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बुधवार, 17 दिसंबर 2025

अब नहीं लौटना

लघुकथा

दिनेशराय द्विवेदी

महानगर की ऊँची गगनचुम्बी इमारतों के बीच यदि झुग्गियों का दरिया न बह रह रहा हो तो शायद महानगर की अबाध गति यकायक थम जाए. लाखों लोगों की सेवा करने वाले और जीवन के लिए कम दामों में वस्तुएँ उपलब्ध कराने वाले लोगों से ले कर शहर से कचरा बीनने वाले लोग यहीं से तो आते हैं. ऐसी ही झुग्गियों के बीच की तंग गलियों में रीमा का बचपन बीता. उस रात जब माई ने उसे मामा की लड़की को छोड़कर आने को कहा, तब वह बुखार और चक्कर से जूझ रही थी. लौटते समय सड़क किनारे बैठ जाना उसकी मजबूरी थी, लेकिन घर पहुँचने में हुई देरी उसके लिए अभिशाप बन गई.

घर पहुँचते ही माई चीखी-
"कहाँ मर गई थी? एक घंटा लग गया! सच बता, कहाँ से आ रही है?"
"गलत काम में उलझ जाती है, तभी देर करती है." बाप ने माई के सुर में सुर मिलाया.
और फिर गालियाँ और मारपीट शुरू हो गई.
घर का माहौल पहले से ही जहरीला था. माँ-बाप दोनों आपस में झगड़ते रहते. बाप को जरा भी कसर पड़ती तो वह माँ को रण्डी कहने और उसकी खाल खिंचाई में बिलकुल नहीं झिझकता. माई भी उस पर जो दिखता फेंकने लगती. उसने माँ के न जाने कितने यार घोषित कर रखे थे. वे फिर लड़ने लगे-
माँ चीख कर बाप से बोली, "तेरी वजह से यह सब बर्बाद हुआ है."
"तू ही बच्चों को बिगाड़ रही है." बाप क्या कम था, उसे जवाब देना जरूरी था.
रीमा जो बुखार में तप रही थी, उसकी किसी को फिक्र नहीं थी.

उन दोनों की लड़ाई का अंत हमेशा बच्चों पर होता. बरसों से बच्चों को माँ-बाप का प्यार नसीब नहीं हुआ था. लोग कुत्ता पालते हैं तो उससे भी दुलार जताते हैं, लेकिन रीमा तो उस दुलार से भी महरूम थी. माँ-बाप काम पर जाते तो उसे राहत मिलती. माँ बाप की लड़ाई के बीच छठी कक्षा तक ही वह पढ़ पायी थी. फिर दिन में वह वहीं झुग्गियों के बीच एक लिफाफे बनाने वाली वर्कशॉप में काम करने लगी, जहाँ उसकी तरह अधिकांश नाबालिग काम किया करते थे. वहीं वह जीतू से मिली, दोनों दोस्त बने. एक दूसरे के दर्द साझा करने लगे.

रीमा तीन दिन तक घर में बुखार से तपती रही. कमजोर थी तो चौथे दिन भी काम पर जाने की हिम्मत नहीं जुटा सकी. पाँचवें दिन काम पर पहुँची तो जीतू ने पूछा-
“चार दिन किधर रही.”
“बुखार से तपती रही. पर तुझे क्या? तूने तो खबर तक नहीं ली.”
“खबर कैसे लेता? तूने ही तो तेरी झुग्गी के आसपास नहीं दिखने का आर्डर दे रखा है.”
“तो क्या करूँ, बिना किसी के साथ देखे भी माई चमड़ी उधेड़ लेती है. तेरे साथ किसी दिन देख लेगी तो मार ही डालेगी.”
"मैं जानता हूँ, तेरे घर में क्या होता है. पर तू अकेली नहीं है, मैं हूँ न तेरे साथ. तू हिम्मत तो कर. छोड़ माई बाप को मेरे साथ निकल ले."

