Saturday, August 29, 2015

राखी - "हम सब साथ साथ हैं"

राखी स्नेहपूर्ण मृदुल त्यौहार है। एक युग था जब इसे रक्षा के त्यौहार के रूप में मनाया जाता था। लेकिन उस रूप में उस का महत्व तभी तक रह सकता है जब कि समाज में रक्षक और अरक्षित दोनों हों और रक्षा का दायित्व निभाने को तैयार हों। राखी को भाई-बहन के मधुर सम्बन्धों से भी जोड़ कर देखा जाता है। लेकिन उन का संबंध तो सहोदरता का है जो ऐसा स्थाई संबंध है कि तोड़े भी नहीं टूट सकता है। फिर एक धागे में ऐसा क्या है जो उन्हें अपने दायित्वों कर्तव्यों का बोध करा दे?

जब हम बहन द्वारा भाई को राखी बांधे जाने की बात करते हैं तो सहज ही उस मूल्य का शिकार हो जाते हैं जो यौनिकता के आधार पर मनुष्य मनुष्य में भेद करता है। यौनिकता के आधार पर स्त्री रक्षिता हो जाती है और पुरुष रक्षक। यौनिकता के आधार पर किया जाने वाला यह भेद समाज से मिटना चाहिए। यौनिकता अपने स्थान पर है लेकिन उस के आधार पर सामाजिक भेद की समाप्ति जरूरी है।

बहनें राखी बांधती हैं और भाई बंधवाते हैं और बहिन को अच्छी से अच्छी भेंट देना चाहते हैं, लेकिन वही दे पाते हैं जिस से उन का अपनी अपनी पत्नियों से जो खुद भी किसी न किसी की बहिन हैं बिगाड़ न हो जाए। पर तमाम भाई लोग यह सारी इस कारण निभा रहे हैं कि कहीं बहिन माता पिता की संपत्ति में हिस्सा न मांग ले। अदालतों में खूब मुकदमे चल रहे हैं जो बहनों ने अपने माता पिता की संपत्ति में हिस्सा लेने के लिए किए हैं। वहाँ न बहिन भाई को राखी बांधती है और न भाई बंधवाने को तैयार है। भाई कहता है काहे की राखी, कैसी राखी? बाप की जमीन में हिस्सा तो मांग लिया।

इस राखी पर भाई ये प्रण करें कि माता पिता की संपत्ति में जो भी हिस्सा बहिन कानून के अनुसार है उसे स्वयं अपनी बहन को दे देंगे तो फिर देखिए भाई बहनों के बीच स्नेह की कैसी संसृष्टि होती है? पर यह मक्खन किसे चाहिए?

मेंरे दादा जी ज्योतिषी और पुरोहित थे। राखी पर उन के यजमानों के काम करने के उपकरणों को राखी बांधने जाते थे। यह उन की ओर से एक प्रकार की शुभकामना होती थी। उन के और यजमानों के बीच कभी फीस (दक्षिणा) नहीं रही। वे अपने यजमानों का काम बिना किसी अपेक्षा के दायित्व-बोध से करते थे। यही दायित्व-बोध उन के यजमानों में भी था। उन का कभी कोई काम न रुका। अपने यजमानों पर इतना अधिकार भी रखते थे कि उन्हें हमें धमकी देनी होती तो कहते -गाँव चला जाउंगा, मांग कर खा लूंगा। अपने जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए यजमानों से मांगना उन का अधिकार था। लेकिन आज यह पारिवारिक-सामाजिक दायित्व-बोध का भाव इस भाववादी दुनिया से कहीं गायब हो चुका है।


यह दायित्व-बोध राखी बांधने से उत्पन्न नहीं होता। यह भावनाओं से भी उत्पन्न नहीं होता। यह समानता के साथ से पैदा होता है। हम परिवार और समाज में सब को समान समझें। केवल समझें ही नहीं, यह हमारे भौतिक व्यवहार में आए और सब की आदत बन जाए। वैसे ही जैसे किसी एक रास्ते पर रोज जाने की आदत बनती है। आप वाहन की ड्राइविंग सीट पर बैठे होते हैं आप के हाथ स्टीयरिंग को रोज चलने वाले रास्ते पर जाने के लिए नियंत्रित करते रहते हैं, उस के लिए मस्तिष्क को इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती।

इस का एक ही उपाय है, हम भाववाद (आदर्शवाद, दिखावा) का त्याग करें। यथार्थ की जमीन पर आएँ। हम में बोध हो कि परिवार में सब समान हैं भाई-बहिन भी और स्त्री-पुरुष भी। परिवार में भी और समाज में भी सभी एक दूसरे के लिए हैं, सब मिल कर किसी एक की आवश्यकता को पूरा कर सकते हैं।  यह हमारी आदत बने, व्यवहार में दिखाई दे, तब किसी को किसी भी चीज का अभाव नहीं खल सकता, न भौतिक वस्तुओं का न ही प्यार और स्नेह का।

राखी के इस त्यौहार का उद्घोष "हम सब साथ साथ हैं" होना चाहिए।

Thursday, August 27, 2015

भण्डारा

'लघुकथा'


भिखारियों को भोजन के लिए बाजार वालों ने भण्डारा किया। बाजार को कनातें लगा कर बन्द कर दिया गया था। सड़क को नगर निगम से टैंकर मंगवा कर धुलवाया गया। जब वह सूख ली तो उस पर टाट पट्टियाँ बिछाई गयीं। भोजन के लिए आए भिखारी यह सब कार्रवाई बाजार के कोने में भीड़ लगाए टुकुर टुकुर देखते रहे। जब हलवाई ने बताया कि इतना भोजन तैयार है कि भिखारियों को भोजन के लिए बिठाया जा सकता है। भिखारी आए और टाटपट्टियों पर बैठ गए। उन में से एक-दो ही थे जिन्हों ने पालथी मारी हो। अधिकांश उकड़ूँ बैठे थे। उन्हें देख कर एक हाथियाए व्यापारी ने कहा, 'बेकार ही टाट पट्टियाँ मंगाईं, ये तो सब उकड़ूँ बैठगए'।

