अनवरत पर
यादवचंद्र पाण्डेय की कविताएँ आप पहले भी पढ़ चुके हैं। यहाँ प्रस्तुत है उन की एक विशिष्ट कविता
'आप कहाँ हैं?'
आप कहाँ हैं?
नील गगन में
मनिहारिन घनश्याम नटी का
पुरना-जुड़ना कितना सुंदर !
नील गगन में
गोरी-गोरी बगुलों की नागर पाँतो का
फिरना-तिरना कितना सुंदर !
नील गगन में
कंचनकाया बच्चों-सा हिमशिखरों का
टुक-टुक तकना कितना सुंदर !
नील गगन में
जूड़े में नौ लाख सितारे
टाँक रात्रि का खिल-खिल हंसना
मुसका देना कितना सुंदर !
नील गगन में
नभ-गंगा के कंठहार से
हीरा मोती सोना झरना
रोज बरसना कितना सुंदर !
बोल, रे पागल मनुवाँ
कितना सुंदर ! कितना सुंदर !
नील गगन में अट्टहास प्रेतों का
कोरस-मृत्यु नाश का
और मंगलाचरण अनय का
घोर असुंदर !
नील गगन में बजे नगाड़ा
नखत-युद्ध का, महाप्रलय का
कुंठा, भय का
घोर असुंदर !
नील गगन में गंध चिराइन, धुआँ विषैला
सूरज-चांद-सितारों का काला पड़ जाना
घोर असुंदर !
आठ अरब के भाग्य सूर्य पर
राष्ट्र संघ के एक राहु का
ग्रहण लगाना, मोद मनाना
घोर असुंदर
शांति कपोत उड़ाने वालों का
गिद्धों के साथ गगन में
मंडराना, सह-भोज रचाना
घोर असुंदर !
घोर असुंदर से सुंदर की रक्षा करना
काव्य कर्म है
आप कहाँ हैं ?
घोर असुंदर से सुंदर के हित में लड़ना
शास्त्र धर्म है
आप कहाँ हैं ?
घोर असुंदर विषघट को अमृत से भरना
आर्ष सूत्र है
आप कहाँ हैं?
मुक्ति युद्ध में आप कहाँ हैं?
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