जीतू उसकी आँखों में का दर्द पढ़ लेता था जो उसके माई-बाप कभी नहीं देख पाए. लड़की ने पहली बार सोचा—जीतू के साथ निकल लेना ही शायद मुक्ति है. वह जीतू के साथ निकल ली.
दो नाबालिगों पर संदेह हुआ तो पुलिस ने रेल में बैठते बैठते दोनों को पकड़ लिया. पुलिस ने दोनों की कहानी सुनी. दोनों को चेतावनी मिली कि बालिग होने तक ऐसे नहीं भागना. रीमा को फिर से उसके माई-बाप को थाने बुला कर लौटा दिया. बोले अपनी लड़की का काबू में रखो. उस रात माई बाप ने कुछ नहीं कहा. लेकिन अगले दिन से फिर से पहले वाला सिलसिला शुरू हो गया.

चार महीने नहीं हुए थे कि माई ने लिफाफा फैक्ट्री के बाहर रीमा को जीतू के हाथ में हाथ पकड़े देख लिया. इस बार माई और बाप दोनों ने उसकी खाल खिंचाई की. चार दिन तक झुग्गी में बन्द रखा. पर जहाँ खाने के लाले पड़े हों वहाँ जवान होती बेटी को कितने दिन ताले में रखते. रीमा को छोड़ा और काम पर जाने को बोला.
इन चार दिनों में रीमा के भीतर एक टीस लगातार बढ़ती रही, वह सोचती रही कि, “क्या यही जीवन है? जहाँ माई-बाप अपनी ही बेटी को संदेह और हिंसा से देखते हैं, उसके साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करने लगते हैं. रोटी कपड़े की लड़ाई ने ही उसके माई बाप को संवेदनाहीन बना दिया कि, वे अपने ही रक्त-मांस को दुश्मन समझने लगते हैं.

इस बार उसने ठान लिया-अब लौटना नहीं. तीन महीने चुपचाप रहेगी. कारखाने में काम के वक्त के अलावा कहीं बाहर किसी लड़के के साथ नहीं दिखेगी. तब तक वह अठारह की हो जाएगी. फिर न पुलिस उसे पकड़ सकेगी और न उसे माई बाप के पास लौटा सकेगी.
 
चौथे महीने एक दिन रीमा वापस अपनी माई बाप की झुग्गी में वापस नहीं लौटी. माई-बाप उसे तलाश करते करते थक गए. वे समझ गये कि अब लड़की उन्हें नहीं मिलेगी. और मिलेगी भी तो वे उसका कुछ नहीं कर सकते. दोनों को अब उसके साथ किया गया अमानवीय व्यवहार याद आता तो खुद की आँखों से पानी निकलने लगता.
 
वह पगार का दिन था. रीमा और जीतू ने अपनी सारी पगार ली और कारखाने से निकल गए. रीमा तो खाली हाथ थी. दोनों जीतू की झुग्गी पहुँचे. जीतू ने अपना सामान लिया और दोनों रेलवे स्टेशन पहुँचे. पहली लंबी दूरी वाली ट्रेन में चढ गए. ट्रेन का आखिरी स्टेशन एक दूसरा महानगर था. वहाँ उन्होंने शादी कर ली. यह शादी उसके लिए केवल प्रेम नहीं थी, बल्कि अपने अस्तित्व की घोषणा थी.

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

पेंशन का सौदा

लघुकथा

दिनेशराय द्विवेदी
रामकिशोर  नगर परिषद का एक साधारण कर्मचारी था. मेहनती, ईमानदार, और अपने काम से संतुष्ट. उसे प्रमोशन मिला, लेकिन वेतन वही पुराना रहा. उसे नए पद का वेतनमान नहीं दिया गया. उसने सोचा, “न्याय अवश्य मिलेगा.” और अदालत का दरवाज़ा खटखटाया.

मुकदमा दाख़िल हुआ. अदालत में पहले से ही मुकदमों का पहाड़ था. तारीख़ पर तारीख़ मिलती रही. अफसरों ने भी अपनी चालें चलीं, कभी काग़ज़ अधूरा, कभी वकील अनुपस्थित. इस तरह 22 साल बीत गए.

आख़िरकार अदालत का फैसला आया, “रामकिशोर का वेतन फिक्स करो और सारा बकाया दो.”

नगर निगम के आयुक्त का का चेहरा उतर गया. लाखों रुपये देने पड़ेंगे. उसने तुरंत हाईकोर्ट में अपील पेश करवायी.