मोटे पेट वाले एक व्यापारी ने उन्हें पत्तलें परोसीं, दूसरे पूरी, सब्जी, नुक्ती और सेव परसने लगे। ये वही थे जो और दिनों भिखारियों के कुछ मांगने पर एक सैंकड़ा गाली देकर भगा दिया करते थे। कभी कभी किसी जिद्दी भिखारी के सामने तो डंडे का उपयोग भी कर लेते थे। भिखारीगण भोजन करने लगे। एक पंगत उठती तो दूसरी बैठ जाती। भिखारी आते जा रहे थे उन का कोई वारापार न था।

दोपहर बाद एक अच्छे कपडे पहने नौजवान आया और भिखारियों की पंक्ति में बैठ गया। परोसने वाले चौंके ये भिखारियों के बीच कौन आ गया। व्यापारियों में खुसुर फुसुर होने लगी। तभी एक नौजवान व्यापारी ने उसे पहचान लिया। वह तो नगर के सब से ज्यादा चलने वाले महंगे ग़ज़ब रेस्टोरेंट के मालिक का बेटा था। व्यापारियों ने कुछ तय किया और तीन चार उस के नजदीक गए। बोले -तुम तो ग़ज़ब के मालिक के बेटे हो न? तुम्हें यहाँ भिखारियों के साथ खाने को बैठने की क्या जरूरत?


मुझे बाप के रेस्टोरेंट का खाना पसंद नहीं। रेस्टोरेंट का धन्धा भी कोई धन्धा है। बहुत परेशानियाँ हैं। मैने बाप से कहा तो उस ने घर से निकाल दिया। अब भिखारी जैसा ही हूँ, इस लिए भंडारे के भोजन का अधिकारी भी।

व्यापारियों ने विचार किया कि बाप ने नाराज हो कर घर से निकाला है हम ने भंडारे में खाने दिया तो इस का बाप नाराज हो जाएगा, दूसरे भिखारियों को भी ये पसन्द न आएगा। उन्हों ने उसे उठा दिया।

उसे गुस्सा आ गया। गुस्से में भर कर उस ने मुट्ठियाँ तानीं और भाषण देने लगा -तुम ने मेरा अपमान किया है। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे यहाँ से उठाने की। मेरे दोस्तों और फॉलोवरों की कमी नहीं है।अभी सब को साथ ले कर आता हूँ। देखता हूँ कैसे करते हो भंडारा। यह कहते हुए वह वहाँ से चला गया। व्यापारी भंडारा करते रहे।

आधे घंटे बाद हाथों मेे हॉकियाँ और बेसबॉल के डंडे लिए बाइकों पर 20-30 नौजवान आए। भंडारे की भट्टियाँ बुझा दीं। तेल के कड़ाह और भोजन भरे बरतन उलट दिए। जिस ने रोका उस का सिर फोड़ दिया। कुल तीन मिनट लगे। वे सब कुछ तहस नहस कर के दफा हो गए। पूरे बाजार में हाहाकार मच गया।

यह पिछले साल की बात थी। इस साल फिर भंडारे का दिन नजदीक आ रहा है। व्यापारी सोच रहे हैं कि भंडारा करें कि नहीं?

Monday, August 10, 2015

इंसाफ माँगा था, इस्लाम मिला ! ... - भंवर मेघवंशी



भगाना जिला हिसार हरियाणा के दलितों ने अत्याचारों के विरोध में हिन्दू धर्म त्याग कर सार्वजनिक रूप से जन्तर मन्तर पर इस्लाम को अपना लिया।  लेकिन यह उन की पीड़ाओं की चिकित्सा नहीं है। उन की पीड़ाओं का अन्त सिर्फ और सिर्फ सारे धर्मों को नकारने से ही हो सकता है। सारी कहानी कह रहे हैं, राजस्थान में मानव अधिकार के मुद्दों पर कार्यरत स्वतंत्र पत्रकार श्री भँवर मेघवंशी ...


गभग 4 माह तक उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया, आर्थिक नाकेबंदी हुयी, तरह तरह की मानसिक प्रताड़नाएँ दी गयी। गाँव में सार्वजनिक नल से पानी भरना मना था, शौच के लिए शामलात जमीन का उपयोग नहीं किया जा सकता था, एक मात्र गैर दलित डॉक्टर ने उनका इलाज करना बंद कर दिया, जानवरों का गोबर डालना अथवा मरे जानवरों को दफ़नाने के लिए गाँव की भूमि का उपयोग तक वे नहीं कर सकते थे। उनका दूल्हा या दुल्हन घोड़े पर बैठ जाये, यह तो संभव ही नहीं था। जब साँस लेना भी दूभर होने लगा तो अंततः भगाना गाँव के 70 दलित परिवारों ने 21 मई 2012 को अपने जानवरों समेत गाँव छोड़ देना ही उचित समझा। वे न्याय की प्रत्याशा में जिला मुख्यालय हिसार स्थित मिनी सचिवालय के पास आ जमें, जहाँ पर उन्होंने विरोध स्वरुप धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया। भगाना के दलितों ने ग्राम पंचायत के सरपंच से लेकर देश के महामहिम राष्ट्रपति महोदय तक हर जगह न्याय की गुहार लगायी, वे तहसीलदार के पास गए, उपखंड अधिकारी को अपनी पीड़ा से अवगत कराया, जिले के पुलिस अधीक्षक तथा जिला कलेक्टर को अर्जियां दी। तत्कालीन और वर्तमान मुख्यमंत्री से कई कई बार मिले। विभिन्न आयोगों, संस्थाओं एवं संगठनों के दरवाजों को खटखटाते रहे, दिल्ली में हर पार्टी के अलाकमानों के दरवाजों पर दस्तक दी मगर कहीं से इंसाफ की कोई उम्मीद नहीं जगी। उन्होंने अपने संघर्ष को व्यापक बनाने के लिए हिसार से उठकर दिल्ली जंतर मंतर पर अपना डेरा जमाया तथा 16 अप्रैल 2014 से अब तक दिल्ली में बैठ कर पुरे देश को अपनी व्यथा कथा कहते रहे, मगर समाज और राज के इस नक्कारखाने में भगाना के इन दलितों की आवाज़ को कभी नहीं सुना गया। हर स्तर पर, हर दिन वे लड़ते रहे, पहले उन्होंने घर छोड़ा, फिर गाँव छोड़ा, जिला और प्रदेश छोड़ा और अंततः थक हार कर धर्म को भी छोड़ गए, तब कहीं जाकर थोड़ी बहुत हलचल हुयी है लेकिन अब भी उनकी समस्या के समाधान की बात नहीं हो रही है। अब विमर्श के विषय बदल रहे है, कोई यह नहीं जानना चाहता है कि आखिर भगाना के दलितों को इतना बड़ा कदम उठाने के लिए किन परिस्थितियों ने मजबूर किया ?

