्रिबुनल और लेबर कोर्ट पर मजदूरों को अधिक विश्वास नहीं वे पिछले अनेक वर्षों के अपने अनुभवों से जानते हैं कि अदालतें भी मजदूरों को और प्रबंधन को समान पलड़ों में तौलने लगी हैं, जबकि मजदूर विक्टिम है. सामाजिक न्याय का सिद्धांत पता नहीं कहाँ हवा हो चुका है. उधर क्लोजर वाले मामले में प्रबंधन ने हथियार नहीं डाले हैं, बस मोर्चा बदला है,"

“अब कोई नई सूचना मिली है क्या आपको?” प्रिया ने कुर्सी पर बैठते हुए पूछा.”

"हमें खबर है कि प्रबंधन 'डीम्ड परमिशन' (Deemed Permission) का खेल खेलने की कोशिश में है. कानून कहता है कि यदि क्लोजर का आवेदन पेश होने से 60 दिनों के भीतर एएसएल आवेदन पर अपना निर्णय प्रबंधन को कम्युनिकेट नहीं करते हैं उसे स्वतः स्वीकृत मान लिया जाएगा. एएसएल को अचानक किसी 'इमरजेंसी' सरकारी ट्रेनिंग या मीटिंग में उलझाने की तैयारी है ताकि आदेश में देरी हो और उसका कम्युनिकेशन बाधित हो जाए और समय सीमा पार हो जाए."

"यह तो सरासर जालसाजी होगी!" प्रिया के भीतर की मध्यवर्गीय नैतिकता चीख उठी.

"यही पूँजी का असली चरित्र है प्रिया. वह कम मुनाफे से अधिक मुनाफे की ओर बहती है. जहाँ फैक्ट्री खड़ी है, उस जमीन की रियल एस्टेट वैल्यू बुक वैल्यू से सात गुना ज्यादा है. वे जमीन बेचकर मॉल और ऊँची बहुमंजिला इमारतें खड़ी करना चाहते हैं, मजदूरों के भविष्य की बलि देकर."

प्रिया ने महसूस किया कि अब एक्शन का वक्त है. "हमारे पास कितना समय है?"

"कल 26 अप्रैल है. प्रबंधन का आखिरी अवसर. हमें कल ही उनसे जिरह समाप्त करनी होगी. जिसके कारण हम अपनी साक्ष्य के लिए समय निकालें और एएसएल को अपना निर्णय लिखने और उसे कम्युनिकेट करने के लिए कम से कम दस दिनों का समय मिले. तुम्हारी टीम आज जितना सच खोज सकेगी, वही कल काम आएगा.”

प्रिया ने वहीं से राहुल को फोन किया कि ‘वह घर पहुँच रही है, प्रशांत बाबू चाहते हैं कि प्रबंधन के गवाहों से कल ही जिरह खत्म हो. हमें आज रात ही उन 'लायबिलिटीज' का सच तलाशना होगा जो प्रबंधन ने अपने अंतिम शपथ-पत्र में दी हैं. तुम स्नेहा और राहुल को भी कहो कि हमें काम में जुटना है.’

फोन करने के बाद वह प्रशांत बाबू की ओर मुखातिब हो बोली, “मैं घर पहुँच कर अपनी टीम के साथ काम पर जुटती हूँ.”

“बिलकुल, मैं चव्हाण साहब से फोन करके उन्हें सारी स्थिति बताता हूँ जिससे वे कल की तैयारी कर सकें.”

सुबह के चार बज रहे थे. प्रिया की आँखें लाल थीं, पर दिमाग साफ था. उसकी टीम ने वह 'चक्रव्यूह' ढूंढ निकाला था जिससे सरकार और प्रबंधन की जुगलबंदी को काटा जा सकता था. वह अब केवल एक मददगार इंजीनियर नहीं रह गयी थी; वह एक ऐसी सिपाही थी जिसने अपनी मध्यवर्गीय देहरी लांघकर मेहनतकश वर्ग के संघर्ष की असली जमीन पर लड़ने के लिए तैयार कर लिया था. उसकी टीम भी उसके साथ थी.

कल 26 अप्रैल थी. आखिरी मोर्चा. प्रिया ने डायरी में लिखा— "पूँजी के पास पैसा है, पर हमारे पास भी डेटा का सच है. अब देखते हैं चक्रव्यूह कौन तोड़ता है."
... क्रमशः