वकील ने आयुक्त को समझाया, “अपील खारिज होगी. लेकिन मैं इसे पाँच-दस साल खींच दूँगा.”

आयुक्त को राहत मिली, पर डर भी था कि कहीं उनके कार्यकाल में ही फैसला न आ जाए.

रामकिशोर की रिटायरमेंट में बस एक साल बचा था. आयुक्त ने नई चाल चली.
उसने अपने अधीनस्थ अफसर को कहा, “इसने अदालत को गुमराह किया है. फर्जी दस्तावेज़ दिए हैं. इसे चार्जशीट दो.”

रामकिशोर को चार्जशीट मिली, उसने दस्तावेज मांगे, कई दिन तक नहीं दिए गए. फिर उसने स्मरण पत्र दिया. लेकिन उसे जवाब मिला कि उसे दस्तावेज नहीं दिए जा सकते.

आयुक्त की योजना साफ़ थी—

• जांच चलते-चलते रामकिशोर रिटायर हो जाएगा.
• उसकी पेंशन रुक जाएगी.
• तब मजबूरी में वह खुद लिख देगा, “मैं प्रमोशन के मुकदमे के लाभ छोड़ता हूँ.”
• और तभी उसकी पेंशन चालू होगी.


फिर एक दिन उसे अचानक सूचना मिली कि वह जाँच में हाजिर हो.

रामकिशोर समझ गया कि यह लड़ाई अब सिर्फ़ वेतन की नहीं रही. यह उसकी गरिमा, उसकी ज़िंदगी, और उसके अधिकार की लड़ाई है.

वह सोचता रह गया, “क्या न्याय पाने की कोशिश ही मेरी सबसे बड़ी गलती थी?”

रविवार, 14 दिसंबर 2025

ट्रेन मिल गयी

लघुकथा :


दिनेशराय द्विवेदी
ह सात दिनों से मुम्बई में था. आज यहाँ उसका आख़िरी दिन था. रात नौ बजे की ट्रेन मुंबई सेंट्रल से थी. सुबह उसने मेज़बान से पूछा,

“आज का पूरा दिन खाली है, क्या किया जाए?”

मेज़बान ने मुस्कराकर कहा,

“एलिफेंटा केव्ज चले जाइए. समुद्र के बीच हैं, गेटवे ऑफ इंडिया से नाव मिल जाएगी.”

वह लोकल पकड़कर विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पहुँचा और पैदल गेटवे ऑफ इण्डिया तक चला गया. टिकट लिया और थोड़ी देर बाद नाव में बैठ गया. नाव तट से दूर हुई तो समुद्र की लहरें और तेज़ हवाएँ उसे रोमांचित करने लगीं. बाल हवा में उड़ रहे थे. नाव में दस-पंद्रह किशोर भी थे, जो पिकनिक के लिए एलिफेंटा जा रहे थे. नाव में ही उन से परिचय हुआ. नाव एलीफेंटा पहुँचती तब तक किशोरों से उसकी दोस्ती भी हो चुकी थी.

वह सीमित समय में पूरा द्वीप घूमना चाहता था. पर उसकी जेब गाइड के लिए पैसे खर्च करने को तैयार नहीं थी. किशोरों ने कहा,



“आप हमारे साथ घूमिए, हम सब दिखा देंगे हमसे बेहतर गाइड कौन होगा.

दिन भर वह किशोरों के साथ ही सब साथ घूमते रहे. गुफाओं की भव्यता, द्वीप की सुंदरता और किशोरों की चहल-पहल ने उसे आनंदित कर दिया.

शाम ढलने लगी. पाँच बजने को थे. जब वे तट पर लौटे तो टिकट खिड़की पर लंबी कतार देखकर उसका चेहरा उतर गया. मन में हिसाब लगाया,

“कम से कम एक घंटा लाइन में लगेगा, सात बजे तक नाव मिलेगी. आधे घंटे में गेटवे पहुँचा भी तो अंधेरी पहुँचते-पहुँचते साढ़े आठ बजेंगे. सामान लेकर ट्रेन छूटने के पहले सेंट्रल पहुँचना असंभव था. ट्रेन छूटना तय था.”