गाना हरियाणा के हिसार जिला मुख्यालय से मात्र 17 किमी दूर का एक पारम्परिक गाँव है। जिसमे 59 % जाट, 8 % सामान्य सवर्ण {ब्राह्मण, बनिया, पंजाबी } 9 % अन्य पिछड़ी जातियां { चिम्बी, तेली, कुम्हार, लौहार व गोस्वामी }तथा 24 % दलित { चमार, खटिक, डोमा, वाल्मीकि एवं बैगा } निवास करते है। वर्ष 2000 में यहाँ पर अम्बेडकर वेलफेयर समिति बनी, दलित संगठित होने लगे। उन्हें गाँव में अपने साथ होने वाले अन्याय साफ नज़र आने लगे, वे अपने नागरिक अधिकारों को प्राप्त करने के प्रयास में एकजुट होने लगे, जिससे यथास्थितिवादी ताकतें असहज होने लगी। दलितों ने अपने लिए आवासीय भूमि के पट्टे मांगे तथा गाँव की शामलाती जमीन पर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग उठाई। संघर्ष की वास्तविक शुरुआत वर्ष 2012 में तब हुयी जबकि दलितों ने गाँव में स्थित चमार चौक का नाम अम्बेडकर चौक करने तथा वहां पर अम्बेडकर की प्रतिमा लगाने की मांग शुरू की। दरअसल यह चौक दलित परिवारों की आबादी के पास स्थित है, जहाँ पर कई दलितों के घरों के दरवाजे खुलते है, मगर गाँव के दबंगों को यह गवारा ना था कि इस चौक पर दलितों का कब्ज़ा हो। इतना ही नहीं बल्कि गाँव में दलितों को आवासीय भूखंड देने के लिए बनायीं गयी महात्मा गाँधी बस्ती विकास योजना के तहत प्लॉट्स का पंजीकरण और आवंटन भी उन्हें स्वीकार नहीं था। गाँव की शामलाती जमीन पर दलितों की आवाजाही भी उन्हें बर्दाश्त नहीं थी.कुल मिलाकर भगाना स्वाभिमानी दलितों के लिए नरक बन चुका था, ऐसे में दलितों के लिए गाँव छोड़कर चले जाने तथा इंसाफ के लिए आवाज़ उठाने के अलावा कोई चारा ही नहीं था। इस तरह यह लडाई चलती रही। विगत तीन वर्षों से यह जंग बहुत सघन और मज़बूत हो गयी, पहले हिसार के मिनी सचिवालय के बाहर और अंततः जंतर मंतर पर यह संघर्ष जारी रहा।

