@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: एन्काउन्टर

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

एन्काउन्टर

'लघुकथा'

शहर की अदालतों में इन दिनों अजीब सा माहौल था. हर जज की मेज़ पर मुकदमों की फाइलें ऐसे गिर रही थीं जैसे किसी युद्धभूमि में लाशें.

जजों को रोज़ वीडियो कॉन्फ़्रेंस पर हाईकोर्ट को जवाब देना पड़ता था—कितने मुकदमे निपटाए, कितने "टारगेट केस" खत्म किए.

एक दिन, एक न्यायार्थी ने जज से कहा—

"मान्यवर, यह दस्तावेज़ मुकदमे का केन्द्रीय बिन्दु है, और यह प्रतिवादी के कब्जे में है, उससे मंगवाए जाने की दर्ख्वास्त है.   ही नहीं गया. इस दस्तावेज पर गौर किए बिना फैसला हुआ तो हमारे साथ अन्याय हो जाएगा."

जज ने चश्मा उतारते हुए ठंडी आवाज़ में कहा—

"मैं कुछ नहीं कर सकता. यह टारगेट मुकदमा है, अगर आपकी दरख़्वास्त मंज़ूर की फैसला तय समय में होना मुमकिन नहीं."

और अगले ही दिन मुकदमे का "एन्काउटर" कर दिया गया. जज साहेब का टारगेट पूरा हुआ.  

इसी बीच देश भर में खबर पहुँची—राम मंदिर का निर्माण पूरा हो गया है. कल मन्दिर के शिखर पर ध्वजारोहण होगा.

सोलह जिलों में रूट डायवर्जन होगा, लोग उमड़ेंगे, झंडा फहरेगा.

न्यायार्थी ने अदालत से बाहर निकलते हुए सोचा—

"न्याय कालकोठरी में कैद रहे तो रहे, मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण जरूरी है."

उसने आकाश की ओर देखा. मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं, और अदालत की दीवारें चुप थीं.

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