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रविवार, 9 अगस्त 2020

एक महामारी का आविष्कार

  • जॉर्जो आगम्बेन

जॉर्जो आगम्बेन

इतालवी दार्शनिक जार्जो आगम्बेन कोविड के दौर में चर्चा में रहे हैं। अकादमिया में संभवत: वे पहले व्यक्ति थे, जिसने नावेल कोरोना वायरस के अनुपातहीन भय के खिलाफ आवाज़ उठाई। कोविड से संबंधित उनकी टिप्पणियों के हिंदी अनुवाद
प्रमोद रंजन की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक “भय की महामारी” के परिशिष्ट में संकलित हैं। प्रस्तुत है उनमें से पहली टिप्पणी :

हम आज तथाकथित कोरोना महामारी से निपटने के लिए जल्दबाजी में उठाये गए निहायत उन्मादपूर्ण, अतार्किक और निराधार आपातकालीन क़दमों से जूझ रहे हैं। इस मसले के पड़ताल की शुरुआत हमें नेशनल रिसर्च कौंसिल (सीएनआर) द्वारा की गयी इस घोषणा से करनी चाहिए कि “इटली में सार्स कोविड 2 महामारी नहीं है”। कौंसिल ने यह भी कहा कि “इस महामारी से सम्बंधित दसियों हज़ार मामलों पर आधारित जो आंकडें उपलब्ध हैं, उनके अनुसार 80-90 प्रतिशत मामलों में यह संक्रमण केवल मामूली लक्षणों (इन्फ्लुएंजा की तरह) को जन्म देता है। लगभग 10-15 प्रतिशत मामलों में मरीजों को न्युमोनिया हो सकता है परन्तु इनमें से अधिकांश मरीजों के लिए यह जानलेवा नहीं होगा। केवल 4 प्रतिशत मरीजों को इंटेंसिव थेरेपी की ज़रुरत पड़ेगी।” 

अगर यह सही है तो भला क्या कारण है कि मीडिया और सरकार देश में डर और घबराहट का माहौल बनाने की हरचंद कोशिश कर रहे हैं? इसका नतीजा यह हुआ है कि लोगों के आने जाने और यात्रा करने के अधिकार पर रोक लग गयी है, और रोजाना की ज़िन्दगी ठहर सी गयी है।

इस गैर-आनुपातिक प्रतिक्रिया के पीछे दो कारक हो सकते हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण है, अपवादात्मक स्थितियों का सामान्यीकरण करने की सरकार की प्रवृति। सरकार ने ‘साफ़-सफाई और जनता की सुरक्षा’ की ख़ातिर जिस विधायी आदेश को तुरत-फुरत लागू करने की मंज़ूरी दी, उससे एक तरह से “ऐसे म्युनिसिपल और अन्य क्षेत्रों का सैन्यकरण कर दिया गया जहाँ एक भी ऐसा व्यक्ति है जो कोविड पॉजिटिव है और जिसके संक्रमण का स्रोत अज्ञात है, या जहाँ संक्रमण का एक भी ऐसा मामला है जिसे किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं जोड़ा जा सकता जो हाल में किसी संक्रमित इलाके से लौटा हो।” जाहिर है कि इस तरह की स्थिति कई क्षेत्रों में बनेगी और नतीजे में इन अपवादात्मक आदेशों को एक बड़े क्षेत्र में लागू किया जा सकेगा. इस आदेश में लोगों की स्वतंत्रता पर जो गंभीर रोके लगाई गई है, वे हैं: 
  1. कोई भी व्यक्ति प्रभावित म्युनिसिपैलिटी या क्षेत्र से बाहर नहीं जा सकेगा।
  2. कोई बाहरी व्यक्ति इस म्युनिसिपैलिटी या क्षेत्र के अन्दर नहीं आ सकेगा।
  3. निजी या सार्वजनिक स्थानों पर सभी प्रकार के जमावड़ों, जिनमें सांस्कृतिक, धार्मिक और खेल सम्बन्धी जमावड़े शामिल हैं, पर रोक रहेगी - ऐसे स्थानों पर भी जो किसी भवन के अन्दर हैं, परन्तु उनमें आम लोगों को प्रवेश की अनुमति है।
  4. सभी किंडरगार्टेन, स्कूल और बच्चों के देखभाल की सेवाएं बंद रहेंगी। उच्च और व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं में ‘डिस्टेंस लर्निंग’ के अलावा सभी शैक्षिक गतिविधियाँ प्रतिबंधित रहेंगी।
  5. संग्रहालय और अन्य सांस्कृतिक संस्थाएं और स्थल जनता के लिए बंद रहेंगे। इनमें वे सभी स्थल शामिल हैं जो 22 जनवरी 2004 के विधायी आदेश क्रमांक 42 के अंतर्गत कोड ऑफ़ कल्चरल एंड लैंडस्केप हेरिटेज के आर्टिकल 101 में शामिल हैं। इन संस्थाओं और स्थलों पर सार्वजनिक प्रवेश के अधिकार से संबंधित नियम निलंबित रहेंगे।
  6. इटली के अन्दर या विदेशों की शैक्षिक यात्राएं निलंबित रहेंगी।
  7. जी) सभी परीक्षाएं स्थगित रहेंगी और सार्वजनिक कार्यालयों में कोई काम नहीं होगा, सिवाय आवश्यक और सार्वजानिक उपयोगिता सेवाओं के संचालन के।
  8. एच) क्वारंटाइन सम्बन्धी नियम प्रभावशील होंगे और उन लोगों पर कड़ाई से नज़र रखी जाएगी जो संक्रमित व्यक्तियों के संपर्क में आये हैं।
सीएनआर का कहना है कि यह संक्रमण साधारण फ्लू से अलग नहीं है, जिसका सामना हम हर साल करते हैं। फिर यह अनुपातहीन प्रतिक्रिया क्या अजीब नहीं है? ऐसा लगता है कि चूँकि अब आतंकवाद के नाम पर असाधारण और अपवादात्मक कदम नहीं उठाये जा सकते इसलिए एक महामारी का आविष्कार कर लिया गया है जिसके बहाने इन क़दमों को कितना भी कड़ा किया सकता है।

इससे भी अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि पिछले कुछ सालों में भय का जो वातावरण व्याप्त हो गया है उसे ऐसी परिस्थितियां भाती हैं जिनसे सामूहिक घबराहट और अफरातफरी फैले। इसके लिए यह महामारी एक आदर्श बहाना है। इस तरह एक दुष्चक्र बन गया है। सरकार द्वारा स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों को इसलिए स्वीकार कर लिया जाता है क्योंकि लोगों में सुरक्षित रहने की इच्छा है। और यह इच्छा उन्हीं सरकारों ने पैदा की है, जो अब उसे पूरा करने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रच रही हैं।

(जॉर्जो आगम्बेन ने यह टिप्प्णी अपने इतालियन ब्लॉग Quodlibet पर 26 फरवरी, 2020 को लिखी थी, जिसका अंग्रेजी अनुवाद यूरोपीय जर्नल ऑफ साइकोएनालिसिस ने प्रकाशित किया। आगम्बेन की इस टिप्पणी पर कई प्रकार की नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ भी आईं, जिसके उत्तर में उन्होंने अपने ब्लॉग पर एक सटीक ‘स्पष्टीकरण’ दिया और बाद में “विद्यार्थियों का फतीहा” नाम से भी एक टिप्पणी लिखी। उनकी इन टिप्पणियों का विश्व के अनेक प्रमुख अकादमिशयनों ने संज्ञान लिया। जिसके परिणामस्वरूप कथित ऑनलाइन-, डिजिटल शिक्षा के सुनियोजित षड़यंत्र के विरोध की सुगबुगाहट आरंभ हो सकी है। इन टिप्पणियों के हिंदी अनुवाद प्रमोद रंजन की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक "भय की महामारी" में संकलित हैं, जिन्हें जॉर्जो आगम्बेन की अनुमति से किया गया है।])

रविवार, 19 जुलाई 2020

कोराना वायरस: अर्थव्यवस्था और प्रतिरोधक क्षमता

डर और अपराधबोध के उपकरणों के माध्यम से जनता के साथ खेल खेलना शासकों और धर्माचार्यों का पुराना आजमाया तरीक़ा रहा है। जब यह चरम सीमा तक पहुंच जाता है तो जनता पर सबसे ज्यादा चोट की जाती है। यहां तक कि कम्युनिस्ट और खुद को शातिर समझने वाले लोग भी इस खेल में शामिल हो कर इसे अंजाम देने लगते हैं।
कोवाड गांधी
हिंदी अनुवाद : असीम सत्यदेव


इस तकनीकी विकास के युग में व्यापक जनसमुदाय के अंदर सामूहिक डर (मास हिस्टीरिया) जंगल की आग की तरह फैल जाता है, खास तौर से जब शासकों और, या धर्म के जरिए उसे प्रोत्साहित किया जाता है। गणेश दूध पीना इसका एक उदाहरण था। एक और उदाहरण स्काई लैब गिरने की ख़बर थी। 2000ई. (y2k) संकट जैसे भयग्रस्तता के कई और उदाहरण हैं। झारखंड जेल में एक आदिवासी ने मुझे बताया था कि उनके सुदूर गांव में लोगों ने 31 दिसम्बर, 2000 तक दुनिया ख़त्म हो जाने की बात पर विश्वास कर अपनी बकरियों को रोज काटना शुरू कर दिया था।
डर और अपराधबोध के उपकरणों के माध्यम से जनता के साथ खेल खेलना शासकों और धर्माचार्यों का पुराना आजमाया तरीक़ा रहा है। जब यह चरम सीमा तक पहुंच जाता है तो जनता पर सबसे ज्यादा चोट की जाती है। यहां तक कि कम्युनिस्ट और खुद को शातिर समझने वाले लोग भी इस खेल में शामिल हो कर इसे अंजाम देने लगते हैं। हम आपस में भावनात्मक तरीके से एक-दूसरे पर प्रहार करते हैं और हमारे अपराधबोध की भावना और डर से लाभ उठाया जाता है।