उसके चेहरे पर उदासी देख एक किशोर ने पूछा,

“अंकल, आप इतने परेशान क्यों हैं?”

उसने धीमी आवाज़ में कहा,

“रात नौ बजे ट्रेन है. अगर टिकट लेने में देर हो गई तो ट्रेन छूट जाएगी.”

किशोर ने तुरंत साथियों को बताया. उनमें से एक बोला,

“घबराइए मत अंकल, आपको अगली नाव में बिठा देंगे.”

एक किशोर उससे पैसे लेकर टिकट खिड़की तक गया. वहाँ लगी कतार में खिड़की से चौथी जगह पर टिकट लेने को खड़ी महिला से उसने विनती की,

“आंटी, मदद कर दीजिए. ये अंकल राजस्थान से आए हैं. रात नौ बजे ट्रेन है. लाइन में लगेंगे तो ट्रेन छूट जाएगी. आप इनके लिए टिकट ले लीजिए.”

महिला ने बिना झिझक टिकट लिया और किशोर को थमा दिया. उसकी चिंता मिट गई. अगली नाव में बैठकर वह गेटवे पहुँचा. वहाँ से दौड़ते हुए लोकल पकड़ी, फिर बस. अंधेरी पहुँचा तो मेज़बान ने कहा,

“खाना तैयार है, खा लो.”

उसने घबराकर कहा,

“ट्रेन छूट जाएगी.”

मेज़बान हँसकर बोले,

“नहीं छूटेगी. ट्रेन बोरीवली भी रुकती है. वहाँ से साढ़े दस बजे चलेगी. हम साथ खाना खाएँगे, फिर मैं कार से आपको बोरीवली छोड़ दूँगा.”

उसकी साँस में साँस आई. खाना खाकर वे निकले. मेज़बान ने उसे बोरीवली स्टेशन ट्रेन आने के पंद्रह मिनट पहले पहुँचा दिया. उसे ट्रेन मिल गई.

शनिवार, 13 दिसंबर 2025

'साख'

'लघुकथा'

अदालत का काम पूरा होते ही पदार्थीजी ने अपने भीतर एक अजीब हलकापन महसूस किया. जैसे किसी भारी बोझ को उतार दिया हो. बाहर गर्मी और उमस का आलम था, हवा ठहरी हुई, पसीने की महीन बूंदें कनपटी से बहकर कॉलर तक पहुँच रही थीं. दिन भर की थकान अब उनके कदमों में उतर आई थी.

उन्होंने सहायक को बस्ते समेटने को कहा और पार्किंग की ओर बढ़े. कार स्टार्ट होते ही विविध भारती का प्रसारण गूँज उठा. फिल्मी गीतों के बीच बुनी हुई कहानी, और फिर अचानक एक पुराना सुरीला गाना. सारंगी की झंकार जैसे कार की खिड़की से बाहर फैल रही थी, और शब्द भीतर कहीं पुराने घाव कुरेद रहे थे.

गाड़ी गेट नं. 1 पर पहुँची. सहायक का इंतजार करते हुए पदार्थीजी का मन रेडियो की कहानी में डूबा हुआ था. तभी सड़क के उस पार खड़ा ट्रैफिक सिपाही दिखा. उसकी भंगिमा से लगा कि वह किसी वाहन को रोकने वाला है. पदार्थीजी को क्षणभर लगा कि कहीं वह उनसे ही न कह दे, “गाड़ी आगे लगाइए.” लेकिन सिपाही ने पास के स्कूटर वाले को ही टोक दिया. शायद उसने पहचान लिया था कि वकील साहब अब घर लौट रहे हैं.

गाना थम गया, कहानी फिर आगे बढ़ी. तभी सहायक आ पहुँचा, बस्ता पिछली सीट पर रखा और सामने की सीट पर आकर बैठ गया. वह आज बयान कमिश्नर के रूप में गवाह का बयान दर्ज कर के आया था. उसने उसी का किस्सा सुनाना शुरू किया, “कैसे एक जूनियर वकील को उसके ही पिता के शिष्य ने चालाकी से बेवकूफ बनाया और अपने पक्ष के बयान दर्ज करवा लिए.


