@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: नहीं मना सका मैं, मुंशी प्रेमचंद जी का जन्मदिन

शनिवार, 31 जुलाई 2010

नहीं मना सका मैं, मुंशी प्रेमचंद जी का जन्मदिन

ज मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन है। वे भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि हैं। उन्होंने भारतीय जन जीवन, उस की पीड़ाओं को गहराई से जाना और अभिव्यक्त किया। उन की कृतियाँ हमें उन के काल के उत्तर भारतीय जीवन का दर्शन कराती हैं। 
न का बहुत सा साहित्य अन्तर्जाल पर उपलब्ध है। लेकिन उन का एक महत्वपूर्ण आलेख 'महाजनी सभ्यता' अभी तक अंतर्जाल पर उपलब्ध नहीं है। मैं ने सोचा था कि उन के इस जन्मदिन पर मैं इसे अंतर्जाल पर चढ़ा दूंगा। लेकिन जब कल तलाशने लगा तो वह आलेख जिस पुस्तक में उपलब्ध था नहीं मिली। मुझे उस पुस्तक के न मिलने का भी बहुत अफसोस हुआ, मैं ने उसे करीब पिछले तीस वर्षों से सहेजा हुआ था। 
मुझे कुछ तलाशते हुए परेशान होते देख पत्नी शोभा ने पूछा -क्या तलाश रहे हो? मैं ने बताया कि कुछ किताबें और पत्रिकाएँ नहीं मिल रही हैं। रद्दी में तो नहीं दे दीं? तब उस ने कहा कि कोई किताब और पत्रिका रद्दी में नहीं दी गई है। हाँ, दीपावली पर सफाई के वक्त कुछ किताबें ऊपर दुछत्ती में जरूर रखी हैं। मैं तुरंत ही दुछत्ती से उन्हें निकालना चाहता था। लेकिन वहाँ पहुँचने का एक मात्र साधन स्टूल टूट कर चढ़ने लायक नहीं रहा है। खैर महाजनी सभ्यता को इस जन्मदिन पर अंतर्जाल पर नहीं चढ़ा पाया हूँ। लेकिन जैसे ही वह पुस्तक मेरे पल्ले पड़ी इसे अविलंब चढ़ाने का काम करूंगा। प्रेमचंद जी के अगले जन्मदिन का इंतजार किए बिना।

11 टिप्‍पणियां:

Abhishek Ojha ने कहा…

प्रेमचंद की कहानियाँ और उपन्यास तो पढ़े हैं लेकिन ये आलेख नहीं पढ़ा. किस किताब में है ये बताएं तो शायद मैं ढूढ़ पाऊं?

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कहानियाँ लगभग पूरी पढ़ी हैं पर कुछ पुनः पढ़ने का मन करता है।

bhuvnesh sharma ने कहा…

इंतजार रहेगा इस आलेख का...

शरद कोकास ने कहा…

आप सारा दिन प्रेमचन्द के साथ रहे ...कैसे कह सकते है कि आप प्रेम चन्द का जन्म दिन मना नही सके ?

राज भाटिय़ा ने कहा…

जब मै बहुत छॊटा था शायद पहली कलास मै तो पिता जी मुझे मुंशी प्रेमचंद जी की किताबे ला कर देते थे, ओर मेने वो सब कहानियां एक बार नही कई बार पढी, लेकिन मन नही भरता फ़िर फ़िर पढने को मन करता है, अब आप ने जिस आलेख का नाम लिखा है वो नही पढा, पढा भी हो तो ३५ ४० साल पहले पढा होगा, मुझे बेसवरी से इंतजार है उस लेख का, चलिये इंतजार है उस लेख का. आप का धन्यवाद,मुंशी प्रेमचंद जी को नमन

शिवम् मिश्रा ने कहा…

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आप को बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

प्रेमचंद जी का साहित्य बहुत कुछ काफ़ी पहले पढा है, महाजनी सभ्यता वाकई नही पढा. आपके द्वारा इस आलेख के प्रकाशन का इंतजार रहेगा.

रामराम

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

अच्छा लगा यह पढ़कर कि कितना सहेजतें हैं आप धरोधहरों को. आशा है, शीघ्र पढ़ने को मिलेगी यह रचना, आपके सौजन्य से.

Sachi ने कहा…

आपके इस लेख का बहुत इंतज़ार रहेगा | आप की ओर से मुझे रामधारी सिंह "दिनकर" के बारे में पढ़कर अच्छा लगेगा|

Sachi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

किस किताब में है यह?…आपने लगाया या नहीं?