जब हम अपने तरह- तरह के डर पर नजर डालते हैं तो देखते हैं कि बहुत सारे डर हमें घेरे रहते हैं-- अस्वीकार किए जाने, असफल होने, बीमारी इत्यादि का डर और सबसे ज्यादा मौत का डर जो मौजूदा कोराना बीमारी के कारण हमारे अंदर समा गया है। यह सच है कि यह वायरस उच्च स्तर का संक्रामक है जो किसी वस्तु पर और मानव शरीर से बाहर 3-4 घंटे तक जीवित रहने की क्षमता रखता है। इसलिए यह जंगल की आग की तरह फैल सकता है। किन्तु इसकी मृत्यु दर सामान्य इनफ्लुएंजा से ज्यादा की नहीं है। इसके ज्यादातर शिकार वृद्ध और पहले से बीमार लोग हो रहे हैं। मृत्युदर अनुमानतः 3% से 0.5% तक है। लेकिन सरकारी प्रचार तंत्र और मीडिया ने इसे भयानक जानलेवा वायरस घोषित कर दिया है। इसलिए चारों तरफ भय व्याप्त हो गया है। मौत का डर, अपनों के खोने का डर, अनजाना डर।।। और इस भय ने रोजगार का खात्मा, कारोबार की हानि, बचत का नुक़सान और असुविधाओं को पैदा किया है। जिसने आने वाले दिनों में भुखमरी से मौत की आशंका को बढ़ाया और हमारी जीने की क्षमता को घटाया है।

दरअसल समूची विश्व अर्थवयवस्था पहले से ही गम्भीर संकट में चल रही है। जैसा कि हाल ही में मानस चक्रवर्ती ने कहा है कि - पिछले हफ़्ते इक्विटी ही नहीं बल्कि बॉन्ड व माल, यहां तक की सोने के भाव में भारी गिरावट आ गई है। यह गिरावट इतनी ज्यादा थी कि सिर्फ नकदी ही सुरक्षित है। वह भी सिर्फ अमरीकी डालर ही मुख्य रूप से सुरक्षित स्वर्ग हो गया है। जिसकी मांग बढ़ती गई है। अमरीका, यूरोप और अन्य विकसित अर्थवयवस्थाओं में ब्याजदर जीरो की तरफ लुढ़कता जा रहा। इस स्थिति में खरीददार के लिए सुरक्षित आखिरी रास्ता सिर्फ खरीदना ही होता है। सरकारों ने कारोबार उपभोक्ताओं को इस बढ़ते संकट से उबारने लिए दसियों खरब डॉलर खर्च करना मंजूर कर लिया है। (भारत में अभी ऐसी स्थिति नहीं आयी है।) 

लेकिन यहां वायरस के फैलाव को रोकने के एक मात्र उपाय के रूप में सामाजिक मेल-मिलाप को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्था को ठप कर दिया गया है। स्पेन, इटली और फिर दुनिया कि पांचवीं बड़ी अर्थवयवस्था कैल्फोर्निया को ठप्प कर दिया गया है। इससे विश्व अर्थव्यवस्था को बड़ा धक्का लगना ही है।

फार्चून के अनुसार दूसरी तिमाही में ज्यादातर देशों की जीडीपी दर भयानक रूप से (-8%) से (-15%) तक गिर गई है। गोल्डमेन सैच ने इसे और कम होने की बात (पानी सर से ऊपर जाने) कही है।

बैंक ने आज शोध नोट जारी किया है। जिसके अनुसार "अमरीकी अर्थव्यवस्था के अचानक ठप्प" हो जाने के कारण 2020 की दूसरी चौथाई में जीडीपी में 24% गिरावट की आशंका है।

पूरी दुनिया की सरकारों द्वारा जिस पैमाने पर लाकडाउन किया गया है, उससे अर्थवयवस्थाओं में सुधार की कोई उम्मीद नहीं बची है। पिछले छह महीने से चले आ रहे आर्थिक संकट के लिए, जिसका कोराना से कुछ लेना देना नहीं है, यह एक बहाना हो गया है। 1929 की महामंदी के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया गया था। परंतु मौजूदा संकट के लिए जिम्मेदारी को बकायदा व्यवस्थागत समस्या को वायरस समस्या की ओर इसे मोड़ दिया गया है। 

बहरहाल विश्व आज दो मुख्य समस्याओं का सामना कर रहा है। कोई नहीं कह सकता कि इनमें कौन ज्यादा जानलेवा है। पहली समस्या कोराना वायरस की है और दूसरी समस्या अर्थव्यवस्था की है। पहली समस्या दुनिया भर में फैल कर मौत का तांडव मचा सकती है। तो दूसरी से पूरी दुनिया को भुखमरी और बीमारी कि सबसे बुरी हालत में ला सकती है। पहली से हम अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा कर लड़ने की सोच सकतें हैं। लेकिन दूसरी पर हमारा नियंत्रण नहीं है।

प्रतिरोधक क्षमता का मनोविज्ञान

विज्ञान ने प्रतिरोधक क्षमता पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव (प्लसबो थ्योरी) को मान लिया है। इसके अनुसार मानव के दिमाग मे वह क्षमता होती है कि वह अपने शरीर को बीमारी से उबार ले। यदि उसे किसी दवा या उपचार पर भरोसा हो जाए, भले ही उसमे औषधीय गुण नहीं हो और वह चीनी की गोली मात्र हो। मेडिकल के विद्यार्थी अध्ययन में यह पाते हैं कि बहुत सी बीमारियों में से एक तिहाई का उपचार मनोवैज्ञानिक असर के चमत्कार से हो जाता है। बीमारियों के इलाज में मनोवैज्ञानिक प्रभाव अब सर्वमान्य हो चुका है। कोराना वायरस जैसी बीमारी जिसकी कोई दवा नहीं है से लड़ने में हमारी मजबूत प्रतिरोधक क्षमता केंद्रीय भूमिका निभा सकती है।

विज्ञान का नया क्षेत्र न्यूरोइम्युनोलॉजी है। जिसे आम भाषा में ऐसे कह सकतें हैं कि मस्तिष्क द्वारा स्नायु तंत्र पर नियंत्रण के जरिए प्रतिरोधक क्षमता मजबूत की का सकती है। यह सुस्वीकृत तथ्य है कि तनाव बढ़ाने वाला हार्मोन (कोर्टिसोल) हमारी प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देता है। इससे हम वायरस या बैक्टीरिया से लड़ाई में कमजोर पड़ जाते हैं। दूसरी तरफ़ सकारात्मक नजरिया और प्रसन्नता वाले हार्मोन(एंडोर्फिन, डोपामाइन, सेरोटोनिन) हमारी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं। अतः वायरस का डर और भयानक वातावरण का फैलना उससे लड़ने में हमारी प्रतिरोधक शक्ति को कमजोर कर सकता है।

अब यह भलीभांति मान लिया गया है कि आत्मविश्वास के बजाय डर के माहौल में गम्भीर बीमारी से लड़ने की क्षमता घट जाती है। कोराना जैसी बीमारी की कोई दवा नहीं है। प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करके ही इसका सामना किया जा सकता है। इसलिए प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी को रोकने की प्राथमिकता महत्वपूर्ण है। जो भी पद्धति अपनायी जाय वह तार्किक व प्रभावी होनी चाहिए। और हर तरीके से बीमारी का तार्किक मूल्यांकन कर डर व भयग्रस्तता के प्रचार का प्रभावी तरके से काट करनी चाहिए। भारतवासियों की गरीबी के कारण पहले से कमजोर प्रतिरोधक क्षमता को उनके आत्मविश्वास को बढ़ाकर मजबूत करने की जरूरत है। कम से कम भय का आतंक फैलाना बन्द करके उनमें वायरस के संक्रमण को मजबूत होने से बचाएं।

लगभग 70 वर्षीय कोबाड गांधी, सीपीआई माओवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य रहे हैं। कुछ ही समय पहले वे 8 साल जेल में रहने के बाद जमानत पर बाहर आए हैं।इस समय वे कैंसर समेत कई रोगों से लड़ रहे हैं। उपरोक्त लेख उन्होंने मूलतः अंग्रेज़ी में लिखा है। ब्लॉग ‘दस्तक नए समय की’ से साभार

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

कोविद-19 से लड़ाई मैदान में हमें खुद लड़नी पड़ेगी?


पिछले चार-पाँच दिनों से जिस तरह की रिपोर्टें आ रही हैं उन से लग रहा था कि भारत में 75-80 प्रतिशत कोरोना संक्रमित ऐसे हैं जिनमें कोई लक्षण ही नहीं नजर आ रहे हैं। वे समाज में खुले घूम रहे हैं और निश्चित ही अनेक को संक्रमित भी कर रहे हैं। इस पर कल ही लिखना चाहता था, पर अधिकारिक निष्कर्ष के बिना इस लेख को ले कर मेरी कुटाई भी हो सकती थी। लेकिन कल एमआईसीआर ने भी इस तथ्य की पुष्टि कर दी है।

इस स्थिति में यदि हम देश को कोविद-19 मुक्त करना चाहें तो देश के हर निवासी का हमें टेस्ट करना पड़ेगा वह भी एक बार नहीं कम से कम कुछ कुछ अन्तराल से तीन बार। फिर उन्हें क्वेरंटाइन कर के उनके संक्रमण को समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी और उन्हें जीवित बनाए रखने के प्रयास भी जारी रखने होेगे। देश को सारी दुनिया से तब तक काट कर रखना होगा जब तक कि दुनिया कोविद-19 से मुक्त न हो जाए। जो मैं कह रहा हूँ, वह भारत के किसी एक नगर के लिए भी संभव नहीं है। राज्य और देश तो बहुत दूर की बातें हैं। फिर?

हमने देश को लॉकडाउन करके 40 करोड़ रोज मजदूर आबादी को संकट में डाल दिया है। उन्हें उनके घरों तक या जहाँ उन्हें काम उपलब्ध हो सके वहाँ तक पहुँचाने में हम असमर्थ हैं। हमने उन्हें परिस्थितियों की दया पर छोड़ दिया है। हम बाहर पढ़ रहे बच्चों को लाने मे राज्यों की मशीनरी झोंक चुके हैं। पर देश का निर्माण करने और उसे चलाने वाले मजूरों के लिए हमारे पास कुछ नहीं है।

लॉकडाउन के एक माह में हम बेहाल हो चुके हैं। हम अधिक दिनों तक इस बीमारी का बोझा नहीं ढो सकते। सरकारें दिवालिया होने की कगार पर हैं। हम रिजर्व बैंक के रिजर्व को खर्च कर रहे हैं। उसका भी अधिक लाभ जनता को नहीं, वित्तीय पूंजी के रक्षक और पूंजीपतियों की सेवा करने वाले बैंकों को मिल रहा है।

लॉकडाउन  इस महामारी का इलाज नहीं है, न ह ो सकता है।  इस लॉकडाउन ने हमें रुक कर सोचने का मौका दिया है।  फिलहाल हमें सामाजिक सामञ्जस्य के साथ भौतिक दूरी (सामाजिक दूरी नहीं)  का अभ्यास करना है,  मास्क लगाने, नियमित रूप से हाथ साफ करने   तथा दूसरे साफ सफाई के तरीके  अपनाने और उन्हें आदत बना लेने  की जरूरत है। यही इस महामारी का इलाज हैं। 

आने वाला वक्त मुझे लगता है ऐसा हो सकता है बीमारी और मौत का डर छोड़ कर हमें अपनी वास्तविक गति में आने को बाध्य होना पड़ेगा। वही इस का इलाज भी होगा। हमें कोविद-19 से  लड़ाई हमें  घरों में छुप कर नहीं बल्कि मैदान में आ कर  खुद लड़नी होगी। लड़ाई में जरूर कुछ हजार या लाख खेत रह सकते हैं। तो वे तो अब भी खेत रह रहे हैं। पर अभी हमने सब कुछ दाँव पर लगा रखा है। तब शायद सब कुछ दाँव पर नहीं होगा। क्या होगा? यह तो भविष्य ही बता सकता है।


गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

कोविद-19 महामारी और भारत-7


मजदूरों के पलायन की वजह क्या थी?

