Friday, April 23, 2010

परंपरा और विद्रोह ... स्व. यादव चंद्र का एक प्रबंध काव्य

यादवचंद्र जी से शायद आप परिचित न हों, उन के परिचय के लिए उन की एक रचना  से साक्षात्कार ही पर्याप्त है। अनवरत पर उन की कुछ रचनाएँ मैं ने प्रस्तुत की थीं। वे केवल समर्थ क्रांतिकारी कवि ही नहीं थे अपितु उन के व्यक्तित्व के बहुत विस्तृत आयाम थे। वे ओजस्वी वक्ता, समीक्षक, नाटककार, नाट्य निर्देशक, अभिनेता, कुशल लोक नर्तक, समर्पित कार्यकर्ता, परिश्रमी संगठनकर्ता ,प्रतिबद्ध चिंतक, लोकप्रिय शिक्षक ... और भी बहुत कुछ थे।
"परंपरा और विद्रोह" यादवचंद्र कृत अठारह सर्गों का एक प्रबंध काव्य है। इसे पढ़े बिना इस के मूल्य और महत्ता का अनुमान नहीं किया जा सकता। यह हिन्दी साहित्य को उन का विशिष्ठ योगदान है। यह आपातकाल के दौरान पहली बार प्रकाशित हुआ। शहीद भगत सिंह के साथी शिव वर्मा ने इस की भूमिका लिखी। यह समूचे ब्रह्मांड और सृष्टि के आविर्भाव और विकास की यात्रा की यथार्थ और सौंदर्यमयी अभिव्यक्ति है, यह मनुष्य की उत्पत्ति और जीवन संघर्षों और उस के महाभियानों की यात्रा है। इसे राहुल सांकृत्यायन की कृति 'वोल्गा से गंगा' और भगवत शरण उपाध्याय की 'इतिहास पर खून के छींटे' की परंपरा का सृजनात्मक विकास कहा जा सकता है।
स कृति के बारे में अधिक कुछ कहना अभी ठीक नहीं। मेरा मानना है कि इस कृति को पढ़ कर पाठक स्वयं इस कृति और इस के कृतिकार का मूल्यांकन करें। इस कृति को मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ। कोशिश रहेगी कि सप्ताह में दो दिन अनवरत पर यह कृति स्थान पा सके। आशा है, आप इसे पढ़ेंगे और कृति और कृतिकार के संबंध में अपनी राय से हमें अवगत कराएंगे। 
कुल 142 पृष्ठों का यह प्रबंध काव्य अठारह सर्गों में विभाजित है। एक पोस्ट में एक सर्ग प्रस्तुत किया जाना संभव नहीं है। एक सर्ग को दो-तीन या चार पोस्टों में बांट कर ही प्रस्तुत किया जाएगा। यहाँ प्रथम सर्ग का पूर्वार्ध प्रस्तुत है जिस में सृष्टि का आरंभ, पृथ्वी की उत्पत्ति का सुंदर और वैज्ञानिक वर्णन है। 


परंपरा और विद्रोह  
* यादवचंद्र * 

प्रथम सर्ग (पूर्वार्ध)
धऱती माता

तुम मेरा इतिहास न पूछो......

मेरे प्रथम चरण में धू-धू
कर जलती हैं दशों दिशाएँ
महाशून्य जाज्वल्यमान है
बंधी हुई हैं और हवाएँ

गति है मौन, ग्रहादिक तारे
और उपग्रह सभी लुप्त हैं
मानव के मानस-सुत ब्रह्मा,
विष्णु, पिनाकी सभी सुप्त हैं

रोक हृदय की गति बस अम्बर
दृश्य प्रलय का देख रहा है
नाश और निर्माण बिंदु की,
पूछ रहा है वह-रेख कहाँ है?


देखो उधर नेबुला देखो !
गति की गति ले, देता चक्कर
अग्नि-पिंड विष ज्वाल उगलता
चला, बढ़ा वह धुन्ध बांधकर

लाल गगन में आग लगाता
लाल गगन में लपट बिछाता
लाल-लाल शोले-चिनगारी
प्रतिपल-प्रतिपल वह छिटकाता

मेरा पहला हास न पूछो
तुम मेरा इतिहास न पूछो

शोले हर शोले को बांधे
नाच रहे हैं ऊपर-नीचे
यह गुरुत्व औ आकर्षण है
जो है एक, एक को खींचे

वर्ना वे फिर से टकरा कर
यहीँ आदि का अंत करेंगे
किन्तु स्वतः परतः दो गतियों
के कारण वे नहीं लड़ेंगे

नहीं लड़ेंगे, नहीं भिड़ेंगे
नाच रहे जो लाल सितारे
बीच सबों के बड़े पिंड जो
सूर्य, वही हैं भाग्य हमारे

मनुज! प्रज्वलित अग्नि-पिण्ड से
डरो  नहीं, मंगल  ही  होगा
'मंगल' की गति-विधि से धरणी
रह न सकेगी युग-युग बन्ध्या

यौवन की थाती धरती -
को पल भर भी तो सोने दो
महानाश को अजी, न छेड़ो
ज्वाला को शीतल होने दो

चक्कर काट-काट अकुलाती
रवि से दूर प्रिया की छाती
खोया-खोया सा दिन आता
सिसक-सिसक कर रजनी जाती

हाँ, इस निशा दिवस के क्रम में
ठंडा हुआ धधकता शोला
उभर सिमट कर पर्वत - गह्वर
पहले-पहल हुआ यह गोला

पा कर मौन धरा को, नभ के
तत्व द्रवित हो पाँव बढ़ाए
सावन-भादों घिरे नयन में
उमड़-घुमड़ कर बादल छाए

रोके रुके न लेकिन आँसू
झंझावात-विजन की आहें
आँसू कढ़े हृदय को पाने
फैलाए चिर प्यासी बाहें

फूट-फूट कर रोता अंबर
सिसक-सिसक धरती अकुलाती
प्लावन कहीं न हो इस क्रम में
सोच कलम मेरी रुक जाती

रूठ गई है आज हवाएँ
जल के फूट रहे फौव्वारे
हिम के पर्वत छूट गगन से
गिरते टूट रहे ज्यों तारे

कोटि-कोटि मीलों की गति ले
झंझा हहर रही है दुस्तर
जिस के भीम वेग में पड़ कर
उड़ते तिनके-से गुरु प्रस्तर

टाईफोन, संहार, प्रलय है
जल-प्लावन से आज न खेलो
जागा है नैराश्य धरा का
सागर उसे अंक में ले लो ....

गुरु ऋंगों पर सिन्धु लहरता
सिन्धु बीच ज्वारों का पर्वत
जिस के तुङ्ग शिखर पर युग का
कवि बैठा है बन कर तक्षक

पीने को निखिल विश्व का
युग उद्वेलित कटु हालाहल
पी कर तरल गरल कवि के दृग
स्नेह-स्निग्ध बरसाते प्रतिपल

निष्ठा से विश्वास न पूछो
तुम मेरा इतिहास न पूछो

(क्रमशः)
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