2014 से जंतर मंतर को ठिकाना बना कर लड़ रहे इन दलितों को कोई न्याय नहीं मिल पाया, ऊपर से चार दलित नाबालिग लड़कियों का भगाना गाँव में अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म का मामला और हो गया, जिसमे भी पुलिस की भूमिका संतोषजनक नहीं रह पाई, इससे भी आक्रोश बढ़ता गया। हरियाणा की पिछली सरकार ने संघर्षरत दलितों से न्याय के कई वादे किये मगर वे सत्ता से बाहर हो गए, भाजपा की सरकार के मुख्यमंत्री खट्टर से भी भगाना के पीड़ित चार बार मिलकर आये, मगर कोई कार्यवाही नहीं हुयी, लम्बे संघर्ष के कारण दलित संगठनों के रहनुमाओं ने भी कन्नी काट ली, जब कोई भी साथी नहीं रहा, तब भगाना के दलितों को कोई ना कोई तो कदम उठाना ही था, इसलिए उन्होंने संसद के सत्र के दौरान एक रैली का आह्वान करता हुआ पर्चा सबको भेजा, यह रैली 8 अगस्त 2015 को आयोजित की गयी थी, इसी दौरान करीब 100 परिवारों ने जंतर मंतर पर ही कलमा और नमाज पढ़कर इस्लाम कुबूल करने का ऐलान कर दिया, जिससे देश भर में हडकंप मचा हुआ है। भगाना में इसकी प्रतिक्रिया में गाँव में सर्वजाति महापंचायत हुयी है जिसमे हिन्दू महासभा, विश्व हिन्दू परिषद् तथा बजरंग दल के नेता भी शामिल हुए, उन्होंने खुलेआम यह फैसला किया है कि –“ धर्म परिवर्तन करने वाले लोग फिर से हिन्दू बनकर आयें, वरना उन्हें गाँव में नहीं घुसने देंगे। “विहिप के अन्तर्राष्ट्रीय महामंत्री डॉ सुरेन्द्र जैन का कहना है कि – “यह धर्मांतरण पूरी तरह से ब्लेकमेलिंग है, इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। “हिन्दू महासभा के धर्मपाल सिवाच का संकल्प है कि –“ भगाना के दलितों की हर हाल में हिन्दू धर्म में वापसी कराएँगे।” जो दलित मजहब बदल कर गाँव लौटे है उन्हें हिंदूवादी नेताओं ने समझाने के नाम पर धमकाने की कोशिश भी की है वहीँ दूसरी और देश और प्रदेश की हिंदूवादी सरकारों ने सत्ता का कहर भी ढाना प्रारम्भ कर दिया है। धर्मांतरण के तुरंत बाद ही शुक्रवार की रात को हिसार के मिनी सचिवालय के बाहर विगत तीन वर्षों से धरना दे रहे दलितों को हरियाणा पुलिस ने जबरन हटा दिया और टेंट फाड़ दिए है। दिल्ली जंतर मंतर पर भी 10 अगस्त की रात को पुलिस ने धरनार्थियों पर धावा बोल दिया, विरोध करने पर लाठी चार्ज किया गया, जिससे 11 लोग घायल हो गए है.यहाँ से भी इन लोगों को खदेड़ने का पूरा प्रयास किया गया है। अब स्थिति यह है इस्लाम अपना चुके लोगों का गाँव में बहिष्कार किया जा चुका है,हालाँकि यह भी सच है कि इनका पहले से ही ग्रामीणों ने सामाजिक बहिष्कार किया हुआ था। हिसार से उन्हें भगाया जा चुका है और जंतर मंतर से भी वो खदेड़े गए है, ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि भगाना के इतने लम्बे आन्दोलन का आखिर भविष्य क्या होगा? क्या यह आगे भी चल पायेगा या यही ख़त्म हो जायेगा? यह सवाल मैंने आन्दोलन से बहुत नज़दीक से जुड़े हुए तथा धर्मान्तरण कार्यक्रम के मुख्य योजनाकार अब्दुल रज्जाक अम्बेडकर से पूंछा, उनका कहना है कि – “जालिमों के खिलाफ यह लड़ाई जारी रहेगी। जंतर मंतर पर धरना जारी है और आईंदा भी जारी रहेगा, जहाँ तक गाँव की सर्वखाप पंचायत के फैसले की तो हम उससे नहीं डरते, हम लोग जल्दी ही भगाना जायेंगे, यह हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार है” । रज्जाक अम्बेडकर का कहना है कि –‘ हमें मालूम था कि इस धर्मांतरण के बाद हमारी मुश्किलात बढ़ेगी, क्योंकि साम्प्रदायिक संगठन इसे हिन्दू मुस्लिम का मुद्दा बना रहे है, पर जिन दलितों ने इस्लाम कुबूल कर लिया है, वो इस्लाम में रह कर ही इंसाफ की लडाई लड़ेंगे। 9 अगस्त की रात में हुए हमले में पुलिस के निर्दयी लाठीवार में रज्जाक को भी गंभीर चौटें पंहुची है, मगर उनका हौंसला बरक़रार है, वे बताते है कि –‘धर्मान्तरित दलित जानते है कि अब उनका अनुसूचित जाति का स्टेट्स नहीं बचेगा, मगर उन्हें यह भी उम्मीद है मुस्लिम बिरादरी उनके सहयोग में आगे आएगी।’

जिन दलितों ने धर्म बदला है, उनका मनोबल चारों तरफ से हो रहे प्रहारों के बावजूद भी कमजोर नहीं लगता है। नव धर्मान्तरित सतीश काजला जो कि अब अब्दुल कलाम अम्बेडकर है, कहते है कि-‘ हम हर हाल में अब मुसलमान ही रहेंगे, जो कदम हमने उठाया, वह अगर हमारे पूर्वज उठा लेते तो आज ये दिन हमको नहीं देखने पड़ते।’ इसी तरह पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले भगाना निवासी धर्मान्तरित वीरेन्द्र सिंह बागोरिया का कहना है कि –‘हम पूरी तरह से इस्लाम अपना चुके है और अब किसी भी भय, दबाव या प्रलोभन में वापस हिन्दू नहीं बनेंगे।’ अन्य दलित व अति पिछड़े जिन्होंने इस्लाम कबूला है, वो भी अपने फैसले पर फ़िलहाल तो मजबूती से टिके हुए है। भाजपा, संघ, विहिप, बजरंग दल तथा हिन्दू महासभा अपना पूरा जोर लगा रही है कि धर्मान्तरित लोग अपने मूल धर्म में लौट आये, मगर भगाना के पीड़ित दलितों ने अपना सन्देश स्पष्ट कर दिया है कि अगर हिन्दुओं को दलितों की परवाह नहीं है तो दलितों को भी हिन्दुओं की रत्ती भर भी परवाह नहीं है। एक ऐसे वक़्त में जबकि एक दक्षिणपंथी हिन्दू शासक दिल्ली की सल्लतनत पर काबिज़ है, ऐसे में उसकी नाक के नीचे खुलेआम, चेतावनी देकर, पर्चे बाँट कर, ऐलानिया तौर पर पीड़ित दलित इस्लाम कुबूल कर रहे है तो यह वर्ष 2020 में बनने वाले कथित हिन्दू राष्ट्र के मार्ग में गति अवरोधक बन सकता है। भगाना के दलितों ने लम्बे समय तक सोच कर यह निर्णय लिया है, एक माह पहले जब मैं उनके धरने में गया तब मुझे इसका अहसास होने लगा था कि उनका रुख मजहब बदलने की तरफ है और वे शायद इस्लाम का दामन थामेंगे। 