भारत के प्रधानमंत्री ने 24 मार्च 2020 की शाम 8 बजे टीवी-रेडियो से जीवित प्रसारण में सूचना दी कि कोविद-19 महामारी से बचाव के लिए आधी रात अर्थात 25 मार्च शुरु होते ही देश भर में 21 दिनों का लॉकडाउन आरंभ हो जाएगा। इस के पहले उन्होंने 19 मार्च की रात 8 बजे 22 मार्च की सुबह 7 से रात 9 बजे तक जनता कर्फ्यू रखे जाने का आव्हान किया था। जिसके दौरान शाम 5 बजे थाली, ताली, घण्टे बजा कर कोविद-19 से बचाव में लगे स्वास्थ्य और पुलिसकर्मियों का आभार व्यक्त करने का भी आव्हान किया था। 22 मार्च की कवायद एक तरह की मोक-ड्रिल थी जो इसलिए कराई गयी थी कि भौतिक-दूरी (कथित सोशल डिस्टेंस) बनाए रखने को आदत बनाने का आरंभ किया जाए।
22 मार्च की यह कवायद शाम पाँच बजे तक ठीक चली। लेकिन शाम पाँच बजते ही वह भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के संसद में विश्वास मत जीत लेने के जश्न में बदल गयी। उन के विश्वसनीय समर्थकों यहाँ तक कि उनकी पार्टी के जाने-माने नेताओँ और अनेक सरकारी अफसरों ने भौतिक-दूरी की इस कवायद की बैंड बजा दी। ये लोग जलूस के रूप में सड़क पर निकल आए। थालियाँ- तालियाँ और घंटे-झालरें बजाते हुए मोदी जी की जयजयकार करने लगे। मोदी जी ने आभार प्रकट करने के इस घन्टा-नाद का समय शाम 5 बजे का ही क्यों रखा यह आज तक समझ नहीं आया।
हम इसे समझने की कोशिश करें तो हमें बन्द के आवाहनों के ताजा इतिहास में जाना पड़ेगा। मेरे 65 वर्ष के जीवन में मैंने उत्तर भारत में जितने नगर, प्रान्त या भारत बंद देखे हैं, उनमें से अधिकांश भारतीय जनता पार्टी, पूर्व जनसंघ या उसके बिरादर संगठनों के आव्हानों पर आयोजित हुए हैं। ये बन्द दिन भर के लिए होते हैं, और ज्यादातर तोड़-फोड़, मार-पीट और संपत्ति को हानि पहुँचने के भय से पूरे या पौने सफल भी हो जाते हैं। लेकिन शाम चार बजने के बाद धीरे-धीरे चहल-पहल बढ़ती है और शाम 5 बजते बजते बाजार आबाद हो जाते हैं। उसी समय आव्हान करने वाले कार्यकर्ता बंद की सफलता की आदिम प्रसन्नता अभिव्यक्त करने के लिए छोटे-मोटे जलूस निकालने लगते हैं। यह व्यवहार इन दक्षिणपंथी संगठनों की एक स्थायी आदत बन चुका है। इस आदत के चलते मुझे पहले ही लग रहा था कि ऐसा कुछ होने वाला है, और यह हुआ भी। भारतीय मीडिया ने जिसका अधिकांश पूरी तरह प्रधानमंत्री के समक्ष नतमस्तक है, जनता कर्फ्यू की सफलता को प्रधानमंत्री की जीत के रूप में अभिव्यक्त किया और विजय के विद्रूप प्रदर्शनों को छोटी-मोटी गलती बताया। बाद में प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के इन नेताओँ और समर्थकों के व्यवहार पर अपने ट्वीट में या अन्यथा किसी भी प्रकार कोई आपत्ति या नाराजगी व्यक्त नहीं की। इससे यही समझा जा सकता है कि वे इससे प्रसन्न थे और ऐसा होते देखना चाहते थे। मेरे जैसे लोगों ने और मीडिया के उंगलियों पर गिने जाने वाली इकाइयों ने इस पर आश्चर्य प्रकट किया भी तो वह नगाड़ों के शोर में तूती की आवाज सिद्ध हुई और इसे खिसियाना भी कहा गया।
जब 24 मार्च की शाम देश को लॉक-डाउन करने के आव्हान का प्रसारण हुआ तो लॉक-डाउन शुरू होने के पहले लोगों के पास केवल 4 घंटों का समय था। लॉक-डाउन में अत्यावश्यक सेवाओँ के सिवा सभी कुछ बन्द हो जाना था। सरकारी कार्यालय, बाजार, दुकानें, कारखाने, निर्माण कार्य वगैरा-वगैरा। इस घोषणा के बाद से ही मध्यवर्ग बाजारों में निकल पड़ा कि जैसे-तैसे महीने भर घर पर रहने का राशन-पानी इकट्ठा कर ले। बाजारों में बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गई और देखते ही देखते दुकानें सामानों से खाली नजर आने लगीं। यह तो मध्यवर्ग था जो इतना कुछ खरीद भी सकता था। लेकिन मजदूर वर्ग की रोज-मजूरी करने वाली आबादी के सामने भीषण संकट खड़ा हो गया था। अगले दिन से उन्हें कई दिनों तक रोजगार नहीं मिलने वाला था। यह महीने के बीच का समय था। रोज-मजूरों के जेबें लगभग खाली थीं। यदि वे खरीददारी के लिए निकलते भी तो अधिक से अधिक सप्ताह भर का राशन ही खऱीद सकते थे।
एक आकलन के अनुसार देश में लगभग 45 करोड़ लोग रोज-मजदूरी पर निर्भर हैं। यह भारत की कुल आबादी का एक तिहाई हिस्सा है। जीवन के उनके अपने अनुभव हैं। मैंने खुद देखा है, अनेक बार ठेकेदार एक दो सप्ताह या महीने भर काम कराने के बाद उनकी मजदूरी देने से मना कर देते हैं। देश के किसी राज्य में ऐसी व्यवस्था नहीं कि उनकी बकाया मजदूरी तत्काल या महीने-दो महीने तो क्या साल भर में भी दिला सके। कानूनी व्यवस्था ऐसी है कि बकाया मजदूरी वसूलने में एडियाँ घिस जाती हैं, वकीलों को फीस देनी पड़ती है और बरस लग जाते हैं। फिर भी मजदूरी नहीं मिलती। अब रोज-मजदूर बकाया मजूदूरी के लिए बरसों चलने वाली लड़ाई लड़े या जहाँ उसे मजदूरी मिलती हो वहाँ जा कर मजदूरी करे। अधिकतर मामलों में वह सरकारी दफ्तरों में शिकायत करने और उनके चक्कर काट-काट कर थक जाने के बाद मजदूरी को डूबी मान कर अपना रास्ता देखता है।
लॉक-डाउन की घोषणा के साथ ही आबादी के इस हिस्से पर भीषण गाज गिर पड़ी थी। अपने अनुभव से वह जान चुका था कि 21 दिन तो आरंभ है। पड़ौसी देश चीन और दूसरे देशों से आ रही खबरें भी उनके कानों तक पहुँच ही रही थीं। इन से वह समझ गया था कि यह लॉक-डाउन महीनों चल सकता है। इसके समाप्त हो जाने पर भी गतिविधियाँ कई चरणों में आरंभ होंगी। इस कारण कम से कम अगले छह माह संकट में गुजरने वाले हैं। नगरों और महानगरों में जीना दूभर हो जाएगा। वहाँ काम मिलने में समय लगेगा। 
रोज-मजूरों के इस वर्ग एक हिस्सा ऐसा है जिनके परिवारों के पास कुछ न कुछ खेती की जमीनें हैं और परिवार के अधिकांश सदस्य मजदूरी के लिए नगरों-महानगरों को निकल जाते हैं। जब कि कुछ गाँव में बने रहते हैं जो उस नाम मात्र की पारिवारिक स्वामित्व की जमीन पर तथा ग्रामीण मजदूरी पर निर्भर करते हैं। गाँव में उनके पास रहने के लिए स्थान की कमी नहीं। कम से कम उसके लिए किराया नहीं देना पड़ता। रोज-मजूरों का दूसरा हिस्सा पूरी तरह भू-विहीन है। उसे भी पता था कि इस समय जब शहर में काम बन्द हो गया है, तब गाँवो में फसलें खड़ी हैं और इस बार यातायात के साधन बन्द हो जाने से फसलों की कटाई से ले कर उसे तैयार करने के लिए बाहर का मजदूर नहीं आएगा। लगभग हर गाँव में इस समय कम से कम 15 से 35 दिनों की मजदूरी उसे अवश्य ही मिल जाएगी, जो कुछ नकद होगी और कुछ अनाज के रूप में। इस से उनकी प्राण रक्षा हो सकेगी।
निर्माण मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए 1996 में बनाए गए कानून के अंतर्गत जरूर कुछ उपाय पिछली मनमोहन सरकार के दौरान आरंभ किए गए थे। इस योजना में पंजीकृत मजदूरों के लिए तो कुछ सुविधाएँ मिलने की संभावना थी लेकिन अन्य मजदूरों के लिए किसी तरह की कोई सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। ऐसी सुविधा जिस से वे कुछ दिनों या महीनों के संकट में कुछ मदद की आशा कर सकें। ऐसे में उनके पास एक ही मार्ग था कि वे अपने घरों की ओर निकल पड़ें। इन रोज-मजूरों को अपने जीवन का तात्कालिक आश्रय अपने-अपने गाँवों में दिखाई पड़ा। उसे जैसे समझ पड़ा वह उसी रात, या अगले 1-2 दिनों में जैसे बन पड़ा गाँव के लिए निकल पड़ा। रोज-मजूरों के पास सामाजिक सुरक्षा का यही अभाव देश व्यापी नगर से गाँव की ओर पलायन का मुख्य कारण बना। जिस से आजादी के समय हुए देश के बँटवारे के समय हुए पलायन के बाद का सब से बड़ा पलायन देश को देखने को मिला। बहुत हृदय विदारक दृश्य देखने को मिले। इस पलायन से कोविद-19 को देश भर में फैल जाने का खतरा बढ़ गया।
इस तरह हम देखते हैं कि परिस्थितियों का सम्यक मूल्यांकन किए बिना जल्दबाजी में और बिना समय तथा अवसर प्रदान किए किया गया लॉक-डाउन ही इस वृहत-पलायन का आधार बना। यह बहुत जरूरी था लेकिन इस की तैयारी पहले से की जानी चाहिए थी।                    .... (क्रमशः)
अगली कड़ी में पढ़ें- लॉक-डाउन के बाद भी संक्रमण कैसे फैला?

