चिदम्बरम् बाबू ने फिर कहा है कि वे तीन साल में नक्सलवाद पर काबू पाएंगे। लेकिन कैसे? इस के खुलासे में उन्हों ने अपना नया फार्मूला पेश किया है वह बिलकुल दिलासा देने काबिल नहीं है। उन का कहना है कि वे विकास और सुरक्षा उपायों के माध्यम से इस पर काबू पाएंगे। 'विकास' और 'सुरक्षा ' इन दो शब्दों का अर्थ चिदम्बरम बाबू के लिए कुछ हो सकता है और जनता के लिए कुछ। यह भी हो सकता है कि नक्सलवादियों के लिए उस का अर्थ कुछ और हो।

जहाँ तक बात विकास की है, जनता अब तक विकास के नाम पर सिर्फ सड़कें देखती आई है। जो चुनावों के ठीक पहले चमचमाती हैं और सरकारें बनने के बाद उन के उखड़ने का सिलसिला तुरंत शुरू हो जाता है। इस के अलावा जनता तमाम नेताओं और उन के कुनबे को फलता फूलता देखती है। दूसरी और जनता का जीवन और दूभर होता जाता है। पिछले दिनों महंगाई ने जो कमर तोड़ी है उस के सीधे होने के आसार दूर दूर तक नजर नहीं आते। उस पर शरद पंवार जैसे बयान-बाज के बयान दुखते नंगे घावों पर नमक और छिड़क जाते हैं। चिदम्बरम बाबू किस विकास के माध्यम से नक्सलवाद की हवा खिसकाना चाहते हैं? जरा उसे परिभाषित तो कर दें।
नक्सलवाद आज जंगलों में अपनी जड़ें जमाए बैठा है। उस की वजह है कि जंगलों की आबादी को उन्हीं जंगलों में बेशकीमती खनिजों का खनन करने वालों ने उजाड़ा है, बरबाद और बेइज्जत किया है। नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों का तो मुझे प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है लेकिन इतना जानता हूँ कि राजस्थान के गिने चुने जंगलों में जितनी खानें सरकारी कागजों में दिखाई गई हैं उस से संख्या में दुगनी से भी अधिक खानें वास्तव में चल रही हैं। वन नष्ट हो रहे हैं। उन के साथ ही वनवासी और उन का जीवन नष्ट हो रहा है। यह नक्सलवादी प्रचार कि सरकार जंगलों को देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हवाले कर देना चाहती है, जनता को सच लगता है। क्यों नहीं चिदम्बरम बाबू इस का जवाब इस तरह देते कि जंगलों में कोई भी नया खनन तब तक नहीं होगा जब तक उस इलाके के वनवासी उस से सहमत नहीं होते। पुराने खनन क्षेत्रों की जाँच की जाएगी और यदि यह पाया गया कि इस से वन और वनवासी जीवन को हानि पहुंच रही है तो उसे रोक दिया जाएगा। चिदंबरम बाबू आप घोषणा करें और इस ओर पहला कदम उठा कर तो देखें। और फिर उस का चमत्कार देखें। पर आप कैसे ऐसा कर पाएंगे? किया तो अपने आकाओं को क्या मुहँ दिखाएँगे?
9 टिप्पणियां:
किस ओर ले जा रहे है यह नेता इस देश को....इन गधो को अकल आनी चाहिये की अगर देस नही बचा तो यह केसे बचेगे??? आप ने बिलकुल सही लिखा आप की एक एक बात से सहमत हुं
आकाओं को मूँह दिखाने के चक्कर में ही तो सब सत्यानाश हुआ जा रहा है.
विकास और सुरक्षा, दोनों अनसुलझे से पड़े हैं देश की विस्तृतता में, पता नहीं तीन वर्षों में कैसे बँध पायेंगे।
आज आधी सदी बाद विकास याद आया... हा हा हा..
उन्होंने बचे हुए कार्यकाल के हिसाब से फार्मूला दे दिया है ! आगे का फार्मूला अगली सरकार बना कर देगी ,रही जनता उसे फार्मोलिन में रखा जा सकता है !
नेताओं को फ़ार्मुले देने के अलावा क्या काम है? पांच साला फ़सल काटकर चले जायेंगें.
रामराम
बाढ़ खेत को कैसे खाती है देखना हो भारत की ओर देखें।
घुघूती बासूती
हमारे देश में कहाँ भ्रष्टाचार नहीं है?जिसको जहाँ मौका मिलता है, एक एक बूंद निचोड़ लेता है| काम करने को कोई राज़ी नहीं है।
जब तक इस गंदगी की सफाई नहीं होगी, कुछ भी होना नामुमकिन है | यह चिदम्बरम साहब पर निर्भर नहीं करता|
बहुत पहले मैंने एक फिल्म देखी थी, सत्यकाम | आज भी बहुत प्रासंगिक है
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