Sunday, August 30, 2009

पुरुषोत्तम 'यक़ीन' की जादू वाली पहली ग़ज़ल "खुल कर बात करें आपस में"

मेरे शायर दोस्त पुरुषोत्तम 'यक़ीन' से आप सब परिचित हैं। आज रविवार की शाम अचानक वे आए, बहुत देर बैठे। खूब बातें हुईं। कहने लगे -तुम्हें दो जादू वाली ग़ज़लें देता हूँ।  मैं ने पूछा -जादूवाली ग़ज़ल का क्या मानी? वो मैं बाद में बताऊंगा। पहले इन दोनों ग़ज़लों को 'अनवरत' पर छापो। मैं ने कहा -समझो छाप दी, तुम जादू बताओ। नहीं बताउंगा। जब तक छप नहीं जाएंगी और खुद कम्प्यूटर पर नहीं पढ़ लूंगा, नहीं बताउंगा।  
मैं ने बहुत कहा, पर उन्हों ने जादू नहीं बताया।  अड़ गए, सो अड़ गए। शायर जो ठहरे। खैर, मैं पहली ग़ज़ल छाप रहा हूँ। ध्यान से पढ़ें। दूसरी ग़ज़ल भी कल शाम तक जरूर छाप दी जाएगी। मुझे तो इन ग़ज़लों में कोई जादू नज़र नहीं आया। आप को आए तो जरूर बताइगा। वरना दोनों ग़ज़लें छप जाने के बाद 'यक़ीन' साहब से ही पूछेंगे जादू क्या है? 
एक बात और वे अपना नया फोटो भी लाए थे। उसे भी देखिए, मूँछें मुड़ा कर कितने खूबसूरत लग रहे हैं?
खुल कर बात करें आपस में
<>  पुरुषोत्तम 'यक़ीन' <>

तू इक राहत अफ़्ज़ा मौसम
तू बादल तू सबा तू शबनम

छल करते हैं अपना बन कर
मेरे साथी मेरे हमदम

तेरे मुख पर तेज है सच का
तेरे आगे सूरज मद्धम

दर्दे-जुदाई और तन्हाई
क्यूँ न निकल जाता है ये दम

कोई नहीं है तुझ बिन मेरा
कह तो दे इतना कम से कम

खुल कर बात करें आपस में
कुछ तो कम होंगे अपने ग़म

झूठी ख़ुशियों पर ख़ुश रहिए
व्यर्थ 'यक़ीन' यहाँ है मातम
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