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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

यह हड़ताल एक नया इतिहास लिखेगी

ज और कल देश के 11 केन्द्रीय मजदूर संगठन हड़ताल कर रहे हैं। उन के साथ आटो, टैक्सी बस वाले और कुछ राज्यों में सरकारी कर्मचारी भी हड़ताल पर जा रहे हैं।  केन्द्रीय संगठनों ने इस दो दिनों की हड़ताल की घोषणा कई सप्ताह पहले कर दी थी।  सरकार चाहती तो इस हड़ताल को टालने के लिए बहुत पहले ही केन्द्रीय संगठनों से वार्ता आरंभ कर सकती थी। लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया। वह अंतिम दिनों तक हड़ताल की तैयारियों का जायजा लेती रही। जब उसे लगने लगा कि यह हड़ताल ऐतिहासिक होने जा रही है तो हड़ताल के तीन दिन पहले केन्द्रीय संगठनों से हड़ताल न करने की अपील की और एक दिखावे की वार्ता भी कर डाली।  न तो सरकार की मंशा इस हड़ताल को टालने की थी और न ही वह इस स्थिति में है कि वह मजदूर संगठनों की मांगों पर कोई ठीक ठीक संतोषजनक आश्वासन दे सके।  इस का कारण यह है कि यह हड़ताल वास्तव  में वर्तमान केन्द्र सरकार की श्रमजीवी जनता की विरोधी नीतियों के विरुद्ध है। श्रम संगठन तमाम श्रमजीवी जनता के लिए राहत चाहते हैं। जब कि सरकार केवल पूंजीपतियों के भरोसे विकास के रास्ते पर चल पड़ी है चाहे जनता को कितने ही कष्ट क्यों न हों। वह इस मार्ग से वापस लौट नहीं सकती।  सरकार की प्रतिबद्धताएँ देश की जनता के प्रति होने के स्थान पर दुनिया के पूंजीपतियों और साम्राज्यवादी देशों के साथ किए गए वायदों के साथ है। 
लिए देखते हैं कि इन केन्द्रीय मजदूर संगठनों की इस हड़ताल से जुड़ी मांगें क्या हैं?

  1. महंगाई के लिए जिम्मेदार सरकारी नीतियां बदली जाएं
  2. महंगाई के मद्देनजर मिनिमम वेज (न्यूनतम भत्ता) बढ़ाया जाए
  3. सरकारी संगठनों में अनुकंपा के आधार पर नौकरियां दी जाएं
  4. आउटसोर्सिंग के बजाए रेग्युलर कर्मचारियों की भर्तियां हों
  5. सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी प्राइवेट कंपनियों को न बेची जाए
  6. बैंकों के विलय (मर्जर) की पॉलिसी लागू न की जाए
  7. केंद्रीय कर्मचारियों के लिए भी हर 5 साल में वेतन में संशोधन हो
  8. न्यू पेंशन स्कीम बंद की जाए, पुरानी स्कीम ही लागू हो 
मांगो की इस फेहरिस्त से स्पष्ट है कि केन्द्रीय मजदूर संगठन इस बार जिन मांगों को ले कर मैदान में उतरे हैं  वे आम श्रमजीवी जनता को राहत प्रदान करने के लिए है।  

