'लघुकथा'
एक समय की बात है, जब देश की आत्मा दो नगरों में बंटी हुई थी, एक था न्यायपुर, जहाँ दीवारें काली थीं, और दूसरा आस्थागढ़, जहाँ मंदिरों की घंटियाँ हर पल गूंजती थीं।
मुकदमे अब जीवित नहीं थे, वे
कागज़ी प्राणी थे, जिनके पास आँखें थीं, तर्क थे, और कभी-कभी आँसू भी।
"महोदय, मेरा एक
दस्तावेज़ अभी प्रतिवादी से नहीं आया है। कृपया मुझे थोड़ा समय दीजिए, अन्यथा मेरा वध हो जाएगा।"
"यह टारगेट मुकदमा है। देरी नहीं चलेगी।
हमें रोज़ ऊपर जवाब देना होता है।"
और फिर सत्यप्रार्थी का वध हो गया।
उसी दिन, आस्थागढ़ में उत्सव था। ध्वजारोहण की तैयारी थी। मंदिर के शिखर पर केसरिया पताका लहराने वाली थी।
राजा स्वयं आए थे, आरती की थाली लिए। गणेशजी
की मूर्ति के सामने दीप जलाया गया।
घंटियाँ बजीं, पुष्पवर्षा हुई, और सोलह नगरों में रथयात्रा निकली।
न्यायपुर के एक वृद्ध दरबारी ने यह दृश्य देखा और बुदबुदाया,
"जब न्याय कालकोठरी में बंद हो, तब भी उत्सव तो हो ही सकता है।"
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
एक ओर अंधेरा था, जहाँ सत्य का वध हो रहा था।
दूसरी ओर उजाला था, जहाँ आस्था का जयघोष हो
रहा था।
और देश… ?
कुछ कहते थे, “उसका गौरव बढ़ रहा है”।
कुछ अंधेरे में आँसुओं के साथ कहते थे, “देश मर
रहा है।