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

कोविद-19 महामारी और भारत-6


छँटनी की परिभाषा बदलने से जन्मी श्रमिक-कर्मचारियों की नई श्रेणी

देश के श्रम न्यायालयों और औद्योगिक न्यायाधिकरणों में जो प्रकरण लंबित हैं, मेरे अनुमान के अनुसार उनमें से 80 प्रतिशत से अधिक केवल छंटनी के मामले हैं। 1984 में छंटनी की परिभाषा में परिवर्तन के पहले तक उसकी सामान्य व्याख्या यह थी कि नियोजक द्वारा किसी भी श्रमिक की प्रत्येक सेवा समाप्ति चाहे वह किसी भी कारण से की गयी हो छँटनी है। केवल कुछ प्रकार की सेवा समाप्तियाँ थी जो उस परिभाषा के बाहर थीं। छँटनी की परिभाषा से बाहर की गई सेवा समाप्तियों में, श्रमिक द्वारा स्वेच्छा से ली गयी सेवानिवृत्ति, सेवा संविदा के अनुसार निर्धारित उम्र हो जाने के कारण हुई सेवानिवृत्ति तथा लगातार बीमारी के कारण की गयी सेवा समाप्तियाँ थीं। 1984 में इनमें नियोजन के कॉन्ट्रेक्ट में वर्णित रीति से की गयी सेवा समाप्ति तथा इस कॉन्ट्रेक्ट का नवीनीकरण  न होने पर कॉन्ट्रेक्ट की अवधि की समाप्ति पर हुई सेवा समाप्ति को भी इस में सम्मिलित कर दिया गया।
इस संशोधन ने श्रमिकों की एक नई श्रेणी को जन्म दिया। यह तो सभी जानते हैं कि देश में बेरोजगारी की दर अत्यधिक है। जब बेरोजगारी की दर अधिक होती तो नौकरी चाहने वालों की नियोजक के साथ होने वाले नियोजन के कान्ट्र्रेक्ट में अपनी शर्तें शामिल करने की शक्ति समाप्त हो जाती है। किसी भी काम चाहने वाले बेरोजगार व्यक्ति को नियोजक की शर्तों पर ही काम करना स्वीकार करना पड़ता है।  इस तरह इस संशोधन ने श्रमिकों के बेपानाह शोषण की छूट पूंजीपतियों को दे दी। और केवल पूंजीपति ही क्यों केन्द्र और राज्य सरकारें, सरकारी संस्थान और सार्वजनिक संस्थान भी उस छूट का लाभ उठाने में पीछे नहीं रहे।
इस संशोधन के बाद से नियोजक अब तमाम कामों के लिए श्रमिक कर्मचारी नियोजित करने के सम ही उसके नियुक्ति पत्र में यह शर्त रखने लगे कि यह नियुक्ति 3 या 6 माह के लिए अथवा 1, 2, या 3 वर्ष के लिए है और यह अवधि समाप्त होने पर स्वयमेव समाप्त हो जाएगी। इस तरह के श्रमिक कर्मचारियों को संविदा कर्मचारी या संविदा श्रमिक कहा गया। धीरे-धीरे यह शब्द प्रचलित हो गया और उनकी अलग श्रेणी बन गयी। अब यह श्रेणी आम है। इन संविदा कर्मियों को एक निश्चित वेतन दिया जाता है, आठ घण्टों के स्थान पर कई-कई घण्टे काम लिया जाता है, साप्ताहिक अवकाश के दिनों में भी काम लिया जाता है। उनसे निर्धारित कार्य जिसके लिए वे नियोजित किए गए होते हैं उन कामों के अतिरिक्त अनेक प्रकार काम लिए जाते हैं। उनके अधिकारी उन से घरों के काम भी खूब कराते हैं।
इस तरह इस संशोधन ने ठेकेदार श्रमिकों के बाद सबसे अधिक शोषित श्रमिकों / कर्मचारियों की नई श्रेणी खड़ी कर दी। आज तमाम सरकारी अर्ध-सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक उद्योगों में इस तरह के कर्मचारियों की भरमार है। ये कर्मचारी भर्ती नियमो के भी परे हैं। समय-समय पर सरकार के मंत्री यह घोषणा करते रहते हैं कि संविदा कर्मचारियों को स्थायी नौकरी देने पर विचार किया जाएगा। ये घोषणाएँ वह चारा है जो तांगे वाले ने एक बाँस पर बान्ध कर घोड़े के आगे उसकी पहुँच से दूर लटका रखा है। घोड़ा दौड़ता है यह सोच कर कि जल्दी ही उसे चारा खाने को मिलेगा। लेकिन जितना वह दौड़ता है चारा आगे खिसकता जाता है और कभी भी उसे नहीं मिलता।  घोड़े को जितनी तेज भूख लगती है वह उतनी ही तेज भागता है। तांगे का मालिक घोड़े को कभी भरपेट चारा नहीं देता। क्यों कि भरपेट खाना मिल जाने पर तो चारे से अरूचि हो जाएगी और वह सुस्त चलने लगेगा। इस रूपक में ये संविदा कर्मचारी और श्रमिक घोड़े हैं।
हालाँकि इस लॉकडाउन में हुए मजदूरों के पलायन में ये संविदा श्रमिक सम्मिलित नहीं हैं। लेकिन औद्योगिक विवाद अधिनियम में इस संशोधन ने भारत में श्रम-बाजार के परिदृश्य को एकदम बदल दिया है। इस संशोधन के पहले जहाँ पूंजीपति और सरकारें खुद कानूनों से बंधी महसूस करती हैं। अब पूरी तरह आजादी की साँस लेने लगी हैं। उन के हिस्से में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ गयी है। वहीं श्रमजीवी जनता के हिस्से में ऑक्सीजन कम हो गयी है और उस का दम घुट रहा है।                                            .... (क्रमशः)
अगली कड़ी में पढ़ें- इतने भारी पलायन की वजह क्या है?

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

कोविद-19 महामारी और भारत-5

श्रम कानून में परिवर्तन से मजदूर वर्ग की स्थिति कैसे बदतर हुई?

फरवरी 1978 में सुप्रीमकोर्ट के 7 न्यायाधीशों की वृहत पीठ ने बैंगलोर वाटर सप्लाई एण्ड सीवरेज बोर्ड व अन्य बनाम आर. राजप्पा व अन्य के मुकदमे में निर्णय पारित कर यह स्पष्ट कर दिया था कि किस तरह के संस्थानों को उद्योग कहा जाएगा। इस निर्णय से बहुत बड़ी संख्या में संस्थान उद्योग की श्रेणी में आ गए थे और उनके कर्मचारियों को औद्योगिक विवाद अधिनयिम के अंतर्गत अपने विवाद उठाने का अधिकार मिल गया था। इससे देश भर के पूंजीपतियों को बहुत परेशानी हो गयी। तब केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार थी जो अपने ही अन्तर्विरोधों के कारण अस्थिर थी। 1979 में संसद भंग हो गयी और मध्यावधि चुनाव हुए। जिनमें कांग्रेस फिर से शासन में आ गयी और श्रीमती इन्दिरा गांधी फिर से प्रधान मंत्री चुनी गयी।  पूंजीपति केन्द्र सरकार पर लगातार दबाव बनाने लगे कि ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा को बदला जाए तथा जो संस्थान बैंगलोर वाटर सप्लाई केस के निर्णय के बाद उद्योग की श्रेणी में आ गए थे उन्हें फिर से इस से बाहर किया जाए। उसी साल सितम्बर माह में सुप्रीम कोर्ट ने अन्य केस एक्सल वियर व अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य के केस में यह निर्धारित कर दिया गया था पूंजीपतियों पर उद्योग बंद करने के के पूर्व सरकार से अनुमति प्राप्त करने की पाबंदी लगाने का 1976 में पारित किया गया संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया था और अब उन्हें उद्योगबंदी करने के लिए किसी तरह की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं रही थी। इस निर्णय से मजदूर संगठनों में रोष था। उद्योगबंदी पर रोक के कानून को बनाए रखने के लिए कानून में संशोधन चाहते थे। इस तरह फिर से औद्योगिक विवाद अधिनियम में संशोधन किया जाना आवश्यक समझा जाने लगा था।

तब केंद्र सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम में संशोधन हेतु बिल प्रस्तुत किया जो 1982 में पारित हो गया। इस संशोधन द्वारा ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा को बदल दिया गया था। बड़े उद्योगों में विवादों को उद्योग में ही हल करने के लिए एक ग्रीवेंस कमेटी का प्रावधान किया था। सरकार जानती थी कि इस संशोधन कानून का विरोध होगा। उस विरोध को दबाने के लिए इस संशोधन में औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए समय सीमा निर्धारित कर दी थी। (जो कभी भी व्यवहारिक सिद्ध नहीं हुई) किसी भी मजदूर की मृत्यु के कारण न्यायालय में लम्बित कोई भी विवाद समाप्त नहीं होने की व्यवस्था की गयी थी। सेवा से हटाए गए मजदूर को पुनः सेवा में लिए जाने का निर्णय श्रम न्यायालय से होने तथा आगे ऊंची अदालत में उस निर्णय को चुनौती दिए जाने पर मजदूर को अन्तिम प्राप्त वेतन पाने का अधिकारी बना दिया गया। उद्योग बंदी और ले-ऑफ को कुछ हद तक रोके जाने की व्यवस्था की गयी। इसके साथ ही अनुचित श्रम आचरण को परिभाषित करने के लिए कुछ कृत्यों की एक सूची कानून में जोड़ी गयी और उसे दंडनीय अपराध बना दिया गया था। लेकिन मजदूरों के पक्ष में दिखाई देने वाले इन प्रावधानों में इतने छेद रखे गए थे कि वे व्यवहारिक सिद्ध नहीं हुए।