स बीच प्रचार माध्यमों, मीडिया और समाचार पत्रों के माध्यम से सरकार यह माहौल बनाना चाहती है कि इस हड़ताल से देश को बीस हजार करोड़ रुपयों की हानि होगी।  जनता को कष्ट होगा।  वास्तव में इस हड़ताल से जो हानि होगी वह देश की न हो कर पूंजीपतियों की होने वाली है।  जहाँ तक जनता के कष्ट का प्रश्न है तो कोई दिन ऐसा है जिस दिन यह सरकार जनता को कोई न कोई भारी मानसिक, शारीरिक व आर्थिक संताप नहीं दे रही हो। यह सरकार पिछले दस वर्षों से लगातार एक गीत गा रही है कि वह महंगाई कम करने के लिए कदम उठा रही है। लेकिन हर बार जो भी कदम वह उठाती है उस से महंगाई और बढ़ जाती है। कम होने का तो कोई इशारा तक नहीं है। 
हा जा रहा है कि मजदूरों और कर्मचारियों को देश के लिए काम करना चाहिए।  वे तो हमेशा ही देश के लिए काम करते हैं। पर इस सरकार ने उन के लिए पिछले कुछ सालों में महंगाई बढ़ाने और उन को मिल रहे वेतनों का मूल्य कम करने के सिवा किया ही क्या है? ऐसे में वे भी यह कह सकते हैं कि जिस काम के प्रतिफल का लाभ उन्हें नहीं मिलता वैसा काम वे करें ही क्यों? 
मित्रों! यह हड़ताल देश की समस्त श्रमजीवी जनता के पक्ष की हड़ताल है और यह हड़ताल कैसी भी हो लेकिन इस हड़ताल का ऐतिहासिक महत्व होगा क्यों कि यह शोषक वर्गों के विरुद्ध श्रमजीवी वर्गों का शंखनाद है और इस बार सभी रंगों के झण्डे वाले मजदूर संगठन एक साथ हैं। यह हड़ताल एक नया इतिहास लिखेगी और भविष्य के लिए भारतीय समाज को एक नई दिशा देगी।