पदार्थीजी का मन अब दो कहानियों में झूल रहा था, एक रेडियो की कहानी और दूसरी सहायक की. सहायक बोल रहा था, और रेडियो अपनी धुन में कहानी कहे रहा था. उन्होंने सहायक की ओर देखा और कहा, “बयान कमिश्नर का काम गवाह की बात लिखना है, न कि वकील की व्याख्या. जब शब्द निष्पक्ष नहीं रहते, तो न्याय भटक जाता है.”

रेडियो की कहानी भी अपने अंतिम मोड़ पर थी, अभिनेता ने मंच पर नाटक खेलकर पिता और समाज को आईना दिखाया. उसका संवाद गूँजा,

“न्याय वही है जो सबके लिए समान हो, चाहे वह प्रेम हो या कानून.”

पदार्थीजी ने गहरी साँस ली. उन्हें लगा जैसे रेडियो की कहानी, सहायक का किस्सा और सड़क पर खड़ा सिपाही, तीनों एक ही बात कह रहे हों.

न्याय केवल प्रक्रिया नहीं है, वह ऐसी साँस है जो सब को बराबरी से मिलनी चाहिए.

गाड़ी अब पदार्थी जी के घर के सामने थी. संगीत थम चुका था. उन्होंने सहायक से कहा, “आज की सीख यही है,” कहानी हो या अदालत, शब्दों की सच्चाई ही सबसे बड़ा न्याय है. आज से जब भी तुम कमिश्नर ड्यूटी करो, गवाह को ध्यान से सुनो, उसका कहा ही लिखो, किसी पक्ष के वकील का सुझाया हुआ नहीं, वरना न्याय मरने लगेगा. इससे तुम पर अदालत, वकीलों और पक्षकारों का विश्वास बढ़ेगा, तुम्हारी साख कायम होगी. अन्यथा लोग तुम्हें भी उन बहुतेरे वकीलों में शामिल कर लेंगे जो अपनी ‘फीस’ ले कर कुछ भी कर सकते हैं.”

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

बधाई हो


अदालत की इमारत उस दिन जैसे मुस्करा रही थी. बरसात में महीनों तक छत टपकती रही, फाइलों पर पानी की बूंदें गिरती रहीं, और मरम्मत के लिए एक चिट्ठी बमुश्किल पीडब्ल्यूडी तक पहुँची. पर आज माहौल अलग था—जैसे दीवारों से सीलन उतर गई हो, जैसे गलियारों में धूप उतर आई हो.

खबर थी, “जज साहब का तबादला हो गया और साथ ही उन्हें रिटायरमेंट के चन्द महीनों पहले डिस्ट्रिक्ट जज बना दिया गया था.”
 
इस खबर से अदालत की दरारों में फँसी नमी तक मानो राहत की साँस ले रही थी. जज साहब वही थे जिनके बारे में मजदूरों और अभियुक्तों की दुनिया में एक ही कहावत चलती थी, "अगर तुम्हारा मामला इनके पास है, तो समझो तुम्हारा पक्ष पहले ही हार गया." दीवानी मामलों में सरकार के खिलाफ़ तब तक फैसला नहीं दिया जब तक कि सरकार की तरफ से पैरवी ही नहीं की गयी हो या फिर ऐसा करना बिल्कुल असंभव हो गया हो. फौजदारी मुकदमों में बरी होना तो मानो अपराध ही था. उनकी अदालत में अभियुक्त को खुद को पाक-साफ़ साबित करना पड़ता था, अभियोजन को कुछ भी साबित करने की ज़रूरत नहीं थी.

फिर जब श्रम न्यायालय में नियुक्त हुए तो मजदूरों की हालत और भी पतली हो गई. एक तो पहले ही उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों ने कानून की पुनर्व्याख्याएँ कर-कर के श्रमिक को सामाजिक न्याय प्रदान करने वाले कानून के झुकाव की दिशा नियोजक पक्ष की ओर मोड़ दी थी, दूसरे इन जज साहब का सोचना कमाल का था. जो कुछ साबित करना है वह मजदूर को ही साबित करना है. वे मजदूर के पक्ष को मजबूत करने वाले दस्तावेजों को जो नियोजक के कब्जे में होते अदालत में पेश करने का आर्डर कभी नियोजक को न देते. फैसले में लिखते यह मजदूर का दायित्व था. मजदूर सोचने लगे थे कि वे इन दस्तावेजों के लिए नियोजक के यहाँ चोरी करें या डाका डालें? नियोजक का पक्ष चाहे कितना भी खोखला हो, मजदूर को राहत मिलना ऊँट के मुहँ में जीरा ही साबित होता. मजदूर की गवाही अदालत की दीवारों तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती.