मजदूर यूनियनों ने इस संशोधन से ‘उद्योग’ की परिभाषा को बदल देने का जबरर्दस्त विरोध किया। जिसके कारण यह पूरा संशोधन अधिनियम 1984 तक लागू नहीं किया जा सका। 1984 में एक और बिल पारित हुआ जिसके द्वारा छंटनी की परिभाषा में परिवर्तन किया गया। 1982 और 1984 के संशोधन अगस्त 1984 में प्रभावी कर दिए गए। मजदूर यूनियनों के विरोध के कारण ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा बदलने के प्रावधान को कभी लागू नहीं किया जा सका। लेकिन उसे कभी निरस्त भी नहीं किया गया, वह आज भी अप्रभावी प्रावधान के रूप में कानून की किताब में मौजूद है।

इन दोनों संशोधनों के प्रभावी होने के बाद आज तक का अनुभव रहा है कि श्रमिक की मृत्यु हो जाने पर यदि उसका कोई विधिक प्रतिनिधि रेकार्ड पर नहीं लाया जाता है तो वह विवाद समाप्त तो नहीं होता, लेकिन उस विवाद में श्रमिक के विधिक प्रतिनिधियों को न्यायालय से कोई राहत नहीं मिलती जिससे वह लगभग निष्प्रभावी सिद्ध हुआ है।  औद्योगिक विवादों को तीन माह और एक वर्ष में निपटारा किए जाने का जो निर्देशक प्रावधान किया गया था वह पूरी तरह बेकार सिद्ध हुआ क्योंकि इसे प्रभावी बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में श्रम अदालतें खोली जानी थीं। लेकिन सरकारों ने ऐसा नहीं किया। नतीजे में अभी भी 20 से 30 वर्ष से अधिक पुराने मुकदमे लंबित हैं। अनेक विवादों में मुकदमों के चलते श्रमिक की मृत्यु ही हो जाती है, या सेवा निवृत्ति की आयु ही व्यतीत हो जाती है। श्रमिक को सेवा में पुनर्स्थापित करने का निर्णय होने पर उसे नियोजक द्वारा चुनौती देने पर श्रमिक द्वारा जब तक उच्च न्यायालय को आवेदन नहीं दिया जाता तब तक उसे न तो सेवा में लिया जाता है और न ही उस का अंतिम वेतन आरंभ किया जाता है। उच्च न्यायालयों में चुनौती देने वाली अधिकांश याचिकाएँ दस वर्ष से भी अधिक समय से लंबित पड़ी हैं। अनुचित श्रम आचरण के लिए किसी  नियोजक को दंडित करने का समाचार कभी नहीं मिला। उसके अभियोजन की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि दंडित कराने के लिए आवेदन करने वाला  श्रमिक थक कर ही हार जाता है। इस तरह समय ने यह सिद्ध किया कि श्रमिकों के हक में दिखाई देने वाले कानून सिर्फ दिखावे के साबित हुए।

उद्योग को बंद करने के लिए सरकार की पूर्व अनुमति प्राप्त करने का प्रावधान भी बेकार सिद्ध हुआ। पूंजीपतियों ने नई तरकीब यह निकाली कि वे अपनी कंपनी की बैलेंस शीट को दो-चार साल तक घाटे में दिखा कर उसे बीमार घोषित कराने और उद्योग के पुनर्संचालन के लिए सहायता प्राप्त करने केन्द्र सरकार द्वारा अलग से स्थापित बोर्ड फॉर इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंशियल रिकंस्ट्रक्शन  (बीआईएफआर) के पास आवेदन करने लगे। बोर्ड से कंपनी को बीमार घोषित करवा कर उद्योग का संचालन बिना किसी पूर्वानुमति के बन्द करने लगे। एक कंपनी के मामले में तो यह भी हुआ कि सरकार ने उद्योग बंदी की अनुमति प्राप्त करने के आवेदन को निर्धारित अवधि के अन्तिम दिन अनुमति देने से इन्कार करने का आदेश पारित किया। लेकिन आदेश की प्रति समय पर उद्योग के प्रबंधक को श्रम विभाग द्वारा नहीं पहुँचाए जाने के कारण प्रबंधक उद्योग बंद कर चलते बने। श्रमिकों को बकाया वेतन और मुआवजा प्राप्त करने के लिए भी मुकदमे लड़ने पड़े और अनेक तो कभी प्राप्त ही नहीं कर सके। 

छंटनी की परिभाषा में जो मामूली परिवर्तन 1984 के संशोधन से किए गए थे वे मजदूर वर्ग के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध हुए। इस संशोधन ने बिना किसी कानूनी अधिकार वाले श्रमिक-कर्मचारियों की एक नई श्रेणी खड़ी कर दी।  जिसके सिर पर हमेशा नौकरी जाने की तलवार लटकती रहती है।                                        .... (क्रमशः)



अगली कड़ी में पढ़ें- 1984 के संशोधन से श्रमिक कर्मचारियों की कौन सी नई श्रेणी खड़ी हुई?

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

कोविद-19 महामारी और भारत-4


नए कानूनों ने मजदूर वर्ग को कमजोर और असहाय बनाया

केन्द्र और देश के अधिकांश राज्यों में श्रीमती इन्दिरागांधी की पार्टी कांग्रेस (इ) की सरकारें थी। तभी ठेकेदार मजदूर (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम-1970 संसद में पारित हुआ। इसका उद्देश्य बताया गया था कि ठेकेदार मजदूरों को कुछ सुविधाएँ प्रदान की जाएंगी और जिन उद्योगों को जिन ट्रेड्स में उचित समझा जाएगा ठेकेदार के माध्यम से काम कराया जाना विधि से वर्जित किया जाएगा। किस उद्योग के किस ट्रेड में ठेकेदारी प्रथा का उन्मूलन किया जाएगा यह पूरी तरह केन्द्र या राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में रखा गया। इस कानून के पारित होने से पहले अक्सर मजदूरों के संगठन न्यायालय में औद्योगक विवाद उठाते थे और ठेकेदारी प्रथा को हटाने का आदेश औद्योगिक न्यायाधिकरण या श्रम न्यायालय से प्राप्त कर सकते थे। इस से उद्योगपतियों को बहुत परेशानी थी। उन्हें अपने यहाँ नियमित होने वाले कामों के लिए नियमित मजदूर नियोजित करने पड़ते थे जिन्हें ठेकेदार मजदूरों से लगभग दुगना वेतन व लाभ देना पड़ता था और उन का मुनाफा कम होता था। इस कानून के अंतर्गत अब मजदूर अदालत नहीं जा सकते थे। अब ठेकेदारी प्रथा का उन्मूलन पूरी तरह सरकार की मर्जी पर निर्भर था। यह तो सब जानते हैं कि जो सरकारें उद्योगपतियों के धन-बल पर शासन में आयी हों वे उनके हितों की अनदेखी नहीं कर सकतीं थी।

इस कानून के प्रभावी होने के पहले तक उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को यह भय रहता था कि नियमित कामों के लिए ठेकेदार मजदूरों से काम लिया गया तो अदालत उन मजदूरों को उद्योग का मजदूर घोषित कर के उन्हें उद्योग के मजदूरों के समान लाभ दिलाने का आदेश दे देगी। इस कानून के पारित होने का नतीजा यह हुआ कि पूंजीपति बेधड़क ठेकेदार मजदूरों से नियमित काम भी करवाने लगे। कारखानों और उद्योगों में नियमित मजदूरों की भर्ती कम होने लगी और वे काम ठेकेदारों के मजदूरों से कराए जाने लगे। धीरे-धीरे उद्योगों में नियमित मजदूरों की संख्या जो पहले 70-80 प्रतिशत होती थी अब 20-30 प्रतिशत तक रह गयी। ठेकेदार मजदूरों की संख्या बढ़ कर 70-80 प्रतिशत तक चली गयी।

इसके पूंजीपतियों को अनेक लाभ मिले। अब ठेकेदार मजदूरों पर नियमित मजदूरों की बनिस्पत आधा ही खर्च करना पड़ता था। ठेकेदार मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी देकर काम चलाया जाने लगा। इस से पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ गया। इस नए कानून ने जो सुविधाएँ देने का प्रावधान किया था वे सुविधाएँ भी उन्हें नहीं मिलीं। क्योंकि सुविधाएँ दी जा रही हैं या नहीं इस बात का निरीक्षण तो सरकारी निरीक्षकों को करना था।  इन निरीक्षकों को मैनेज करना तो पूंजीपतियों के बाएँ हाथ का खेल था। यदि मजदूर इन सुविधाओं को देने की मांग करते या ट्रेड यूनियन के सदस्य बनते या ट्रेड यूनियन के माध्यम से अपनी आवाज उठाते तो उन्हें नौकरी से हटाना बहुत आसान हो गया। पूंजीपति ठेकेदार का ठेका खत्म कर देते। जिससे सभी मजदूरों की नौकरियाँ चली जातीं। वे किसी दूसरे ठेकेदार के माध्यम से या उसी ठेकेदार के किसी रिश्तेदार के नाम से नया ठेका दे देते। नए मजदूरों को काम पर रख लिया जाता। यह देश में बेरोजगारों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण आसान था। इससे ठेकेदार मजदूरों को यह समझ आ गया कि वे अपने हकों की मांग नहीं कर सकते।