क लोकतान्त्रिक देश में कोई भी नागरिक किसी भी धर्म को स्वीकारे या अस्वीकार करे, यह उनकी व्यक्तिगत इच्छा है और कानूनन इसमें कुछ भी गलत नहीं है, इसलिए भगाना के दलितों द्वारा किये गए इस्लाम को कुबूलने के निर्णय से मुझे कोई आपति नहीं है, मैं उनके निर्णय का आदर करता हूँ, हालाँकि मेरी व्यक्तिगत मान्यता यह है कि धर्मान्तरण किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता है क्योंकि यह खुद ही एक समस्या है। संगठित धर्म के आडम्बर और पाखंड तथा उसकी घटिया राजनीती सदैव ही धर्म का सक्षम तबका तय करता है, भारत के जितने भी धर्म है, उन सबमें जातियां पाई जाती है तथा कम ज्यादा जातिगत भेदभाव भी मौजूद रहता है, इस्लाम भी इससे अछुता नहीं है.जैसा कि दलित चिन्तक एस आर दारापुरी का कहना है कि-“धर्मपरिवर्तन दलित उत्पीडन का हल नहीं है, दलितों को संघर्ष का रास्ता अपनाना चाहिए, हाँ अगर धर्म बदलना ही है तो बौद्ध धर्म अपनाना चाहिए जिसके सिद्धांत और व्यव्हार में अंतर नहीं है जबकि भारतीय इस्लाम, इसाई और सिख धर्म में यह अंतर पाया जाता है।” वाकई यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या हिन्दू धर्म का त्याग करके किसी और धर्म को अपना लेने मात्र से कोई व्यक्ति जातिगत घृणा से मुक्त हो जाता है या धार्मिक नफरत का भी शिकार होने लगता है। जैसा कि भगाना के धर्मान्तरित दलितों के साथ होने लगा है कि धर्म बदलते ही उनके प्रति राज्य और समुदाय दोनों का व्यवहार अत्यंत क्रूर हो गया है। फिर यह भी देखना होगा कि क्या आज मुसलमान खुद भी स्वयं को सुरक्षित महसूस करते है, जिस तरीके से बहुसंख्यक भीड़ के हमले उन पर बढ़ रहे है, गुजरात, मुज्जफरनगर, अटाली जैसे हमले इसके उदहारण है, ऐसे में भले ही दलित उनका दामन थाम रहे है, मगर उनका दमन थमेगा, इसकी सम्भावना बहुत क्षीण नजर आती है।

अंतिम बात यह है कि अब भगाना के दलितों की आस्था बाबा साहेब के संविधान के प्रति उतनी प्रगाढ़ रह पायेगी या वो अपनी समस्याओं के हल कुरान और शरिया तथा अपने बिरदाराने मुसलमान में ढूंढेगे? क्या लडाई के मुद्दे और तरीके बदल जायेंगे, क्या अब भी भगाना के दलित मुस्लिम अपने गाँव के चमार चौक पर अम्बेडकर की प्रतिमा लगाने हेतु संघर्ष करेंगे या यह उनके लिए बुतपरस्ती की बात हो जाएगी, सवाल यह भी है कि क्या भारतीय मुसलमान भगाना के नव मुस्लिमों को अपने मज़हब में बराबरी का दर्जा देंगे या उनको वहां भी पसमांदा के साथ बैठ कर मसावात की जंग को जारी रखना होगा? अगर ऐसा हुआ तो फिर यह खाई से निकलकर कुएं में गिरने वाली बात ही होगी। भगाना के दलितों को इंसाफ मिले यह मेरी भी सदैव चाहत रही है, मगर उन्हें इंसाफ के बजाय इस्लाम मिला है, जो कि उनका अपना चुनाव है, हम उनके धर्म बदलने के संवैधानिक अधिकार के पक्ष में खड़े है, कोई भी ताकत उनके साथ जोर जबरदस्ती नहीं कर पायें और जो भी उनका चयन है, वे अपनी चयनित आस्था का अनुपालन करे,यह सुनिश्चित करना अब भारतीय राष्ट्र राज्य की जिम्मेदारी है, मगर अब भी मुझे दलित समस्याओं का हल धर्म बदलने में नहीं दिखाई पड़ता है। आज दलितों को एक धर्म छोड़कर दुसरे धर्म में जाने की जरुरत नहीं है, उन्हें किसी भी धर्म को स्वीकारने के बजाय सारे धर्मों को नकारना होगा, तभी मुक्ति संभव है, संभवतः सब धर्मों को दलितों की जरुरत है, मगर मेरा मानना है कि दलितों को किसी भी धर्म की जरुरत नहीं है .धर्म रहित एक लोकतंत्र जरुर चाहिए, जहाँ पर समता, स्वतंत्रता और भाईचारा से परिपूर्ण जीवन जीने का हक सुनिश्चित हो।

Saturday, July 11, 2015

'घड़ीसाज'



'लघुकथा'

'घड़ीसाज'