लेखक-पाठक के बीच की दूरी पाटने के लिए लेखकों को स्वयं सामूहिक प्रयास करने होंगे

उपन्यासकार अशोक जामनानी के साथ एक विचारोत्तेजक संगोष्ठी 


कुछ दिन पहले अचानक मुझे महेन्द्र 'नेह' ने बताया कि युवा उपन्यासकार श्री अशोक जमनानी केन्द्रीय साहित्य अकादमी की लेखक यात्रा योजना के अंतर्गत 17 फरवरी को कोटा आ रहे हैं और "विकल्प" अखिल भारतीय सांस्कृतिक और सामाजिक मोर्चा की कोटा इकाई को उन के साथ "लेखक और पाठक के बीच दूरी को कौन पाटेगा" विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन करना है। उन्हों ने यह भी बताया कि उस दिन वे खुद और शकूर "अनवर" कोटा में नहीं होंगे। संगोष्ठी को आयोजित करने की दायित्व मुझे वहन करना है। यह सूचना मिलने के अगले दिन ही मुझे चार दिनों के लिए बाहर जाना था और 11 फरवरी को लौटना था। महेन्द्र ने मुझे आश्वासन दिया कि गोष्ठी के लिए आरंभिक तैयारी वे कर लेंगे और मुझे केवल एक दिन पहले उस काम में जुटना है। मैं 11 फरवरी रात को कोटा पहुंचा और यहाँ आते ही अपनी वकालत में व्यस्त हो गया। 15 फरवरी की शाम मुझे अचानक उक्त दायित्व का स्मरण हुआ तो मैं ने महेन्द्र 'नेह' को फोन किया। तो पता लगा वे मोर्चा के अखिल भारतीय सम्मेलन में जाने के लिए ट्रेन में बैठ चुके हैं और मोर्चा के अ.भा. सचिव होने के कारण उस की तैयारियों की व्यस्तता के कारण संगोष्ठी की तैयारी भी नहीं कर सके हैं, सब कुछ मुझे ही करना है।
अतिथि का स्वागत
मैं अपने व्यक्तिगत कारणों से विगत तीन-चार वर्षों से इस तरह के कार्यक्रम आयोजनों के दायित्व से दूर ही था। अब अचानक यह दायित्व आ गया जिसे निभाना था। खैर! मैं ने विकल्प के सक्रिय साथियों में से तथा अपने मित्रों से टेलीफोन से संपर्क किया। गोष्ठी के लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ साथियों के सहयोग से कराईं। मुझे आशा थी कि इस आयोजन में लगो पर्याप्त संख्या में जुट जाएंगे। समय की कमी के कारण पहली गलती तो यह हुई कि गोष्ठी की सूचना किसी स्थानीय अखबार में प्रकाशित कराने की बात तब स्मरण हुई जब 17 फरवरी का अखबार लोगों के हाथों में पहुँच गया। जिस का सीधा नतीजा यह हुआ कि संगोष्ठी में उपस्थिति अपेक्षित से कम रही। संतोष की बात यह रही कि संगोष्ठी के विषय में रुचि रखने वाले लेखक और विद्वान पर्याप्त संख्या में उपस्थित थे। करीब ढाई घंटे चली यह संगोष्ठी बहुत उपयोगी रही। विषय पर विस्तार से चर्चा हुई और जो प्रश्न संगोष्ठी में रखा गया था उस पर एक सामान्य निष्कर्ष पर पहुँचा जा सका।  
अशोक जमनानी
संगोष्ठी में अतिथि उपन्यासकार अशोक जमनानी ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि आज के लेखक अपने साहित्य के स्थान पर स्वयं को स्थापित करने में लगे हैं, जिस के कारण लेखक और पाठक के बीच दूरी बढ़ी है। प्रकाशकों की रुचि भी लेखक को ब्राण्ड बनाने में है। पुस्तकों के सस्ते संस्करण प्रकाशित कर के साहित्य को पाठकों तक पहुँचाने में उस की रुचि नहीं है क्यों कि उसे इस तरह हजारों पुस्तकें बेच कर जो लाभ होता है उस से अधिक लाभ वह ब्रांड लेखक की पुस्तकों को सरकारी और सांस्थानिक पुस्तकालयों को महंगी पुस्तकें बेच कर कमा लेता है। इन पुस्तकालयों में पहुँच कर पुस्तकें पाठक की पहुँच से दूर हो जाती हैं। लेखक को ब्रांड बनाने में अकादमियों और पुरस्कारों का योगदान है वे कृतियों को नहीं लेखक को पुरस्कार सम्मान देते हैं। पाठक लेखक को तो जानता है पर यह नहीं जानता कि वह क्या लिख रहा है और कौन सा साहित्य महत्वपूर्ण है। हमारी शिक्षा प्रणाली में भी साहित्य पर जोर नहीं दिया जाता लेकिन लेखक के जीवन पर जोर दिया जाता है। 
ओम नागर