इसका दूसरा असर यह हुआ कि जैसे-जैसे उद्योगों में नियमित मजदूर कम होते गए वैसे-वैसे उनकी संगठन बना कर अपने हकों के लिए लड़ने की क्षमता भी कम होती गयी। इस तरह देश के मजदूर आंदोलन को धीरे-धीरे कमजोर बनाया गया। अनेक उद्योगों में समय-समय पर ठेकेदार मजदूरों की लड़ाई नियमित मजदूरों की यूनियनों ने लड़ने का प्रयत्न किया। लेकिन ऐसे आंदोलन कुचल दिए गए। ठेकेदार मजदूर बेकार हो गए। यहाँ तक कि नियमित मजदूरों के नेताओं को भी अपनी नोकरियाँ खोनी पड़ीं। धीरे-धीरे नियमित मजदूरों की मजबूत यूनियने ठेकेदार मजदूरों की लड़ाई लड़ने से कतराने लगीं। पूंजीपतियों और उनके प्रचारक मध्यवर्ग और प्रेस ने ऐसी धारणाएँ पैदा की कि मजदूर नेता आंदोलन के माध्यम से अपने हित साधते हैं और ठेकेदार मजदूरों को उन की नौकरियाँ खोनी पड़ती हैं। इस तरह पूंजीपतियों ने मजदूर वर्ग के ईमानदार नेताओँ को बेईमान प्रचारित कर उन्हें मजदूर वर्ग से दूर करने में सफलता प्राप्त कर ली। दूसरी और पूंजीपति वर्ग ने अपने समर्थक नेताओं की यूनियनें खड़ी कीं। जिन का उद्देश्य मजदूरों को उनके हकों के लिए लड़ने से रोकना और मजदूरों के वोट पूंजीपति वर्ग के राजनैतिक दलों के पक्ष में मोड़ने का काम करना था। पूंजीपति वर्ग अपने इस उद्देश्य में एक हद तक सफल रहा।

लेकिन देश की राजनैतिक परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि कांग्रेस (इ) को 1977 में सत्ता से बाहर हौना पड़ा और जनता पार्टी सत्ता में आ गयी जिसमें दक्षिणपंथी हिन्दूवादी दल जनसंघ भी विलीन हो गया था। वामपंथी इसी कारण इस सरकार से बाहर रहे। लेकिन जब तक जनता पार्टी शासन में रही तब तक पूंजीपति अपना प्रभाव नहीं बना सके और मजदूर वर्ग के दमन का बड़ा अवसर प्राप्त नहीं हुआ। इस दौर में मजदूर वर्ग के आंदोलनों का एक बड़ा उभार देखा गया। लेकिन जल्दी ही जनता पार्टी अपने अंतर्विरोध से टूट गयी और पुनः इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में केन्द्र में सरकार बनी। कांग्रेस की इस नयी सरकार ने पुनः श्रम कानूनों में 1982 तथा 1984 में महीन परिवर्तन किए। कहा यह गया कि इस का लाभ मजदूर वर्ग को मिलेगा। लेकिन हुआ इस के उलट। मजदूर वर्ग की हालत श्रम कानूनों में इन परिवर्तनो से और बदतर हुई।                         ...  (क्रमशः)

अगली कड़ी में पढ़ें- 1984 में श्रम कानून में परिवर्तन से मजदूर वर्ग की स्थिति कैसे बदतर हुई?

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

कोविद-19 महामारी और भारत-3

संगठित मजदूरों के क्षेत्र को न्यूनतम बनाए रखने की साजिश

इस विमर्श की कल की कड़ी में मैं ने कहा था कि कोविद-19 महामारी को फैलने से रोकने के उपायों की घोषणा मात्र से, लोगों को विशेष रूप से देश से औद्योगिक केन्द्रों से मजदूरों और उनके परिवारों द्वारा उनके गाँवों की ओर पलायन से, महामारी के तैजी से फैलने के जो अवसर पैदा हो गए, उसके पीछे को कारणों की पड़ताल करना और जानना अत्यन्त आवश्यक है। यदि इन तथ्यों को न जाना गया तो हमें समझ लेना चाहिए कि हम परमाणु बम से भी खतरनाक बम पर बैठे हैं जो कभी भी फट पड़ सकता है।  
मैंने अपने पैतृक नगर बाराँ में जो एक उपजिला मुख्यालय था 1978 में वकालत शुरू की थी। साल भर बाद 1979 के सितम्बर माह में ही मैं राजस्थान के औद्योगिक शहर कोटा में आ गया था। यह नगर जिला मुख्यालय के साथ-साथ संभाग मुख्यालय भी था। यहाँ श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण स्थित था। जिस में संभाग के चारों जिलों के ओद्योगिक विवादो की सुनवाई की होती थी।  मैं ने वकालत के लिए श्रम-विवादों का क्षेत्र चुना जो मेरी रुचि के अनुरूप भी था। जल्दी ही मैं पहला श्रम विवाद मजदूर के पक्ष में जीतने में सफल रहा। मुझे लगा कि मेरा निर्णय सही था। तभी से मैं औद्योगिक क्षेत्र तथा मजदूरों से जुड़ा रहा हूँ। मैंने देखा कि 1980 तक आम तौर पर लगभग सभी उद्योगों में 75 प्रतिशत से 100 प्रतिशत मजदूर उद्योग के स्थायी मजदूर हैं। शेष 0 से 25 प्रतिशत मजदूर ठेकेदार के माध्यम से उद्योगों में काम करते हैं। कुछ काम तो ऐसे हैं जो ठेकेदारों को करने के लिए ठेके पर दे दिए जाते हैं। ये लोडिंग-अनलोडिंग, पेकिंग वगैरा के काम हैं जिनमें निरन्तर मजदूरों की जरूरत घटती बढ़ती रहती है। किसी भी कोयले से चलने वाले उद्योग में कोयले की रैक आने पर उस में से कोयला खाली कर गोदाम में रखने का काम तथा तैयार माल के बैगों या कंटेनरों को तैयार करने और उन्हें ट्रकों में लोड करने का काम ठेकेदारों को पीस-रेट पर दे दिया जाता हैं। ठेकेदार अपने मजदूरों से यह काम कराता हैं। इस तरह मूल उद्योगपतियों को यह सुविधा मिल जाती है कि उन्हें जो वेतन अपने स्थायी मजदूरों को देना होता है, उससे लगभग आधे मूल्य पर ठेकेदार मजदूरों के माध्यम से यह काम सम्पन्न हो जाते हैं, जिसमें मजदूरों की मजदूरी के साथ साथ पीएफ और ईएसआई वगैरा के खर्च तथा ठेकेदार का कमीशन भी निकल जाता है।
आंदोलनरत संगठित मजदूर 
हालाँकि ठेकेदार मजदूर (विनियमन एवं उन्मूलन) कानून वर्ष 1970 में पारित हो चुका था। इस कानून के नाम से ऐसा लगता है कि इसका उद्देश्य बड़े उद्योगों में से ठेकेदार मजूरी की शोषणकारी व्यवस्था का उन्मूलन करने के लिए बनाया गया है, लेकिन वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। इस कानून के पहले यह स्थिति थी कि जब मजदूरों को ठेकेदारी में काम करते हुए कुछ वर्ष हो जाते थे तो वे ठेकेदार की जगह उद्योग का स्थायी कर्मचारी घोषित कर देने और उनके समान वेतन व लाभ देने की मांग करने लगते थे। इस कानून में यह व्यवस्था की गयी थी कि उचित सरकार (केन्द्र या राज्य की) किसी भी उद्योग में किसी खास ट्रेड में ठेकेदारी व्यवस्था को खत्म करने का नोटिफिकेशन जारी कर सकती थी। उस के बाद उस ट्रेड में ठेकेदार मजदूर नहीं रखे जा सकते थे। शुरू-शुरू में कुछ उद्योगों में ठेकेदारी उन्मूलन के लिए नोटिफिकेशन जारी भी किए गए। लेकिन जल्दी ही यह समझ में आ गया कि यह कानून वास्तव में मजदूरों को मूल उद्योग का स्थायी कामगार बनाने के औद्योगिक विवादों को श्रम न्यायालय या औद्योगिक न्यायाधिकरण में न्याय निर्णयन के लिए ले जाने के अधिकार को समाप्त कर दिया गया है। अब यह अधिकार सीधे-सीधे केन्द्र और राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आ गया था।
जैसा की सभी जानते हैं कि पूंजीवादी जनतंत्रों में सरकारों को चुने जाने में प्रचार और धन की बहुत बड़ी भूमिका होती है। बड़ी मात्रा में यह धन केवल पूंजीपति और बड़ी-बड़ी औद्योगिक कंपनियाँ ही राजनैतिक पार्टियों को उपलब्ध करवा सकती हैं। लेकिन पूंजीपति वर्ग राजनैतिक दलों को यह धन ऐसे ही उपलब्ध नहीं करा देता, बल्कि उसके पीछे उनकी शर्तें होती हैं। चुनाव लड़ने के लिए पूंजीपतियों द्वारा उपलब्ध कराए गए धन के कारण सत्ता में रहने वाली राजनैतिक पार्टियाँ मजबूर हो जाती हैं कि वे सभी कानूनों की अनुपालना उनके हितों में करें। ठेकेदार मजदूरी प्रथा सीधे-सीधे पूंजीपतियों के मुनाफों और उन की पूंजी को बढ़ाती है। यह सिद्ध तथ्य है कि मुनाफों और पूंजी का निर्माण केवल और केवल अतिरिक्त श्रम से अर्थात वस्तुओँ में मजदूरों द्वारा पैदा किए मूल्य से कम मुल्य चुका कर ही किया जा सकता है। यह सारा का सारा मुनाफा और पूंजी केवल और केवल अतिरिक्त-मूल्य की ही उपज होता है। मजूरों को उनके श्रम के वास्तविक मूल्य से जितना मूल्य कम चुकाया जाता है वही मुनाफों और पूंजी में परिवर्तित होता है।
जब मजदूर संगठित होने लगता है तो वह उचित मजदूरी की मांग करने लगता है। संगठित होने से बिखरे हुए और अशक्त मजदूरों का समूह बन जाता है और उसमें शक्ति का संचार हो जाता है। मजदूरों की इस संगठित शक्ति को राज्य की मशीनरी पुलिस, प्रशासन तथा गुंडों की मदद से दबाना कठिन हो जाता है और पूंजीपतियों और सरकारी-अर्धसरकारी उद्योगों द्वारा मजदूरों की मांगों को दबाना संभव नहीं रह जाता। ऐसे में उन की मजदूरी और सुविधाएँ बढ़ानी पड़ती हैं। इस सब से पूंजीपतियों का मुनाफा कम हो जाता है, पूंजी का बढ़ना भी उसी अनुपात में कम हो जाता है, पूंजी की वृद्धि की गति कम हो जाती है। इस गति को बनाए और बचाए रखने के लिए जो उपाय हो सकते थे उनमें सर्वोत्तम उपाय यही सकता है कि किसी भी प्रकार से संगठित मजदूरों की संख्या सीमित बनी रहे और अधिकांश श्रम-शक्ति को संगठित क्षेत्र से असंगठित क्षेत्र में विस्थापित कर दिया जाए। भारत में पूंजीपतियों के पक्ष में यह काम दो तरीको से हुआ और यह दोनों तरीके कानून बदलकर ईजाद किए गए।           ...  (क्रमशः)
अगली कड़ी में पढ़ें कानून को बदल कर  ईजाद किए गए तरीके क्या हैं?