- दिनेशराय द्विवेदी


- कुछ सुना तुमने?
- क्या?
- अरे! तुमने रेडियो नहीं सुना? टीवी नहीं देखा?
- देखा है, सब देखा है। उस में तो न जने क्या क्या होता है। मुझे कैसे पता कि तुम किस के लिए बोल रहे हो?
- मैं वो बड़े साहब की बात कर रहा था।
- कौन बड़े साहब?
- अरे? वही शेरखान साहब!
- अच्छा, अच्छा!
- अच्छा अच्छा क्या? वही अपने सरकस के नए मनीजर साहब!
- हाँ हाँ वही न? जो बात बात में जो बात बात में राष्ट्र बनाने की बात करते हैं?
- हाँ, वही। अब समझे तुम! उन ने बोला है कि राष्ट्र बनाना है।
- क्या मतलब? क्या राष्ट्र अभी तक बना हुआ नहीं था?
- नहीं नहीं, उन का ये मतलब नहीं था। राष्ट्र तो बना हुआ है। पर जरा बिगड़ा हुआ है न! उसे फिर से बनाना है। जैसे घड़ी चलते चलते आगे या पीछे चलने लगती है तो उसे घड़ीसाज के पास ले जाना पड़ता है, वह बना देता है।
- अच्छा तो बड़े साहब घड़ीसाज भी हैं?
- तुम्हें कितना ही समझाओ। तुम रहोगे चुगद के चुगद ही। राष्ट्र कोई घड़ी थोड़े ही है जिसे बनाने के लिए घड़ीसाज की जरूरत होगी।
- हाँ, वो भी सही है। आज कल घड़ी कौन बनवाता है। थोड़ी भी इधर उधऱ होने लगी कि फेंक दी और नयी ले आए। वैसे भी यूज एण्ड थ्रो का जमाना है। यार! तुम्हारे साहब इस खराब राष्ट्र को फेंक क्यों नहीं देते। नया खरीद लें। बिलकुल कंपनी की गारण्टी वारण्टी वाला। सारा खेल खतम।
- तुम नहीं सुधरोगे! समझना ही नहीं चाहते तो वैसे कह दो।
- नहीं नहीं? ऐसी कोई बात नहीं। मैं समझना चाहता हूँ। पर उदाहरण से समझें तो अच्छा समझ आता है।
- ठीक है, ठीक है। उदाहरण ही सही। पर उदाहरण तो सही दिया करो। अब ये घड़ी और घड़ीसाज का उदाहरण सही नहीं है। कोई और अच्छा सा होना चाहिए था। चल! छोड़। हम भी कहाँ उलझ गए। ..... तो मैं बता रहा था कि साहब ने सब को संदेश दिया है।
- क्या?
- कि गैस सब्सिडी छोड़ दो, राष्ट्र बनाना है।
- गैस सब्सिडी?
- वही पैसा न जो सिलेंडर का पैसा देने के बाद अब खाते में आ जाता है, उस के लिए लिख दो कि वो हमें नहीं चाहिए।
- ओह! तो साहब को पैसा चाहिए?
- क्यों नहीं चाहेगा पैसा? साहब राष्ट्र जो बनाएंगे।
- तब तो मेरा उदाहरण बिलकुल सही था। घड़ीसाज भी तो घड़ी बनाने का पैसा लेता है।

Friday, June 19, 2015

न्याय और कार्यपालिका के बीच शीत गृह-युद्ध

देश में शीत गृहयुद्ध जारी है। हमारी न्याय व्यवस्था जर्जर होने की सीमा तक पहुँच गयी है। कहीं कहीं फटी हुई भी है। फटने से हुए छिद्रों को छुपाने के लिए लगाए गए पैबंद खूब दिखाई देने लगे हैं। जहाँ सौ जोड़ा कपड़ों की हर साल जरूरत है, वहाँ दस जोड़ा कपड़े दिए जाते हैं। जंजीरों में बंधे गुलामों के वो चित्र याद आते हैं जिन में गुलामों से जब तक वे बहोश न खो दें काम कराया जाता था और खाने को इतना ही दिया जाता था कि वे मर न जाएँ। वैसी ही हालत हमारी न्याय पालिका की है। न्याय पालिका हमारे संघ राज्य का महत्वपूर्ण अंग है। लेकिन वह कभी कभी जनपक्षीय हो जाता है। यही कारण है कि उसे विधायिका और कार्यपालिका कभी मजबूत नहीं होने देती। यह डर हमेशा सताता रहता है कि कहीं वह पूंजीवादी निजाम को पलटने का एक साधन न बन जाए।

यही है हमारी स्वतंत्र न्याय पालिका। हर साल उच्चतम न्यायालयों और उच्च न्यायालयों के जजों के साथ प्रधानमंत्री एक समारोह करते हैं। पिछले 15 वर्षों के इन समारोहों की रपटें उठा ली जाएँ तो पता लगेगा कि हर बार मुख्य न्यायाधीश अदालतों की अतिशय कमी की ओर ध्यान दिलाते हैं। पर इन अदालतों की स्थापना तो सरकार से मिलने वाले वित्त पोषण पर निर्भर करती है। हर साल प्रधानमंत्री आश्वासन देते हैं। लेकिन सरकारें अण्डज हैं, साल भर बाद नतीजे के नाम पर अण्डा निकलता है।

उधर विधायिकाओं और सरकारों के पास देश की हर समस्या का एक इलाज है, कानून बना दो। वे कानून बनाते हैं। हर कानून अदालतों में मुकदमों का इजाफा करता है। हर कानून के साथ न्याय पालिका में अदालतें भी बढ़ाने का इंतजाम होना चाहिए। लेकिन उस से सरकार को क्या? यदि मुकदमे देर तक चलेंगे तो सरकार की बदनामी थोड़े ही होगी, बदनाम तो न्याय पालिका होगी। यही तो सरकारें चाहती हैं। तभी तो सरकार के लिए न्यायपालिका में हस्तक्षेप के अवसर पैदा होंगे। आप देख ही रहे हैं कि सरकार ने कॉलेजियम की पद्धति को बदल कर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बना दिया है। अब नए जजों को पुराने जज नहीं बल्कि ये आयोग चुनेगा। इस आयोग के गठन को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी है। न्याय पालिका इस परिवर्तन के विरुद्ध लड़ रही है। लेकिन उस के पास फौज और पुलिस जैसे हथियार तो हैं नहीं। उस के पास जो साधारण औजार हैं और वह उन्हीं से लड़ रही है।