विषय प्रवर्तन के उपरान्त सब से पहले तकनीकी विश्वविद्यालय के व्याख्याता रंजन माहेश्वरी बोले। वे लेखक नहीं हैं लेकिन फिर भी संगीत और लेखन की दुनिया से जुड़े हैं। उन्हों ने कहा कि लेखक को आज इंटरनेट से जुड़ना होगा। जो इंटरनेट पर लिख रहे हैं वे केवल देश के ही नहीं दुनिया भर के पाठकों से सीधे जुड़ रहे हैं। जब अमिताभ जैसे लोकप्रिय अभिनेता अपने दर्शकों से सीधे जुड़ने के लिए ब्लाग लिख सकते हैं तो लेखक ऐसा क्यों नहीं कर सकते? कथाकार राधेश्याम मेहर ने कहा कि अकादमियाँ निष्पक्ष नहीं हैं। वे अपने हिसाब से काम करती हैं। व्यंगकार हितेष व्यास ने कहा कि लेखक प्रकाशक के पास जाता है और प्रकाशक अपने लाभ के लिए उस का उपयोग करता है। अकादमियाँ भी साहित्यकारों और पाठकों के बीच पुल बनाने का काम नहीं करती। केन्द्रीय साहित्य अकादमी ने जमनानी जी को कोटा भेजा लेकिन वे कोटा के साहित्यकारों से परिचित नहीं हैं यह अकादमी की कमजोरी है। स्पिक मैके के अशोक जैन ने कहा कि जैसे संगीत के क्षेत्र में लोग अच्छे कंठ-संगीत के स्थान पर किसी नयी नृत्यांगना का नृत्य देखना पसंद करते हैं वैसी ही स्थिति साहित्य में है, इसे तोड़ना होगा। कवि ओम नागर ने कहा कि आज साहित्य की शर्तें बाजार तय कर रहा है वह लेखक और पाठक को दूर कर रहा है। उसे इस से कोई सरोकार नहीं कि लेखक और पाठक के बीच कोई रिश्ता स्थापित हो।  
संचालक शू्न्य आकांक्षी
स अवसर पर जब मुझे बोलने के लिेए कहा गया तो मैं ने अपनी बात कही कि तुलसीदास के पहले भी रामकथा थी लेकिन तुलसीदास ने जनता तक उसे पहुँचाने के लिए सघर्ष किया और जान की बाजी तक लगा दी। प्रेमचंद ने जनता के लिखा तो उसे प्रकाशित करने के लिए खुद प्रेस चलाई और पत्रिकाएं निकाली। उन में जनता के हित का साहित्य पाठक तक पहुँचाने की जिद थी। जिद आज भी लेखक को अपने अंदर पैदा करनी होगी तभी लेखक पाठक से अपनी दूरी कम कर सकेगा। कवि अम्बिकादत्त ने कहा कि रचनाकार को पाठक तक पहुँचने का माध्यम भी तलाशना पड़ेगा। उसे अपने साहित्य की भाषा, विधा और शैली को पाठक के अनुरूप बनाना होगा। गोष्ठी के अध्यक्ष अपने विचार रखें इस के पूर्व अशोक जमनानी ने पुनः कहा कि गोष्ठी के अंत में उन्हों ने कहा कि इस दूरी को पाटने के लिए लेखक को अपना व्यक्तित्व हिमालय की तरह उच्च और साहित्य को उस से निकलने वाली गंगा जैसा बनाना होगा जो धरती पर आ कर उसे सींचती है और जन-जन तक पहुँच जाती है। प्रकाशकों ने समाज के साथ रिश्ता कायम करने वाली रचनाओं और रचनाकारों को पहले हाशिए पर डाला और फिर परिदृश्य से गायब कर दिया।  संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि निर्मल पाण्डेय ने कहा कि साहित्यकार जर्रे से बनता है लेकिन फिर उसे विस्मृत कर अपना नाम करने में जुट जाता है यह एक दुर्भावना है। लेखक को इस दुर्भावना से मुक्त हो कर पाठकों की संवेदना से जुड़ना होगा। संगोष्ठी का संचालन करते हुए कवि शून्याकांक्षी ने कहा कि कोटा में सर्वाधिक लेखन होने के बावजूद भी यहाँ अच्छे प्रकाशक का अभाव है। वर्ष में बीसियों पुस्तकें कोटा के लेखकों की प्रकाशित होती हैं और वे बाहर के प्रकाशक तलाशते हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए लेखकों को अपने सामूहिक प्रकाशन का प्रयास करना चाहिए। एक सामूहिक प्रकाशन ही लेखकों को पाठकों से बेहतर जोड़ सकता है। गोष्ठी के अंत में विकल्प की और से वरिष्ठ ग़ज़लकार अखिलेश अंजुम ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।
मंच पर अध्यक्ष निर्मल पाण्डेय, अशोक जमनानी, दूसरे अध्यक्ष अम्बिकादत्त और संचालक शून्य आकांक्षी
संगोष्ठी के उपरान्त मेरी जमनानी जी से बात हुई तो वे संतुष्ट थे।  उनका कहना था कि संगोष्ठी में भले ही उपस्थिति कम रही हो पर यह एक उपयोगी और विचारोत्तेजक संगोष्ठी रही।  यह विचार सामने आया कि लेखक को पाठक से दूरी कम करने के लिए स्वयं सभी स्तरों पर प्रयास करने होंगे।  न केवल उस की संवेदना से जुड़ना होगा, उस के लिए अपने लेखक को उस तक संप्रेषणीय बनाना होगा। वे मेरे इस विचार से भी सहमत थे कि प्रकाशन को सस्ता बनाना होगा और इस के लिए अव्यवसायिक सामूहिक प्रकाशन अत्यन्त जरूरी है।  अव्यवसायिक सामूहिक प्रकाशन की आवश्यकता क्यों पड़ रही है यह भी एक प्रासंगिक विषय है इस पर भी विचार किया जाना चाहिए और इस पर भी इसे कैसे स्थापित किया जा सकता है।