मंगलवार, 31 मार्च 2020

कोविद-19 महामारी और भारत-2


बचाव के बचकाना उपाय

24 मार्च 2020 को सुबह-सुबह घोषणा होने के बाद कि प्रधानमंत्री रात आठ बजे देश को संबोधित करेंगे तरह तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं कि आखिर प्रधानमंत्री क्या करने वाले हैं। लेकिन किसी को पता नहीं था कि वे क्या कहेंगे। रात आठ बजे जब वे टीवी-रेडियो पर आए तो उन्होंने आधी रात से 21 दिनों के लिए पूरे देश को लॉक-डाउन कर देने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि घर के दरवाजे पर लक्ष्मण रेखा खींच दें और उसके बाहर नहीं निकलें। कोविद-19 से उत्पन्न इस विश्वव्यापी महामारी से निपटने का यही एक तरीका है। दुनिया भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ दो माह के अध्ययन के बाद इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि इस महामारी से निपटने का लोगों के बीच डिस्टेंसिंग के अलावा और कोई तरीका नहीं है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो देश 21 साल पीछे चला जाएगा। उन्होंने कोविद-19 से संक्रमित रोगियों की चिकित्सा के लिए, देश के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत बनाने के लिए 15 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान केन्द्र सरकार की ओर से करने की घोषणा करते हुए यह भी बताया कि टेस्टिंग फेसिलिटीज, पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्वीपमेंट्स, आइसोलेशन बेड, आसीयू बेड, वेंटीलेटर और अन्य जरूरी साधनों की संख्या तेजी से बढ़ाई जाएगी। आपदा प्रबंध के विशेषज्ञों ने इस पर राय जताई कि यह धनराशि भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए बहुत अपर्याप्त सिद्ध होगी। अन्य किसी प्रकार की कोई घोषणा प्रधानमंत्री नहीं की।
आधी रात अर्थात 25 मार्च 2020 के आरंभ होते ही लॉक-डाउन शुरू हो गया। सब लोग असमंजस में थे कि अब क्या होगा। क्या काम चालू रहेंगे और क्या काम बन्द होंगे? लोग घरों के बाहर निकलेंगे नहीं तो उद्योग कैसे चल सकेंगें? कैसे लोगों को जरूरी सामान मुहैया कराए जाएँगे? यदि उद्योग बन्द होंगे तो मजदूरों का क्या होगा? उन्हें वेतन मिलेगा या नहीं। लोगों के राशन-पानी की क्या व्यवस्था होगी? रबी की फसल की कटाई सिर पर आ चुकी थी। उसकी कटाई कैसे होगी? क्या फसलें बरबाद होने के लिए छोड़ दी जाएँगी? अनेक ज्वलन्त प्रश्नों को बिलकुल अनुत्तरित छोड़ दिए गए। उस दिन सभी कुछ अन्धेरे में था। अगले दिन रिजर्व बैंक के गवर्नर ने आकर कुछ राहतें प्रदान करने की घोषणा की। लेकिन उसमें भी कुछ स्पष्ट नहीं था कि राहतों के लाभ आम लोगों को कैसे प्राप्त होंगे। रेलें, बसें और आवागमन के सारे साधन पूरी तरह मार्गों से हटा दिए गए थे। निजी वाहनों को भी एक हद तक प्रतिबंधित कर दिया गया था। सभी उद्योगों और आवश्यक सेवाओँ के अतिरिक्त सभी सेवाओं को तुरन्त प्रभाव से बन्द कर दिया गया। 
 लॉकडाउन के दो दिन बाद ही अचानक एक विस्फोट की तरह देश के सभी बड़े और छोटे औद्योगिक नगरों से मजदूर हजारों नहीं बल्कि लाखों की संख्या में अपने गोँवों की ओर पलायन करने लगे। उनके पास न तो रास्ते के लिए पर्याप्त धन था और न ही खाने पीने की वस्तुएँ। लेकिन तब तक रेलें और बसें सब बन्द हो चुकी थीं। कुछ सौ किलोमीटर से ले कर डेढ़ हजार किलोमीटर तक की यात्रा करने के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं था। लेकिन लोग उसकी परवाह न करते हुए इतने लम्बे रास्तों पर जो भी थोड़ा बहुत माल असबाब उनके पास था उसे ले कर गावों की ओर  भूखे प्यासे पैदल ही चल दिए। कोविद-19 की महामारी को लॉक-डाउन कर के रोकने के प्रयास को बहुत बड़ा धक्का लगा। क्यों की केन्द्र और राज्य सरकारो और देश के प्रशासन को बिलकुल समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हुआ? इसे कैसे रोका जाए। इस से तो कुछ खास जगहों पर इस रोग को सीमित करने के सारे उपाय बेकार हो जाने वाले थे। इस पलायन से महामारी के रुकने के स्थान पर उसे जंगल की आग की तरह फैलने का अवसर मिल गया था।
पुलिस और प्रशासन द्वारा पैदल निकल पड़ी इस श्रमशक्ति को रोका जाने लगा। पुलिस ने उन पर डंडे बरसाए, उन्हें बैठ कर आगे बढ़ने को मजबूर किया, कहीं उन्हें मुर्गा बना दिया और पुलिस ने अपने थर्ड डिग्री वाले तरीकों का उपयोग किया। अनेक सहृदयी संवेदनशील पुलिस कर्मियों द्वारा उनकी मदद करने के समाचार भी मिले। वहीं लोगों और संस्थाओं ने जितना हो सका इन्हें भोजन आदि की व्यवस्था की जो किसी भी तरह पर्याप्त नहीं थी।  पलायन इन लोगों में स्त्रियाँ भी थीं तो बूढ़े भी थे, छोटे बच्चे और शिशु भी थे तो गर्भवती स्त्रियाँ भी थीं। पलायन को रोकने के इन बेतरतीब कष्टदायी तरीकों के बावजूद देश भर का प्रशासन समझ गया था कि इस विस्फोट को ऐसै नहीं रोगा जा सकेगा। आखिर कुछ राज्य सरकारों ने इन लोगों को घर जाने के लिए मुफ्त बसें उपलब्ध कराने की घोषणा कर दी। उत्तर प्रदेश में बसे उपलब्ध कराई गयी लेकिन जिन लोगों के पास खाने की सामग्री नहीं थी उनसे कुछ सौ रुपयों से ले कर हजार रुपये तक किराए वसूल किए गए। यह सूचना समाचार माध्यमों पर वायरल हो जाने पर आदेश जारी किया गया कि अब यात्रा के लिए कोई धन वसूला नहीं जाएगा। वहीं अनेक गाँवों में शहर से पहुंच रहे अपने ही लोगों को गाँवो में घुसने से रोक दिया गया। उनकी समझ थी कि ये लोग महामारी को लेकर घर लौट रहे हैं। अजीब तरह की अराजकता पूरे देश में फैल रही थी। 
आखिर इतवार 29 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में अपने फैसलों से उत्पन्न विकट परिस्थितियों के लिए देश के गरीबों से माफी मांगी और पलायन कर रहे लोगों से वहीं रुकने का आग्रह किया। इस के बाद राज्यादेश भी जारी किए गए कि प्रत्येक जिले और नगर को सील कर दिया जाए। जो लोग जहाँ हैं वहीं रोक दिए जाएँ। प्रशासन उनके रहने खाने की वहीं व्यवस्था करे और कम से कम दो सप्ताह तक उन सब को निगरानी में रखा जाए जिस से महामारी को फैलने से रोका जाए। इसके बाद सभी स्थानों पर प्रशासन हरकत में आया और पलायन कर रहे लोगों को जहाँ के तहाँ रोकने के प्रयास आरंभ हो गए। ये प्रयास कितने सफल होंगे। महामारी को कुछ इलाकों तक सीमित करने और फिर समाप्त करने में कैसे सफलता मिलेगी? सफलता मिलेगी भी या नहीं मिलेगी? इन प्रश्नों के उत्तर तो समय के साथ पता लगेंगे। लेकिन महामारी को फैलने से रोकने के उपायों की घोषणा मात्र से उसके तैजी से फैलने के जो अवसर पैदा हो गए उसके पीछे क्या कारण हैं? उनकी पड़ताल करना और जानना अत्यन्त आवश्यक है। यदि इन तथ्यों को न जाना गया तो हमें समझ लेना चाहिए कि हम परमाणु बम से भी खतरनाक बम पर बैठे हैं जो कभी भी फट पड़ सकता है।                           ...... (क्रमशः)

सोमवार, 30 मार्च 2020

कोविद-19 महामारी और भारत-1


 'भारत में महामारी का प्रवेश'

तीन माह की अवधि में ही कोविद-19 वायरस ने दुनिया को हलकान कर दिया है और अब उसने वैश्विक महामारी का रूप ले लिया है। वे देश अभी सौभाग्यशाली हैं जिन में अभी तक इस वायरस के चरण नहीं पड़े हैं। इस वायरस से बचाव के लिए कोई टीका वैज्ञानिक अभी तक पुख्ता तौर पर ईजाद नहीं कर पाए हैं। न ही इस के रोगी की चिकित्सा के लिए कोई खास दवा की वे पहचान नहीं कर पाए हैं। इन दोनों की खोज/ आविष्कार में वे में दिन रात जुटे हैं। टीका ईजाद करने में उन्हें कम से कम एक वर्ष का समय लगेगा ऐसा अनुमान है। इस वायरस का संक्रमण संक्रमित व्यक्ति के मुहँ और नाक से निकले डिस्चार्ज से फैलता है। यह छींक और खाँसी के माध्यम से वातावरण में आता है। छींक और खाँसी के डिस्चार्ज से निकले कण चार-पांच फुट की दूरी तक तुरन्त फैल जाते हैं।