अब जब उनका तबादला हुआ और वे जिला जज बन गए, तो मजदूरों और उनके वकीलों ने राहत की साँस ली. अदालत के गलियारों में जज साहब के लिए बधाइयों की बौछार थी, "बधाई हो साहब बधाई.” मन ही मन बधाई देने वाला कह रहा होता, “अब हम भी चैन की नींद सो पाएंगे."
 
तबादला आदेश आने के तीन दिन बाद जज साहब ने रुखसत ली. वकील लोग आपस में एक दूसरे से पूछते, “फेयरवेल का क्या करें?” तो जवाब में फिर सवाल मिलता, “अब बधाई के चार शब्द बोल दिए वही क्या कम हैं? दूसरे जजों की तरह कर्मचारियों ने साहब के माथे टीका लगा कर माला पहनाई, मिठाई, कचौड़ियों और चाय से जलपान करवा कर फेयरवेल दिया. वकीलों की ओर से कोई विदाई समारोह नहीं हुआ, बस एक सामूहिक मुस्कान थी, जैसे किसी भारी बोझ से मुक्ति मिल गई हो.

जज साहब इस अदालत की अपनी कुर्सी से अन्तिम बार अत्यन्त खुश हो कर उठे, सोचते रहे कि जाते जाते उन्हें जिला जज बनने का मौका मिल ही गया. एक तरह से प्रमोशन ही समझो. लोगों ने इतनी बधाइयाँ दी जितनी इससे पहले उन्हें कभी नहीं मिलीं. यह कोई कम उपलब्धि नहीं थी.
 
अदालत के बाहर मजदूर और वकील आपस में फुसफुसा रहे थे, “आखिर साहब चले ही गए, अब शायद न्यायालय में न्याय भी लौट आए."

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

रैंप और गंगा

लघुकथा
सभागार में रोशनी झिलमिला रही थी.
रैंप पर कदमों की खटखटाहट, जैसे सदियों की चुप्पी पर चोट.

दरवाज़ा धड़ाम से खुला.
कुछ पुरुष भीतर घुसे, आवाज़ें गूँजीं गूंजने लगीं.

पहली पुरुष आवाज थी, "मॉडलिंग खत्म, घर जाओ. संस्कृति बचाओ."
यह आवाज गंगा की धारा को रोकने की कोशिश थी.

प्रतियोगी एक ने मुस्कराकर उत्तर दिया, "संस्कृति इतनी नाज़ुक है अगर, तो दुकानों से पश्चिमी कपड़े हटाइए."

तभी दूसरे पुरुष की आवाज गूंजी, उसमें गुस्सा भरा था. "सभ्यता ऐसे कपड़ों से टूटती है."

प्रतियोगी दो की आँखें चमकी और उसने अपने महीन स्वर में कहा, "और आप कौन हैं यह तय करने वाले, कि सभ्यता किससे टूटेगी?"

हॉल में सन्नाटा छा गया.

पुरुषों की आवाज़ें धीरे-धीरे खोने लगीं.

प्रतियोगी तीन का दृढ़ स्वर गूंजा, "हम यहाँ कपड़े दिखाने नहीं आए, हम अपने सपने सुनाने आए हैं."

रैंप अब लकड़ी का फर्श भर नहीं था.
अब वह एक पुल था, जिस पर से महिलाएँ अपने सपनों को समाज के उस पार ले जा रही थीं.
ऊँची एड़ी की खटखटाहट गूंजी, वह थी साहस की ऊँचाई.
हर कदम एक घोषणा, "हम पीछे नहीं हटेंगे."

बाहर गंगा बह रही थी, उसकी लहरें गा रही थी,
"संस्कृति वही है जो बहती रहती है ...
रुकती नहीं."