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

विदेशी शब्दों की बाढ़


मारे साहित्य के प्रत्येक युग में विदेशी शब्दों की एक बाढ़ सी हमारे यहाँ आई है।  हमारा अपना युग भी इस का अपवाद नहीं है।  और यह एक ऐसी चीज है जिस का जल्दी ही अन्त नहीं होगा।  विदेशी धरती में विकसित नए विचारों से हमारा परिचय अपने साथ नए शब्दों को भी ले आता है।  लेकिन इस में कोई शक नहीं कि बिना जरूरत या बिना उपयुक्त कारण के हमारी भाषा में विदेशी शब्दों की खिचड़ी पकाने का आग्रह सहज बुद्धि और परिष्कृत रुचि के विरुद्ध है।  लेकिन यह आग्रह न तो हमारी भाषा का कुछ बाल बाँका कर सकता है, न ही हमारे साहित्य का।  यह केवल उन्हीं के लिए बुरा सिद्ध होगा जिन के सिर पर यह सवार है।  लेकिन इस की दूसरी, विरोधी अति, अर्थात अपरिमित शुद्धता का भी कोई भिन्न नतीजा नहीं निकलेगा।  दोनों एक ही सिक्के को दो पहलू हैं।  भाषा का एक अपनी आत्मा, उस की अपनी प्रतिमा है।  इसलिए उन ढेर सारे विदेशी शब्दों में से जिन का समावेश किया गया, केवल कुछ ही जीवित रह सके, बाकी अपने आप गायब हो गए।  इसी प्रकार, नए गढ़े गए शब्दों का भी वही भाग्य होगा, - कुछ प्रचलित होंगे और बाकी लुप्त हो जाएंगे। 

-विस्सारिन ग्रिगोरियेविच बेलिंस्की (1811-1848) प्रसिद्ध रूसी आलोचक

ज्ञान का, और अन्धविश्वासों का सूत्रपात




मानव सदा अपनी आदिम अवस्था में नहीं रह सकता था, सदा प्रकृति और गोचर जगत की नाल से जुड़ा नहीं रह सकता था।  पशु ही ऐसा है जो प्रकृति से कभी अनमेल या बेसुरेपन का अनुभव नहीं करता, किन्तु मानव? न केवल बाह्य प्रकृति से, वरन् स्वयं अपने से भी उस का द्वंद्व चलता रहता है।  यह असंगति इसे झनझनाती  और व्यथित करती है, और यह व्यथा उसे सदा आगे बढ़ने को प्रेरित करती है।  कभी कभी ऐसा होता है कि प्रकृति के साथ यह वैमनस्य, यह अंतर्विरोध इतना भयानक रूप ले लेता है कि मानव सत्य की टोह छोड़ कर ऑथेलो की भाँति अन्धी झुंझलाहट और क्षोभ से त्रस्त किसी भुलावे को पकड़ने के लिए, यहाँ तक कि एकदम औघड़ जादू-टोनों तक में पड़ने के लिए विकल हो उठता है।  यह जैसे भी हो, उस जानलेवा द्वंद्व को भूलना और उस से निकल भागना चाहता है¡  ... यहीं से ज्ञान का, और अन्धविश्वासों का भी सूत्रपात होता है...¡

- अलेक्सान्द्र इवानोविच हर्ज़न (1812-1870)