इस कारण फिलहाल बचाव के लिए यह उपाय निकाला गया है कि एक व्यक्ति दूसरे से कम से कम दो मीटर की दूरी बनाए रखे, घर से बाहर निकले तो अनजान सतहों और व्यक्तियों को न छुए। अपने मुहँ और नाक को खास तरह के मास्क से ढक कर रखे जिससे संक्रमण दूर तक न फैले। जब तक अत्यन्त ज्ररूरी न हो तो घर से बाहर न निकले। अलग अलग सतहों पर कुछ ही समय में यह वायरस निष्क्रीय हो कर समाप्त हो जाता है। यदि 14 दिन तक इस का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में होने से रोका जा सके तो इस वायरस को नष्ट किया जा सकता है। यदि कुछ समय और अर्थात कम से कम तीन सप्ताह तक इलाकों में आवागमन पूरी तरह रोक दिया जाए और लोग घरों से न निकलें तो किसी भी क्षेत्र विशेष में इस वायरस को पूरी तरह से नष्ट किया जा सकता है। सरकारें अपने अपने काम में जुट गयी हैं। यह वायरस पहले पहल चीन में 8 दिसंबर को प्रकट हुआ था और 31 दिसंबर को एक रिपोर्ट से विश्व स्वास्थ्य संगठन को सूचित किया गया था । चीन में उस ने तीन हजार से अधिक लोगों की जान ले ली। फिलहाल चीन में स्थिति नियन्त्रण में प्रतीत होती है और वहाँ जिस नगर वुहान में इसे पहले पहले देखा गया था उसे वहाँ सभी गतिविधियाँ फिर से आरंभ की जा रही हैं।

भारत में यह पहली बार 30 जनवरी 2020 को प्रकट हो चुका था। उसी समय हमारी सरकार को इसे गंभीरता से लेते हुए इस से देश को बचाने के उपाय पूरी गंभीरता से आरंभ कर देने चाहिए थे। लेकिन केरल राज्य की सरकार को छोड़ कर 19 मार्च 2020 की सुबह तक भारत को इस महामारी से बचाने के लिए कोई खास उपाय भारत सरकार और राज्यों की सरकारें करती नजर नहीं आईं।  19  मार्च की रात 8 बजे प्रधानमंत्री मोदी अचानक टीवी/रेडियो पर आए और देश की जनता से इतवार 22 मार्च को देश भर में सुबह 7 से रात 9 बजे तक जनता कर्फ्यू रखने का आव्हान किया गया। केवल एक दिन के लिए यह उपाय करने का कोई औचित्य नहीं था। जनता कर्फ्यू के दिन शाम 5 बजे स्वास्थ्य कर्मियों, पुलिस और प्रशासन को इस के लिए काम करने के लिए धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए शाम 5 बजे पाँच मिनट के लिए तालियाँ और थालियाँ बजाने का आव्हान किया गया था। जनता कर्फ्यू को जनता का अभूतपूर्व सहयोग मिला और वह पूरी तरह सफल रहा। मोदी जी के उत्साही भक्तों ने तालियाँ और थालियों के साथ साथ शंख, ढोल, ड्रम वगैरा भी बजा दिए। यहाँ तक कि अनेक नगरों में लोग जलूसों और झुण्डों में बाहर निकले जैसे कोविद-19 पर उन्होने विजय प्राप्त कर ली हो। इस तरह उन्होंने कर्फ्यू की उपयोगिता को नष्ट कर दिया।  कर्फ्यू की सफलता से शायद मोदीजी ने यह समझा कि भारत की जनता कोविद-19 से निपटने को तैयार है। एक दिन के अंतराल के बाद 24 मार्च 2020 को सुबह-सुबह घोषणा हुई कि प्रधानमंत्री रात आठ बजे देश को संबोधित करेंगे। ... (क्रमशः)

रविवार, 29 मार्च 2020

'सामाजिक दूरी' नहीं, सामाजिक सामंजस्य के साथ 'भौतिक दूरी'

कोविद-19 वायरस से उत्पन्न महामारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह जरूरी पाया है कि लोग आपस में कम से कम 6 फुट की दूरी बनाए रखें। यह वायरस मनुष्य और मनुष्य की भौतिक निकटता से फैलता है। यदि इस वायरस से संक्रमित व्यक्ति छींकता है या खाँसता है तो छींक या खाँसी के साथ बाहर निकले कणों में वायरस होते हैं और वे विशेष रूप से आँख, नाक, कान या मुख के ज़रीए निकट व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर उसे भी संक्रमित कर सकते हैं। सरकार, मीडिया संगठनों आदि ने इस पर चर्चा करते हुए मनुष्यों के बीच इस दूरी को बनाए रखने को आम तौर पर “सोशल डिस्टेंसिंग” हिन्दी में “सामाजिक दूरी” शब्द का प्रयोग किया है।

भौतिक दूरी (Physical Distancing)
“सोशल डिस्टेंसिंग” या “सामाजिक दूरी” शब्द इस संदर्भ में बिलकुल गलत शब्द है और बहुत भ्रामक है। इस वैश्विक आपदा के समय में जब इस से निपटने के लिए “सामाजिक निकटता” की अत्यन्त आवश्यकता है हम ठीक उसका विलोम शब्द “सामाजिक दूरी” का प्रयोग कर रहे हैं। “सामाजिक दूरी” का सही अर्थ यह है कि हम एक दूसरे का सहयोग करना बन्द कर दें। यदि ऐसा हुआ तो यह महामारी दुनिया के लाखों लोगों को लील लेगी। यदि कुछ ही समय में इस महामारी और उस से उत्पन्न प्रभावों से मरने वाले लोगों की संख्या करोड़ से ऊपर चली जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

कल शाम जब मैंने इस मुहावरे पर बहुत विचार किया और उसके बाद मैंने इंटरनेट पर तनिक रिसर्च की तो पाया कि इस शब्द पर अमरीका की नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान और सार्वजनिक नीति के प्रोफेसर डैनियल एल्ड्रिच का कहा ​​है कि यह शब्द भ्रामक है और इसका व्यापक उपयोग का प्रभाव उल्टा पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी उसी निष्कर्ष पर पहुंचा है। पिछले हफ्ते एल्ड्रिच ने इसके स्थान पर "शारीरिक दूरी" शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया है।

एल्डरिच ने कहा है कि कोरोनोवायरस के प्रसार को धीमा करने के लिए किए गए प्रयासों में “शारीरिक दूरी” (Physical Distance) बनाए रखते हुए सामाजिक संबंधों को मजबूत करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए। एक ट्वीट में, उन्होंने शारीरिक दूरी” के साथ “सामाजिक जुड़ाव" (Social Connectedness) के लिए बुजुर्ग पड़ोसियों के लिए काम करने वाले नौजवानों की तारीफ की है। उन्होंने कहा है कि यह लोगों के बीच सामाजिक संबंध आपदाओं से निपटने के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। एल्ड्रिच ने अपने सहयोगियों और निर्णय लेने वाले अधिकारियों और संस्थाओँ से “सामाजिक दूरी” शब्द के उपयोग के बारे में अपनी चिंता प्रकट की है और कहा है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी और गैर सरकारी संगठन “सामाजिक दूरी” शब्द का उपयोग करने के स्थान पर “शारीरिक दूरी” शब्द का प्रयोग करना चाहिए। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने पिछले सप्ताह "शारीरिक दूरी" शब्द का उपयोग शुरू कर दिया है। डब्लूएचओ द्नवारा 20 मार्च को की गयी दैनिक प्रेस ब्रीफिंग में डब्ल्यूएचओ के महामारी-वैज्ञानिक मारिया वान केरखोव ने कहा है कि अब हम “शारीरिक दूरी” शब्द को “भौतिक दूरी” शब्द से बदल देना चाहते हैं, क्योंकि हम चाहते हैं कि लोग अभी भी आपस में जुड़े रहें, उन के सामाजिक सम्बन्ध पहले से अधिक मजबूत बनें।

एल्ड्रिच के शोधकार्य से पता चलता है कि मजबूत सामाजिक निकटता वाले समुदाय जिनमें लोग एक दूसरे के साथ जीवन भर की जानकारी साझा कर सकते हैं वे ही किसी भी बड़ी आपदा के बाद सबसे प्रभावी ढंग से जीवित रह कर बेहतर ढंग से पुनर्निर्माण करने में सफल हो सके हैं।  जिन लोगों और समुदायों को आपदाओं में सब से अधिक हानि हुई है और जो ठीक से पुनर्निर्माण नहीं कर सके वे कमजोर सामाजिक संबंध वाले थे जिनमें आपसी विश्वास और सामंजस्य की कमी थी। 1995 की शिकागो हीट वेव के, कैलिफोर्निया की 2018 कैंप फायर और 2011 में जापान में आए भूकंप और सूनामी की आपदाओं के समय  यह प्रमाणित हो चुका है कि ऐसे कमजोर सामाजिक संबंध वाले समुदाय आपदा में सब से पहले नष्ट होने वाले होते हैं।

 पैराडाइज, कैलिफ़ोर्निया में 2018 कैंप फायर में, एल्डरिच ने पाया कि वे लोग जीवित नहीं बचे थे जिनके बीच आपसी सामाजिक संबंध मजबूत नहीं थे । इसके विपरीत जिन समुदायों में मजबूत सामाजिक सामंजस्य था वे सभी को अपने घरों से बाहर निकालने और मदद करने में सक्षम रहे। उन समुदायों में अविश्वसनीय रूप से किसी की मृत्यु नहीं हुई। 

इस कारण पश्चिम के अनेक विशेषज्ञों का मत है कि वर्तमान भाषा को बदलना चाहिए। अर्बाना विश्वविद्यालय में नगरीय और क्षेत्रीय नियोजन के प्रोफ़ेसर रॉबर्ट ओलशनस्की ने कहा है कि “सामाजिक दूरी” मुहावरे में एक विरोधाभास है।  वास्तव में हम परस्पर एक दूसरे से छह फीट दूर रहने के लिए सहमत होते हुए अधिक सहयोगी और सामाजिक हो रहे हैं। इस से हमारी सामाजिक निकटता में वृद्धि हुई है। जब कि “सामाजिक दूरी” 'शब्द का अर्थ है कि हमें एक ऐसा समाज चाहिए जिसमें लोग अलग-अलग रहें।  लोगों के बीच मजबूत सामाजिक संबंध न केवल महामारी का मुकाबला करने के लिए आवश्यक हैं, बल्कि पुनर्निर्माण के लिए बहूत जरूरी हैं।

इतिहास ने हमें बार-बार सिखाया है कि सहयोगी, पारस्परिक रूप से सहायक समुदाय ही हैं बड़ी आपदाओं से लगातार उबरने में सबसे सफल रहते हैं। इस कारण मेरा बहुत दृढ़ता के साथ समाचार माध्यमों के संपादकों, संवाददाताओं, एकंरों और सोशल मीडिया के एक्टिविस्टों से आग्रह है कि हमें भारत में अपनी भाषा को बदल देना चाहिए और तुरन्त “सामाजिक दूरी” (Social Distancing) शब्द के स्थान पर “भौतिक दूरी” (Physical Distancing) शब्द का उपयोग आरंभ कर देना चाहिए।