कई बरस पहले देशी-विदेशी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव पर परक्राम्य विलेख अधिनियम में चैक बाउंस को अपराध बनाए जाने का कानून बनाया गया। कानून बनते ही चैक का इस्तेमाल आम हो गया। अब चैक सब से बड़ी गारंटी होने लगा। कंपनियों से ले कर गली के बनियों ने उधार माल बेचने और बहुराष्ट्रीय वित्तीय उपक्रमों से ले कर टटपूंजिए साहूकारों तक ने चैक का खूब इस्तेमाल किया। पहले तो उधार वसूलने के लिए गुंडों और लठैतों की जरूरत होती थी। अब अदालतें यह काम करने लगीं। बड़ी कंपनियों ने चैक ले कर थोक में अपने उत्पाद बेचे और जब वे चैक अनादरित होने लगे तो सब के खिलाफ मुकदमे होने लगे। एक कंपनी ने तो दक्षिण भारत की एक अदालत में एक ही दिन में 70000 से अधिक मुकदमे पेश किए। अगले दिन खबर मुख्य न्यायाधीश को मिली और तीसरे दिन एक समारोह में उन्होने बयान दिया कि वे इस कानून को रुपया वसूली का औजार न बनने देंगे। एक समय में 500 मुकदमों की सुनवाई करने की क्षमता वाली अदालत पर 70000 हजार मुकदमे आ जाएँ तो शायद उन्हें रजिस्टर में दर्ज करने में ही दो-तीन साल तो लग ही जाएंगे।

लेकिन मुख्य न्यायाधीश के कहने से क्या होता है? मुकदमे आते रहे और अदालतें बोझिल होती रहीं। कोई प्राथमिक अपराधिक अदालत ऐसी न बची जहाँ इस तरह के मुकदमे हजार पाँच सौ की संख्या में लंबित न हों। हाल वैसा हो गया जैसे सारे वाहन यकायक एक साथ सड़क पर निकल आने पर होता है। अदालतों मे ट्रेफिक जाम होने लगा। ट्रेफिक जाम में नियम कानून और नैतिकता सब दाँव पर होते हैं। कैसे भी सवार बाहर निकलने की कोशिश करता है और ट्रेफिक के सिपाही डंड़ा फटकार कर जाम को हटाने की कोशिश करते हैं।

यही हुआ भी। 1 अगस्त 2014 को उच्चतम न्यायालय के तीन जजों की बैंच ने दशरथ रूपसिंह राठौड़ के मुकदमे में यह फैसला दिया कि चैक बाउंस का मुकदमा सुनने का अधिकार केवल उस अदालत को है जिस के क्षेत्र में चैक जारीकर्ता की बैंक की शाखा स्थित है। अब तक लगभग सारे मुकदमे वहाँ दाखिल किए गए थे जहाँ चैक डिसऑनर हुआ था। पुराने मुकदमों को वापस ले कर इस निर्णय के अनुसार क्षेत्राधिकार वाली अदालत में प्रस्तुत करने के लिए 30 दिन की अवधि निर्धारित की गयी। हजारों मुकदमे वापस दिए गए जिन में से कुछ मुकदमे जो साधारण न्यायार्थियों के थे, वापस पेश ही नहीं हुए जब कि बहुत सारी कंपनियों और न्यायार्थियों ने अपने मुकदमे दूसरे राज्यों की अदालतों में पेश किए ।

इस से सब से बड़ी परेशानी बड़ी कंपनियों को हुई। चैक अब अच्छी गारंटी नहीं रहा। कंपनियों को माल बेचने में परेशानी आने लगी। उन्हों ने फिर सरकारा पर दबाव बनाया और कानून में बदलाव की हवा बनने लगी। कानून बनने में तो देर लगती है। संसद में पारित कराना होता है, फिर राष्ट्रपति का अनुमोदन चाहिए तब कानून लागू होता है। इस से बचाने का एक रास्ता अध्यादेश लागू करना है। सो केन्द्र सरकार ने इतनी तत्परता दिखाई कि 15 जून को परक्राम्य विलेख अधिनियम में संशोधन अध्यादेश लागू कर दिया।

दशरथ रूप सिंह राठौर के मुकदमे में उच्चतम न्यायालय ने खास तौर पर इस बात का उल्लेख किया था कि किस तरह इन मुकदमों ने मजिस्ट्रेट न्यायालयों में एक एविलांस (ऊँचे पहाड़ों में हिम स्खलन से उत्पन्न बर्फीला तूफान) उत्पन्न कर दिया है –

“we need to remind ...... “हमें खुद को याद दिलाने की जरूरत है कि इस देश की मजिस्ट्रेसी पर चैक अनादरण के मुकदमों का हिमस्खलन आया हुआ है। विधि आयोग की 213वीं रिपोर्ट के अनुमान के अनुसार अक्टूबर 2008 में इस तरह के मुकदमों की संख्या 38 लाख से अधिक थी। नतीजे के तौर पर चैक अनादरण के मुकदमों से देश के हर मुख्य शहर की मजिस्ट्रेट स्तर की अपराधिक न्याय व्यवस्था का दम घुट रहा था। चार महानगरों और अन्य व्यावसायिक महत्व के केन्द्रों की अदालतें इस तरह के मुकदमों के कारण भारी बोझ से दब गईं। अकेले दिल्ली की अदालतों में 1 जून 2008 को इस तरह के पाँच लाख से अधिक मुकदमे लंबित थे। दूसरे अनेक शहरों की हालत भी इस से अच्छी नहीं है, केवल इसलिए नहीं कि वहाँ बड़ी संख्या में धारा 138 के मामले घटे हैं बल्कि इस लिए कि बहुराष्ट्रीय व दूसरी कंपनियों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों व अभिक्रमों ने इन शहरों को शिकायत दर्ज कराने के लिए उचित समझा जिस का इस से अच्छा कारण कोई नहीं है कि अनादरित चैक की राशि को लौटाने के लिए नोटिस जारी किए गए थे और चैक उन शहरों की शाखाओं में समाशोधन के लिए जमा किए गये थे”। ... banks in those cities.”