बुधवार, 10 दिसंबर 2025

अमूल्य घोड़ा

लघुकथा

अरब में एक साईस था, जो एक अमीर के घोड़ों की देखरेख करता था. अमीर के पास एक से एक बेहतरीन घोड़े थे. साईस की भी इच्छा थी कि उसका अपना घोड़ा हो, पर उसके पास इतना धन नहीं था. आखिर अपनी बचत से उसने मेले से एक घोड़े का बच्चा खरीदा और उसे बेटे की तरह पाला. वह उससे बातें करता, उसे दुलारता और अपनी सारी कमाई उसी पर खर्च करता.

जब घोड़ा जवान हुआ तो साईस को लगा कि ऐसा घोड़ा पूरे अरब में नहीं होगा. उसने सोचा कि इसकी असली पहचान तो मेले में ही होगी जहाँ सारे अरब से घोड़े आते हैं. अमीर से अवकाश लेकर वह अपने घोड़े को मेले में ले गया.

मेले में सबसे महंगे घोड़े की कीमत देखकर उसने अपने घोड़े की कीमत (टैग-प्राइस) उससे भी सवाई रख दी. लोग घोड़ा देखने आते, पर कीमत देखकर लौट जाते. तभी एक अमीर ने बोली लगाई. फिर दूसरा अमीर आया और उसने उससे अधिक बोली लगाई. इस तरह कीमत बढ़ती गई और टैग से भी दुगनी हो गई. जैसे जैसे उसकी कीमत बढ़ती जाती साईस का दिल डूबने लगता कि, मेरा बेटा मुझ से छिन जाएगा.

साईस मन ही मन सोचने लगा, ... "मैंने तो कीमत अपनी इच्छा से तय की थी, पर असली कीमत तो वही है जो लोग देने को तैयार हैं. मालिक की चाह अलग है, पर असली मूल्य बाजार ही तय करता है."

आखिरकार पहला अमीर मैदान छोड़ भागा और दूसरा अमीर खुश हुआ कि उसने पहले वाले अमीर को मात दे दी. पर जब मेले के अधिकारी ने रकम जमा करने को कहा तो वह अमीर बोला, "मैंने घोड़ा खरीदना नहीं है, मुझे तो बस दूसरे को पछाड़ने का सुख चाहिए था."

साईस बहुत खुश हुआ कि उसका बेटा-सा घोड़ा अब उसके पास ही रहेगा. वह अपने बेटे को साथ ले कर अमीर के पास लौटा. अमीर ने घोड़ा देखकर पूछा, "यह घोड़ा तुम लाए हो?"

साईस ने विनम्रता से कहा, "हुजूर, मेरी इतनी हैसियत कहाँ कि ऐसा घोड़ा खरीद सकूं. यह घोड़ा मैंने ही पाल-पोसकर अपने बेटे की तरह बड़ा किया है. मेले में इसकी कीमत मैंने सबसे महंगे घोड़े से सवाई रखी थी. पर दो रईस आए और बोली लगाने लगे. आखिर मेरी बताई कीमत से दुगने तक पहुँच गए. अचानक एक रईस ने बोली छोड़ दी. दूसरे ने इसे लेने से इन्कार कर दिया कि मैं तो बस दूसरे अमीर को पछाड़ना चाहता था. मेरा मकसद पूरा हुआ. यह कह कर वह मेला छोड़ कर चला गया.


कुछ रुक कर साईस ने फिर कहा, "असली कीमत वही बनी जो बाजार ने तय की. मैं खुश हूँ कि मेरा बेटा मेरे पास है. मैं इसे वापस ले आया हूँ. इसे आप मेरी ओर से नजराना समझ रख लीजिए. मैं इसी में खुश हूँ कि यह हमेशा मेरे पास रहेगा."

रईस ने खुश हो कर कहा, “भले ही मेले में इस घोड़े की कीमत सबसे अधिक लगी हो, लेकिन यह घोड़ा बेशकीमती ही नहीं, बल्कि अमूल्य है. इसकी कोई कीमत नहीं, जिसे कोई बाप की तरह प्यार करे उसकी कोई कीमत नहीं होती. यह घोड़ा तुम्हारा है और हमेशा तुम्हारा ही रहेगा. आज से यह इस घुड़साल में सबके साथ रहेगा."