इस उल्लेख से यह स्पष्ट हो गया था कि उच्चतम न्यायालय किस तरह परेशान है और उस से निपटने के लिए क्षेत्राधिकार के आधार पर वह कुछ मुकदमे कम होते देखना चाहता है। कम से कम कार्यपालिका को एक चेतावनी देना चाहता है। लेकिन उच्चतम न्यायालय का यह मंसूबा सरकार कैसे पूरा होने देती। उस ने इस मामले को संसद तक ले जाने और कानून में संशोधन करने तक की राह नहीं देखी। तब तक वे कंपनियाँ कैसे इन्तजार करतीं जिन्हों ने करोड़ों रुपए इस सरकार को बनाने में दाँव पर लगाए थे। अपने आका को इतने दिन परेशान होते देखना किस जिन्न को बर्दाश्त होता है? वे अध्यादेश लाए और एक दम आका की परेशानी का हल पेश कर दिया।

यह सरकार और न्यायपालिका के बीच का शीत गृह-युद्ध है। जहाँ न्याय पालिका के पास निर्णय पारित करने का औजार है वहीं सरकार के पास निर्णयों को कानून और अध्यादेशों के जरिए पलट डालने का शस्त्र मौजूद है। अब साल में दो चार बार इस युद्ध का नजारा देखने को मिलता ही रहेगा। जब तक कि न्यायपालिका को देश की जरूरतों के मुताबिक अदालतें नहीं मिल जातीं। आप जानते हैं, देश की जरूरत क्या है? नहीं जानते हों तो मैं ही बता देता हूँ। देश को मौजूदा अदालतों की संख्या से चार गुनी और अदालतें चाहिए।

Saturday, June 13, 2015

फर्जी डिग्री

'लघुकथा'
रामदास सरकारी टीचर हो गया। वह स्कूल में मुझ से चार साल पीछे था। एक साधारण विद्यार्थी जो हमेशा पास होने के लिए जूझता रहता था।  मैं स्कूल से कालेज में चला गया। फिर पता लगा कि वह दसवीं क्लास में दो बार फेल हो जाने पर पढ़ने मध्यप्रदेश चला गया। कुछ साल बाद जानकारी मिली कि उस ने वहाँ से न केवल हायर सैकण्डरी बल्कि बीए भी कर लिया और बीएड भी। कुछ दिन उस ने निजी स्कूलों में भी पढाया।

सरकारी नौकरी मिलने पर उस की पहली पोस्टिंग किसी गाँव के स्कूल में हुई थी। वह एक जीप से रोज शहर से गाँव जाता। इसी जीप से बहुत टीचर और टीचरनियाँ रोज शहर से गाँवों के स्कूल जाया करते थे। एक टीचरनी से उस की दोस्ती हो गयी। दोस्ती भी ऐसी कि धीरे धीरे प्यार में बदल गयी। दोनों ने शादी कर ली। 

शादी हो जाने के बाद दोनों ने कोशिश कर के अपनी पोस्टिंग जिला मुख्यालय पर करवा ली। दोनों कमाते और बचाते। फिर जिला मुख्यालय के शहर की ही एक बस्ती में प्लाट ले लिया। धीरे धीरे उस पर दो मंजिला मकान बना लिया। उन्हीं दिनों पडौस में कोचिंग इंस्टीट्यूट खुले तो पढ़ने वाले बच्चे कमरे ढूंढने लगे। रामदास ने बैंक से लोन ले कर दो मंजिलें और बना लीं और कमरे कोचिंग स्टूडेण्ट्स को किराए पर चढ़ा दिए। 

फिर एक दिन पता लगा कि रामदास की हायर सैकण्डरी का प्रमाण पत्र फर्जी निकला। उसे आरोप पत्र मिला और आखिर उसे नौोकरी से निकाल दिया गया। पर इस से रामदास के जीवन पर कोई बड़ा असर नहीं हुआ। रामदास की पत्नी अब भी सरकारी टीचर है। वह नौकरी पर जाती है। घर का सारा काम रामदास देख लेता है। खाना भी अक्सर दोनों वक्त का खुद ही बनाता है और बच्चों को भी संभाल लेता है। आमदनी की कोई कमी नहीं। जितना वेतन टीचर की नौकरी से मिलता था उस से दुगना तो वह मकान के किराए से कमा लेता है। रामदास सुखी है, उस की पत्नी अब भी खुश है। बेटा इंजिनियर हो गया है, बंगलौर में नौकरी कर रहा है। रामदास के पास बेटे के लिए खूब रिश्ते आ रहे हैं अच्छे खासे दहेज के प्रस्ताव के साथ।

Sunday, June 7, 2015

भूत-कथा

भूत-कथा 

  • दिनेशराय द्विवेदी



रात बाथरूम में चप्पल के नीचे दब कर एक कसारी (झिंगूर) का अंत हो गया। चप्पल तो नहाने के क्रम में धुल गयी। लेकिन कसारी के अवशेष पदार्थ बाथरूम के फर्श पर चिपके रह गए।

अगली सुबह जब मैं बाथरूम गया तो देखा कसारी के अवशेष लगभग गायब थे। केवल अखाद्य टेंटेकल्स वहाँ कल रात की दुर्घटना का पता दे रहे थे। बचे हुए भोजन कणों का सफाया करने में कुछ चींटियाँ अब तक जुटी थीं।

अगली बार जब मेैं बाथरूम गया तो वह पूरी तरह साफ था। वहाँ न चींटियाँ थीं और न ही कसारी का कोई अवशेष। किसी ने स्नान के पहले उस के फर्श को जरूर धोया होगा।

कसारी एक जीवित पदार्थ थी, एक दुर्घटना ने उस के जीवन तंत्र को विघटित कर दिया, वह मृत पदार्थ रह गयी। चींटियों ने उसे अपना भोजन बनाया। मृत पदार्थ अनेक जीवनों को धारण करने का आधार बना। बाथरूम धुलने के समय कुछ चींटियाँ वहाँ रही होंगी तो पानी में बह गयी होंगी। जाने वे जीवित होंगी या फिर उन में से कुछ मृत पदार्थ में परिवर्तित हो कर और किसी जीवन का आधार बनी होंगी।

इस बीच काल्पनिक आत्मा और परमात्मा कहीं नहीं थे, अब इस कथा को पढ़ कर वे किसी के चित्त में मूर्त हो भी जाएँ तो उन सब का आधार यह भूत-कथा ही होगी।